### विरोध का अधिकार और अराजकता की कीमत: क्या अपनी बात मनवाने के लिए दूसरों को परेशान करना जरूरी है?
लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यह है कि उसमें सरकार से असहमति जताने की गुंजाइश होती है। सरकार कोई दैवी सत्ता नहीं है, जिसके हर फैसले को सिर झुकाकर स्वीकार कर लिया जाए। वह जनता के मत से बनती है, जनता के कर से चलती है और संवैधानिक व्यवस्था के प्रति जवाबदेह होती है। इसलिए सरकार की नीतियों, निर्णयों और कार्यशैली पर सवाल उठाना, उसकी आलोचना करना और उसके खिलाफ आवाज उठाना लोकतांत्रिक जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है। लेकिन असली सवाल यह है कि विरोध का तरीका क्या हो? क्या अपनी बात मनवाने के लिए सड़कों को जाम करना, सार्वजनिक जीवन को अस्त-व्यस्त कर देना, आम लोगों की आवाजाही रोक देना, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना और कई बार हिंसा या अराजकता का वातावरण पैदा करना जरूरी है? क्या विरोध करने वाले नागरिकों के अधिकार इतने व्यापक हैं कि उनके सामने बाकी नागरिकों के अधिकारों का कोई अर्थ ही न रह जाए? लोकतंत्र में असहमति का अधिकार जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण यह समझना भी है कि उस अधिकार का इस्तेमाल दूसरों के अधिकारों को कुचलने के लिए नहीं किया जा सकता।
सामान्यतः किसी सरकार से असहमति की स्थिति में कई संवैधानिक और लोकतांत्रिक रास्ते उपलब्ध होते हैं। संसद और विधानसभाओं में विपक्ष सरकार से सवाल पूछ सकता है, उसकी नीतियों पर बहस कर सकता है और उसे जवाब देने के लिए बाध्य कर सकता है। न्यायपालिका के सामने कानूनों और सरकारी निर्णयों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी जा सकती है। प्रशासनिक अधिकारियों से शिकायत की जा सकती है, संबंधित आयोगों और नियामक संस्थाओं के पास जाया जा सकता है तथा जनप्रतिनिधियों के माध्यम से समस्याएं उठाई जा सकती हैं। चुनाव में जनता सरकार के कामकाज का मूल्यांकन कर सकती है। मीडिया, लेखन, जनसभाओं और शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के जरिए भी जनमत तैयार किया जा सकता है। यानी लोकतंत्र में विरोध के लिए केवल सड़क ही एकमात्र मंच नहीं है। फिर भी यह मान लेना कि संसद, अदालत और प्रशासन मौजूद हैं, इसलिए सड़क पर उतरने की जरूरत नहीं रह जाती, एक अधूरा निष्कर्ष होगा। लोकतांत्रिक संस्थाएं होने भर से यह सुनिश्चित नहीं हो जाता कि हर समस्या का समाधान समय पर हो जाएगा, हर शिकायत सुनी जाएगी और हर निर्णय न्यायसंगत होगा।
दरअसल, संसद में सरकार को घेरने का अवसर मुख्यतः निर्वाचित प्रतिनिधियों को मिलता है। आम नागरिक सीधे संसद में जाकर अपनी समस्या नहीं रख सकता। न्यायालय भी हर छोटी-बड़ी शिकायत का तत्काल समाधान करने वाला मंच नहीं है। मुकदमों में समय और धन लगता है, कानूनी प्रक्रिया जटिल हो सकती है और हर सामाजिक या नीतिगत असहमति को अदालत के सामने ले जाना संभव नहीं होता। प्रशासनिक शिकायतें भी कई बार अनसुनी रह जाती हैं। ऐसी परिस्थितियों में शांतिपूर्ण जनप्रदर्शन जनता के दबाव को संगठित करने का प्रभावी माध्यम बन सकता है। इतिहास में अनेक सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों ने उन समस्याओं को सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में पहुंचाया है, जिन्हें सत्ता या व्यवस्था लंबे समय तक नजरअंदाज करती रही। इसलिए प्रदर्शन को अपने आप में गैरजरूरी, गैरजिम्मेदाराना या लोकतंत्र विरोधी मानना भी उचित नहीं होगा। कई बार सड़क पर उठी आवाज ही बंद कमरों में बैठे लोगों को जनता की वास्तविक परेशानी का एहसास कराती है।
लेकिन यहीं विरोध और अराजकता के बीच की महीन रेखा को समझना जरूरी हो जाता है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन का उद्देश्य अपनी मांग को सार्वजनिक करना, जनसमर्थन जुटाना और सत्ता पर नैतिक तथा लोकतांत्रिक दबाव बनाना होता है। इसके विपरीत, जब प्रदर्शन के नाम पर सार्वजनिक संपत्ति तोड़ी जाती है, आगजनी होती है, लोगों को जबरन रास्ता बदलने के लिए मजबूर किया जाता है, अस्पताल जाने वाले मरीजों की राह रुकती है, काम पर जाने वाले कर्मचारियों की आजीविका प्रभावित होती है और व्यापारियों को नुकसान उठाना पड़ता है, तब विरोध का बोझ उन लोगों पर भी पड़ने लगता है जिनका उस विवाद से कोई संबंध नहीं होता। जिस नागरिक ने न सरकार का निर्णय लिया, न आंदोलनकारियों की मांग का विरोध किया, न किसी राजनीतिक दल को चुना, उसे आखिर किस अपराध की सजा दी जा रही है? वह अपनी रोजी-रोटी कमाने, बच्चों को स्कूल पहुंचाने, किसी बीमार परिजन को अस्पताल ले जाने या समय पर काम पर पहुंचने के लिए घर से निकला है। उसकी सड़क रोककर, बस जलाकर या दुकान बंद करवाकर कौन-सा न्याय स्थापित किया जा रहा है?
