दाढ़ी की दास्तान : चेहरे के बालों से संस्कृति, धर्म और फैशन तक
“उनकी दाढ़ी उजली-उजली, इनकी दाढ़ी है काली,
जिसकी दाढ़ी में तिनका हो, वह दाढ़ी चोरों वाली।
यह दाढ़ी है मुल्ला जी की, यह दाढ़ी है काज़ी की,
दाढ़ी संत विनोबा की यह, यह दाढ़ी नेता जी की।
दाढ़ी अब्राहम लिंकन की, यह दाढ़ी है लेनिन की,
दाढ़ी यह कवि गुरु रवीन्द्र की, विश्व-ख्याति फैली जिनकी...”
सूर्यकुमार पांडेय की ये पंक्तियां बच्चों के लिए लिखी गई कविता भर नहीं हैं। इनमें दाढ़ी के बहाने मनुष्य की एक ऐसी दुनिया दिखाई देती है, जिसमें धर्म भी है, राजनीति भी, संत भी हैं, क्रांतिकारी भी, कवि भी और बकरा भी! किसी की दाढ़ी काली है, किसी की सफेद, किसी की लंबी, किसी की छोटी और किसी की इतनी घनी कि चेहरा कम और दाढ़ी ज्यादा दिखाई देती है। चेहरे पर उगने वाले कुछ बालों ने मनुष्य की सभ्यता में आखिर इतना बड़ा महत्व कैसे हासिल कर लिया? यही दाढ़ी कभी ज्ञान और तपस्या का प्रतीक बनती है, कभी धार्मिक पहचान का, कभी सत्ता और पुरुषत्व का, कभी विद्रोह का और आजकल कभी-कभी केवल फैशन का।
दाढ़ी की कहानी वास्तव में मनुष्य के शरीर से शुरू होती है, लेकिन शरीर पर खत्म नहीं होती। वह इतिहास, संस्कृति, धर्म, भाषा, राजनीति, कला, सिनेमा और बाजार तक फैल जाती है। प्रकृति ने चेहरे पर बाल दिए और मनुष्य ने उनके लिए अर्थ गढ़ दिए। यही कारण है कि दाढ़ी को केवल चेहरे के बाल कहना उतना ही अधूरा है जितना टोपी को केवल सिर ढकने का कपड़ा, चश्मे को केवल आंखों की सहायता का उपकरण या वस्त्र को केवल शरीर ढकने का साधन मान लेना। मनुष्य की दुनिया में चीजों का भौतिक अस्तित्व एक बात है और उनका सांस्कृतिक अर्थ दूसरी।
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि दाढ़ी का कोई एक आविष्कारक नहीं है। किसी ने बैठकर यह नहीं सोचा होगा कि “आज से हम दाढ़ी रखना शुरू करते हैं।” दाढ़ी मानव शरीर की प्राकृतिक विशेषता है। पुरुषों में किशोरावस्था के बाद एंड्रोजन हार्मोन, विशेष रूप से टेस्टोस्टेरोन और उससे संबंधित हार्मोनल प्रक्रियाएं, चेहरे के बालों की वृद्धि को प्रभावित करती हैं। चेहरे के बालों की घनता, मोटाई और बढ़ने की गति में व्यक्ति-व्यक्ति काफी अंतर होता है और इसमें आनुवंशिकता की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यानी दाढ़ी पहले प्रकृति ने बनाई, मनुष्य ने बाद में उसके साथ प्रयोग शुरू किए।
प्रागैतिहासिक मनुष्य के पास आधुनिक रेजर, ट्रिमर या शेविंग क्रीम नहीं थी। इसलिए यह अनुमान स्वाभाविक है कि प्रारंभिक मानव समाजों में चेहरे के बालों को प्राकृतिक रूप से बढ़ने दिया जाता रहा होगा। लेकिन जैसे-जैसे औजार विकसित हुए, वैसे-वैसे मनुष्य ने अपने शरीर और चेहरे के बालों को काटने-संवारने की क्षमता भी हासिल की। पुरातात्त्विक साक्ष्यों और प्राचीन सभ्यताओं की मूर्तियों, चित्रों तथा अन्य कलात्मक अभिव्यक्तियों से पता चलता है कि बहुत पुराने समय से लोग दाढ़ी को अलग-अलग ढंग से रखते और संवारते रहे हैं। इसलिए यह कहना अधिक सही है कि दाढ़ी रखने और काटने की परंपराएं धीरे-धीरे विकसित हुईं, न कि किसी एक समय में शुरू हुईं।
