रविवार, 20 सितंबर 2026

निठल्ले के नोट्स - गंज डुंडवारा की कहानी

गंज डुंडवारा—नाम सुनते ही जैसे रेडियो के पुराने दिनों की कोई धुन कानों में उतर आती है। खासकर वे लोग जिन्होंने आकाशवाणी और विविध भारती के फरमाइशी फिल्मी गीत सुने हैं, उनके लिए यह नाम किसी नक्शे पर दर्ज एक छोटे शहर से कहीं अधिक है। आज गंज डुंडवारा उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले का एक कस्बा है। 2011 की जनगणना के अनुसार यहां की आबादी लगभग 45 हजार थी और यह रेलमार्ग से भी जुड़ा हुआ है। लेकिन रेडियो की दुनिया में इसकी पहचान किसी सरकारी सूची, किसी बड़े प्रसारण केंद्र या फिल्मी सितारे की वजह से नहीं, बल्कि फरमाइशी गीतों के श्रोताओं की वजह से बनी।

विविध भारती की सबसे बड़ी खूबी ही यही थी कि वह केवल गीत नहीं बजाता था, गीत को श्रोता के जीवन से जोड़ देता था। 1957 में शुरू हुई विविध भारती ने फिल्म संगीत, बातचीत, नाटक और मनोरंजन के अनेक रूपों को एक साथ लेकर देश के करोड़ों लोगों तक पहुंच बनाई। आज भी प्रसार भारती उसे आकाशवाणी का प्रमुख मनोरंजन नेटवर्क बताता है और ‘जयमाला’, ‘हवा महल’, ‘संगीत सरिता’, ‘भूले-बिसरे गीत’, ‘चित्रलोक’, ‘छायागीत’ जैसे कार्यक्रमों को उसकी विरासत का हिस्सा गिनाता है।

और फिर आता था वह जादुई क्षण—फरमाइश! श्रोता चिट्ठी लिखता था। चिट्ठी में अपना नाम, पता, कभी-कभी अपनी कहानी और अंत में किसी प्रिय गीत की फरमाइश। रेडियो पर उद्घोषक जब बोलता—“यह गीत फरमाया है गंज डुंडवारा से...” तो दूर-दराज बैठे श्रोता के कान अचानक चौकन्ने हो जाते। गंज डुंडवारा कोई महानगर नहीं था, लेकिन रेडियो की आवाज में उसका नाम किसी बड़े शहर से कम महत्वपूर्ण नहीं लगता था। उपलब्ध पुराने रेडियो अभिलेख-सदृश स्रोतों में भी गंजडुंडवारा के श्रोताओं की फिल्मी गीतों की फरमाइशें मिलती हैं। एक पुराने संकलन में तो “खोया मंडी गंजडुंडवारा” से कई श्रोताओं द्वारा फिल्म शागिर्द का गीत फरमाए जाने का उल्लेख मिलता है।

यहीं से गंज डुंडवारा का रेडियो-रोमांस शुरू होता है। सोचिए, उस समय न मोबाइल था, न व्हाट्सऐप, न फेसबुक, न इंस्टाग्राम। किसी को अपना पसंदीदा गीत सुनवाना है तो कागज उठाइए, स्याही लगाइए, चिट्ठी लिखिए, पोस्टकार्ड पर पता लिखिए और डाकखाने की ओर निकल जाइए। फिर इंतजार कीजिए—पता नहीं चिट्ठी पहुंचेगी भी या नहीं, पहुंचेगी तो पढ़ी जाएगी या नहीं, पढ़ी जाएगी तो फरमाइश स्वीकार होगी या नहीं और स्वीकार हुई तो किस दिन रेडियो पर अपना नाम सुनाई देगा! आज के ‘सेंड’ बटन की तुलना में वह इंतजार प्रेम-पत्र के इंतजार जैसा था।

फरमाइशी गीतों के कार्यक्रमों में इसीलिए केवल संगीत नहीं होता था, भूगोल भी होता था। “दिल्ली से फरमाइश”, “लखनऊ से फरमाइश”, “इलाहाबाद से फरमाइश”, “कानपुर से फरमाइश”—और इनके बीच अचानक कोई उद्घोषक कह देता, “गंज डुंडवारा से...”। रेडियो सुन रहे आदमी को लगता जैसे उसके अपने आसपास का कोई आदमी बोल उठा हो। कस्बे का नाम राष्ट्रीय तरंगों पर सुनाई देना अपने आप में एक छोटी-सी सामाजिक प्रतिष्ठा थी। रेडियो ने भारत के नक्शे पर केवल शहरों को नहीं जोड़ा, उसने श्रोताओं की भावनाओं को एक-दूसरे से जोड़ा।

गंज डुंडवारा की दिलचस्पी का एक पहलू यह भी है कि यह कोई महानगर या प्रसिद्ध सांस्कृतिक राजधानी नहीं था। यह कासगंज जिले का एक सामान्य कस्बा है, जिसकी अपनी स्थानीय अर्थव्यवस्था, बाजार, रेलवे और सामाजिक जीवन है। सरकारी और अन्य अभिलेखों में यह उत्तर प्रदेश के एटा-कासगंज क्षेत्र से जुड़े कस्बों में दिखाई देता है। लेकिन रेडियो ने इसकी एक दूसरी पहचान बना दी—“वह जगह जहां से फरमाइश आती है।”

और शायद यही रेडियो की असली ताकत थी। टेलीविजन ने हमें चेहरे दिखाए, इंटरनेट ने हमें दुनिया दिखाई, लेकिन रेडियो ने हमें कल्पना करने की आजादी दी। जब उद्घोषक कहता था—“गंज डुंडवारा से अब्दुल सत्तर अंसारी, एम. कलीम ज़ख्मी, वी.पी. गौतम और मुनव्वर लल्ला की फरमाइश पर...” तो श्रोता इन लोगों को देख नहीं सकता था, लेकिन कल्पना कर सकता था—शायद कोई दुकान पर बैठा होगा, कोई खेत से लौटा होगा, कोई चाय की दुकान पर रेडियो लगाए होगा और कोई अपने कमरे में अकेला उस गीत का इंतजार कर रहा होगा। एक गीत और एक छोटे-से कस्बे के बीच रेडियो ने कितनी बड़ी भावनात्मक दूरी मिटा दी थी!

गंज डुंडवारा की कहानी असल में गंज डुंडवारा की कहानी कम और उस भारत की कहानी ज्यादा है, जो रेडियो सुनता था। वह भारत जिसमें रेडियो घर का सदस्य था। सुबह समाचार, दोपहर में गीत, शाम को फरमाइश और रात में धीमी आवाज में बजता कोई पुराना नगमा—रेडियो घर की दीवारों से टकराकर परिवार का हिस्सा बन जाता था। विविध भारती ने फिल्मी गीतों को केवल मनोरंजन नहीं रहने दिया; उसने उन्हें स्मृति, प्रेम, दोस्ती, इंतजार और पहचान का माध्यम बना दिया। संसद के एक पुराने दस्तावेज में भी आकाशवाणी द्वारा फिल्मी संगीत और विविध भारती जैसे कार्यक्रमों को जनता की पसंद से जोड़े जाने का उल्लेख मिलता है।

इसलिए आज जब कोई पुराने रेडियो दिनों को याद करते हुए कहता है—“गंज डुंडवारा से फरमाइश आई है...” तो यह केवल एक पते का उच्चारण नहीं है। इसमें एक पूरा युग छिपा है—डाकिए का इंतजार, पोस्टकार्ड की स्याही, ट्रांजिस्टर की खरखराहट, उद्घोषक की आवाज, गीत की पहली पंक्ति और उस क्षण की खुशी जब हजारों-लाखों श्रोताओं के बीच किसी छोटे कस्बे के किसी साधारण आदमी का नाम अचानक राष्ट्रीय तरंगों पर सुनाई देता था।

गंज डुंडवारा इसलिए रेडियो के इतिहास में कोई बड़ा प्रसारण केंद्र होकर याद नहीं आता; वह श्रोता होकर याद आता है। और शायद यही उसकी सबसे खूबसूरत पहचान है। बड़े शहर रेडियो को कार्यक्रम देते थे, लेकिन छोटे शहर और कस्बे रेडियो को दिल देते थे। गंज डुंडवारा उन्हीं धड़कते हुए दिलों में से एक था—जहां से कभी कोई चिट्ठी चली होगी, किसी ने अपना पसंदीदा गीत लिखकर भेजा होगा और कई दिनों बाद किसी शाम रेडियो से आवाज आई होगी—“अब सुनिए, गंज डुंडवारा से फरमाइश पर...” फिर गीत बजा होगा और उस छोटे-से कस्बे को लगा होगा कि पूरी दुनिया ने कुछ क्षण के लिए उसका नाम सुन लिया है।

निठल्ले के नोट्स - जेन ज़ी की फितरत

हाँ, इस तरह के सर्वे हुए हैं, लेकिन एक महत्वपूर्ण सावधानी जरूरी है: दुनिया में ऐसा कोई विश्वसनीय सर्वे मुझे नहीं मिला जो पूरी Gen Z को “इतने प्रतिशत पढ़ाकू, इतने प्रतिशत मौज-मस्ती वाले, इतने प्रतिशत गंभीर और इतने प्रतिशत लापरवाह” जैसी चार श्रेणियों में बाँटता हो। ऐसी श्रेणियाँ वैज्ञानिक सर्वेक्षण की सामान्य श्रेणियाँ भी नहीं हैं। उपलब्ध शोध अलग-अलग सवाल पूछता है—करियर, शिक्षा, पैसा, मानसिक स्वास्थ्य, मनोरंजन, खेल, सामाजिक जीवन, तकनीक आदि। इसलिए इन अलग-अलग आंकड़ों को जोड़कर यह कहना कि “60% गंभीर और 20% लापरवाह” होगा, भ्रामक होगा।

सबसे बड़ा और उपयोगी संदर्भ अभी Deloitte का 2026 Global Gen Z and Millennial Survey है। 2026 के सर्वे में 44 देशों के 23,000 से अधिक Gen Z और millennials शामिल हैं। इसका निष्कर्ष यह नहीं है कि Gen Z काम या करियर से भागना चाहती है; बल्कि तस्वीर यह है कि वह करियर चाहती है, लेकिन करियर का अर्थ केवल पदोन्नति और ऊँची कुर्सी नहीं मानती। केवल 25% Gen Z ने तेज गति से career progression और rapid promotions को प्राथमिकता दी; बहुसंख्यक धीरे-धीरे आगे बढ़ने या अनुभव हासिल करने के लिए lateral moves को स्वीकार करने की ओर हैं।

