शनिवार, 10 अक्टूबर 2026
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शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026
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गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026
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बुधवार, 7 अक्टूबर 2026
निठल्ले के नोट्स - काम के प्रति समर्पण या अपने अपने राम के प्रति, सफलता के लिए क्या है जरूरी
सवाल का केंद्र यही विरोधाभास है—क्या सफलता मेहनत का फल है, आस्था का, संबंधों का, अवसर का, या इन सबके बीच किसी ऐसे अदृश्य समीकरण का जिसे हम अक्सर ‘किस्मत’ कहकर छोड़ देते हैं?
सफलता का पैमाना क्या है? यह सवाल जितना सीधा दिखाई देता है, उतना ही उलझा हुआ है। बचपन से हमें बताया जाता है कि खूब पढ़ो, मेहनत करो, ईमानदारी से काम करो, लक्ष्य बनाओ और सफलता तुम्हारे कदम चूमेगी। फिर जीवन में प्रवेश करते ही पता चलता है कि कहानी इतनी सरल नहीं है। कोई आदमी वर्षों तक ईमानदारी से काम करता रहता है, सुबह समय पर दफ्तर पहुंचता है, शाम को थका-हारा लौटता है, अपने काम में कोई कमी नहीं छोड़ता, फिर भी पदोन्नति की सीढ़ी पर उससे आगे वह आदमी निकल जाता है जो काम से अधिक लोगों को संभालना जानता है। कोई व्यक्ति अपनी पूरी जवानी प्रतियोगी परीक्षाओं, डिग्रियों और नौकरी की तलाश में लगा देता है, जबकि कोई दूसरा कम योग्यता के बावजूद सही समय पर सही व्यक्ति से मिलकर ऐसी जगह पहुंच जाता है जहां पहला व्यक्ति पूरी जिंदगी भी नहीं पहुंच पाता। तब मन में सवाल उठता है—आखिर सफलता मेहनत से मिलती है या ‘अपने-अपने राम’ की कृपा से?
यहां ‘अपने-अपने राम’ को केवल धार्मिक अर्थ में देखना शायद इस प्रश्न को छोटा कर देना होगा। किसी के राम भगवान हैं, किसी के लिए भाग्य, किसी के लिए पिता की संपत्ति, किसी के लिए राजनीतिक संरक्षण, किसी के लिए रिश्तों का जाल, किसी के लिए चतुराई और किसी के लिए उसकी अपनी प्रतिभा। किसी का राम मंदिर में बैठा है, किसी का दफ्तर के केबिन में, किसी का मोबाइल की कॉन्टैक्ट लिस्ट में और किसी का बैंक खाते में। आदमी अक्सर अपने-अपने राम की शरण में जाता है क्योंकि उसे मालूम है कि जीवन केवल योग्यता की परीक्षा नहीं है; यह अवसर, परिस्थिति, संसाधन, संबंध, स्वास्थ्य, समय और संयोग की भी परीक्षा है। इसलिए यह कहना कि जो सफल हुआ वह केवल मेहनती था और जो असफल रहा वह आलसी था, जीवन की जटिलता के साथ अन्याय होगा।
हमारे समाज में सफलता का एक दिलचस्प धार्मिक संस्करण भी दिखाई देता है। आदमी पूजा करता है, व्रत रखता है, मंदिर जाता है, दान करता है, हर दूसरे वाक्य में भगवान का नाम लेता है और संकट आते ही कहता है—‘भगवान सब ठीक कर देंगे।’ इसमें कुछ भी गलत नहीं है। आस्था मनुष्य को मानसिक सहारा देती है, उसे आशा देती है और कठिन समय में टूटने से बचा सकती है। समस्या तब शुरू होती है जब पूजा को कर्म का विकल्प मान लिया जाता है। अगर कोई व्यक्ति सुबह मंदिर में सौ दीपक जला आए और दिनभर अपने काम में बेईमानी करे, अधीनस्थों का शोषण करे, दूसरों का हक मारे और फिर शाम को भगवान से सफलता का आशीर्वाद मांगे, तो यह आध्यात्मिकता कम और धार्मिक प्रदर्शन अधिक है। धर्म मनुष्य के भीतर उतरता है तो उसके व्यवहार में दिखाई देना चाहिए; केवल माथे पर तिलक, हाथ में माला और जुबान पर भगवान का नाम आ जाने से आदमी धार्मिक नहीं हो जाता।
