मंगलवार, 12 नवंबर 2024

आज से नयी श्रृंखला - १२ नवंबर


लोक सेवा प्रसारण दिवस
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#PublicServiceBroadcastingDay
वर्ष 1947 में आज ही के दिन राष्‍ट्रपिता महात्‍मा गांधी नयी दिल्ली में आकाशवाणी के स्‍टुडियो पहुंचे थे। इसकी स्‍मृति में हर वर्ष 12 नवम्‍बर को यह दिवस मनाया जाता है । राष्ट्रपिता की इस ऐतिहासिक यात्रा के 50 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में 12 नवंबर 1997 को दोपहर 3 बजे आकाशवाणी परिसर में एक समारोह आयोजित किया गया। बाद में वर्ष 2001 में इस दिन को आधिकारिक तौर पर लोक सेवा प्रसारण दिवस के रूप में घोषित किया गया। 
दरअसल १२ नवंबर १९४७ को महात्मा गांधी को कुरुक्षेत्र जाकर वहां ठहरे ढाई लाख शरणार्थियों को संबोधित करना था। लेकिन किसी कारणवश वे वहां नहीं पहुंच सके तो आकाशवाणी भवन के स्टूडियो से उनके संबोधन की व्यवस्था की गई। इसीलिए महात्मा गांधी उस दिन ३ बजे विशेष प्रसारण के लिए आकाशवाणी भवन पहुंचे थे। इसी की याद में १२ नवंबर को लोक सेवा प्रसारण दिवस घोषित किया गया।

विश्व निमोनिया दिवस
#WorldPneumoniaDay
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श्वास संबंधी बीमारी निमोनिया के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए हर साल 12 नवंबर को 'विश्व निमोनिया दिवस' मनाया जाता है। निमोनिया दिवस पहली बार 2009 में ग्लोबल कोएलिशन अगेंस्ट चाइल्ड न्यूमोनिया (Global Coalition against Child Pneumonia) की ओर से मनाया गया था। तब से हर साल विश्व निमोनिया दिवस 12 नवंबर को एक खास थीम के साथ मनाया जाता रहा है, ताकि वैश्विक स्तर पर लोगों को इस बीमारी के प्रति जागरूक किया जा सके।स्टॉप निमोनिया संगठन के एक अनुमान के अनुसार, 2009 में निमोनिया के कारण लगभग 2.5 मिलियन लोगों की मृत्यु हुई, जिनमें 6,72,000 बच्चे शामिल थे। २००९ में इस दिन लगभग 100 संगठन निमोनिया के साथ-साथ अन्य रोकथाम योग्य बीमारियों के कारण बाल मृत्यु को कम करने के मिशन के समर्थन में आगे आए। निमोनिया दिवस का लक्ष्य 2030 तक निमोनिया का उन्मूलन  करना है। 

पक्षी विज्ञानी डॉ सालिम अली का जन्मदिन 
#NationalBirdDay
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12 नवंबर को प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी सलीम अली का जन्मदिन भी मनाया जाता है। यह पक्षियों के संरक्षण और उनके बारे में जागरूकता फैलाने का एक खास अवसर है। सालिम अली बर्डमैन ऑफ इंडिया के नाम से भी जाने जाते हैं। इसलिए उनके जन्मदिन को राष्ट्रीय पक्षी दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। हालांकि अमेरिका में राष्ट्रीय पक्षी दिवस ५ जनवरी को और विश्व प्रवासी पक्षी दिवस हर साल मई में मनाया जाता है। अक्टूबर में भी पक्षी दिवस मनाने की परंपरा है।



सोमवार, 11 नवंबर 2024

भारत की बल्ले-बल्ले!