यहां एक बुनियादी नैतिक प्रश्न सामने आता है। यदि किसी समूह को लगता है कि सरकार ने उसके साथ अन्याय किया है, तो क्या वह अन्याय दूर करने के लिए दूसरे नागरिकों के साथ अन्याय कर सकता है? यदि किसी कर्मचारी संगठन की मांग पूरी नहीं होती और वह काम बंद कर देता है, तो उसका प्रभाव केवल सरकार पर नहीं पड़ता; सेवाओं पर निर्भर आम लोगों पर भी पड़ता है। यदि किसी राजनीतिक दल के कार्यकर्ता अपनी असहमति जताने के लिए सार्वजनिक परिवहन रोक देते हैं, तो परेशान होने वालों में उसके समर्थक भी हो सकते हैं। यदि किसी मुद्दे पर विरोध के दौरान सरकारी बस, अस्पताल, विद्यालय या सार्वजनिक कार्यालय को नुकसान पहुंचाया जाता है, तो अंततः उसकी भरपाई सार्वजनिक धन से होती है। यह धन किसी मंत्री या अधिकारी की निजी जेब से नहीं, बल्कि जनता के कर से आता है। इस तरह सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना वस्तुतः उसी जनता की संपत्ति को नुकसान पहुंचाना है, जिसके हितों की रक्षा का दावा आंदोलनकारी कर रहे होते हैं।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का अर्थ केवल आर्थिक हानि नहीं है। एक बस के जलने से कुछ लाख रुपये का नुकसान हो सकता है, लेकिन उससे कहीं बड़ा नुकसान उस सेवा का है जो बस लोगों को दे रही थी। किसी सार्वजनिक विद्यालय या पुस्तकालय में तोड़फोड़ केवल इमारत को क्षतिग्रस्त नहीं करती, बल्कि शिक्षा और सार्वजनिक सुविधा को भी प्रभावित करती है। सरकारी संपत्ति किसी सरकार की निजी संपत्ति नहीं होती। वह जनता की साझा संपत्ति होती है और उसका उपयोग वर्तमान के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए भी होता है। इसलिए किसी सरकारी निर्णय का विरोध करते हुए सरकारी संपत्ति को निशाना बनाना अपने ही घर की दीवार तोड़कर घर के मालिक को सबक सिखाने जैसा विरोधाभास है। हां, यह भी स्पष्ट रहना चाहिए कि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के लिए हर प्रदर्शनकारी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। जिम्मेदारी उन व्यक्तियों की तय होनी चाहिए जिनकी भूमिका प्रमाणों से स्थापित हो, न कि पूरे आंदोलन या किसी समूह को बिना भेदभाव के अपराधी मान लिया जाए।
फिर भी यह प्रश्न उठता है कि जब शांतिपूर्ण तरीके से आवाज उठाने पर सुनवाई नहीं होती, जब ज्ञापन देने और बातचीत करने के बाद भी मांगें अनसुनी रहती हैं, तब क्या किया जाए? क्या आंदोलनकारी अनिश्चितकाल तक केवल अनुरोध करते रहें? इसका उत्तर यह है कि लोकतंत्र में विरोध की तीव्रता बढ़ सकती है, लेकिन उसके तरीके की वैधता और नैतिकता समाप्त नहीं होनी चाहिए। शांतिपूर्ण धरना, नियमानुसार जुलूस, प्रतीकात्मक कार्यबहिष्कार, हस्ताक्षर अभियान, जनसुनवाई, सार्वजनिक बहस, कानूनी चुनौती और व्यापक जनमत निर्माण जैसे कई तरीके हैं जिनसे दबाव बढ़ाया जा सकता है। कुछ परिस्थितियों में नागरिक अवज्ञा भी सामाजिक परिवर्तन का माध्यम रही है, लेकिन उसका औचित्य इस बात पर निर्भर करता है कि उसका उद्देश्य क्या है, उसका तरीका कैसा है, उससे किसे नुकसान हो रहा है और आंदोलनकारी अपने आचरण की जिम्मेदारी लेने को कितने तैयार हैं। अहिंसक विरोध का अर्थ कमजोर विरोध नहीं होता। कई बार अनुशासित और निरंतर शांतिपूर्ण आंदोलन, क्षणिक हिंसा या तोड़फोड़ से कहीं अधिक व्यापक नैतिक समर्थन जुटा सकता है।
दूसरी ओर, सरकारों को भी यह सुविधाजनक तर्क नहीं अपनाना चाहिए कि चूंकि न्यायालय मौजूद हैं और चुनाव होते हैं, इसलिए जनता को सड़कों पर उतरने का अधिकार नहीं है। लोकतंत्र केवल मतदान के दिन सक्रिय होने वाली व्यवस्था नहीं है। जनता का अधिकार है कि वह सरकार से जवाब मांगे, असहमति व्यक्त करे और सार्वजनिक नीतियों के बारे में अपना मत रखे। संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा शांतिपूर्ण और निरस्त्र सभा करने का अधिकार देता है, हालांकि ये अधिकार निरपेक्ष नहीं हैं और संविधान के अनुच्छेद 19(2) तथा 19(3) के अंतर्गत निर्धारित उचित प्रतिबंधों के अधीन हैं। इसका अर्थ यह है कि शांतिपूर्ण विरोध लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति का विनाश या दूसरों के अधिकारों का मनमाना उल्लंघन उस अधिकार का अनिवार्य हिस्सा नहीं है। इसी तरह प्रशासन को भी व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर हर असहमति को दबाने या हर प्रदर्शन को अराजकता बताने से बचना चाहिए। उसे वैध प्रदर्शनों के लिए उचित स्थान और अवसर उपलब्ध कराने, कानून का निष्पक्ष पालन कराने और प्रदर्शनकारियों तथा आम जनता—दोनों के अधिकारों की रक्षा करने का प्रयास करना चाहिए।