लेकिन यहां एक और कठिन सवाल है। क्या अत्यंत सफल व्यक्ति का धार्मिक होना अपने आप में उसके कर्मों की सफलता का प्रमाण है? बिल्कुल नहीं। पैसा, पद, प्रसिद्धि और प्रभाव नैतिकता के प्रमाणपत्र नहीं हैं। इतिहास और वर्तमान दोनों में ऐसे लोग मिलते हैं जो अत्यंत प्रभावशाली और सफल रहे, लेकिन उनके आचरण पर गंभीर प्रश्न भी उठे। इसलिए सफलता और सदाचार को एक ही तराजू पर तौलना उचित नहीं। एक व्यक्ति आर्थिक रूप से सफल हो सकता है लेकिन नैतिक रूप से विफल; दूसरा व्यक्ति आर्थिक रूप से साधारण हो सकता है लेकिन मनुष्यता की कसौटी पर अत्यंत सफल। असली कठिनाई यह है कि समाज पहले व्यक्ति को सफल और दूसरे को असफल कह देता है, क्योंकि समाज को दिखाई देने वाली चीजें पसंद हैं—मकान, गाड़ी, पद, पैसा, प्रतिष्ठा और सामाजिक प्रभाव। चरित्र की संपत्ति दिखाई नहीं देती।
फिर मेहनत का क्या? क्या मेहनत बेकार है? बिल्कुल नहीं। मेहनत सफलता की गारंटी नहीं है, लेकिन सफलता की संभावना को बढ़ाने वाली सबसे महत्वपूर्ण चीजों में से एक जरूर है। खेत में बीज बोना किसान का काम है; बारिश उसके हाथ में नहीं। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि किसान बीज ही न बोए और बारिश के भरोसे बैठा रहे। जीवन भी कुछ ऐसा ही है। परिश्रम हमारी तरफ से किया जाने वाला निवेश है और परिणाम में परिस्थितियों, अवसरों और संयोग की भी हिस्सेदारी होती है। यही कारण है कि समान मेहनत करने वाले दो लोगों के परिणाम हमेशा समान नहीं होते। किसी को अवसर जल्दी मिलता है, किसी को देर से; किसी को परिवार का सहारा मिलता है, किसी को परिवार ही संघर्ष का कारण बन जाता है; किसी की एक छोटी-सी मुलाकात जीवन बदल देती है, तो कोई सही अवसर के सामने खड़ा होकर भी उसे पहचान नहीं पाता।
इसलिए सफलता का पहला भ्रम यह है कि मेहनत और सफलता के बीच सीधी रेखा होती है। वास्तव में इनके बीच कई मोड़ होते हैं। मेहनत के साथ दिशा चाहिए, दिशा के साथ कौशल चाहिए, कौशल के साथ अवसर चाहिए, अवसर के साथ उसे पकड़ने की क्षमता चाहिए और इन सबके साथ कुछ हद तक समय और संयोग भी चाहिए। कोई आदमी बहुत मेहनत कर रहा है लेकिन गलत दिशा में, तो उसकी मेहनत उसे मंजिल के बजाय उससे दूर ले जा सकती है। कुएं को खोदने में मेहनत लगती है, लेकिन यदि हर दिन अलग जगह दो-दो फुट खोदा जाए तो आदमी जिंदगी भर खुदाई करता रहेगा और पानी नहीं मिलेगा। इसलिए केवल ‘कितना काम किया’ महत्वपूर्ण नहीं है; ‘क्या काम किया, क्यों किया, कैसे किया और उसका परिणाम क्या निकला’ यह अधिक महत्वपूर्ण है।
