गुरुवार, 24 सितंबर 2026

निठल्ले के नोट्स - ५० के बाद

पचास की उम्र के बाद जिंदगी का सवाल थोड़ा बदल जाता है। जवानी में आदमी पूछता है—“मैं जिंदगी में क्या हासिल कर सकता हूं?” पचास के बाद धीरे-धीरे सवाल बन जाता है—“जो हासिल किया है, उसमें से मेरे हिस्से की खुशी आखिर कितनी है?” यह उम्र अक्सर एक अजीब मोड़ लेकर आती है। पीछे मुड़कर देखें तो लगता है कि आधी से ज्यादा जिंदगी बीत गई, बच्चों की पढ़ाई, नौकरी, घर, परिवार, जिम्मेदारियां और भविष्य की चिंता में बहुत कुछ कर लिया, लेकिन अपने लिए क्या किया—इस सवाल का जवाब कई बार चुप्पी में मिलता है। यही वह समय है जब आदमी को घबराने के बजाय अपने जीवन को नए अर्थ में देखना चाहिए। पचास की उम्र अंत की शुरुआत नहीं, बल्कि बिना भ्रम के जीवन जीने की शुरुआत हो सकती है।

जिंदगी की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम खुश रहने की तैयारी करते-करते खुश रहना ही भूल जाते हैं। बचपन में कहते हैं कि पढ़-लिख लो, फिर नौकरी मिलेगी तो मजा आएगा। नौकरी मिलती है तो कहते हैं प्रमोशन हो जाए, फिर चैन मिलेगा। शादी के बाद बच्चों की चिंता, बच्चों के बाद उनके करियर की चिंता, घर बन गया तो कर्ज चुकाने की चिंता और कर्ज चुक गया तो बुढ़ापे की चिंता। इस बीच जीवन लगातार आगे निकलता रहता है। पचास की उम्र में जाकर पहली बार अहसास होता है कि जिस “एक दिन” के आने का इंतजार करते रहे, वह शायद कैलेंडर में किसी तारीख के रूप में आता ही नहीं। इसलिए अब खुशी को भविष्य के किसी सुरक्षित कोने में रखने के बजाय वर्तमान जीवन में उसका स्थान बनाना जरूरी है।

इस उम्र में सबसे पहले यह स्वीकार करना चाहिए कि हर अधूरा सपना पूरा नहीं होगा। यह सुनने में निराशाजनक लगता है, लेकिन वास्तव में यह बहुत बड़ी आजादी है। बीस साल की उम्र में हमारे सामने असंख्य संभावनाएं थीं; पचास की उम्र में अनुभव हमें यह बताने लगता है कि हर रास्ते पर चलना संभव नहीं। कुछ सपनों को छोड़ना पड़ेगा, कुछ को छोटा करना पड़ेगा और कुछ को नए रूप में जीना पड़ेगा। यदि कभी बड़ा घर बनाने का सपना था और अब परिस्थितियां वैसी नहीं हैं तो छोटे, सुंदर और शांत घर को ही अपना सपना बनाया जा सकता है। यदि किसी पद की इच्छा पूरी नहीं हुई तो अपने ज्ञान और अनुभव से किसी दूसरे व्यक्ति को आगे बढ़ाना भी उपलब्धि हो सकती है। सपना मरता नहीं, कई बार उसका आकार बदल जाता है।

पचास के बाद खुश रहने का पहला नियम शायद तुलना छोड़ना है। सोशल मीडिया ने यह भ्रम और बढ़ा दिया है कि बाकी सब लोग हमसे ज्यादा सफल, ज्यादा खुश, ज्यादा स्वस्थ और ज्यादा संपन्न हैं। किसी की विदेश यात्रा दिखाई देती है, किसी का नया घर, किसी की नई कार, किसी की उपलब्धि और किसी के बच्चों की सफलता। लेकिन तस्वीर में किसी की रातों की बेचैनी, कर्ज, पारिवारिक तनाव या अकेलापन दिखाई नहीं देता। जीवन की तुलना दूसरों की प्रदर्शित जिंदगी से करना अपने साथ अन्याय है। पचास के बाद यह समझना जरूरी है कि अब दौड़ दूसरों से नहीं, अपने कल से होनी चाहिए।

इस उम्र में शरीर को भी खुशी की परियोजना का हिस्सा बनाना होगा। पचास के बाद शरीर पहले की तरह हर गलती को माफ नहीं करता। देर रात, लगातार बैठना, अनियमित भोजन, धूम्रपान, अत्यधिक शराब, तनाव और व्यायाम की कमी का हिसाब शरीर धीरे-धीरे लेने लगता है। इसलिए चलना, व्यायाम करना, पर्याप्त नींद लेना, संतुलित भोजन करना और नियमित स्वास्थ्य जांच कराना केवल लंबी उम्र के लिए नहीं, बल्कि बेहतर जीवन के लिए भी जरूरी है। आखिर ऐसी लंबी जिंदगी किस काम की जिसमें शरीर साथ न दे और मन हमेशा थका हुआ रहे? इस उम्र में फिटनेस कोई दिखावे की चीज नहीं रह जाती; वह स्वतंत्रता की कीमत बन जाती है।

पचास के बाद अपने लिए समय निकालना स्वार्थ नहीं है। वर्षों तक परिवार के लिए काम करने वाला व्यक्ति जब एक दिन अपने लिए दो घंटे निकालता है तो उसे अपराधबोध नहीं होना चाहिए। कोई किताब पढ़ना चाहता है, संगीत सुनना चाहता है, यात्रा करना चाहता है, लिखना चाहता है, चित्र बनाना चाहता है, बागवानी करना चाहता है या पुराने दोस्तों से मिलना चाहता है—तो उसे इन इच्छाओं को “बाद में” के खाते में डालते रहना बंद करना चाहिए। क्योंकि जीवन का सबसे खतरनाक शब्द शायद “बाद में” ही है। कई इच्छाएं इतनी देर तक टाली जाती हैं कि जब उन्हें पूरा करने का समय आता है तब परिस्थितियां साथ नहीं देतीं।

इस उम्र में काम का अर्थ भी बदलना चाहिए। यदि नौकरी है तो केवल वेतन के लिए काम करना धीरे-धीरे बोझ बन सकता है। अपने काम में अर्थ तलाशना, युवा सहकर्मियों को सिखाना, अपने अनुभव का उपयोग करना और यह महसूस करना कि हमारे काम से किसी को लाभ हो रहा है—ये बातें संतोष देती हैं। और यदि कभी नौकरी छूट जाए या करियर में अपेक्षित सफलता न मिले तो यह मान लेना कि जीवन समाप्त हो गया, सबसे बड़ी भूल होगी। पचास साल का अनुभव भी एक पूंजी है। शायद वह पूंजी किसी नई नौकरी से ज्यादा किसी सलाह, लेखन, प्रशिक्षण, शिक्षण, परामर्श या छोटे स्वतंत्र काम में उपयोगी साबित हो।

रिश्तों को लेकर भी इस उम्र में एक पुनर्विचार जरूरी है। जीवनभर जिम्मेदारियां निभाते-निभाते पति-पत्नी कई बार एक-दूसरे के साथ रहते तो हैं, लेकिन एक-दूसरे से बात करना भूल जाते हैं। बच्चों के बड़े हो जाने के बाद घर अचानक शांत हो जाता है और तब पता चलता है कि जिन दो लोगों ने वर्षों तक परिवार चलाया, उन्होंने आपस में आखिरी बार दिल की बात कब की थी, यह याद नहीं। पचास के बाद रिश्तों को फिर से दोस्ती में बदलने की जरूरत होती है। पुराने दोस्तों को फोन करना, साथ बैठना, छोटी यात्राएं करना, बिना किसी काम के बातचीत करना—ये मामूली लगने वाली चीजें जीवन में बहुत बड़ी गर्माहट वापस ला सकती हैं।

और शायद सबसे जरूरी बात—पचास के बाद अपने अतीत से समझौता करना सीखना चाहिए। कुछ फैसले गलत हुए होंगे, कुछ अवसर छूटे होंगे, कुछ लोगों ने धोखा दिया होगा, कुछ रिश्ते टूटे होंगे और कुछ सपने अधूरे रह गए होंगे। लेकिन हर रात पुराने हिसाब-किताब की कॉपी खोलकर बैठने से वर्तमान भी चला जाएगा। अतीत को बदला नहीं जा सकता, लेकिन उसके साथ हमारा संबंध बदला जा सकता है। जिसने गलती की, उससे सीखिए; जिसने दुख दिया, उससे दूरी रखिए; जो छूट गया, उसकी याद को सम्मान दीजिए और फिर आगे बढ़िए। क्षमा हमेशा दूसरे व्यक्ति के लिए नहीं होती; कई बार अपने मन को पुराने बोझ से मुक्त करने के लिए होती है।

पचास के बाद खुशी का एक बड़ा स्रोत दूसरों को खुश करना भी बन सकता है। जीवन के शुरुआती वर्षों में हम पूछते हैं कि मुझे क्या मिला; उम्र बढ़ने पर यह सवाल धीरे-धीरे बदलकर हो सकता है—मेरे होने से किसे कुछ मिला? किसी युवा को करियर की सलाह देना, किसी जरूरतमंद की मदद करना, अपने अनुभव को लिखकर अगली पीढ़ी तक पहुंचाना, परिवार में किसी अकेले व्यक्ति के साथ समय बिताना—ये छोटी-छोटी चीजें मनुष्य को अपने अस्तित्व का अर्थ महसूस कराती हैं। उम्र के इस पड़ाव पर केवल उपलब्धियां नहीं, उपयोगिता भी खुशी देती है।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि पचास की उम्र के बाद आदमी अपनी इच्छाओं को त्यागकर केवल त्याग और सेवा में लग जाए। बिल्कुल नहीं। यदि जीवनभर परिवार के लिए कमाया है तो अब अपने लिए भी खर्च कीजिए। यदि हमेशा दूसरों की पसंद का ध्यान रखा है तो कभी अपनी पसंद की जगह जाइए। यदि हमेशा दूसरों की राय के डर से कोई काम नहीं किया तो अब यह पूछना शुरू कीजिए कि वास्तव में आपको क्या चाहिए। उम्र बढ़ने के साथ समाज की स्वीकृति का महत्व थोड़ा कम और आत्मस्वीकृति का महत्व अधिक होना चाहिए।

पचास के बाद आर्थिक स्वतंत्रता भी खुशी की बुनियाद है। इसलिए भावनाओं के साथ वित्तीय वास्तविकता को भी समझना जरूरी है। बच्चों के भविष्य, घर, स्वास्थ्य और वृद्धावस्था की जरूरतों के लिए पर्याप्त व्यवस्था करते हुए अपनी वर्तमान खुशियों के लिए भी एक निश्चित हिस्सा रखना चाहिए। सारी कमाई भविष्य के लिए बचाते-बचाते वर्तमान को कंगाल कर देना भी बुद्धिमानी नहीं। और सारी संपत्ति वर्तमान में खर्च करके भविष्य को असुरक्षित कर देना भी समझदारी नहीं। संतुलन यही है कि भविष्य की चिंता इतनी न हो कि वर्तमान जीना भूल जाएं और वर्तमान की खुशी इतनी बड़ी न हो कि भविष्य संकट में पड़ जाए।

आखिर में शायद पचास की उम्र का सबसे बड़ा उपहार यही है कि आदमी को यह भ्रम छोड़ देना चाहिए कि जिंदगी अभी शुरू होगी। जिंदगी शुरू हो चुकी है—बहुत पहले। जो बीत गया, वह भी जिंदगी थी और जो बचा है, वह भी उतनी ही वास्तविक जिंदगी है। अब सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “मेरे पास कितना समय बचा है?” बल्कि यह होना चाहिए कि “जो समय बचा है, उसमें मैं किस तरह का जीवन जीना चाहता हूं?” उम्र की गणना वर्षों से होती है, लेकिन जीवन की गुणवत्ता उन वर्षों में भरे अनुभवों, रिश्तों, स्वास्थ्य, स्वतंत्रता, सीखने और संतोष से तय होती है।

पचास के बाद खुशियां हासिल करने का कोई जादुई फार्मूला नहीं है। शायद इतना करना ही पर्याप्त शुरुआत है कि आदमी अपनी प्राथमिकताएं फिर से लिखे—स्वास्थ्य को समय दे, जिनसे प्रेम करता है उनसे बात करे, जिन सपनों का कोई वास्तविक रास्ता अभी भी बचा है उन्हें मौका दे, जिन चीजों पर उसका नियंत्रण नहीं उन्हें धीरे-धीरे छोड़ दे, अपनी कमाई और भविष्य को व्यवस्थित करे, कुछ नया सीखता रहे और रोजमर्रा की छोटी खुशियों को छोटा समझना बंद कर दे। क्योंकि अंततः खुश जिंदगी वह नहीं जिसमें कोई परेशानी नहीं होती; खुश जिंदगी वह है जिसमें परेशानियों के बीच भी आदमी के पास कुछ ऐसा जरूर बचा रहता है जिसके लिए वह सुबह उठना चाहता है।

और शायद पचास की उम्र के बाद यही सबसे बड़ा सवाल है—जिंदगी कितनी बची है, यह गिनने से ज्यादा जरूरी है कि जो बची है, उसमें जिंदगी कितनी है।

निठल्ले के नोट्स - कैसे जीतें हारी हुई बाजी

कहते हैं, परिस्थितियां प्रतिकूल हों तो मनुष्य के पास मन मसोसकर बैठ जाने के अलावा आखिर बचता ही क्या है? लेकिन शायद यही वह क्षण है जब मनुष्य की असली परीक्षा शुरू होती है। अनुकूल परिस्थितियों में आगे बढ़ना उपलब्धि हो सकता है, पर प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच अपने भीतर की रोशनी बचाए रखना कहीं बड़ी उपलब्धि है। जिंदगी हमेशा हमारे हिसाब से नहीं चलती। कभी मेहनत पूरी होती है, परिणाम नहीं मिलता; कभी सही समय पर लिया गया सही फैसला भी गलत साबित हो जाता है; कभी हम पूरी ईमानदारी से अपनी भूमिका निभाते हैं और बाजी किसी और के हाथ चली जाती है। ऐसे क्षणों में लगता है कि कर्म हार गया और किस्मत जीत गई। मगर क्या सचमुच किस्मत इतनी शक्तिशाली है कि कर्म को हमेशा परास्त कर दे?

किस्मत को समझने की पहली भूल यह है कि हम उसे कोई ऐसी अदृश्य शक्ति मान लेते हैं जो हमारी जिंदगी के सारे फैसले पहले से लिखकर बैठी है। यदि ऐसा होता तो मनुष्य की मेहनत, बुद्धि, साहस, योजना और अनुभव का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता। वास्तविक जीवन में परिस्थितियां हमारे नियंत्रण से बाहर हो सकती हैं, लेकिन उन परिस्थितियों के प्रति हमारी प्रतिक्रिया हमेशा पूरी तरह बाहर नहीं होती। बारिश रोकना हमारे हाथ में नहीं, लेकिन छाता लेकर निकलना या बारिश रुकने का इंतजार करना हमारे हाथ में है। बाजार बदलना हमारे हाथ में नहीं, लेकिन अपने कौशल को बदलते बाजार के अनुरूप ढालना हमारे हाथ में है। किसी व्यक्ति का व्यवहार हमारे नियंत्रण में नहीं, लेकिन उसके व्यवहार के कारण अपनी पूरी जिंदगी को अस्त-व्यस्त होने देना या उससे कोई सबक लेकर आगे बढ़ना काफी हद तक हमारे हाथ में है। शायद किस्मत और कर्म का वास्तविक संघर्ष यहीं नहीं, बल्कि यहीं से शुरू होता है।

कई बार कर्म करते-करते मनुष्य थक जाता है। वह पूछता है—आखिर कब तक? मैंने इतना किया, फिर भी मिला क्या? यही प्रश्न सबसे खतरनाक भी है और सबसे मानवीय भी। क्योंकि लगातार प्रयास के बाद भी परिणाम न मिलना मनुष्य के भीतर यह भ्रम पैदा कर देता है कि शायद प्रयास ही व्यर्थ है। लेकिन बीज बोने और पेड़ बनने के बीच का समय भी तो जीवन का हिस्सा है। खेत में बीज डालने के अगले दिन किसान मिट्टी खोदकर यह देखने नहीं लगता कि बीज ने काम करना शुरू किया या नहीं। वह पानी देता है, मौसम देखता है, खरपतवार हटाता है और इंतजार करता है। कर्म का सबसे कठिन हिस्सा अक्सर कर्म करना नहीं, बल्कि उसके परिणाम आने तक धैर्य बनाए रखना होता है।

सिकंदर की उपमा भी इसी संदर्भ में दिलचस्प है। इतिहास में सिकंदर को विजेता कहा गया, लेकिन किसी भी विजेता की कहानी केवल जीती हुई लड़ाइयों की कहानी नहीं होती। उसके पीछे संसाधन, रणनीति, सैनिक, समय, परिस्थितियां, सहयोगी, विरोधियों की कमजोरियां और असंख्य संयोग भी होते हैं। इसलिए जिंदगी को केवल "हर बाजी जीतने" की कला मान लेना भी खतरनाक है। मनुष्य हर बाजी नहीं जीत सकता। कुछ बाजियां हारनी पड़ती हैं, कुछ से हटना पड़ता है और कुछ में यह समझना पड़ता है कि खेल ही गलत था। असली सफलता शायद हर मुकाबला जीतने में नहीं, बल्कि हार के बाद यह पहचान लेने में है कि अगली बाजी किस तरह खेलनी है।

कर्म पर किस्मत भारी पड़ती हुई दिखाई दे तो सबसे पहले यह देखना चाहिए कि वास्तव में हमारे नियंत्रण में क्या है और क्या नहीं। परिणाम हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता, लेकिन तैयारी होती है। अवसर हमारे हाथ में नहीं होता, लेकिन अवसर मिलने पर तैयार रहना हमारे हाथ में है। दूसरे लोग हमें पहचानेंगे या नहीं, यह हमारे नियंत्रण में नहीं; लेकिन अपने काम की गुणवत्ता सुधारना हमारे नियंत्रण में है। किसी परीक्षा में प्रश्न क्या आएगा, यह हमारे हाथ में नहीं; लेकिन तैयारी कितनी होगी, यह काफी हद तक हमारे हाथ में है। इसी तरह जिंदगी में कुछ दरवाजे बंद हो जाएं तो उसी दरवाजे के सामने बैठकर रोते रहने के बजाय यह देखना अधिक उपयोगी है कि कमरे में कोई खिड़की है या नहीं। किस्मत के साथ संघर्ष करने का पहला तरीका शायद यही है कि अपनी ऊर्जा उन चीजों पर खर्च न करें जिन्हें हम बदल ही नहीं सकते।

किस्मत पलटने का दूसरा नाम अक्सर अवसर पहचानना होता है। इतिहास और व्यक्तिगत जीवन दोनों में ऐसे अनेक अवसर आते हैं जिन्हें पहली नजर में अवसर समझना मुश्किल होता है। नौकरी चली जाना किसी के लिए संकट है, लेकिन वही घटना किसी दूसरे काम की शुरुआत भी बन सकती है। किसी योजना का असफल होना निराशाजनक है, लेकिन उससे यह पता चल सकता है कि योजना में गलती कहां थी। देर से मिलने वाली सफलता भी कभी-कभी अधिक टिकाऊ होती है, क्योंकि तब तक मनुष्य केवल परिणाम नहीं, प्रक्रिया भी सीख चुका होता है। इसलिए किस्मत पलटने का अर्थ हमेशा अचानक कोई चमत्कार होना नहीं है। कई बार किस्मत धीरे-धीरे तब पलटती है जब मनुष्य अपने निर्णय, कौशल, संपर्क, आदत और दिशा बदलना शुरू करता है।

और सबसे महत्वपूर्ण बात—किस्मत पलटने के लिए कभी-कभी अपनी अपेक्षाओं को भी पलटना पड़ता है। हम जिस रास्ते को सफलता का एकमात्र रास्ता मान बैठे हैं, जरूरी नहीं कि वही रास्ता हमें वहां पहुंचाए। जिंदगी में मंजिल से अधिक महत्वपूर्ण कभी-कभी दिशा होती है। अगर रास्ता बंद है तो गति बढ़ाने से कोई लाभ नहीं; दिशा बदलनी पड़ती है। यह स्वीकार करना पराजय नहीं कि कोई योजना काम नहीं कर रही। असली पराजय तब होती है जब हम केवल इसलिए उसी योजना से चिपके रहें क्योंकि हमने उसमें बहुत समय और ऊर्जा लगा दी है।

मनुष्य की सबसे बड़ी ताकत शायद उसकी परिस्थितियों को बदलने की क्षमता से भी पहले अपनी परिस्थितियों का अर्थ बदलने की क्षमता है। वही घटना किसी एक व्यक्ति को तोड़ सकती है और दूसरे को बना सकती है। असफलता किसी के लिए प्रमाण हो सकती है कि वह कुछ नहीं कर सकता, और किसी दूसरे के लिए प्रमाण कि उसे तरीका बदलना होगा। इसलिए प्रतिकूल परिस्थिति अपने आप में न तो जीत है, न हार; वह केवल परिस्थिति है। उसका परिणाम काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि हम उसके साथ क्या करते हैं।

फिर भी यह कहना ईमानदार होगा कि मेहनत करने वाला हर व्यक्ति सफल होगा और मेहनत से हर किस्मत बदली जा सकती है—यह जीवन का पूरा सच नहीं है। दुनिया में असमान अवसर हैं, संयोग हैं, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियां हैं, स्वास्थ्य और पारिवारिक जिम्मेदारियां हैं और ऐसी घटनाएं हैं जिन पर मनुष्य का कोई नियंत्रण नहीं। इसलिए असफल व्यक्ति को केवल यह कह देना कि "तुमने पर्याप्त मेहनत नहीं की", उतना ही गलत है जितना हर सफलता का श्रेय केवल किस्मत को दे देना। मनुष्य कर्म करता है, परिस्थितियां उसके साथ खेलती हैं और परिणाम दोनों के बीच कहीं बनता है।

इसलिए शायद किस्मत पलटने का सबसे व्यावहारिक मंत्र यह नहीं कि किसी चमत्कार का इंतजार किया जाए, बल्कि यह कि अपनी संभावना बढ़ाई जाए। एक रास्ता बंद हो तो दूसरा रास्ता तैयार हो, एक कौशल पुराना हो तो नया कौशल सीखा जाए, एक अवसर छूट जाए तो अगले अवसर के लिए तैयारी बढ़ाई जाए, एक हार मिले तो उससे मिली जानकारी को अगली कोशिश में इस्तेमाल किया जाए। किस्मत के दरवाजे पर दस्तक देते रहना जरूरी है, लेकिन दस्तक देने के साथ यह भी जरूरी है कि जब दरवाजा खुले तो हमारे हाथ में कुछ ऐसा हो जिसे दुनिया के भीतर ले जाया जा सके।

आखिरकार जिंदगी में हर बाजी जीतना संभव नहीं। कभी-कभी सबसे समझदार आदमी भी हारता है और कभी-कभी तैयार हुए बिना कोई व्यक्ति संयोग से जीत जाता है। लेकिन लंबी यात्रा में एक जीत या एक हार से अधिक मायने रखता है कि हम लगातार किस दिशा में जा रहे हैं। सिकंदर होना शायद सारी बाजियां जीत लेना नहीं, बल्कि हार, संयोग, विपरीत परिस्थितियों और अनिश्चितता के बीच भी अपनी अगली चाल सोच पाने की क्षमता है। किस्मत हमारे दरवाजे पर कब दस्तक देगी, यह शायद हमारे हाथ में नहीं; लेकिन दरवाजा खुला रखना, भीतर रोशनी जलाए रखना और दस्तक सुनते ही उठकर दरवाजा खोल देना—यह काफी हद तक हमारे हाथ में है। शायद यही कर्म का वह हिस्सा है, जहां से किस्मत को बदलने की कहानी शुरू होती है।

बुधवार, 23 सितंबर 2026

निठल्ले के नोट्स - सुबह जल्दी उठने के फायदे

बिल्कुल, ब्रह्म मुहूर्त में जाग जाना और ब्रह्म मुहूर्त में बिस्तर छोड़ देना—दो अलग उपलब्धियाँ हैं। पहली में अलार्म जीतता है, दूसरी में इंसान। 😄

सुबह जल्दी उठने के फायदे तभी मिलते हैं जब नींद पूरी होने के बाद व्यक्ति उठकर अपनी दिनचर्या शुरू करे। लेकिन अगर कोई चार बजे अलार्म सुनकर आँखें खोल ले, फिर यह सोचकर कि “आज से जीवन बदलना है” चादर में ही पड़ा रहे, तो उसके कुछ अपने फायदे जरूर हैं—मसलन, वह कम-से-कम यह महसूस कर सकता है कि उसने ब्रह्म मुहूर्त को देख तो लिया!

असल में बिस्तर पर जागते हुए पड़े रहने का एक फायदा शांत संक्रमण काल हो सकता है। नींद से जागने के तुरंत बाद शरीर और मस्तिष्क पूरी तरह सक्रिय नहीं होते। कुछ मिनट आराम से पड़े रहना, बिना मोबाइल उठाए, धीरे-धीरे जागना और दिन की योजना बनाना मानसिक रूप से उपयोगी हो सकता है। इसे नींद की जड़ता यानी sleep inertia से बाहर आने का समय भी समझ सकते हैं। लेकिन यह तभी ठीक है जब यह कुछ मिनटों का हो और पर्याप्त नींद के बाद हो।

दूसरा फायदा है आत्मचिंतन। सुबह का वातावरण अपेक्षाकृत शांत होता है। बिस्तर पर आँखें खोलकर कुछ देर अपने विचारों को व्यवस्थित करना, दिन के जरूरी कामों के बारे में सोचना या थोड़ी देर ध्यान करना उपयोगी हो सकता है। यानी बिस्तर उस समय मोबाइल स्क्रॉल करने की जगह विचारों की प्रयोगशाला बन सकता है।

लेकिन यहीं एक बड़ा पेंच है। यदि आप रात में देर से सोए हैं और सुबह चार बजे केवल इसलिए उठ गए कि “ब्रह्म मुहूर्त निकल न जाए”, तो बिस्तर में पड़े रहना समस्या का समाधान नहीं है। शरीर को पर्याप्त नींद चाहिए। अधिकांश वयस्कों के लिए नियमित रूप से लगभग 7–9 घंटे की नींद आवश्यक मानी जाती है। इसलिए चार बजे उठना अपने-आप में स्वास्थ्य का प्रमाण नहीं है; महत्वपूर्ण यह है कि आप पर्याप्त और नियमित नींद लेकर उठे हैं या नहीं।

और यदि ब्रह्म मुहूर्त में जागकर आपका कार्यक्रम यह है—आँख खुली, करवट बदली, मोबाइल देखा, WhatsApp खोला, Instagram देखा, फिर दुनिया की समस्याओं पर विचार करते-करते दोबारा नींद आ गई—तो इसे आध्यात्मिक साधना कहना थोड़ा मुश्किल होगा। इसे ब्रह्म मुहूर्त में डिजिटल पुनर्निद्रा कहा जा सकता है!

दिलचस्प बात यह है कि सुबह जल्दी उठने का लाभ केवल घड़ी के समय से नहीं आता। असली लाभ नियमित नींद-जागने के समय, पर्याप्त नींद, सुबह की रोशनी, शारीरिक गतिविधि और व्यवस्थित दिनचर्या के संयोजन से आता है। इसलिए किसी व्यक्ति के लिए पाँच बजे उठना उपयोगी हो सकता है, जबकि दूसरे के लिए सात बजे उठकर पर्याप्त नींद लेना अधिक उपयुक्त हो सकता है।

इसलिए ब्रह्म मुहूर्त का सबसे व्यावहारिक सूत्र शायद यह है—“जागिए जरूर, लेकिन जागने के बाद कुछ कीजिए भी।” और अगर शरीर कह रहा है कि अभी नींद पूरी नहीं हुई, तो बिस्तर छोड़कर महान बनने की जल्दी भी मत कीजिए। आखिरकार, नींद से समझौता करके सूर्योदय देखने से बेहतर है पर्याप्त नींद लेकर सूरज को थोड़ी देर बाद नमस्कार करना।

निठल्ले के नोट्स - दीक्षांत समारोह का ज्ञान

दीक्षांत समारोह: चोगे और परेड से बहुत पुरानी है इसकी कहानी

आज किसी विश्वविद्यालय का दीक्षांत समारोह याद कीजिए—मंच पर कुलपति, मुख्य अतिथि और अकादमिक अधिकारी विशेष परिधान में बैठे हैं, विद्यार्थी गाउन और हुड पहने कतारबद्ध होकर सभागार में प्रवेश कर रहे हैं, डिग्रियां प्रदान की जा रही हैं और पूरा आयोजन एक औपचारिक जुलूस या अकादमिक परेड जैसा दिखाई देता है। पहली नजर में यह सब कुछ इतना ‘अंग्रेजी’ लगता है कि स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि क्या दीक्षांत समारोह भी अंग्रेजों की देन है? उत्तर थोड़ा दिलचस्प है। दीक्षांत की मूल अवधारणा भारत में अंग्रेजों के आने से बहुत पहले मौजूद थी, लेकिन आज दिखाई देने वाला गाउन, हुड, कैप और औपचारिक अकादमिक procession मुख्यतः मध्यकालीन यूरोपीय विश्वविद्यालयों की परंपरा से आया है। अर्थात् भारतीय विश्वविद्यालयों ने दीक्षांत का विचार पश्चिम से नहीं लिया; आधुनिक भारतीय विश्वविद्यालयों ने उसके आयोजन के बाहरी रूप में यूरोपीय, विशेषतः ब्रिटिश, विश्वविद्यालयी परंपराओं को अपनाया।

आज के अकादमिक चोगे की जड़ें वास्तव में ब्रिटिश साम्राज्य से भी पुरानी हैं। यूरोप के मध्यकालीन विश्वविद्यालयों में विद्वानों और विद्यार्थियों का संबंध चर्च तथा धार्मिक संस्थाओं से बहुत गहरा था। उस समय सामान्य जीवन में भी वस्त्र व्यक्ति की सामाजिक और पेशागत स्थिति बताते थे। विश्वविद्यालयों में भी विद्वानों की पोशाक उनके पद और शैक्षणिक स्थिति की पहचान बन गई। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय स्वयं बताता है कि उसकी academic robes की परंपरा मध्यकालीन यूरोप के उन वस्त्रों से जुड़ी है जिनसे पहनने वाले का rank और profession पहचाना जाता था; आज की पोशाक में भी मध्यकालीन परंपरा की स्पष्ट निरंतरता दिखाई देती है।

यहां एक और रोचक बात है। जिसे हम आज ‘चोगा’ समझते हैं, वह शुरू से किसी विशेष समारोह के लिए बनाया गया fancy costume नहीं था। यूरोप के मध्यकालीन विश्वविद्यालयों में gown, hood और headgear व्यावहारिक तथा सामाजिक दोनों अर्थ रखते थे। ठंडे मौसम में लंबे वस्त्र उपयोगी थे और धार्मिक विद्वानों की पोशाक से भी उनका संबंध था। धीरे-धीरे अलग-अलग डिग्रियों और विश्वविद्यालयों के लिए इनके रंग, आकार और सजावट निर्धारित होने लगी। Oxford के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार, अकादमिक पोशाक के प्रमुख रूपों में 16वीं शताब्दी तक महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए, जबकि उनकी जड़ें उससे पहले के मध्यकालीन विश्वविद्यालयी जीवन में थीं।

परेड की कहानी भी इसी यूरोपीय विश्वविद्यालयी संस्कृति से जुड़ी है। विश्वविद्यालय केवल पढ़ाई की जगह नहीं थे बल्कि अपने-आप में स्वायत्त academic corporations थे। औपचारिक academic processions में अधिकारी, शिक्षक और degree प्राप्त करने वाले विद्यार्थी निर्धारित क्रम में चलते थे। Oxford के अभिलेख बताते हैं कि मध्यकालीन विश्वविद्यालयी वर्ष के महत्वपूर्ण समारोहों में academic exercises होते थे और degrees confer की जाती थीं; degree देने की प्रक्रिया स्वयं एक औपचारिक सार्वजनिक अनुष्ठान थी। आज जब हम कुलपति, डीन, प्रोफेसर और graduands को एक निश्चित क्रम में सभागार में प्रवेश करते देखते हैं, तो वह उसी लंबे यूरोपीय institutional tradition का आधुनिक रूप है।

लेकिन अब कहानी का सबसे महत्वपूर्ण भारतीय अध्याय शुरू होता है। भारत में शिक्षा पूरी होने पर विद्यार्थी को विदाई देने और उसके आगे के जीवन के लिए तैयार करने की परंपरा वैदिक काल से मिलती है। इसे समावर्तन या समावर्तन संस्कार कहा जाता था। ‘समावर्तन’ का सामान्य अर्थ है—वापस लौटना। विद्यार्थी ब्रह्मचर्य और गुरुकुल-जीवन की शिक्षा पूरी करके गुरु के आश्रम से गृहस्थ या सामाजिक जीवन में लौटता था। इसलिए इसे आधुनिक अर्थ में degree distribution ceremony कहना पूरी तरह सही नहीं होगा, लेकिन कार्यात्मक दृष्टि से इसमें आधुनिक convocation से एक महत्वपूर्ण समानता अवश्य दिखाई देती है: औपचारिक शिक्षा के एक चरण का समापन और विद्यार्थी को सामाजिक जीवन में प्रवेश की अनुमति। उपलब्ध संस्कृत परंपराओं के विवरण में समावर्तन को विद्यार्थीजवन की समाप्ति से जोड़ा गया है।

समावर्तन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा कोई चमकदार पोशाक या मंच नहीं था, बल्कि गुरु का विदाई-संदेश था। तैत्तिरीय उपनिषद् में गुरु द्वारा विद्यार्थियों को दिया गया प्रसिद्ध उपदेश इसी संदर्भ में आता है—“सत्यं वद, धर्मं चर” अर्थात सत्य बोलो और धर्म का आचरण करो। इसके साथ गुरु विद्यार्थी को स्वाध्याय, कर्तव्य, माता-पिता और गुरु के प्रति सम्मान तथा समाज के प्रति उत्तरदायित्व की याद दिलाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो आधुनिक convocation में कुलपति का भाषण जिस भूमिका को निभाता है, प्राचीन भारतीय समावर्तन में उसका केंद्र गुरु का नैतिक और सामाजिक उपदेश था।

समावर्तन में एक प्रतीकात्मक परिवर्तन भी होता था। विद्यार्थी ब्रह्मचर्य के दौरान धारण किए जाने वाले कुछ विशिष्ट चिह्नों को छोड़कर स्नान करता और नए वस्त्र धारण करता था। इसीलिए उसे ‘स्नातक’ कहा जाता था—अर्थात जिसने स्नान करके विद्यार्थी जीवन की एक अवस्था पूर्ण की। उपलब्ध विवरणों में स्नान, पुराने विद्यार्थी-चिह्नों का त्याग, नए वस्त्र धारण करना और गुरु-दक्षिणा देना जैसे तत्व मिलते हैं। यहां ‘स्नातक’ शब्द का इतिहास विशेष रूप से रोचक है, क्योंकि आज हम Bachelor या Graduate को जिस अर्थ में ‘स्नातक’ कहते हैं, उसकी जड़ इसी प्राचीन भारतीय परंपरा में है।

इसलिए अगर किसी प्राचीन गुरुकुल में आज के विश्वविद्यालय जैसा मंच, डिग्री-स्क्रॉल, mortarboard और काला gown खोजेंगे तो निराशा होगी। प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य मूलतः प्रमाणपत्र प्राप्त करना नहीं, बल्कि विद्यार्थी का संस्कार और सामाजिक जीवन के लिए उसका निर्माण था। शिक्षा समाप्त होने पर गुरु विद्यार्थी को केवल यह नहीं बताता था कि ‘तुम पास हो गए’, बल्कि यह भी बताता था कि अब तुम्हें मनुष्य के रूप में कैसा जीवन जीना है। इस दृष्टि से आधुनिक convocation की सबसे मूल्यवान परंपरा—शिक्षा पूरी होने के बाद जिम्मेदारी का बोध—भारत में किसी औपनिवेशिक प्रशासन से आयातित नहीं थी।

यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि ‘प्राचीन भारतीय विश्वविद्यालय’ और ‘गुरुकुल’ एक ही चीज नहीं थे। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला जैसे बड़े शिक्षण केंद्रों की संरचना और कार्यप्रणाली अलग-अलग ऐतिहासिक परिस्थितियों में विकसित हुई थी। नालंदा जैसे बौद्ध महाविहार में हजारों विद्यार्थी और आचार्य रहते थे और शिक्षा अनेक विषयों में दी जाती थी। इसलिए हर प्राचीन शिक्षण संस्था में वैदिक गुरुकुल के समावर्तन संस्कार को हूबहू लागू मान लेना इतिहास को अत्यधिक सरल बना देना होगा। प्राचीन भारत में शिक्षा की अनेक परंपराएं थीं और उनके समापन संस्कार भी एक जैसे नहीं रहे होंगे। हमारे पास समावर्तन के बारे में अपेक्षाकृत स्पष्ट साहित्यिक प्रमाण हैं, लेकिन किसी आधुनिक विश्वविद्यालय जैसी एक समान ‘राष्ट्रीय convocation ceremony’ का प्रमाण नहीं मिलता।

अब प्रश्न आता है कि भारत के विश्वविद्यालयों में यूरोपीय academic dress कैसे पहुंचा। इसका उत्तर आधुनिक विश्वविद्यालय व्यवस्था में है। 19वीं शताब्दी में भारत में आधुनिक शैली के विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई—कलकत्ता, बंबई और मद्रास विश्वविद्यालय 1857 में स्थापित हुए। ये विश्वविद्यालय ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान विकसित उस आधुनिक higher-education system का हिस्सा थे जिसकी संस्थागत संरचना यूरोपीय विश्वविद्यालयों से प्रभावित थी। इसलिए degrees, Senate, Convocation, Chancellor, Vice-Chancellor जैसे संस्थागत ढांचे के साथ औपचारिक academic dress और ceremonial procession की परंपरा भी भारतीय विश्वविद्यालयी संस्कृति में प्रवेश करती गई। लेकिन इसे यह कहना कि ‘अंग्रेजों ने भारत में convocation की परंपरा शुरू की’ ऐतिहासिक रूप से अधूरा कथन होगा; अधिक सटीक बात यह है कि अंग्रेजी शासन ने आधुनिक विश्वविद्यालयी संस्थान और उनके यूरोपीय ceremonial forms भारत में स्थापित किए, जबकि शिक्षा पूर्ण होने पर गुरु से विदाई और सामाजिक जीवन में प्रवेश की भारतीय परंपरा उनसे कहीं पुरानी थी।

दिलचस्प बात यह है कि आज के ‘convocation’ में भारतीय और यूरोपीय परंपराएं एक तरह से मिल गई हैं। गाउन यूरोप का है, लेकिन ‘स्नातक’ भारत का अपना पुराना शब्द है; academic procession यूरोपीय विश्वविद्यालयी संस्कृति से आया, लेकिन गुरु से विदाई और जीवन के लिए उपदेश की अवधारणा भारतीय शिक्षा-परंपरा में बहुत पुरानी है। आज कुछ भारतीय विश्वविद्यालय पारंपरिक gowns को छोड़कर भारतीय पोशाक, अंगवस्त्रम, पगड़ी या संस्थान की स्थानीय पहचान वाले परिधानों का इस्तेमाल भी करते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि वे convocation छोड़ रहे हैं; वे केवल उसके बाहरी प्रतीकों को स्थानीय सांस्कृतिक संदर्भ में ढाल रहे हैं।

और शायद यही इस पूरी कहानी का सबसे सुंदर निष्कर्ष है। दीक्षांत समारोह का असली अर्थ चोगा पहनना नहीं है। चोगा एक प्रतीक है; परंपरा का बाहरी आवरण है। यूरोप ने इसे अपनी विश्वविद्यालयी संस्कृति के अनुसार विकसित किया, ब्रिटिश शासन के माध्यम से यह आधुनिक भारतीय विश्वविद्यालयों में आया और भारत ने इसे अपने ढंग से स्वीकार किया। लेकिन शिक्षा पूरी होने पर गुरु का यह कहना कि अब तुम्हारा ज्ञान केवल तुम्हारा निजी लाभ नहीं, बल्कि तुम्हारे आचरण और समाज के प्रति तुम्हारी जिम्मेदारी है—यह विचार भारतीय बौद्धिक परंपरा में बहुत पहले मौजूद था। तैत्तिरीय उपनिषद् का “सत्यं वद, धर्मं चर” शायद किसी भी आधुनिक convocation address से अधिक संक्षिप्त और गहरा ‘farewell message’ है।

इस दृष्टि से देखें तो विश्वविद्यालय का दीक्षांत समारोह दो सभ्यताओं की मिली-जुली स्मृति है। यूरोप ने हमें उसका ceremonial form दिया—gown, hood, cap और procession; भारत के पास पहले से उसका philosophical core था—शिक्षा की पूर्णता, गुरु की विदाई, ज्ञान के साथ जिम्मेदारी और समाज में लौटने का संस्कार। आज जब कोई विद्यार्थी चोगा पहनकर मंच की ओर बढ़ता है, तो वह केवल डिग्री लेने नहीं जा रहा होता; वह उस बहुत पुरानी मानवीय परंपरा को आगे बढ़ा रहा होता है जिसमें शिक्षा का अंत वास्तव में शिक्षा का अंत नहीं, बल्कि उसके वास्तविक उपयोग की शुरुआत माना जाता है।

मंगलवार, 22 सितंबर 2026

निठल्ले के नोट्स - अच्छे लोग बुरे लोग बनाम अच्छाई और बुराई

अच्छे लोग अधिक हैं, फिर बुराई दिखाई इतनी क्यों देती है?

कभी-कभी मन में यह सवाल उठता है कि अगर दुनिया में अच्छे लोगों की संख्या बुरे लोगों से अधिक है, तो फिर समाज में बुराइयां इतनी दिखाई क्यों देती हैं? क्यों लगता है कि ईमानदारी, संवेदनशीलता, सहयोग और करुणा जैसे गुण पीछे छूट रहे हैं, जबकि छल, हिंसा, भ्रष्टाचार, स्वार्थ और बेईमानी हर तरफ अपना प्रभाव दिखा रहे हैं? क्या सचमुच बुरे लोग अधिक हैं, या हमारी नजर और समाज की व्यवस्था कुछ ऐसी है कि थोड़े-से बुरे काम भी बहुत बड़े दिखाई देने लगते हैं? शायद इस प्रश्न का उत्तर मनुष्य की प्रकृति से कम और उसके व्यवहार, सामाजिक व्यवस्था तथा हमारी देखने की आदत से अधिक जुड़ा हुआ है।

सबसे पहली बात यह समझने की है कि अच्छाई और बुराई समान शक्ति से दिखाई नहीं देतीं। एक व्यक्ति दस लोगों की मदद करता है, किसी भूखे को खाना खिलाता है, किसी अनजान की फीस भर देता है, रास्ते में घायल व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाता है या वर्षों तक ईमानदारी से अपना काम करता है—इनमें से अधिकांश घटनाएं खबर नहीं बनतीं। इसके विपरीत एक व्यक्ति दस लोगों को ठग ले, किसी की हत्या कर दे, कोई बड़ा घोटाला कर दे या सार्वजनिक स्थान पर हिंसा कर दे, तो वह घटना सैकड़ों-हजारों लोगों तक पहुंच जाती है। अर्थात अच्छाई अक्सर जीवन की सामान्य धारा में घुली रहती है, जबकि बुराई धारा को तोड़ती है और इसलिए अधिक दिखाई देती है।

हमारी मानसिक संरचना भी नकारात्मक घटनाओं को अधिक महत्व देती है। मनुष्य का मस्तिष्क खतरे को पहचानने के लिए विकसित हुआ है। जंगल में हजार शांत पेड़ों के बीच एक हिंसक जानवर को पहचानना जीवन-मरण का प्रश्न हो सकता था। आज जंगल की जगह शहर और सोशल मीडिया ने ले ली है, लेकिन खतरे पर ध्यान देने की वह प्रवृत्ति पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। इसलिए दुर्घटना, अपराध, विवाद, युद्ध, धोखा और हिंसा हमारी स्मृति पर सकारात्मक घटनाओं की अपेक्षा अधिक गहरा प्रभाव छोड़ते हैं। यही कारण है कि दिन भर में मिले दस अच्छे अनुभवों के बावजूद रात को हम अक्सर उस एक बुरी घटना के बारे में सोचते रहते हैं जिसने हमारा मन खराब कर दिया।

मीडिया और सोशल मीडिया इस अंतर को और बढ़ा देते हैं। शांति खबर नहीं होती, संघर्ष खबर बन जाता है। किसी शहर में लाखों लोग सुबह घर से निकलते हैं, अपना काम करते हैं, एक-दूसरे की मदद करते हैं और शाम को सुरक्षित घर लौटते हैं—यह सामान्य जीवन है, इसलिए समाचार नहीं बनता। लेकिन उसी शहर में कोई बड़ी आपराधिक घटना हो जाए तो वह सुर्खी बन जाती है। सोशल मीडिया पर भी यही तंत्र काम करता है। एक प्रेमपूर्ण, संवेदनशील और संतुलित संदेश शायद कुछ लोगों तक पहुंचे, लेकिन क्रोध, विवाद, अपमान और सनसनी पैदा करने वाली सामग्री बहुत तेजी से फैल सकती है। इस तरह हमें समाज का पूरा चेहरा नहीं, बल्कि उसका सबसे उत्तेजक हिस्सा बार-बार दिखाई देता है।

लेकिन केवल हमारी दृष्टि को दोष देना भी ठीक नहीं होगा। अच्छे लोगों की संख्या अधिक होने के बावजूद उनका प्रभाव हमेशा अधिक हो, यह जरूरी नहीं। अच्छाई कई बार व्यक्तिगत होती है, जबकि बुराई संगठित हो सकती है। एक ईमानदार व्यक्ति अकेला रिश्वत लेने से इनकार कर सकता है, लेकिन भ्रष्ट व्यवस्था में कई लोग मिलकर नियमों को अपने पक्ष में मोड़ सकते हैं। एक व्यक्ति हिंसा से बचना चाहता है, लेकिन संगठित हिंसा हजारों शांत लोगों का जीवन प्रभावित कर सकती है। एक परिवार अपने बच्चों को ईमानदारी सिखाता है, लेकिन यदि संस्थाओं में गलत आचरण को पुरस्कार मिलता दिखाई दे, तो व्यक्तिगत अच्छाई की शक्ति सीमित हो सकती है। इसलिए किसी समाज को केवल अच्छे व्यक्तियों की संख्या से नहीं, बल्कि उसकी संस्थाओं, कानूनों, सामाजिक मानदंडों और जवाबदेही की व्यवस्था से भी समझना चाहिए।

यहां एक और महत्वपूर्ण बात सामने आती है—अच्छाई निष्क्रिय हो तो बुराई के लिए जगह बनती है। बहुत-से अच्छे लोग स्वयं गलत काम नहीं करते, लेकिन गलत काम के सामने चुप रह जाते हैं। वे सोचते हैं कि इससे उनका क्या लेना-देना, किसी और का मामला है, कौन परेशानी मोल ले। परिणाम यह होता है कि बुराई करने वाला व्यक्ति सक्रिय रहता है और अच्छाई चाहने वाला व्यक्ति निष्क्रिय। तब संख्या में कम होने के बावजूद बुराई का प्रभाव बड़ा दिखाई देने लगता है। लोकतांत्रिक समाज में नागरिक जिम्मेदारी का महत्व यहीं सामने आता है—गलत काम न करना अच्छाई की पहली सीढ़ी है, लेकिन गलत के विरुद्ध उचित और वैधानिक तरीके से आवाज उठाना उसकी अगली सीढ़ी है।

फिर भी यह मान लेना कि अच्छाई कमजोर है, मनुष्य के इतिहास को गलत पढ़ना होगा। सभ्यता का निर्माण मुख्यतः सहयोग से हुआ है। परिवार, मित्रता, पड़ोस, शिक्षा, चिकित्सा, विज्ञान, व्यापार, कला और लोकतांत्रिक संस्थाएं—इन सबके पीछे किसी न किसी रूप में विश्वास और सहयोग की आवश्यकता होती है। यदि मनुष्य मूलतः केवल स्वार्थी और हिंसक होता, तो इतने बड़े पैमाने पर अनजान लोगों के बीच सहयोग संभव ही नहीं होता। हम रोज ऐसे हजारों लोगों पर भरोसा करते हैं जिन्हें हम जानते तक नहीं—बस चालक से लेकर डॉक्टर तक, दुकानदार से लेकर बैंक कर्मचारी तक। समाज का सामान्य जीवन इसी अदृश्य भरोसे पर चलता है।

असल समस्या शायद यह नहीं है कि बुराई अच्छाई से अधिक है, बल्कि यह है कि बुराई की दृश्यता, प्रभाव और नुकसान की क्षमता कई बार अच्छाई से अधिक होती है। एक पुल बनाने में वर्षों लग सकते हैं और उसे गिराने में कुछ मिनट। किसी बच्चे का चरित्र बनाने में वर्षों लगते हैं, लेकिन एक गलत संगति उसे कुछ समय में प्रभावित कर सकती है। विश्वास बनाने में लंबा समय लगता है, टूटने में एक क्षण। इसी असमानता के कारण बुराई अपने वास्तविक अनुपात से बड़ी प्रतीत हो सकती है।

इसलिए अच्छे लोगों की संख्या गिनने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह देखना है कि वे अपनी अच्छाई के साथ क्या करते हैं। क्या वे केवल अच्छे बने रहते हैं या अपने आसपास की व्यवस्था को भी थोड़ा बेहतर बनाते हैं? क्या वे अन्याय देखकर चुप रहते हैं या उचित तरीके से उसका विरोध करते हैं? क्या वे अपने बच्चों को केवल सफल होना सिखाते हैं या सही होना भी? क्या वे ईमानदारी को केवल निजी गुण मानते हैं या सामाजिक जिम्मेदारी भी समझते हैं? क्योंकि समाज को बदलने के लिए केवल बुरे लोगों का कम होना पर्याप्त नहीं है; अच्छे लोगों का सक्रिय, सजग और जिम्मेदार होना भी जरूरी है।

शायद इसलिए दुनिया में अच्छाई का सबसे बड़ा प्रमाण कोई बड़ी घटना नहीं, बल्कि रोजमर्रा की सामान्य जिंदगी है। कोई मां अपने बच्चे के लिए जागती है, कोई पिता अपनी जरूरतें रोककर बच्चे की पढ़ाई कराता है, कोई शिक्षक बिना चर्चा के किसी विद्यार्थी की मदद करता है, कोई कर्मचारी अपना काम ईमानदारी से करता है, कोई राहगीर दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाता है, कोई दुकानदार गलती से मिले अतिरिक्त पैसे वापस कर देता है। ये घटनाएं इतिहास की सुर्खियां नहीं बनतीं, लेकिन इन्हीं छोटी-छोटी अच्छाइयों के सहारे समाज हर दिन चलता रहता है।

अंततः शायद सवाल यह नहीं होना चाहिए कि अच्छे लोग ज्यादा हैं या बुरे, बल्कि यह कि हमारे भीतर की अच्छाई कितनी जागरूक, सक्रिय और प्रभावशाली है। बुराई का शोर बड़ा हो सकता है, उसकी तस्वीरें ज्यादा तेजी से फैल सकती हैं और उसका असर कभी-कभी बहुत गहरा हो सकता है, लेकिन मनुष्य की सभ्यता का मूल आधार अब भी सहयोग, विश्वास, करुणा और परस्पर निर्भरता है। अच्छाई शायद इसलिए कम दिखाई देती है क्योंकि वह जीवन को तोड़ती नहीं, चलाती है। जिस दिन सुबह से शाम तक बिना किसी बड़ी घटना के हमारा जीवन सामान्य रूप से चलता है, उसी दिन हजारों-अनगिनत अच्छे काम चुपचाप अपना काम कर चुके होते हैं। बुराई अक्सर दरवाजा तोड़कर भीतर आती है; अच्छाई घर बनाकर रहती है—और घर की मौजूदगी इसलिए कम दिखाई देती है क्योंकि हम उसमें रोज रहते हैं।

निठल्ले के नोट्स - अच्छे दिन कब आएंगे

अच्छे दिन कब आएंगे?

मनुष्य की सबसे पुरानी आदतों में एक है—आज में रहते हुए कल की प्रतीक्षा करना। आज कुछ ठीक नहीं है तो मन कहता है, कल ठीक हो जाएगा; आज जेब हल्की है तो उम्मीद रहती है कि अगले महीने कुछ अधिक पैसे होंगे; आज नौकरी में मन नहीं लग रहा तो लगता है कि कभी कोई बेहतर अवसर आएगा; आज मन की कोई इच्छा अधूरी है तो भरोसा रहता है कि एक दिन वह पूरी जरूर होगी। इसी उम्मीद का एक लोकप्रिय नाम है—“अच्छे दिन”। लेकिन सवाल यह है कि आखिर अच्छे दिन आते कब हैं? क्या उनकी कोई तारीख होती है, कोई मुहूर्त होता है, कोई कैलेंडर होता है जिसमें लाल घेरे से लिखा हो कि फलां दिन से जिंदगी बदल जाएगी?

शायद नहीं। अच्छे दिन कोई डाकिया नहीं हैं जो दरवाजे पर दस्तक देकर कहें कि लीजिए, आपकी खुशियां आ गईं। वे अक्सर हमारी जिंदगी में चुपचाप आते हैं और हमें पता भी नहीं चलता। जिस दिन हम किसी चीज के लिए परेशान होते हैं, वही चीज कुछ समय बाद मिल जाए तो हमें लगता है कि अब अच्छे दिन आ गए। लेकिन थोड़े दिनों बाद वही उपलब्धि सामान्य लगने लगती है और मन किसी दूसरी चीज की कमी गिनने लगता है। नौकरी मिली तो पदोन्नति चाहिए, पदोन्नति मिली तो अधिक वेतन चाहिए, वेतन बढ़ा तो अपना घर चाहिए, घर मिला तो बेहतर घर चाहिए। मनुष्य की इच्छाओं का पेट शायद दुनिया की किसी भी अर्थव्यवस्था से बड़ा है—जितना भरिए, उतनी ही नई मांग पैदा हो जाती है।

फिर क्या इच्छाएं रखना ही छोड़ दें? बिल्कुल नहीं। इच्छा मनुष्य को आगे बढ़ाती है। जिस आदमी के भीतर कल को आज से थोड़ा बेहतर बनाने की इच्छा नहीं है, उसके जीवन में ठहराव बहुत जल्दी आ सकता है। समस्या इच्छा में नहीं, इच्छा को जीवन की एकमात्र शर्त बना देने में है। यदि हम यह तय कर लें कि “जब तक यह नहीं मिलेगा, मैं खुश नहीं हो सकता”, तो हम अपनी वर्तमान जिंदगी की सारी खुशियां भविष्य के किसी अनिश्चित खाते में जमा कर देते हैं। फिर जिंदगी चलती रहती है और हम जीने के बजाय इंतजार करते रहते हैं।

अजीब बात यह है कि हमें भविष्य की चिंता वर्तमान से अधिक रहती है। जिस अच्छे दिन के आने की प्रतीक्षा हम दस साल से कर रहे होते हैं, उसके रास्ते में आज का एक पूरा दिन बिना किसी शिकायत के निकल जाता है। सुबह की चाय, बच्चे की हंसी, किसी पुराने दोस्त का फोन, घर लौटते समय ठंडी हवा, मनपसंद गीत, किसी काम के ठीक से हो जाने की छोटी-सी संतुष्टि—ये सब इतने मामूली लगते हैं कि हम इन्हें खुशी की श्रेणी में रखते ही नहीं। हमें खुशी के लिए कोई बड़ी घटना चाहिए। जैसे जिंदगी तब तक जिंदगी नहीं है, जब तक उसमें कोई बड़ी उपलब्धि न जुड़ जाए।

लेकिन जिंदगी बड़ी घटनाओं से कम और छोटी-छोटी निरंतरताओं से ज्यादा बनती है। अच्छे दिन शायद वही हैं जिनमें समस्याएं खत्म नहीं हुईं, लेकिन उनसे निपटने की हमारी ताकत बढ़ गई। परिस्थितियां पूरी तरह हमारे अनुकूल नहीं हुईं, लेकिन हमने उनसे समझौता करना सीख लिया। कुछ इच्छाएं पूरी हुईं, कुछ अधूरी रह गईं और कुछ इच्छाओं के बारे में हमें बाद में समझ आया कि उनका पूरा न होना ही शायद अच्छा था। समय के साथ मनुष्य को यह भी पता चलता है कि हर इच्छा पूरी हो जाना सुख की गारंटी नहीं है। कई बार जिस चीज के लिए हम वर्षों बेचैन रहते हैं, उसके मिल जाने के बाद पता चलता है कि असली जरूरत कुछ और थी।

इसलिए “जैसा चल रहा है, वैसा चलने दो” भी पूरी तरह सही दर्शन नहीं है और “सब कुछ अभी बदल देना है” भी हमेशा समझदारी नहीं। जीवन को नदी की तरह होना चाहिए—बहते रहना, लेकिन दिशा का बोध बनाए रखना। जहां रास्ता बदलना जरूरी हो, वहां मोड़ लेना चाहिए; जहां थोड़ा धैर्य चाहिए, वहां ठहरना चाहिए; जहां मेहनत की जरूरत हो, वहां मेहनत करनी चाहिए और जहां कुछ हमारे हाथ में नहीं है, वहां चिंता का बोझ थोड़ा नीचे रख देना चाहिए। हर चीज को नियंत्रित करने की कोशिश भी मनुष्य को थका देती है।

मन में इच्छाएं हैं तो उन्हें लिखिए, उनके लिए योजना बनाइए, समय दीजिए और जितना संभव हो उतना प्रयास कीजिए। लेकिन अपनी खुशी को केवल उस अंतिम परिणाम से मत बांधिए। मंजिल जरूरी है, मगर रास्ते को सजा-संवारकर चलना भी जरूरी है। क्योंकि हो सकता है मंजिल आने में देर हो और रास्ता ही आपकी जिंदगी का सबसे बड़ा हिस्सा बन जाए।

और शायद अच्छे दिनों का सबसे ईमानदार उत्तर यही है कि अच्छे दिन आने वाले दिनों में ही नहीं होते। वे कभी-कभी आज में भी छिपे होते हैं, बस हम उनसे भविष्य की तारीख पूछते रहते हैं। जिस दिन मनुष्य यह समझ लेता है कि “मुझे आगे भी बढ़ना है और आज को भी जीना है”, उस दिन प्रतीक्षा थोड़ी हल्की हो जाती है। इच्छाएं रहती हैं, सपने भी रहते हैं, संघर्ष भी रहता है, लेकिन बेचैनी अकेली साथी नहीं रहती।

आखिर जिंदगी कोई रेलवे स्टेशन नहीं कि हम प्लेटफॉर्म पर खड़े होकर घोषणा सुनते रहें—“अच्छे दिनों वाली गाड़ी कुछ ही देर में आने वाली है।” हो सकता है जिस गाड़ी का हम इंतजार कर रहे हैं, उसमें हमारी सीट पहले से न हो। और यह भी संभव है कि जिस ट्रेन में हम अभी बैठे हैं, उसमें खिड़की के बाहर का दृश्य हमारी कल्पना से कहीं सुंदर हो। इसलिए सफर जारी रखना चाहिए, टिकट संभालकर रखना चाहिए, जरूरत पड़े तो गाड़ी बदलनी चाहिए और बीच-बीच में खिड़की से बाहर भी देख लेना चाहिए।

अच्छे दिन कब आएंगे? शायद जब सब कुछ मनमाफिक हो जाएगा—लेकिन शायद उससे पहले भी। और मन की सारी इच्छाएं कब पूरी होंगी? शायद कभी नहीं। क्योंकि एक इच्छा पूरी होते ही मन दूसरी इच्छा पैदा कर देगा। इसलिए जीवन का रहस्य इच्छाओं को खत्म करने में नहीं, इच्छाओं के साथ शांतिपूर्वक जीना सीखने में है। कल बेहतर हो, इसके लिए आज प्रयास करते रहिए; लेकिन कल के इंतजार में आज को खराब मत कीजिए। आखिर जो दिन हमारे हाथ में है, वह आज है—और संभव है कि कुछ साल बाद हम इसी आज को याद करके कहें, “वह भी क्या अच्छे दिन थे!”

सोमवार, 21 सितंबर 2026

निठल्ले के नोट्स - कैसे होता है जहाज पर अपशिष्ट का निपटारा

समुद्री जहाजों और युद्धपोतों पर हफ्तों और महीनों तक रहने वाले लोगों के लिए अपशिष्ट (Sewage) और अन्य जलीय पदार्थों का निपटारा पर्यावरण सुरक्षा के सख्त अंतरराष्ट्रीय नियमों, विशेष रूप से MARPOL (Maritime Pollution) संधि के तहत किया जाता है। जहाज पर बनने वाले गंदे पानी को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जाता है: ब्लैक वॉटर (Blackwater), जो शौचालय का अपशिष्ट होता है, और ग्रे वॉटर (Graywater), जो सिंक, शॉवर, रसोई और कपड़े धोने से निकलता है। इन दोनों प्रकार के जल के निपटारे के लिए जहाज पर अत्याधुनिक मरीन सैनिटेशन डिवाइसेस (MSD) और जहाजी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) लगे होते हैं। शौचालय का ब्लैक वॉटर पाइपलाइनों के माध्यम से सीधे ट्रीटमेंट प्लांट में पहुंचता है, जहां पहले इसे यांत्रिक रूप से छाना और पीसा जाता है। इसके बाद बायोलॉजिकल डाइजेस्टर में मौजूद सूक्ष्म जीव (Aerobic Bacteria) इस जैविक कचरे को पचाकर हानिकारक पदार्थों को खत्म कर देते हैं। अंत में, इस पानी को क्लोरीन या पराबैंगनी (UV) किरणों से जीवाणुरहित (Disinfect) किया जाता है।

अंतरराष्ट्रीय समुद्री नियमों के अनुसार, साफ और उपचारित (Treated) पानी को ही समुद्र में छोड़ने की अनुमति होती है। हालांकि, इसे तट या किनारे से एक तय दूरी (आमतौर पर तट से 3 से 12 समुद्री मील दूर) पर ही डिस्चार्ज किया जा सकता है। यदि जहाज बंदरगाह पर खड़ा हो या संवेदनशील समुद्री क्षेत्र (जैसे प्रवाल भित्तियों वाले इलाके) से गुजर रहा हो, तो वहां समुद्र में किसी भी प्रकार का जल या अपशिष्ट फेंकना पूरी तरह प्रतिबंधित होता है। ऐसे समय में उपचारित और अनुपचारित पानी को जहाज के अंदर बनी विशेष होल्डिंग टैंकों (Holding Tanks) में जमा करके रखा जाता है। जब जहाज बंदरगाह पर रुकता है, तो इन टैंकों के अपशिष्ट को सक्शन पाइपों के जरिए बंदरगाह की ऑन-शोर सीवेज सुविधाओं में स्थानांतरित (Pump out) कर दिया जाता है।

रसोई के कचरे, जहाजी इंजन रूम से निकलने वाले तेल युक्त पानी और सामान्य तरल पदार्थों के लिए अलग प्रक्रिया अपनाई जाती है। रसोई के जैविक कचरे को 'पल्पर' या 'ग्राइंडर' में पीसकर बेहद बारीक बना दिया जाता है, जिसे किनारे से काफी दूर समुद्र में छोड़ा जा सकता है। वहीं, इंजन रूम में जमा होने वाले जहरीले तेल-युक्त पानी (Bilge Water) को सीधे समुद्र में बहाना सख्त अपराध है। इसके लिए जहाज पर ऑयली वॉटर सेपरेटर (OWS) नाम का उपकरण होता है, जो पानी और तेल को अलग करता है। जब पानी में तेल की मात्रा 15 PPM (पार्ट्स पर मिलियन) से कम रह जाती है, तभी मॉनिटरिंग सिस्टम उस पानी को समुद्र में जाने की इजाजत देता है; बचा हुआ गाढ़ा तेल (Sludge) अलग टैंकों में जमा कर लिया जाता है जिसे बंदरगाह पर रिसाइकलिंग के लिए सौंप दिया जाता है। इस प्रकार, उन्नत तकनीक और कड़े कानूनों के संतुलन से जहाजों पर स्वच्छता और पर्यावरण की सुरक्षा बनी रहती है।