यहां सरकार और प्रदर्शनकारियों, दोनों की जवाबदेही बनती है। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह नागरिकों की शिकायतों को समय रहते सुने, संवाद के रास्ते खुले रखे और असहमति को केवल राजनीतिक विरोध समझकर खारिज न करे। यदि लोगों को बार-बार लगे कि उनकी बात सुनने वाला कोई नहीं है, तो असंतोष बढ़ सकता है। दूसरी तरफ आंदोलनकारी संगठनों की जिम्मेदारी है कि वे अपनी मांगों को स्पष्ट रखें, आंदोलन के उद्देश्य और तरीकों के प्रति जवाबदेह हों तथा यह सुनिश्चित करें कि आम लोगों को अनावश्यक रूप से बंधक न बनाया जाए। राजनीतिक दलों को भी यह समझना चाहिए कि जनता की परेशानी को अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने का साधन बना लेना लोकतांत्रिक जिम्मेदारी से बचना है। आंदोलन की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितनी सड़कें बंद हुईं, कितनी गाड़ियां जलीं या कितने घंटे जनजीवन ठप रहा; उसे इस आधार पर भी परखा जाना चाहिए कि समस्या कितनी स्पष्टता से सामने आई, जनता का कितना समर्थन मिला और समाधान की दिशा में कितना वास्तविक परिवर्तन हुआ।
समस्या के आकार और विरोध के तरीके के बीच संतुलन भी जरूरी है। हर शिकायत एक जैसी नहीं होती। किसी नागरिक को स्थानीय कार्यालय में प्रमाणपत्र न मिलने की समस्या है, किसी समुदाय को अपने अधिकारों के हनन का भय है और किसी बड़े समूह को ऐसी नीति पर आपत्ति है जिसका असर करोड़ों लोगों पर पड़ सकता है। इन सभी समस्याओं को एक ही पैमाने से नहीं तौला जा सकता। छोटी समस्या का अर्थ यह नहीं कि वह पीड़ित व्यक्ति के लिए महत्वहीन है; और बड़ी समस्या का अर्थ यह भी नहीं कि उसे उठाने वाला किसी भी तरीके का इस्तेमाल करने के लिए स्वतंत्र हो जाता है। विरोध का स्वरूप समस्या की गंभीरता, उपलब्ध उपायों, सुनवाई की स्थिति और संभावित नुकसान को ध्यान में रखकर तय किया जाना चाहिए। लेकिन किसी भी परिस्थिति में हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति के विनाश को विरोध की अनिवार्य शर्त नहीं माना जा सकता।
नागरिक के दृष्टिकोण से देखें तो लोकतंत्र का सबसे बड़ा लाभ यह है कि वह हमें केवल शासित व्यक्ति नहीं, बल्कि अधिकार-संपन्न नागरिक बनाता है। लेकिन अधिकारों के साथ विवेक और जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। यदि हम चाहते हैं कि सरकार हमारी बात सुने, तो हमें भी यह विचार करना चाहिए कि अपनी बात रखते समय हम दूसरों की बात सुनने और उनके अधिकारों का सम्मान करने के लिए कितने तैयार हैं। एक नागरिक को सरकार की नीति से असहमति हो सकती है, दूसरे नागरिक को उसी नीति का समर्थन हो सकता है और तीसरे को उस विवाद से कोई मतलब नहीं हो सकता। लोकतंत्र इन तीनों को साथ रहने की जगह देता है। सड़क पर उतरने वाले को यह अधिकार नहीं मिल जाता कि वह बाकी दोनों की स्वतंत्रता समाप्त कर दे। जिस प्रकार बहुमत को अपनी संख्या के बल पर अल्पमत की आवाज दबाने का अधिकार नहीं है, उसी प्रकार आंदोलनकारी समूह को अपनी मांग के बल पर पूरे शहर या देश के जनजीवन को मनमाने ढंग से बाधित करने का असीमित अधिकार भी नहीं है।
अंततः प्रश्न यह नहीं है कि सरकार का विरोध किया जाना चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि विरोध किस उद्देश्य से और किस मर्यादा में किया जा रहा है। यदि सरकार गलत है, तो उसकी आलोचना होनी चाहिए; यदि नीति जनविरोधी है, तो उसके खिलाफ जनमत बनना चाहिए; यदि अधिकारों का हनन हुआ है, तो उसके प्रतिकार के लिए कानूनी और लोकतांत्रिक संघर्ष होना चाहिए। लेकिन सरकार की गलती का जवाब ऐसी कार्रवाई से देना, जिसमें निर्दोष नागरिकों को कष्ट हो, सार्वजनिक संसाधन नष्ट हों और समाज में भय या हिंसा फैले, समस्या का समाधान नहीं, बल्कि एक नई समस्या पैदा करना है। साथ ही, यदि सरकार संवाद से बचती है या वैध असहमति को दबाती है, तो उसे भी जवाबदेह ठहराना आवश्यक है।
लोकतंत्र में सड़क जनता की आवाज का मंच हो सकती है, लेकिन उसे जनता की परेशानी का अखाड़ा नहीं बनना चाहिए। संसद में सवाल पूछना, अदालत में न्याय मांगना, मीडिया के माध्यम से जनमत तैयार करना और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना—ये एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के पूरक रास्ते हैं। हर समस्या अदालत तक नहीं पहुंच सकती, हर शिकायत संसद में नहीं उठ सकती और हर अन्याय केवल ज्ञापन देने से दूर नहीं होता; इसलिए विरोध की जरूरत बनी रहती है। मगर विरोध का अधिकार किसी को दूसरों के जीवन, आजीविका और स्वतंत्रता की कीमत पर अपनी मांग मनवाने का असीमित लाइसेंस नहीं देता। एक परिपक्व लोकतंत्र की पहचान केवल इस बात से नहीं होती कि वहां लोग सरकार के खिलाफ कितनी जोर से बोल सकते हैं, बल्कि इस बात से भी होती है कि वे अपनी आवाज बुलंद करते हुए दूसरों के अधिकारों का कितना सम्मान करते हैं और सरकार असहमति को सुनने का कितना साहस दिखाती है।
### विरोध बनाम अराजकता: शाहीन बाग, किसान आंदोलन और जंतर-मंतर के संदर्भ में लोकतांत्रिक असहमति की पड़ताल
लोकतंत्र में सरकार का विरोध करना नागरिक का अधिकार है, लेकिन क्या इस अधिकार का इस्तेमाल इस तरह किया जा सकता है कि सरकार से असहमत व्यक्ति अपनी बात कहने के लिए उन लाखों लोगों का जीवन कठिन बना दे, जिनका उस विवाद से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है? क्या किसी कानून, सरकारी नीति या प्रशासनिक निर्णय का विरोध करने के लिए सड़कें रोकना, लंबे समय तक सार्वजनिक स्थानों पर धरना देना, परिवहन व्यवस्था बाधित करना या कामकाज ठप कर देना आवश्यक है? और यदि सरकार या प्रशासन शिकायत नहीं सुन रहा हो, तो क्या अदालतों का दरवाजा खटखटाना, जनप्रतिनिधियों को जवाबदेह बनाना और दूसरे लोकतांत्रिक उपाय अपनाना अधिक उपयोगी नहीं हो सकता? शाहीन बाग, किसान आंदोलन और जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शनों के उदाहरण इन सवालों पर गंभीरता से विचार करने का अवसर देते हैं। इन घटनाओं को किसी एक राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध के चश्मे से देखने के बजाय हमें तीन अलग-अलग प्रश्नों पर विचार करना चाहिए—आंदोलन की मांग क्या थी, विरोध का तरीका कितना उचित था और उससे समाज के दूसरे लोगों के अधिकारों पर क्या प्रभाव पड़ा।
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि विरोध और अराजकता एक ही चीज नहीं हैं। किसी सरकार के फैसले के खिलाफ नारे लगाना, शांतिपूर्ण धरना देना, जुलूस निकालना, ज्ञापन सौंपना या सार्वजनिक बहस आयोजित करना लोकतांत्रिक असहमति के सामान्य तरीके हैं। इसके विपरीत, हिंसा करना, सार्वजनिक संपत्ति को जानबूझकर नष्ट करना, लोगों को धमकाना या उन्हें जबरन किसी गतिविधि में शामिल होने से रोकना अलग तरह के आचरण हैं। इन दोनों को एक ही श्रेणी में रख देना न तो आंदोलनकारियों के अधिकारों के लिए उचित है, न ही कानून के शासन के लिए। इसी तरह किसी प्रदर्शन से असुविधा होने मात्र से उसे अराजकता नहीं कहा जा सकता। शांतिपूर्ण प्रदर्शन में कुछ असुविधा हो सकती है, लेकिन यह देखना आवश्यक है कि वह कितनी व्यापक है, कितने समय तक रहती है, क्या उसके लिए कम बाधा वाले विकल्प उपलब्ध हैं और प्रशासन ने संतुलित व्यवस्था करने का प्रयास किया है या नहीं। लोकतंत्र में असहमति की आवाज भी सुनाई देनी चाहिए और आम नागरिक का जीवन भी अनावश्यक रूप से ठप नहीं होना चाहिए।
शाहीन बाग का उदाहरण इस बहस को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। दिसंबर 2019 में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के खिलाफ दिल्ली के शाहीन बाग इलाके में धरना शुरू हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में स्थानीय महिलाओं और अन्य नागरिकों ने भाग लिया। प्रदर्शनकारियों की आपत्तियां नागरिकता कानून के स्वरूप और उसके व्यापक संवैधानिक तथा सामाजिक प्रभावों को लेकर थीं। उनके लिए यह केवल एक कानून का विरोध नहीं, बल्कि नागरिकता, समानता और धर्मनिरपेक्षता से जुड़े सवालों को सार्वजनिक विमर्श में लाने का प्रयास भी था। इस आंदोलन ने राष्ट्रीय स्तर पर बहस पैदा की और बड़ी संख्या में लोगों का ध्यान उन आशंकाओं की ओर आकर्षित किया जिन्हें प्रदर्शनकारी महत्वपूर्ण मानते थे। दूसरी ओर, प्रदर्शन के कारण कालिंदी कुंज–शाहीन बाग मार्ग और ओखला अंडरपास से जुड़ी आवाजाही प्रभावित हुई। इससे यात्रियों, स्थानीय निवासियों, कारोबारियों और रोजाना काम पर जाने वाले लोगों को परेशानी हुई। इस प्रकार एक ही घटना में लोकतांत्रिक असहमति का महत्व भी दिखाई दिया और सार्वजनिक रास्तों को लंबे समय तक बाधित करने की समस्या भी सामने आई।