हमारे यहां एक और विचित्र धारणा है—जो जितना अधिक खटता है, वह उतना ही अधिक सफल होना चाहिए। लेकिन मजदूर से लेकर निम्न वेतन वाले कर्मचारी तक असंख्य लोग ऐसे हैं जो दिन-रात मेहनत करते हैं और फिर भी जीवन की मूलभूत जरूरतों के लिए संघर्ष करते रहते हैं। उनके लिए सफलता कभी-कभी करोड़पति बनना नहीं, महीने की पच्चीस तारीख तक पैसे बचा लेना होती है। किसी के लिए सफलता अपने बच्चे की फीस भर देना है, किसी के लिए बीमारी में परिवार को संभाल लेना, किसी के लिए नौकरी बचा लेना और किसी के लिए इतना कमा लेना कि किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े। जिसे हम बाहर से ‘साधारण जीवन’ कहते हैं, उसके भीतर रहने वाला व्यक्ति उसे अपनी बड़ी उपलब्धि मान सकता है। इसलिए सफलता का एक सार्वभौमिक पैमाना बनाना शायद संभव ही नहीं।
सर्वाइवल भी सफलता है—और कई बार बहुत बड़ी सफलता है। जिस व्यक्ति ने विपरीत परिस्थितियों में अपना परिवार संभाला, बच्चों को पढ़ाया, बीमारी और बेरोजगारी के बीच घर चलाया, कर्ज चुकाया और बिना किसी बड़े सहारे के अपनी जिंदगी को पटरी पर बनाए रखा, वह भले ही किसी कॉरपोरेट सूची में सफल व्यक्ति न हो, लेकिन जीवन की कठिन परीक्षा में उसने असाधारण प्रदर्शन किया है। समस्या यह है कि हम संघर्ष की लंबाई नहीं देखते, केवल अंतिम ऊंचाई देखते हैं। हमें पहाड़ की चोटी दिखाई देती है, उस पर चढ़ने वाले के पैरों के छाले नहीं।
फिर चापलूसी और नेटवर्किंग का प्रश्न आता है। जीवन में संबंधों का महत्व असंदिग्ध है। हर सफलता केवल व्यक्तिगत योग्यता से नहीं आती; मनुष्य सामाजिक प्राणी है और सहयोग, नेटवर्क, संचार तथा विश्वास उसके काम को आगे बढ़ाते हैं। लेकिन चापलूसी और संबंध-निर्माण में अंतर है। संबंध-निर्माण में पारस्परिक सम्मान और उपयोगिता होती है; चापलूसी में प्रायः स्वार्थ छिपा होता है। दुर्भाग्य से कई संस्थानों में चापलूसी को योग्यता से अधिक पुरस्कार मिल जाता है। इससे यह निष्कर्ष निकालना कि मेहनत बेकार है, गलत होगा। सही निष्कर्ष यह है कि केवल मेहनत पर्याप्त नहीं है। आदमी को अपना काम जानना, लोगों के साथ काम करना, अपनी उपलब्धियों को प्रस्तुत करना, अवसर पहचानना और जरूरत पड़ने पर अपने लिए आवाज उठाना भी सीखना पड़ता है।
यही बात धार्मिकता पर भी लागू होती है। आस्था मनुष्य को धैर्य दे सकती है, लेकिन भगवान को अपना एजेंट बनाकर काम करवाने की कोशिश शायद धर्म नहीं है। ‘मैं कर्म करूंगा, परिणाम तुम्हारे हाथ में है’—यह भाव आध्यात्मिकता के कहीं अधिक करीब है। पूजा के बाद काम पर लौटना धर्म है; पूजा करके काम से बचना धर्म नहीं। मंदिर जाना अच्छी बात है, लेकिन मंदिर से लौटकर घर में अपने ही लोगों के साथ अन्याय करना उस यात्रा की आध्यात्मिक उपलब्धि को खोखला कर देता है। भगवान का नाम लेना सुंदर है, लेकिन भगवान के नाम पर किसी का हक मारना विडंबना है। आदमी के भीतर यदि करुणा, संयम, सत्यनिष्ठा और जिम्मेदारी बढ़ रही है तो उसकी पूजा का कुछ अर्थ है; यदि पूजा बढ़ रही है लेकिन अहंकार, लालच और क्रूरता भी साथ बढ़ रहे हैं, तो उसे अपने धार्मिक जीवन की समीक्षा करनी चाहिए।
