सोमवार, 2 नवंबर 2026

निठल्ले के नोट्स - बेटियों से जुड़ा सवाल बड़ा

### प्यारी-दुलारी बेटियां, किस्मत की मारी बेटियां : सृष्टि का आधार होने के बावजूद सम्मान की तलाश में बेटियां

प्यारी-दुलारी बेटियां, घर की रौनक बेटियां, आंगन की चिड़ियां बेटियां, पिता की आंखों का तारा और मां के हृदय का विस्तार बेटियां। कभी घर की दहलीज पर उनकी खिलखिलाहट से उत्सव का माहौल बन जाता है तो कभी उनकी विदाई पर पूरा घर आंसुओं में डूब जाता है। बेटियां सचमुच प्रकृति की सबसे सुंदर रचनाओं में से एक हैं। वे सृष्टि का आधार हैं, जीवन की निरंतरता हैं और संवेदना, स्नेह, करुणा तथा सृजनशीलता की जीवंत अभिव्यक्ति हैं। लेकिन एक विडंबना देखिए कि जिस समाज की निरंतरता में बेटियों की इतनी महत्वपूर्ण भूमिका है, उसी समाज में उन्हें अपने अस्तित्व, अस्मिता, स्वतंत्रता और सम्मान के लिए बार-बार संघर्ष करना पड़ता है। एक ओर हम देवी की पूजा करते हैं, कन्या पूजन करते हैं, नवरात्र में छोटी-छोटी बच्चियों के पैर धोकर उन्हें भोजन कराते हैं, दूसरी ओर उसी समाज में बेटियों के साथ भेदभाव, शोषण, हिंसा और अपमान की घटनाएं लगातार सामने आती हैं। आखिर यह कैसी सामाजिक मानसिकता है, जिसमें स्त्री को एक ओर देवी का दर्जा दिया जाता है और दूसरी ओर उसे मनुष्य होने का सामान्य अधिकार भी सहजता से नहीं मिल पाता?

बेटी के जन्म से ही उसके जीवन की कहानी कई बार एक अदृश्य सामाजिक संघर्ष के साथ शुरू होती है। आज भले ही शहरों में बेटी के जन्म पर मिठाइयां बांटी जाती हों और सोशल मीडिया पर बधाइयों की बाढ़ आ जाती हो, लेकिन देश के अनेक हिस्सों में आज भी बेटी का जन्म अपेक्षित प्रसन्नता नहीं ला पाता। कहीं परिवार को बेटे की चाहत होती है, कहीं वंश चलाने का तर्क दिया जाता है, कहीं बुढ़ापे का सहारा बेटा ही माना जाता है तो कहीं बेटी को भविष्य की आर्थिक जिम्मेदारी समझ लिया जाता है। विज्ञान और तकनीक ने मनुष्य को बहुत आगे पहुंचा दिया है, लेकिन दुर्भाग्य से कुछ लोगों की सोच आज भी पुत्र-मोह और पितृसत्तात्मक धारणाओं की गिरफ्त में है। कन्या भ्रूण हत्या और लिंग चयन जैसी कुप्रथाएं इसी मानसिकता की भयावह परिणति हैं। भारत में भ्रूण के लिंग की जांच और उसके आधार पर गर्भपात कराने पर कानूनी प्रतिबंध है, फिर भी सामाजिक पूर्वाग्रहों और अवैध गतिविधियों के कारण यह समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। सवाल यह है कि जब एक बेटी को जन्म लेने का अधिकार ही सुरक्षित नहीं है तो उससे जीवन में समान अवसरों की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