2025 के Deloitte सर्वे में तो पढ़ाई और skill development की ओर झुकाव और स्पष्ट दिखाई देता है। 70% Gen Z respondents ने कहा कि वे सप्ताह में कम-से-कम एक बार अपने career को आगे बढ़ाने के लिए skills विकसित कर रहे हैं और 67% काम के घंटों के बाहर भी skills विकसित करते हैं। 86% ने communication, leadership, empathy और networking जैसी soft skills को career progression के लिए महत्वपूर्ण माना। यानी “Gen Z पढ़ना नहीं चाहती, बस मोबाइल चलाना चाहती है”—इस लोकप्रिय धारणा को उपलब्ध आंकड़े समर्थन नहीं करते।

लेकिन यहाँ एक दिलचस्प बदलाव है। Gen Z पढ़ाई के खिलाफ नहीं है; वह ऐसी पढ़ाई के खिलाफ हो सकती है जिसका परिणाम उसे दिखाई नहीं देता। 2025 के वैश्विक सर्वे में 31% Gen Z respondents ने कहा कि उन्होंने higher education न करने का फैसला किया। इसका एक बड़ा संदर्भ यह है कि 40% ने tuition की ऊँची लागत को चिंता बताया, 24% ने curriculum की job-market relevance पर सवाल उठाया और 28% ने higher education में practical experience की कमी को चिंता बताया। यानी सवाल “पढ़ना है या नहीं?” से ज्यादा “जो पढ़ रहे हैं उसका फायदा क्या होगा?” का है।

भारत की तस्वीर भी इसी दिशा में जाती है, बल्कि यहाँ career और practical learning का आग्रह काफी मजबूत दिखाई देता है। 2025 के Deloitte India survey में 505 Gen Z professionals समेत 809 भारतीय Gen Z और millennials शामिल थे। भारतीय Gen Z में 94% ने on-the-job learning को career growth के लिए उपयोगी माना। केवल 11% भारतीय Gen Z respondents ने कहा कि वे higher education नहीं करना चाहते/नहीं करेंगे—यह वैश्विक आंकड़े से कम है। साथ ही 52% भारतीय Gen Z respondents ने higher education की quality को लेकर असंतोष व्यक्त किया।

अब आते हैं आपके दूसरे सवाल—मौज-मस्ती कितनी और गंभीरता कितनी? यहाँ आंकड़ों को लेकर सावधान रहना होगा। कोई विश्वसनीय वैश्विक सर्वे यह नहीं कहता कि “X प्रतिशत Gen Z मौज-मस्ती में डूबी हुई है और Y प्रतिशत गंभीर है।” और ऐसा वर्गीकरण स्वयं बहुत कृत्रिम होगा। एक ही व्यक्ति सुबह परीक्षा की तैयारी कर सकता है, दोपहर में internship कर सकता है, शाम को gym या football खेल सकता है और रात को तीन घंटे reels देख सकता है। क्या उसे गंभीर कहेंगे या लापरवाह? Gen Z को समझने में यही गलती बार-बार होती है—उसके मनोरंजन को उसकी मानसिकता और उसके leisure को उसकी ambition का विरोधी मान लिया जाता है।

खेलों के मामले में भी यही स्थिति है। Gen Z में sports participation, fitness, esports, watching sports और casual gaming जैसी अलग-अलग चीजें हैं। इसलिए “कितने प्रतिशत खेलों के प्रति झुकाव रखते हैं” का एक विश्वसनीय वैश्विक प्रतिशत बताना संभव नहीं है, जब तक यह तय न हो कि हम खेल खेलने, fitness करने, professional sports देखने या gaming में रुचि की बात कर रहे हैं। अलग-अलग देशों और सर्वेक्षणों में इनकी परिभाषाएँ और नमूने अलग हैं।

अगर उपलब्ध शोध को मिलाकर एक सावधान सामाजिक तस्वीर बनाई जाए, तो मुझे Gen Z कुछ इस तरह दिखाई देती है:

Gen Z: उपलब्ध सर्वेक्षणों से दिखने वाली कुछ प्रवृत्तियाँ


ये अलग-अलग प्रश्नों के सर्वेक्षण परिणाम हैं; इन्हें Gen Z की चार श्रेणियों में विभाजन नहीं समझना चाहिए।

Deloitte Global 2025–2026; प्रतिशत अलग-अलग सर्वे प्रश्नों के उत्तर हैं।

इन आंकड़ों से एक बहुत महत्वपूर्ण बात निकलती है। Gen Z को “कामचोर पीढ़ी” कहना आंकड़ों से मेल नहीं खाता; लेकिन उसे “हर समय career-oriented पीढ़ी” कहना भी गलत होगा। वह career चाहती है, लेकिन उसके बदले जीवन नहीं देना चाहती। 2025 के Deloitte सर्वे में 89% Gen Z ने job satisfaction और well-being के लिए purpose को महत्वपूर्ण माना। 2026 के सर्वे में भी stability, skills और well-being को तेज career growth की तुलना में अधिक महत्व देने की प्रवृत्ति सामने आई।

यही शायद Gen Z की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है—उसके लिए जीवन और career अलग-अलग compartments नहीं हैं। पुरानी पीढ़ी के लिए आदर्श यह हो सकता था कि पहले पढ़ो, फिर नौकरी पाओ, फिर मेहनत करके promotion लो, फिर पैसा कमाओ और अंततः जीवन का आनंद लो। Gen Z इस क्रम पर सवाल करती है। उसका सवाल है—“अगर जीवन अभी चल रहा है तो आनंद और मानसिक संतुलन retirement तक क्यों टालें?” इसलिए वह salary भी चाहती है, meaningful work भी, learning भी, flexibility भी और personal life भी। Deloitte ने इसे money, meaning और well-being के संतुलन के रूप में रेखांकित किया है।

और शायद यही वह जगह है जहाँ नेताओं और मीडिया की Gen Z को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमी पैदा हो सकती है। जो युवा Instagram पर मजाक करता है, वही अपने career को लेकर अत्यंत गंभीर हो सकता है। जो युवा मीम बनाता है, वही AI के कारण अपनी नौकरी को लेकर चिंतित हो सकता है। जो युवा weekend पर घूमता है, वही सोमवार को competitive examination की तैयारी कर सकता है। यानी उसकी गंभीरता का रूप बदल गया है; गंभीरता समाप्त नहीं हुई है।

इसलिए अगर मुझे केवल उपलब्ध शोध के आधार पर Gen Z का एक वाक्य में चरित्र-चित्रण करना हो, तो मैं कहूँगा—यह “लापरवाह पीढ़ी” से अधिक “व्यावहारिक पीढ़ी” है; यह “पढ़ाई-विरोधी” से अधिक “परिणाम-विरोधी पढ़ाई” की आलोचक है; यह “काम से भागने वाली” से अधिक “काम और जीवन के बीच अपनी शर्तों पर संतुलन चाहने वाली” पीढ़ी है।

और यहीं आपके मूल सवाल का शायद सबसे दिलचस्प उत्तर छिपा है: Gen Z को साधने के लिए उसके reels, slang और fashion की नकल करना शायद सबसे आसान काम है; उसकी असली आकांक्षाओं—रोजगार, कौशल, आर्थिक सुरक्षा, स्वतंत्रता, मानसिक संतुलन, meaningful life और भविष्य की अनिश्चितता—को समझना कहीं ज्यादा कठिन काम है। आंकड़े फिलहाल दूसरी तस्वीर की ओर अधिक संकेत करते हैं।

निठल्ले के नोट्स - जेन ज़ी को क्या चाहिए?

यह सवाल केवल जेन ज़ी को समझने का नहीं, बल्कि उस पीढ़ी को समझने का है जो पुराने ढंग से समझाए जाने को ही संदेह की नजर से देखती है। अगर मैं जेन ज़ी की तरह सोचकर जवाब दूँ तो शायद सबसे पहले यही कहूँगा—हमें साधने की कोशिश मत कीजिए, हमें समझने की कोशिश कीजिए। हमें यह मत बताइए कि हमें क्या सोचना चाहिए; हमें वह जानकारी दीजिए जिसके आधार पर हम खुद तय कर सकें कि क्या सोचना है। हमारी पीढ़ी को भाषण से ज्यादा संवाद चाहिए, उपदेश से ज्यादा प्रमाण और दावे से ज्यादा संदर्भ।

जेन ज़ी को अक्सर सोशल मीडिया, शॉर्ट वीडियो, मीम, इंस्टाग्राम रील और तेज सूचना के साथ जोड़कर देखा जाता है। लेकिन यह तस्वीर अधूरी है। किसी पीढ़ी की तकनीकी आदत को उसकी पूरी मानसिकता मान लेना सबसे बड़ी भूल होगी। जेन ज़ी के लिए स्मार्टफोन केवल मनोरंजन का उपकरण नहीं, बल्कि पढ़ाई, रोजगार, दोस्ती, प्रेम, खरीदारी, समाचार, अभिव्यक्ति और अपनी पहचान बनाने का माध्यम है। इसलिए उसकी सूचना-प्रक्रिया भी बदल गई है। वह टीवी पर बैठकर रात के नौ बजे खबर का इंतजार करने वाला दर्शक नहीं है; खबर उसके पास दिनभर अलग-अलग प्लेटफॉर्मों, वीडियो, पोस्ट, मीम, पॉडकास्ट और बातचीत के रूप में आती रहती है। इसीलिए मीडिया के सामने चुनौती केवल यह नहीं है कि जेन ज़ी क्या देखती है, बल्कि यह है कि वह किसी सूचना पर भरोसा क्यों करती है।

और यहीं से असली समस्या शुरू होती है। अगर कोई न्यूज चैनल यह मान ले कि जेन ज़ी को केवल तेज संगीत, चमकदार ग्राफिक्स, छोटे वीडियो, अंग्रेजी के कुछ शब्द और मीम जैसी प्रस्तुति चाहिए, तो वह जेन ज़ी को नहीं, जेन ज़ी की एक मार्केटिंग-कॉपी को संबोधित कर रहा है। युवा दर्शक मनोरंजन पसंद कर सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उसे गंभीर विषयों में दिलचस्पी नहीं है। बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, परीक्षा, करियर, जलवायु परिवर्तन, एआई, मानसिक दबाव, निजी स्वतंत्रता, रिश्ते, डिजिटल प्राइवेसी और भविष्य की अनिश्चितता जैसे सवाल उसके लिए उतने ही वास्तविक हैं जितने किसी दूसरी पीढ़ी के लिए रहे हैं। अंतर केवल इतना है कि वह इन सवालों पर लंबा भाषण सुनने के बजाय शायद दस मिनट का अच्छा पॉडकास्ट, तीन मिनट का व्याख्यात्मक वीडियो या किसी विशेषज्ञ के साथ सीधी बातचीत पसंद करे।

अगर मैं जेन ज़ी की ओर से नेताओं से कुछ कहूँ तो शायद कहूँगा—हमसे वोट मांगने से पहले हमारा समय और हमारी बुद्धि दोनों का सम्मान कीजिए। हमें बार-बार यह बताने की जरूरत नहीं कि देश महान है, भविष्य उज्ज्वल है और हम दुनिया के सबसे बड़े युवा देश हैं। ये बातें अच्छी लगती हैं, लेकिन हमारे सामने सवाल कुछ अधिक ठोस हैं—मेरी पढ़ाई के बाद नौकरी कहाँ है? अगर नौकरी नहीं है तो आय का रास्ता क्या है? मेरी शिक्षा की गुणवत्ता कैसी है? मुझे शहर बदलना पड़ेगा या देश? एआई मेरी नौकरी बदलेगा या मेरी उत्पादकता बढ़ाएगा? घर खरीदना मेरे लिए संभव होगा या नहीं? मेरी डिजिटल निजता सुरक्षित है या नहीं? और अगर मैं सरकार की आलोचना करूँ तो क्या मेरी बात सुनी जाएगी? युवा नागरिक को नारे से ज्यादा इन सवालों के उत्तर चाहिए।

लेकिन जेन ज़ी को केवल सुविधा और अवसर की पीढ़ी समझना भी गलत होगा। यह पीढ़ी विरोधाभासों से भरी हुई है। वह स्वतंत्रता चाहती है, लेकिन आर्थिक सुरक्षा भी चाहती है। वह व्यक्तिगत पहचान को महत्व देती है, लेकिन समुदाय से पूरी तरह अलग नहीं होना चाहती। वह परंपराओं पर सवाल उठाती है, लेकिन उनमें से कुछ को नए अर्थों के साथ अपनाती भी है। वह ग्लोबल कंटेंट देखती है, लेकिन स्थानीय भाषा, भोजन, संगीत और संस्कृति से भी जुड़ी रह सकती है। वह रिश्तों को लेकर अधिक खुलकर बात कर सकती है, लेकिन अकेलापन भी महसूस कर सकती है। वह डिजिटल रूप से अत्यंत जुड़ी हुई है, फिर भी वास्तविक सामाजिक संपर्क की कमी महसूस कर सकती है। इसलिए उसे किसी एक विशेषण—'विद्रोही', 'आलसी', 'डिजिटल', 'प्रगतिशील' या 'भटकी हुई'—में समेटना आसान है, लेकिन सही नहीं।

मीडिया की स्थिति तो और दिलचस्प है। समाचार चैनल अगर जेन ज़ी को अपने दर्शक के रूप में चाहते हैं तो उन्हें यह समझना होगा कि युवा केवल न्यूज का उपभोक्ता नहीं, न्यूज का सह-निर्माता भी है। उसके पास कैमरा है, मोबाइल है, सोशल मीडिया अकाउंट है और अपनी बात कहने का मंच है। किसी घटना का वीडियो पहले उसके फोन से निकल सकता है और बाद में न्यूज चैनल तक पहुँच सकता है। वह किसी चैनल की रिपोर्ट देखने के बाद उसी विषय पर दस दूसरे स्रोत खोज सकता है। यानी न्यूज चैनल का 'हमने बताया इसलिए आपने जाना' वाला पुराना समीकरण टूट चुका है। अब दर्शक पूछता है—आपने यह बताया, लेकिन क्या आपने पूरा बताया?

यही कारण है कि जेन ज़ी को प्रभावित करने के लिए केवल प्रस्तुति बदलना पर्याप्त नहीं होगा। अगर न्यूज चैनल का मूल कंटेंट वही पुराना है, जिसमें हर छोटी घटना को 'ब्रेकिंग', हर बहस को 'महाभारत' और हर विवाद को 'देश बनाम देशद्रोह' जैसी अतिनाटकीय भाषा में पेश किया जाता है, तो नया ग्राफिक्स पैकेज उसे युवा मीडिया नहीं बना देगा। जेन ज़ी के पास तुलना करने के लिए दुनिया भर का कंटेंट है। वह एक ही विषय पर न्यूज चैनल की रिपोर्ट, किसी विशेषज्ञ का पॉडकास्ट, किसी स्वतंत्र पत्रकार का वीडियो और सोशल मीडिया पर प्रत्यक्षदर्शी की पोस्ट देख सकती है। इसलिए विश्वसनीयता अब केवल ब्रांड से नहीं आती; वह हर खबर के साथ अर्जित करनी पड़ती है।

और शायद सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि जेन ज़ी को 'साधा' जा सकता है। कोई भी पीढ़ी इतनी एकरूप नहीं होती कि उसके लिए एक फार्मूला बनाया जाए। जेन ज़ी में महानगरीय युवा भी है और छोटे शहर का युवा भी; विश्वविद्यालय का विद्यार्थी भी है और परिवार का कारोबार संभालने वाला युवा भी; प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाला भी है और कंटेंट क्रिएटर भी। किसी के लिए राजनीति रोजमर्रा की चिंता है, किसी के लिए उससे दूरी ही प्राथमिकता है। इसलिए 'जेन ज़ी क्या चाहती है?' का एक उत्तर शायद संभव ही नहीं है। बेहतर सवाल है—आज का युवा किन सवालों से जूझ रहा है और उन सवालों के उत्तर खोजने के लिए वह किन माध्यमों और किन लोगों पर भरोसा करता है?

नेताओं और मीडिया दोनों के लिए असली परीक्षा यहीं है। अगर वे केवल युवा की भाषा की नकल करेंगे—थोड़े मीम, थोड़ी स्लैंग, थोड़ा इंस्टाग्राम, कुछ पॉडकास्ट और कुछ वायरल वीडियो—तो यह संवाद नहीं, युवाओं की भाषा में पुराना संदेश पैक करने की कोशिश होगी। लेकिन अगर वे वास्तव में उसकी बात सुनेंगे, असहमति को जगह देंगे, कठिन प्रश्नों का सीधा उत्तर देंगे, अपनी गलतियों को स्वीकार करेंगे और सूचना को मनोरंजन से अलग पहचानने की उसकी क्षमता का सम्मान करेंगे, तब संवाद संभव होगा।

जेन ज़ी शायद यह नहीं चाहती कि कोई उसे बताए कि वह क्या देखे, क्या सोचे और किसे पसंद करे। वह चाहती है कि उसे इतनी विश्वसनीय और पर्याप्त जानकारी दी जाए कि वह खुद तय कर सके कि उसे क्या देखना, क्या सोचना और किसे पसंद करना है। यही उसकी तथाकथित 'नई समझदारी' का मूल हो सकता है।

इसलिए नेताओं और मीडिया की मौजूदा कवायद को पूरी तरह अंधेरे में तीर भी नहीं कहा जा सकता—वे बदलते दर्शक और मतदाता को समझने की वास्तविक कोशिश कर रहे हैं। लेकिन केवल फॉर्मेट बदलने से पीढ़ी नहीं समझी जाती। रील देखकर जेन ज़ी को समझ लेना उतना ही गलत है, जितना किसी पुराने अखबार की हेडलाइन पढ़कर पूरी पुरानी पीढ़ी को समझ लेने का दावा करना। जेन ज़ी को समझने का रास्ता उसके फोन की स्क्रीन से होकर जरूर गुजरता है, लेकिन वहीं खत्म नहीं होता। उसके सपनों, असुरक्षाओं, सवालों, आकांक्षाओं, असहमतियों और भविष्य को लेकर उसकी बेचैनी तक पहुँचना होगा।

और अगर जेन ज़ी की तरफ से आखिरी बात कहनी हो तो वह शायद इतनी ही होगी—हमें 'टारगेट ऑडियंस' मत समझिए, हमें इंसान समझिए। हम पर कंटेंट मत थोपिए, हमारे साथ बातचीत कीजिए। हमें प्रभावित करने से पहले हमें समझिए। क्योंकि हम केवल अगली पीढ़ी नहीं हैं; हम वह पीढ़ी हैं जो आज ही आपके दर्शक, उपभोक्ता, नागरिक, कर्मचारी, मतदाता और भविष्य के निर्माता हैं।

शनिवार, 19 सितंबर 2026

निठल्ले के नोट्स - स्पेस सूट का रहस्य!

अंतरिक्ष यात्री को स्पेससूट देखकर अक्सर यही सवाल उठता है कि जब वही व्यक्ति अंतरिक्ष स्टेशन के भीतर पहुँचकर शर्ट-पैंट या टी-शर्ट जैसे सामान्य कपड़ों में घूमता दिखाई देता है, तो फिर इतने भारी-भरकम और महंगे स्पेससूट की जरूरत आखिर क्यों पड़ती है? इसका सीधा उत्तर यह है कि अंतरिक्ष स्टेशन के भीतर का वातावरण और स्टेशन के बाहर का अंतरिक्ष—दो बिल्कुल अलग दुनिया हैं। अंतरिक्ष स्टेशन के अंदर मनुष्य के रहने योग्य दबाव, तापमान, ऑक्सीजन और अन्य पर्यावरणीय परिस्थितियाँ कृत्रिम रूप से बनाई जाती हैं। इसलिए वहाँ अंतरिक्ष यात्री सामान्य कपड़े पहन सकते हैं। लेकिन स्टेशन से बाहर निकलते ही उन्हें ऐसी जगह जाना पड़ता है जहाँ लगभग पूर्ण निर्वात है, सांस लेने के लिए हवा नहीं है और तापमान, विकिरण तथा सूक्ष्म अंतरिक्षीय मलबे जैसी कई गंभीर चुनौतियाँ मौजूद हैं। NASA स्वयं स्पेससूट को एक तरह का “मानव आकार का छोटा अंतरिक्षयान” बताता है, क्योंकि वह अंतरिक्ष यात्री के शरीर के चारों ओर वही मूलभूत जीवन-समर्थन वातावरण बनाता है जो पूरा अंतरिक्षयान उसके लिए बनाता है।

सबसे पहली और सबसे महत्वपूर्ण जरूरत है वायुदाब और सांस लेने योग्य वातावरण। अंतरिक्ष में पृथ्वी जैसा वायुमंडलीय दबाव नहीं है। अगर कोई व्यक्ति बिना सुरक्षा के निर्वात में चला जाए तो वह सांस लेने के लिए ऑक्सीजन प्राप्त नहीं कर सकेगा और शरीर सामान्य वातावरणीय दबाव के अभाव में गंभीर शारीरिक संकट में पड़ जाएगा। इसलिए EVA यानी Extravehicular Activity, अर्थात अंतरिक्षयान या अंतरिक्ष स्टेशन के बाहर की गतिविधि के लिए इस्तेमाल होने वाला स्पेससूट अपने भीतर नियंत्रित दबाव और ऑक्सीजन उपलब्ध कराता है। NASA के अनुसार EVA स्पेससूट जीवन-समर्थन प्रणाली के रूप में ऑक्सीजन उपलब्ध कराने, कार्बन डाइऑक्साइड हटाने, तापमान और आर्द्रता नियंत्रित करने तथा अन्य आवश्यक कार्यों में मदद करता है।

दूसरी बड़ी समस्या है तापमान। अंतरिक्ष में यह सोचना गलत होगा कि हर जगह बस बहुत ठंड होती है। वहाँ हवा न होने के कारण पृथ्वी जैसा सामान्य तरीके से ताप का आदान-प्रदान नहीं होता और सूर्य की सीधी रोशनी तथा छाया में परिस्थितियाँ बहुत अलग हो सकती हैं। NASA के अनुसार अंतरिक्ष में सूर्य की रोशनी वाले हिस्से और छाया वाले हिस्से में अत्यधिक तापीय अंतर हो सकता है। इसलिए स्पेससूट में कई परतें होती हैं और अंदर विशेष liquid cooling garment पहनाया जाता है। इसमें शरीर के पास से पानी प्रवाहित करने वाली ट्यूबें होती हैं, जो अंतरिक्ष यात्री के शरीर से अतिरिक्त गर्मी हटाने में मदद करती हैं। यानी स्पेससूट केवल बाहर की ठंड से बचाने वाला कपड़ा नहीं है; वह शरीर को अत्यधिक गर्मी और ठंड दोनों से नियंत्रित वातावरण देता है।

तीसरी समस्या है सूक्ष्म उल्कापिंड और orbital debris। अंतरिक्ष बिल्कुल खाली और शांत दिखाई देता है, लेकिन वहाँ बहुत छोटे-छोटे कण और मानव निर्मित अंतरिक्षीय मलबे के टुकड़े अत्यधिक गति से घूम सकते हैं। पृथ्वी पर एक छोटा कंकड़ मामूली चीज लग सकता है, लेकिन अंतरिक्ष में बहुत तेज गति से चल रहा छोटा कण भी गंभीर नुकसान कर सकता है। इसलिए EVA स्पेससूट में ऐसी बहुस्तरीय सुरक्षा होती है जो माइक्रोमीटियोरॉइड और orbital debris से सुरक्षा प्रदान करती है। NASA के EMU विवरण में thermal और micrometeoroid protection को स्पेससूट की प्रमुख विशेषताओं में शामिल किया गया है।

चौथी चुनौती है सूर्य का विकिरण और तेज प्रकाश। पृथ्वी पर हमारा वायुमंडल और पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र हमें अंतरिक्ष के अनेक प्रकार के विकिरण से काफी हद तक बचाते हैं। अंतरिक्ष यात्री जब स्टेशन से बाहर निकलता है तो उसे इस प्राकृतिक सुरक्षा की तुलना में अधिक प्रत्यक्ष अंतरिक्षीय वातावरण का सामना करना पड़ता है। इसलिए स्पेससूट में ऐसी सामग्री और परतें होती हैं जो तापीय विकिरण तथा सूर्य के प्रकाश के प्रभाव को कम करने में मदद करती हैं। हेलमेट का visor भी सिर्फ कांच की खिड़की नहीं होता; उसमें सूर्य की तीव्र रोशनी से आँखों की सुरक्षा के लिए विशेष फिल्टर और coating होती है।

एक और दिलचस्प बात यह है कि स्पेससूट केवल सुरक्षा कवच नहीं बल्कि एक चलता-फिरता जीवन-समर्थन तंत्र है। अंतरिक्ष यात्री के पीछे लगा backpack वास्तव में Portable Life Support System होता है। इसमें ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड नियंत्रण, पानी और तापमान नियंत्रण से संबंधित प्रणालियाँ होती हैं। सूट में संचार प्रणाली भी जुड़ी होती है, जिससे अंतरिक्ष यात्री स्टेशन या मिशन नियंत्रण से बात कर सकता है। NASA के अनुसार EMU में atmospheric containment, thermal insulation, cooling, solar-radiation protection और micrometeoroid/orbital-debris protection जैसी क्षमताएँ शामिल हैं।

अब सवाल आता है कि स्टेशन के अंदर वही सब सुविधाएँ क्यों नहीं चाहिए? क्योंकि अंतरिक्ष स्टेशन स्वयं एक विशाल, दबावयुक्त और नियंत्रित वातावरण है। स्टेशन के अंदर पृथ्वी जैसा रहने योग्य वातावरण बनाए रखा जाता है—यही कारण है कि वहाँ अंतरिक्ष यात्री सामान्य कपड़ों में काम कर सकते हैं। NASA इसे “shirt-sleeve environment” कहता है, यानी ऐसा वातावरण जहाँ व्यक्ति शर्ट-पैंट जैसे सामान्य कपड़ों में काम कर सकता है। इसलिए स्टेशन के अंदर स्पेससूट पहनकर घूमना वैसा ही होगा जैसे कोई व्यक्ति अपने घर के अंदर ऑक्सीजन सिलेंडर, एयर-कंडीशनिंग सिस्टम और सुरक्षा कवच लेकर घूमता रहे। उसकी जरूरत नहीं है क्योंकि वह पूरा वातावरण पहले से ही नियंत्रित है।

इसे एक सरल उदाहरण से समझिए। एक पनडुब्बी के अंदर और समुद्र के पानी में तैरने वाले व्यक्ति में जो अंतर है, लगभग वैसा ही अंतर अंतरिक्ष स्टेशन के अंदर और स्टेशन के बाहर है। पनडुब्बी के अंदर सामान्य कपड़े पर्याप्त हैं क्योंकि अंदर हवा और दबाव नियंत्रित है; लेकिन बाहर निकलते ही व्यक्ति को ऐसा diving suit चाहिए जो पानी के दबाव, तापमान और सांस लेने की समस्या से बचाए। अंतरिक्ष स्टेशन भी अंतरिक्ष में मनुष्य के लिए एक तरह का कृत्रिम सुरक्षित वातावरण है। अंतरिक्ष स्टेशन से बाहर निकलना उस सुरक्षित वातावरण को छोड़कर सीधे अत्यंत hostile environment में जाना है—इसलिए वहाँ स्पेससूट अनिवार्य हो जाता है।

यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर और समझना चाहिए: सभी स्पेससूट एक जैसे नहीं होते। लॉन्च और re-entry के दौरान पहना जाने वाला pressure suit, अंतरिक्ष स्टेशन के बाहर spacewalk के लिए इस्तेमाल होने वाले EVA suit से अलग उद्देश्य रखता है। लॉन्च या वापसी के समय मुख्य चिंता cabin pressure खोने जैसी आपात स्थिति में अंतरिक्ष यात्री को सुरक्षित रखना हो सकती है, जबकि EVA suit को स्वतंत्र रूप से जीवन-समर्थन देने के साथ-साथ बाहर काम करने, चलने-फिरने, उपकरण पकड़ने और कई घंटे तक अंतरिक्षीय वातावरण झेलने में सक्षम होना पड़ता है। NASA के मानकों में launch/entry/abort suits और EVA suits के कार्य अलग-अलग बताए गए हैं।

एक और रोचक तथ्य यह है कि स्पेससूट को पहनना साधारण कपड़े पहनने जैसा नहीं है। EVA suit कई परतों और अलग-अलग हिस्सों से बना होता है। उसके अंदर cooling garment, pressure system, protective layers, helmet, gloves और life-support system जुड़े होते हैं। NASA के अनुसार पूरी तरह तैयार होने में काफी समय लग सकता है। यही कारण है कि अंतरिक्ष यात्री spacewalk से पहले कई प्रक्रियाओं से गुजरते हैं। इसके अलावा, कम दबाव वाले स्पेससूट में जाने से पहले nitrogen से संबंधित decompression sickness के जोखिम को कम करने के लिए विशेष prebreathe प्रक्रिया अपनाई जाती है।

इसलिए अंतरिक्ष यात्री का स्पेससूट पहनना अंतरिक्ष में रहने की सामान्य वर्दी नहीं है; वह अंतरिक्ष स्टेशन की सुरक्षित सीमा से बाहर जाने की व्यक्तिगत जीवन-रक्षक मशीन है। स्टेशन के अंदर स्टेशन स्वयं “बड़ा स्पेससूट” बन जाता है—वह हवा, दबाव, तापमान और रहने योग्य वातावरण उपलब्ध कराता है। स्टेशन के बाहर वही काम एक छोटे, व्यक्ति के शरीर पर पहने जाने वाले स्पेससूट को करना पड़ता है। इसीलिए तस्वीरों में एक ही अंतरिक्ष यात्री कभी साधारण टी-शर्ट में और कुछ समय बाद विशाल सफेद स्पेससूट में दिखाई देता है—कपड़े नहीं बदले हैं, बल्कि उसके आसपास का पूरा पर्यावरण बदल गया है। यही स्पेससूट की वास्तविक आवश्यकता और उसका सबसे सरल वैज्ञानिक उत्तर है। 

शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

निठल्ले के नोट्स - टीकों पर टीका-टिप्पणी!

क्या हर बीमारी के लिए अलग वैक्सीन लगवाते-लगवाते इंसान वैक्सीनों का चलता-फिरता भंडार बन जाएगा?

मनुष्य ने बीमारी से लड़ने के लिए जो सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपाय विकसित किए हैं, उनमें टीकाकरण का स्थान बहुत ऊपर है। चेचक जैसी बीमारी के उन्मूलन से लेकर पोलियो, डिप्थीरिया, टिटनेस, खसरा, काली खांसी और कई अन्य संक्रमणों के नियंत्रण तक टीकों ने करोड़ों लोगों की जान बचाई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार पिछले 50 वर्षों में केवल 14 प्रमुख बीमारियों के खिलाफ टीकाकरण ने कम-से-कम 15.4 करोड़ जीवन बचाने में योगदान दिया है। इसलिए टीके को केवल एक दवा या इंजेक्शन मानना उसके महत्व को छोटा कर देना होगा; यह वास्तव में शरीर की प्रतिरक्षा-व्यवस्था को किसी विशिष्ट रोगजनक को पहचानने और उसके विरुद्ध तेजी से प्रतिक्रिया करने के लिए प्रशिक्षित करने की तकनीक है। 

लेकिन जैसे-जैसे विज्ञान आगे बढ़ रहा है, एक बिल्कुल स्वाभाविक सवाल सामने आता है—यदि आज पोलियो, टिटनेस, हेपेटाइटिस, इन्फ्लुएंजा, कोविड, एचपीवी, न्यूमोकोकल संक्रमण और अनेक दूसरी बीमारियों के लिए टीके उपलब्ध हैं और कल डेंगू, मलेरिया, कैंसर या अन्य रोगों के लिए और टीके आते हैं, तो क्या मनुष्य को हर बीमारी के लिए अलग-अलग टीका लगवाते जाना होगा? और यदि शरीर में एक साथ अनेक टीकों के जरिए अलग-अलग एंटीजन पहुंचाए जाएं, तो क्या प्रतिरक्षा-तंत्र पर कोई ऐसा दबाव पड़ेगा जिससे उसकी प्राकृतिक कार्यप्रणाली बिगड़ जाए? यह प्रश्न सुनने में जितना भय पैदा करता है, वैज्ञानिक दृष्टि से तस्वीर उतनी सीधी नहीं है। उपलब्ध प्रमाण बताते हैं कि एक ही समय में कई वैक्सीन देने से सामान्यतः प्रतिरक्षा-तंत्र 'ओवरलोड' नहीं होता। WHO स्पष्ट रूप से कहता है कि एक ही विजिट में कई टीके देना सुरक्षित है और वैक्सीनों में मौजूद एंटीजन की मात्रा उन असंख्य बाहरी पदार्थों की तुलना में बहुत कम है जिनका सामना हमारा शरीर रोजमर्रा में करता है। 

इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। हमारा शरीर हर दिन केवल वैक्सीन का सामना नहीं करता। हम सांस लेते हैं, भोजन करते हैं, पानी पीते हैं, त्वचा और श्वसन तंत्र के जरिए सूक्ष्मजीवों के संपर्क में आते हैं। भोजन में भी ऐसे अनेक पदार्थ होते हैं जिन्हें प्रतिरक्षा-तंत्र पहचानता है। इसलिए शरीर को यदि एक दिन में दो या तीन अलग-अलग टीके दिए जाते हैं तो इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रतिरक्षा-तंत्र तीन दिशाओं में खिंचकर कमजोर हो जाएगा। आधुनिक टीकाकरण कार्यक्रम इसी समझ पर आधारित हैं। बच्चों को कई बार एक ही विजिट में अनेक टीके दिए जाते हैं और कुछ बीमारियों के लिए तो कॉम्बिनेशन वैक्सीन बनाई ही जाती हैं, जिसमें कई रोगों के विरुद्ध प्रतिरक्षा पैदा करने वाले घटक एक ही इंजेक्शन में होते हैं। CDC के अनुसार उपलब्ध वैज्ञानिक अध्ययनों में एक साथ दिए गए नियमित टीकों से दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्या का प्रमाण नहीं मिला है। 

इसका मतलब यह भी नहीं है कि हर वैक्सीन को किसी भी दूसरी वैक्सीन के साथ मनमाने ढंग से मिला देना सुरक्षित है। यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा—एक ही दिन कई वैक्सीन लगाना और अलग-अलग वैक्सीनों को एक ही सिरिंज में मिला देना दो बिल्कुल अलग बातें हैं। चिकित्सकीय प्रोटोकॉल में अलग वैक्सीनों को अलग सिरिंज और उचित अलग-अलग स्थानों पर दिया जाता है। कुछ विशेष परिस्थितियों में दो वैक्सीनों के बीच अंतराल रखना भी आवश्यक हो सकता है, क्योंकि कुछ प्रतिरक्षात्मक प्रतिक्रियाएं एक-दूसरे को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए 'कई टीके सुरक्षित हैं' का अर्थ 'कोई भी टीका कभी भी किसी भी दूसरे टीके के साथ दे दीजिए' नहीं है। 

यहीं से वैक्सीन-विज्ञान का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत सामने आता है—हर मनुष्य को हर उपलब्ध वैक्सीन की आवश्यकता नहीं होती। टीकाकरण कोई ऐसा मेन्यू नहीं है जिसमें अस्पताल जाकर व्यक्ति कहे कि बीमारी से बचना है इसलिए उपलब्ध सभी टीके लगा दीजिए। उम्र, पहले लग चुके टीके, यात्रा, पेशा, गर्भावस्था, प्रतिरक्षा-स्थिति, किसी विशेष रोग का जोखिम, स्थानीय संक्रमण की स्थिति और व्यक्ति की चिकित्सकीय परिस्थितियों के आधार पर टीकाकरण तय किया जाता है। उदाहरण के लिए डेंगू का टीका उपलब्ध होने का अर्थ यह नहीं कि दुनिया के प्रत्येक वयस्क को डेंगू का टीका लगवाना चाहिए। WHO की अप्रैल 2025 की जानकारी के अनुसार TAK-003/Qdenga के लिए विशेष आयु और उच्च डेंगू-संचरण वाले क्षेत्रों को ध्यान में रखकर सिफारिश की गई है और यह दो खुराकों की श्रृंखला है। 

डेंगू का उदाहरण इस बात को और स्पष्ट करता है कि वैक्सीन भी हर बीमारी का जादुई समाधान नहीं है। डेंगू वायरस के चार प्रमुख सीरोटाइप हैं और टीके की प्रभावशीलता तथा जोखिम व्यक्ति की पूर्व प्रतिरक्षा और वायरस के प्रकार जैसी बातों से प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए WHO डेंगू टीकाकरण को मच्छर नियंत्रण, व्यक्तिगत सुरक्षा और बेहतर रोग-प्रबंधन के साथ जोड़कर देखता है। अर्थात भविष्य की चिकित्सा में भी केवल 'टीका लगवा लो और बीमारी खत्म' वाला दृष्टिकोण पर्याप्त नहीं होगा। 

कैंसर के मामले में तो 'कैंसर की वैक्सीन' शब्द को समझना और भी जरूरी है। कैंसर कोई एक बीमारी नहीं बल्कि अनेक प्रकार की बीमारियों का समूह है। इसलिए ऐसा कोई एक सार्वभौमिक टीका नहीं है जिसे लगवाने से हर प्रकार के कैंसर से सुरक्षा मिल जाए। कुछ टीके कैंसर पैदा करने वाले संक्रमणों से बचाकर कैंसर का जोखिम कम करते हैं—जैसे HPV वैक्सीन, जो कुछ कैंसर से जुड़े मानव पैपिलोमावायरस संक्रमणों से बचाव करती है, और हेपेटाइटिस-B वैक्सीन, जो दीर्घकाल में लीवर कैंसर के जोखिम को कम करने में मदद कर सकती है। दूसरी ओर कुछ कैंसर-ट्रीटमेंट वैक्सीन पहले से कैंसर से पीड़ित व्यक्ति की प्रतिरक्षा-व्यवस्था को कैंसर कोशिकाओं को पहचानने और उन पर हमला करने में मदद करने की कोशिश करती हैं। वे सामान्य संक्रमण-रोधी टीकों से अलग श्रेणी हैं। 

इसलिए भविष्य की चिकित्सा में शायद 'हर बीमारी के लिए हर व्यक्ति को टीका' से अधिक महत्वपूर्ण अवधारणा होगी—सही व्यक्ति को सही समय पर सही वैक्सीन। जैसे आज हम हर व्यक्ति को हर एंटीबायोटिक नहीं देते, वैसे ही भविष्य में उपलब्ध हर वैक्सीन हर व्यक्ति के लिए आवश्यक नहीं होगी। चिकित्सा का लक्ष्य केवल बीमारियों की सूची बनाकर उनके सामने टीकों की सूची रखना नहीं, बल्कि व्यक्ति के जोखिम और संभावित लाभ-हानि का आकलन करना होगा।

अब आते हैं कोविड वैक्सीन के कथित दुष्प्रभावों पर, क्योंकि इस विषय में दो विपरीत अतियां दिखाई देती हैं। एक ओर यह कहना कि कोविड वैक्सीन से जुड़ी हर स्वास्थ्य समस्या वैक्सीन की वजह से हुई, वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है; दूसरी ओर यह कहना भी सही नहीं होगा कि कोविड वैक्सीन से कोई गंभीर प्रतिकूल प्रभाव कभी हुआ ही नहीं। वैज्ञानिक निगरानी ने कुछ दुर्लभ लेकिन वास्तविक प्रतिकूल घटनाओं की पहचान की है। उदाहरण के लिए कुछ mRNA कोविड टीकों के बाद मायोकार्डाइटिस और पेरिकार्डाइटिस का दुर्लभ जोखिम पहचाना गया, विशेष रूप से किशोर और युवा पुरुषों में; वहीं Janssen/J&J वैक्सीन के साथ दुर्लभ thrombosis with thrombocytopenia syndrome यानी TTS का संबंध स्थापित हुआ था। 

यहां 'किसी व्यक्ति को टीका लगने के बाद बीमारी हुई' और 'टीके ने बीमारी पैदा की' के बीच का अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है। करोड़ों लोगों को कोई वैक्सीन लगाई जाए तो उसके बाद होने वाली अनेक स्वास्थ्य घटनाएं समय के लिहाज से टीकाकरण के बाद होंगी ही। वैज्ञानिक जांच का प्रश्न यह होता है कि क्या ऐसी घटनाएं सामान्य आबादी की अपेक्षित दर से अधिक हुईं, क्या कोई जैविक संबंध दिखाई देता है, क्या अलग-अलग अध्ययनों में वही संकेत दोहराया गया और क्या अन्य कारणों को हटाने के बाद भी संबंध बना रहता है। कोविड टीकों की सुरक्षा के लिए इसी तरह के निगरानी तंत्र लगातार इस्तेमाल किए गए हैं। 

इसलिए कोविड टीकों के दुष्प्रभावों को लेकर सबसे वैज्ञानिक स्थिति यह है कि कुछ दुर्लभ दुष्प्रभाव वास्तविक रूप से पहचाने और स्वीकार किए गए हैं, लेकिन उनसे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि वैक्सीन से जुड़ी हर गंभीर बीमारी या हर मृत्यु वैक्सीन के कारण हुई। इसी तरह यह भी वैज्ञानिक दृष्टि से गलत होगा कि किसी दुष्प्रभाव की संभावना होने के कारण उसकी चर्चा या निगरानी बंद कर दी जाए। वैक्सीन विज्ञान की विश्वसनीयता का आधार ही यही है कि लाभ के साथ जोखिम को भी मापा जाए और नई जानकारी मिलने पर सिफारिशें बदली जाएं। 

एक और दिलचस्प बात यह है कि शरीर में कई टीकों की प्रतिक्रियाएं 'मिलकर शरीर की प्राकृतिक स्थिति बिगाड़ देंगी'—इसका कोई सामान्य वैज्ञानिक आधार नहीं मिला है। प्रतिरक्षा-तंत्र कोई एक छोटी-सी बाल्टी नहीं है जिसे एक निश्चित मात्रा में एंटीजन डालते ही भर दिया जाए। वह अरबों स्तरों पर काम करने वाला अत्यंत जटिल नेटवर्क है। वैक्सीन उस नेटवर्क को विशिष्ट प्रतिरक्षा-स्मृति विकसित करने का प्रशिक्षण देती है। हां, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि प्रतिरक्षा-तंत्र असीमित रूप से किसी भी पदार्थ को सह सकता है। प्रत्येक वैक्सीन की अपनी सुरक्षा-प्रोफाइल होती है, कुछ लोगों में contraindications होते हैं, कुछ टीकों के बीच विशेष अंतराल आवश्यक हो सकते हैं और कुछ प्रतिरक्षा-सम्बंधी स्थितियों में अतिरिक्त सावधानी चाहिए। इसलिए वैज्ञानिक उत्तर 'सब सुरक्षित है' या 'सब खतरनाक है' जैसे दो ध्रुवों में नहीं बल्कि व्यक्ति, वैक्सीन और परिस्थिति के आधार पर जोखिम-लाभ के मूल्यांकन में मिलता है। 

असल चुनौती शायद भविष्य में टीकों की संख्या नहीं, बल्कि अनावश्यक टीकाकरण और आवश्यक टीकाकरण के बीच अंतर करने की होगी। यदि किसी बीमारी का जोखिम नगण्य है और वैक्सीन का लाभ उस व्यक्ति के लिए बहुत कम है, तो केवल उपलब्ध होने के कारण उसे लेना आवश्यक नहीं। इसके उलट यदि कोई बीमारी गंभीर है, व्यक्ति के लिए उसका जोखिम पर्याप्त है और टीके की सुरक्षा तथा प्रभावशीलता का प्रमाण मजबूत है, तो टीकाकरण का महत्व बढ़ जाता है। चिकित्सा में 'अधिक' हमेशा 'बेहतर' नहीं होता और 'कम' हमेशा 'सुरक्षित' नहीं होता।

अंततः टीकों का भविष्य शायद ऐसा नहीं होगा कि मनुष्य जीवन भर इंजेक्शन लगवाता रहे और उसका शरीर अलग-अलग बीमारियों के विरुद्ध युद्ध का मैदान बन जाए। अधिक संभावित तस्वीर यह है कि टीकाकरण धीरे-धीरे अधिक लक्षित, अधिक व्यक्तिगत और अधिक वैज्ञानिक जोखिम-आकलन पर आधारित होगा। कुछ टीके बचपन में, कुछ किशोरावस्था में, कुछ वृद्धावस्था में, कुछ विशेष जोखिम वाले लोगों को और कुछ महामारी या यात्रा जैसी परिस्थितियों में दिए जाएंगे। कॉम्बिनेशन वैक्सीन इंजेक्शनों की संख्या कम कर सकती हैं, जबकि नई तकनीकें अधिक विशिष्ट प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया विकसित करने की कोशिश कर रही हैं।

इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष शायद यही है कि टीके अंधविश्वास का विषय भी नहीं होने चाहिए और भय का भी नहीं। टीका न तो अमृत है, न जहर; वह एक जैव-चिकित्सकीय हस्तक्षेप है, जिसके लाभ, सीमाएं और जोखिम होते हैं। जिस तरह किसी दवा को डॉक्टर बीमारी देखकर देते हैं, उसी तरह भविष्य में भी वैक्सीन का विवेकपूर्ण इस्तेमाल यही होगा कि हम पूछें—किस बीमारी से बचाव चाहिए, इस व्यक्ति को उसका कितना जोखिम है, वैक्सीन कितनी प्रभावी है, उसके ज्ञात दुष्प्रभाव क्या हैं, दूसरी वैक्सीनों के साथ उसका संबंध क्या है और इस व्यक्ति के लिए लाभ-हानि का संतुलन क्या कहता है? विज्ञान का रास्ता न 'हर बीमारी के लिए टीका लगवाते चलो' है, न 'टीकों से दूर रहो'; रास्ता है **प्रमाण के आधार पर उतना ही टीकाकरण जितना व्यक्ति और समाज के लिए उचित हो।**

चिकित्सा विज्ञान के अभूतपूर्व विकास के साथ ही विभिन्न गंभीर और संक्रामक बीमारियों से बचाव के लिए टीकों का दायरा लगातार विस्तृत हो रहा है। जहाँ पारंपरिक रूप से टीके बच्चों को पोलियो, खसरा, और हेपेटाइटिस जैसी बीमारियों से बचाने के लिए दिए जाते थे, वहीं अब डेंगू (जैसे Qdenqa) और कैंसर (mRNA आधारित चिकित्सीय टीके) जैसी जटिल बीमारियों के लिए भी टीकों का विकास और प्रयोग अंतिम चरणों में है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हर बीमारी के लिए अलग टीका लगवाना व्यावहारिक है, शरीर पर इनकी संयुक्त या मिश्रित प्रतिक्रिया कैसी होती है, और क्या ये प्राकृतिक प्रतिरक्षा प्रणाली को नुकसान पहुंचाते हैं।
इंसानी शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (Immune System) अत्यधिक परिष्कृत और बहुआयामी होती है। यह प्रणाली एक साथ करोड़ों अलग-अलग रोगाणुओं (Pathogens) को पहचानने और उनसे निपटने में सक्षम है। जब किसी व्यक्ति को कोई टीका लगाया जाता है, तो वह पूरे शरीर की प्रतिरक्षा क्षमता को असंतुलित नहीं करता, बल्कि प्रतिरक्षा प्रणाली की 'मेमोरी बी और टी कोशिकाओं' को किसी विशेष वायरस, बैक्टीरिया या कैंसरजनित प्रोटीन (Neoantigens) की पहचान करना सिखाता है। चिकित्सीय वैज्ञानिक शोधों से यह सिद्ध हो चुका है कि इंसान के शरीर में एक साथ कई टीकों का जवाब देने की अपार क्षमता होती है। उदाहरण के लिए, नवजात शिशुओं को दिए जाने वाले 'पेंटावेलेंट' या 'हेक्सावेलेंट' टीके एक ही खुराक में 5-6 बीमारियों से सुरक्षा प्रदान करते हैं, और प्रतिरक्षा प्रणाली बिना किसी आपसी टकराव या मिश्रित नकारात्मक प्रतिक्रिया के प्रत्येक बीमारी के विरुद्ध अलग-अलग एंटीबॉडी तैयार करती है।
अलग-अलग टीकों की आवश्यकता और उनकी प्रासंगिकता को लेकर उठने वाली चिंताओं का एक प्रमुख कारण कोविड-19 टीकों के बाद सामने आए कथित दुष्परिणामों की चर्चा है। वैज्ञानिक और महामारी विज्ञान के दृष्टिकोण से देखा जाए, तो किसी भी टीके या दवा के कुछ दुर्लभ दुष्प्रभाव (Side Effects) हो सकते हैं, जिनकी गहन निगरानी वैश्विक स्वास्थ्य संस्थाओं (जैसे WHO और ICMR) द्वारा की जाती है। कोविड-19 टीकों के संदर्भ में व्यापक वैश्विक अध्ययनों और डेटा विश्लेषण ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि टीकों से मिलने वाला सुरक्षात्मक लाभ (बीमारी की गंभीरता, अस्पताल में भर्ती होने और मृत्यु दर में कमी) उनके बहुत ही दुर्लभ दुष्प्रभावों के जोखिम की तुलना में कई गुना अधिक है। किसी भी टीके को जनसामान्य के लिए स्वीकृत करने से पहले चरण-1 से लेकर चरण-3 तक के कठोर नैदानिक परीक्षणों (Clinical Trials) से गुजरना पड़ता है, जिनमें उनकी सुरक्षा, खुराक की मात्रा और शरीर की प्राकृतिक स्थिति पर उनके प्रभाव की सूक्ष्म जाँच की जाती है।
जहाँ तक कैंसर जैसे रोगों के टीकों का प्रश्न है, वे रोकथाम (Preventive) के बजाय उपचारात्मक (Therapeutic) श्रेणी में आते हैं। कैंसर वैक्सीन शरीर के स्वस्थ ऊतकों को नुकसान पहुँचाए बिना केवल ट्यूमर कोशिकाओं पर लक्षित प्रहार करने के लिए प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रशिक्षित करती हैं। इसलिए, यह धारणा कि अनगिनत टीकों से शरीर का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ जाएगा, वैज्ञानिक तथ्यों से परे है। टीकों का उद्देश्य प्राकृतिक प्रतिरक्षा को प्रतिस्थापित करना नहीं, बल्कि उसे सटीक पहचान और प्रशिक्षण देना है। हर बीमारी के लिए अलग-अलग टीके लगवाने की आवश्यकता भी व्यक्ति की उम्र, भौगोलिक क्षेत्र, जीवनशैली और व्यक्तिगत स्वास्थ्य जोखिमों पर निर्भर करती है—सभी टीके सभी व्यक्तियों के लिए अनिवार्य नहीं होते। निष्कर्षतः, वैज्ञानिक मानकों पर खरे उतरे टीके आधुनिक स्वास्थ्य सेवा के सबसे प्रासंगिक, सुरक्षित और जीवन रक्षक स्तंभ हैं।

निठल्ले के नोट्स - दिल्ली में विभाजन (पाकिस्तान) की यादें

विभाजन की टीस से उपजे नाम: जब पाकिस्तान के शहर दिल्ली के मोहल्ले बन गए
हाँ, दिल्ली के कोहाट एन्क्लेव और पाकिस्तान के कोहाट के बीच ऐतिहासिक-सांस्कृतिक रिश्ता होने के पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं। यह रिश्ता केवल इतना नहीं है कि दोनों जगहों का नाम एक जैसा है; दिल्ली का नामकरण विभाजन के बाद पाकिस्तान से आए लोगों की स्मृतियों और उनके छोड़े हुए शहरों-इलाकों के नामों को दिल्ली में फिर से बसाने की प्रक्रिया से जुड़ा हुआ माना जाता है। हालांकि, उपलब्ध स्रोत यह नहीं बताते कि कोहाट एन्क्लेव में रहने वाले हर परिवार का मूल कोहाट ही था। यह अंतर महत्वपूर्ण है।

पाकिस्तान का कोहाट क्या है?

Kohat आज पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में स्थित एक प्रमुख शहर और कोहाट जिले का मुख्यालय है। ऐतिहासिक रूप से यह उत्तर-पश्चिमी सीमांत क्षेत्र का महत्वपूर्ण शहर रहा है। यहां पश्तो के साथ कोहाटी/हिंदको भाषायी परंपरा भी रही है। ब्रिटिश काल में कोहाट का सैन्य और प्रशासनिक महत्व काफी बढ़ा और यहां ब्रिटिश छावनी तथा किले से जुड़े संस्थान विकसित हुए। 

लेकिन 1947 के बाद कोहाट भारत का हिस्सा नहीं रहा। विभाजन के साथ ही उस पूरे क्षेत्र की राजनीतिक सीमा बदल गई और वहां रहने वाले अनेक हिंदू-सिख परिवारों को अपना घर छोड़कर भारत आना पड़ा।

फिर दिल्ली में 'कोहाट' कैसे आ गया?

यहीं से कहानी रोचक होती है।

1947 के विभाजन के बाद पश्चिमी पंजाब और तत्कालीन नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस (NWFP)—आज का खैबर पख्तूनख्वा—से बड़ी संख्या में शरणार्थी दिल्ली पहुंचे। दिल्ली के कई इलाकों और नई बस्तियों में इन विस्थापित लोगों को बसाया गया। समय के साथ उन्होंने अपनी पुरानी जगहों की स्मृतियों को नए दिल्ली के भूगोल में भी सुरक्षित रखा।

इसी प्रक्रिया में दिल्ली में ऐसे नाम दिखाई देने लगे जो आज पाकिस्तान में हैं—मियांवाली नगर, गुजरांवाला टाउन, मुल्तान से जुड़े नाम और कोहाट एन्क्लेव। Economic Times ने भी स्पष्ट रूप से लिखा है कि दिल्ली की ऐसी कई कॉलोनियों के नाम उन स्थानों की याद में रखे गए जिन्हें पाकिस्तान से आए शरणार्थी पीछे छोड़ आए थे। 

Hindustan Times ने भी विभाजन के बाद दिल्ली में बने इलाकों का उल्लेख करते हुए लिखा है कि 1950 के दशक के अंत और 1960 के दशक में मुल्तान, मियांवाली, गुजरांवाला और कोहाट जैसे नामों से जुड़े मोहल्ले विकसित हुए, जो पीछे छूटे स्थानों की स्मृति को दिल्ली में लेकर आए। 

इसलिए Kohat Enclave को पाकिस्तान के Kohat से जुड़ी स्मृति का दिल्ली में पुनर्स्थापन समझना सबसे उचित है।

इसे एक उदाहरण से समझिए

मान लीजिए 1947 से पहले कोई परिवार कोहाट में रहता था। उसका घर, बाजार, स्कूल, मंदिर या गुरुद्वारा, पड़ोसी—सब कुछ वहीं था। विभाजन के बाद उसे अपना घर छोड़कर दिल्ली आना पड़ा।

नई जगह पर रहने के बाद जब कोई बस्ती विकसित हुई और उसका नाम Kohat Enclave रखा गया, तो वह नाम केवल एक भौगोलिक संकेत नहीं था। वह उस परिवार के लिए कुछ हद तक ऐसा था जैसे—

> "हम कोहाट से आए हैं, लेकिन कोहाट को पूरी तरह पीछे नहीं छोड़ेंगे।"



अर्थात भूगोल बदल गया, लेकिन स्मृति का नाम साथ आ गया।

इसी तरह के दूसरे उदाहरण

दिल्ली का यह मामला अकेला नहीं है। विभाजन के बाद दिल्ली में ऐसे अनेक नाम मिलते हैं जो आज पाकिस्तान के शहरों या क्षेत्रों की याद दिलाते हैं।

गुजरांवाला → Gujranwala Town
आज गुजरांवाला पाकिस्तान के पंजाब में है। दिल्ली में इसी नाम का इलाका मौजूद है। नामकरण विभाजन-पूर्व भौगोलिक स्मृति को दिल्ली में बनाए रखने का उदाहरण है। 

मियांवाली → Mianwali Nagar
मियांवाली आज पाकिस्तान के पंजाब में स्थित है। दिल्ली का मियांवाली नगर भी इसी ऐतिहासिक स्मृति की ओर संकेत करता है। 

मुल्तान → Multan से जुड़े नाम
दिल्ली के कुछ पुराने इलाकों में मुल्तान की स्मृति से जुड़े नाम भी दिखाई देते हैं। यह उस समय की व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा था, जब विस्थापित लोग अपने पुराने शहरों के नामों को नई बस्तियों में जीवित रखते थे। 

इसे आप एक तरह का "मानचित्र पर स्मृति-संरक्षण" कह सकते हैं।

लेकिन एक जरूरी सावधानी

यह कहना ठीक नहीं होगा कि कोहाट एन्क्लेव का हर निवासी कोहाट से आया हुआ है, या यह कि पूरी कॉलोनी केवल कोहाट के शरणार्थियों के लिए बनाई गई थी। उपलब्ध विश्वसनीय स्रोत मुख्यतः इतना स्थापित करते हैं कि दिल्ली की इस कॉलोनी का नाम पाकिस्तान में छूटे स्थानों की स्मृति से जुड़ी उस व्यापक विभाजन-उत्तर नामकरण परंपरा का हिस्सा है।

आज सरकारी रिकॉर्ड में भी Kohat Enclave दिल्ली का बाकायदा एक वार्ड है; दिल्ली सरकार के दस्तावेजों में इसे Ward 61 के रूप में दर्ज किया गया है। 

एक दिलचस्प विडंबना

आज यदि कोई व्यक्ति दिल्ली मेट्रो की Kohat Enclave स्टेशन पर उतरता है, तो वह शायद इसे केवल एक आधुनिक दिल्ली की कॉलोनी का नाम समझेगा। लेकिन उस नाम के पीछे 1947 की एक बहुत बड़ी ऐतिहासिक कहानी छिपी है।

एक तरफ पाकिस्तान में Kohat अपने वास्तविक भूगोल में मौजूद है; दूसरी तरफ दिल्ली में Kohat Enclave उसी नाम को एक बिल्कुल अलग देश के महानगर में जीवित रखे हुए है।

इस अर्थ में दोनों के बीच रिश्ता प्रशासनिक या वर्तमान राजनीतिक संबंध का नहीं, बल्कि विभाजन, विस्थापन, स्मृति और पुनर्वास का ऐतिहासिक रिश्ता है।

और शायद यही विभाजन के बाद दिल्ली की सबसे दिलचस्प विशेषताओं में से एक है—लोग पाकिस्तान से आए, लेकिन अपने साथ केवल सामान नहीं लाए; वे अपने शहरों के नाम, अपनी गलियां, अपनी बोलियां और अपनी स्मृतियां भी लेकर आए। दिल्ली ने उन स्मृतियों को अपने भूगोल में जगह दे दी। 

सन 1947 का भारत-विभाजन केवल सरहदों का बंटवारा नहीं था, बल्कि करोड़ों लोगों की जड़ों, यादों और संस्कृति का विस्थापन भी था। जब उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (अब पाकिस्तान का खैबर पख्तूनख्वा) के ऐतिहासिक शहर 'कोहाट' से हिंदू और सिख शरणार्थियों को अपने पुस्तैनी मकान छोड़कर भारत आना पड़ा, तो वे अपने साथ सिर्फ एक पोटली सामान नहीं लाए, बल्कि अपनी मिट्टी की खुशबू और स्मृतियां भी ले आए। दिल्ली पहुंचे इन परिवारों को जब पुनर्वास योजनाओं के तहत उत्तर-पश्चिम दिल्ली में बसाया गया, तो उन्होंने अपनी पुरानी जन्मभूमि को न भूलने की ज़िद में अपनी नई बस्ती का नाम 'कोहाट एन्क्लेव' रख दिया।
दिल्ली में कोहाट एन्क्लेव अकेला ऐसा इलाका नहीं है जो पाकिस्तान के भूगोल की याद दिलाता हो। विभाजन के समय पश्चिमी पंजाब के गुजरांवाला से आए लोगों ने उत्तरी दिल्ली में 'गुजरांवाला टाउन' की नींव रखी, तो मियांवाली जिले के शरणार्थियों ने 'मियांवाली नगर' बसाया। इसी तरह डेरा इस्माइल खान और डेरा गाजी खान से आए डेरावाल समुदाय के लोगों ने दिल्ली में 'डेरावाल नगर' का निर्माण किया।
इन सबसे अलग एक दिलचस्प और तथ्यात्मक उदाहरण कराची का भी है। विभाजन के समय जब दिल्ली से कई मुस्लिम परिवार कराची जाकर बसे, तो उन्होंने वहाँ के एक प्रमुख इलाके का नाम दिल्ली की याद में 'बहादुराबाद' (दिल्ली के अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फर के नाम पर) रखा और वहां दिल्ली की तहज़ीब को ज़िंदा रखा। ये सभी नाम आज भी इस बात के गवाह हैं कि नक्शे पर खिंची लकीरें भले ही इंसानों को बांट दें, लेकिन वे उनकी जड़ों और यादों के रिश्ते को कभी मिटा नहीं सकतीं।

निठल्ले के नोट्स - जलेबी का जोड़ नहीं!

जलेबी : जितनी मीठी, उतनी ही उलझी हुई कहानी

जलेबी बनाना और जलेबी खाना—ये सचमुच दो अलग-अलग काम हैं। जलेबी खाना सीधा काम है: गरम जलेबी उठाइए, चाशनी टपकने दीजिए और मुंह में रख लीजिए। लेकिन जलेबी बनाना? वह अपने आप में एक कला है। घोल तैयार कीजिए, उसे कुछ देर रखिए, फिर किसी कपड़े, बोतल या विशेष नोजल से गरम तेल या घी में गोल-गोल घुमाते हुए डालिए। एक चक्र दूसरे चक्र में समाता जाता है और देखते-देखते कड़ाही में एक ऐसी आकृति बनती है जिसका न आरंभ समझ में आता है, न अंत। शायद इसी कारण हिंदी में किसी जटिल या उलझे हुए मामले को “जलेबी की तरह घुमा-फिराकर कहना” कहा जाता है। जलेबी केवल मिठाई नहीं; हमारी भाषा में भी उसका एक चरित्र है।

जलेबी की कहानी भी उसकी आकृति की तरह सीधी नहीं है। आज वह भारतीय मिठाइयों की पहचान जैसी लगती है, लेकिन उपलब्ध ऐतिहासिक प्रमाण बताते हैं कि इसकी पुरानी रिश्तेदारी पश्चिम एशिया की ज़लाबिया/ज़ुलबिया जैसी मिठाइयों से जुड़ती है। दसवीं शताब्दी के बगदाद के अरबी पाकशास्त्रीय ग्रंथ Kitab al-Tabikh में ऐसी तली हुई मिठाई की रेसिपी मिलती है और बाद के मध्यकालीन ग्रंथों में भी इसके रूप मिलते हैं। भारत में इसका उल्लेख कम-से-कम पंद्रहवीं शताब्दी तक पहुंच चुका था। लगभग 1450 ईस्वी के जैन ग्रंथ प्रियंकरनृपकथा में समृद्ध व्यापारी के भोजन के संदर्भ में जलेबी का उल्लेख मिलता है और बाद के भारतीय ग्रंथों में इसके बनाने की विधि भी मिलती है। इसलिए यह कहना अधिक सटीक है कि जलेबी की पुरानी जड़ें पश्चिम एशिया से जुड़ी हैं, लेकिन भारत ने उसे इतना अपना बना लिया कि आज उसके बिना भारतीय मिठाई की कल्पना अधूरी लगती है।

यही तो भोजन की खूबसूरती है। कोई चीज एक जगह पैदा होती है, दूसरी जगह पहुंचती है और तीसरी जगह जाकर अपनी नई पहचान बना लेती है। जलेबी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। पश्चिम एशिया की ज़लाबिया जब भारतीय उपमहाद्वीप के खान-पान में आई तो उसने स्थानीय स्वाद, उपलब्ध सामग्री और पाक-परंपराओं के साथ अपना रूप बदला। आज ईरान में इसके रिश्तेदार ज़ुलबिया के नाम से मिलते हैं, अरब दुनिया में ज़लाबिया जैसे नाम मिलते हैं और भारतीय उपमहाद्वीप में जलेबी, जिलेबी, जिलापी जैसे रूप दिखाई देते हैं। खाद्य इतिहास हमें यही बताता है कि व्यंजन पासपोर्ट लेकर यात्रा नहीं करते; वे यात्रियों, व्यापारियों, संस्कृतियों और स्वादों के साथ चलते हैं।

जलेबी बनाने की प्रक्रिया अपने आप में देखने लायक नाटक है। मैदे का घोल तैयार होता है, उसमें पानी और कभी-कभी दही, बेसन, सूजी या दूसरे घटक मिलाए जाते हैं; घोल को कुछ समय आराम दिया जाता है ताकि उसमें हल्का किण्वन हो सके। फिर उसे किसी नोजल या कपड़े से गरम घी या तेल में गोल-गोल धार के रूप में छोड़ा जाता है। कुछ ही क्षणों में वह तरल घोल एक कुरकुरी आकृति में बदल जाता है। उसके बाद उसे गरम चाशनी में डुबोया जाता है। Oxford Companion to Food भी जलेबी के इसी मूल ढांचे—मैदे आधारित घोल, गोलाकार धार, डीप-फ्राइंग और फिर चाशनी में भिगोने—का वर्णन करता है।

यहीं जलेबी का असली जादू है—वह पानी जैसे घोल से शुरू होकर कुरकुरे चक्र में बदलती है और फिर चाशनी को अपने भीतर सोख लेती है। यानी जलेबी का पूरा दर्शन तीन अवस्थाओं में है—तरलता, संरचना और मिठास। पहले वह आकारहीन है, फिर आकार ग्रहण करती है और अंततः चाशनी में डूबकर अपना चरित्र पाती है। जीवन भी शायद ऐसा ही है; परिस्थितियां हमें घोल की तरह कहीं भी बहा सकती हैं, लेकिन अनुभव और अनुशासन हमें कोई आकार देते हैं और अंत में हमारी पहचान इस बात से बनती है कि हमने भीतर क्या सोखा।

लेकिन जलेबी को केवल दर्शन में बदल देना भी उसके साथ अन्याय होगा। वह खाने की चीज है और खाने में उसका अपना विज्ञान है। मैदा, तेल या घी और चीनी की चाशनी—इन तीनों का मेल जलेबी को ऊर्जा-सघन मिठाई बनाता है। यानी वह कोई ऐसा खाद्य पदार्थ नहीं है जिसे पोषण की दृष्टि से रोजमर्रा के मुख्य भोजन का विकल्प माना जाए। खासकर जिन लोगों को अपने कुल चीनी और कैलोरी सेवन पर नियंत्रण रखना है, उनके लिए जलेबी का आकार छोटा होने के बावजूद उसमें मौजूद चीनी और तलने से आई ऊर्जा को ध्यान में रखना जरूरी है। यह कहना कि “एक जलेबी से स्वास्थ्य खराब हो जाएगा” उतना ही अतिरंजित है जितना यह कहना कि “जलेबी में कोई समस्या ही नहीं।” असली सवाल है—कितनी, कितनी बार और किस तरह के बाकी आहार के साथ?

जलेबी की एक विचित्र खूबी है कि वह मिठाई होते हुए भी केवल मिठाई नहीं रहती। उत्तर भारत के कई हिस्सों में दही-जलेबी का संयोजन मिलता है। उत्तर प्रदेश के वाराणसी, प्रयागराज, आगरा, मथुरा और लखनऊ जैसे शहरों में यह नाश्ते की सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा रहा है। हाल की पोषण चर्चाओं में भी दही-जलेबी को एक ओर चीनी और डीप-फ्राइड मिठाई तथा दूसरी ओर प्रोटीन और कैल्शियम वाले दही के संयोजन के रूप में देखा गया है। यह संयोजन पोषण की दृष्टि से जलेबी को “स्वास्थ्य भोजन” नहीं बना देता, लेकिन यह जरूर दिखाता है कि भारतीय समाज ने स्वाद और भोजन को कितनी रचनात्मकता से जोड़ा है।

जलेबी का भूगोल भी कम दिलचस्प नहीं है। कहीं वह पतली और कुरकुरी है, कहीं मोटी और रस से भरी हुई; कहीं उसे दूध या दही के साथ खाया जाता है, कहीं समोसे या कचौड़ी के साथ। कुछ जगहों पर वह त्योहार की मिठाई है, कहीं नाश्ता है और कहीं मेहमाननवाजी का हिस्सा। पश्चिम एशिया में इसके ऐतिहासिक रिश्तेदार धार्मिक और उत्सवी अवसरों से भी जुड़े रहे हैं; ईरान में ज़ुलबिया रमज़ान और इफ्तार की परंपरा से जुड़ी रही है। भारत में जलेबी ने त्योहारों, विवाहों, धार्मिक आयोजनों और मेलों में अपनी जगह बना ली। भोजन ने भूगोल पार किया और फिर हर भूगोल ने उसे अपने स्वाद के अनुसार थोड़ा-थोड़ा बदल लिया।

और अब आती है जलेबी की वह विशेषता जिसके कारण वह केवल मिठाई नहीं, मुहावरा भी बन गई। किसी बात को बहुत घुमाकर कहना हो तो कहा जाता है—“जलेबी मत बनाइए।” यानी जलेबी की गोलाई भारतीय मानसिकता में भाषाई प्रतीक बन गई है। सीधी बात को घुमाकर कहना, मुद्दे के इर्द-गिर्द घूमते रहना, बात को इतना उलझा देना कि सुनने वाला भूल जाए कि शुरुआत कहां से हुई थी—यह सब “जलेबी बनाना” है। राजनीति से लेकर दफ्तर तक, प्रेम से लेकर पारिवारिक बातचीत तक, जलेबी हमारे संवाद की एक शैली बन चुकी है। मजेदार बात यह है कि जलेबी खाने वाला उसे खोलकर नहीं खाता, लेकिन जलेबी बनाने वाला उसे लगातार घुमाकर बनाता है। शायद यही कारण है कि हमारी भाषा ने जलेबी को उलझी हुई बात का प्रतीक बना दिया।

फिर भी जलेबी में एक गहरी सांस्कृतिक उदारता है। यह उन मिठाइयों में है जिसने अपनी विदेशी रिश्तेदारी को छिपाकर भारतीय होने का दावा नहीं किया; उसने भारत में आकर भारतीयता को अपना लिया। यही भारतीय भोजन-संस्कृति की बड़ी विशेषता है—वह बाहर से आई चीज को केवल स्वीकार नहीं करती, उसे बदल देती है। मसाले बदलते हैं, आकार बदलता है, खाने का समय बदलता है, साथ में परोसी जाने वाली चीज बदलती है और कुछ पीढ़ियों बाद लोग पूछने लगते हैं—“यह बाहर की चीज थी?” जलेबी के मामले में भी इतिहास और पहचान के बीच यही रोचक रिश्ता दिखाई देता है।

और शायद जलेबी हमें एक और महत्वपूर्ण बात सिखाती है—हर चीज जो मीठी है, वह जीवन के लिए अच्छी नहीं होती; लेकिन हर चीज जो स्वास्थ्य की दृष्टि से सीमित मात्रा में खानी चाहिए, वह जीवन से निकाल देने योग्य भी नहीं होती। जलेबी आनंद है, पोषण का विकल्प नहीं। त्योहार है, रोज का नाश्ता नहीं। स्मृति है, भोजन की अनिवार्यता नहीं। कभी-कभार गरम जलेबी की खुशबू से बचना भी जरूरी नहीं, लेकिन उसे रोज की आदत बना लेना भी विवेकपूर्ण नहीं।

आखिर में जलेबी की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि उसे बनाने वाला उसे जितना घुमाता है, खाने वाला उतनी ही जल्दी खत्म कर देता है। बनाने में धैर्य, खाने में अधैर्य; बनाने में कला, खाने में लालच; बनाने में चाशनी का इंतजार, खाने में “गरम है क्या?” की बेचैनी। और शायद यही जलेबी का जीवन-दर्शन है—दुनिया चाहे जितनी गोल-गोल घूमती रहे, अंततः मनुष्य की सबसे बड़ी चिंता यही रहती है कि गरम जलेबी कब मिलेगी।

इसलिए अगली बार कोई आपसे कहे कि “बात को जलेबी मत बनाइए”, तो मुस्कुराइए। जलेबी केवल बात को घुमाने का नाम नहीं है। वह सदियों की यात्राओं, संस्कृतियों के मेल, व्यापारिक रास्तों, धार्मिक और सामाजिक परंपराओं, कारीगर की उंगलियों और भारतीय स्वाद की रचनात्मकता से बनी एक खाद्य-कहानी है। **जलेबी की मिठास उसकी चाशनी में जितनी है, उससे कहीं अधिक उसकी कहानी में है—और उसकी कहानी की तरह ही उसका आकार भी हमें याद दिलाता है कि इतिहास कभी सीधी रेखा में नहीं चलता। वह भी अक्सर जलेबी की तरह घूमता हुआ हमारे सामने आता है।**