सफलता का शायद सबसे खतरनाक पैमाना दूसरों की सफलता है। पड़ोसी ने मकान बना लिया, सहकर्मी प्रमोशन पा गया, किसी मित्र का बच्चा विदेश चला गया, किसी परिचित ने नई गाड़ी खरीद ली—और आदमी अचानक अपनी पूरी जिंदगी को असफल मान बैठता है। यह तुलना मनुष्य को भीतर से गरीब बना देती है। जीवन कोई एक ही दौड़ नहीं है जिसमें सब लोग एक ही शुरुआती रेखा से दौड़ रहे हों। किसी के पास आर्थिक पूंजी अधिक है, किसी के पास शिक्षा, किसी के पास पारिवारिक समर्थन, किसी के पास स्वास्थ्य, किसी के पास संपर्क और किसी के पास केवल जिद। इसलिए किसी और की मंजिल देखकर अपनी यात्रा को असफल घोषित करना बुद्धिमानी नहीं।
सच्ची सफलता शायद तब शुरू होती है जब आदमी दूसरों की परिभाषा से निकलकर अपनी परिभाषा बनाने लगता है। यदि किसी व्यक्ति का लक्ष्य बड़ा पद है तो उसे उसके लिए मेहनत करनी चाहिए। यदि किसी का लक्ष्य स्वतंत्र जीवन है तो उसे उसी दिशा में जाना चाहिए। यदि किसी के लिए परिवार को सुरक्षित रखना सबसे बड़ी उपलब्धि है तो उसे करोड़पति न बनने पर शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं। यदि किसी ने ईमानदारी से जीवन जिया, अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दिए, अपने काम के प्रति न्याय किया और रात को अपने अंतर्मन के सामने खड़ा हो सकता है, तो उसके खाते में ऐसी सफलता है जिसे शेयर बाजार, बैंक बैलेंस या सोशल मीडिया की संख्या में नहीं मापा जा सकता।
अंततः सफलता के लिए ‘काम के प्रति समर्पण’ और ‘अपने-अपने राम के प्रति समर्पण’ को आमने-सामने खड़ा करना भी शायद सही नहीं है। काम के प्रति समर्पण मनुष्य की जिम्मेदारी है और ‘राम’ के प्रति समर्पण उसके भीतर की आस्था, नैतिकता या जीवन-दृष्टि का विषय हो सकता है। लेकिन अगर राम के प्रति समर्पण का अर्थ यह है कि आदमी अपना कर्म छोड़कर चमत्कार की प्रतीक्षा करे, तो वह सफलता का रास्ता नहीं। और यदि काम के प्रति समर्पण का अर्थ यह है कि आदमी पैसे और पद के लिए अपने विवेक, संबंधों और मनुष्यता को बेच दे, तो वह भी सफलता नहीं।
इसलिए सफलता का बेहतर मानदंड शायद यह होना चाहिए कि आदमी ने अपनी परिस्थितियों के भीतर उपलब्ध क्षमता का कितना ईमानदार और बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग किया, अपने लक्ष्य तक पहुंचने में कितनी कीमत चुकाई, उस कीमत में क्या खोया और अंततः वह जो बन गया उससे स्वयं कितना संतुष्ट है। पैसा हो लेकिन नींद न हो, पद हो लेकिन सम्मान न हो, प्रसिद्धि हो लेकिन अपने लोगों का विश्वास न हो, पूजा हो लेकिन भीतर शांति न हो—तो सफलता अधूरी है। दूसरी ओर साधारण आय हो, सीमित साधन हों, जीवन में संघर्ष रहा हो, लेकिन आदमी ने अपने लोगों को संभाला हो, अपना आत्मसम्मान बचाया हो और रात को अपने आप से नजर मिलाने में उसे शर्म न आती हो, तो यह भी कम सफलता नहीं।
