### समय अच्छा होता है या बुरा?
समय बड़ा विचित्र जीव है। दिखाई नहीं देता, लेकिन सबको दिखाई देता रहता है। न उसके हाथ हैं, न पैर, फिर भी वह चलता रहता है। न उसके पंख हैं, फिर भी उड़ता रहता है। न उसकी कोई आवाज है, फिर भी उसके गुजरने की आहट हर किसी को सुनाई देती है। किसी के लिए समय पंख लगाकर उड़ जाता है, तो किसी के लिए घड़ी की सुइयां भी जैसे थम जाती हैं। परीक्षा के परिणाम की प्रतीक्षा कर रहे विद्यार्थी के लिए एक-एक मिनट भारी पड़ता है, जबकि छुट्टियों में घूमने निकले व्यक्ति को लगता है कि दिन देखते-देखते बीत गए। प्रेम में प्रतीक्षा लंबी होती है और मिलन छोटा। अस्पताल में किसी प्रियजन के स्वस्थ होने की प्रतीक्षा करते हुए एक रात भी एक युग के बराबर लग सकती है। आखिर समय एक ही है, लेकिन सबके लिए उसका अनुभव अलग-अलग क्यों है? क्या सचमुच समय अच्छा या बुरा होता है, अथवा यह हमारे मन की बनाई हुई कोई धारणा है?
समय की अवधारणा पर विचार करें तो सबसे पहले यह समझना होगा कि समय केवल घड़ी में चलने वाली सुइयों का नाम नहीं है। घड़ी समय को मापती है, समय को पैदा नहीं करती। कैलेंडर तारीखें बताता है, जीवन की गति नहीं। सेकंड, मिनट, घंटे, दिन, महीने और वर्ष समय को समझने तथा व्यवस्थित करने के लिए मनुष्य द्वारा विकसित माप की इकाइयां हैं। प्रकृति में दिन और रात का क्रम, ऋतुओं का परिवर्तन, चंद्रमा की कलाएं और पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर परिक्रमा हमें समय का बोध कराते हैं। आधुनिक विज्ञान में समय की माप अत्यंत सूक्ष्म और सटीक हो चुकी है। आइंस्टीन के सापेक्षता सिद्धांत ने तो यह भी स्पष्ट किया कि समय हर परिस्थिति में सबके लिए एक समान गति से नहीं गुजरता। गति और गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से समय की माप में अंतर आ सकता है। यानी जिसे हम अपनी सहज बुद्धि से एक सार्वभौमिक, स्थिर और अपरिवर्तनीय चीज समझते हैं, वह भौतिकी की दुनिया में भी इतना सीधा-सादा नहीं है। फिर जीवन की दुनिया में उससे सीधे-सादे होने की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
समय को अच्छा या बुरा कहने की हमारी आदत दरअसल समय से ज्यादा अपनी परिस्थितियों के बारे में बताती है। नौकरी मिल जाए तो समय अच्छा, नौकरी छूट जाए तो समय खराब। कारोबार में लाभ हो तो अच्छा समय, घाटा हो जाए तो बुरा समय। घर में बच्चे का जन्म हो, मनचाही जगह तबादला हो जाए, वर्षों से रुका हुआ काम पूरा हो जाए, तो लगता है कि भाग्य ने करवट ली है और समय हमारे पक्ष में आ गया है। लेकिन उसी समय किसी दूसरे घर में बीमारी, बेरोजगारी या किसी अपने की मृत्यु का दुख पसरा हो सकता है। जिस दिन एक परिवार के यहां शहनाई बज रही होती है, उसी दिन किसी दूसरे घर से अर्थी उठ सकती है। सूरज दोनों के लिए एक ही समय पर उगता है और रात दोनों के घरों में एक ही पृथ्वी के अंधकार के साथ उतरती है। सूरज किसी की खुशी देखकर जल्दी नहीं उगता और किसी के दुख से प्रभावित होकर देर तक ठहरा नहीं रहता। प्रकृति अपना क्रम चलाती रहती है; अच्छा और बुरा होने का अर्थ हम अपने अनुभवों से निकालते हैं।
