गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

मीडिया ट्रायल, खुदकुशी और समाचारों की संवेदना



16-17 दिसंबर 2013- अपनी सहयोगी से बलात्कार के मामले में दिल्ली के एक एनजीओ के एग्जेक्यूटिव डायरेक्टर के खिलाफ एफआईआर दर्ज होती है। एक टीवी चैनल पर प्राइम टाइम में इस मामले से जुड़ा समाचार प्रसारित होता है, बहस होती है।
18 दिसंबर 2013 – आरोपित एग्जेक्यूटिव डायरेक्टर खुदकुशी कर लेता है।
18 दिसंबर 2013- एग्जेक्यूटिव डायरेक्टर पर लगे आरोप और उसकी खुदकुशी देश के तमाम हिंदी समाचार चैनलों की हेडलाइन में शुमार हो जाते हैं।
कहानी यहां खत्म नहीं होती। बल्कि, नए सिरे से नए सवाल खड़े हो जाते हैं।
सवाल ये उठता है कि क्या आरोपित शख्स इतना कमजोर था, कि वो अपने ऊपर लगे आरोप को सहन न कर सका? क्या वो अपने खिलाफ एफआईआर दर्ज होने पर आगे होनेवाली कानूनी कार्रवाई और जेल जाने से डरता था, क्य़ा वो जानता था कि वो खुद को बेगुनाह साबित नहीं कर सकेगा?  क्या वो अपने मामले की खबर मीडिया में आने से परेशान था?
मामला चुंकि सितंबर महीने में हुई घटना से शुरु हुआ था, लिहाजा तीन महीने में इसको लेकर जांच-पड़ताल और सीमित दायरों में विवाद-बहस खूब हुई। ऐसे में नहीं लगता कि आरोपित शख्स सिर्फ आरोप से सन्न था, हताश और निराश था। एफआईआर दर्ज होने के बाद खुदकुशी दूसरी आशंका की ओर इशारा करती है और तीसरी आशंका भी हो सकती है, जिसकी ओर उसके करीबी भी इशारा करते हैं और मानते हैं कि 17 दिसंबर 2013 को मशहूर हिंदी समाचार चैनल इंडिया टीवी पर इस मामले से जुड़ी खबर प्रसारित होने और उसके साथ नारीवादी कार्यकर्ताओं, महिला आयोग से जुड़े लोगों, पत्रकारों की बहस से पैदा तनाव ने आरोपित को खुदकुशी करने को मजबूर कर दिया।
वजह कुछ भी हो सकती है, जो शायद मरहूम शख्स ही जानता होगा। ये राज़ राज़ ही रह जाएगा कि आखिर उसने क्यों जान दी? समाज के डर से, पुलिस के डर से, अपनी आत्मा की आवाज पर या किसी और वजह से?
बहरहाल, इस मामले ने एक बार फिर आधुनिक दौर की हिंदी टेलीविजन पत्रकारिता पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं। अगर ध्यान दें, और याद करें तो इस तरह की खुदकुशी का ये पहला मामला नहीं दिखता। कुछ वक्त पहले ही एक बाप ने अपनी बेटी की ओऱ से बलात्कार का आरोप लगाए जाने पर जान दे दी थी। ये भी माना जाता है कि इस तरीके से खुदकुशी कर लेने भर से ही आरोपित पर लगे दाग साफ नहीं हो जाते। बेटी ने बाप पर भले ही गलत आरोप लगाए हो, या सहकर्मी के साथ एनजीओ के एग्जेक्यूटिव डायरेक्टर ने क्या किया या नहीं किया उसकी सच्चाई कुछ भी हो, सबसे बड़ा सवाल जो यहां उभरकर आया है, वो है मीडिया में व्यक्ति की निजता का।
आधुनिक दौर में जब कैमरे की जद से कुछ भी छिपा नहीं है, दीवारों के कान मीडिया संस्थानों के न्यूज़रूम में जुड़ने लगे हैं, तो किसी संगीन अपराध के आरोप को छिपा पाना किसी के लिए भी मुमकिन नहीं रहा, चाहे वो तरुण तेजपाल जैसे धाकड़ पत्रकार या आसाराम और नारायण साईं जैसे विशाल श्रद्धालु समुदाय के धर्मगुरु ही क्यों न हों। मीडिया में, खासकर टीवी के समाचार चैनलों पर इनकी जो छीछालेदर हो चुकी है, वो किसी से छिपी नहीं है। लेकिन, तेजपाल या आसाराम ने अगर उस तरह प्रतिक्रिया नहीं दी, जैसे खुर्शीद अनवर ने दी, तो इसके मायने अलग हो सकते हैं। परंतु, आरोप तो इन्हें एक धरातल पर ला ही देते हैं। ऐसे में, जब 16 दिसंबर 2012 की पीड़िता के चेहरे सज़ा सुनाए जाने तक सार्वजनिक नहीं किए जाते, तो फिर किसी और शख्स पर सरेआम बहस कितनी जायज है।