शायद जिंदगी का अंतिम हिसाब यही है कि सफलता वह नहीं जो दुनिया आपके बारे में घोषित करे; सफलता वह है जिसे जीवन के अंत में आप स्वयं अपने बारे में स्वीकार कर सकें। दुनिया कह सकती है—‘तुम बहुत सफल हुए।’ आपका बैंक खाता भी इसकी पुष्टि कर सकता है। लोग आपके साथ तस्वीरें खिंचवा सकते हैं। मंदिर में आपके नाम का दान-पत्र भी लग सकता है। लेकिन भीतर का आदमी यदि पूछता रहे—‘क्या यही सब पाने के लिए मैं पैदा हुआ था?’—तो कहानी अभी अधूरी है। और यदि जीवन ने बहुत कुछ नहीं दिया, फिर भी भीतर से आवाज आए—‘मैंने अपनी तरफ से बेईमानी नहीं की, मैंने अपने हिस्से का कर्म किया, जितना बचा सका बचाया, जितना संभाल सका संभाला और गिरकर भी उठता रहा’—तो शायद आदमी ने सफलता की वह परिभाषा पा ली है जिसे किसी प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं।
आखिर ‘अपने-अपने राम’ सबके अलग हो सकते हैं, परिस्थितियां अलग हो सकती हैं, मंजिलें अलग हो सकती हैं, लेकिन एक चीज सबके लिए समान रह सकती है—कर्म करते हुए विवेक को बचाए रखना। क्योंकि सफलता केवल यह नहीं कि हम कितनी ऊंचाई पर पहुंचे; यह भी है कि वहां पहुंचते-पहुंचते हम अपने भीतर से कितने बचे रहे।
निठल्ले के नोट्स - ये दिल न होता बेचारा
आदमी के जीवन में एक ऐसा समय भी आता है जब परिस्थितियाँ बाहर से कम और भीतर से ज्यादा भारी लगने लगती हैं। काम वही होते हैं, लोग वही होते हैं, समस्याएँ भी शायद उतनी ही होती हैं, लेकिन अचानक आदमी को लगता है कि वह कुछ कर नहीं सकता। उसे हर रास्ता बंद दिखाई देता है, हर निर्णय जोखिम भरा लगता है और हर असफलता उसके अपने सामर्थ्य पर सवाल खड़ा करने लगती है। वह मन ही मन कहने लगता है—“मैं क्या कर सकता हूँ?”, “मेरे हाथ में है ही क्या?”, “मेरी कौन सुनेगा?” यहीं से आदमी के भीतर ‘बेचारा’ होने की भावना जन्म लेती है। ध्यान देने वाली बात यह है कि बेबसी और बेचारगी एक ही चीज नहीं हैं। बेबसी किसी वास्तविक परिस्थिति का परिणाम हो सकती है, लेकिन बेचारगी धीरे-धीरे उस परिस्थिति के बारे में हमारे मन की स्थायी धारणा बन जाती है।
लाचार महसूस करने की शुरुआत अक्सर तब होती है जब आदमी को लगातार ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है जिन पर उसका नियंत्रण बहुत कम होता है। नौकरी की असुरक्षा, आर्थिक दबाव, बीमारी, पारिवारिक तनाव, रिश्तों में उपेक्षा, उम्र का बढ़ना, सामाजिक तुलना, बार-बार असफल होना या किसी प्रिय व्यक्ति पर निर्भर हो जाना—ये सब आदमी के आत्मविश्वास को धीरे-धीरे कमजोर कर सकते हैं। खासकर तब, जब वह लंबे समय तक कोशिश करता रहे और परिणाम उसकी इच्छा के अनुसार न आएँ। मनुष्य को केवल कठिनाई नहीं थकाती; कठिनाई के बावजूद परिणाम न बदलना उसे ज्यादा थकाता है। लगातार असफल प्रयासों के बाद दिमाग कभी-कभी यह निष्कर्ष निकाल लेता है कि “कोशिश करने से भी क्या होगा?” मनोविज्ञान में इस प्रवृत्ति को ‘सीखी हुई लाचारी’ यानी learned helplessness के रूप में समझा जाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि आदमी वास्तव में कुछ कर ही नहीं सकता; बल्कि यह कि उसे अपने प्रभाव की संभावना दिखाई देना बंद हो जाती है।