बेटियों के साथ भेदभाव केवल उनके जन्म तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उनके बचपन, शिक्षा, खानपान, स्वास्थ्य और व्यक्तित्व निर्माण तक उसका प्रभाव दिखाई देता है। कई परिवारों में बेटे की शिक्षा पर खुलकर खर्च किया जाता है, जबकि बेटी की पढ़ाई को विवाह तक की तैयारी के रूप में देखा जाता है। बेटे को देर तक बाहर रहने, अपनी पसंद के कपड़े पहनने, मित्र बनाने और अपनी आकांक्षाओं के अनुसार जीवन चुनने की स्वतंत्रता मिलती है, जबकि बेटी के लिए छोटी उम्र से ही मर्यादा, इज्जत, परंपरा और लोकलाज की लंबी-चौड़ी लक्ष्मण रेखाएं खींच दी जाती हैं। बेटे की शरारत को बचपना और बेटी की हंसी को चरित्र से जोड़कर देखने वाली मानसिकता आज भी मौजूद है। बेटी को सिखाया जाता है कि धीरे बोलो, संभलकर चलो, ज्यादा मत हंसो, किसी से अधिक बात मत करो और अपनी इच्छाओं को परिवार की प्रतिष्ठा के अनुसार ढाल लो। आखिर ऐसा क्यों है कि परिवार की प्रतिष्ठा का पूरा बोझ अक्सर बेटी के कंधों पर डाल दिया जाता है? क्या परिवार की इज्जत और संस्कारों की जिम्मेदारी बेटों की नहीं होती?

शिक्षा बेटियों के सशक्तीकरण का सबसे प्रभावी माध्यम है, लेकिन केवल विद्यालय में दाखिला दिला देना ही शिक्षा का उद्देश्य पूरा नहीं करता। उसे अपनी पसंद का विषय चुनने, उच्च शिक्षा प्राप्त करने, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने और अपने विवेक से जीवन के निर्णय लेने का अवसर भी मिलना चाहिए। देश में बेटियों ने विज्ञान, चिकित्सा, अंतरिक्ष, सेना, खेल, साहित्य, प्रशासन, राजनीति, उद्योग और कला के क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। कल्पना चावला से लेकर पी. वी. सिंधु, मैरी कॉम, मिताली राज और अनेक दूसरी महिलाओं ने यह प्रमाणित किया है कि प्रतिभा का कोई लिंग नहीं होता। भारतीय बेटियों ने अंतरिक्ष से लेकर ओलंपिक के मंच तक अपनी पहचान बनाई है। इसके बावजूद यह भी सच है कि इन प्रेरक उदाहरणों के पीछे लाखों ऐसी बेटियां हैं जिन्हें अपनी प्रतिभा को विकसित करने का अवसर ही नहीं मिल पाता। किसी की पढ़ाई आर्थिक तंगी के कारण छूट जाती है, किसी को घरेलू जिम्मेदारियों में उलझा दिया जाता है तो किसी के सपनों पर विवाह और सामाजिक अपेक्षाओं का पर्दा डाल दिया जाता है।

बेटियों की सुरक्षा आज भारतीय समाज की सबसे गंभीर चिंताओं में से एक है। घर हो, विद्यालय हो, कार्यस्थल हो, सार्वजनिक परिवहन हो या इंटरनेट की दुनिया, कहीं भी वे पूरी तरह निश्चिंत होकर अपने अस्तित्व का उत्सव नहीं मना पातीं। छेड़छाड़, पीछा करना, यौन उत्पीड़न, घरेलू हिंसा, दहेज प्रताड़ना, बलात्कार, बाल विवाह और मानव तस्करी जैसी समस्याएं बेटियों के जीवन को असुरक्षित बनाती हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि शोषण करने वाला हमेशा कोई अनजान व्यक्ति ही नहीं होता। कई बार वह परिचित, पड़ोसी, रिश्तेदार, शिक्षक, सहकर्मी या परिवार के विश्वास के दायरे में शामिल व्यक्ति भी हो सकता है। जिस घर को बच्चे के लिए सबसे सुरक्षित स्थान माना जाता है, वहीं कभी-कभी उसकी अस्मिता पर आघात होता है। ऐसी परिस्थितियों में पीड़िता को न्याय दिलाने के बजाय उससे ही सवाल पूछे जाते हैं। वह कहां गई थी, किसके साथ थी, उसने कैसे कपड़े पहने थे, इतनी देर तक बाहर क्यों रही थी? अपराधी के आचरण की पड़ताल करने के बजाय पीड़िता के व्यवहार की समीक्षा शुरू हो जाती है। यह कैसी न्याय व्यवस्था है, कैसी सामाजिक संवेदना है, जिसमें अन्याय सहने वाली लड़की को ही अपने निर्दोष होने का प्रमाण देना पड़ता है?