उदाहरण तो पूर्व जस्टिस एस के गांगुली के मामले के भी दिए जा रहे हैं जिनकी मीडिया में छीछालेदर सिर्फ एक लॉ इंटर्न की शिकायत भर पर हो गई। आरोप तो रामसिंह, विनय ठाकुर, पवन इत्यादि आम दोषी बलात्कारियों से लेकर तेजपाल, आसाराम, गांगुली, खुर्शीद सरीखे तमाम आरोपितों तक को एक ही जमीन पर ला खड़ा कर देते हैं। ऐसे में, मीडिया, खासकर टीवी के समाचार चैनलों की भूमिका कैसी होनी चाहिए। एक पत्रकार ने फेसबुक पर लिखा कि खबर देना भर पत्रकार के हाथ में है, उसका असर उसके हाथ में नहीं है। दलील बिल्कुल सही है, लेकिन सवाल है, टेलीविजन के जरिए देश से लेकर दुनिया तक खबर का प्रसारण करते हुए उसके असर की चिंता क्यों नहीं की जा सकती। और अगर असर की उम्मीद नहीं होती है, तो प्राइम टाइम में दसियों खबरों में से चुनकर कोई खास खबर ही प्रमुखता से क्यों दिखाई जाती है? अगर इस तरह के आरोप मीडिय़ा और टीवी चैनलों पर लगते हैं कि टीआरपी के लिए ये सबकुछ किया जा रहा है, तो ये आरोप जायज क्यों नहीं माने जा रहे?
कानून और सुप्रीम कोर्ट की सख्ती की वजह से मीडिया में महिलाओं को लेकर संयम बरता जा रहा है। ऐसे किसी भी मामले से जुड़ी खबर में जहां महिला का चरित्र हनन दिखता हो, उस महिला की तस्वीर चैनलों पर या तो नहीं दिखाई जाती है, या फिर धुंधली (Blurr) करके दिखाई जाती है और उसकी पहचान जाहिर नहीं की जाती है। लेकिन मर्दों के मामले में ऐसा नहीं होता। चंद मामलों को छोड़ दें, तो आम तौर पर हरेक मर्द आरोपी का चेहरा खुलकर चैनलों पर दिखाया जाता है, मानो उसका आरोप साबित होने से पहले ही उसे दोषी घोषित कर दिया गया हो। अगर कानून की मर्यादा है, उसके तहत कोई लकीर खींची गई है, तो उसका पालन दोनों ही स्थितियों में होना चाहिए, चाहे वो किसी महिला का मामला हो, या किसी मर्द का। कानून को परे रखकर भी सोचें, तो मीडिया को इतने आत्मसंयम का पालन तो करना ही चाहिए कि किसी की निजता का उल्लंघन न हो। लेकिन, ऐसे मामले रोज देखने में आते हैं, जिनमें मीडिया की भूमिका बेलगाम दिखती है। सबसे तेजी से, सबसे पहले, सबसे सनसनीखेज तरीके से खबर देने की होड़ में टीवी के खबरिया चैनलों में कोई संयम नहीं दिखता, ना ही कोई संवेदना दिखती है।
उंगुलियों पर गिने जानेवाले चंद मामले ऐसे होंगे, जहां आरोपित मर्द की पहचान उजागर न की गई हो। इसकी अलग वजहें हो सकती हैं। किसी का रसूख इसके पीछे हो सकता है, किसी से हित जुड़ा हो सकता है या और भी बहुत कुछ। संवेदना का सवाल इस मामले में जुदा हो जाता है। आज के दौर का मीडिया संवेदना का सौदा करना तो जानता है, लेकिन, संवेदना के साथ पेश आना शायद नहीं। खबरें प्रसारित करते हुए ये तो जरूर सोचा जाता है कि किसी को सरेआम पिटते दिखाने की खबर लोग जरूर देखेंगे, लेकिन ये नहीं सोचा जाता कि उस एक पिटनेवाले से जुड़े उसके परिवार के कई और लोगों को सरेआम फब्तियां सुननी पड़ेंगी, गांव-घर छोड़ देना पड़ेगा और उसके अकेले के गुनाह की सज़ा सिर्फ इसलिए भुगतनी पड़ेगी चुंकि सारा समाज, सारी दुनिया, वो भी जो उक्त मामले से अनजान हैं, सभी उसके बारे में जान जाएंगे और हिकारत भरी नजरों से देखेंगे। कानून, अदालत और पुलिस गुनाहों का हिसाब करनेवाली संस्थाएं हैं। मीडिया का ये काम नहीं कि वो किसी को दोषी ठहराए या किसी को बेगुनाह जाहिर करे। अगर ऐसा किसी खबर के जरिए होता है, तो माना जा सकता है कि मीडिया अपनी लक्ष्मणरेखा का उल्लंघन कर रहा है।
खबर के असर का अंदाजा अगर पत्रकार को न हो, तो इससे बड़ी संवेदनहीनता और क्या होगी? खासकर तब जबकि आप किसी छोटे से दायरे में काम नहीं कर रहे, विशाल सार्वजनिक जीवन से जुड़े हुए हैं। जब आप ये मान सकते हैं कि अपने बच्चे या पति की मौत पर आंसू बहा रही, ढाढ़ें मारकर रो रही महिला के आंसू दिखाने से टीआरपी आएगी, तो आपको ये भी समझना चाहिए कि किसी को पर्दे पर दोषी साबित करने की आपकी कोशिश न सिर्फ उसके लिए जानलेवा हो सकती है बल्कि उसके बेगुनाह परिजनों को भी उसका खामियाजा भुगतने को मजबूर कर सकती है। यहां ये कतई न माना जाए कि कोई गुमनाम आरोपी या खुर्शीद अनवर या तेजपाल या आसाराम अपने आरोपों के लिए दोषी थे या नहीं इसके बारे में कोई दलील दी जा रही है, ये सब तय करने के लिए अदालते हैं, पुलिस है। यहां तो सिर्फ ये माना जाए कि इन मामलों के बहाने बात टेलीविजन समाचार प्रसारण में संयम के अभाव की हो रही है, जिसे दुरुस्त करने की सख्त जरूरत है।
-          कुमार कौस्तुभ