विडंबना यह है कि आदमी की सबसे बड़ी कैद कई बार बाहर नहीं, उसके अपने निष्कर्षों में बनती है। परिस्थितियाँ कहती हैं—“यह कठिन है”, लेकिन मन कह देता है—“यह मेरे लिए असंभव है।” परिस्थितियाँ कहती हैं—“इस रास्ते में बाधा है”, लेकिन मन कह देता है—“मेरे लिए कोई रास्ता ही नहीं है।” असफलता कहती है—“यह प्रयास काम नहीं आया”, लेकिन मन कह देता है—“मैं ही असफल हूँ।” इन तीनों वाक्यों के बीच बहुत बड़ा अंतर है। घटना को अपनी पहचान बना लेना आदमी को भीतर से कमजोर कर देता है। नौकरी चली जाना एक घटना है; “मैं किसी काम का नहीं हूँ” एक आत्म-निर्णय है। किसी रिश्ते का टूटना एक घटना है; “मुझे कोई कभी नहीं चाहेगा” एक निष्कर्ष है। आर्थिक कठिनाई एक परिस्थिति है; “मैं हमेशा गरीब ही रहूँगा” भविष्य के बारे में एक अनुमान है। जब अनुमान को सत्य मान लिया जाता है, तब लाचारी और गहरी हो जाती है।
उम्र बढ़ने के साथ यह भावना कभी-कभी और जटिल हो जाती है। युवा आदमी को लगता है कि उसके सामने बहुत समय है, इसलिए वह जोखिम उठा सकता है; मध्य आयु का आदमी पीछे मुड़कर अपने किए-अनकिए फैसलों का हिसाब करने लगता है। उसे परिवार की जिम्मेदारियाँ दिखाई देती हैं, बच्चों का भविष्य दिखाई देता है, नौकरी की अनिश्चितता दिखाई देती है, माता-पिता की चिंता दिखाई देती है और अपने शरीर तथा समय की सीमाएँ भी दिखाई देने लगती हैं। तब आदमी को लगता है कि अब गलत होने की गुंजाइश कम है। यही भावना कई बार उसे निर्णय लेने से रोकती है। वह सुरक्षा चाहता है, लेकिन पूर्ण सुरक्षा जीवन में उपलब्ध नहीं होती। परिणाम यह होता है कि आदमी न तो पुराने ढर्रे से संतुष्ट रहता है और न नया रास्ता चुनने का साहस कर पाता है।
बेचारगी का एक और कारण लगातार तुलना है। आज आदमी केवल अपने पड़ोसी या सहकर्मी से तुलना नहीं करता; वह सोशल मीडिया के माध्यम से सैकड़ों सफल, संपन्न और खुश दिखाई देने वाले लोगों से हर दिन तुलना करता है। किसी का बड़ा घर दिखाई देता है, किसी की विदेश यात्रा, किसी की पदोन्नति, किसी का व्यवसाय, किसी के बच्चों की उपलब्धियाँ और किसी का स्वस्थ शरीर। आदमी अपने जीवन की पूरी कहानी की तुलना दूसरे की दिखाई देने वाली कुछ तस्वीरों से करने लगता है। फिर उसे लगता है कि सब आगे निकल गए और वह पीछे रह गया। जबकि वास्तविकता यह है कि हर आदमी अपनी समस्याओं का एक हिस्सा छिपाकर चलता है। दूसरों की उपलब्धियों का दृश्य पक्ष और अपने जीवन की कठिनाइयों का अदृश्य पक्ष मिलाकर तुलना करेंगे तो परिणाम हमेशा अपने विरुद्ध ही आएगा।
इस स्थिति से निकलने का पहला रास्ता यह स्वीकार करना है कि “मैं अभी लाचार महसूस कर रहा हूँ” और “मैं वास्तव में पूरी तरह लाचार हूँ”—इन दोनों में अंतर है। भावनाएँ वास्तविक होती हैं, लेकिन हर भावना वास्तविकता का पूरा वर्णन नहीं करती। डर वास्तविक है, पर खतरा उतना बड़ा हो यह जरूरी नहीं। निराशा वास्तविक है, पर भविष्य निराशाजनक हो यह जरूरी नहीं। अकेलापन वास्तविक है, पर आदमी हमेशा अकेला रहेगा यह जरूरी नहीं। इसलिए जब मन कहे कि “मेरे पास कोई विकल्प नहीं है”, तब स्वयं से एक छोटा-सा सवाल पूछना चाहिए—“क्या सचमुच कोई विकल्प नहीं है, या मुझे अभी कोई विकल्प दिखाई नहीं दे रहा?” यह छोटा-सा अंतर सोचने की दिशा बदल सकता है।