बेटियों के विरुद्ध होने वाले अपराधों का एक और दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष है सामाजिक चुप्पी। कई परिवार बदनामी के डर से घटनाओं को दबा देते हैं। कहीं समझौते का दबाव बनाया जाता है, कहीं पीड़िता को ही चुप रहने की सलाह दी जाती है और कहीं परिवार की प्रतिष्ठा को न्याय से अधिक महत्वपूर्ण मान लिया जाता है। विशेषकर बालिकाओं के यौन शोषण के मामलों में यह चुप्पी अत्यंत घातक है। बच्चों को सुरक्षित और असुरक्षित स्पर्श के बारे में उम्र के अनुरूप जानकारी देना, उन्हें बिना भय अपनी बात कहने का वातावरण देना और उनकी शिकायतों को गंभीरता से सुनना प्रत्येक परिवार तथा शैक्षणिक संस्थान की जिम्मेदारी है। भारत में बाल यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम यानी पॉक्सो कानून बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा प्रदान करता है। लेकिन कानून की मौजूदगी तभी सार्थक होगी जब समाज पीड़ित बच्चियों को दोषी मानने के बजाय उनके साथ खड़ा होना सीखेगा।

बेटियों के शोषण का एक बड़ा सामाजिक कारण दहेज प्रथा भी है। दहेज निषेध अधिनियम, 1961 के बावजूद विवाह के नाम पर लेन-देन, महंगे उपहारों की अपेक्षा और आर्थिक दबाव अनेक परिवारों में आज भी दिखाई देते हैं। बेटी के जन्म से ही कुछ माता-पिता उसकी शादी के खर्च की चिंता में जीवन भर की कमाई जोड़ने लगते हैं। बेटी की शिक्षा, स्वास्थ्य और व्यक्तित्व निर्माण के बजाय विवाह के लिए धन इकट्ठा करना उनकी प्राथमिकता बन जाता है। विवाह के बाद भी यदि अपेक्षाएं पूरी नहीं होतीं तो नवविवाहिता को मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना झेलनी पड़ सकती है। यह कैसी विडंबना है कि जिस बेटी को माता-पिता अपने स्नेह और परिश्रम से पालते-पोसते हैं, उसकी विदाई के समय भी उन्हें आर्थिक लेन-देन और सामाजिक प्रतिष्ठा की चिंता करनी पड़ती है? विवाह दो व्यक्तियों और दो परिवारों के बीच आत्मीय संबंध होना चाहिए, न कि किसी परिवार की आर्थिक हैसियत प्रदर्शित करने का अवसर।

बाल विवाह भी बेटियों के भविष्य पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न है। कम उम्र में विवाह होने से उनकी शिक्षा बाधित होती है, स्वास्थ्य प्रभावित होता है और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता विकसित होने से पहले ही उन्हें वैवाहिक तथा पारिवारिक जिम्मेदारियों में बांध दिया जाता है। भारत में बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 के अनुसार लड़की के विवाह की न्यूनतम आयु 18 वर्ष और लड़के की 21 वर्ष निर्धारित है। इसके बावजूद कई सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों में बाल विवाह की घटनाएं सामने आती हैं। गरीबी, अशिक्षा, असुरक्षा और रूढ़िवादी मान्यताएं इस समस्या को बनाए रखने में भूमिका निभाती हैं। यह समझना जरूरी है कि किसी बेटी की शादी जल्दी कर देना उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने का उपाय नहीं है। उसकी शिक्षा, आत्मनिर्भरता, स्वास्थ्य और आत्मविश्वास को मजबूत करना ही उसके सुरक्षित भविष्य की वास्तविक नींव है।