इसका अर्थ यह भी नहीं कि समय की अच्छाई-बुराई पूरी तरह काल्पनिक है। कुछ परिस्थितियां वस्तुतः अनुकूल होती हैं और कुछ प्रतिकूल। स्वस्थ शरीर, पर्याप्त साधन, सहयोगी लोग, शिक्षा के अवसर और सुरक्षित वातावरण जीवन को आसान बनाते हैं। इसके विपरीत बीमारी, आर्थिक संकट, युद्ध, प्राकृतिक आपदा और अन्याय किसी व्यक्ति के जीवन को सचमुच कठिन बना सकते हैं। इन परिस्थितियों को केवल मन का भ्रम कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन यहां एक बारीक अंतर है। परिस्थितियां बुरी हो सकती हैं, पर क्या उनसे गुजरने वाला पूरा समय भी बुरा ही होता है? कठिन समय में कोई व्यक्ति टूट जाता है, तो कोई अपने भीतर ऐसी शक्ति खोज लेता है जिसका उसे पहले कभी अनुमान नहीं था। कोई असफलता को जीवन का अंत मान लेता है, तो कोई उसी असफलता से अपनी दिशा बदलने का साहस जुटाता है। घटना एक हो सकती है, लेकिन उसका अर्थ और परिणाम हर व्यक्ति के लिए एक जैसा नहीं होता। समय परिस्थितियां प्रस्तुत करता है; उनसे हमारा सामना कैसा होगा, यह कुछ हद तक हमारे निर्णयों, संसाधनों और प्रयासों पर भी निर्भर करता है।
हम अक्सर कहते हैं कि समय बड़ा बलवान है। यह कहावत अनुभव की लंबी यात्रा से निकली है। समय के सामने सत्ता के सिंहासन ढह जाते हैं, धन-दौलत का वैभव फीका पड़ जाता है और कभी अपने प्रभाव से दुनिया को चकित करने वाले लोग धीरे-धीरे स्मृतियों के पन्नों में सिमट जाते हैं। इतिहास के पन्ने ऐसे साम्राज्यों से भरे पड़े हैं जो स्वयं को अमर समझते थे, लेकिन आज उनके महल खंडहर हैं और उनके शासकों के नाम इतिहास की पुस्तकों तक सीमित हैं। दूसरी ओर, जिन विचारों को अपने समय में दबा दिया गया, वे कभी-कभी सदियों बाद अधिक प्रासंगिक होकर सामने आते हैं। किसी विचारक, लेखक या वैज्ञानिक को अपने जीवनकाल में वह सम्मान नहीं मिला जिसकी उसकी प्रतिभा अधिकारी थी, लेकिन बाद की पीढ़ियों ने उसके योगदान को पहचाना। इससे लगता है कि समय कभी-कभी न्यायाधीश भी है, हालांकि यह न्यायाधीश हर मामले में समय पर फैसला नहीं सुनाता। कई बार अन्याय करने वाले सुख-सुविधाओं के साथ जीवन बिताकर चले जाते हैं और पीड़ित व्यक्ति को न्याय नहीं मिल पाता। इसलिए यह मान लेना कि समय अंततः हर अन्याय का हिसाब बराबर कर देगा, सांत्वना तो हो सकती है, सुनिश्चित सत्य नहीं।
समय की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जब वह हमारे पास होता है, तब हमें उसकी कीमत का पूरा एहसास नहीं होता और जब उसकी कमी महसूस होती है, तब तक बहुत कुछ हाथ से निकल चुका होता है। बचपन में हम बड़े होने के लिए बेचैन रहते हैं। लगता है कि कब स्कूल से छुट्टी मिलेगी, कब अपने फैसले खुद कर सकेंगे, कब नौकरी मिलेगी और कब अपनी दुनिया बनाएंगे। जवानी में लगता है कि अभी तो पूरी जिंदगी सामने पड़ी है। हम समय को ऐसे खर्च करते हैं जैसे वह किसी बैंक खाते में जमा अनंत पूंजी हो और जब चाहेंगे, निकाल लेंगे। फिर एक दिन पीछे मुड़कर देखते हैं तो बचपन की छुट्टियां, माता-पिता के साथ बिताए पल, पुराने मित्र, छूट गए अवसर और टलती रही इच्छाएं स्मृतियों में बदल चुकी होती हैं। तब समझ आता है कि समय केवल बीतता नहीं, अपने साथ संभावनाओं को भी ले जाता है। जो बात आज कही जा सकती थी, वह कल शायद कहने का अवसर न दे। जिस व्यक्ति के साथ आज बैठकर चाय पी जा सकती थी, हो सकता है कल वह हमारे पास न हो। समय की सबसे महंगी मुद्रा पैसा नहीं, स्वयं जीवन है; और इसकी विशेषता यह है कि खर्च हो जाने के बाद इसे वापस नहीं कमाया जा सकता।
फिर भी समय के बारे में हमारी एक दिलचस्प शिकायत रहती है कि अच्छा समय बहुत जल्दी बीत जाता है और बुरा समय खत्म होने का नाम नहीं लेता। सुख में समय उड़ता है और दुख में रेंगता है। मनोविज्ञान भी इस अनुभव के पीछे ध्यान, भावनाओं और स्मृति की भूमिका को समझता है। जब हम किसी रोचक काम में डूबे होते हैं, तो समय पर ध्यान कम जाता है और घंटे मिनट जैसे लग सकते हैं। जब हम पीड़ा, बेचैनी या प्रतीक्षा में होते हैं, तो बार-बार घड़ी देखते हैं और हर मिनट लंबा महसूस होता है। बाद में स्मृति भी समय का अलग हिसाब रखती है। घटनाओं से भरा कोई वर्ष पीछे मुड़कर देखने पर बहुत लंबा लग सकता है, जबकि एक जैसी दिनचर्या में बीता वर्ष यादों में छोटा होकर रह जाता है। इसीलिए समय की घड़ी और समय का अनुभव दो अलग चीजें हैं। घड़ी की सुई अपनी गति से चलती है, लेकिन मन अपनी गति से समय को जीता है।
यहां एक प्रश्न और उठता है। यदि समय अपने आप में न अच्छा है, न बुरा, तो फिर ज्योतिष में अच्छे समय, बुरे समय, शुभ मुहूर्त और ग्रहों की दशाओं की इतनी चर्चा क्यों होती है? मनुष्य सदियों से भविष्य को समझने और अनिश्चितता पर नियंत्रण पाने की कोशिश करता रहा है। शुभ मुहूर्त चुनना अनेक लोगों के लिए सांस्कृतिक आस्था और मानसिक आश्वासन का हिस्सा है। किसी काम को सोच-समझकर, अनुकूल परिस्थितियों में शुरू करना व्यावहारिक बुद्धिमानी भी हो सकती है। लेकिन किसी निश्चित समय को अपने आप सफलता या विफलता का कारण मान लेने के लिए विश्वसनीय वैज्ञानिक प्रमाण आवश्यक हैं। ग्रहों की स्थिति के आधार पर जीवन की हर घटना का निश्चित पूर्वानुमान कर लेना वैज्ञानिक रूप से स्थापित नहीं है। कभी-कभी समय को दोष देना अपनी असफलता के कारणों से बचने का सुविधाजनक तरीका भी बन जाता है। परीक्षा में तैयारी न की हो, कारोबार में गलत निर्णय लिए हों या संबंधों में संवाद की कमी रही हो, तो हम कह देते हैं कि समय खराब चल रहा है। यह मान लेना आसान है कि ग्रह प्रतिकूल थे; कठिन यह स्वीकार करना है कि शायद हमारी तैयारी अधूरी थी या हमारा निर्णय गलत था। हालांकि यह भी सच है कि हर असफलता व्यक्ति की गलती नहीं होती। सामाजिक असमानता, आकस्मिक दुर्घटनाएं और हमारे नियंत्रण से बाहर की परिस्थितियां भी जीवन को प्रभावित करती हैं। विवेक इसी में है कि जहां सुधार संभव हो, वहां प्रयास करें और जहां नियंत्रण न हो, वहां स्वयं को व्यर्थ दोष देने से बचें।
समय और अवसर का रिश्ता भी बड़ा रोचक है। कहा जाता है कि समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता, लेकिन अवसर क्या सचमुच केवल एक बार दरवाजा खटखटाते हैं? जीवन में कुछ अवसर लौटकर नहीं आते। बीती हुई उम्र, खोया हुआ बचपन और गुजर चुका कोई खास क्षण वापस नहीं मिल सकता। फिर भी जीवन का हर दरवाजा हमेशा के लिए बंद नहीं हो जाता। नौकरी का एक अवसर छूट जाए तो दूसरा मिल सकता है। किसी परीक्षा में असफलता के बाद फिर