प्राचीन मेसोपोटामिया में दाढ़ी राजाओं, अधिकारियों और योद्धाओं की छवियों में विशेष महत्व रखती थी। असीरियाई शासकों की मूर्तियों और उत्कीर्ण चित्रों में अत्यंत व्यवस्थित, घनी और घुंघराली दाढ़ियां दिखाई देती हैं। इन्हें केवल चेहरे के बाल समझना पर्याप्त नहीं होगा; राजकीय कला में शरीर और पोशाक की हर चीज की तरह दाढ़ी भी प्रतिष्ठा और सत्ता की दृश्य भाषा का हिस्सा बन सकती थी। जितनी सलीके से दाढ़ी बनाई गई है, उससे लगता है कि उस समय के मनुष्य को भी “ग्रूमिंग” का शौक था—बस तब बार्बर शॉप की जगह राजमहल और औजार कुछ अलग रहे होंगे।
प्राचीन मिस्र की कहानी और भी रोचक है। मिस्र में व्यक्तिगत स्वच्छता और शरीर के बाल हटाने की परंपरा के प्रमाण मिलते हैं, लेकिन राजाओं और देवताओं के चित्रण में कृत्रिम औपचारिक दाढ़ी का प्रयोग भी किया जाता था। मिस्र के फिरौन के चित्रों में दिखाई देने वाली वह लंबी, अक्सर नीचे की ओर मुड़ी हुई दाढ़ी कई बार वास्तविक दाढ़ी नहीं बल्कि राजकीय प्रतीक के रूप में पहनी जाने वाली कृत्रिम दाढ़ी थी। यानी वहां दाढ़ी का अर्थ केवल “चेहरे पर बाल” नहीं था; वह सत्ता और दिव्यता के प्रतीकात्मक संसार का हिस्सा बन चुकी थी।
प्राचीन यूनान पहुंचते-पहुंचते दाढ़ी का संबंध दर्शन और पुरुषत्व से भी जुड़ता दिखाई देता है। सुकरात जैसे दार्शनिकों की पारंपरिक छवियों में दाढ़ी उनके व्यक्तित्व की पहचान बन गई। यूनानी दार्शनिक की दाढ़ी को देखकर आज भी हमारे मन में एक गंभीर, चिंतनशील चेहरा उभर आता है। लेकिन इतिहास यहां भी सीधी रेखा में नहीं चलता। सिकंदर महान के समय सैनिकों के चेहरे साफ रखने की परंपरा को बढ़ावा मिलने का उल्लेख मिलता है। इसका एक कारण युद्ध में विरोधी द्वारा दाढ़ी पकड़ने की आशंका बताया जाता है, हालांकि इस विवरण को इतिहास की हर पुस्तक समान रूप से प्रमाणित नहीं करती। इससे इतना जरूर पता चलता है कि दाढ़ी केवल सौंदर्य का प्रश्न नहीं थी; युद्ध और व्यवहारिकता भी कभी-कभी उसके पक्ष या विपक्ष में खड़ी होती थी।
रोमन समाज में भी दाढ़ी के फैशन बदलते रहे। किसी काल में क्लीन-शेव चेहरा सभ्यता और आधुनिकता का संकेत बन गया तो किसी दूसरे काल में दाढ़ी फिर प्रतिष्ठित हो गई। सम्राट हैड्रियन की दाढ़ी तो रोमन सम्राटों के चेहरे की पारंपरिक छवि से अलग एक महत्वपूर्ण बदलाव का उदाहरण मानी जाती है। इससे एक बात साफ होती है—फैशन नया शब्द जरूर है, लेकिन फैशन बदलने की मनुष्य की आदत बहुत पुरानी है। आज हम इंस्टाग्राम देखकर दाढ़ी की शैली बदलते हैं; दो हजार साल पहले लोग राजाओं, योद्धाओं और लोकप्रिय व्यक्तियों की छवियों से प्रभावित होते होंगे।