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 7 अक्टूबर 2020 के फैसले में शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि सार्वजनिक रास्तों और स्थानों पर अनिश्चितकाल तक कब्जा करके दूसरों की आवाजाही बाधित नहीं की जा सकती। अदालत ने यह भी कहा कि विरोध निर्धारित स्थानों पर होना चाहिए और सार्वजनिक मार्गों को खाली कराने की जिम्मेदारी प्रशासन की है। इस फैसले का अर्थ यह नहीं था कि सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करना गलत है या नागरिकता कानून पर सवाल नहीं उठाए जा सकते। इसका मूल संदेश यह था कि एक नागरिक या समूह का मौलिक अधिकार दूसरे नागरिकों के मौलिक अधिकारों को पूरी तरह निष्प्रभावी नहीं कर सकता। शाहीन बाग के अनुभव से एक व्यावहारिक विकल्प भी निकलता है—यदि किसी मुद्दे पर लंबे समय तक धरना देना है, तो प्रशासन और प्रदर्शनकारियों के बीच पहले से ऐसा स्थान, समय और व्यवस्था तय होनी चाहिए, जहां आंदोलन की निरंतरता बनी रहे, लेकिन जरूरी सड़कें, अस्पतालों तक पहुंच, सार्वजनिक परिवहन और स्थानीय निवासियों का सामान्य जीवन बाधित न हो।
किसान आंदोलन का उदाहरण इस चर्चा को और जटिल बनाता है, क्योंकि यहां प्रश्न केवल किसी कानून से असहमति का नहीं, बल्कि कृषि अर्थव्यवस्था, किसानों की आय, न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था और भविष्य की आर्थिक सुरक्षा को लेकर आशंकाओं का था। सितंबर 2020 में संसद ने तीन कृषि कानून पारित किए। इन कानूनों के समर्थकों का तर्क था कि उनसे कृषि व्यापार के नए अवसर खुलेंगे और किसानों को अपनी उपज बेचने के अधिक विकल्प मिलेंगे। दूसरी ओर, आंदोलनकारी किसान संगठनों को आशंका थी कि इन बदलावों से मौजूदा मंडी व्यवस्था, न्यूनतम समर्थन मूल्य और उनकी मोलभाव करने की क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इन आशंकाओं की व्याख्या और कानूनों के संभावित प्रभावों पर मतभेद थे, लेकिन यह निर्विवाद था कि किसानों का एक बड़ा संगठित समूह इन कानूनों को लेकर गंभीर रूप से असंतुष्ट था। दिल्ली की सीमाओं पर लंबे समय तक चले आंदोलन ने इस असंतोष को राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया।
इस आंदोलन में विरोध की प्रभावशीलता और उसके सामाजिक मूल्य—दोनों पर विचार करना चाहिए। एक ओर, दिल्ली की सीमाओं पर लंबे धरनों और व्यापक जनदबाव ने सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाए रखा। दूसरी ओर, दिल्ली आने-जाने वाले मार्गों पर यातायात प्रभावित हुआ और स्थानीय निवासियों, परिवहन सेवाओं, व्यापार तथा रोजाना यात्रा करने वालों को कठिनाइयां झेलनी पड़ीं। 26 जनवरी 2021 की घटनाओं में ट्रैक्टर परेड के दौरान कुछ प्रदर्शनकारी निर्धारित मार्गों से हटकर मध्य दिल्ली पहुंचे; लाल किले पर हुई घटनाओं और पुलिस के साथ टकराव ने आंदोलन के शांतिपूर्ण स्वरूप को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए। लेकिन उन घटनाओं के आधार पर पूरे किसान आंदोलन को हिंसक घोषित कर देना भी उचित नहीं होगा, क्योंकि किसी बड़े आंदोलन में विभिन्न समूहों, व्यक्तियों और अलग-अलग चरणों के आचरण में अंतर हो सकता है। सही तरीका यह है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन में भाग लेने वालों के अधिकारों का सम्मान किया जाए और हिंसा, तोड़फोड़ या हमले में शामिल व्यक्तियों की जिम्मेदारी अलग से तय की जाए।