तैयारी की जा सकती है। एक संबंध टूट जाए तो मनुष्य नए संबंधों में भरोसा करना सीख सकता है। उम्र बढ़ने के साथ कुछ संभावनाएं सीमित होती हैं, लेकिन कुछ नई संभावनाएं भी जन्म लेती हैं। समस्या तब होती है जब हम बीते समय के पछतावे में इतने उलझ जाते हैं कि वर्तमान में उपलब्ध अवसर भी पहचान नहीं पाते। जो बीत गया, उसे बदलने की इच्छा स्वाभाविक है, लेकिन जो बीत गया उसे बदलने की कोशिश में जो बचा हुआ है, उसे भी गंवा देना बुद्धिमानी नहीं।
वास्तव में मनुष्य समय को तीन खिड़कियों से देखता है—अतीत, वर्तमान और भविष्य। अतीत स्मृतियों और अनुभवों का संसार है। वहां हमारी सफलताएं हैं, गलतियां हैं, पछतावे हैं और कुछ ऐसी खुशियां भी हैं जिन्हें याद करके आज भी चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। भविष्य आशाओं और आशंकाओं का संसार है। उसमें हम अपने सपने सजाते हैं, योजनाएं बनाते हैं और अनहोनी की कल्पना करके चिंतित भी होते हैं। वर्तमान इन दोनों के बीच खड़ा वह छोटा-सा द्वार है जिससे होकर जीवन वास्तव में गुजरता है। विडंबना यह है कि हमारा शरीर वर्तमान में रहता है, लेकिन मन अक्सर अतीत और भविष्य के बीच भटकता रहता है। कभी हम बीती हुई गलती को बार-बार दोहराकर स्वयं को दंडित करते हैं, तो कभी भविष्य की अनिश्चितता से डरकर आज का सुख गंवा देते हैं। वर्तमान में जीने का अर्थ न अतीत को भूल जाना है, न भविष्य की चिंता छोड़ देना; इसका अर्थ है अतीत से सीखना, भविष्य के लिए तैयारी करना और इस बीच आज को पूरी तरह व्यर्थ न जाने देना।
समय का एक और रूप है—प्रतीक्षा। किसी के लौट आने की प्रतीक्षा, नौकरी के परिणाम की प्रतीक्षा, किसी बीमारी से उबरने की प्रतीक्षा, अपने परिश्रम के फल की प्रतीक्षा। प्रतीक्षा मनुष्य के धैर्य की परीक्षा लेती है। हम चाहते हैं कि बीज बोते ही पेड़ उग आए, मेहनत करते ही सफलता मिल जाए और दुख आते ही तुरंत समाप्त हो जाए। लेकिन प्रकृति की अपनी गति है। बीज को अंकुर बनने में समय लगता है, बच्चे को बड़ा होने में समय लगता है और विश्वास को संबंध में बदलने में भी समय लगता है। जल्दी की अपनी उपयोगिता है, लेकिन हर चीज को जल्दी हासिल करने की इच्छा कई बार हमें उस प्रक्रिया से वंचित कर देती है जिसमें हमारा व्यक्तित्व बनता है। फिर भी केवल प्रतीक्षा करते रहना पर्याप्त नहीं। किसान खेत में बीज बोकर मौसम का इंतजार करता है, लेकिन खेत की देखभाल भी करता है। इसी तरह मनुष्य को धैर्य के साथ प्रयास भी करना पड़ता है। समय अपने आप हर समस्या का समाधान नहीं करता; कभी-कभी समय के साथ सही कदम उठाना ही समाधान की दिशा बनाता है।
तो क्या समय अच्छा होता है या बुरा? शायद इसका सबसे ईमानदार उत्तर यह है कि समय स्वयं कोई नैतिक चरित्र नहीं रखता। वह न हमारा मित्र है, न शत्रु। वह किसी की सफलता पर ताली नहीं बजाता और किसी की विफलता पर आंसू नहीं बहाता। वह परिस्थितियों के बदलने, घटनाओं के घटने और जीवन के आगे बढ़ने का आयाम है। अच्छा-बुरा कहकर हम अपने अनुभवों को नाम देते हैं। आज जो परिस्थिति हमें असहनीय लग रही है, संभव है कुछ वर्षों बाद उसी से मिली सीख हमारे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाए। लेकिन यह भी संभव है कि कोई घाव लंबे समय तक दुखता रहे। इसलिए हर दुख को भविष्य की खुशी का अनिवार्य कारण मानना उचित नहीं। कुछ दुखों को स्वीकारना पड़ता है, कुछ से लड़ना पड़ता है और कुछ के साथ जीना सीखना पड़ता है। समय इनमें मदद कर सकता है, लेकिन सहायता का रास्ता कभी-कभी अपने प्रयास, प्रियजनों के सहयोग और जरूरी पेशेवर मदद से होकर भी गुजरता है।