इसके बाद आदमी को अपने जीवन को उन चीजों में बाँटना चाहिए जो उसके नियंत्रण में हैं और जो उसके नियंत्रण से बाहर हैं। मौसम, दूसरों की राय, किसी दूसरे व्यक्ति का व्यवहार, बीती हुई गलती या बाजार की स्थिति को वह पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सकता। लेकिन अपनी दिनचर्या, अपनी तैयारी, अपने खर्च, अपने स्वास्थ्य के प्रति सावधानी, अपनी भाषा, अपने व्यवहार, अपनी प्रतिक्रिया और अपने अगले कदम पर कुछ हद तक उसका अधिकार होता है। जब जीवन बहुत बड़ा और उलझा हुआ लगे, तब पूरी जिंदगी को ठीक करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। अगले चौबीस घंटे को व्यवस्थित करना चाहिए। एक जरूरी फोन करना, एक लंबित काम पूरा करना, थोड़ी देर चलना, किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करना, खर्च का हिसाब बनाना या किसी समस्या के तीन संभावित समाधान लिखना—ये छोटे कदम आदमी को फिर से यह अनुभव कराते हैं कि वह निष्क्रिय दर्शक नहीं, अपने जीवन का सहभागी है।
लाचारी का इलाज हमेशा बड़ा निर्णय नहीं होता; कई बार छोटे-छोटे निर्णयों की वापसी होती है। आदमी जब लगातार दूसरों से पूछकर, दूसरों की स्वीकृति लेकर या परिस्थितियों के अनुसार प्रतिक्रिया करते-करते थक जाता है, तब उसे अपने जीवन में कुछ छोटे निर्णय स्वयं लेने चाहिए। कौन-सा काम पहले करना है, किस बात को टालना नहीं है, किस खर्च को रोकना है, किस व्यक्ति से दूरी रखनी है, किससे सहायता माँगनी है और किस बात को स्वीकार कर आगे बढ़ जाना है—इन छोटे निर्णयों से आत्म-नियंत्रण की भावना लौटती है। आत्मविश्वास अक्सर पहले से मौजूद कोई जादुई गुण नहीं होता; वह अपने ही किए हुए छोटे-छोटे सफल कार्यों से बनता है।
यह भी समझना जरूरी है कि सहायता माँगना कमजोरी नहीं है। आदमी के भीतर ‘मैं सब कुछ खुद करूँगा’ वाली धारणा भी कई बार उसे बेबस बना देती है। जीवन में कुछ समस्याएँ अकेले हल नहीं होतीं। आर्थिक समस्या में वित्तीय सलाह की जरूरत हो सकती है, स्वास्थ्य समस्या में चिकित्सक की, मानसिक दबाव में मनोवैज्ञानिक या काउंसलर की और पारिवारिक संकट में किसी विश्वसनीय व्यक्ति की। मदद लेना और अपनी जिम्मेदारी किसी दूसरे के हवाले कर देना अलग-अलग बातें हैं। सहायता वह हाथ है जो आदमी को खड़ा होने में मदद करता है; उसके स्थान पर जीवन जीने का काम वह हाथ नहीं कर सकता।
कभी-कभी आदमी को अपनी अपेक्षाओं का भी पुनर्मूल्यांकन करना पड़ता है। जीवन में बहुत-सी पीड़ा इसलिए पैदा होती है क्योंकि हम चाहते हैं कि हर चीज हमारी योजना के अनुसार हो। लेकिन जीवन योजना से कम और अनिश्चितता से ज्यादा चलता है। हर मेहनत का तत्काल पुरस्कार नहीं मिलता, हर अच्छा आदमी सफल नहीं होता और हर गलत आदमी तुरंत दंडित नहीं होता। यह जीवन की असुविधाजनक सच्चाई है। पर इसका अर्थ यह नहीं कि प्रयास व्यर्थ है। प्रयास का मूल्य केवल परिणाम में नहीं, आदमी की अपनी क्षमता और चरित्र को बचाए रखने में भी है। कई बार जीत परिस्थिति बदलने में नहीं, परिस्थिति के भीतर टूटे बिना खड़े रहने में होती है।