मध्यकाल में आते-आते दाढ़ी का धार्मिक और सामाजिक अर्थ और गहरा हो गया। दुनिया की अनेक धार्मिक परंपराओं में बाल और दाढ़ी शरीर से आगे बढ़कर अनुशासन, पहचान, तपस्या या आस्था से जुड़े। लेकिन यहां एक सावधानी जरूरी है। किसी भी धर्म में दाढ़ी रखने का व्यवहार सभी अनुयायियों में एक जैसा नहीं रहा है। धर्मग्रंथों की व्याख्या, संप्रदाय, क्षेत्र, ऐतिहासिक काल और व्यक्तिगत आस्था के अनुसार काफी अंतर मिलता है।
इस्लामी परंपरा में दाढ़ी का विशेष महत्व पैगंबर मुहम्मद से संबंधित हदीसों और उनसे विकसित धार्मिक व्याख्याओं से जुड़ा है। अनेक मुस्लिम विद्वान दाढ़ी बढ़ाने और मूंछें छोटी रखने को सुन्नत से जोड़ते हैं। इस्लामी विधिशास्त्र की विभिन्न परंपराओं में दाढ़ी रखने के धार्मिक दर्जे और उसके स्वरूप को लेकर मतभेद भी मिलते हैं। इसलिए किसी व्यक्ति की दाढ़ी देखकर उसके धार्मिक आचरण के बारे में निश्चित निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। एक मुसलमान के लिए दाढ़ी धार्मिक अनुकरण का विषय हो सकती है, तो दूसरे के लिए उसका स्वरूप स्थानीय संस्कृति और व्यक्तिगत पसंद से भी प्रभावित हो सकता है।
सिख परंपरा में दाढ़ी और केश का महत्व और भी स्पष्ट धार्मिक पहचान के रूप में सामने आता है। खालसा परंपरा में केश पंच ककारों में शामिल हैं। बिना कटे बालों के साथ दाढ़ी भी अनेक सिखों के लिए धार्मिक अनुशासन और पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पगड़ी, केश और दाढ़ी मिलकर सिख पहचान की एक विशिष्ट दृश्य छवि बनाते हैं। यहां दाढ़ी फैशन से पहले आस्था, परंपरा और आत्म-अनुशासन का विषय है।
यहूदी परंपरा में भी दाढ़ी को लेकर धार्मिक निर्देशों और उनकी अलग-अलग व्याख्याओं का इतिहास है। कुछ रूढ़िवादी और हसीदिक यहूदी समुदायों में दाढ़ी को विशेष धार्मिक महत्व प्राप्त है, जबकि दूसरे यहूदी समुदायों में चेहरे के बालों के प्रति व्यवहार अलग हो सकता है। ईसाई परंपराओं में भी एकरूपता नहीं रही। पूर्वी ऑर्थोडॉक्स चर्च के अनेक पादरियों में दाढ़ी की परंपरा दिखाई देती है, जबकि रोमन कैथोलिक परंपरा में लंबे समय तक साफ चेहरे की परंपरा अधिक प्रचलित रही। इससे पता चलता है कि धार्मिक दाढ़ी की भी कोई एक वैश्विक शैली नहीं है।
हिंदू धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में दाढ़ी का संसार तो और भी विविध है। ऋषि, मुनि, तपस्वी और संन्यासी की कल्पना करते ही लंबी जटाओं और लंबी दाढ़ी वाला चेहरा अक्सर हमारी आंखों के सामने आ जाता है। पुरानी चित्रकला और लोकप्रिय धार्मिक कला ने इस छवि को इतना मजबूत कर दिया है कि सफेद या लंबी दाढ़ी अपने आप में “संत” की दृश्य पहचान जैसी लगने लगती है। लेकिन सभी साधु-संत एक ही तरह की दाढ़ी रखते हों, ऐसा नहीं है और न ही सभी हिंदुओं के लिए दाढ़ी रखना कोई अनिवार्य धार्मिक नियम है। यहां भी दाढ़ी एक सांस्कृतिक प्रतीक हो सकती है, धार्मिक सार्वभौमिक नियम नहीं।