आधुनिक समय में बेटियों के शोषण का एक नया और जटिल क्षेत्र डिजिटल दुनिया भी बन गया है। इंटरनेट ने लड़कियों को ज्ञान, संवाद, अभिव्यक्ति और रोजगार के असंख्य अवसर दिए हैं, लेकिन इसी के साथ साइबर बुलिंग, ऑनलाइन उत्पीड़न, निजी तस्वीरों का दुरुपयोग, फर्जी प्रोफाइल, साइबर स्टॉकिंग और ब्लैकमेलिंग जैसी चुनौतियां भी सामने आई हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में डीपफेक और किसी की तस्वीर या आवाज का दुरुपयोग करके अश्लील अथवा भ्रामक सामग्री तैयार करना एक अतिरिक्त खतरा बन गया है। किसी लड़की की तस्वीर को उसकी सहमति के बिना प्रसारित करना केवल तकनीकी शरारत नहीं, बल्कि उसकी निजता, गरिमा और मानसिक सुरक्षा पर हमला है। ऐसे अपराधों से निपटने के लिए तकनीकी जागरूकता, प्रभावी शिकायत व्यवस्था, डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही और कठोर कानूनी कार्रवाई आवश्यक है। साथ ही बेटियों को डिजिटल दुनिया से दूर रखने के बजाय उसमें सुरक्षित और आत्मविश्वास के साथ भागीदारी करने के लिए सक्षम बनाना होगा।

यहां एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि क्या बेटियों को केवल इसलिए सम्मान दिया जाना चाहिए कि वे मां बनती हैं, परिवार संभालती हैं या किसी पुरुष के जीवन को पूर्ण करती हैं? निस्संदेह मातृत्व एक महान अनुभव है, लेकिन किसी महिला की गरिमा को केवल मातृत्व तक सीमित कर देना उसके व्यक्तित्व के साथ अन्याय है। बेटी का अपना स्वतंत्र अस्तित्व है। वह मां बने या न बने, विवाह करे या न करे, नौकरी करे या उद्यमी बने, कला में रुचि रखे या विज्ञान में, उसकी मानवीय गरिमा और अधिकार समान हैं। उसे केवल किसी की बेटी, पत्नी, बहू या मां के रूप में नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र मनुष्य के रूप में स्वीकार करना होगा। स्त्री की पहचान को रिश्तों की परिधि से बाहर निकालकर उसके व्यक्तिगत अस्तित्व और उपलब्धियों के आधार पर भी देखना होगा।

बेटियों के प्रति सामाजिक व्यवहार में एक विरोधाभास यह भी है कि हम सफल महिलाओं का सम्मान तो करते हैं, लेकिन अपने घर की बेटी को वैसी ही स्वतंत्रता देने में हिचकिचाते हैं। हमें महिला पायलट, वैज्ञानिक, खिलाड़ी, पुलिस अधिकारी और उद्यमी पर गर्व होता है, लेकिन जब अपनी बेटी किसी अलग क्षेत्र में करियर बनाने की इच्छा जताती है तो परिवार की चिंताएं जागने लगती हैं। हम चाहते हैं कि बेटियां आत्मनिर्भर बनें, लेकिन उनकी स्वतंत्रता हमारे नियंत्रण में रहे। हम चाहते हैं कि वे आत्मविश्वासी हों, लेकिन अपनी बात परिवार के निर्णयों से अलग न रखें। हम चाहते हैं कि वे दुनिया में आगे बढ़ें, लेकिन सामाजिक मान्यताओं की सीमाओं का अतिक्रमण न करें। यह दोहरा दृष्टिकोण समाप्त होना चाहिए। बेटियों को अवसर देने का अर्थ केवल उनकी सफलता पर तालियां बजाना नहीं, बल्कि उनके संघर्ष के समय उनके साथ खड़ा होना भी है।

बेटियों के प्रति सम्मान की शुरुआत घर से ही होती है। बेटे और बेटी के खानपान, शिक्षा, स्वास्थ्य, संपत्ति, स्वतंत्रता और अवसरों में भेदभाव नहीं होना चाहिए। बेटियों को बचपन से आत्मसम्मान, आत्मरक्षा, आर्थिक समझ और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनाया जाना चाहिए। लेकिन यह जिम्मेदारी केवल बेटियों की नहीं है। बेटों को भी बचपन से सहमति, समानता, संवेदनशीलता और स्त्री के प्रति सम्मान का अर्थ समझाना होगा। लड़कियों को सुरक्षित रहने की सलाह देने के साथ-साथ लड़कों को जिम्मेदार नागरिक बनाने पर भी उतना ही ध्यान देना होगा। यदि किसी समाज में बेटी को हर समय अपनी सुरक्षा की चिंता करनी पड़ती है तो समस्या केवल उसकी सुरक्षा व्यवस्था में नहीं, बल्कि उस सामाजिक मानसिकता में भी है जो उसे असुरक्षित बनाती है। महिलाओं के प्रति सम्मान किसी विशेष दिवस, अभियान या भाषण का विषय नहीं, बल्कि रोजमर्रा के व्यवहार का हिस्सा होना चाहिए।