अपने आप को ‘बेचारा’ मानने से बचने के लिए अपनी भाषा बदलना भी जरूरी है। “मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है?” की जगह “अब मैं क्या कर सकता हूँ?” पूछना, “सब खत्म हो गया” की जगह “इस समय सबसे बड़ी समस्या क्या है?” पूछना और “मैं कुछ नहीं कर सकता” की जगह “मैं कौन-सी एक चीज बदल सकता हूँ?” पूछना मानसिक दिशा बदल देता है। यह कोई सकारात्मक सोच का खोखला नारा नहीं है। यह समस्या को नकारना नहीं, समस्या के भीतर उपलब्ध नियंत्रण के छोटे से हिस्से को खोज लेना है।
फिर भी कुछ स्थितियाँ ऐसी होती हैं जहाँ केवल इच्छाशक्ति पर्याप्त नहीं होती। यदि लंबे समय तक निराशा, असहायता, अत्यधिक चिंता, नींद की गंभीर गड़बड़ी, किसी काम में रुचि समाप्त होना, सामाजिक दूरी, लगातार अपराधबोध या जीवन को समाप्त करने जैसे विचार आने लगें, तो इसे केवल “कमजोर मन” कहकर टालना उचित नहीं है। ऐसी स्थिति में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सहायता लेना समझदारी है। जिस तरह शरीर की गंभीर बीमारी में डॉक्टर के पास जाना कमजोरी नहीं है, उसी तरह मन की गंभीर परेशानी में विशेषज्ञ की सहायता लेना भी कमजोरी नहीं है।
अंततः आदमी को यह समझना होगा कि जीवन में कुछ दौर ऐसे आएँगे जब वह सचमुच दूसरों पर निर्भर होगा। बच्चा निर्भर होता है, बीमार आदमी निर्भर होता है, वृद्ध आदमी कभी-कभी निर्भर होता है और कठिन समय में स्वस्थ तथा सक्षम व्यक्ति भी सहायता का मोहताज हो सकता है। निर्भर होना अपमान नहीं है। असली खतरा तब शुरू होता है जब आदमी अपनी अस्थायी निर्भरता को अपनी स्थायी पहचान बना लेता है। “मुझे अभी सहारे की जरूरत है” और “मैं बिना सहारे के कुछ नहीं हूँ”—इन दोनों वाक्यों के बीच आत्मसम्मान की पूरी दुनिया खड़ी है।
शायद जिंदगी का सबसे कठिन पाठ यही है कि आदमी हर परिस्थिति को अपने अनुकूल नहीं बना सकता, लेकिन हर परिस्थिति में अपनी प्रतिक्रिया को कुछ हद तक चुन सकता है। वह हर दरवाजा नहीं खोल सकता, लेकिन यह तय कर सकता है कि बंद दरवाजे के सामने कितनी देर बैठना है। वह हर व्यक्ति को नहीं बदल सकता, लेकिन यह तय कर सकता है कि किसके व्यवहार को अपने आत्मसम्मान का पैमाना नहीं बनने देना है। वह बीता हुआ समय वापस नहीं ला सकता, लेकिन आज का एक घंटा अपने हाथ में ले सकता है। और कई बार जिंदगी को फिर से पकड़ने के लिए इतना ही काफी होता है।
इसलिए जब आदमी को लगे कि वह बेचारा है, तो उसे तुरंत अपने बारे में कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाना चाहिए। संभव है कि वह थका हुआ हो, डरा हुआ हो, लगातार असफलताओं से घायल हो या ऐसी परिस्थिति में फँसा हो जहाँ उसके विकल्प वास्तव में सीमित हों। लेकिन सीमित विकल्प और शून्य विकल्प एक बात नहीं हैं। उसे अपनी समस्या को छोटे हिस्सों में बाँटना चाहिए, जो उसके नियंत्रण में है उसे पहचानना चाहिए, जहाँ जरूरत हो वहाँ सहायता लेनी चाहिए और फिर एक छोटा-सा अगला कदम उठाना चाहिए। जिंदगी हमेशा बड़े फैसलों से नहीं बदलती; कभी-कभी वह केवल इतना करने से बदलने लगती है कि आदमी एक दिन सुबह उठकर स्वयं से कहता है—“मैं बेचारा नहीं हूँ। मैं मुश्किल में हूँ। और मुश्किल में होना तथा हार जाना एक ही बात नहीं है।” यही वाक्य भीतर बुझती हुई रोशनी को फिर से जलाने की शुरुआत हो सकता है।