किसान आंदोलन में न्यायपालिका की भूमिका भी उल्लेखनीय रही। 12 जनवरी 2021 को सुप्रीम कोर्ट ने तीनों कृषि कानूनों के क्रियान्वयन पर अगले आदेश तक रोक लगाई और किसानों की शिकायतों तथा सरकार के पक्ष को सुनने के लिए विशेषज्ञ समिति गठित की। यह इस बात का उदाहरण था कि न्यायिक हस्तक्षेप केवल अंतिम फैसला सुनाने तक सीमित नहीं होता; कुछ परिस्थितियों में अदालत विवाद को आगे बढ़ने से रोकने और संवाद के लिए जगह बनाने का प्रयास भी कर सकती है। हालांकि, अदालत की पहल से विवाद तत्काल समाप्त नहीं हुआ। किसान संगठनों के एक बड़े हिस्से ने कानूनों को पूरी तरह वापस लेने की मांग जारी रखी। नवंबर 2021 में प्रधानमंत्री ने कानूनों को वापस लेने की घोषणा की और संसद ने 29 नवंबर 2021 को तीनों कानूनों को निरस्त करने वाला विधेयक पारित कर दिया। दिसंबर में आंदोलन समाप्त करने की दिशा में किसान संगठनों और सरकार के बीच सहमति बनी।
इस घटनाक्रम से दो महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलते हैं। पहला, किसी मुद्दे को अदालत में ले जाना और सड़क पर विरोध करना हमेशा एक-दूसरे के विकल्प नहीं होते; कई बार दोनों समानांतर चल सकते हैं। दूसरा, न्यायालय में याचिका दायर कर देना अपने आप में किसी आंदोलन की मांग पूरी होने की गारंटी नहीं है। अदालत कानून की संवैधानिकता, अधिकारों के उल्लंघन और न्यायिक हस्तक्षेप के औचित्य जैसे प्रश्नों पर विचार करती है; वह प्रत्येक आर्थिक या राजनीतिक विवाद में प्रदर्शनकारियों की हर मांग स्वीकार नहीं कर सकती। किसान आंदोलन में कानूनों पर रोक लगने के बावजूद विरोध जारी रहने से यह स्पष्ट हुआ कि विवाद केवल कानून के तत्काल क्रियान्वयन का नहीं था, बल्कि सरकार पर भरोसे, भविष्य की कृषि व्यवस्था और किसानों की मांगों के समाधान का भी था। इसलिए अदालत और आंदोलन को एक-दूसरे का शत्रु मानना गलत है। बेहतर स्थिति वह है जिसमें कानूनी चुनौती, विशेषज्ञ विमर्श, सरकार से वार्ता और शांतिपूर्ण जनदबाव मिलकर समाधान की दिशा बनाएं।
जंतर-मंतर का उदाहरण इस पूरे विमर्श में विशेष महत्व रखता है, क्योंकि यह स्थान लंबे समय से उन लोगों के लिए प्रतीक रहा है जो अपनी समस्याएं सत्ता के केंद्र तक पहुंचाना चाहते हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले किसान, कर्मचारी, विद्यार्थी, सामाजिक कार्यकर्ता और अन्य नागरिक यहां धरना देकर अपनी मांगें उठाते रहे हैं। लेकिन जंतर-मंतर पर भी यह प्रश्न सामने आया कि प्रदर्शनकारियों के अधिकारों और स्थानीय निवासियों के सामान्य जीवन के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। 23 जुलाई 2018 को Mazdoor Kisan Shakti Sangathan बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन को मौलिक अधिकार मानते हुए यह स्पष्ट किया कि इस अधिकार और स्थानीय निवासियों के जीवन तथा सुविधा के अधिकारों के बीच संतुलन आवश्यक है। अदालत ने पूर्ण प्रतिबंध लगाने के बजाय नियंत्रित और व्यवस्थित प्रदर्शनों के लिए दिशा-निर्देश बनाने पर जोर दिया।
इस फैसले का महत्व इसलिए भी है कि यह केवल प्रदर्शनकारियों को अनुशासित करने की बात नहीं करता, बल्कि प्रशासन की जिम्मेदारी भी निर्धारित करता है। यदि सरकार किसी स्थान को प्रदर्शन के लिए उपयुक्त मानती है, तो उसे वहां भीड़, ध्वनि, स्वच्छता, अवधि और यातायात के प्रबंधन की व्यवस्था करनी चाहिए। यदि प्रशासन हर प्रदर्शन को अनुमति देने से इनकार कर दे, तो नागरिकों का विरोध करने का अधिकार व्यवहार में निष्प्रभावी हो सकता है। इसके विपरीत, यदि बिना किसी प्रभावी नियमन के प्रदर्शन चलते रहें, तो स्थानीय निवासियों को लंबे समय तक परेशानी हो सकती है। इसलिए समाधान न तो हर प्रदर्शन पर प्रतिबंध है, न हर प्रदर्शन को हर स्थान पर मनमाने ढंग से करने की छूट। समाधान ऐसी व्यवस्था है जिसमें विरोध के लिए पर्याप्त जगह हो, लेकिन सार्वजनिक जीवन की अनिवार्य गतिविधियां बाधित न हों।
तो क्या हर समस्या का समाधान अदालत के माध्यम से नहीं किया जा सकता? अदालतों का इस्तेमाल निश्चित रूप से अधिक प्रभावी और व्यवस्थित विकल्पों में से एक हो सकता है, लेकिन उसके लिए समस्या की प्रकृति को समझना जरूरी है। यदि किसी कानून की संवैधानिक वैधता पर प्रश्न है, किसी सरकारी आदेश से मौलिक अधिकार प्रभावित हो रहे हैं, प्रशासन कानूनी कर्तव्य निभाने में विफल है या किसी व्यक्ति अथवा समूह के साथ कानून के विरुद्ध भेदभाव हुआ है, तो उपयुक्त न्यायिक उपाय उपलब्ध हो सकते हैं। परिस्थितियों के अनुसार उच्च न्यायालय में अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका और मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर की जा सकती है। हालांकि, हर शिकायत सीधे सुप्रीम कोर्ट तक ले जाना आवश्यक या व्यावहारिक नहीं होता। कुछ मामलों में संबंधित प्रशासनिक प्राधिकारी, नियामक संस्था, आयोग, निचली अदालत या उच्च न्यायालय अधिक उपयुक्त मंच हो सकता है। कानूनी सलाह लेकर सही मंच चुनना समय, धन और प्रयास बचा सकता है।