कानून और सरकारी योजनाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे अभियान ने बालिका के अस्तित्व, शिक्षा और अधिकारों को सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनाया है। शिक्षा का अधिकार, पॉक्सो कानून, घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न रोकने संबंधी कानून और दहेज निषेध अधिनियम जैसे प्रावधान बेटियों तथा महिलाओं की सुरक्षा और गरिमा के लिए महत्वपूर्ण कानूनी आधार प्रदान करते हैं। संविधान का अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार देता है, अनुच्छेद 15 लिंग के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है और अनुच्छेद 21 जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। लेकिन किसी भी कानून की सफलता केवल उसके निर्माण से नहीं, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन, समयबद्ध न्याय, सामाजिक जागरूकता और पीड़ितों को मिलने वाले सहयोग से तय होती है। हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि बेटियों को न्याय मांगने के लिए आर्थिक, सामाजिक या पारिवारिक दबावों से न गुजरना पड़े।

बेटियों की आर्थिक स्वतंत्रता भी उनके सम्मान और सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण आधार है। जिस लड़की के पास शिक्षा, कौशल और रोजगार के अवसर हैं, उसके पास अपने जीवन के निर्णय लेने की अधिक क्षमता होती है। हालांकि आर्थिक आत्मनिर्भरता अपने आप में हर तरह के शोषण से सुरक्षा की गारंटी नहीं है, फिर भी यह निर्भरता और विवशता को कम करने में सहायक होती है। परिवारों को बेटियों को संपत्ति में समान अधिकार देने, उनके नाम से बचत और निवेश करने तथा उन्हें वित्तीय निर्णयों में भागीदार बनाने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 ने पैतृक सहदायिकी संपत्ति में बेटियों को बेटों के समान अधिकार प्रदान किए हैं। लेकिन कानूनी अधिकारों के साथ-साथ सामाजिक स्वीकार्यता भी जरूरी है। बेटी को संपत्ति में हिस्सा देने की बात आते ही यदि परिवार के रिश्ते बदलने लगें तो समझ लेना चाहिए कि समानता का दावा अभी अधूरा है।

यह भी स्वीकार करना होगा कि बेटियों की समस्याएं सभी सामाजिक और आर्थिक वर्गों में एक जैसी नहीं हैं। ग्रामीण क्षेत्रों की बेटियां शिक्षा और परिवहन की कठिनाइयों से जूझ सकती हैं, शहरी बेटियां कार्यस्थल और सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा तथा भेदभाव का सामना कर सकती हैं। गरीब परिवारों की बेटियों के सामने पोषण, स्वास्थ्य और शिक्षा की चुनौतियां अधिक गंभीर हो सकती हैं। दिव्यांग बेटियों, वंचित समुदायों की बालिकाओं और संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में रहने वाली लड़कियों के सामने अतिरिक्त बाधाएं होती हैं। इसलिए बेटी के सशक्तीकरण की कोई एक समान परिभाषा या एकमात्र समाधान नहीं हो सकता। समाज को उनकी वास्तविक परिस्थितियों को समझना होगा और उसी के अनुरूप अवसर, संसाधन तथा सुरक्षा उपलब्ध करानी होगी।

एक और बात जिस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है, वह है बेटियों के प्रति हमारे सांस्कृतिक दृष्टिकोण का दोहरापन। साहित्य, लोकगीतों, फिल्मों और लोकप्रिय संस्कृति में बेटी को कभी पराया धन कहा जाता है, कभी दूसरे घर की अमानत और कभी परिवार की इज्जत का प्रतीक। ये शब्द सुनने में आत्मीय लग सकते हैं, लेकिन इनके भीतर कई बार यह धारणा छिपी होती है कि बेटी का स्थायी घर उसका अपना नहीं, बल्कि विवाह के बाद का घर है। आखिर जन्म जिस घर में हुआ, जहां बचपन बीता, जहां उसने अपने सपने बुने, वह घर उसका अपना क्यों नहीं रह सकता? बेटी विवाह के बाद भी अपने माता-पिता की संतान रहती है। उसका अपने मायके पर उतना ही अधिकार है जितना बेटे का। उसे पराया धन कहने के बजाय परिवार का समान और स्थायी सदस्य मानने की जरूरत है।

