यह सवाल दरअसल “डिग्री बनाम स्किल” का नहीं, बल्कि “डिग्री + स्किल + अनुभव + बदलती अर्थव्यवस्था” का है। “डिग्री नहीं, स्किल जरूरी है” सुनने में बहुत आकर्षक वाक्य है, लेकिन इसे शाब्दिक रूप से लेना भी उतना ही गलत होगा जितना यह मान लेना कि केवल डिग्री हासिल कर लेने से अच्छी नौकरी और अच्छी आय अपने-आप मिल जाएगी। वास्तविक दुनिया में दोनों की भूमिका अलग-अलग है—डिग्री कई दरवाजों की चाबी है और स्किल उन दरवाजों के भीतर काम करने की क्षमता। सवाल यह है कि किस व्यक्ति को कितनी चाबी चाहिए और कौन-सा दरवाजा खोलना है।
डिग्री आखिर है क्या?
डिग्री को केवल कागज का प्रमाणपत्र समझना भी भूल होगी। एक अच्छी डिग्री किसी व्यक्ति के विषयगत ज्ञान, लंबे समय तक सीखने की क्षमता और एक निश्चित शैक्षणिक अनुशासन का प्रमाण होती है। डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, शिक्षक, शोधकर्ता, वैज्ञानिक, चार्टर्ड अकाउंटेंट या अनेक सरकारी और पेशेवर पदों के लिए निर्धारित शैक्षणिक योग्यता केवल विकल्प नहीं, बल्कि प्रवेश की अनिवार्य शर्त हो सकती है। इसलिए “डिग्री बेकार है” कहना वास्तविकता से दूर है। समस्या डिग्री में नहीं, डिग्री को रोजगार की गारंटी समझने में है।
दूसरी ओर, आज के रोजगार बाजार में केवल यह बताना पर्याप्त नहीं है कि आपने क्या पढ़ा है; नियोक्ता यह भी देखना चाहता है कि आप कर क्या सकते हैं। दो लोगों के पास एक जैसी डिग्री हो सकती है, लेकिन एक व्यक्ति डेटा का विश्लेषण कर सकता है, अच्छी प्रस्तुति बना सकता है, ग्राहक से बातचीत कर सकता है, AI उपकरणों का इस्तेमाल कर सकता है या किसी समस्या का व्यावहारिक समाधान निकाल सकता है, जबकि दूसरा केवल परीक्षा पास करने की क्षमता तक सीमित हो सकता है। यहीं स्किल का महत्व सामने आता है।
कितनी डिग्री और कितना स्किल?
इसका कोई सार्वभौमिक प्रतिशत नहीं हो सकता। यह पेशे पर निर्भर करता है। डॉक्टर बनने के लिए डिग्री और लाइसेंसिंग की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण है; वहीं डिजिटल मार्केटिंग, डिजाइन, वीडियो एडिटिंग, कंटेंट क्रिएशन, कुछ तकनीकी काम, बिक्री या उद्यमिता जैसे क्षेत्रों में पोर्टफोलियो और वास्तविक कौशल कई बार औपचारिक डिग्री से अधिक निर्णायक हो सकते हैं। लेकिन एक सामान्य नियम बनाया जाए तो कहा जा सकता है कि डिग्री आपको किसी क्षेत्र में प्रवेश दिलाने में मदद करती है और स्किल आपको उस क्षेत्र में टिकने, आगे बढ़ने और अधिक मूल्य पैदा करने में मदद करती है।
उच्च-मध्यवर्गीय जीवन के लिए केवल डिग्री की संख्या बढ़ाते जाना भी कोई समझदारी नहीं है। BA के बाद MA, फिर कोई डिप्लोमा, फिर दूसरी डिग्री—लेकिन यदि व्यक्ति किसी काम को बाजार की जरूरत के मुताबिक अच्छी तरह नहीं कर सकता, तो शैक्षणिक प्रमाणपत्रों का ढेर उसकी आय को उसी अनुपात में नहीं बढ़ाएगा। इसके विपरीत, केवल किसी छोटे-से कौशल को सीख लेना भी पर्याप्त नहीं है। आज कोई व्यक्ति छह महीने में वीडियो एडिटिंग सीख सकता है, लेकिन यदि उसे भाषा, संचार, ग्राहक की जरूरत, कॉपीराइट, व्यावसायिक व्यवहार और बाजार की समझ नहीं है, तो केवल सॉफ्टवेयर चलाना उसे उच्च आय तक नहीं पहुंचाएगा।
यही कारण है कि अच्छी कमाई के लिए सबसे उपयोगी संयोजन अक्सर domain knowledge + practical skill + communication + digital literacy + experience होता है। उदाहरण के लिए पत्रकारिता में पत्रकारिता की समझ, भाषा, समाचार-बोध और मीडिया-एथिक्स आधार हैं; लेकिन आज उसी व्यक्ति के लिए वीडियो, डिजिटल प्लेटफॉर्म, डेटा, सोशल मीडिया, AI-assisted research और मल्टीमीडिया storytelling जैसी क्षमताएं उसके काम का मूल्य बढ़ा सकती हैं।
लेकिन कितने लोग वास्तव में स्किल सीखना चाहते हैं?
यहां “स्किल इंडिया”, “अपस्किलिंग” और “री-स्किलिंग” जैसे नारों और वास्तविक जीवन के बीच अंतर दिखाई देता है। हर व्यक्ति को यह कहना आसान है कि “डिग्री छोड़िए, स्किल सीखिए”, लेकिन स्किल सीखने का अर्थ अक्सर कई महीनों या वर्षों तक अभ्यास करना, असफल होना, अपना काम दिखाना, लगातार अपडेट रहना और शुरुआत में कम कमाई स्वीकार करना होता है। यह मेहनत हर व्यक्ति करने के लिए तैयार हो, ऐसा मान लेना वास्तविकता को सरल बना देना है।
और यहां एक महत्वपूर्ण सामाजिक प्रश्न भी है। परिवार और समाज अभी भी डिग्री को सामाजिक प्रतिष्ठा और सुरक्षित भविष्य से जोड़ते हैं। माता-पिता अक्सर चाहते हैं कि बच्चा पहले “ग्रेजुएट” हो जाए; विद्यार्थी प्रतियोगी परीक्षाओं और डिग्रियों की दौड़ में इसलिए भी जाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि प्रमाणपत्र रोजगार के जोखिम को कम करेगा। दूसरी तरफ, स्किल-आधारित रोजगार में शुरुआती आय अनिश्चित हो सकती है। इसलिए किसी मध्यमवर्गीय परिवार के लिए “डिग्री छोड़कर स्किल सीखो” कहना उतना आसान नहीं जितना किसी भाषण में सुनाई देता है।
असली समस्या स्किल की कमी से ज्यादा “सही स्किल” की है
आज हर तरफ स्किल सीखने की सलाह दी जा रही है, लेकिन सवाल होना चाहिए—किस बाजार के लिए कौन-सी स्किल? हर लोकप्रिय कौशल उच्च आय वाला कौशल नहीं होता। किसी समय एक सॉफ्टवेयर बहुत मांग में होता है, फिर तकनीक बदल जाती है। AI ने इसी बदलाव की गति को और तेज कर दिया है। इसलिए केवल किसी एक टूल को सीखना पर्याप्त नहीं है; व्यक्ति को सीखने की क्षमता भी विकसित करनी होगी।
कल तक जिस काम के लिए एक पूरा कर्मचारी चाहिए था, आज उसका कुछ हिस्सा AI या ऑटोमेशन कर सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य की जरूरत समाप्त हो जाएगी; बल्कि काम की प्रकृति बदलेगी। भविष्य में ऐसे व्यक्ति का महत्व बढ़ सकता है जो तकनीक का इस्तेमाल करके बेहतर निर्णय, बेहतर उत्पाद या बेहतर सेवा दे सके। यानी भविष्य की सबसे महत्वपूर्ण स्किल शायद किसी एक सॉफ्टवेयर का ज्ञान नहीं, बल्कि बदलती तकनीक के साथ स्वयं को बदलने की क्षमता होगी।
उच्च-मध्यवर्गीय जीवन केवल नौकरी से नहीं बनता
यहां एक और भ्रम दूर करना जरूरी है। अच्छी कमाई और उच्च-मध्यवर्गीय जीवन का संबंध केवल डिग्री या स्किल से नहीं है। आय के साथ-साथ करियर की स्थिरता, बचत, निवेश, ऋण का स्तर, परिवार का आकार, शहर की लागत, स्वास्थ्य और आवास का खर्च तथा आर्थिक अनुशासन भी जीवन स्तर तय करते हैं। दो समान आय वाले लोगों का जीवन स्तर अलग हो सकता है क्योंकि उनकी आर्थिक जिम्मेदारियां अलग हैं।
इसीलिए किसी युवा को केवल यह सिखाना कि “एक स्किल सीखो और खूब पैसा कमाओ” अधूरा संदेश है। उसे यह भी समझना होगा कि आय कैसे बढ़ती है, नौकरी और व्यवसाय में जोखिम क्या है, पैसा कैसे बचता है, संपत्ति कैसे बनती है और जीवनशैली की महंगाई आय की वृद्धि को कैसे खा सकती है। कमाई की स्किल और पैसे को संभालने की स्किल—दोनों जरूरी हैं।
डिग्री और स्किल का द्वंद्व वास्तव में नकली द्वंद्व है
सबसे महत्वपूर्ण बात यही है। हमें यह तय करने की जरूरत नहीं कि डिग्री रखी जाए या स्किल। बेहतर सवाल यह है कि डिग्री को स्किल से कैसे जोड़ा जाए। विश्वविद्यालय केवल परीक्षा लेने वाली संस्थाएं न रहें और कौशल प्रशिक्षण केवल कुछ मशीनें या सॉफ्टवेयर चलाना सिखाने तक सीमित न रहे। कॉलेज में विषय का ज्ञान भी मिले और वास्तविक समस्याओं पर काम करने का अवसर भी। विद्यार्थी किसी कंपनी के लिए प्रोजेक्ट करे, वास्तविक ग्राहक की समस्या हल करे, डेटा का विश्लेषण करे, रिपोर्ट लिखे, प्रस्तुति दे, टीम में काम करे और अपने काम का पोर्टफोलियो तैयार करे।
एक आदर्श स्नातक वह नहीं होगा जिसके पास केवल अच्छी मार्कशीट है और न ही वह जिसके पास केवल दस ऑनलाइन सर्टिफिकेट हैं। आदर्श उम्मीदवार वह होगा जो कह सके—“मैंने यह पढ़ा है, मैंने इसे समझा है और यह रहा वह काम जो मैं वास्तव में कर सकता हूं।”
अंततः रोजगार बाजार किसे पुरस्कृत करेगा?
संभवतः उस व्यक्ति को जिसके पास ज्ञान भी है और ज्ञान को उपयोग में बदलने की क्षमता भी। डिग्री ज्ञान का आधार और सामाजिक/व्यावसायिक प्रवेश-पत्र हो सकती है; स्किल उस ज्ञान की उपयोगिता सिद्ध करती है; अनुभव व्यक्ति की विश्वसनीयता बढ़ाता है; संचार क्षमता उसके मूल्य को दूसरों तक पहुंचाती है और निरंतर सीखने की क्षमता उसे बदलती अर्थव्यवस्था में प्रासंगिक बनाए रखती है।
इसलिए “डिग्री नहीं, स्किल” को नारा बनाने के बजाय इसे थोड़ा बदलना चाहिए—“डिग्री के साथ स्किल, स्किल के साथ अनुभव और अनुभव के साथ लगातार सीखने की आदत।” जिस दिन हमारी शिक्षा व्यवस्था विद्यार्थी को केवल यह नहीं पूछेगी कि उसने परीक्षा में कितने अंक पाए, बल्कि यह भी पूछेगी कि वह वास्तविक दुनिया की कौन-सी समस्या हल कर सकता है, उस दिन डिग्री और स्किल का झगड़ा काफी हद तक समाप्त हो जाएगा। क्योंकि आखिरकार नौकरी देने वाला यह नहीं खरीदता कि आपने कितने साल कॉलेज में बिताए; वह उस मूल्य के लिए भुगतान करता है जो आप उसके काम, संस्था या ग्राहक के लिए पैदा कर सकते हैं। और उस मूल्य की नींव कहीं न कहीं ज्ञान, कौशल, अनुभव और चरित्र—चारों के मेल से बनती है।