आखिरकार, समय को अच्छा या बुरा कहने से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि हम उसके साथ कैसा व्यवहार करते हैं। क्या हम उसे केवल शिकायतों में खर्च कर रहे हैं, या कुछ सीखने में भी? क्या हम बीते कल का हिसाब लगाते-लगाते आज को भूल रहे हैं, या आज का उपयोग कल को बेहतर बनाने के लिए कर रहे हैं? क्या हम अपने प्रियजनों के लिए समय निकालते हैं, या उनके पास समय बचने पर पहुंचने की योजना बनाते हैं? क्या हम जीवन को किसी बड़े अवसर के आने तक स्थगित रखते हैं, या छोटी-छोटी खुशियों को भी जीना जानते हैं? जीवन की विडंबना यह है कि हम समय बचाने के लिए अनेक साधन बनाते हैं, लेकिन बचाए हुए समय का क्या करना है, यह तय करना भूल जाते हैं। तेज गाड़ियां, तेज इंटरनेट, तेज संचार और तेज जीवनशैली ने हमारे कामों की गति बढ़ाई है, लेकिन जरूरी नहीं कि हमारे भीतर का सुकून भी उसी अनुपात में बढ़ा हो।
समय नदी की तरह है। उसमें दोबारा उतरने पर भी वही पानी नहीं मिलता। लेकिन नदी केवल अपने साथ चीजों को बहाकर नहीं ले जाती, वह नए किनारे भी बनाती है, नई जमीन को सींचती है और नए जीवन को जन्म देती है। समय भी हमसे बहुत कुछ छीनता है—उम्र, अवसर, लोग और कुछ सपने; लेकिन उसी के साथ अनुभव, समझ, परिपक्वता और नए आरंभ की संभावना भी देता है। शायद इसलिए जीवन को केवल अच्छे समय और बुरे समय के खानों में बांटकर देखना उसके व्यापक अर्थ को छोटा कर देना है। समय को रोकना हमारे हाथ में नहीं, लेकिन उसके बीच अपने जीवन को अर्थ देना काफी हद तक हमारे हाथ में है। घड़ी की सुइयों को हम पीछे नहीं घुमा सकते, मगर अपनी दिशा बदल सकते हैं। बीते हुए कल को वापस नहीं ला सकते, मगर उससे सीखकर आज को बेहतर बना सकते हैं। और भविष्य की गारंटी तो किसी के पास नहीं, लेकिन उसके लिए तैयारी अवश्य कर सकते हैं।
इसलिए अगली बार जब जीवन में कठिनाइयां आएं और मन कहे कि बुरा समय चल रहा है, तो अपने दुख को झुठलाए बिना यह भी याद रखिए कि यह समय आपके पूरे जीवन की परिभाषा नहीं है। और जब सब कुछ अनुकूल हो, तब यह भ्रम भी मत पालिए कि अच्छा समय हमेशा बना रहेगा। सुख में विनम्र रहना और दुख में धैर्य बनाए रखना शायद समय को समझने की सबसे व्यावहारिक कला है। समय न अच्छा होता है, न बुरा; वह बस होता है। अच्छा या बुरा बनता है हमारा अनुभव, हमारी परिस्थिति और कभी-कभी उस परिस्थिति से निपटने का हमारा तरीका। समय का सबसे बड़ा रहस्य शायद यही है कि हम उसे गुजरते हुए देखते रहते हैं, जबकि वास्तव में उसके साथ-साथ हमारा जीवन भी गुजर रहा होता है। हम अक्सर पूछते हैं—समय कैसा चल रहा है? शायद कभी-कभी हमें यह भी पूछना चाहिए कि समय तो चल रहा है, लेकिन हम उसके साथ चल रहे हैं या केवल उसके बीत जाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं?