दरअसल, दाढ़ी का सबसे रोचक खेल यही है कि वह एक ही समय में कई अर्थ धारण कर सकती है। साधु की दाढ़ी तपस्या का प्रतीक हो सकती है, सिख की दाढ़ी धार्मिक अनुशासन की, मुस्लिम की दाढ़ी धार्मिक आस्था की अभिव्यक्ति हो सकती है, किसी बुजुर्ग की सफेद दाढ़ी अनुभव की छवि पैदा कर सकती है और किसी युवा की स्टाइलिश दाढ़ी केवल फैशन का हिस्सा हो सकती है। दाढ़ी वही है, अर्थ बदल जाता है।
राजनीति और सार्वजनिक जीवन में भी दाढ़ी ने अपनी जगह बनाई। अब्राहम लिंकन इसका प्रसिद्ध उदाहरण हैं। अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति लिंकन ने 1860 के राष्ट्रपति चुनाव से पहले ग्रेस बेडेल नाम की एक बच्ची के पत्र के बाद दाढ़ी बढ़ाने का निर्णय लिया था—ऐतिहासिक विवरणों में इस घटना का उल्लेख मिलता है। बाद में उनकी विशिष्ट दाढ़ी उनके सार्वजनिक व्यक्तित्व की पहचान बन गई। आज लिंकन की तस्वीर या प्रतिमा बनानी हो तो दाढ़ी उनके चेहरे का लगभग अनिवार्य हिस्सा बन चुकी है। यानी दाढ़ी ने यहां व्यक्ति की पहचान को दृश्य प्रतीक में बदल दिया।
रवींद्रनाथ ठाकुर की लंबी सफेद दाढ़ी भी भारतीय सांस्कृतिक स्मृति में उनकी पहचान का अभिन्न हिस्सा है। उन्हें बिना दाढ़ी के कल्पना करना ही कठिन लगता है। लेनिन की तस्वीरों में भी चेहरे की विशिष्ट शैली उनके सार्वजनिक व्यक्तित्व का हिस्सा बन गई। महात्मा गांधी का उदाहरण इसके विपरीत दिशा में है—उनकी पहचान दाढ़ी से नहीं बल्कि साफ चेहरे, गोल चश्मे और विशिष्ट वेशभूषा से बनी। इससे यह समझना जरूरी है कि इतिहास में किसी व्यक्ति की विचारधारा या महत्व का निर्धारण उसकी दाढ़ी से नहीं होता; दाढ़ी केवल दृश्य पहचान का एक हिस्सा हो सकती है।
दाढ़ी और पुरुषत्व का संबंध भी पुराना है। जैविक रूप से पुरुषों में यौवन के बाद चेहरे पर बालों की वृद्धि एंड्रोजन हार्मोन से प्रभावित होती है। लेकिन दाढ़ी का जैविक होना और उसे पुरुषत्व का सामाजिक प्रतीक बना देना दो अलग बातें हैं। किसी समाज में घनी दाढ़ी को परिपक्वता और शक्ति का प्रतीक माना जा सकता है, जबकि दूसरे समाज में साफ-सुथरा चेहरा सभ्यता या पेशेवर शिष्टता का संकेत माना जा सकता है। यानी चेहरे पर बाल प्रकृति की देन हैं, लेकिन उनका सामाजिक अर्थ संस्कृति की देन है।
यही कारण है कि दाढ़ी को बुद्धिमत्ता का प्रमाण मानना भी उचित नहीं है। सफेद दाढ़ी ज्ञान की गारंटी नहीं देती और काली दाढ़ी अज्ञान की। लंबी दाढ़ी तपस्या का प्रमाण नहीं और छोटी दाढ़ी आधुनिकता का। दाढ़ी का आकार मनुष्य के चेहरे को बदल सकता है, लेकिन उसके चरित्र का वैज्ञानिक परीक्षण नहीं कर सकता। फिर भी समाज चेहरे के बालों को अर्थ देता रहा है और शायद आगे भी देता रहेगा।