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अमेरिका में ट्रंप राज आने के बाद भारत को कितना फायदा होगा और कितना नुक़सान इसका हिसाब-किताब होने लगा है। ट्रंप की नीतियों की वजह से यह विचार करना फिलवक्त लाजिमी ही है कि आने वाले समय में अमेरिका के साथ भारत के संबंध कितने सहज रहेंगे। लेकिन गहराई से गौर करें तो ऐसा लगता है कि भारत के साथ रिश्तों को लेकर ट्रंप प्रशासन को बहुत टेढ़ा रुख अपनाने के बजाय संजीदगी से चलना होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि ट्रंप अपने राष्ट्रीय हितों के मामले में पीछे हटने वाले नहीं हैं तो भारत के पीएम मोदी भी कम नकाहीं हैं।  मोदी का लोहा तो ट्रंप अपने पिछले कार्यकाल में ही मान चुके थे और उन्हें "Very though negotiator" करार दे चुके थे क्योंकि ट्रंप के लिए अमेरिका फर्स्ट की सोच अहम है तो मोदी भी राष्ट्र प्रथम की नीति को सबसे ज्यादा अहमियत देते हैं। राजनीति में आने से पहले ट्रंप मंजे हुए कारोबारी रहे हैं तो मोदी की रगों में भी गुजराती रक्त बहता है जिसके कतरे-कतरे में कारोबार है। लिहाजा इसमें कोई शक नहीं कि ट्रंप को साधने में मोदी को कोई दिक्कत नहीं होगी। और ट्रंप मोदी से दोस्ती का भी दम भरते हैं तो देखना ये भी होगा कि अपने दूसरे कार्यकाल में ट्रंप को भारत के प्रति कितने उदार रह पाते हैं।
हालांकि, गौर करने वाली बात यह भी है कि पीएम मोदी के दस वर्षों के कार्यकाल में भारत के विदेश संबंध हर तरह से मजबूत हुए हैं और हकीकत यह है कि भारत अब किसी भी मामले में केवल अमेरिका या चीन पर निर्भर नहीं रहा बल्कि अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए दूसरे विकल्प भी तलाश लिये हैं। रक्षा और ऊर्जा के क्षेत्र में रूस का सहयोग भारत को मिल ही रहा है, जो अमेरिका को अब तक फूटी आंखों नहीं सुहाता रहा है। फ्रांस और स्पेन के साथ भी भारत का रक्षा सहयोग बढ़ा है। वहीं, भारतीय मैनपावर को रोजगार और शिक्षा के मामले में अगर कनाडा के बाद अमेरिका से भी रेड सिग्नल मिलता है तो जर्मनी और यूरोप के दूसरे देश भारतीयों के लिए पलक-पांवड़े बिछाए हुए हैं। जर्मनी पिछले दिनों हर साल ९० हजार भारतीयों के लिए वर्क वीज़ा देने का एलान कर ही चुका है। तो कई मामलों में ऑस्ट्रेलिया और जापान भी भारत के अच्छे मददगार हैं। 
ऐसे में भारत को विदेशी सहयोग का दायरा बढ़ा ही है जबकि एशिया में चीन से लोहा लेने के लिए भारत को साथ लेकर चलना अमेरिका की मजबूरी रहेगी। 
तो अमेरिका फर्स्ट का राग अलापने वाले ट्रंप को भारत के साथ रिश्तों के मामले में लचीलापन अपनाना ही होगा , इसके अलावा उनके समक्ष कोई और चारा भी नहीं है। तो ट्रंप के आने से भारत को फायदा ही होगा, बल्ले-बल्ले ही रहेगी।
© कुमार कौस्तुभ 

बुधवार, 6 नवंबर 2024

कमला की लुटिया ले डूबी बाइडेन की बरजोरी


#KamlaHarris #Trump #USElections #Biden
अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव 2024 में डेमोक्रेट उम्मीदवार कमला हैरिस को भले ही हार का सामना करना पड़ा लेकिन जितनी कड़ी टक्कर उन्होंने रिपब्लिकन उम्मीदवार डॉनल्ड ट्रंप को दी उसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता। यह भी माना जाना चाहिए कि यदि कमला हैरिस को समय से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया गया होता तो वे ट्रंप को हरा भी सकती थीं। इसमें कहीं न कहीं निवर्तमान होने जा रहे राष्ट्रपति जो बाइडेन की महत्वाकांक्षा जरूर आड़े आई। 81 वर्ष के बाइडेन को यह समझने में बहुत देर लग गई कि उनकी उम्र और सेहत अब उनके लिए इस पद के माकूल नहीं है और इसका खामियाजा सीधे सीधे उपराष्ट्रपति कमला हैरिस को भुगतना पड़ा जिन्हें बहुत देर से डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से उम्मीदवार घोषित किया गया। तब तक बाइडेन पर हमलावर ट्रंप कहीं न कहीं लीड ले चुके थे। लिहाजा कमला हैरिस को ट्रंप के आक्रामक चुनाव प्रचार की चुनौती से निपटने के लिए अपेक्षाकृत बहुत ही कम समय मिला। वहीं कमला हैरिस के मैदान में आने के बाद ट्रंप उनकी छवि पर भी वार करने से नहीं चूके जो स्वाभाविक ही था। कुल मिलाकर हालात कमला के पक्ष में बनने से रह गये और अमेरिका एक बार फिर इतिहास रचने से चूकी गया। कमला हैरिस अगर जीत गयी होती तो वे न केवल अमेरिका की पहली महिला राष्ट्रपति होतीं बल्कि अमेरिका में इस सर्वोच्च पद पर पहुंचने वाली पहली भारतवंशी भी होतीं। लेकिन, बाइडेन की बरजोरी के कारण अमेरिका में नया इतिहास बनने से रह गया। © कुमार कौस्तुभ 

गुरुवार, 31 अक्टूबर 2024

ग्लोबल होती दिवाली

#Diwali #Deepawali #FestivalofLights #Global #US #UK
#दिवाली भारतीयों का पर्व है और दुनिया भर में रह रहे भारतीय चाहे जहां भी हों, बड़े उत्साह और उमंग से इसे मनाते हैं। दुनिया के विभिन्न देशों में भारतीय दूतावासों में भी दिवाली का आयोजन होता है जो स्वाभाविक है। लेकिन दूसरे देशों में सरकारी स्तर पर दिवाली से जुड़े उत्सव का आयोजन इसके प्रति दुनिया में बढ़ते रुझान को प्रकट करता है। इसका बड़ा कारण तमाम देशों में भारतीयों और भारतवंशियों की बढ़ी हैसियत ही है। अमेरिका में हिंदू मंदिरों में और भारतवंशियों के संगठन जगह जगह दिवाली से जुड़े कार्यक्रम किए जाते हैं तो पिछले कई वर्षों से अमेरिका के राष्ट्रपति निवास व्हाइट हाउस में भी धूमधाम से दिवाली समारोह का आयोजन हो रहा है। अमेरिका के न्यूयॉर्क में इस बार वर्ल्ड ट्रेड सेंटर को दिवाली की प्रतीकात्मक लाइटिंग से रोशन किया गया तो साथ ही साथ वहां के प्रशासन ने पहली बार स्कूलों में दिवाली की छुट्टी की घोषणा की। इधर नई दिल्ली में भारत में अमेरिका के राजदूत एरिक गार्सेटी भी दूतावास में दिवाली उत्सव में बड़े उत्साह से शामिल हुए।
वहीं ब्रिटिश राजधानी लंदन में भी दिवाली मेले का आयोजन किया गया। तो दिवाली के प्रति सरकारी रुझान भी दिखा। प्रख्यात साहित्यकार तेजेन्द्र शर्मा ने लंदन से फेसबुक पर सूचना दी - "मित्रो, आज पहली बार हमारी Overground Railways ने यात्रियों को दीपावली की शुभकामनाएं दीं और मिठाई भेंट की।हम भारतवंशियों के लिए गर्व का पल है।" 
ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, यूरोप के अन्य देशों और पश्चिम एशिया और खाड़ी देशों में भी अच्छी भारतीय आबादी होने के कारण दिवाली उत्सव मनाने की खबरें आती हैं जबकि फ़िजी, मॉरिशस, ट्रिनिडाड टोबैगो जैसे देशों में भारतीय गिरमिटिया आबादी के कारण दिवाली तो वहां की परंपरा का हिस्सा है।
भारत के अलावा और भी देशों में दिवाली जैसे दीपों और रोशनी के त्योहार मनाए जाते हैं, जिनके नाम अलग हो सकते हैं और टाइमिंग अलग हो सकती है। 
लेकिन जब भारत में दीपावली मनाई जाती है तब दूसरे देशों में भी भारतीय समुदाय अपनी सांस्कृतिक परंपरा जारी रखते हुए इसे मनाते हैं। परन्तु, अब यह त्योहार केवल भारतीय समुदाय तक सीमित नहीं रहा है बल्कि विभिन्न देशों की सरकारें और प्रशासन भी इसमें रुचि ले रहे हैं क्योंकि उनके यहां रह रहे, कामकाज कर रहे और उनकी समृद्धि में योगदान दे रहे भारतीय लोग भी आखिर उनका अभिन्न अंग बन चुके हैं। एक और खास बात यह भी है कि दुनिया में भारत की साख बढ़ी है, सम्मान बढ़ा है। इसीलिए विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्ष दिवाली और होली पर भारतीय लोगों और भारतीय राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री को संबोधित करके ऐसे पर्व-त्योहार पर बधाई और शुभकामनाएं देने में पीछे नहीं रहते। यह सुखद स्थिति है जो दुनिया में भारत और भारतीयों के बढ़ते असर को इंगित करती है। © कुमार कौस्तुभ 

बुधवार, 23 अक्टूबर 2024

५ साल बाद औपचारिक मुलाकात, क्या बनेगी बिगड़ी बात?

भारत-चीन के आपसी रिश्तों के लिहाज से २३ अक्टूबर २०२४ की तारीख तवारीख में दर्ज हो गयी है, क्योंकि इसी दिन चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की औपचारिक बैठक पांच साल के लंबे अंतराल के बाद हुई। हालांकि २०१४ से २०२३ के बीच भी भारत और चीन के तनाव के बीच दोनों नेताओं की मुलाकात अंतरराष्ट्रीय मंचों पर होती रही लेकिन २०१९ के बाद उनकी पहली द्विपक्षीय वार्ता २०२४ में ही हुई है।
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दरम्यान रूस के कजान में हुई इस बैठक की अहमियत इसलिए भी है कि इससे चंद दिनों पहले ही भारत और चीन के बीच पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास सीमा विवाद सुलझाने पर सहमति की खबरें आईं। भारतीय पक्ष ने इस बाबत बढ़ चढ़कर बयान दिए जबकि चीनी पक्ष इस पर गोलमोल बोलकर निकल गया।
 कजान में मुलाकात में पीएम मोदी ने सीमा पर शांति की आवश्यकता पर बल दिया और विवाद सुलझाने पर सहमति का जिक्र किया, लेकिन जिनपिंग केवल इतना ही बोल कर निकल गये कि दोनों देशों के बीच संवाद और सहयोग मजबूत होना चाहिए।
इससे पहले भी सीमा विवाद सुलझाने पर सहमति के मामले पर चीन ने ज्यादा कुछ नहीं कहा था और अब जिनपिंग भी इस मुद्दे पर चुप ही दिखे। 
दिलचस्प यह भी है कि जिनपिंग और मोदी की बैठक से पहले कई बार रूस के राष्ट्रपति पुतिन दोनों नेताओं के साथ दिखे जिससे यही संदेश गया है कि मोदी और जिनपिंग की बैठक रूस ने प्रायोजित की और रूस ने दोनों देशों के रिश्ते पर पड़ी बर्फ पिघलाने का प्रयास किया है। लेकिन हकीकत क्या है? अगर रूस की कोई भूमिका है भी तो क्या जिनपिंग और उनकी सरकार का भारत से संबंध सामान्य करने को लेकर रुख सकारात्मक है? ऐसा नहीं लगता। 
चीन संवाद और सहयोग की बात करता है लेकिन दोनों देशों के बीच कोर इश्यू पर बोलने से कतराता है। ऐसा लगता है जो भारत का कोर इश्यू है उसे चीन कोई मुद्दा मानता ही नहीं। शायद इसीलिए भूलकर भी LAC पर कंप्लीट डिस-इनगेजमेंट की बात भी नहीं करता ताकि कभी मीडिया इस सिलसिले में चीन का हवाला न दे सके। चीन का यह रवैया तो साफ साफ यही जाहिर करता है कि उसके तेवर बदले नहीं हैं। आने वाले कुछ दिनों में तस्वीरें और साफ होंगी जिससे चीन की असली मंशा क्या है यह पता चलेगा, क्योंकि २०१९ और २०२० का घटनाक्रम बहुत पुराना नहीं है। तो आखिर क्या चाहता है चीन, यह जानने के लिए अभी और इंतजार करना होगा। एक चीनी कहावत है - To win the battle, retain the surprise, और चीन हैरान करने में माहिर है, इससे भला कौन इनकार कर सकता है। © कुमार कौस्तुभ