सोमवार, 16 दिसंबर 2013

हिंदी समाचार पत्रिकाओं का भविष्य

-कुमार कौस्तुभ
क्या भारत में हिंदी समाचार पत्रिकाओं का वजूद खतरे में है? क्या इंडिया टुडे जैसी समाचार पत्रिकाओं के पाठक वर्ग में कमी आ रही है? क्या हिंदी समाचार पत्रिकाएं स्तरीयता खोती जा रही हैं? ऐसे तमाम सवाल इन दिनों प्रासंगिक हैं। भारत में टेलीविजन समाचार चैनलों के उत्थान के बावजूद समाचार पत्रों ने तो अपनी जगह पाठकों के बीच बरकरार रखी है, लेकिन समाचार पत्रिकाओं की सेहत में गिरावट देखी गई है। 2010 और बाद के रीडरशिप सर्वे को देखें तो साफ पता चलता है कि हिंदी पाठक वर्ग में इंडिया टुडे और आउटलुक हिंदी जैसी समाचार पत्रिकाओं की अव्वल जगह नहीं। इनके बजाय, सरस सलिल जैसी चलताऊ सामग्री देने वाली पत्रिका सर्वेक्षणों में लगातार टॉप पर रही है तो दूसरा नंबर प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए उपयोगी प्रतियोगित दर्पण जैसी पत्रिका का रहा है। ऐसे में हिंदी समाचार पत्रिकाओं पर सवाल उठना लाजिमी है।
यूं तो हिंदी समाचार पत्रिकाओं के बंद होने का सिलसिला 80 के दशक के अंत में ही शुरु हो गया था, जब टेलिविजन के समाचार चैनल अस्तित्व में लगभग नहीं थे। लगभग 50 साल चली समाचार पत्रिका धर्मयुग को 1989 में बंद कर दिया गया। इसी दौर में मशहूर समाचार पत्रिका साप्ताहिक हिंदुस्तान भी बंद हो गई। संडे मेल और हिंदी संडे ऑब्जर्वर जैसे अखबार और समाचार पत्रिकाओं के मिले-जुले रूप भी इन पत्रिकाओं की जगह न ले सके और जल्द ही बंद हो गए। उस वक्त हिंदी की चर्चित समाचार पत्रिकाओं के बंद होने के पीछे कारोबारी समस्याएं मानी जा सकती हैं। 80 के दशक में इंडिया टुडे का हिंदी संस्करण बाजार में आ चुका था और उसने हिंदी पट्टी में जबर्दस्त पैठ बनाई थी। वैसे मौलिक विश्लेषण के बजाय अनुवाद आधारित पत्रिका होने की वजह से इंडिया टुडे हिंदी की लगातार आलोचना भी हुई, लेकिन चमक-दमक भरे प्रेजेंटेशन के साथ-साथ अनुवाद में भी मौलिक विश्लेषण का मुलम्मा चढ़ाकर इंडिया टुडे ने हिंदी पट्टी के पाठक वर्ग पर ऐसा कब्जा कर लिया जिसे तोड़ना किसी भी दूसरी समाचार पत्रिका के लिए मुश्किल रहा । 80 के दशक में इलाहाबाद से प्रकाशित समाचार पत्रिका माया की भी हिंदी पट्टी पर जबर्दस्त पकड़ थी, लेकिन इंडिया टुडे सबको पीछे छोड़कर आगे निकल गई। इसी की तर्ज पर काफी आगे चलकर अंग्रेजी आउटलुक का भी हिंदी संस्करण प्रख्यात पत्रकार आलोक मेहता के संपादन में 90 के दशक में शुरु हुआ था, लेकिन वो भी वैसी पहचान न बना सका। हालांकि इंडिया टुडे हिंदी के उद्भव ने हिंदी पट्टी में उसके आकार-प्रकार की और भी पत्रिकाओं के प्रकाशन की बुनियाद खड़ी की, जिनमें से बहुतेरी आज भी प्रकाशित हो रही हैं और नई पत्रिकाएं भी आने लगी हैं, लेकिन इंडिया टुडे की जगह लेना उसके जैसी पत्रिकाओं के लिए मुमकिन नहीं हो सका। सरस सलिल और प्रतियोगिता दर्पण जैसी पत्रिकाओं ने इंडिया टुडे और उसके जैसी समाचार पत्रिकाओं को रीडरशिप सर्वे में भले ही पछाड़ा हो, लेकिन ये तो बिल्कुल साफ है कि उनका कंटेंट अलग है और उसके मुताबिक पाठक वर्ग भी अलग है। ऐसे में समाचार पत्रिकाओं से उनकी कोई तुलना हो ही नहीं सकती।
जहां तक हिंदी की समाचार पत्रिकाओं के भविष्य का सवाल है, तो उस पर विचार करने से पहले ये भी समझना होगा कि आखिर समाचार पत्रिकाओं की जरूरत ही क्य़ों पड़ी। धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी पत्रिकाएं जिस दौर में शुरु हुई थीं उस दौरान आम लोगों तक समाचारों की पहुंच का एकमात्र सुलभ माध्यम था रेडियो। समाचार पत्र छपते तो जरूर थे, लेकिन दूर-दराज के इलाकों के पाठकों तक उनका पहुंच पाना तो 80 के दशक तक मुश्किल था। ऐसे में लोगों को समाचारों की जानकारी रेडियो के जरिए तो होती थी, लेकिन समाचार आधारित विमर्श की भूख शांत नहीं हो पाती थी। ऐसी परिस्थिति में शुरु की गई समाचार पत्रिकाओं ने बड़ा पाठक वर्ग बनाया क्य़ोंकि देर से ही सही दूर-दराज के लोगों तक समाचारों के विश्लेषण पहुंचाने में वो सफल रहीं। कहना न होगा कि इन पत्रिकाओं ने काफी हद तक नए कलेवर में उन राजनीतिक और सामाजिक पत्रिकाओं की भी जगह ली जिन्हें गांधी, नेहरू और बड़े नेताओं का संरक्षण हासिल था। कारोबारी घरानों से निकली इन पत्रिकाओं का विस्तार दिनमान, रविवार जैसी पत्रिकाओं के साथ हुआ लेकिन शाय़द कारोबारी समस्याओं की वजह से ही ये चल न सकीं। परंतु, जनमानस में समाचार विश्लेषणों के जरिए खबरिया नजरिये को पेश करने की जो कोशिश इन पत्रिकाओं ने की, उससे समाचार-संवाद की आम जन की भूख जरूर तृप्त हुई, साथ ही बड़े स्तर पर पत्रकारीय गतिविधियों को भी बढ़ावा मिला। धर्मवीर भारती, अज्ञेय, रघुवीर सहाय, उदयन शर्मा, एसपी सिंह जैसे नामवर साहित्यकार और पत्रकार इन पत्रिकाओं से जुड़े और स्वतंत्र भारत में हिंदी पत्रकारिता को नया आय़ाम दिया ।
स्वतंत्रता पूर्व और स्वतंत्रता आंदोलन के बाद देश में प्रकाशित होनेवाली हिंदी समाचार पत्रिकाओं में बड़ा फर्क देखा जा सकता है। स्वतंत्रता पूर्व की पत्रिकाएं जहां स्वतंत्रता आंदोलन के मिशन से ओतप्रोत थीं, वहीं स्वतंत्रता के बाद शुरु हुई पत्रिकाओं की पैकेजिंग कुछ इस तरह से की गई कि समाज के हर तबके और परिवार के हर सदस्य के लिए ये उपयोगी हों। बहुधा, ऐसी पत्रिकाओं में समाचार और विचार के साथ-साथ पूरे परिवार के लिए उपयोगी सामग्री पेश की जाती थी। समाचारों से जुड़ी कवर स्टोरी के अलावा मानवीय संवेदना परक खबरों, सम-सामयिक महत्व की सामग्री और खेल-खिलाड़ी, कारोबार, विज्ञान, सिनेमा, कला-संस्कृति-साहित्य की हलचल के साथ-साथ महिलाओं और बच्चों के लिए भी इन पत्रिकाओं में गिनी-चुनी सामग्री जरूर रहती थी जिसके चलते परिवार के हर सदस्य को हर सप्ताह इन पत्रिकाओं का इंतजार रहता था। रविवार और दिनमान जैसी चुनिंदा पत्रिकाओं को छोड़ दें, तो धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी पत्रिकाएं तो हर परिवार के लिए संग्रहणीय हो चली थीं। आज भी साप्ताहिक तौर पर प्रकाशित होनेवाली ऐसी तमाम पत्रिकाओं में पैकेजिंग का चलन कमोबेश वही है, हालांकि अब बच्चों और महिलाओं के लिए अलग-अलग ढेर सारी पत्रिकाएं चल रही है, लेकिन काफी हद तक आज भी कोशिश ये होती है कि पत्रिकाएं पूरे परिवार के लिए हों।
सवाल ये है कि जब समाचार पत्रिकाएं पूरे परिवार के लिए साप्ताहिक पैकेजपेश कर ही रही हैं, तो फिर उनके वजूद पर संकट क्यों? इसका उत्तर यही हो सकता है कि एक तरफ टेलीविजन समाचार चैनलों का बढ़ता असर, तो दूसरी तरफ समाचार पत्रों का क्षेत्रीयकरण ऐसी पत्रिकाओं को अपना ग्रास बना रहा है। 80 के दशक के बाद से समाचार पत्रों का जबर्दस्त क्षेत्रीय विस्तार हुआ है। इक्कीसवीं सदी में प्रिंटिंग की आधुनिक सुविधाओं के आने से तमाम राष्ट्रीय समाचार पत्र क्षेत्रीय भी नहीं, बल्कि शहर आधारित होकर रह गए हैं। यानी अब अखबारों की प्राथमिकता उस इलाके की खबरों को प्रमुखता देने की है, जहां से उनके अधिकतर पन्ने प्रकाशित हो रहे हैं, न कि राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय य़ा राज्य स्तर के मसलों को। हां, पहले पन्ने पर राष्ट्रीय या राज्य स्तर की खबरें प्रमुख हो सकती हैं, लेकिन बाकी पन्नों पर तो मसलन बिहार में पटना, भागलपुर या मुजफ्फरपुर से जुड़े इलाकों की ही छोटी-से-छोटी खबर को जगह मिलेगी। इस तरह प्रकाशन के विस्तार से अखबारों के प्रसार को भी बढ़ावा दिया गय़ा है। जिन जगहों पर दिल्ली से प्रकाशित अखबार एक दिन बाद पहुंचते थे, अब उन्हीं अखबारों के क्षेत्रीय संस्करण सुबह-सुबह पहुंच जाते हैं। जाहिर है, लोगों तक खबरों की पहुंच अखबारों के जरिए आसान हो गई है और उसी तरीके से उनसे जुड़े विश्लेषणों की भी। दूसरा माध्यम हैं टेलीविजन के समाचार चैनल, जो राष्ट्रीय और अंतराराष्ट्रीय से लेकर अपने लक्षित क्षेत्रों की हर बड़ी-छोटी खबर तेजी से प्रसारित करने को तैयार रहते हैं। यही नहीं, समाचारों के विश्लेषण भी लगातार दिखते हैं, जिनसे पाठकों-दर्शकों को व्यापक सोच का दायरा मिलता है।
खबरों को जनता तक पहुंचाने की इस होड़ की चर्चा इंटरनेट माध्यमों की बात किए बगैर अधूरी रहेगी। अब तमाम अखबार और समाचार चैनल इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। तो जहां भी जिस व्यक्ति के पास कंप्यूटर या फिर यहां तक कि मोबाइल के जरिए इंटरनेट की सुविधा हासिल है, वो खबरों और उनसे जुड़ी सामग्रियों ही नहीं, अपनी पसंद की तमाम बौद्धिक और मनोरंजक सामग्रियों को एक क्लिक के जरिए हासिल कर सकता है। ऐसे में, पत्रिका के लिए हफ्तेभर इंतजार क्यों करना? जिस तरह की सामग्री पत्रिका में हफ्तेभर बाद हासिल होगी, उसे इंटरनेट पर जब जी चाहे हासिल कर सकते हैं और पत्रिका को घर में जमा करके कबाड़ इकट्ठा करने की भी जहमत नहीं, सारी सामग्री वर्चुअल स्पेस में भंडारित रहेगी, जब जी चाहे, आसानी से खोजकर इस्तेमाल भी कर सकते हैं। ये ऐसी स्थिति पैदा हो गई है, जिसे समाचार से जुड़ी ही नहीं, बल्कि, खेल, महिलाओं और बच्चों से जुड़ी पत्रिकाओं के भी कागजी रूप की अंतिम घड़ी माना जा सकता है। वक्त को पहचानते हुए इंडिया टुडे जैसे प्रकाशन समूहों ने पत्रिकाओं के वजूद को बचाए रखने की कोशिश भी शुरु कर दी है और उनके डिजिटल संस्करण निकालने लगे हैं, जिन्हें अच्छे डिस्काउंट पर ग्राहकों को दिया जा रहा है। यानी एक तरह से देखें तो ये इंटरनेट आधारित पत्रिकाओं को बढ़ावा देने की कोशिश भी है ताकि प्रिंट संस्करण बंद करके खर्चे घटाए जा सके। पिछले दिनों अमेरिकी पत्रिका न्यूज़वीक ने इसकी पहल की और अब भारत में भी इसकी तैयारी होती दिख रही है।
सवाल ये है कि डिज़िटाइजेशन से क्या फर्क आएगा, क्या पत्रिकाएं मर जाएंगी? पारंपरिक पत्रिकाओं का क्या स्वरूप रहेगा? एक समय ये भी बातें उछ रही थीं कि इंटरनेट के आने से पुस्तक प्रकाशन व्यवसाय खत्म हो सकता है। कुछ ऐसा ही पत्रिकाओं के संदर्भ में भी सोचा जा सकता है। लेकिन, मेरा मानना है कि दिल्ली अभी दूर है और जमीनी हकीकत कुछ और है। इंटरनेट ने पत्रिकाओं को प्रकाशन का नया आधार जरूर दिया है। देश ही नहीं दुनिया भर में कोने-कोने में बैठे लोगों तक पहुंचने का अवसर दिया है। ऐसे में पत्रिकाओं के लिए इसका इस्तेमाल सुखद है। रही बात उन पाठकों की जो अब भी इंटरनेट की सुविधा से महरूम हैं, तो उनके लिए पत्रिकाओं के प्रकाशकों को सोचना होगा और ऐसे पाठकों से जुड़े रहने, उनकी जरूरत पूरी करने के लिए नए सिरे से सोचना होगा। सीधी सी बात ये है कि भारत अभी अमेरिका नहीं हुआ है और इंटरनेट की उपलब्धता यहां अब भी काफी बड़े क्षेत्र के लोगों में नहीं है। ऐसे में एक बड़ा पाठक वर्ग है, जिसे अपने साथ जोड़ना पत्रिकाओं का दायित्व भी है और उनके कारोबारी हितों के लिए जरूरी भी।

रविवार, 15 दिसंबर 2013

साहित्यिक पत्रिकाओं का ‘दृश्यांतर’


हिंदी पाठक वर्ग में साहित्यिक पत्रिकाओं का अहम स्थान है। एक ओर जहां हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाएं आम जनों से लेकर साहित्यिक अभिरुचि के लोगों और साहित्य के छात्रों की आवश्यकता पूर्ति करती रही हैं, उन्हें न सिर्फ पढ़ने के लिए साहित्यिक सामग्री मुहैया कराती रही हैं, बल्कि उनकी अपनी लेखन संबंधी साहित्यिक गतिविधियों को मंच भी प्रदान करती रही हैं, वहीं दूसरी ओर, हिंदी की बहुत-सी साहित्यिक पत्रिकाओं ने साहित्य के साथ-साथ राजनितिक और सामाजिक मुद्दों पर विमर्श को स्थान देकर अलग स्थान बनाया है। इस सिलसिले में चर्चा करते हुए साहित्यिक पत्रिकाओं का वर्गीकरण कुछ इस तरह से किया जा सकता है- एक तो शुद्ध साहित्यिक पत्रिकाएं, जिनमें बड़ी संख्या देश के कोने-कोने से निकलनेवाली अनियतकालीन पत्रिकाओं की है। दूसरी- खास विचारधारा की रुझानवाली पहल, वसुधा जैसी तमाम पत्रिकाएं जिनसे वामपंथी रुझान वाले साहित्यकार जुड़े और उन्हें अपनी बात हर तरह से जाहिर करने का मंच इन पत्रिकाओं ने दिया। तीसरी- साहित्य की ऐसी पत्रिकाएं, जो कमर्शियल भी हैं और सरोकारी भी- ऐसी पत्रिकाओं में पहले पहल सारिका थी, जो टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप की ओर से चलाई जाती थी और कमर्शियल वजहों से ही बंद भी हो गई और अब हंस, कथादेश जैसी पत्रिकाएं हैं, जो सरोकारी होने के साथ-साथ प्रकाशकों के कमर्शियल हितों की भी पूर्ति कर रही हैं। इन पत्रिकाओं को सीधे-सीधे कमर्शियल इसलिए नहीं कहा जा सकता कि अगर सिर्फ मुनाफे का ख्याल रखा जाता, और सरोकारों को छोड़ दिया जाता तो इनका भी अंतिम समय आ चुका होता, लेकिन सरोकारों को साथ लेकर भी ये पत्रिकाएं प्रकाशकों पर बोझ नहीं हैं इसलिए कमर्शियल लिहाज से भी इनकी गणना की जा सकती है।
हंस और कथादेश जैसी कई पत्रिकाएं आधुनिक दौर की खांटी साहित्यिक पत्रिकाओं में शुमार हैं जिनमें न सिर्फ प्रतिष्ठित लेखकों, साहित्यकारों की रचनाएं पढ़ने को मिलती रही हैं, बल्कि, नए और उभरते लेखकों को भी बढ़ने का भरपूर अवसर मिला। ऐसी पत्रिकाओं में सारिका की किन्हीं परिस्थितियों में अकाल मृत्यु भले ही हो गई, लेकिन हंस को पुनर्जीवित करने का काम मशहूर साहित्यकार राजेंद्र यादव ने किया और अपने पूरे जीवनकाल में करीब 27 वर्षों तक वे इस पत्रिका को शानदार तरीके से चलाते रहे। 1930 में वाराणसी से मुंशी प्रेमचंद की ओर से शुरु की गई हंस पत्रिका का प्रकाशन मुंशी प्रेमचंद की मृत्यु के बाद काफी समय बंद रहा। 1986 से फिर इस पत्रिका को कथाकार राजेंद्र यादव ने मासिक रूप में निकालना शुरु किया और जीवनपर्यंत प्रकाशित करते रहे। अक्टूबर 2013 में अपने निधन तक राजेंद्र यादव हंस के प्रकाशन के लिए इतना ठोस आधार छोड़ गए कि इस नामी पत्रिका को जारी रखना कोई मुश्किल नहीं, लेकिन राजेंद्र जी के बाद का दृश्यांतरहंस को किस ओर ले जाएगा कहना मुश्किल है। निस्संदेह कहा जा सकता है कि साथी साहित्यिकों और खुद अपने माध्यम से राजेंद्र यादव हंस को बहस के एक मंच के रूप में स्थापित करने में सफल रहे। हिंदी साहित्य के कविता-कहानी से इतर स्त्री-पुरुष संबंधों, दलित विमर्श और कई सामाजिक समस्याओं से जुड़े पहलुओं पर अपने और साथी साहित्यकारों के विचार-वितान के जरिए राजेंद्र जी ने हंस के मंच पर गर्मागर्म बहसें करवाईं जिनकी वजह से वे खुद भी चर्चा में रहे और पत्रिका तो चर्चित होनी ही थी। राजेंद्र जी ने हंस का पाठक वर्ग बनाया और मेरा ऐसा मानना है कि पत्रिका को बिकाऊ बनाए रखने के लिए उन्होंने ऐसे तमाम जतन किए जिससे लोगों की दिलचस्पी उसमें बनी रहे। हिंदी साहित्य के स्तंभ के रूप में राजेंद्र जी ने न सिर्फ सम्मानित और प्रतिष्ठित साहित्यकारों को ही स्थान दिया, बल्कि नए लोगों को भी उन्होंने पत्रिका में जगह दी और उनके साहित्यिक उद्भव और विकास का सहारा बने, ऐसा कहा जाए तो अनुचित न होगा। हंस के लिए कहानियों और कविताओं के चयन को लेकर राजेंद्र जी पर यदा-कदा कुछ सवाल भी उठे, लेकिन ये उनकी अपनी सोच का मामला था, इसपर टिप्पणी की आवश्यकता नहीं। हंस से अलग होकर साहित्यकार हरिनारायण ने कथादेश नाम से पत्रिका लांच की और वो जल्द ही हंस को टक्कर देने लगी। कथादेश भी अपने नाम के अनुरूप कहानियों पर केंद्रित पत्रिका ही रही है, लेकिन इसमें भी मुद्दों पर बहस को पर्याप्त जगह दी जाती रही है। सारिका की कमी पूरी करने में ये दोनों पत्रिकाएं काफी हद तक सफल रही हैं, खासकर उन पाठकों के लिए जो किसी धारा से न जुड़े हों। साथ ही आसानी से इन पत्रिकाओं का सुलभ होना भी आम पाठकों के लिए आकर्षक रहा है, क्योंकि पत्रिकाएं तो हिंदी में बहुत सी हैं, जिनमें कहानियां और कविताएं छपती हैं, लेकिन अपने-अपने आयाम हैं। पहल, तद्भव जैसी शुद्ध साहित्यिक पत्रिकाएं मासिक न होने और आसानी से बुक स्टॉल पर उपलब्ध न होने के कारण खास पाठक वर्ग की पत्रिकाएं होकर रह गईं। इन जैसी ढेर सारी साहित्यिक पत्रिकाएं लघु पत्रिकाओं की श्रेणी में आती हैं, अनियतकालीन तरीके से प्रकाशित होती हैं और इनका भी खास पाठक और लेखक वर्ग है, जो इनकी परंपरा को जिंदा रखे हुए है।
बात साहित्यिक पत्रिकाओं के दृश्यांतर की हो रही है, तो यहां हंस और कथादेश जैसी पत्रिकाओं के कंटेंट पर विचार जरूरी हो जाता है। जैसा कि पहले कहा जा चुका है – हंस को आगे बढ़ाने में राजेंद्र जी के अपने आभामंडल और उनके जरिए शुरु की गई बहसों का अहम योगदान माना जा सकता है। राजेंद्र जी के समकालीन साहित्यिकों में मोहन राकेश और कमलेश्वर की अपनी-अपनी दुनिया थी। नामवर सिंह का अपना क्षेत्र है। उनके समकालीन ऐसे तमाम साहित्यकार रहे हैं, जो अपनी रचनाओं के लिए चर्चित रहे, लेकिन साहित्यिकों को जैसा मंच राजेंद्र जी ने दिया, वैसा शायद किसी ने नहीं। राजेंद्र जी हंस के सब कुछ थे, तो जाहिर है, पत्रिका में जो कुछ छपता रहा, वो उनकी सहमति से ही छपता रहा। चाहे वो होना-सोना..’ हो, या फिर तथाकथित खुलेपन से भरपूर कोई कहानी, स्त्री विमर्श और महिलाओं के साथ शोषण, उनकी आजादी जैसे मुद्दों के नाम पर कहानियों में भरी तमाम ऐसी बातें, जिन्हें पारंपरिक तौर पर कोई खुलकर नहीं कहता। ये हिंदी साहित्य के यथार्थवाद का दौर है, आधुनिक साहित्य का दौर है, तमाम रूढ़ियों से हम आजाद हो चुके हैं, तो फिर कागज पर वो सब लिखने में काहे की परहेज, जो अंधेरे बंद कमरे में होता रहा है (और आज के आधुनिक दौर में तो सरेआम भी होता है)। फिल्मों में भी तमाम बंदिशों का लोप हो रहा है, तो साहित्य में क्यों न हो। मेरा ये मानना हैकि राजेंद्र जी ने अपनी विचारधारा और कारोबारी रणनीति के तहत ऐसे लेखन को मंच दिया और बढ़ावा दिया, जिसमें सभ्य सुसंस्कृत शब्दों में वो सब सामने लाया जाए, जिसे आमतौर पर समाज में खुलेआम नहीं कहा-देखा-सुना जाता हो और संपूर्ण में से एक ऐसे पाठक वर्ग की भी उन दबी हुई इच्छाओं की पूर्ति हो, जो अजंता-एलोरा-खजुराहो की मूर्ति देखकर पूरी हो सकती हैं। उसके लिए छिपाकर पढ़ी जानेवाली कोई किताब पढ़ने की जरूरत न हो, बल्कि साहित्यिक पत्रिका के आवरण में ही वो सब उपलब्ध हो, जो भारत में सेंसर बोर्ड की अनुमति के बाद दिखाई जानेवाली अंग्रेजी फिल्मों में होता है। दिवंगत राजेंद्र जी और उनके द्वारा मंच पर जगह पानेवाले तमाम लेखक-रचनाकार ऐसा मानते होंगे कि जो कुछ वो प्रकाशित करते रहे हैं या लिखते रहे हैं वो यथार्थ है, कोरी कल्पना नहीं है, लेकिन पढ़नेवाला पाठक वर्ग तो चंद लफ्जों में ही उस यथार्थ की कल्पना करके अपनी क्षुधा-पूर्ति कर सकता है। हंस ही नहीं कथादेश और दूसरी पत्रिकाओं में भी इस तरह के कथा-लेखन को जगह मिलती रही है। नवंबर 2013 से शुरु हुई पत्रिका दृश्यांतर में भी ऐसी रचना दिखी और ऐसा लगा कि संपादक महोदय राजेंद्र जी के शिष्य होने की वजह से उनकी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। जाहिर है, अगर राजेंद्र जी ने कारोबारी सोच के तहत ऐसी रचनाओं को जगह दी होगी, तो दृश्यांतर को भी हिंदी के बाजार में हिट होने में देर नहीं लगेगी। लेकिन सवाल है कि कोई लेखक अपनी इच्छा के तहत कुछ भी लिखे, प्रकाशक कुछ भी छापे, क्या सरोकारी पत्रिकाओं को भी सिर्फ इस नाम पर वो सब छापना चाहिए कि ये अमुक के शोषण, उसके साथ हुई बेरहमी की दास्तां है। अगर ये सब छापना ही है, तो उस चोले में क्यों। लेखकों का मत अलग हो सकता है- कोई अपनी आत्मकथा लिख रहा है, तो उसका कुछ हिस्सा ऐसा हो सकता है, जिसमें ऐसी कोई बात खुलेआम चित्रित की गई हो, जो पर्दे में रहनी चाहिए, या उसे दूसरे तरीके से भी कहा जा सकता है। अगर प्रस्तुति प्रेम कविता या प्रेम कहानी है, तो उसमें आपके कर्मों के उद्दाम विश्लेषण से कोई शिकायत नहीं, क्योंकि आपको आत्मानुभवों के वर्णन की पूरी छूट है। बहरहाल, मुद्दा विवादास्पद है और इसके जरिए पूरे साहित्य लेखन को लेकर बहस हो सकती है, इस नाचीज लेखक को संघी या दक्षिणपंथी करार दिया जा सकता है। लेकिन, सरसरी तौर पर देखें, ये जरूर कहा जा सकता है कि आज के दौर की साहित्यिक पत्रिकाओं का कंटेट तो किसी असाहित्यिक आम आदमी को भी साहित्यिक बनने के लिए प्रेरित कर सकता है। देखना होगा कि मीडिया के मायालोक में राजेंद्र जी के जाने के बाद साहित्यिक पत्रिकाओं का दृश्यांतरकैसा रंग लाता है।
साहित्य तो राजनीतिक और सामयिक पत्रिकाओं में भी प्रकाशित होता रहा है। गुजरे दौर में आम पाठकों के लिए साप्ताहिक हिंदुस्तान, धर्मयुग, दिनमान जैसी पत्रिकाओं में भी सामग्री मुहैया कराई जाती थी, जिस परंपरा को अब भी हिंदी इंडिया टुडे, आउटलुक हिंदी, शुक्रवार जैसी न जाने कितनी ही साप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक पत्रिकाओं ने जिंदा रखा हुआ है। लेकिन, साहित्यिक पत्रिकाओं की कविता-कहानी का साहित्यिक कंटेट जैसा है, वैसा शायद इन सामयिक पत्रिकाओं में न मिले। आम पाठकों की अभिरुचि का साहित्य, कविता, कहानी तो कादंबिनी, सरिता, मुक्ता जैसी पत्रिकाओं में भी भरपूर मात्रा में उपलब्ध रहता आया है, जिस साहित्य को शायद हिंदी साहित्य के इतिहास में कभी जगह नहीं मिली और न मिलेगी। लेकिन, कमर्शियल लिहाज से देखें तो ये पत्रिकाएं हंस और कथादेश जैसी पत्रिकाओं से कहीं आजे हैं। गंभीर पत्रिकाओं में भारतीय विद्या भवन की ओऱ से प्रकाशित नवनीत नाम की पत्रिका है, जिसमें साहित्य और मिलती-जुलती सामग्री होती है। लेकिन, शायद अधिक प्रचार-प्रसार न होने से लंबे समय से निकल रही ये पत्रिका उतनी लोकप्रिय या यूं कहें कि सुलभ नहीं है। मामला मार्केटिंग का है और कहा जाता है कि मीडिया में कंटेंटही किंगहै, तो सुधी पाठकों को साहित्यिक पत्रिकाओं के दृश्यांतर पर नज़र रखनी होगी।

गुरुवार, 14 नवंबर 2013

‘मंदिर’ बदलेगा किस्मत?



खबर है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार में देश का सबसे ऊंचा राम मंदिर बनवाने की तैयारी शुरु कर दी है। आईबीएन-खबर के मुताबिक, द्वारकापीठ के जगदगुरु स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज ने विराट रामायण मंदिर के मॉडल का अनावरण किया। इस विराट रायायण मंदिर की ऊंचाई करीब 405 फीट होगी। सियासी लोगों का मानना है कि बीजेपी से पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी द्वारा गुजरात में सरदार पटेल की ऊंची प्रतिमा बनाने के जवाब में बिहार में सबसे ऊंचे मंदिर का निर्माण किया जा रहा है। जो मोदी को नीतीश का जवाब हो सकता है द टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक, 200 एकड जमीन पर बननेवाले इस मंदिर की ऊंचाई 2 हजार 800 फीट होगी और ये पटना से करीब डेढ़ से 200 किलोमीटर दूर पूर्वी चंपारण के केसरिया में बनेगा। शायद ये मंदिर अयोध्या में राम मंदिर के मुद्दे को भी भूल जाने के लिए लोगों को बाध्य करेगा और जैसा कि आईबीएन लिखता है, गुजरात में पटेल की प्रतिमा बनवाने पर मोदी को जवाब भी हो सकता है। बीजेपी से अलग होकर सेक्यूलरछवि बनाने की कवायद में जुटे सीएम नीतीश कुमार को इस मंदिर के जरिए हिंदूजनता को भी जीतने का मौका मिल सकता है क्योंकि मंदिर के मॉडल के अनावरण के वक्त ही उन्हें शंकराचार्य का आशीर्वाद भी मिल चुका है। तो खबर सियासी तौर पर बड़े मायने रखती है, लेकिन आम चंपारणवासियों के लिए इसका क्या मतलब है?
 मुद्दे की बात  ये है कि मंदिर चाहे 405 फीट का हो, या 2800 फीट का ..सवाल ये है कि क्या बिहार, खासकर चंपारण के लोगों को इस मंदिर की कोई जरूरत है..महात्मा बुद्ध, सम्राट अशोक और महात्मा गांधी तक की विरासत सहेजकर रखनेवाले चंपारण में नीतीश कुमार की ओर से चुनावी माहौल में मंदिर की आधारशिला रखना कई अहम सवाल खड़े करता है। कहनेवाले कह सकते हैं कि इसकी योजना तो पहले से ही थी, अब जाकर इसके मॉडल का अनावरण हुआ है..ये भी अटकलें पुख्ता लगती हैं कि इस मंदिर के जरिए नीतीश की ओर से मोदी को जवाब देने की तैयारी है..मंदिर के जरिए मोदी के वोट बैंक में नीतीश सेंध लगाना चाहते हैं..वही भावनाओं की राजनीति कर रहे हैं, जो बीजेपी और मोदी करते रहे हैं..लेकिन एक आम चंपारणवासी का सवाल ये है कि इसके लिए चंपारण को ही क्यों मोहरा बनाया जा रहा है..आप नालंदा में भी ये मंदिर बनवा सकते थे, बाढ़ में भी, चाहते तो पटना के आसपास भी, जहां आप अपने धर्मानुरागी मन को ज्यादा आसानी से शांति दिला सकते थे..महात्मा बुद्ध, सम्राट अशोक और गांधी से जुड़ी इस धरती पर मंदिर-मस्जिद का क्या काम? आपके विकास के मॉडल में इस मंदिर की जगह कहां है? नीतीश बाबू, रेल मंत्री रहते हुए गांधी के नाम पर चंपारण के लिए आपने जो कुछ किया- दिल्ली से लेकर गुजरात तक के लिए सप्तक्रांति एक्सप्रेस और बापूधाम पोरबंदर एक्सप्रेस जैसी सीधी ट्रेनें चलने का ट्रैक तैयार किया- इसके लिए हर चंपारणवासी आपका शुक्रगुजार है। आप चाहते तो बुद्ध और गांधी सर्किट के नाम पर चंपारण में पर्यटन के विकास के लिए बहुत कुछ कर सकते थे, लेकिन आपकी योजनाओं में बुद्ध और गांधी से जुड़ी जगहों के विकास को कितनी जगह मिली है क्या कोई बता सकता है? विकास के नाम पर वोट बटोरने के लिए बड़ी जद्दोजहद करते हुए बिहार में स्थापित केंद्रीय विश्वविद्यालय का भी बंटवाराकिया गया और चंपारण में एक केंद्रीय विश्वविद्यालय खुलवाने की प्रक्रिया शुरु हुई, लेकिन वो प्रक्रिया जहां की तहां है, लगता है अगली सरकार आने के बाद भी चंपारण में विश्वविद्यालय शायद ही मूर्त रूप ले पाए। और बन भी जाए तो उसका सेहरा आपके साथ-साथ बीजेपी वाले भी जरूर बांधना चाहेंगे।
तो नीतीश बाबू, सवाल ये है कि बिहार के सीएम के रूप में 10 साल की पारी खेलने की तैयारी में चंपारण के लिए आपने क्या किया? आप ये जरूर कह सकते हैं कि राम मंदिर या रामायण मंदिर की 10 साल की परियोजना से लोगों को काम मिलेगा, लेकिन आप ये बखूबी जानते होंगे कि ये गरीबों को और गरीब बनाने, मजदूरों को और मजबूर बनाने की साजिश के अलावा कुछ और नहीं...ठीक उसी तरह जैसे मनरेगा और खाद्य सुरक्षा जैसी योजनाएं हैं जिनमें मजदूरी के रोजगार और मुफ्त भोजन के जरिए अकर्मण्यता का तोहफा दिया गया है। हमने ऐसी कई कहानियां सुनी हैं कि मजदूर का बेटा अफसर बन गया, लेकिन आप लोगों ने जैसी योजनाएं मजदूरों के लिए पेश की हैं, उनसे पीढ़ी दर पीढ़ी मजदूरी की मजबूरी के अलावा और क्या मिलेगा? आपकी दोस्त बनी केंद्र की कांग्रेस की सरकार बिहार को विशेष दर्जे के दबाव पर कुछ आर्थिक सहायता भले ही दे दे, लेकिन महंगाई का जो चाबुक जनता पर लगातार चलाया जा रहा है, क्या उससे आम लोगों को बचाने के लिए आपने कुछ किया? आपने तो पेट्रोल-डीज़ल के दाम बढ़ाने का न कभी विरोध किया, ना ही, अपने यहां टैक्सों में कुछ कमी करके लोगों को राहत दी।
बहरहाल, आपने दरभंगा को सॉफ्टवेयर टेक्नॉलॉजी पार्क देने का वादा किया है, जो सराहनीय है। कितना अच्छा होता, आप केसरिया की 200 एकड़ जमीन पर कुछ ऐसी विकास योजना बनाते, मंदिर के बजाय किसी मिनीया मेगाप्रोजेक्ट की आधारशिला रखते। कितना अच्छा होता, अगर आप चंपारण के विलुप्तप्राय थरुहटके विकास के लिए कुछ करते। कितना अच्छा होता, अगर आप चंपारण के गन्ना किसानों के लिए कुछ सोचते। कितना अच्छा होते, आप 15 से 25 साल पहले राज्य से हुए प्रतिभा पलायन को रिवर्स गियर में लाने के उपाय करते। लेकिन, आप तो पूरे राज्य के स्वामी हैं, चक्रवर्ती सम्राट बनने की तैयारी में हैं, तो प्राचीन भारतीय परंपरा के हिसाब से मंदिर बनवाने का पुण्य कमाने की सलाह तो आपके सलाहकारों ने जरूर दी होगी, माननीय शंकराचार्य ने भी आपकी तुलना राजाओंसे कर दी है, और पूर्व मुख्यमंत्री केबी सहाय का भी नाम आपके साथ लिया है जिनके लिए ये नारा भी प्रचलित हो चला था- गली-गली में शोर है, केबी सहाय चोर है। तो निहितार्थ और नतीजे जो भी हों, मंदिर के बहाने आपको आपकी सियासत चमकाने का मौका जरूर मिल रहा है..भले ही गरीब और गरीब होते जाएं..मजदूरों की मजबूरी कभी खत्म न हो..लेकिन आपका ये दांव कितना सटीक बैठेगा, ये अभी नहीं कहा जा सकता..आपके पास अभी मौके और भी हैं, जिस 350 करोड़ या 500 के बजट से आप मंदिर बनवानेवाले हैं, उससे आम लोगों का कुछ कल्याण कर सकें तो जनता आपको वोट भी देगी, और दुआ भी ( इस बजट का आधा हिस्सा तो जेबों में जाएगा, इतना सभी मानते हैं, बाकी आधा भी सही तरीके से इस्तेमाल हो तो चंपारण के विकास के लिए पर्याप्त होगा..)

बुधवार, 28 अगस्त 2013

बदल रहा है जेएनयू!

Pillers of beauty demolished!

दोस्तो,  आपको याद है ये जगह ? ये वो जगह है, जहां आपने न जाने कितने सपने बुने होंगे, ये वो जगह है, जहां तैयार हुई होगी आपकी जिंदगी की रूपरेखा..ये जेएनयू का स्कूल कॉम्प्लेक्स है, स्कूल ऑफ लैंग्वेजेज़ और एसआईएस के सामने का हिस्सा..यहां कुछ दिनों पहले तक खंबे हुआ करते थे और उन खंबों पर झूलती थीं फूलों की लताएं..लेकिन अब वो सब नहीं है यहां, उन खूबसूरत खंबों को गिरा दिया गया है, शायद उनकी जगह खुला आसमान रहे, या फिर कोई और स्ट्रक्चर खड़ा किया जाए..कुछ लोगों का कहना है कि खंबे पुराने पड़ चुके थे, जर्जर होकर ढह रहे थे, इसलिए उन्हें गिराया गया..तो कुछ लोग ऐसा भी मानते हैं कि
 यूनिवर्सिटी के पास बहुत ज्यादा पैसा होगा, जिसका कुछ न कुछ इस्तेमाल करने की जुगत में इन खंबों को गिराया गया होगा..बहरहाल इस पूरी कवायद के पीछे वजहें जो भी हों, लेकिन एक खूबसूरत संरचना अब इतिहास के गर्त में जरूर चली गई है..कुछ दोस्तों के पास अगर जेएनयू की पुरानी तस्वीरें होंगी, तो वो उन खूबसूरत स्तंभों और उन पर झूलती लताओं को याद कर सकते हैं, जिनके सहारे उन्होंने कैंपस में अपने दिन गुजारे होंगे...अपने जीवन की तैयारी की होगी, तेज़ धूप के दौरान उनकी छांव में कुछ पल बैठे होंगे, या रात के पिछले पहर में भी यहां इन टूटी हुई सीढ़िय़ों से सटे खंबों के सहारे बैठकर बिताए होंगे कुछ यादगार पल...स्कूल ऑफ लैंग्वेजेज से लेकर स्कूल ऑफ
 एनवायरनमेंटल साइंस तक जाने का पूरा रास्ता खंबों पर बने ढांचे पर झूलती फूलों की लताओं से आच्छादित हुआ करता था..जो अब नहीं है..बारिश के दौरान बूंदों से बचने की ये राह थी, जिसकी कमी जरूर खलेगी..कड़ी धूप में भी छात्र-छात्राओं को इस राह पर तरावट का एहसास होता था...और भी तमाम यादें बहुत से दोस्तों के पास होंगी..लेकिन वो अब इतिहास हैं...शायद जेएनयू प्रशासन के पास आनेवाली पीढ़ियों के लिए कुछ नया करने, नए रंग-रूप वाले नए ढांचे में कुछ नया कर दिखाने की योजना होगी..लेकिन जेएनयू में जिंदगी के एक दशक या उससे ज्यादा बिता चुके लोगों के लिए इस राह पर हुआ बदलाव एक ऐसा एहसास है..जिसके बगैर वो कैंपस को अधूरा ही मानेंगे..... कहने को बहुत कुछ है...लिखने को काफी कुछ है...शेष रह जाएंगी सिर्फ यादें...जो कैंपस में
आनेवाला हर शख्स अपने साथ लेकर जाता है...

26.08.2013 दोपहर 2 बजे, जेएनयू कैंपस