अब आते हैं दाढ़ी के प्रकारों पर। दाढ़ी की कोई एक आधिकारिक या वैज्ञानिक सूची नहीं है। बार्बरिंग और फैशन की दुनिया में अलग-अलग शैलियों के अलग नाम हैं। हल्की बढ़ी हुई दाढ़ी को सामान्यतः स्टबल कहा जाता है। कुछ लोग एक-दो दिन की हल्की दाढ़ी रखते हैं, कुछ कई दिनों की। फिर आती है छोटी और करीने से तराशी हुई दाढ़ी, जिसमें गाल और गर्दन की रेखाएं साफ रखी जाती हैं। फुल बीयर्ड में गाल, जबड़े और ठुड्डी पर अपेक्षाकृत अधिक बाल रखे जाते हैं। किसी की दाढ़ी घनी होती है, किसी की विरल; यह आनुवंशिकता और जैविक कारकों पर निर्भर करता है।
गोअटी या गोटी में मुख्य जोर ठुड्डी के आसपास के बालों पर रहता है। सर्किल बीयर्ड में मूंछ और ठुड्डी के बाल मिलकर गोलाकार आकृति बनाते हैं। चिन स्ट्रैप में जबड़े की रेखा के साथ पतली पट्टी जैसी दाढ़ी रखी जाती है। इसके अलावा वैन डाइक, बाल्बो, एंकर बीयर्ड और कई आधुनिक मिश्रित शैलियां भी लोकप्रिय रही हैं। आज बार्बर किसी ग्राहक के चेहरे के आकार के अनुसार इन शैलियों में बदलाव कर सकता है। यानी दाढ़ी अब केवल “है या नहीं है” का प्रश्न नहीं रही; वह डिजाइन की वस्तु बन चुकी है।
और यहीं से दाढ़ी का प्रवेश फैशन की दुनिया में होता है। एक समय था जब पुरुषों के लिए दाढ़ी बढ़ाना और फिर किसी नाई से उसे ठीक करवा लेना पर्याप्त था। अब दाढ़ी के लिए अलग ट्रिमर, कैंची, कंघी, ब्रश, तेल, बाम, शैंपू और स्टाइलिंग उत्पाद बाजार में उपलब्ध हैं। कुछ लोग दाढ़ी की लंबाई तक नापते हैं, गालों की लाइन निर्धारित करते हैं, गर्दन की लाइन साफ करते हैं और मूंछों को अलग आकार देते हैं। दाढ़ी रखने वाले पुरुषों के लिए विशेष ग्रूमिंग उद्योग खड़ा हो गया है।
इसे आधुनिक फैशन स्टेटमेंट कहने के पीछे सिनेमा, टेलीविजन, खेल, संगीत, विज्ञापन और सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका है। किसी अभिनेता की दाढ़ी लोकप्रिय हुई तो उसके प्रशंसक वैसी ही दाढ़ी रखने लगे। किसी क्रिकेटर की स्टाइल चर्चा में आई तो बार्बर की दुकान पर उसी तरह की तस्वीर दिखाई जाने लगी। किसी वेब सीरीज के नायक की घनी दाढ़ी युवाओं के बीच आकर्षण का विषय बनी तो वह केवल चेहरे के बाल नहीं रही—वह एक दृश्य शैली बन गई। फैशन उद्योग का यही खेल है: शरीर की प्राकृतिक चीज को सामाजिक शैली में बदल देना।
दिलचस्प बात यह है कि दाढ़ी का फैशन हमेशा एक ही दिशा में नहीं चलता। एक समय क्लीन-शेव चेहरा आधुनिक और पेशेवर माना जाता है, फिर कुछ दशकों बाद घनी दाढ़ी “मर्दाना” या “रफ एंड टफ” छवि देने लगती है। फिर छोटी ट्रिम्ड दाढ़ी का दौर आता है। फिर मूंछ लौटती है। फिर फ्रेंच कट। फिर स्टबल। फिर लंबी दाढ़ी। यानी दाढ़ी का फैशन भी मौसम की तरह बदलता रहता है। अंतर बस इतना है कि मौसम बदलने पर हम छाता निकालते हैं और दाढ़ी का फैशन बदलने पर ट्रिमर।
दाढ़ी ने भाषा में भी अपनी जगह बनाई है। हिंदी का प्रसिद्ध मुहावरा है—“दाढ़ी में तिनका।” इसका अर्थ है कि किसी व्यक्ति के मन में अपराधबोध या किसी गलत काम से संबंधित संदेह हो और वह अपने व्यवहार से स्वयं शक पैदा कर दे। वास्तविक दाढ़ी में तिनका होना किसी अपराध का प्रमाण नहीं है; यह एक रूपक है। मनुष्य ने शरीर के एक हिस्से को भाषा में डालकर मनोविज्ञान और सामाजिक व्यवहार का मुहावरा बना दिया।
दाढ़ी के साथ “मूंछ” की कहानी भी जुड़ी है। भारत में मूंछ को लंबे समय तक पुरुषत्व, प्रतिष्ठा, वीरता और सामाजिक पहचान से जोड़ा गया। राजपूतों की बड़ी-बड़ी मूंछों से लेकर पुलिस और सेना की अलग-अलग मूंछ शैलियों तक, चेहरे के बालों ने सामाजिक प्रतीक का काम किया। लेकिन यहां भी वही सावधानी जरूरी है—मूंछ या दाढ़ी किसी व्यक्ति की बहादुरी, ईमानदारी या चरित्र का प्रमाण नहीं है। वह केवल एक सांस्कृतिक प्रतीक हो सकती है।
दाढ़ी की रंगत भी अपने आप में एक कहानी कहती है। युवावस्था में काली या गहरी दाढ़ी और उम्र के साथ सफेद या धूसर होते बालों ने समाज में अलग-अलग अर्थ ग्रहण किए। सफेद दाढ़ी अक्सर अनुभव, वरिष्ठता और ज्ञान से जोड़ दी जाती है। किसी बुजुर्ग की सफेद दाढ़ी देखकर सम्मान की भावना पैदा होना सांस्कृतिक अनुभव है, वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं। सफेद बालों की शुरुआत और गति व्यक्ति-व्यक्ति बदलती है और इसमें आनुवंशिकता सहित कई जैविक कारक भूमिका निभाते हैं।
आज बहुत से लोग सफेद दाढ़ी को प्राकृतिक रूप में रखते हैं, जबकि कुछ लोग उसे रंगते हैं। कोई उम्र छिपाना चाहता है, कोई उम्र को स्वीकार करना। कोई सफेद दाढ़ी को गरिमापूर्ण मानता है तो कोई युवा रूप बनाए रखना चाहता है। दाढ़ी यहां शरीर से अधिक आत्म-छवि का हिस्सा बन जाती है।
दाढ़ी के साथ स्वच्छता का प्रश्न भी अक्सर उठता है। लंबी दाढ़ी का अर्थ गंदगी नहीं और क्लीन-शेव चेहरा स्वच्छता की गारंटी नहीं। दाढ़ी में पसीना, त्वचा का तेल, धूल या भोजन के कण जमा हो सकते हैं यदि उसकी सफाई न की जाए। इसलिए दाढ़ी रखने वालों के लिए नियमित सफाई और उचित ग्रूमिंग महत्वपूर्ण है। दूसरी ओर, शेविंग करने वालों को भी रेजर से कटने, त्वचा में जलन या बालों के भीतर की ओर बढ़ने जैसी समस्याएं हो सकती हैं। असली प्रश्न दाढ़ी है या नहीं, यह नहीं; प्रश्न यह है कि व्यक्ति अपनी त्वचा और चेहरे की सफाई किस प्रकार रखता है।
दाढ़ी ने अर्थव्यवस्था को भी बदल दिया है। एक समय नाई की दुकान में मुख्य काम बाल काटना और शेव करना था। अब बार्बर शॉप कई जगह “ग्रूमिंग स्टूडियो” जैसी दिखाई देती है। दाढ़ी ट्रिमिंग, शेपिंग, मूंछ डिजाइन, फेस क्लीनिंग और दाढ़ी के लिए अलग-अलग उत्पादों ने एक पूरा बाजार तैयार किया है। दाढ़ी जितनी प्राकृतिक दिखती है, कई बार उसे वैसा दिखाने के पीछे उतनी ही मेहनत होती है। “नेचुरल लुक” भी अब कभी-कभी बहुत मेहनत से तैयार किया जाता है।
इस पूरे इतिहास में सबसे दिलचस्प बात यह है कि दाढ़ी ने कभी पूरी तरह किसी एक अर्थ को स्वीकार नहीं किया। वह धर्म भी है और फैशन भी। वह परंपरा भी है और व्यक्तिगत पसंद भी। वह तपस्या की पहचान भी हो सकती है और विज्ञापन की रणनीति भी। वह बुजुर्ग की गरिमा का हिस्सा हो सकती है और युवा की स्टाइल का। किसी के लिए वह रोजमर्रा की सुविधा है, किसी के लिए धार्मिक अनुशासन और किसी के लिए चेहरे की डिजाइन।
इसलिए दाढ़ी को देखकर व्यक्ति के बारे में बहुत कुछ मान लेना उचित नहीं है। दाढ़ी देखकर धर्म का अनुमान लगाया जा सकता है, लेकिन निश्चित रूप से धर्म नहीं जाना जा सकता। दाढ़ी देखकर उम्र का अंदाजा लगाया जा सकता है, लेकिन अनुभव नहीं। दाढ़ी देखकर फैशन का अंदाजा लगाया जा सकता है, लेकिन चरित्र नहीं। दाढ़ी देखकर किसी व्यक्ति की सामाजिक पहचान का एक संकेत मिल सकता है, लेकिन उसका पूरा व्यक्तित्व नहीं।
सूर्यकुमार पांडेय की कविता की खूबसूरती यही है कि वह इस गंभीर इतिहास को बच्चों की हंसी में बदल देती है। “मुल्ला जी की दाढ़ी”, “काज़ी की दाढ़ी”, “संत विनोबा की दाढ़ी”, “नेता जी की दाढ़ी”, “लिंकन की दाढ़ी”, “लेनिन की दाढ़ी”, “कवि गुरु रवींद्र की दाढ़ी”—कवि एक ही चीज को कितने अलग-अलग चेहरों पर रख देता है। और अंत में “बकरे की दाढ़ी” और “मेरी दाढ़ी” कहकर वह पूरी गंभीरता को बाल-सुलभ शरारत में बदल देता है।
शायद दाढ़ी की सबसे बड़ी कहानी यही है कि वह चेहरे पर उगती है, लेकिन उसका अर्थ चेहरे से बाहर बनता है। प्रकृति ने बाल दिए, मनुष्य ने कैंची बनाई; समाज ने नियम बनाए, धर्म ने अर्थ दिए, इतिहास ने प्रतीक बनाए, नेताओं ने छवि बनाई, कलाकारों ने उसे अमर किया और बाजार ने उसे उत्पाद बना दिया। कभी दाढ़ी काटना आधुनिकता था, कभी दाढ़ी रखना गरिमा; कभी सफेद दाढ़ी ज्ञान का प्रतीक बनी, कभी घनी दाढ़ी पुरुषत्व का; कभी धार्मिक पहचान बनी, कभी फैशन स्टेटमेंट।
इसलिए दाढ़ी की कहानी वास्तव में दाढ़ी की कहानी कम और मनुष्य की कहानी अधिक है। मनुष्य की यही विशेषता है कि वह प्रकृति की साधारण वस्तु को भी अर्थों से भर देता है। पेड़ को केवल पेड़ नहीं रहने देता—उसे कल्पवृक्ष बना देता है; नदी को केवल पानी नहीं रहने देता—उसे मां कह देता है; कपड़े को केवल कपड़ा नहीं रहने देता—उसे पहचान बना देता है; और चेहरे पर उगे बालों को भी केवल बाल नहीं रहने देता—उसे धर्म, दर्शन, राजनीति, उम्र, पुरुषत्व और फैशन का प्रतीक बना देता है।
दाढ़ी इसलिए कभी खत्म नहीं होगी। उसके रूप बदलते रहेंगे। आज स्टबल फैशन में है तो कल लंबी दाढ़ी लौट सकती है; आज क्लीन-शेव पेशेवर छवि है तो कल कोई नया ट्रेंड उसे बदल सकता है। लेकिन चेहरे पर उगते ये बाल मनुष्य को अपनी एक पुरानी कहानी हमेशा सुनाते रहेंगे—शरीर प्रकृति देता है, लेकिन उसकी शैली और उसका अर्थ मनुष्य स्वयं गढ़ता है।
और शायद इसीलिए कवि के बच्चे की नजर में दाढ़ी अंततः न धर्म है, न राजनीति, न इतिहास और न फैशन—वह बस “बालों की ढेरी दाढ़ी” है। यही सरलता दाढ़ी की सबसे गहरी कहानी भी है: जिसे बड़े लोग पहचान, प्रतिष्ठा और प्रतीक बनाते रहे, बच्चा उसे देखकर बस इतना कहता है—“बच्चो, यह मेरी दाढ़ी!”