अदालत जाने का लाभ यह है कि विवाद को तथ्यों, कानून, दस्तावेजों और संवैधानिक सिद्धांतों के आधार पर परखा जा सकता है। न्यायालय अंतरिम राहत दे सकता है, किसी कार्रवाई पर रोक लगा सकता है, सरकार से जवाब मांग सकता है या कानून के अनुसार निर्णय करने का निर्देश दे सकता है। लेकिन इसकी सीमाएं भी हैं। मुकदमे में समय लग सकता है, वकील और अन्य खर्च हो सकते हैं तथा हर राजनीतिक या आर्थिक मांग का समाधान न्यायिक आदेश से संभव नहीं होता। अदालत यह तय कर सकती है कि कोई कानून संवैधानिक है या नहीं, लेकिन किसी नीति के प्रत्येक व्यावहारिक परिणाम का मूल्यांकन करने के लिए कभी-कभी व्यापक आर्थिक अध्ययन, विशेषज्ञों की राय और राजनीतिक विमर्श की आवश्यकता होती है। इसी तरह, किसी समूह की मांग जायज होने पर भी अदालत उसे उसी रूप में स्वीकार करे, यह जरूरी नहीं है। इसलिए अदालत को विरोध का पूर्ण विकल्प नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर उपलब्ध एक महत्वपूर्ण और स्वतंत्र उपाय समझना चाहिए।
इसके अतिरिक्त, समाधान के कुछ ऐसे रास्ते हैं जिनका पर्याप्त उपयोग किया जा सकता है। किसी नीति से प्रभावित लोग पहले अपनी शिकायतों को स्पष्ट और प्रमाण-आधारित रूप में तैयार कर सकते हैं। संबंधित विभाग को लिखित ज्ञापन देकर समयबद्ध जवाब मांगा जा सकता है। सांसदों, विधायकों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के माध्यम से मामला उठाया जा सकता है। संसदीय समितियों, सार्वजनिक परामर्श, सूचना के अधिकार के माध्यम से प्राप्त दस्तावेजों और मीडिया में तथ्यपरक चर्चा का उपयोग किया जा सकता है। नागरिक संगठनों, विशेषज्ञों और प्रभावित पक्षों के बीच संवाद आयोजित किया जा सकता है। यदि सरकार जवाब नहीं देती, तो शांतिपूर्ण प्रदर्शन के साथ-साथ कानूनी चुनौती भी जारी रखी जा सकती है। इन उपायों की प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि मांग कितनी स्पष्ट है, उपलब्ध प्रमाण कितने मजबूत हैं और सरकार जवाबदेही निभाने के लिए कितनी तैयार है।
अब हड़ताल और प्रदर्शन की परंपरा के मूल उद्देश्य पर विचार करना चाहिए। ऐतिहासिक रूप से हड़ताल का अर्थ केवल काम बंद कर देना नहीं रहा है। श्रमिक आंदोलनों में हड़ताल का उद्देश्य नियोक्ता या सत्ता को यह महसूस कराना रहा है कि श्रमिकों के श्रम के बिना उत्पादन और सेवाओं का संचालन कठिन हो सकता है। औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध आंदोलनों में हड़ताल, बहिष्कार और सत्याग्रह ने राजनीतिक असहमति को संगठित रूप दिया। स्वतंत्र भारत में भी कर्मचारी संगठनों, किसानों और सामाजिक समूहों ने अपनी मांगों को प्रभावी बनाने के लिए इन तरीकों का उपयोग किया है। इनका मूल उद्देश्य किसी समस्या की गंभीरता को सामने लाना, वार्ता के लिए दबाव बनाना और सत्ता या नियोक्ता को निर्णय पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करना रहा है। लेकिन किसी उपाय का ऐतिहासिक महत्व यह साबित नहीं करता कि उसका हर प्रयोग, हर परिस्थिति में उचित होगा।
हड़ताल और बंद के बीच अंतर करना भी जरूरी है। किसी कर्मचारी संगठन का काम बंद करना और किसी राजनीतिक संगठन द्वारा पूरे शहर को बंद कराने का प्रयास करना समान परिस्थिति नहीं है। पहली स्थिति में भी सेवाओं और आम नागरिकों पर प्रभाव पड़ सकता है, लेकिन दूसरी स्थिति में ऐसे लोग भी बाधित हो सकते हैं जो न आंदोलन का हिस्सा हैं, न उसके लक्ष्य से सहमत। भारत में हड़ताल का अधिकार भी हर क्षेत्र और हर परिस्थिति में असीमित मौलिक अधिकार नहीं है। विशेष रूप से आवश्यक सेवाओं, सार्वजनिक सुरक्षा और वैधानिक प्रतिबंधों से जुड़े मामलों में अलग नियम लागू हो सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने टी. के. रंगराजन बनाम तमिलनाडु सरकार (2003) में सरकारी कर्मचारियों की हड़ताल को मौलिक अधिकार नहीं माना था। इससे यह स्पष्ट होता है कि किसी मांग के लिए विरोध करने का अधिकार और काम बंद करने का कानूनी अधिकार अलग-अलग प्रश्न हैं। इसलिए किसी हड़ताल की वैधता और उसके तरीके को संबंधित कानून तथा परिस्थितियों के आधार पर देखना चाहिए।
आंदोलन की नैतिकता का प्रश्न भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। यदि कोई संगठन अपने सदस्यों के अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है, तो उसे यह भी सोचना चाहिए कि उसके तरीके से कमजोर वर्गों पर क्या असर पड़ेगा। दिहाड़ी मजदूर एक दिन काम पर नहीं जा पाया तो उसकी कमाई चली जाती है। छोटी दुकान का मालिक दुकान बंद रखने पर रोज का नुकसान उठाता है। मरीज को समय पर अस्पताल पहुंचना है, विद्यार्थी को परीक्षा देने जाना है और किसी परिवार को रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करनी हैं। आंदोलन का उद्देश्य यदि जनता के हितों की रक्षा करना है, तो जनता के इन्हीं सदस्यों को अनावश्यक रूप से कष्ट पहुंचाना आत्मविरोधी हो सकता है। हां, यह भी सच है कि किसी बड़े अन्याय के खिलाफ आंदोलन में कुछ असुविधा से पूरी तरह बच पाना हमेशा संभव नहीं होता। इसलिए कसौटी यह होनी चाहिए कि असुविधा कितनी जरूरी, कितनी सीमित और कितनी अनुपातिक है; क्या कम नुकसान वाला कोई प्रभावी विकल्प मौजूद है; और क्या आंदोलनकारी अपनी कार्रवाई की जवाबदेही स्वीकार करते हैं।
सरकार की जिम्मेदारी को भी इसी गंभीरता से देखना होगा। कई बार प्रशासन अनुमति देने, प्रदर्शन स्थल तय करने या यातायात का प्रबंध करने में विफल रहता है और बाद में पूरी परेशानी का दोष आंदोलनकारियों पर डाल देता है। कभी-कभी सरकार बातचीत को टालती रहती है, जबकि शिकायतों का समाधान संभव होता है। ऐसे में आंदोलन का लंबा खिंचना केवल प्रदर्शनकारियों की जिद का परिणाम नहीं माना जा सकता। दूसरी ओर, यदि सरकार बातचीत कर रही है और कानूनी प्रक्रिया चल रही है, तो आंदोलनकारी संगठनों को भी यह स्पष्ट करना चाहिए कि उनकी मांगें क्या हैं, वार्ता की शर्तें क्या हैं और समाधान के लिए कौन-सा रास्ता स्वीकार्य हो सकता है। लोकतंत्र में संवाद का अर्थ यह नहीं कि सरकार हर मांग मान ले या प्रदर्शनकारी अपनी हर मांग वापस ले लें। संवाद का अर्थ है कि दोनों पक्ष तथ्यों और तर्कों के आधार पर समाधान खोजने का प्रयास करें।
इसलिए शाहीन बाग, किसान आंदोलन और जंतर-मंतर के अनुभवों से निकलने वाला निष्कर्ष किसी एक पक्ष को पूरी तरह सही या गलत ठहराना नहीं है। इन घटनाओं ने दिखाया कि सार्वजनिक प्रदर्शन उपेक्षित शिकायतों को राष्ट्रीय विमर्श तक पहुंचा सकते हैं, लेकिन लंबे समय तक सार्वजनिक मार्गों को बाधित करने से दूसरे नागरिकों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। किसान आंदोलन ने यह भी दिखाया कि न्यायालय का हस्तक्षेप, सरकार से बातचीत और व्यापक जनदबाव एक ही विवाद में अलग-अलग भूमिकाएं निभा सकते हैं। जंतर-मंतर से जुड़े फैसले ने यह स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण विरोध पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के बजाय उचित नियमन का रास्ता अपनाया जाना चाहिए। इन उदाहरणों से सीख यह है कि लोकतंत्र को न तो सड़क से वंचित किया जा सकता है, न सड़क को इस तरह इस्तेमाल करने की छूट दी जा सकती है कि बाकी नागरिकों का जीवन ठप हो जाए।
अंततः विरोध का उद्देश्य केवल सरकार को परेशान करना नहीं, बल्कि किसी समस्या को दूर करना होना चाहिए। यदि आंदोलन के कारण समस्या से अधिक परेशानी पैदा होने लगे, यदि मांग की स्पष्टता पीछे छूट जाए और रास्ता रोकना ही आंदोलन की पहचान बन जाए, तो उसके तरीकों पर पुनर्विचार जरूरी है। उसी तरह यदि सरकार शांतिपूर्ण असहमति को दबाती है, संवाद से बचती है या न्यायिक और प्रशासनिक उपायों को प्रभावहीन होने देती है, तो उसे भी अपनी भूमिका की समीक्षा करनी चाहिए। लोकतंत्र की परिपक्वता का अर्थ यह नहीं कि विरोध कभी न हो; उसका अर्थ यह है कि विरोध को सुना जाए, सरकार जवाबदेह बने, अदालतें स्वतंत्र रूप से न्याय करें और आंदोलनकारी अपने अधिकारों का उपयोग दूसरों के अधिकारों का सम्मान करते हुए करें। सड़क, संसद और अदालत—तीनों लोकतंत्र के महत्वपूर्ण मंच हैं। इनमें से किसी एक को शेष दोनों का विकल्प बनाने के बजाय इनके बीच संतुलन स्थापित करना ही विरोध को अराजकता में बदलने से रोक सकता है।