बेटियों के सम्मान की चर्चा करते समय हमें उन माता-पिताओं को भी नहीं भूलना चाहिए जो तमाम कठिनाइयों के बावजूद अपनी बेटियों के सपनों को पंख देते हैं। वे पिता जो समाज की परवाह किए बिना बेटी को पढ़ाते हैं, वे मांएं जो अपनी सीमित आय में भी उसकी शिक्षा के लिए संघर्ष करती हैं, वे परिवार जो बेटी की पसंद और निर्णयों का सम्मान करते हैं, वास्तव में सामाजिक परिवर्तन के वाहक हैं। बेटियों की सफलता के पीछे अक्सर ऐसे अनगिनत अनाम संघर्ष होते हैं जिनका कहीं उल्लेख नहीं होता। कोई पिता अपनी बेटी को साइकिल चलाना सिखाने के लिए रोज समय निकालता है, कोई मां उसे पढ़ाने के लिए अपने आभूषण बेच देती है, कोई भाई अपनी बहन के सपनों को अपना सपना समझकर उसका साथ देता है। यही छोटे-छोटे प्रयास एक बड़े सामाजिक परिवर्तन की नींव रखते हैं।

अंततः हमें यह समझना होगा कि बेटियां किसी पर बोझ नहीं हैं, न ही उन्हें किसी की दया, कृपा या विशेष अनुग्रह की आवश्यकता है। उन्हें चाहिए समानता, सुरक्षा, अवसर, सम्मान और अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेने की स्वतंत्रता। उन्हें देवी बनाकर ऊंचे आसन पर बैठाने से अधिक जरूरी है उन्हें मनुष्य मानकर उनके अधिकारों का सम्मान करना। पूजा के समय कन्या के पैर धोने वाला समाज यदि उसी कन्या को बड़े होने पर अपनी पसंद से शिक्षा, रोजगार, विवाह और जीवनसाथी चुनने का अधिकार नहीं देता तो उसकी पूजा का अर्थ अधूरा है। किसी बेटी के जन्म पर उत्सव मनाना अच्छी बात है, लेकिन उसके पूरे जीवन को उत्सवमय बनाने के लिए समान अवसर और सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना उससे कहीं बड़ी जिम्मेदारी है।

प्यारी-दुलारी बेटियां, किस्मत की मारी बेटियां... आखिर कब तक यह संबोधन हमारी सामाजिक विडंबना का प्रतीक बना रहेगा? कब तक बेटियां अपने ही घर में बराबरी का अधिकार मांगेंगी? कब तक उनकी हंसी पर पहरे और उनके सपनों पर पाबंदियां लगाई जाती रहेंगी? कब तक किसी बेटी की अस्मिता को परिवार की इज्जत और किसी बेटे के अहंकार के तराजू पर तौला जाता रहेगा? हमें ऐसा समाज बनाना है जहां बेटी का जन्म किसी चिंता का कारण न हो, उसकी शिक्षा किसी पर एहसान न हो, उसकी स्वतंत्रता किसी की उदारता पर निर्भर न हो और उसकी सुरक्षा उसके पहनावे, समय या स्थान की शर्तों से बंधी न हो। ऐसा समाज जहां किसी पिता को अपनी बेटी की विदाई पर यह चिंता न सताए कि वह जिस दुनिया में जा रही है, वहां उसे सम्मान मिलेगा या नहीं। ऐसा समाज जहां बेटियां केवल दूसरों के घरों को रोशन करने वाली दीपशिखाएं न समझी जाएं, बल्कि अपने जीवन का प्रकाश स्वयं बन सकें। क्योंकि बेटियों का सम्मान करना केवल आधी आबादी का सम्मान करना नहीं है, बल्कि मनुष्यता, सभ्यता और भविष्य का सम्मान करना है। जिस दिन बेटियों को अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ेगा, उसी दिन हम सचमुच एक सभ्य, संवेदनशील और विकसित समाज होने का दावा कर सकेंगे।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें