शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

निठल्ले के नोट्स - फिर भी दिल है हिंदुस्तानी



फिर भी दिल है हिंदुस्तानी

जब सरहदों के पार हुआ इश्क़

भारत की राजनीति में सीमाएँ खींचने वाले भाषण खूब हुए हैं—देश, संस्कृति, धर्म, भाषा और पहचान की सीमाएँ। मगर दिल का भूगोल कुछ और होता है। उसे पासपोर्ट नहीं चाहिए, वीज़ा नहीं चाहिए और न ही वह सीमा पर लगी कंटीली तारों को पहचानता है। भारतीय राजनीति में भी ऐसे कुछ रिश्ते हुए, जहाँ भारतीय राजनेताओं का दिल भारत की भौगोलिक सीमा पार जाकर किसी विदेशी महिला के लिए धड़का। इनमें कुछ प्रेम कहानियाँ बेहद चर्चित हुईं, कुछ लगभग निजी ही रहीं और कुछ ने आगे चलकर भारतीय राजनीति के इतिहास को भी प्रभावित किया।

राजीव गांधी और सोनिया माइनो — कैंब्रिज से दिल्ली तक

इस सूची की सबसे चर्चित कहानी निस्संदेह Rajiv Gandhi और सोनिया माइनो की है। सोनिया का जन्म इटली में हुआ था और उनका मूल नाम सोनिया माइनो था। दोनों की मुलाकात इंग्लैंड के कैंब्रिज में हुई, जहाँ राजीव पढ़ रहे थे और सोनिया अंग्रेज़ी का अध्ययन कर रही थीं। भारत सरकार के पूर्व प्रधानमंत्री संबंधी आधिकारिक अभिलेख में भी दर्ज है कि राजीव गांधी की कैंब्रिज में सोनिया माइनो से मुलाकात हुई और दोनों ने 1968 में दिल्ली में विवाह किया। 

सोनिया के जीवन की यह यात्रा केवल एक प्रेम-विवाह की कहानी नहीं थी। इटली के एक छोटे से कस्बे की युवती भारत के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक परिवार में बहू बनकर आई। फिर लंबे समय तक सार्वजनिक जीवन से दूर रहीं, राजीव गांधी के साथ पारिवारिक जीवन जिया और 1991 में राजीव की हत्या के बाद वर्षों तक राजनीति से दूरी बनाए रखी। अंततः वही सोनिया गांधी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सबसे लंबे समय तक अध्यक्ष रहने वाली नेताओं में शामिल हुईं। कांग्रेस के आधिकारिक जीवन-वृत्त में भी दर्ज है कि उन्होंने राजीव से कैंब्रिज में मुलाकात की और 1968 में विवाह किया। 

इस कहानी का सबसे दिलचस्प पक्ष शायद यही है—जिस युवती ने भारत को विवाह के कारण अपनाया था, वही आगे चलकर भारतीय राजनीति की सबसे प्रभावशाली महिलाओं में एक बनी। उनका निजी प्रेम बाद में भारतीय लोकतंत्र की एक बड़ी राजनीतिक कहानी में बदल गया।


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फारूक अब्दुल्ला और मोली — कश्मीर की कहानी में ब्रिटेन का एक पन्ना

Farooq Abdullah की पत्नी मोली ब्रिटिश मूल की नर्स थीं। दोनों का विवाह 1968 में हुआ। उपलब्ध विश्वसनीय जीवनी-सामग्री और समकालीन रिपोर्टों में मोली को ब्रिटिश मूल की नर्स बताया गया है तथा इस विवाह से उनके चार बच्चे—उमर, सफिया, हिना और सारा—हुए। 

फारूक अब्दुल्ला की कहानी में एक दिलचस्प विरोधाभास है। एक ओर वह कश्मीर की राजनीति के बड़े चेहरे बने, दूसरी ओर उनके निजी जीवन का एक महत्वपूर्ण रिश्ता ब्रिटेन से आया था। फारूक चिकित्सा की पढ़ाई के बाद ब्रिटेन भी गए थे और वहीं के अनुभवों से उनका जीवन जुड़ा। लेकिन उनके और मोली के रिश्ते की निजी शुरुआत के बारे में सार्वजनिक स्रोत बहुत विस्तार से प्रमाणित विवरण नहीं देते।

इसलिए इस कहानी को रोमांटिक रंग देते समय कल्पना की गुंजाइश बहुत है, मगर तथ्य की गुंजाइश कम। इतना अवश्य कहा जा सकता है कि कश्मीर के राजनीतिक घराने में ब्रिटिश मूल की मोली का आना उस दौर के सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश में अपने आप में एक असाधारण अंतर-सांस्कृतिक विवाह था।

और इस प्रेम की सबसे खूबसूरत निरंतरता शायद उनके बेटे उमर अब्दुल्ला हैं—जिन्होंने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया।


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एस. जयशंकर और क्योको सोमेकावा — टोक्यो में मिला दूसरा जीवन

विदेश मंत्री S. Jaishankar की कहानी इन सबमें कुछ अलग है। यह उस व्यक्ति की कहानी है जिसकी पेशेवर दुनिया ही विदेशों और कूटनीति से बनी थी और जिसका निजी जीवन भी अंततः एक अंतरराष्ट्रीय रिश्ता बन गया।

जयशंकर की पहली शादी शोभा से हुई थी, जिनसे उनकी मुलाकात जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हुई थी। उनकी मृत्यु के बाद जयशंकर की मुलाकात जापानी मूल की क्योको सोमेकावा से जापान में हुई। उपलब्ध जीवनी-सामग्री के अनुसार दोनों तब मिले जब जयशंकर टोक्यो स्थित भारतीय दूतावास में कार्यरत थे। 

यहाँ एक तथ्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। जयशंकर के 2019 के चुनावी हलफनामे में उनकी पत्नी का नाम आधिकारिक रूप से Kyoko Somekawa Jaishankar दर्ज है। इसलिए उनके जापानी मूल की पत्नी होने की बात केवल मीडिया रिपोर्टों पर आधारित नहीं है।

इस कहानी में राजीव-सोनिया जैसा सार्वजनिक रोमांस नहीं मिलता। जयशंकर अपने निजी जीवन को सार्वजनिक चर्चा से काफी हद तक दूर रखते रहे हैं। लेकिन शायद यही इसकी खूबसूरती है—एक भारतीय राजनयिक, टोक्यो का शहर, दो अलग संस्कृतियाँ और पेशेवर दुनिया के बीच जन्मा निजी रिश्ता।

राजनीति में आने से पहले उनका जीवन अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में बीता; आज उनकी पत्नी क्योको के साथ उनका रिश्ता उसी वैश्विक जीवन की निजी निरंतरता जैसा दिखाई देता है।


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पवन कल्याण और अन्ना लेजनेवा — फिल्म के सेट से जीवन के मंच तक

दक्षिण भारत के अभिनेता से राजनेता बने Pawan Kalyan की कहानी में सिनेमा और राजनीति दोनों का रंग है। उनकी पत्नी अन्ना लेजनेवा रूस की मूल निवासी हैं। दोनों की मुलाकात 2011 में तेलुगु फिल्म Teen Maar की शूटिंग के दौरान हुई थी। बाद में उनका रिश्ता आगे बढ़ा और दोनों ने 30 सितंबर 2013 को विवाह किया। NDTV ने भी अन्ना को रूसी मॉडल-अभिनेत्री बताते हुए इस मुलाकात और विवाह की जानकारी दी है। 

यह प्रेम-कहानी शायद सबसे सिनेमाई है—क्योंकि शुरुआत ही फिल्म के सेट पर हुई।

कैमरा चल रहा था, संवाद बोले जा रहे थे, दृश्य फिल्माए जा रहे थे और इसी बीच दो कलाकारों के बीच निजी रिश्ता आकार लेने लगा। फर्क सिर्फ इतना था कि फिल्म की कहानी का अंत पहले से लिखा हुआ था, लेकिन उनकी अपनी कहानी का अगला अध्याय उन्हें खुद लिखना था।

2013 में विवाह के बाद यह रिश्ता निजी जीवन से निकलकर धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन का हिस्सा भी बन गया। आज पवन कल्याण राजनीति में एक प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं और उनकी पत्नी अन्ना समय-समय पर सार्वजनिक रूप से उनके राजनीतिक सफर के प्रति अपना समर्थन और भावनाएँ व्यक्त करती दिखाई देती हैं। 

यह कहानी इसलिए भी दिलचस्प है कि एक रूसी महिला और आंध्र प्रदेश की राजनीति के एक बड़े चेहरे का रिश्ता पहले सिनेमा में शुरू हुआ और फिर वास्तविक जीवन में आगे बढ़ा।


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शशि थरूर और क्रिस्टा जाइल्स — संयुक्त राष्ट्र की दुनिया में एक भारतीय प्रेम

कांग्रेस नेता और लेखक Shashi Tharoor का निजी जीवन भी अंतरराष्ट्रीय परिवेश से गहराई से जुड़ा रहा है। उनकी पहली पत्नी तिलोत्तमा मुखर्जी भारतीय मूल की थीं। इसके बाद 2007 में उन्होंने क्रिस्टा जाइल्स, जो कनाडाई राजनयिक थीं और संयुक्त राष्ट्र में कार्यरत थीं, से विवाह किया। यह विवाह लगभग तीन वर्ष चला और 2010 में समाप्त हो गया। 

यहाँ एक सावधानी बहुत जरूरी है। थरूर और क्रिस्टा के रिश्ते को लेकर मीडिया में बहुत-सी बातें लिखी गई हैं, लेकिन उनके प्रेम की शुरुआत को लेकर उतने ठोस सार्वजनिक स्रोत उपलब्ध नहीं हैं जितने राजीव-सोनिया या पवन-अन्ना के मामले में हैं। इसलिए इसे “एक शानदार प्रेम-कहानी” के रूप में गढ़ना उचित नहीं होगा।

इतना जरूर रोचक है कि थरूर का जीवन स्वयं अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दुनिया में बीता था। संयुक्त राष्ट्र में लंबे राजनयिक करियर के बाद भारतीय राजनीति में आए और उसी अंतरराष्ट्रीय परिवेश में उनका विवाह एक कनाडाई राजनयिक से हुआ।

लेकिन यह कहानी एक और दिलचस्प मोड़ लेती है—विदेशी पत्नी के साथ यह विवाह समाप्त हुआ और बाद में उन्होंने भारतीय मूल की सुनंदा पुष्कर से विवाह किया। अतः थरूर का प्रसंग “विदेशी से विवाह” के साथ-साथ उनके बहुस्तरीय निजी जीवन का भी हिस्सा है। 


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पाँच प्रेम-कहानियाँ, पाँच अलग रंग

इन पाँच उदाहरणों को एक साथ रखिए तो भारतीय राजनीति का निजी संसार भी भारत की तरह ही बहुरंगी दिखाई देता है।

राजीव गांधी–सोनिया में कैंब्रिज से दिल्ली और फिर भारतीय राजनीति तक की यात्रा है।
फारूक अब्दुल्ला–मोली में कश्मीर और ब्रिटेन का सांस्कृतिक मिलन है।
एस. जयशंकर–क्योको में कूटनीति के बीच जन्मा एक निजी रिश्ता है।
पवन कल्याण–अन्ना में सिनेमा के पर्दे से वास्तविक जीवन तक पहुँचती कहानी है।
और शशि थरूर–क्रिस्टा में संयुक्त राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय दुनिया के बीच बना विवाह है।

इन कहानियों में एक बात समान है—राजनीति ने इन रिश्तों को जन्म नहीं दिया था; लेकिन बाद में राजनीति ने इनके अर्थ जरूर बदल दिए।

सोनिया के लिए प्रेम भारत आने का रास्ता बना और बाद में राजनीति उनका सार्वजनिक जीवन बनी। फारूक अब्दुल्ला के लिए निजी जीवन कश्मीर की राजनीति से अलग रहा, मगर परिवार स्वयं राजनीतिक विरासत का हिस्सा बन गया। जयशंकर के मामले में कूटनीति और निजी जीवन की अंतरराष्ट्रीयता एक-दूसरे के समानांतर चलती रही। पवन कल्याण की प्रेम-कहानी सिनेमा से शुरू हुई और राजनीति तक पहुँची। थरूर की कहानी में तो अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, विवाह और भारतीय राजनीति तीनों एक ही जीवन-यात्रा में दिखाई देते हैं।

और शायद यही इस पूरे प्रसंग का सबसे सुंदर निष्कर्ष है—

देश सीमाओं से बनते हैं, लेकिन रिश्ते सीमाओं से नहीं।

पासपोर्ट किसी व्यक्ति की नागरिकता बता सकता है,
लेकिन यह नहीं बता सकता कि उसका दिल कहाँ बसेगा।

इसीलिए इन कहानियों के लिए एक पंक्ति बिल्कुल स्वाभाविक लगती है—

“फिर भी दिल है हिंदुस्तानी।”


निठल्ले के नोट्स - टोपी छोटी मतलब बड़े

टोपी : सिर पर रखी एक छोटी-सी दुनिया

आदमी ने टोपी कब पहनी होगी? यह सवाल जितना सीधा है, उसका जवाब उतना ही धुंधला। शायद किसी तपती दोपहर में किसी ने पेड़ की छाल, पत्ते या कपड़े का टुकड़ा सिर पर रख लिया होगा। शायद किसी ठंडी रात में किसी ने ऊन को सिर के चारों ओर लपेट लिया होगा। हो सकता है, बारिश से बचने के लिए किसी ने सिर पर कुछ रख लिया हो। शुरुआत में टोपी शायद सिर्फ जरूरत रही होगी—धूप, धूल, ठंड और बारिश से बचने की एक मामूली तरकीब। मगर मनुष्य केवल जरूरतों से नहीं जीता; वह चीजों को अर्थ भी देता है। इसीलिए धीरे-धीरे सिर पर रखी जाने वाली वह छोटी-सी चीज कपड़े से पहचान बनी, पहचान से प्रतिष्ठा बनी, प्रतिष्ठा से परंपरा और परंपरा से राजनीति तक पहुंच गई।

टोपी की यही तो खूबी है—वह सिर पर बैठती है, मगर उसका अर्थ सिर से बहुत आगे तक जाता है।

मनुष्य के शरीर में सिर का अपना ही सामाजिक रुतबा है। बुद्धि वहीं रहती है, विचार वहीं जन्म लेते हैं और सम्मान भी अक्सर उसी से जोड़ा जाता है। इसीलिए सिर पर रखा गया मुकुट सत्ता का प्रतीक बनता है, पगड़ी आन-बान-शान की, धार्मिक सिरोपाव आस्था की और टोपी कभी पहचान, कभी पद, कभी फैशन और कभी विचार की। आदमी के कपड़े उसके बारे में बहुत कुछ बताते हैं, लेकिन कई बार उसके सिर की पोशाक उससे भी ज्यादा बोलती है।

भारत में सिर की पोशाकों की दुनिया इतनी विराट है कि उसे केवल ‘टोपी’ कह देना भी शायद उसके साथ अन्याय होगा। कहीं पगड़ी है, कहीं साफा, कहीं फेंटा, कहीं फेटा, कहीं पगड़ी का धार्मिक रूप और कहीं छोटी-सी टोपी। राजस्थान की रंगीन पगड़ी में रेगिस्तान का सूरज और वहां की आन दिखाई देती है; हिमाचली टोपी में पहाड़ों की संस्कृति; कश्मीरी टोपी में घाटी की ठंड और लोकस्मृति; मुस्लिम समाज की अलग-अलग टोपियों में धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा; और गांधी टोपी में एक पूरे स्वतंत्रता आंदोलन की राजनीतिक स्मृति।

दुनिया भी सिर को खाली छोड़ने के पक्ष में कभी नहीं रही। मौसम और भूगोल बदलते गए तो टोपियों के आकार भी बदलते गए। यूरोप में टॉप हैट, बॉलर, ट्रिल्बी और फेडोरा जैसे रूप सामने आए; फ्रांस की बेरेट ने अपनी अलग पहचान बनाई; तुर्की की फ़ेज़ इतिहास और राजनीति से जुड़ी; रूस की उशांका ने बर्फीली ठंड के सामने कानों तक सुरक्षा पहुंचाई; अमेरिका की काउबॉय हैट ने पश्चिमी जीवन की छवि रची; मेक्सिको का सोमब्रेरो अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान बना गया। कहीं पुआल की टोपी, कहीं ऊन की, कहीं चमड़े की, कहीं रेशम की और कहीं धातु तक की सिर-पोशाकें बनीं।

टोपियों की कोई एक निश्चित संख्या नहीं है। दुनिया की सभ्यताओं, क्षेत्रों, पेशों, धर्मों और फैशन की परंपराओं को देखें तो उनके प्रकार सैकड़ों में पहुंचते हैं। फेडोरा, ट्रिल्बी, बॉलर, टॉप हैट, बेरेट, क्लोश, बीनी, बकेट हैट, बेसबॉल कैप, पनामा हैट, सोमब्रेरो, काउबॉय हैट, उशांका, फ़ेज़, सन हैट, पिथ हेलमेट, शेफ की टोपी, सैनिकों की कैप और स्नातक समारोह की चौकोर कैप—हर टोपी के पीछे एक अलग कहानी है।

टॉप हैट कभी पश्चिमी समाज के संभ्रांत पुरुष की पहचान थी। बॉलर ने ब्रिटिश जीवन में औपचारिकता और व्यवहारिकता का मेल किया। फेडोरा और ट्रिल्बी ने बाद में फैशन की दुनिया में जगह बनाई। बेरेट फ्रांसीसी सांस्कृतिक छवि का हिस्सा बनी। काउबॉय हैट ने अमेरिकी पश्चिम को एक सिर दे दिया। सोमब्रेरो ने मेक्सिको की लोक-स्मृति को आकार दिया। उशांका ने रूस की सर्दी को अपने भीतर समेट लिया। बीनी ने ठंड से बचते-बचाते आधुनिक फैशन में प्रवेश कर लिया। बेसबॉल कैप तो खेल के मैदान से निकलकर दुनिया के हर शहर की सड़क पर पहुंच गई।

कुछ टोपियां सिर ढकती हैं, कुछ पद बताती हैं, कुछ पेशा। शेफ की ऊंची टोपी देखकर रसोई का उस्ताद पहचान में आ जाता है; सैनिक की कैप अनुशासन और पद का संकेत देती है; स्नातक की चौकोर टोपी शिक्षा के एक पड़ाव की घोषणा करती है। जादूगर की लंबी टोपी सिर को कम और रहस्य को अधिक ढकती है। बच्चों की जन्मदिन वाली नुकीली टोपी खुशी का ऐलान करती है। क्रिसमस की लाल टोपी त्योहार को सिर पर रख देती है।

धर्म ने भी सिर को खाली नहीं छोड़ा। अनेक धार्मिक परंपराओं में सिर ढकना सम्मान, विनम्रता, अनुशासन या आस्था का संकेत रहा है। यहूदी परंपरा की किप्पा, मुस्लिम समाज में प्रचलित विभिन्न प्रकार की टोपियां और सिखों की दस्तार इस बात की याद दिलाती हैं कि सिर की पोशाक केवल फैशन नहीं, विश्वास की भाषा भी हो सकती है। हालांकि किसी समुदाय की हर सिर-पोशाक को हर व्यक्ति के लिए अनिवार्य धार्मिक नियम मान लेना उचित नहीं होगा; धार्मिक परंपराएं भी समय, क्षेत्र और संप्रदाय के साथ बदलती रही हैं।

लेकिन टोपी की कहानी में सबसे बड़ा मोड़ तब आता है जब वह धर्म से राजनीति में प्रवेश करती है।

भारत में गांधी टोपी इसका सबसे शानदार उदाहरण है। सफेद खादी की साधारण-सी टोपी ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में असाधारण अर्थ अर्जित किया। वह सिर ढकने वाली वस्तु भर नहीं रही; वह स्वदेशी, खादी, आत्मनिर्भरता और औपनिवेशिक सत्ता के विरोध की दृश्य पहचान बन गई। महात्मा गांधी के विचारों और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़कर गांधी टोपी ने भारतीय राजनीति में अपनी जगह बनाई। आजादी के बाद जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री और मोरारजी देसाई जैसे नेताओं की सार्वजनिक छवि में सफेद टोपी दिखाई देती रही।

टोपी की राजनीति यहीं समाप्त नहीं हुई। समय बदला, राजनीतिक दल बदले, नारों की भाषा बदली और टोपी भी बदलती गई। अन्ना आंदोलन के दौर में फिर सफेद टोपी दिखाई दी और उस पर ‘मैं अन्ना हूं’ जैसे शब्दों ने उसे आंदोलन की पहचान बना दिया। बाद में आम आदमी पार्टी के राजनीतिक उभार के साथ टोपी ने एक नया रंग और नया नारा ग्रहण किया। पुरानी वस्तु थी, मगर अर्थ नया था। यही तो राजनीति की खूबी है—वह पुराने प्रतीकों को भी नए अर्थ पहना देती है।

दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी टोपी राजनीति की भाषा बोलती रही है। फ्रांसीसी क्रांति की ‘लिबर्टी कैप’ स्वतंत्रता और क्रांतिकारी चेतना का प्रतीक बनी। तुर्की की फ़ेज़ ने ऑटोमन साम्राज्य के दौर में धार्मिक, सामाजिक और प्रशासनिक अर्थ ग्रहण किए। यानी टोपी कई बार सिर पर नहीं, सीधे इतिहास के पन्ने पर रखी गई।

और पश्चिमी समाज में टोपी का एक अलग ही संसार रहा—प्रतिष्ठा और शिष्टाचार का संसार। कभी किसी सज्जन के सिर पर टॉप हैट होना उसकी सामाजिक हैसियत का संकेत था। टोपी उतारकर अभिवादन करना सम्मान का तरीका था। टोपी को हल्का-सा झुकाना भी एक सामाजिक भाषा थी। आज हम हाथ मिलाते हैं, सिर हिलाते हैं या मुस्कराते हैं; कभी टोपी भी यही सब कहती थी।

मगर टोपी की सबसे रोचक यात्रा इतिहास की किताबों में नहीं, भाषा में हुई।

हिंदी-उर्दू की बोलचाल ने टोपी को सिर से उठाकर मुहावरे में रख दिया। ‘टोपी पहनाना’ अब किसी के सिर पर कपड़े की टोपी रखने की क्रिया नहीं है। इसका अर्थ है—किसी को छलना, धोखा देना, बातों में उलझाकर बेवकूफ बना देना। क्या शानदार लोकबुद्धि है! धोखा देने के लिए भी टोपी ही चुनी गई। मानो किसी की समझ पर टोपी रख दी गई हो।

सामने वाला सोचता रहा कि उसके साथ बहुत अच्छा हुआ और इधर दूसरा व्यक्ति चुपचाप मुस्कराता रहा। सिर पर टोपी थी, मगर असल में ढका हुआ था विवेक। इसीलिए ‘टोपी पहनाना’ केवल छल का मुहावरा नहीं, लोकभाषा का एक बेहद चुटीला मनोवैज्ञानिक चित्र भी है।

इसी टोपी की दुनिया में एक और लोकप्रिय अभिव्यक्ति आती है—‘इसकी टोपी उसके सिर, उसकी टोपी इसके सिर।’ यह वाक्यांश लोकभाषा और लोकप्रिय संस्कृति में खूब प्रचलित रहा है। इसका मजा इसी उलटफेर में है—टोपी अपनी जगह पर नहीं, दूसरे के सिर पर है। जिम्मेदारी अपनी नहीं, दूसरे की; दोष अपना नहीं, किसी और का; फायदा अपना और हिसाब दूसरे का। यानी टोपी बदलते-बदलते कहानी भी बदल गई।

हिंदी सिनेमा ने भी इस वाक्यांश को खूब लोकप्रिय बनाया। ‘इसकी टोपी उसके सिर’ केवल एक बोलचाल की चुटकी नहीं रही; वह फिल्मी गीतों और शीर्षकों के रास्ते लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा बनी। टोपी अब केवल पहनी नहीं जाती थी—वह संवाद करने लगी थी।

टोपी से जुड़े दूसरे मुहावरे भी कम दिलचस्प नहीं। ‘टोपी उछालना’ किसी की प्रतिष्ठा या सम्मान को चोट पहुंचाने का संकेत बन सकता है। ‘टोपी उतारना’ किसी के प्रति सम्मान व्यक्त करने का प्रतीक हो सकता है। ‘टोपी बदलना’ आत्मीयता या भाईचारे की ओर संकेत कर सकता है। ‘टोपी टेढ़ी करना’ घमंड या अकड़ के भाव में भी इस्तेमाल हुआ है। यानी टोपी ने हिंदी भाषा में अपना पूरा व्याकरण बना लिया है।

टोपी पहनना एक क्रिया है, टोपी पहनाना दूसरी; टोपी उतारना अलग अर्थ देता है, टोपी उछालना अलग; टोपी बदलना रिश्ते का संकेत बन सकता है और टोपी टेढ़ी करना तेवर का। एक ही वस्तु ने भाषा को कितने रंग दे दिए!

राजनीति में तो ‘टोपी’ और ‘मुहावरा’ जैसे पुराने साथी हैं। चुनाव आते हैं तो सिरों पर टोपियां भी आती हैं और भाषणों में वादों की टोपियां भी। कोई विकास की टोपी पहनाता है, कोई बदलाव की, कोई रोजगार की, कोई मुफ्त की सुविधाओं की। जनता भी अब टोपी पहचानने लगी है। वह केवल रंग नहीं देखती, टोपी के भीतर का सिर भी देखने की कोशिश करती है। आखिर लोकतंत्र में सबसे कठिन काम यही है—कौन टोपी पहन रहा है और कौन टोपी पहना रहा है, इसका फर्क समझना।

टोपी और सम्मान का संबंध भी कम रोचक नहीं। भारतीय समाज में पगड़ी को सम्मान और प्रतिष्ठा से जोड़ने वाली अनेक परंपराएं रही हैं। ‘पगड़ी की लाज रखना’ और ‘पगड़ी उछालना’ जैसे मुहावरे बताते हैं कि सिर की पोशाक को व्यक्ति की इज्जत से कितना गहरा जोड़ा गया। टोपी भी इसी सांस्कृतिक मनोविज्ञान की छोटी बहन है। सिर पर रखी चीज कभी सम्मान का प्रतीक बनती है, तो उसे गिराना या उछालना अपमान का संकेत भी।

सिनेमा ने टोपी को एक और जीवन दिया। पुराने दौर के नायक की टोपी, हास्य कलाकार की अजीबोगरीब टोपी, जासूस की फेल्ट हैट, अंग्रेज साहब की टॉप हैट, काउबॉय की चौड़ी टोपी, जादूगर की काली टोपी—टोपी ने चरित्रों की पहचान तक गढ़ी। कई बार अभिनेता का चेहरा याद न रहे, लेकिन उसकी टोपी याद रह जाती है।

और फिर टोपी फैशन की दुनिया में पहुंची। कभी बड़ी टोपी फैशन बनी, कभी छोटी; कभी पंख लगी टोपी शान बनी, कभी साधारण कैप आधुनिकता का प्रतीक। आज बेसबॉल कैप और बकेट हैट जैसे रूप रोजमर्रा के पहनावे का हिस्सा हैं। टोपी अब केवल मौसम का समाधान नहीं, व्यक्तित्व का बयान भी है। ब्रांड, खेल टीम, संगीत समूह, राजनीतिक विचार या सामाजिक संदेश—जो कुछ टी-शर्ट कहती है, उसका एक छोटा संस्करण टोपी भी कहने लगी है।

फिर भी टोपी की सबसे खूबसूरत बात यही है कि वह छोटी है, मगर उसमें दुनिया समा जाती है।

एक किसान की टोपी में खेत हो सकता है। एक सैनिक की टोपी में देश और अनुशासन। एक धार्मिक टोपी में आस्था। एक राजनेता की टोपी में विचारधारा। एक बच्चे की टोपी में उत्सव। एक कलाकार की टोपी में फैशन। एक जादूगर की टोपी में रहस्य। और किसी ठग की टोपी में—किसी दूसरे को पहनाने की योजना!

शायद इसीलिए टोपी मनुष्य की सभ्यता की उन चीजों में है जो आकार में छोटी और अर्थ में विराट हैं। वह सिर को ढकती है, लेकिन पहचान को खोलती है। वह धूप से बचाती है, लेकिन कभी-कभी राजनीति की धूप में विचारों को तपाती भी है। वह सम्मान देती है, सम्मान लेती है और जरूरत पड़ने पर सम्मान उछाल भी देती है।

टोपी का सबसे बड़ा दर्शन शायद यही है कि सिर सबके पास है, लेकिन हर सिर की टोपी अलग है। कोई अपनी पसंद से टोपी पहनता है, कोई परंपरा से, कोई धर्म से, कोई पद के कारण और कोई मौसम के कारण। मगर कई बार जिंदगी किसी को ऐसी टोपी पहना देती है जिसे उसने मांगा ही नहीं था।

तभी तो टोपी के दो संसार आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं—एक वास्तविक और दूसरा मुहावरे का।

वास्तविक टोपी सिर को ढकती है; मुहावरे की टोपी कभी-कभी दिमाग को।

वास्तविक टोपी पहचान देती है; मुहावरे की टोपी पहचान छिपा सकती है।

वास्तविक टोपी सम्मान की हो सकती है; मुहावरे की टोपी बेवकूफ बनाए जाने की।

वास्तविक टोपी आदमी अपनी मर्जी से पहनता है; मुहावरे की टोपी अक्सर कोई दूसरा पहनाता है।

और शायद यही टोपी की सबसे बड़ी विडंबना है—हम सिर बचाने के लिए टोपी पहनते हैं, लेकिन कभी-कभी उसी टोपी के कारण हमारी समझ पर सवाल खड़ा हो जाता है।

इसलिए अगली बार जब किसी को टोपी पहने देखें, तो केवल यह मत पूछिए कि टोपी कैसी है। यह भी देखिए कि उसके पीछे कौन-सी संस्कृति है, कौन-सा मौसम है, कौन-सा पेशा है, कौन-सा विश्वास है, कौन-सी राजनीति है और कौन-सी कहानी।

क्योंकि टोपी कभी केवल टोपी नहीं होती।

वह कभी इतिहास होती है, कभी परंपरा; कभी धर्म, कभी राजनीति; कभी फैशन, कभी हास्य; कभी सम्मान, कभी व्यंग्य और कभी किसी की चालाकी का सबसे सरल हथियार।

सिर पर रखी यह छोटी-सी वस्तु आखिर हमें एक बड़ी बात सिखाती है—दुनिया में टोपियां भले सैकड़ों हों, मगर उन्हें पहनने वाले सिर की कहानी हमेशा अलग होती है।

और जिंदगी का असली हुनर शायद यही है कि अपनी टोपी खुद पहनें, दूसरे की टोपी का सम्मान करें और जब कोई बड़ी सफाई से आपको टोपी पहनाने आए, तो समय रहते पहचान लें कि यह सिर की सुरक्षा है या आपकी समझ की परीक्षा!

क्योंकि टोपी चाहे गांधी की हो या फ़ेज़ की, फेडोरा हो या काउबॉय हैट, बेरेट हो या बीनी, धार्मिक हो या राजनीतिक—अंततः वह सिर पर ही आती है।

और सिर?

सिर तो वही है, जिसमें आदमी की समझ भी रहती है और कभी-कभी—दूसरे की टोपी भी!

निठल्ले के नोट्स - गीता की प्रासंगिकता


कुरुक्षेत्र के उस मोड़ पर...

समय थम गया था। रथ के दो पहियों के बीच सिर्फ दो योद्धा नहीं खड़े थे, बल्कि एक तरफ़ था मनुष्य का संशय और दूसरी तरफ़ स्वयं सृष्टि का समाधान। अर्जुन के हाथ से गांडीव छूटकर गिर चुका था—अपनों को खोने का डर जब कर्तव्य पर हावी हो जाए, तो आत्मा ऐसी ही शिथिल हो जाती है। उसी निस्तब्धता में, सारथि बने केशव की मुस्कान फूटी और उपनिषदों का नवनीत बनकर ढलने लगा।

अठारह अध्यायों की यह यात्रा असल में कुरुक्षेत्र से शुरू होकर हमारे-आपके भीतर तक जाती है।

अठारह का यह विचित्र अंक ही क्यों?

सोचिए, अठारह दिन का युद्ध, अठारह अक्षौहिणी सेना और ग्रंथ के अठारह ही पर्व! यह केवल कोई संयोग या गणित नहीं है। सनातन चिंतन में यह अंक पूर्णांक और रूपांतरण का प्रतीक है। जब मनुष्य अपनी चेतना के अठारह सीढ़ियों को पार करता है, तभी वह संशय से निकलकर सिद्धि तक पहुँचता है। यह अठारह अध्याय मन की अठारह उलझनों को सुलझाने के अठारह सोपान हैं।

छह-छह के तीन पड़ाव: चेतना का विस्तार

गीता की यह अठारह अध्यायों की गंगा तीन धाराएँ बनाकर बहती है:

  • प्रथम षटक (अध्याय १-६): कर्म की भूमि शुरुआत अर्जुन के 'विषाद' से होती है। विषाद यदि सही दिशा पाए, तो योग बन जाता है। यहाँ कृष्ण आत्मा की अजरता-अमरता का बोध कराते हुए कहते हैं—"शरीर वस्त्र की तरह है, उसे बदलना नियति है।" मन को साधने और बिना फल की चिंता किए कर्म करने की कला यहाँ सिखाई गई है।
  • द्वितीय षटक (अध्याय ७-१२): भक्ति का विस्तार यहाँ केशव अपना घूँघट उठाते हैं। अर्जुन को अपनी 'विभूति' और 'विश्वरूप' के दर्शन कराते हैं। ब्रह्मांड की हर चमक, हर ऊर्जा में कृष्ण का ही विस्तार दिखाई देता है। जब साधक समझ जाता है कि सब कुछ ईश्वर ही है, तब तर्क समाप्त होता है और 'भक्ति' का जन्म होता है।
  • तृतीय षटक (अध्याय १३-१८): ज्ञान का शिखर अंतिम पड़ाव विवेक का है। शरीर (क्षेत्र) और आत्मा (क्षेत्रज्ञ) का भेद, प्रकृति के तीन गुण (सत्, रज, तम) और दैवी-आसुरी संपदा का अंतर स्पष्ट होता है। और अंत में, अठारहवें अध्याय में कृष्ण सब समेटते हुए कहते हैं—"सब छोड़, बस मेरी शरण में आ जा।"

केशव की वह बात, जो आज भी गूँजती है

कृष्ण कोई नीरस उपदेशक नहीं थे, वे जीवन के सबसे रसिया और व्यावहारिक शिक्षक थे। उनका पहला और अंतिम संदेश एक ही है—भागो मत, जागो।

वे कहते हैं, कर्म से भागना संन्यास नहीं है, बल्कि कर्म के फल की आसक्ति को छोड़ देना ही सच्चा त्याग है। जब जीवन में सफलता और विफलता, सुख और दुख एक जैसे लगने लगें, समझो तुमने गीता को समझ लिया।

कुरुक्षेत्र का युद्ध तो सदियों पहले समाप्त हो गया, पर मन का कुरुक्षेत्र आज भी जारी है। जब-जब मन का गांडीव हाथ से छूटने लगे, तब-तब अठारह अध्यायों की यह बाँसुरी इंसान को फिर से युद्ध के मैदान में डट जाने का हौसला देती है।


आधुनिक दौर में श्रीमद्भगवद्गीता कोई प्राचीन धार्मिक ग्रंथ मात्र नहीं, बल्कि जीवन प्रबंधन और मानसिक स्वास्थ्य की एक व्यावहारिक मार्गदर्शिका (Mental Health & Life Management Manual) है। आज का मनुष्य बाहरी रूप से जितना सशक्त हुआ है, आंतरिक रूप से उतना ही तनाव, भ्रम और अकेलापन झेल रहा है। ऐसे में गीता के सिद्धांत आज के जीवन में अत्यंत प्रासंगिक हैं:
 * ओवरथिंकिंग और डिप्रेशन से मुक्ति (मानसिक स्वास्थ्य): अर्जुन का 'विषाद' (डिप्रेशन और एंग्जायटी) आज के युवा की मानसिक स्थिति का प्रतीक है। जब अर्जुन निर्णय लेने में असमर्थ हो गए, तब कृष्ण ने उन्हें मानसिक संतुलन बनाना सिखाया। गीता मन को शांत रखने और अनिश्चितता में भी स्थिर रहने की कला सिखाती है।
 * कर्मयोग और बर्नआउट (Work-Life Balance): "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन" का संदेश आज के कॉर्पोरेट और प्रतियोगी माहौल के लिए सबसे बड़ा जीवन-मंत्र है। जब हम केवल परिणाम (पैसा, प्रमोशन, अंक) पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो तनाव और 'बर्नआउट' होता है। गीता सिखाती है कि प्रक्रिया (Process) पर ध्यान दो, परिणाम अपने आप अनुकूल होंगे।
 * भावनात्मक बुद्धिमत्ता (Emotional Intelligence): गीता का 'स्थितप्रज्ञ' का सिद्धांत आधुनिक मनोविज्ञान की 'इमोशनल इंटेलिजेंस' जैसा ही है। सुख-दुख, लाभ-हानि, और सफलता-विफलता में समभाव रखना ही व्यक्ति को हर परिस्थिति में अडिग और खुश रखता है।
 * निर्णय लेने की क्षमता (Decision Making): जीवन के मोड़ पर जब सही और गलत का चयन करना कठिन हो जाए, तब गीता का 'स्वधर्म' का सिद्धांत मार्ग दिखाता है। यह हमें अपनी क्षमताओं और कर्तव्यों को पहचान कर सही निर्णय लेने की प्रेरणा देता है।
 * सस्टेनेबिलिटी और प्राकृतिक संतुलन: अध्याय 3 में कृष्ण यज्ञ और चक्र की बात करते हैं—प्रकृति से जितना लें, उतना लौटाएं। आज के पर्यावरण संकट और उपभोक्तावादी संस्कृति के दौर में यह संयम और संतुलन का सबसे बड़ा पाठ है।
संक्षेप में, कुरुक्षेत्र का युद्ध केवल बाहर नहीं, आज हर व्यक्ति के मन के भीतर रोज लड़ा जा रहा है। जब-जब मन का 'गांडीव' छूटने लगता है, गीता एक दोस्त और मेंटर बनकर रास्ता दिखाती है।

निठल्ले के नोट्स - जूते-चप्पलों की दुनिया में आदमी की पहचान--------

जूते-चप्पलों की दुनिया में आदमी की पहचान
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किसी भीड़ में खड़े होकर अगर हम लोगों के चेहरों को देखना शुरू करें तो कुछ देर बाद चेहरे एक-दूसरे में घुलने लगते हैं। हजारों चेहरे, लगभग वही दो आंखें, एक नाक, एक मुंह, दो कान और चेहरे पर भावनाओं की वही पुरानी वर्णमाला। लेकिन जरा निगाह नीचे कीजिए। पांवों की तरफ। अचानक दुनिया बदल जाती है। कोई चमकदार जूता पहने है, कोई धूल से सना हुआ कैनवास, कोई रंग-बिरंगी चप्पल, कोई नुकीला जूता, कोई गोल-मटोल, कोई इतना भारी जूता कि लगता है पांव नहीं, पांव पर पूरा मकान रखा हो। और कोई ऐसा भी मिलेगा जिसकी चप्पल देखकर लगेगा कि वह चप्पल कम और जीवन-दर्शन ज्यादा है—बस चलती रहे, टूटे तो बांध लेना।

शायद मनुष्य के चेहरे जितनी विविधता उसके जूते-चप्पलों में भी है। फर्क सिर्फ इतना है कि चेहरा हमें प्रकृति ने दिया और जूते-चप्पल हमने खुद चुने हैं। इसलिए चेहरे से ज्यादा पांव के नीचे की चीज हमारे चुनाव की कहानी कहती है।

आप ट्रेन में बैठिए। सामने की सीट पर बैठे चार लोगों के पांव देख लीजिए। संभव है चारों के जूते अलग-अलग हों। एक के जूते पर किसी खेल-कूद कंपनी का निशान होगा, दूसरे के जूते पर धूल की ऐसी परत होगी जो उसके रोजमर्रा के रास्तों का भूगोल बता रही होगी। तीसरे की चप्पल बिल्कुल साधारण होगी और चौथा शायद ऐसा जूता पहने होगा जिसकी कीमत जानने के लिए आपको मोबाइल निकालकर खोज करना पड़े। यही दृश्य बस में, बाजार में, रेलवे स्टेशन पर, दफ्तर के बाहर और किसी विवाह समारोह में भी दिखाई देता है।

सवाल उठता है—आखिर जूते-चप्पलों में इतनी विविधता क्यों है?

क्या सचमुच जूता बनाने वाली कंपनियां हर डिजाइन की सीमित संख्या में जूते बनाती हैं ताकि सड़क पर हर दूसरे आदमी के पांव में वही जूता दिखाई न दे? शायद बाजार की रणनीति में इसका कुछ हिस्सा जरूर हो। फैशन की दुनिया में नया डिजाइन, नया रंग, नया आकार और नया संयोजन लगातार पैदा किया जाता है। मगर पूरी कहानी बाजार की नहीं है। असली कहानी शायद मनुष्य की उस पुरानी इच्छा की है—मैं भीड़ में रहूं, लेकिन भीड़ जैसा न दिखूं।

यही कारण है कि यूनिफॉर्म की दुनिया और सामान्य जीवन की दुनिया में इतना बड़ा अंतर है। स्कूल की वर्दी में बच्चों के जूते एक जैसे होते हैं। सेना में जूतों की एकरूपता अनुशासन का हिस्सा है। पुलिस, सुरक्षा बल या किसी औद्योगिक प्रतिष्ठान में भी जूते अक्सर एक निर्धारित रूप में दिखाई देते हैं। वहां व्यक्ति से पहले संस्था दिखाई देती है।

लेकिन जैसे ही आदमी यूनिफॉर्म उतारता है, उसके पांव आजाद हो जाते हैं।

वह अपनी पसंद का जूता पहनता है।

और यहीं से व्यक्तित्व का एक छोटा-सा लोकतंत्र शुरू होता है।

किसी को चमड़े का जूता पसंद है, किसी को कपड़े का। किसी को फीते अच्छे लगते हैं, किसी को बिना फीते का जूता। कोई ऊंची एड़ी चुनता है, कोई सपाट तलवा। कोई फैशन के लिए असुविधा सह लेता है और कोई सुविधा के लिए फैशन को दरवाजे पर छोड़ आता है। कोई जूते को कपड़ों का हिस्सा मानता है और कोई जूते को सिर्फ पांव बचाने की मशीन।

इसलिए जूता सिर्फ जूता नहीं है।

वह हमारे स्वभाव का एक छोटा-सा बयान भी है।

पुराने समय में जूते शायद ज्यादा लंबे समय तक चलते थे। एक जोड़ी जूता खरीदा गया तो उसके साथ एक रिश्ता बन जाता था। उसकी सिलाई खुलती थी तो मोची के पास जाता था। तलवा घिसता था तो नया लग जाता था। जूते की मरम्मत होती थी, स्मृतियों की नहीं। आज की दुनिया में जूता थोड़ा घिसा नहीं कि मनुष्य का मन भी उसके साथ घिसने लगता है—अब नया ले लेते हैं।

बाजार ने हमारे पांवों को भी 'नया' होने की आदत डाल दी है।

अब जूता केवल चलने के लिए नहीं खरीदा जाता। वह सुबह की सैर के लिए अलग है, दौड़ने के लिए अलग, दफ्तर के लिए अलग, शादी के लिए अलग, पहाड़ पर जाने के लिए अलग, बरसात के लिए अलग और घर के भीतर पहनने के लिए भी अलग। एक समय आदमी के पास जूता होता था; अब जूतों के पास आदमी होता है—हर अवसर के लिए एक नया आदमी तैयार।

और फिर आते हैं वे चप्पलें, जिनका फैशन से कोई खास लेना-देना नहीं। वे जीवन की सबसे ईमानदार वस्तुओं में से हैं। वे पैर में आती हैं, घर से बाहर निकलती हैं, धूल खाती हैं, बरसात झेलती हैं, कभी बाथरूम जाती हैं, कभी बाजार, कभी पड़ोसी के घर और फिर चुपचाप दरवाजे के बाहर पड़ी रहती हैं। उन्हें कोई प्रशंसा नहीं चाहिए। वे बस साथ निभाती हैं।

कुछ चप्पलें ऐसी भी होती हैं जिन्हें देखकर लगता है कि उनका मालिक उन्हें तब तक नहीं छोड़ेगा जब तक चप्पल खुद अंतिम सांस न ले ले। बांटा की लोकप्रिय चप्पलों जैसी कुछ डिजाइनें इसका अपवाद जरूर हैं—ऐसी चप्पलें जिन्हें देखकर लगता है कि डिजाइन बदलने के बजाय पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन चप्पल वहीं की वहीं है।

जूते की दुनिया में एक और मजेदार बात है। हम अपने जूतों को देखते कम हैं, दूसरों के जूतों को देखते ज्यादा हैं। किसी शादी में आदमी शायद ही किसी के कुर्ते की सिलाई को ध्यान से देखे, लेकिन किसी का चमकता हुआ जूता जरूर आंख पकड़ लेता है। दफ्तर में किसी सहकर्मी की नई शर्ट पर टिप्पणी न हो, लेकिन नया जूता आते ही कोई पूछ देता है—"कहां से लिया?"

जूता चुपचाप बातचीत शुरू कर देता है।

कभी-कभी वह बातचीत रोक भी देता है।

किसी सरकारी कार्यालय में चमकदार महंगे जूते पहने आदमी को देखकर लोग उसके पद का अनुमान लगाने लगते हैं। किसी विश्वविद्यालय के परिसर में घिसे हुए जूते देखकर कोई उसके आर्थिक हालात का अनुमान लगा सकता है। किसी युवा के चमकदार खेल-जूतों को देखकर उसकी रुचि का अंदाजा लगाया जा सकता है। हालांकि ये अनुमान हमेशा सही हों, जरूरी नहीं। क्योंकि जूते भी अब अभिनय करना सीख चुके हैं।

एक महंगा दिखने वाला जूता जरूरी नहीं कि महंगा हो और साधारण दिखने वाला जूता जरूरी नहीं कि सस्ता हो।

यानी जूतों की दुनिया भी मनुष्य की तरह ही है—जो दिखाई देता है, जरूरी नहीं कि वही सच हो।

पांव के जूते सामाजिक दूरी भी बताते हैं और उसे मिटाते भी हैं। बड़े शहर के फुटपाथ पर बैठा मोची और किसी चमचमाते मॉल में जूता खरीदता ग्राहक एक ही वस्तु से जुड़े हुए हैं। एक जूता बनाता है, दूसरा पहनता है। एक के हाथ में सुई और हथौड़ी है, दूसरे के हाथ में कार्ड या मोबाइल। लेकिन दोनों के बीच एक अदृश्य धागा है—पांव।

मनुष्य ने पृथ्वी पर जितनी यात्राएं की हैं, उनका इतिहास शायद जूतों के तलवों में भी लिखा हुआ है। पांव ने जंगल पार किए, पहाड़ चढ़े, रेगिस्तान नापे, युद्ध लड़े, खेत जोते, शहर बसाए और चांद की जमीन तक पहुंच गया। जूता सभ्यता का बहुत छोटा आविष्कार दिखाई देता है, लेकिन उसने मनुष्य की यात्रा को बहुत लंबा कर दिया।

शायद इसीलिए किसी आदमी के जूते देखकर उसके रास्तों का थोड़ा अंदाजा लगाया जा सकता है।

लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह है कि इतने सारे जूतों के बावजूद हर आदमी आखिरकार उसी तरह चलता है—एक पैर आगे, दूसरा उसके पीछे। फिर दूसरा आगे, पहला पीछे। पूरी सभ्यता इसी क्रम पर चल रही है।

जूते बदलते रहे, रास्ते बदलते रहे, फैशन बदलता रहा, कंपनियां बदलती रहीं, डिजाइन बदलते रहे; मगर चलने की मूल लय वही रही।

और शायद यही जूतों की सबसे बड़ी दार्शनिक शिक्षा है।

हम सब अलग-अलग जूते पहनते हैं, अलग-अलग रास्तों से आते हैं, अलग-अलग मंजिलों की ओर जाते हैं। किसी के जूते चमक रहे हैं, किसी के घिस चुके हैं। किसी के तलवे मजबूत हैं, किसी के टूटने लगे हैं। किसी के पांव में कांटे चुभे हैं, किसी ने कालीन पर चलने के अलावा कुछ जाना ही नहीं। फिर भी सड़क सबके लिए एक है।

इसलिए अगली बार जब आप किसी ट्रेन में बैठे हों और सामने बैठे लोगों के जूते देखें, तो केवल जूतों को मत देखिएगा। उनके भीतर छिपी यात्राओं को पढ़ने की कोशिश कीजिएगा।

किसी जूते पर धूल होगी—वह किसी रास्ते की कहानी होगी।

किसी जूते पर चमक होगी—वह किसी पसंद की कहानी होगी।

किसी चप्पल पर टूटी हुई पट्टी होगी—वह किसी लंबे साथ की कहानी होगी।

और किसी बिल्कुल नए जूते में शायद एक अधूरी यात्रा छिपी होगी।

क्योंकि आदमी जहां भी जाता है, उसका एक हिस्सा उसके जूतों में भी चलता है।

चेहरा आदमी की पहचान बताता है, लेकिन उसके जूते उसकी यात्रा।

मशहूर लेखक प्रेमचंद के फटे जूते भी साहित्यिक विमर्श के केंद्र में आ चुके हैं!

मनुष्य की एक विचित्र इच्छा है—भीड़ में रहना, लेकिन भीड़ जैसा न दिखना।
और जूता इस इच्छा का सबसे सहज प्रदर्शन है।
लेकिन जूते की कहानी फैशन से शुरू नहीं होती।
जूते की कहानी शायद उस दिन शुरू हुई होगी जब किसी आदिम मनुष्य के पांव में कोई नुकीला पत्थर चुभा होगा।
उसने शायद पहली बार नीचे देखा होगा।
फिर किसी पेड़ की छाल, घास, पत्ते या जानवर की खाल को पांव के नीचे रखने का विचार आया होगा। वह डिजाइनर नहीं था, न उसके पास जूते की दुकान थी, न आकार नापने का फीता। उसके सामने सिर्फ एक समस्या थी—पांव बचाना है।
यहीं से शायद जूते की सभ्यता शुरू हुई।
यह कहना मुश्किल है कि दुनिया का पहला जूता किसने और कहां बनाया। शुरुआती जूते-चप्पल लकड़ी, घास, पत्तियों, रेशों और चमड़े जैसी नष्ट हो जाने वाली चीजों से बने होंगे, इसलिए उनका बहुत कम पुरातात्त्विक प्रमाण बचा है। लेकिन जो प्रमाण मिले हैं, वे बताते हैं कि मनुष्य हजारों साल पहले से अपने पांवों को ढकने लगा था।
अमेरिका के ओरेगन की फोर्ट रॉक गुफा से मिले सेजब्रश की छाल से बने सैंडल लगभग दस हजार वर्ष पुराने हैं और इन्हें दुनिया के सबसे पुराने प्रत्यक्ष रूप से दिनांकित जूतों में माना जाता है।
यानी जब आज का आदमी जूते की दुकान में खड़ा होकर सोचता है—"ब्लैक लूं या ब्राउन?"—तो वह अनजाने में लगभग दस हजार साल पुरानी मानवीय परंपरा को आगे बढ़ा रहा होता है।
अंतर सिर्फ इतना है कि उस समय सवाल था—पांव बचेगा या नहीं?
आज सवाल है—पैर पर अच्छा लगेगा या नहीं?
यात्रा यहीं से बदल गई।
प्रकृति से बचने के लिए बनाया गया जूता धीरे-धीरे संस्कृति का हिस्सा बनने लगा। प्राचीन मिस्र में पत्तियों, पपीरस, घास, चमड़े और यहां तक कि लकड़ी से भी सैंडल बनाए जाते थे। मिस्र में जूते और सैंडल केवल उपयोग की वस्तु नहीं रहे; वे सामाजिक स्थिति और अवसर से भी जुड़ने लगे। ग्रैंड इजिप्शियन म्यूजियम के संग्रह में मध्य साम्राज्य काल के सैंडल लकड़ी और चमड़े के हैं।
दिलचस्प बात यह है कि प्राचीन मिस्र में हर समय जूते पहनकर घूमना जरूरी नहीं था। उपलब्ध संग्रहालयी साक्ष्यों से पता चलता है कि बहुत से लोग सामान्यतः नंगे पांव रहते थे और सैंडल विशेष अवसरों पर या पांव की सुरक्षा की जरूरत होने पर पहने जाते थे। यहां तक कि किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति की चप्पल उठाकर चलना सम्मान का पद माना जाता था—'सैंडल-बेयरर' जैसी उपाधि भी मिलती है।
यानी जिस वस्तु को आज हम अपने पैरों के नीचे रखते हैं, कभी वह किसी दूसरे व्यक्ति के लिए सम्मान का प्रतीक भी हो सकती थी।
फिर जूते ने एक और काम करना शुरू किया—उसने आदमी के वर्ग और हैसियत को बताना शुरू किया।
रोमन दुनिया में जूते का चमड़ा, रंग और डिजाइन भी सामाजिक संकेत देने लगे। मिस्र में मिले एक रोमन जूते के लाल रंग के अवशेष इस ओर संकेत करते हैं कि वह किसी उच्च हैसियत वाले व्यक्ति का हो सकता था, क्योंकि उस समय लाल रंग के लिए इस्तेमाल होने वाला महंगा रंग पदार्थ आम आदमी की पहुंच में नहीं था।
धीरे-धीरे जूता पांव की सुरक्षा से निकलकर प्रतिष्ठा का विस्तार बन गया।
फिर आदमी ने सोचा—जब जूता पहनना ही है तो सुंदर क्यों न हो?
बस, यहीं से डिजाइन पैदा हुआ।
फीते आए। पट्टियां आईं। ऊंची एड़ी आई। चमड़ा आया। रंग आए। नक्काशी आई। सजावट आई। और फिर जूते ने भी वही किया जो मनुष्य हर सुंदर चीज के साथ करता है—उसमें उपयोगिता से अधिक अर्थ भर दिए।
किसी के जूते उसकी गरीबी बताते हैं, किसी के जूते उसकी समृद्धि। किसी के जूते उसके पेशे का संकेत देते हैं और किसी के जूते उसकी फैशन समझ का।
सैनिक के जूते उसे कठिन जमीन पर चलने की ताकत देते हैं।
मजदूर के जूते उसके श्रम के साथी हैं।
खिलाड़ी के जूते उसकी गति का हिस्सा हैं।
दूल्हे के जूते उसकी शादी की पोशाक का हिस्सा हैं।
और बच्चे के स्कूल के जूते उसकी रोज की अनिवार्य यात्रा का हिस्सा।
अर्थात जूता केवल पांव के नीचे नहीं होता; वह आदमी की जीवन-स्थितियों के नीचे भी होता है।
इसीलिए स्कूल और सेना की वर्दी में जूतों की एकरूपता दिखाई देती है। वहां व्यक्ति से पहले संस्था दिखाई देती है। सेना का जूता सैनिक की व्यक्तिगत पसंद नहीं, सैन्य अनुशासन का हिस्सा है। स्कूल का जूता बच्चे की फैशन स्वतंत्रता नहीं, विद्यालय की सामूहिक पहचान का हिस्सा है।
लेकिन जैसे ही आदमी यूनिफॉर्म उतारता है, उसके पांव आजाद हो जाते हैं।
वह अपनी पसंद का जूता पहनता है।
और यहीं से व्यक्तित्व का एक छोटा-सा लोकतंत्र शुरू होता है।
किसी को चमड़े का जूता पसंद है, किसी को कपड़े का। किसी को फीते अच्छे लगते हैं, किसी को बिना फीते का जूता। कोई फैशन के लिए असुविधा सह लेता है और कोई सुविधा के लिए फैशन को दरवाजे पर छोड़ आता है।
किसी को जूते का रंग कपड़ों से मिलाना है।
किसी को जूते का ब्रांड दिखाना है।
किसी को बस इतना चाहिए कि चलते समय पांव न दुखे।
और किसी के लिए जूता इतना महत्वपूर्ण है कि वह पूरा पहनावा जूते से तय करता है।
इक्कीसवीं सदी में जूता लगभग एक अलग उद्योग नहीं, बल्कि व्यक्तित्व का बाजार बन चुका है।
सुबह दौड़ने के लिए अलग जूता।
दफ्तर के लिए अलग।
शादी के लिए अलग।
पार्टी के लिए अलग।
बारिश के लिए अलग।
पहाड़ पर चढ़ने के लिए अलग।
जिम के लिए अलग।
और घर से बाहर कूड़ा फेंकने के लिए भी एक पुरानी चप्पल अलग।
एक समय आदमी के पास जूता होता था।
अब जूतों के पास आदमी होता है—हर अवसर के लिए एक नया आदमी तैयार।
यही वजह है कि आज सड़क पर हमें जूतों की इतनी विविधता दिखाई देती है। दुनिया का बाजार केवल हमारी जरूरत नहीं बेचता; वह हमारी अलग दिखने की इच्छा भी बेचता है।
फिर भी इस पूरी आधुनिक चमकदार दुनिया के बीच कुछ जूते ऐसे हैं जिनकी कोई फैशन महत्वाकांक्षा नहीं होती।
चप्पल।
चप्पल शायद मनुष्य की सबसे लोकतांत्रिक पोशाक है।
वह अमीर के घर भी मिलती है और गरीब के घर भी। घर में भी, बाजार में भी। सुबह भी, शाम भी। कभी मंदिर तक, कभी सब्जी मंडी तक, कभी पड़ोसी के घर तक।
और कुछ चप्पलें तो इतनी लोकप्रिय हो जाती हैं कि डिजाइन बदलने की जरूरत ही महसूस नहीं होती। बंटा की कुछ पुरानी लोकप्रिय चप्पलों की तरह—पीढ़ियां बदल जाती हैं, लेकिन चप्पल का रूप किसी पुराने रिश्तेदार की तरह वहीं खड़ा रहता है।
जूते की दुनिया में यह भी एक विचित्र विरोधाभास है।
हम जूते खरीदते हैं ताकि वे हमारे साथ चलें, लेकिन अंततः वे हमारी पहचान बन जाते हैं।
किसी शादी में आदमी शायद किसी के कुर्ते की सिलाई पर ध्यान न दे, लेकिन जूते जरूर देख लेता है।
दफ्तर में किसी सहकर्मी की नई शर्ट पर कोई टिप्पणी न करे, लेकिन नया जूता तुरंत सवाल पैदा करता है—
"कहां से लिया?"
जूता चुपचाप बातचीत शुरू कर देता है।
लेकिन जूता सिर्फ पहचान और प्रतिष्ठा का प्रतीक नहीं रहा। उसने इतिहास में सत्ता और अपमान की भाषा भी सीखी है।
जिस वस्तु को हमने पांव के नीचे रखा, वही कभी-कभी किसी की इज्जत उतारने का औजार बन गई।
भारतीय भाषाओं में 'जूते से मारना', 'जूते की नोक पर रखना', 'जूती समझना' जैसे मुहावरे हैं। यानी भाषा ने भी जूते को केवल पहनने की वस्तु नहीं माना; उसे अपमान, तिरस्कार और अधीनता के प्रतीक में बदल दिया।
मध्य-पूर्व की कई संस्कृतियों में जूते के तलवे को दिखाना या जूता फेंकना विशेष रूप से गंभीर अपमान माना जाता है, क्योंकि जूता उस चीज को छूता है जिसे जमीन और शरीर के सबसे निचले हिस्से से जोड़ा जाता है। इसी सांस्कृतिक अर्थ ने आधुनिक राजनीति में जूते को विरोध के प्रतीक में बदल दिया।
2008 में दुनिया ने इसका सबसे चर्चित आधुनिक उदाहरण देखा, जब एक इराकी पत्रकार ने बगदाद में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश की प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपने दोनों जूते उनकी ओर फेंके। बुश ने झुककर जूते से बचाव किया, लेकिन घटना की तस्वीर दुनिया भर में फैल गई। वह जूता अचानक एक वस्तु से बढ़कर राजनीतिक असहमति की भाषा बन गया।
इस घटना की दिलचस्पी इस बात में थी कि जूते ने चोट से ज्यादा अपमान का संदेश दिया। दार्शनिक जेरोम न्यू के विश्लेषण के अनुसार, ऐसे प्रतीकात्मक हमलों का उद्देश्य अक्सर शारीरिक क्षति से अधिक सम्मान और गरिमा पर प्रहार करना होता है।
भारत में भी जूता राजनीतिक विरोध का प्रतीक बना है। 

यानी जूते ने मानव सभ्यता की एक लंबी यात्रा तय की है—
पहले वह पांव बचाने की चीज था।
फिर वह चलने का साथी बना।
फिर पहनावे का हिस्सा बना।
फिर प्रतिष्ठा का प्रतीक बना।
फिर फैशन बना।
फिर उद्योग बना।
और कहीं-कहीं वह विरोध और अपमान का हथियार भी बन गया।
जूते की यात्रा यहीं खत्म नहीं होती।
कभी-कभी वह स्मृति भी बन जाता है।
युद्ध में मारे गए सैनिक के खाली जूते।
किसी मृत व्यक्ति के दरवाजे पर रखे उसके पुराने जूते।
किसी बच्चे के छोटे पड़ चुके जूते।
किसी पिता के जूते, जिन्हें बेटा संभालकर रखता है।
इन सबमें जूता वस्तु नहीं रह जाता—वह अनुपस्थिति का संकेत बन जाता है।
किसी का जूता खाली पड़ा हो तो पांव की अनुपस्थिति दिखाई देती है।
शायद इसीलिए जूते मनुष्य से कुछ ज्यादा ईमानदार होते हैं। वे हमारे साथ चलते हैं, हमारी धूल खाते हैं, हमारी थकान जानते हैं और हमारे रास्तों का हिसाब रखते हैं।
जूते पर लगी मिट्टी बताती है कि आदमी कहां-कहां गया है।
तलवे की घिसावट बताती है कि वह कैसे चलता है।
जूते की मरम्मत बताती है कि उसने चीजों को कितनी जल्दी छोड़ना सीखा या कितनी देर तक निभाया।
और जूते का नया होना बताता है कि शायद कोई नई यात्रा शुरू हुई है।
इसलिए अगली बार जब आप ट्रेन में बैठे हों और सामने बैठे लोगों के जूतों को देखें, तो सिर्फ यह मत देखिएगा कि किसका जूता सुंदर है और किसका पुराना।
उन जूतों की कहानियां पढ़ने की कोशिश कीजिएगा।
किसी जूते पर धूल होगी—वह किसी रास्ते की कहानी होगी।
किसी जूते पर चमक होगी—वह किसी पसंद की कहानी होगी।
किसी चप्पल पर टूटी हुई पट्टी होगी—वह किसी लंबे साथ की कहानी होगी।
किसी सैनिक के भारी जूते में किसी सीमा की कहानी होगी।
किसी बच्चे के छोटे जूते में बढ़ते हुए बचपन की।
और किसी बुजुर्ग के पुराने जूते में शायद आधी सदी की यात्रा।
अंततः आदमी के जीवन को भी तो जूते की तरह ही समझा जा सकता है।
हम सब अलग-अलग डिजाइन के हैं।
हमारे रास्ते अलग हैं।
हमारी चाल अलग है।
किसी का रास्ता चिकना है, किसी का पथरीला।
किसी के तलवे जल्दी घिस जाते हैं, किसी के लंबे समय तक चलते हैं।
किसी को रास्ते में कांटे मिलते हैं, किसी को कालीन।
फिर भी मंजिल की ओर बढ़ने का मूल तरीका वही है—
एक पैर आगे, दूसरा उसके पीछे।
सभ्यता ने जूते बदल दिए।
रास्ते बदल दिए।
फैशन बदल दिया।
जूते बनाने की मशीनें बदल दीं।
अब तो कृत्रिम बुद्धिमत्ता से डिजाइन तैयार होने लगे हैं और कारखानों में हजारों जोड़ी जूते एक साथ बनने लगे हैं।
लेकिन मनुष्य की चाल नहीं बदली।
वह अब भी चलता है।
और शायद जूते की पूरी कहानी का सबसे सुंदर सत्य यही है—
जूता चाहे कितना भी नया हो, अंततः उसे किसी पुराने काम में ही लगाया जाता है—किसी आदमी को उसकी मंजिल तक पहुंचाने में।
चेहरा आदमी की पहचान बता सकता है।
कपड़े उसका सामाजिक परिचय दे सकते हैं।
लेकिन उसके जूते उसकी यात्रा बताते हैं।
और हर पांव के नीचे एक अलग कहानी है।

धूमिल के मोचीराम के लिए -

न कोई छोटा है
न कोई बड़ा है

 हर आदमी एक जोड़ी जूता है

जूते के सुर और जूता-प्रेमी

हिंदी सिनेमा ने जूते को केवल पहनावे की चीज नहीं रहने दिया, उसे गीतों में चरित्र, पहचान, यात्रा और मस्ती का प्रतीक बना दिया। राज कपूर की फिल्म श्री 420 का “मेरा जूता है जापानी, ये पतलून इंग्लिशतानी, सिर पे लाल टोपी रूसी, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी” जूते को वैश्विक आधुनिकता और भारतीय आत्मा के अद्भुत मेल का रूपक बना देता है। वहीं इब्न बतूता वाला गीत—“इब्न बतूता, बगल में जूता, पहने तो पूरा है फिट”—जूते को घूमक्कड़ी, बचपन और खिलंदड़ेपन की लय में बदल देता है। इनके बीच हिंदी फिल्मों में जूता कभी प्रेम का बहाना बना, कभी गरीबी और हैसियत का संकेत, कभी हास्य का उपकरण और कभी व्यक्ति की पहचान का हिस्सा। “जूते दे दो पैसे ले लो” जैसे लोक-रंग वाले गीत हों या शादी-ब्याह में दूल्हे के जूते चुराने की रस्म से जुड़े गीत-संवाद—जूता भारतीय लोकप्रिय संस्कृति में पैरों से निकलकर गीत, कथा और मुहावरे तक जा पहुँचा है। इस अर्थ में हिंदी फिल्मी गीतों ने जूते को जमीन पर चलने वाली वस्तु से उठाकर हमारी सामूहिक कल्पना में एक सांस्कृतिक पात्र बना दिया।

दुनिया की अनेक मशहूर हस्तियों की जिंदगी में भी जूते महज जरूरत नहीं, जुनून और व्यक्तित्व का हिस्सा रहे हैं। अमेरिकी बास्केटबॉल खिलाड़ी Michael Jordan के नाम से जुड़ा Air Jordan तो जूते और लोकप्रिय संस्कृति के रिश्ते का शायद सबसे बड़ा उदाहरण है—खेल का जूता देखते-देखते पहचान, फैशन और संग्रह की वस्तु बन गया। Imelda Marcos के जूतों का विशाल संग्रह उनकी सार्वजनिक छवि का ऐसा हिस्सा बना कि उनका नाम ही जूता-संग्रह के पर्याय की तरह इस्तेमाल होने लगा। भारत में भी फिल्मी सितारों और राजघरानों से लेकर उद्योगपतियों तक, महंगे, हाथ से बने और विशेष डिजाइन वाले जूतों का आकर्षण प्रतिष्ठा और व्यक्तित्व-प्रदर्शन से जुड़ा रहा है। आखिर जूता भी अजीब चीज है—वह आदमी के सिर पर नहीं होता, फिर भी कई बार उसकी हैसियत, स्वाद, स्वभाव और यात्रा—चारों का पता दे देता है।

निठल्ले के नोट्स - भद्रा है सुभद्रा


भारतीय परंपरा में नामों का भी अपना भाग्य होता है। ‘सुंदर’ सुनते ही मन में सुंदरता उतर आती है, ‘मंगल’ सुनते ही शुभता की घंटी बजने लगती है और ‘भद्र’ शब्द कान में पड़ते ही मन कहता है—भला, इससे अच्छा और क्या होगा! संस्कृत का ‘भद्र’ यानी कल्याणकारी, शुभ, मंगलमय, श्रेष्ठ। और उसी से बना स्त्रीलिंग शब्द है—‘भद्रा’, अर्थात शुभ या कल्याणकारी स्त्री।

लेकिन ज्योतिष की दुनिया में प्रवेश करते ही कहानी कुछ उलट जाती है।

वहां भद्रा का नाम आते ही शुभ काम की घड़ी रोक दी जाती है। विवाह हो तो ठहरिए, गृहप्रवेश हो तो जरा पंचांग देख लीजिए, कोई नया काम शुरू करना हो तो भद्रा के जाने का इंतजार कीजिए। नाम ‘भद्रा’, काम ‘अभद्र’!

यह भारतीय सांस्कृतिक कल्पना का शायद सबसे सुंदर विरोधाभास है—जिस शब्द का मूल अर्थ शुभ है, वही कालगणना में अशुभ मुहूर्त का पर्याय कैसे बन गया?

यही प्रश्न भद्रा को केवल ज्योतिष का विषय नहीं रहने देता; वह भाषा, पुराण, लोकविश्वास और मानवीय मनोविज्ञान की कहानी बन जाती है।

भद्रा आखिर है कौन?

ज्योतिषीय पंचांग में भद्रा कोई स्वतंत्र ग्रह या नक्षत्र नहीं है। वह विष्टि करण का लोकप्रिय नाम है। वैदिक-ज्योतिषीय समय-विभाजन में तिथि को आगे करणों में बांटा जाता है और करण का एक प्रकार ‘विष्टि’ है। इसी विष्टि करण को लोक और व्यवहार में भद्रा कहा जाता है।

सूर्य और चंद्रमा की गति से बनने वाली तिथियों के भीतर करणों का क्रम चलता है। इसलिए भद्रा कोई महीने में एक बार आने वाली स्थायी तारीख नहीं, बल्कि चंद्र-सौर गणना से बनने वाला एक गतिशील कालखंड है।

और यहीं से पंचांग देखने वालों की माथे की शिकन शुरू होती है—क्योंकि भद्रा कभी दिन में आती है, कभी रात में; कभी पृथ्वी पर मानी जाती है, कभी उसके प्रभाव की गणना उसके ‘वास’ के आधार पर की जाती है।

अर्थात भद्रा का अपना घर भी स्थायी नहीं!

नाम भद्रा, स्वभाव विष्टि

‘विष्टि’ शब्द का अर्थ ही कुछ ऐसा है जिसमें रुकावट, कठोरता या बाधा का भाव निकलता है। ज्योतिषीय मुहूर्त परंपरा में इसे क्रूर या उग्र प्रकृति के कार्यों के लिए उपयुक्त माना गया, जबकि विवाह, मांगलिक संस्कार और कई शुभ कार्यों के लिए इससे बचने की सलाह दी गई।

इसलिए भद्रा को समझने का पहला सूत्र यही है—

भद्रा का नाम उसके स्वभाव का शाब्दिक परिचय नहीं है।

नाम भद्रा इसलिए कि वह ‘भद्र’ से जुड़ा है; व्यवहार में उससे सावधान इसलिए कि ‘विष्टि’ करण को कोमल और मांगलिक कार्यों के अनुकूल नहीं माना गया।

जैसे किसी मोहल्ले में किसी पहलवान का नाम ‘शांतिलाल’ हो सकता है। नाम में शांति, कद-काठी में क्रांति!

पुराणों ने भद्रा को देह दे दी

लोकविश्वास को अमूर्त चीजें कम पसंद आती हैं। उसे हर सिद्धांत के पीछे एक चेहरा चाहिए, एक कथा चाहिए, कोई ऐसी कहानी चाहिए जिसमें ब्रह्मांडीय गणना मनुष्य के सामने पात्र बनकर खड़ी हो जाए।

भद्रा के साथ भी ऐसा हुआ।

ज्योतिषीय और पुराणिक परंपराओं में भद्रा को सूर्यदेव की पुत्री और शनिदेव की बहन के रूप में चित्रित करने वाली कथा प्रसिद्ध है। सूर्य की संतान होने के कारण उसमें तेज था, लेकिन उसका स्वभाव अत्यंत उग्र बताया गया। कथा के अनुसार वह जहां जाती, वहां अपने कठोर स्वभाव के कारण लोगों के लिए परेशानी पैदा करती। देवताओं ने उसके विवाह की चिंता की, लेकिन उसके उग्र स्वभाव के कारण कोई उसके साथ विवाह के लिए तैयार नहीं हुआ।

कथा का यह हिस्सा बड़ा मानवीय है—ब्रह्मांड हो या परिवार, बेटी का स्वभाव अगर बहुत तेज हो तो रिश्तेदारों की चिंता एक जैसी रहती है!

आखिरकार भद्रा को कालगणना में स्थान दिया गया और वह विष्टि करण के रूप में प्रतिष्ठित हुई। उसकी उग्रता का संबंध शुभ कार्यों में विघ्न की मान्यता से जोड़ दिया गया।

यहां यह समझना जरूरी है कि ऐसी कथाएं पुराणिक-लोक परंपरा का हिस्सा हैं, इन्हें खगोलीय विज्ञान का ऐतिहासिक विवरण नहीं समझना चाहिए।

भद्रा के भाई शनिदेव!

भद्रा को शनिदेव की बहन बताने वाली कथा ने उसके चरित्र को लोकमानस में और भी रहस्यमय बना दिया। शनिदेव स्वयं भारतीय ज्योतिष और लोकविश्वास में कर्मफल, विलंब, परीक्षा और कठिनाइयों के प्रतीक बन चुके हैं। ऐसे में उनकी बहन अगर ‘भद्रा’ निकली तो लोगों ने उसके नाम से पहले ही सावधानी की घंटी बजा दी।

लोककथा का मनोविज्ञान भी कम अद्भुत नहीं।

भाई शनि—कठोर।

बहन भद्रा—उग्र।

और दोनों का परिवार सूर्य का!

मानो देवपरिवार ने ब्रह्मांड को समझाने के लिए पूरा एक ‘कठोर विभाग’ खोल रखा हो।

भद्रा और सुभद्रा—नामों की एक अद्भुत समानता

अब आते हैं उस शब्द पर जो भद्रा की पूरी कहानी को एक नया अर्थ देता है—सुभद्रा

‘सु’ उपसर्ग संस्कृत में शुभ, अच्छा, सुंदर या उत्तम अर्थ देता है। इसलिए सु + भद्रा = सुभद्रा, अर्थात अत्यंत शुभ, कल्याणकारी या मंगलमयी।

और भारतीय संस्कृति में सुभद्रा कोई साधारण नाम नहीं। वह श्रीकृष्ण और बलराम की बहन के रूप में महाभारत और वैष्णव परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ओडिशा की जगन्नाथ परंपरा में तो भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की त्रिमूर्ति भारतीय धार्मिक संस्कृति का अद्वितीय रूप है।

देखिए, यहां भाषा की एक छोटी-सी मात्रा कितनी बड़ी सांस्कृतिक दूरी तय करती है।

भद्रा—विष्टि करण।

सुभद्रा—कृष्ण की बहन।

एक से मुहूर्त बचाया जाता है, दूसरी की पूजा की जाती है।

‘सु’ ने भद्रा को शुभ बना दिया!

लेकिन क्या भद्रा सचमुच अशुभ है?

यहीं सावधानी जरूरी है।

ज्योतिषीय परंपरा में भद्रा को सर्वथा और सर्वकार्य अशुभ नहीं माना गया। उसका निषेध मुख्यतः मांगलिक और कोमल प्रकृति के कार्यों में है। इसके विपरीत उग्र, कठोर, शत्रु-विनाश, दंड, युद्ध, विवाद या ऐसे कार्य जिन्हें परंपरा में ‘क्रूर’ प्रकृति का माना गया, उनके लिए भद्रा को कई मुहूर्त-परंपराओं में अनुकूल माना गया है।

यानी भद्रा की समस्या यह नहीं कि वह हर काम बिगाड़ती है।

समस्या यह है कि वह हर काम के लिए बनी ही नहीं है।

यह बात आज के समय में समझना विशेष रूप से जरूरी है। जिस प्रकार कोई औजार खेती के लिए अच्छा और महीन कारीगरी के लिए अनुपयुक्त हो सकता है, उसी प्रकार ज्योतिषीय मुहूर्त-शास्त्र में किसी काल को एक प्रकार के काम के लिए उपयुक्त और दूसरे के लिए अनुपयुक्त माना जा सकता है।

भद्रा को इसलिए ‘पूर्ण अशुभ’ कहना उसकी परंपरागत भूमिका को छोटा कर देना होगा।

‘भद्रा’ का डर इतना बड़ा कैसे हुआ?

लोकजीवन में नियम अक्सर अपने मूल शास्त्रीय संदर्भ से बड़े हो जाते हैं।

किसी ने कहा—भद्रा में विवाह न करें।

दूसरे ने सुना—भद्रा में शुभ काम न करें।

तीसरे ने बताया—भद्रा में तो घर से निकलना भी ठीक नहीं।

और चौथे ने निष्कर्ष निकाल दिया—भद्रा में कुछ भी कर लो, नुकसान होगा!

यहीं से ज्योतिषीय मुहूर्त की सूक्ष्म व्यवस्था धीरे-धीरे लोकभय में बदलने लगती है।

शास्त्र कहता है—कार्य के स्वभाव के अनुसार समय का विचार करो।

लोकमानस कह देता है—भद्रा है, कुछ मत करो!

इन दोनों के बीच का अंतर समझना जरूरी है।

भद्रा का ‘वास’ भी है!

लोकप्रिय पंचांग परंपरा में भद्रा के तीन वास—स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल—बताए जाते हैं। भद्रा किस राशि में है, इसके आधार पर उसके वास की गणना की जाती है। पृथ्वी पर उसका वास होने पर उसके प्रभाव को विशेष रूप से विचारणीय माना जाता है।

यहां भी वही बात लागू होती है—यह ज्योतिषीय परंपरा की गणना है, वैज्ञानिक रूप से सिद्ध भौतिक घटना नहीं।

लेकिन सांस्कृतिक दृष्टि से इसका महत्व रोचक है। मनुष्य ने समय को भी जैसे घर दे दिया—भद्रा कभी ऊपर रहती है, कभी नीचे, कभी हमारे बीच।

समय भी आखिर भारतीय कल्पना में बिना पते के कैसे रह सकता था!

रक्षा-बन्धन और भद्रा की कथा

भद्रा की सबसे लोकप्रिय लोककथाओं में एक संबंध रक्षाबंधन से जोड़ा जाता है। प्रचलित मान्यता है कि भद्रा के समय राखी बांधने से बचना चाहिए और इसी कारण भद्रा की समाप्ति के बाद राखी बांधने की परंपरा कुछ क्षेत्रों में विशेष रूप से जोर पकड़ती है।

इसके पीछे लोककथाओं में यह विचार आता है कि भद्रा के उग्र स्वभाव के कारण उस समय किए गए शुभ कार्यों में बाधा आ सकती है।

लेकिन यहां भी कथा और इतिहास को अलग रखना चाहिए।

रक्षाबंधन का भद्रा से संबंध एक प्रचलित ज्योतिषीय-लोकमान्यता है; इसे ऐतिहासिक रूप से किसी एक घटना से सिद्ध हुआ नियम नहीं माना जा सकता।

रावण की बहन भद्रा?

भद्रा को लेकर लोककथाओं में कई तरह की कहानियां सुनाई जाती हैं। कहीं उसे उग्र शक्ति का रूप माना गया, कहीं उसके कारण शुभ कार्यों में विघ्न की कल्पना की गई, तो कहीं रक्षाबंधन जैसी परंपराओं के साथ उसके संबंध की कथाएं बुनी गईं।

लोककथाओं की यही खूबी है—वे इतिहास की तरह प्रमाण नहीं मांगतीं; वे स्मृति की तरह पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती हैं।

इसलिए भद्रा से जुड़ी हर कथा को ‘शास्त्र का प्रमाण’ मान लेना ठीक नहीं होगा। पुराण, ज्योतिषीय ग्रंथ, क्षेत्रीय पंचांग और लोककथा—इन सबकी अपनी-अपनी परंपरा है।

और फिर सुभद्रा मुस्कराती हैं

भद्रा की कहानी का सबसे सुंदर मोड़ शायद सुभद्रा हैं।

भद्रा—विष्टि।

सुभद्रा—शुभ।

भद्रा—जिससे मुहूर्त में सावधान।

सुभद्रा—जिनके साथ जगन्नाथ की रथयात्रा निकलती है।

भद्रा—शनि की बहन कही गईं।

सुभद्रा—कृष्ण की बहन।

एक ही मूल शब्द, लेकिन आगे लगा छोटा-सा ‘सु’ अर्थ की पूरी दिशा बदल देता है।

यह संस्कृत भाषा की शक्ति है।

भद्र में कल्याण छिपा है।

सुभद्र में वही कल्याण और अधिक शुभ हो जाता है।

इसलिए शायद भद्रा को समझने का सबसे अच्छा तरीका उससे डरना नहीं, उसके स्वभाव को समझना है।

वह ज्योतिषीय परंपरा में मांगलिक कार्यों के लिए सावधानी का समय हो सकती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह ब्रह्मांड की कोई ‘मनहूस घड़ी’ है जिसमें संसार ने काम करना बंद कर दिया हो।

भद्रा की बदनामी और हमारी आदत

हम मनुष्य भी बड़े विचित्र हैं। हमें जटिल बातों का सरल निष्कर्ष चाहिए।

‘विष्टि करण में कुछ प्रकार के शुभ कार्यों से बचना चाहिए’—यह थोड़ा कठिन वाक्य है।

‘भद्रा में काम मत करना’—बहुत आसान!

इसी आसानी ने भद्रा की छवि बना दी।

और फिर हमारे घरों में भद्रा का नाम सुनते ही कोई कहता है—“आज रहने दो।”

पूछिए—“क्यों?”

उत्तर आएगा—“भद्रा है।”

“भद्रा क्या करती है?”

“पता नहीं, लेकिन करती कुछ है!”

यही लोकविश्वास की सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ी कमजोरी दोनों है।

अंततः भद्रा शुभ कैसे?

शायद इसका उत्तर ‘भद्रा’ के बाहर नहीं, भद्र शब्द के भीतर है।

भारतीय परंपरा में शुभ-अशुभ हमेशा पूर्णतः काले-सफेद खाने में नहीं रखे गए। समय, कार्य, व्यक्ति, परिस्थिति और उद्देश्य—इन सबके अनुसार अर्थ बदलता है।

जिस काल को विवाह के लिए टाला जा सकता है, वही काल किसी कठोर कार्य के लिए उपयुक्त माना जा सकता है।

इसलिए भद्रा को ‘अशुभ’ कह देना आधा सत्य है।

पूरा सत्य यह है—

भद्रा एक विशिष्ट करण है, जिसकी अपनी ज्योतिषीय प्रकृति मानी गई है।

और सुभद्रा?

वह उसी ‘भद्र’ की ऐसी व्याख्या हैं जिसमें ‘सु’ जुड़कर शुभता को पूर्ण कर देता है।

इसलिए भद्रा से सुभद्रा तक की यात्रा केवल पंचांग की यात्रा नहीं है; यह भाषा की यात्रा भी है।

एक तरफ भद्रा खड़ी हैं—हाथ में पंचांग, चेहरे पर थोड़ी कठोरता और जैसे कह रही हों, “शुभ काम है? जरा मेरा समय निकल जाने दो।”

दूसरी तरफ सुभद्रा मुस्करा रही हैं—जगन्नाथ के रथ पर विराजमान।

और दोनों के बीच संस्कृत का एक छोटा-सा ‘सु’ खड़ा है।

वही ‘सु’ जो कहता है—

हर भद्रा अभद्र नहीं होती; कभी-कभी उसे समझने के लिए बस एक ‘सु’ की जरूरत होती है।

ज्योतिष के गहन आकाश में जिसे हम भद्रा कहकर अमंगल की छाया मान बैठते हैं, वह सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर सुभद्रा यानी परम कल्याणमयी चेतना का ही एक कड़क रूप है। स्थूल रूप से पंचांग के पन्नों को उलटते हुए विष्टि करण के रूप में 'भद्रा' का नाम आते ही लोग सहम जाते हैं और अपने मांगलिक कार्यों को रोक देते हैं। लोकमानस में यह छवि गहरी है कि सूर्यपुत्री और शनिदेव की यह क्रोधी बहन केवल विघ्न और बाधाओं की अधिष्ठात्री है। किंतु, भारतीय मनीषा का दर्शन कभी भी एकांगी नहीं रहा; यहाँ जो संहारक है, वही सृजक भी है। जब हम ज्योतिष की गहराइयों में उतरकर इस कालखंड का तात्विक विश्लेषण करते हैं, तो भद्रा का वह संकोच टूटता है और वह अपने भीतर छिपे 'सुभद्रा' यानी अत्यंत सुंदर और परम मंगलकारी स्वरूप को प्रकट करती है। यह ठीक वैसा ही है जैसे नारियल का ऊपरी आवरण अत्यंत कठोर और रूखा होता है, परंतु उसके भीतर अमृत तुल्य मधुर जल और कोमल गिरी छिपी होती है।

भद्रा का 'सुभद्रा' होना वास्तव में उसकी चयनात्मक क्रूरता और न्यायप्रियता में निहित है। ज्योतिष शास्त्र स्पष्ट कहता है कि भद्रा हर समय और हर लोक के लिए अनिष्टकारी नहीं होती। जब वह स्वर्ग या पाताल लोक में विहार करती है, तब मृत्युलोक (पृथ्वी) पर उसका कोई दुष्प्रभाव नहीं होता, बल्कि वह अदृश्य रहकर सृष्टि के संतुलन को बनाए रखती है। सबसे सुंदर रहस्य तो यह है कि जिसे हम 'अशुभ' काल कहते हैं, वह असाधारण और कठोर कर्मों के लिए 'अमोघ वरदान' बन जाता है। स्वतंत्र रूप से विचार करें तो अदालती मुकदमों में विजय पाना, राज्य के नीतिगत और कूटनीतिक फैसले लेना, समाज को खोखला करने वाले शत्रुओं का दमन करना या किसी व्याधि से मुक्ति के लिए शल्य चिकित्सा (ऑपरेशन) करना—इन सब उग्र कार्यों के लिए भद्रा से श्रेष्ठ और कोई समय नहीं है। जो काल शुभ कार्यों के ठहराव के लिए बना है, वही काल आसुरी शक्तियों और बाधाओं के विनाश के लिए प्रचंड ऊर्जा का स्रोत बन जाता है। इस प्रकार, भद्रा केवल रोकती नहीं है, बल्कि वह हमें समय की मर्यादा सिखाती है। वह एक कठोर माता या गुरु की भांति हमें सचेत करती है कि कब रुकना है और कब पुरुषार्थ दिखाना है। यही कारण है कि भद्रा अपने इस विदारक और न्यायसंगत रूप में सृजन की पृष्ठभूमि तैयार करती है और अनिष्ट का नाश कर अंततः जीव का परम कल्याण ही साधती है। इसलिए, ज्योतिषीय और दार्शनिक दृष्टिकोण से भद्रा का यह संहारक संयम ही उसका वास्तविक 'सुभद्रा' रूप है, जो संसार के भीतर छिपे अमंगल को सोखकर अंततः शुद्ध मंगल की स्थापना करता है।



निठल्ले के नोट्स - चंपक बनाता है पंचक!


पंचक नाम सुनते ही हमारे यहां कैलेंडर थोड़ा सहम जाता है, पंडित जी की भौंह तन जाती है और घर की दादी अचानक पंचांग की तरफ ऐसे देखने लगती हैं, जैसे उसमें मौसम का नहीं, परिवार का भविष्य लिखा हो। किसी काम की तैयारी चल रही हो और कोई कह दे—“अरे, पंचक लग गया है!”—तो बस, अच्छे-भले काम की चाल में ऐसा ब्रेक लगता है जैसे सड़क पर अचानक ‘स्पीड ब्रेकर’ आ गया हो।

लेकिन पंचक आखिर है क्या? और इस बेचारे के सिर पर इतनी बदमाशियों का इल्जाम क्यों है?

ज्योतिषीय परंपरा में पंचक कोई अलग ग्रह या कोई स्वतंत्र नक्षत्र नहीं, बल्कि पाँच नक्षत्रों के एक विशेष क्रम का नाम है। जब चंद्रमा कुंभ और मीन राशियों में भ्रमण करता है और धनिष्ठा के उत्तरार्ध से लेकर शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती तक पहुंचता है, तब इस अवधि को पंचक कहा जाता है। धनिष्ठा के केवल अंतिम दो चरण इस गणना में आते हैं। यानी पंचक का ‘पंच’ सचमुच पांच नक्षत्रों से आया है—धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती।

चंद्रमा की अपनी गति है—लगभग 27 दिनों में वह नक्षत्रों का पूरा चक्कर लगा आता है। इसलिए पंचक कोई साल में एक बार आने वाला रहस्यमय मेहमान नहीं, बल्कि लगभग हर महीने आने वाली करीब पांच दिन की अवधि है। यानी पंचक भी हमारे यहां का ऐसा रिश्तेदार है जो साल में एक बार नहीं, लगभग हर महीने आ धमकता है—और आते ही कहता है, “अब जरा संभलकर!”

पांच नक्षत्र और पांच तरह की शरारत

भारतीय ज्योतिष में इन पांच नक्षत्रों को उनके स्वभाव और देवताओं के आधार पर अलग-अलग माना गया है। धनिष्ठा के देवता वसु, शतभिषा के वरुण, पूर्वाभाद्रपद के अजैकपाद, उत्तराभाद्रपद के अहिर्बुध्न्य और रेवती के पूषा माने जाते हैं। इनके स्वभाव भी एक जैसे नहीं हैं। यही वजह है कि यह समझ लेना कि पंचक के पांचों दिन और पांचों नक्षत्र हर काम के लिए समान रूप से अशुभ हैं, शास्त्रीय परंपरा को बहुत सरल बनाकर देखना होगा।

मसलन, ज्योतिषीय मुहूर्त परंपरा में धनिष्ठा और शतभिषा को चल संज्ञक, पूर्वाभाद्रपद को उग्र, उत्तराभाद्रपद को ध्रुव और रेवती को मृदु संज्ञक माना गया है। इसलिए पंचक के भीतर भी काम के अनुसार शुभ-अशुभ विचार किया जाता है। पंचक का अर्थ यह नहीं कि पांच दिनों तक आदमी न घर से निकले, न दुकान खोले और न चाय बनाए!

असल बदमाशी तो यहां से शुरू होती है।

मान्यता यह बनी कि पंचक में शुरू किया गया कोई काम पांच गुना फल दे सकता है। फल अच्छा हुआ तो पांच गुना शुभ, लेकिन गलत हुआ तो पांच गुना आफत! लोकजीवन ने इस सिद्धांत को अपने ढंग से इतना लोकप्रिय किया कि पंचक का नाम सुनते ही लोगों को सबसे पहले काम के परिणाम की चिंता होने लगी। कुछ परंपराओं में इसी कारण लकड़ी और ईंधन इकट्ठा करने, चारपाई बनाने, छप्पर डालने, गृह-निर्माण से जुड़े कुछ कामों और दक्षिण दिशा की यात्रा से बचने की सलाह दी गई।

पंचक बेचारा कहता रहा—“मैं तो बस पांच नक्षत्र हूं।”

लोग बोले—“नहीं महाराज, आप तो पांच गुना मुसीबत हैं!”

सबसे बड़ी बदमाशी—मौत!

पंचक की सारी बदनामी में सबसे बड़ा अध्याय मृत्यु का है।

गरुड़ पुराण के और्ध्वदेहिक कर्म से संबंधित अध्याय में पंचक के समय मृत्यु और दाह-संस्कार का विशेष उल्लेख मिलता है। उसमें धनिष्ठा के अर्धभाग से रेवती तक की अवधि को दोषपूर्ण माना गया है और पंचक में मृत्यु होने पर दाह-संस्कार के लिए विशेष विधि बताई गई है। वहां यह भी कहा गया है कि पंचक में मृत्यु होने पर सामान्य रूप से दाह करने से परिवार और सगोत्रियों के लिए कष्ट या हानि की आशंका हो सकती है। साथ ही कुश से बने पुतलों के साथ विशेष विधि से दाह-संस्कार का विधान बताया गया है।

यहीं से वह प्रसिद्ध धारणा जन्म लेती है कि पंचक में एक व्यक्ति की मृत्यु हो तो पांच और लोगों की मृत्यु का संकट पैदा हो सकता है।

लोकविश्वास ने तो इसे और भी व्यवस्थित कर दिया। एक प्रचलित श्लोक में कहा जाता है—

“धनिष्ठ-पंचकं ग्रामे
शतभिषा-कुलपंचकम्।
पूर्वाभाद्रपदा-रथ्या च
उत्तरा गृहपंचकम्।
रेवती ग्रामबाह्यं च
एतत् पंचकलक्षणम्॥”

इसके आधार पर पंचक को ग्राम, कुल, रथ्या, गृह और ग्रामबाह्य जैसे पांच क्षेत्रों से जोड़कर देखा गया और मान्यता बनी कि मृत्यु या जन्म के प्रभाव की ‘पांच गुना’ पुनरावृत्ति संबंधित क्षेत्र में हो सकती है।

लेकिन यहां एक जरूरी बात है—इसे सांस्कृतिक-धार्मिक मान्यता के रूप में समझना चाहिए, वैज्ञानिक भविष्यवाणी के रूप में नहीं। गरुड़ पुराण में पंचक-मृत्यु के दोष और उसके निवारण की विधि मिलती है; आधुनिक लोकप्रिय व्याख्या में जिस तरह “एक मरा तो पांच और मरेंगे” को निश्चित नियम की तरह बताया जाता है, वह शास्त्रीय कथन का सरल और अधिक भय पैदा करने वाला रूप है। स्वयं उपलब्ध गरुड़ पुराण पाठ में पंचक-दाह के लिए विशेष शांति-विधान बताया गया है, यानी परंपरा में समाधान भी है, केवल डर नहीं।

पंचक में घर बनाना क्यों बदनाम हुआ?

पुरानी जीवन-व्यवस्था को समझें तो पंचक के निषेधों के पीछे एक सांस्कृतिक तर्क भी दिखाई देता है। लकड़ी, घास, छप्पर, चारपाई, निर्माण-सामग्री जैसी चीजें उस समय घर-गृहस्थी की महत्वपूर्ण वस्तुएं थीं। इसलिए कुछ विशेष नक्षत्रों में इनके संग्रह या निर्माण से बचने की परंपरा बनी। मुहूर्त-ग्रंथों में भी पंचक के दौरान शय्या, छप्पर, लकड़ी-तृण संग्रह, दक्षिण दिशा की यात्रा और प्रेतदाह आदि से बचने का उल्लेख मिलता है।

आज के आदमी की समस्या यह है कि उसे पंचक में सोफा खरीदना है, फ्लैट की रजिस्ट्री करनी है, नई कार लेनी है और घर में मॉड्यूलर किचन लगवाना है। वह पंचांग खोलता है तो पंचक सामने बैठा मुस्करा रहा होता है।

“क्या करें?” आदमी पूछता है।

पंचक कहता है—“पहले मेरा मुहूर्त देखो!”

और यह दक्षिण दिशा वाला मामला?

पंचक की एक और बदनाम शरारत दक्षिण दिशा से जुड़ी है। परंपरा में पंचक के दौरान दक्षिण दिशा की यात्रा से बचने का उल्लेख मिलता है। इसका संबंध यम की दिशा के रूप में दक्षिण की सांस्कृतिक कल्पना से जोड़ा गया। विशेषकर मृत्यु और दाह-संस्कार के प्रसंग में दक्षिण दिशा का प्रतीकात्मक महत्व भारतीय परंपरा में बहुत पुराना है।

इसलिए पंचक के समय दक्षिण की ओर जाना मानो उस सांस्कृतिक कल्पना में यमलोक की तरफ टिकट कटाने जैसा समझ लिया गया।

हालांकि यहां भी बात धार्मिक मुहूर्त-मान्यता की है, किसी भौतिक दिशा में यात्रा करने से अपने-आप अनिष्ट होने की वैज्ञानिक पुष्टि की नहीं।

वरना आधुनिक भारत में पंचक आते ही चेन्नई, बेंगलुरु, हैदराबाद और कन्याकुमारी की सारी ट्रेनें खाली हो जानी चाहिए थीं!

पंचक के पांच चेहरे

लोकमान्यता ने सप्ताह के दिनों के आधार पर पंचक के अलग-अलग नाम भी गढ़े हैं—रोग पंचक, राज पंचक, अग्नि पंचक, मृत्यु पंचक और चोर पंचक। यानी पंचक अगर रविवार को शुरू हो तो एक तरह का नाम, सोमवार को दूसरी तरह का, और इसी क्रम में अलग-अलग आशंकाओं से जोड़ा जाता है। यह भी पंचक की लोक-व्याख्याओं का हिस्सा है, कोई सार्वभौमिक वैज्ञानिक वर्गीकरण नहीं।

सोचिए, एक ही पंचक बेचारा सोमवार को आया तो कुछ और, मंगलवार को आया तो कुछ और!

पंचक से ज्यादा बहुरूपिया तो हमारे यहां फिल्मों का खलनायक भी नहीं होता।

किंवदंतियों का अपना गणित

भारतीय लोकसंस्कृति की खूबी है कि वह खगोलीय गणना को भी कहानी में बदल देती है। पंचक के साथ भी यही हुआ। पांच नक्षत्र थे, इसलिए पांच गुना फल की धारणा बनी। मृत्यु का प्रसंग जुड़ा तो पांच मृत्यु की आशंका की कथा बन गई। लकड़ी का संग्रह जुड़ा तो आग का डर पैदा हुआ। दक्षिण दिशा यम से जुड़ी तो यात्रा का निषेध बन गया।

इस तरह ज्योतिषीय गणना धीरे-धीरे सामाजिक अनुशासन की भाषा भी बन गई।

पुराने समय में जब जीवन का बड़ा हिस्सा मौसम, कृषि, संसाधनों, यात्रा और सामुदायिक परंपराओं से नियंत्रित था, तब ‘अशुभ समय’ की अवधारणा कई कामों को रोकने या टालने का सांस्कृतिक माध्यम भी रही होगी। लेकिन इसे इतिहास का सिद्ध तथ्य कहने के बजाय एक संभावित सांस्कृतिक व्याख्या के रूप में देखना अधिक उचित है।

पंचक हमेशा खलनायक नहीं

सबसे दिलचस्प बात यही है कि जिस पंचक को आम बोलचाल में पूरी तरह अशुभ मान लिया गया है, उसी के भीतर आने वाले नक्षत्र अलग-अलग शुभ कार्यों के लिए भी प्रयुक्त होते रहे हैं।

ज्योतिषीय परंपरा में धनिष्ठा और शतभिषा को चल कार्यों के लिए उपयुक्त माना गया है। उत्तराभाद्रपद को स्थिर प्रकृति के कामों से जोड़ा गया है और रेवती को कोमल तथा कलात्मक कार्यों के लिए अनुकूल माना गया है। इसलिए पंचक को एक झटके में ‘पांच दिन का पूर्ण निषेध’ मान लेना शास्त्रीय मुहूर्त-विचार की पूरी तस्वीर नहीं है।

यानी पंचक की असली बदमाशी शायद इतनी नहीं है जितनी उसकी बदनामी है।

वह कहता है—“भाई, मैं पांच नक्षत्रों का समूह हूं, तुमने मुझे पांच गुना संकट बना दिया!”

फिर पंचक से डरें या नहीं?

परंपरा का सम्मान करने वाला व्यक्ति पंचक में कुछ कार्यों के लिए मुहूर्त-विचार कर सकता है। मृत्यु जैसे संवेदनशील मामले में तो परिवार की परंपरा और आचार्य की सलाह के अनुसार संस्कार-विधि अपनाना स्वाभाविक है। लेकिन हर घटना का कारण पंचक को मान लेना उचित नहीं।

क्योंकि यदि पंचक सचमुच हर काम को पांच गुना बिगाड़ता होता, तो दुनिया में पंचक के दिनों में पैदा हुए बच्चे पांच गुना दुखी, पंचक में बनी इमारतें पांच गुना कमजोर और पंचक में हुई शादियां पांच गुना असफल होतीं। ऐसा कोई सार्वभौमिक प्रमाण हमारे पास नहीं है।

इसलिए पंचक को समझने का बेहतर तरीका शायद यही है कि उसे भारतीय ज्योतिषीय और सांस्कृतिक परंपरा की एक मुहूर्त-मान्यता माना जाए—न कि डर की मशीन।

आखिर पांच नक्षत्रों ने मिलकर अपना एक क्लब बनाया है। नाम रखा—पंचक।

हमने उस क्लब की ऐसी प्रतिष्ठा बना दी कि बेचारा धनिष्ठा से लेकर रेवती तक पहुंचते-पहुंचते खुद सोचता होगा—

“मैं नक्षत्र हूं या बदमाशों का गिरोह?”

और यहीं भोले भाले लोगों को‘चंपक’ बनाते हुए पंचक मुस्कराता है।

पंचक की असली शरारत शायद यह नहीं कि वह पांच गुना नुकसान करता है; उसकी सबसे बड़ी बदमाशी यह है कि उसने पांच नक्षत्रों की मामूली-सी बैठक को भारतीय जनमानस में इतना बड़ा रहस्य बना दिया कि पंचांग का एक पन्ना खुलते ही आदमी अपना काम नहीं, अपना भाग्य देखने लगता है।

पंचक आया, पांच दिन रहा और चला गया।

लेकिन उसकी कहानी—वह पांच गुना होकर हमारे लोकजीवन में आज भी घूम रही है।

हकीकत यह है कि पंचक हमेशा अशुभ नहीं होता, बल्कि कुछ विशेष स्थितियों और नक्षत्रों के प्रभाव से यह बेहद शुभ और फलदायी भी हो सकता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, यदि पंचक सोमवार से शुरू हो तो उसे राज पंचक कहा जाता है, जिसे सरकारी कार्यों, संपत्ति की खरीदारी और करियर में उन्नति के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। इसके अलावा, पंचक के दौरान आने वाले अलग-अलग नक्षत्रों का अपना विशेष महत्व होता है; उदाहरण के लिए, उत्तराभाद्रपद नक्षत्र वार के साथ मिलकर सर्वार्थसिद्धि योग का निर्माण करता है। वहीं धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद और रेवती नक्षत्रों के प्रभाव में व्यापार की शुरुआत, यात्रा, मुंडन, सगाई और विवाह जैसे मांगलिक कार्य भी सफलतापूर्वक किए जा सकते हैं। इसलिए यह धारणा पूरी तरह गलत है कि पंचक में कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जा सकता।




निठल्ले के नोट्स - वेणु का नाद: मुरली, बंशी और बांसुरी का आध्यात्मिक दर्शन



कभी-कभी कोई वाद्य केवल वाद्य नहीं रहता। वह किसी सभ्यता की स्मृति बन जाता है, किसी प्रेमकथा की धड़कन बन जाता है और किसी देवता की पहचान तक बन जाता है। भारतीय संस्कृति में बाँस से बना एक छोटा-सा वाद्य ऐसा ही है—बाँसुरी। उसके साथ दो और शब्द चलते हैं—मुरली और बंशी। तीनों सुनने में अलग लगते हैं, लेकिन इनके बीच की दूरी उतनी नहीं है जितनी इनके नामों से लगता है। आम बोलचाल में ये शब्द प्रायः एक-दूसरे के पर्याय के रूप में प्रयुक्त होते हैं, हालांकि लोकपरंपराओं और वाद्य-विज्ञान में इनके आकार, स्वरूप और प्रयोग को लेकर कुछ भिन्नताएँ बताई जाती हैं।

और जब इन्हीं शब्दों के आगे ‘कृष्ण’ जुड़ जाता है, तो अर्थ अचानक बहुत बड़ा हो जाता है। बाँस का एक खोखला टुकड़ा संगीत का माध्यम बन जाता है, संगीत प्रेम का संदेश बन जाता है और प्रेम भक्ति का रास्ता।

बाँसुरी, बंशी और मुरली—तीन नाम, एक आत्मा

‘बाँसुरी’ शब्द को सामान्यतः बाँस से बने वाद्य के अर्थ में समझना सबसे सहज है। बाँस का खोखला तना, उसमें बनाए गए छिद्र और फूँक से पैदा होने वाली हवा की कंपन—इतनी-सी वैज्ञानिक संरचना से एक ऐसा संगीत जन्म लेता है, जिसे सुनकर मनुष्य हजारों वर्षों से भाव-विभोर होता आया है।

‘बंशी’ शब्द भी मूलतः इसी प्रकार के फूँक से बजाए जाने वाले वाद्य के लिए प्रयुक्त होता है। कृष्ण-काव्य और लोकभाषाओं में ‘बंशी’ शब्द विशेष रूप से लोकप्रिय हुआ। वहीं ‘मुरली’ का अर्थ भी बाँसुरी से जुड़ा है और संस्कृत तथा भारतीय साहित्यिक परंपरा में इसका व्यापक प्रयोग मिलता है।

अलग-अलग क्षेत्रों में इन नामों का इस्तेमाल अलग अर्थों में भी हुआ है। कहीं लंबी बाँसुरी को बंशी कहा गया, कहीं छोटी को मुरली; कहीं ‘मुरली’ सामान्य नाम है और ‘बंशी’ कृष्ण की बाँसुरी का काव्यात्मक नाम। इसलिए इन्हें तीन बिल्कुल अलग वाद्य मान लेना सही नहीं होगा। अधिक उचित यह कहना है कि ये एक ही बाँस-आधारित वाद्य-परंपरा के अलग नाम, रूप और सांस्कृतिक अर्थ हैं।

लेकिन कृष्ण की कथा में इन नामों का अर्थ केवल वाद्य से आगे निकल जाता है।

कृष्ण और उनकी मुरली का रिश्ता

कृष्ण की कल्पना बाँसुरी के बिना करना लगभग वैसा ही है जैसे वृंदावन की कल्पना बिना यमुना के करना। सिर पर मोरपंख, पीतांबर, अधरों पर मुस्कान और हाथ में बाँसुरी—कृष्ण की यह छवि भारतीय मानस में इतनी गहराई से बैठी है कि बाँसुरी स्वयं कृष्ण का प्रतीक बन गई है।

कृष्ण की बाँसुरी का संगीत सुनकर गोपियाँ अपने घर-आँगन, काम-काज और सामाजिक मर्यादाओं तक को भूलकर वृंदावन की ओर दौड़ पड़ती हैं—यह प्रसंग केवल प्रेमकथा नहीं है। भक्ति परंपरा ने इसमें एक गहरा आध्यात्मिक अर्थ खोजा। गोपियाँ यहाँ केवल स्त्रियाँ नहीं हैं; वे जीवात्मा का प्रतीक हैं और कृष्ण परमात्मा के।

बाँसुरी की पुकार सुनना अर्थात भीतर से आती उस आवाज को सुनना, जो मनुष्य को उसके वास्तविक अस्तित्व की ओर बुलाती है।

इसलिए कृष्ण की बाँसुरी में कोई शब्द नहीं, फिर भी वह सबसे बड़ा संदेश देती है।

बाँसुरी का सबसे बड़ा रहस्य—वह खोखली है

शायद कृष्ण की बाँसुरी का सबसे सुंदर दर्शन उसके संगीत में नहीं, उसके खोखलेपन में छिपा है।

बाँसुरी के भीतर अपना कुछ नहीं होता। वह खोखली होती है। उसमें से जब तक कोई हवा न गुजरे, वह मौन पड़ी रहती है। कृष्ण के अधरों का स्पर्श मिलता है और वही निष्प्राण बाँस बोल उठता है।

भक्ति की भाषा में यही तो मनुष्य की साधना है—अपने भीतर का अहंकार खाली करना।

जब तक ‘मैं’ भरा हुआ है, तब तक परम सत्ता के लिए जगह कहाँ है? बाँसुरी कहती है—अपने भीतर से अहंकार, स्वार्थ और दंभ को निकाल दो; फिर जीवन में किसी बड़ी शक्ति की साँस उतर सकती है।

कृष्ण की बाँसुरी इसलिए केवल प्रेम का प्रतीक नहीं, समर्पण का प्रतीक भी है।

वह जैसे कहती है—

खुद को इतना खाली कर लो कि ईश्वर तुम्हारे भीतर से अपनी धुन बजा सके।

कृष्ण की बाँसुरी में कितने छेद थे?

लोकप्रिय चित्रों में कृष्ण की बाँसुरी प्रायः लंबी दिखाई देती है और उसमें कई छेद होते हैं। भारतीय बाँसुरी की संरचना में सामान्यतः छह या सात उँगली-छेदों की परंपरा मिलती है, जबकि अलग-अलग प्रकार की बाँसुरियों में संरचना और छिद्रों की संख्या भिन्न हो सकती है।

कृष्ण की ‘मुरली’, ‘वंशी’ और ‘वेणु’ के बारे में पुराणों और कृष्ण-साहित्य में भी अलग-अलग वर्णन मिलते हैं। वैष्णव परंपरा में कृष्ण की बाँसुरी के कई रूपों का उल्लेख मिलता है—वेणु, मुरली और वंशी। इनके आकार और ध्वनि के संबंध में बाद की परंपराओं में अनेक रोचक विवरण विकसित हुए।

यही कारण है कि कृष्ण की बाँसुरी का कोई एक ऐतिहासिक ‘नक्शा’ तय कर देना कठिन है। कृष्ण की बाँसुरी जितनी ऐतिहासिक वस्तु है, उससे कहीं अधिक वह सांस्कृतिक कल्पना और आध्यात्मिक प्रतीक है।

बाँसुरी की खोज किसने की?

यह प्रश्न जितना सरल है, उत्तर उतना ही कठिन।

बाँसुरी का आविष्कार किसी एक व्यक्ति ने किया—ऐसा कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। बल्कि बाँसुरी उन वाद्यों में है जिनकी जड़ें मानव सभ्यता के अत्यंत पुराने संगीत-अनुभव में दिखाई देती हैं।

मनुष्य ने बहुत पहले यह देखा होगा कि खोखले पौधों के तनों में हवा गुजरने पर विचित्र ध्वनि पैदा होती है। संभव है कि किसी खोखली हड्डी, सरकंडे या बाँस के टुकड़े में स्वाभाविक रूप से बने छेद से उत्पन्न ध्वनि ने उसे प्रयोग के लिए प्रेरित किया हो। धीरे-धीरे उसमें छेद बनाए गए होंगे, लंबाई बदली गई होगी और उँगलियों से स्वरों को नियंत्रित करने की कला विकसित हुई होगी।

पुरातात्त्विक प्रमाण बताते हैं कि बाँसुरी जैसे वायु-वाद्य मानव सभ्यता के अत्यंत प्राचीन संगीत उपकरणों में शामिल रहे हैं। यूरोप में पाई गई कुछ प्रागैतिहासिक अस्थि-बाँसुरियाँ लगभग 35,000–40,000 वर्ष पुरानी मानी जाती हैं। चीन में भी प्राचीन अस्थि-बाँसुरियों के प्रमाण मिले हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि आधुनिक भारतीय बाँसुरी उसी समय या उसी स्थान से निकली, बल्कि इतना अवश्य है कि हवा से संगीत पैदा करने का मानवीय प्रयोग अत्यंत प्राचीन है।

भारत में बाँस और सरकंडे की प्रचुरता ने इस तरह के वाद्यों के विकास के लिए स्वाभाविक वातावरण उपलब्ध कराया।

इस दृष्टि से बाँसुरी किसी एक आविष्कारक की देन नहीं, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के बीच हजारों वर्षों की साझेदारी का परिणाम है।

बाँस—जो पेड़ से अधिक एक प्रतीक है

बाँसुरी की कहानी बाँस के बिना पूरी नहीं हो सकती।

बाँस तेज़ी से बढ़ता है, भीतर से खोखला होता है और फिर भी अत्यंत मजबूत होता है। भारतीय लोकजीवन में बाँस का उपयोग घर बनाने से लेकर टोकरी, कृषि उपकरण और अनेक घरेलू वस्तुओं तक में होता रहा है। उसी बाँस का एक टुकड़ा जब कलाकार के हाथ में आता है तो वह जीवन की उपयोगिता से उठकर कला की ऊँचाई तक पहुँच जाता है।

यहाँ भी एक सुंदर प्रतीक छिपा है।

बाँस अपनी पहचान छोड़कर बाँसुरी बनता है।

उसमें छेद किए जाते हैं, उसका आकार बदला जाता है, उसे सुखाया जाता है, तराशा जाता है। वह जितना अपने मूल रूप से दूर होता जाता है, उतना ही संगीत के करीब पहुँचता है।

क्या मनुष्य के साथ भी ऐसा नहीं?

जीवन हमें काटता है, छीलता है, भीतर से खाली करता है, फिर किसी दिन हमारी अपनी आवाज पैदा होती है।

शायद इसीलिए बाँसुरी भारतीय दर्शन में इतनी सहजता से आध्यात्मिक प्रतीक बन गई।

मुरली की पुकार और गोपियों का आकर्षण

कृष्ण की मुरली का सबसे प्रसिद्ध प्रसंग वृंदावन की गोपियों से जुड़ा है। कहा जाता है कि कृष्ण जब बाँसुरी बजाते थे तो उसकी ध्वनि केवल कानों तक नहीं पहुँचती थी, सीधे हृदय में उतरती थी।

कृष्ण की मुरली सुनकर गोपियाँ सब कुछ छोड़कर उनकी ओर खिंची चली आती थीं।

इसे यदि केवल सांसारिक प्रेम के रूप में पढ़ें तो कथा अधूरी रह जाती है। भक्ति साहित्य ने इसे आत्मा और परमात्मा के मिलन की आकांक्षा के रूप में देखा।

आत्मा जब अपने मूल से दूर होती है तो संसार के हजारों शोर के बीच भी उसे एक ऐसी ध्वनि सुनाई देती रहती है, जो केवल उसी के लिए है।

कृष्ण की मुरली वही ध्वनि है।

वह किसी को आदेश नहीं देती।

वह किसी को धमकाती नहीं।

वह कोई भाषण नहीं देती।

वह बस बजती है।

और जो उसके लिए तैयार है, वह सुन लेता है।

बाँसुरी का संगीत—शब्दों के बिना संवाद

मनुष्य ने संवाद के लिए भाषा बनाई। लेकिन संगीत ने भाषा से पहले ही संवाद करना सीख लिया था।

बाँसुरी का सबसे बड़ा सौंदर्य यही है कि उसे सुनने के लिए किसी भाषा का ज्ञान आवश्यक नहीं। न संस्कृत चाहिए, न हिंदी, न ब्रज। उसकी ध्वनि सीधे संवेदना से बात करती है।

कृष्ण का संदेश भी शायद इसी कारण बाँसुरी के माध्यम से अधिक प्रभावशाली लगता है।

गीता में कृष्ण ने अर्जुन को शब्द दिए; वृंदावन में उन्होंने बाँसुरी दी।

कुरुक्षेत्र में कृष्ण वाणी हैं।

वृंदावन में कृष्ण संगीत हैं।

कुरुक्षेत्र में वे कर्तव्य समझाते हैं।

वृंदावन में वे प्रेम जगाते हैं।

एक जगह कृष्ण कहते हैं कि कर्म करो; दूसरी जगह उनकी बाँसुरी जैसे कहती है—अपने भीतर सुनो।

दोनों मिलकर कृष्ण के व्यक्तित्व की पूर्णता बनाते हैं।

मुरली में न कोई भेद, न कोई सीमा

बाँसुरी की ध्वनि हवा के सहारे निकलती है। वह यह नहीं पूछती कि सुनने वाला राजा है या चरवाहा, मनुष्य है या पशु, धनी है या निर्धन।

वृंदावन की कृष्ण-कथा में तो यहाँ तक कहा जाता है कि उनकी मुरली सुनकर केवल गोपियाँ ही नहीं, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे और यमुना तक जैसे ठहर जाती थी।

यह साहित्यिक अतिशयोक्ति हो सकती है, लेकिन उसके भीतर एक गहरी सांस्कृतिक आकांक्षा है—ऐसा संगीत जो समूचे जीवन को जोड़ दे।

कृष्ण की बाँसुरी का यह संदेश आज भी प्रासंगिक है।

जिस संगीत में मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने की शक्ति हो, वही सच्चा संगीत है।

बाँसुरी और भारतीय संगीत परंपरा

भारतीय शास्त्रीय संगीत में बाँसुरी का विकास एक स्वतंत्र और अत्यंत समृद्ध परंपरा के रूप में हुआ। उत्तर भारत में बाँसुरी को हिंदुस्तानी संगीत की महत्वपूर्ण वाद्य परंपरा में स्थान मिला और दक्षिण भारत में भी बाँस से बने वायु-वाद्यों की अपनी परंपराएँ विकसित हुईं।

आधुनिक हिंदुस्तानी बाँसुरी को जिस ऊँचाई पर पहुँचाने का श्रेय मिलता है, उनमें पन्नालाल घोष का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने अपेक्षाकृत बड़ी बाँसुरी को शास्त्रीय संगीत के गंभीर मंच के लिए विकसित किया और उसकी संभावनाओं का विस्तार किया। बाद में हरिप्रसाद चौरसिया जैसे महान कलाकारों ने बाँसुरी को विश्वव्यापी पहचान दिलाई।

इस तरह जिस वाद्य को कभी चरवाहे की सहज धुन का साथी समझा जाता था, वह बड़े संगीत सभागारों और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुँच गया।

लेकिन उसकी आत्मा वही रही—बाँस, हवा और उँगलियों का संवाद।

एक दिलचस्प विरोधाभास

बाँसुरी में स्वयं कोई आवाज नहीं होती।

आवाज पैदा करने के लिए उसे किसी और की साँस चाहिए।

यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी है और सबसे बड़ी ताकत भी।

मनुष्य भी कुछ ऐसा ही है। अकेले में हम केवल एक संभावना हैं। किसी संबंध, किसी प्रेम, किसी विचार, किसी गुरु या किसी बड़ी चेतना की साँस हमें वह बना सकती है, जो हम अपने भीतर बनने की क्षमता रखते हैं।

कृष्ण की बाँसुरी शायद इसी कारण इतनी बड़ी प्रतीक बन गई।

वह कहती है—

तुम्हारे भीतर संगीत पहले से है; बस तुम्हें अपनी बाँसुरी को सही साँस के लिए उपलब्ध कराना है।

बंशी की धुन और प्रेम का दर्शन

कृष्ण की बंशी में प्रेम है, लेकिन यह प्रेम अधिकार नहीं मांगता।

कृष्ण बाँसुरी बजाते हैं और गोपियाँ आती हैं। वे किसी को बाँधकर नहीं लाते। बाँसुरी बुलाती है, खींचती नहीं।

यही प्रेम और स्वामित्व का अंतर है।

सच्चा प्रेम सामने वाले को स्वतंत्र रखते हुए भी अपने पास आने की इच्छा पैदा करता है।

शायद इसीलिए कृष्ण की बाँसुरी भारतीय प्रेम-दर्शन में इतनी महत्वपूर्ण है। वह प्रेम को आदेश नहीं, आमंत्रण बनाती है।

कृष्ण का संगीत कहता है—

आओ, यदि मन कहता है।

न आओ, तो भी स्वतंत्र हो।

प्रेम में अधिकार से अधिक आकर्षण है, आग्रह से अधिक समर्पण है और शब्दों से अधिक मौन है।

मुरली का एक और संदेश—अहंकार छोड़ो

बाँसुरी के पास अपनी कोई धुन नहीं होती।

धुन वादक की साँस और उँगलियों से आती है।

यदि बाँसुरी कहने लगे—‘मैं स्वयं बजती हूँ’, तो संगीत समाप्त हो जाएगा।

मनुष्य का अहंकार भी कुछ ऐसा ही है। हम अक्सर अपनी उपलब्धियों को ‘मैं’ से जोड़ते हैं—मैंने किया, मैंने पाया, मैंने बनाया।

कृष्ण की मुरली इससे बिल्कुल उलटा दर्शन देती है।

वह जैसे कहती है—

अपने भीतर से ‘मैं’ थोड़ा कम करो; शायद तब तुम्हारे भीतर से कोई बड़ी धुन निकल सके।

यही कारण है कि कृष्ण की बाँसुरी को भक्ति में आत्मसमर्पण का प्रतीक माना गया।

और अंत में—कृष्ण की बाँसुरी क्यों अमर है?

राजाओं के पास महल थे।

योद्धाओं के पास शस्त्र थे।

ऋषियों के पास शास्त्र थे।

कृष्ण के पास बाँसुरी थी।

उन्होंने संसार को जीतने के लिए बाँसुरी नहीं बजाई। उन्होंने किसी पर शासन करने के लिए भी उसे नहीं बजाया। उनकी बाँसुरी ने किसी साम्राज्य की सीमा नहीं बढ़ाई।

उसने केवल हृदयों की सीमाएँ मिटाईं।

यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है।

मुरली, बंशी और बाँसुरी के नाम भले अलग हों, लेकिन कृष्ण के संदर्भ में तीनों एक ही अनुभव की ओर ले जाते हैं—प्रेम की पुकार, आत्मा का आकर्षण और अहंकार से मुक्ति।

एक साधारण बाँस का टुकड़ा जब कृष्ण के अधरों से लगता है तो वह साधारण नहीं रहता। उसमें से निकलने वाली हवा स्वर बनती है, स्वर संगीत बनता है, संगीत प्रेम बनता है और प्रेम अंततः भक्ति में बदल जाता है।

शायद कृष्ण की बाँसुरी का सबसे बड़ा संदेश यही है—

जीवन को इतना मत भर लो कि उसमें किसी और की साँस के लिए जगह ही न बचे।

थोड़ा खाली रहो।

थोड़ा झुको।

थोड़ा समर्पित हो जाओ।

क्योंकि हो सकता है, तुम्हारे भीतर भी कोई बाँसुरी पड़ी हो—
जिसे अभी तक किसी कृष्ण की साँस का इंतज़ार हो।


सृष्टि के आरंभ में जब पवन ने खोखले बाँस के तनों को छुआ होगा, तब प्रकृति ने स्वयं अपना पहला संगीत सुना होगा। सुषिर् वाद्य यानी फूँककर बजाए जाने वाले वाद्य यंत्रों का इतिहास उतना ही प्राचीन है जितनी स्वयं मानव चेतना। वैदिक साहित्य में जिस 'वेणु' या 'नाड़ी' का उल्लेख मिलता है, वही लोकजीवन में ढलकर बांसुरी, मुरली और बंशी बनी। यह केवल खोखले बाँस का टुकड़ा नहीं, बल्कि प्रकृति और ब्रह्म के मिलन का पहला संगीतमय साक्ष्य है। समय के साथ यह वाद्य न केवल भारतीय संगीत का मुख्य आधार बना, बल्कि लोक परंपराओं से लेकर आध्यात्मिक दर्शन का भी एक अटूट हिस्सा बन गया।
आम जनमानस प्रायः मुरली, बंशी और बांसुरी को एक ही मान लेता है, किंतु इनकी बनावट, ध्वनि और शास्त्रीय प्रयोग में सूक्ष्म भेद हैं। बांसुरी इस श्रेणी का सामान्य और सार्वभौमिक नाम है, जो 'बाँस' और 'सुर' के योग से बना है। यह आकार में बड़ी तथा गँभीर ध्वनि उत्पन्न करने वाली होती है, जिसे प्रायः आड़ी (ट्रांसवर्स) रखकर बजाया जाता है और इसमें छह या सात छिद्र होते हैं। वहीं मुरली आकार में बांसुरी से थोड़ी छोटी और तीक्ष्ण स्वर वाली होती है। इसके मुख की ओर एक सीधा छिद्र होता है जिससे फूँक मारना अपेक्षाकृत सहज होता है, इसलिए लोक संगीत और चरवाहों की संगति में इसका प्रयोग अधिक हुआ। इसके विपरीत, बंशी अत्यंत सूक्ष्म, पतली और मधुर तान वाली होती है। शास्त्रों में वेणु के उसी कोमल रूप को बंशी कहा गया है, जिसकी ध्वनि सीधे हृदय के तारों को झंकृत करती है।
पौराणिक अनुश्रुति है कि द्वापर युग में जब भगवान शिव अपने आराध्य बाल-कृष्ण के दर्शन हेतु गोकुल पहुँचे, तो उन्होंने महर्षि दधीचि की अस्थियों से निर्मित एक अद्भुत वेणु श्रीकृष्ण को भेंट की थी। श्रीकृष्ण का इन तीनों वाद्य यंत्रों से संबंध उनके जीवन के अलग-अलग सोपानों को दर्शाता है। बांसुरी उनके बाल-रूप और प्रकृति-प्रेम की सहचरी है, मुरली गोचारण और सखाओं को एकत्र करने का साधन है, और बंशी श्रीमद्भागवत के रासपंचाध्यायी की वह अमर तान है जो जीवात्मा को परमात्मा की ओर आकर्षित करती है। ब्रज की परंपराओं में यह माना जाता है कि जब कान्हा की बंशी बजती थी, तो पूरी सृष्टि स्थिर हो जाती थी और नदियाँ अपनी धारा रोककर सुनती थीं।
इन काष्ठ-वाद्यों के माध्यम से श्रीकृष्ण का संदेश अत्यंत गूढ़ और व्यावहारिक है। बाँस का खोखलापन मनुष्य को शून्यता अर्थात अहंकार त्याग का संदेश देता है; जब तक मन से द्वेष और अहम् खाली नहीं होगा, ईश्वरीय संगीत का प्रवाह संभव नहीं है। बाँस का स्वयं में मौन रहकर वादक की फूँक के आगे समर्पित हो जाना ही ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना है। इसके साथ ही, एक बाँस को काटने, सुखाने और अग्नि से तपाकर छिद्र किए जाने की प्रक्रिया यह सिखाती है कि जीवन में निखार और मधुरता संघर्षों और सहिष्णुता के बाद ही आती है।
एक सुंदर पौराणिक प्रसंग में राधा जी ने बंशी से ईर्ष्या व्यक्त करते हुए पूछा था कि उसने ऐसा कौन सा पुण्य किया है जो वह दिन-रात मोहन के अधरों से लगी रहती है। इस पर बंशी ने उत्तर दिया कि उसने अपना संपूर्ण अस्तित्व मिटा दिया है और अपने भीतर की सभी गाँठों को जला दिया है; अब उसके पास अपना कुछ नहीं बचा, इसलिए जो फूँक मोहन भरते हैं, वही स्वर बनकर बहता है। इस प्रकार बांसुरी केवल एक वाद्य नहीं, बल्कि भारतीय अध्यात्म का वह जीवित रूपक है जो सिखाता है कि जीवन के सीधे-सपाट पोरों में यदि समर्पण के छिद्र कर दिए जाएँ, तो हर साँस एक मधुर राग बन सकती है।

गुरुवार, 3 सितंबर 2026

निठल्ले के नोट्स: दराज़ का इतिहास, परंपरा और परिवर्तन


एक छोटी-सी जगह में छिपी मनुष्य की बड़ी स्मृति

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घर में रखी कोई पुरानी अलमारी खोलिए। उसके भीतर कपड़ों की तहों, पुराने कागजों और किताबों के बीच कहीं एक दराज़ होगी। हो सकता है उसमें चाबियों का गुच्छा हो, पुराने बिल हों, कुछ सिक्के हों, किसी रिश्तेदार का पत्र हो, बचपन की कोई तस्वीर हो या फिर ऐसी चीजें हों जिनका कोई उपयोग नहीं, लेकिन जिन्हें फेंकने का मन भी नहीं होता। दराज़ केवल लकड़ी का बना हुआ खिसकने वाला खाना नहीं है। वह मनुष्य की सहेजने की आदत, छिपाने की प्रवृत्ति और स्मृतियों को बचाकर रखने की इच्छा का भी एक छोटा-सा वास्तुशिल्प है।

अलमारी के बड़े खाने में चीजें दिखाई देती हैं, संदूक में चीजें ढेर बनकर रहती हैं, लेकिन दराज़ चीजों को क्रम देती है, सीमा देती है और निजता देती है। शायद इसलिए दराज़ का इतिहास केवल फर्नीचर के विकास का इतिहास नहीं, बल्कि मनुष्य की बदलती जीवन-शैली, संपन्नता, निजता और व्यवस्था-बोध का इतिहास भी है।

संदूक से दराज़ तक

दराज़ के इतिहास को समझने के लिए हमें उससे भी पीछे जाना होगा—उस समय में जब मनुष्य ने अपनी वस्तुओं को रखने के लिए संदूक, पेटी और लकड़ी के बक्से बनाने शुरू किए। मध्यकालीन यूरोप में संदूक या coffer घरेलू जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा था। वह केवल सामान रखने की जगह नहीं था; कई बार वही बैठने की जगह, मेज और सामान ढोने का साधन भी बन जाता था।

लेकिन संदूक की एक बड़ी समस्या थी। उसमें रखी चीज तक पहुंचने के लिए ऊपर का ढक्कन खोलना पड़ता था और भीतर रखी वस्तुओं को उलट-पुलट कर खोजना पड़ता था। यदि ऊपर कपड़े रखे हैं और नीचे कोई जरूरी कागज, तो कागज तक पहुंचने के लिए पूरा संसार हटाना पड़ता था।

मनुष्य को तब एक सरल-सा विचार आया—सामान को ऊपर से निकालने के बजाय सामने से क्यों न निकाला जाए?

यहीं से दराज़ की अवधारणा ने आकार लेना शुरू किया।

प्रारंभिक रूप में बड़े संदूक के नीचे एक छोटा-सा खिसकने वाला खाना जोड़ा गया। धीरे-धीरे मुख्य संदूक के भीतर के हिस्से भी अलग-अलग खानों में विभाजित होने लगे और ढक्कन का महत्व कम होता गया। फर्नीचर के इतिहास में यह एक महत्वपूर्ण परिवर्तन था। उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार आधुनिक अर्थ में chest of drawers का विकास विशेष रूप से 17वीं सदी में हुआ और सदी के अंत तक उसका मूल रूप काफी हद तक स्थापित हो चुका था।

अर्थात दराज़ का जन्म किसी एक दिन, किसी एक व्यक्ति या किसी एक देश में नहीं हुआ। यह संदूक से सुविधा की ओर बढ़ते हुए फर्नीचर के क्रमिक विकास का परिणाम था।

सत्रहवीं सदी : दराज़ का व्यवस्थित जन्म

17वीं सदी में यूरोप में बढ़ती संपन्नता, बदलती घरेलू संस्कृति और कुशल कारीगरी ने फर्नीचर के नए रूपों को जन्म दिया। आरंभिक chests of drawers अपेक्षाकृत छोटे होते थे। लकड़ी पर नक्काशी, उभरे हुए पैनल और सजावटी किनारे बनाए जाते थे। धीरे-धीरे दराज़ों की संख्या बढ़ी और फर्नीचर का पूरा ढांचा ही दराज़ों से बनने लगा।

इंग्लैंड में 17वीं सदी के उत्तरार्ध तक दराज़ वाला संदूक मध्यमवर्गीय घरों में भी पहुंचने लगा। शुरुआती दौर में ओक जैसी लकड़ी का इस्तेमाल व्यापक था; बाद में अखरोट और महोगनी जैसी लकड़ियां भी फर्नीचर निर्माण में लोकप्रिय हुईं।

यही वह समय था जब दराज़ ने केवल भंडारण की सुविधा से आगे बढ़कर फर्नीचर की एक स्वतंत्र पहचान हासिल की।

फ्रांस में भी 17वीं सदी के दौरान दराज़दार फर्नीचर के रूप विकसित हुए। फ्रांसीसी शाही दरबार और अभिजात वर्ग में इसका सौंदर्यपरक विकास हुआ। एंड्रे-शार्ल बूल जैसे प्रसिद्ध कारीगरों ने दराज़दार फर्नीचर को केवल उपयोगी वस्तु नहीं रहने दिया, बल्कि उसे कला का रूप दिया। वॉलस कलेक्शन के अनुसार 17वीं सदी को आधुनिक डेस्क और chest of drawers जैसे सफल फर्नीचर रूपों के जन्म का महत्वपूर्ण काल माना जाता है।

दराज़ जब घर की हैसियत बताने लगी

एक समय था जब घर में दराज़ होना ही सुविधा का संकेत था। फिर एक समय आया जब दराज़ की बनावट, लकड़ी, पकड़ और सजावट घर की आर्थिक हैसियत बताने लगी।

धनी परिवारों की दराज़ों पर महंगी लकड़ी की परतें, सजावटी धातु, नक्काशी, जड़ाऊ काम और marquetry जैसी तकनीकें दिखाई देने लगीं। दराज़ों के हैंडल तक कला का हिस्सा बन गए।

18वीं सदी में दराज़दार फर्नीचर के आकार और शैली में भी खूब प्रयोग हुए। कहीं आगे की सतह उभरी हुई थी, कहीं सांप की तरह लहरदार (serpentine) और कहीं पेट के आकार की घुमावदार (bombé)। पैरों और हैंडल की डिजाइन भी समय के साथ बदलती रही।

यानी दराज़ अब केवल यह नहीं कहती थी कि “यहां सामान रखा जाता है।” वह यह भी कहने लगी थी—“यह सामान किस तरह के घर में रखा जाता है।”

लंबी दराज़ और 'टॉल बॉय' का जमाना

मनुष्य की एक विचित्र आदत है—जब जगह कम पड़े तो वह चीज को बड़ा करने लगता है।

दराज़ों के साथ भी यही हुआ। छोटी चौड़ी दराज़ों से आगे बढ़कर लंबी और ऊंची दराज़दार अलमारियां बनीं। इंग्लैंड में tallboy या अमेरिका में highboy जैसे फर्नीचर रूप लोकप्रिय हुए। 1700 से 1775 के बीच इंग्लैंड में tallboy विशेष रूप से लोकप्रिय रहा।

लेकिन ऊंचाई बढ़ाने की भी एक सीमा थी। ऊपर की दराज़ इतनी ऊंची हो गई कि उसे खोलने के लिए कभी-कभी सीढ़ी या स्टूल की जरूरत पड़ती थी। फर्नीचर का इतिहास हमें यहां एक सुंदर व्यंग्य सुनाता है—सुविधा पैदा करने के लिए बनाई गई चीज जब जरूरत से ज्यादा सुविधाजनक बनने की कोशिश करती है, तो खुद असुविधा बन जाती है।

भारत में दराज़ : संदूक, पेटी से औपनिवेशिक फर्नीचर तक

भारत में वस्तुएं सहेजने की अपनी समृद्ध परंपरा पहले से थी। संदूक, पेटियां, मंजूषाएं, कपड़ों की पेटियां, लकड़ी के बक्से और विभिन्न प्रकार की अलमारियां भारतीय घरेलू जीवन का हिस्सा रहे हैं। स्थानीय कारीगर लकड़ी, धातु, हाथीदांत, नक्काशी, चित्रकारी और जड़ाऊ तकनीकों से भंडारण की वस्तुओं को सजाते रहे।

औपनिवेशिक काल में यूरोपीय फर्नीचर के अनेक रूप भारतीय घरों और दफ्तरों में आए। अंग्रेजी शैली की मेज, ब्यूरो, अलमारी और दराज़दार कैबिनेट धीरे-धीरे शहरी मध्यवर्गीय जीवन का हिस्सा बनने लगे। भारतीय कारीगरों ने विदेशी रूपों को जस का तस स्वीकार नहीं किया; उन्होंने स्थानीय लकड़ी, नक्काशी और शिल्प परंपराओं के साथ उनका मेल किया।

इस तरह भारत में दराज़ केवल पश्चिम से आयी वस्तु नहीं बनी, बल्कि स्थानीय कारीगरी और वैश्विक फर्नीचर संस्कृति के मेल का परिणाम भी बनी।

दराज़ और मनुष्य की निजता

दराज़ का एक बहुत महत्वपूर्ण गुण है—वह चीजों को छिपा सकती है।

अलमारी खुली हो तो उसके भीतर रखी चीजें दिखाई दे सकती हैं। लेकिन दराज़ बंद होते ही भीतर की दुनिया अदृश्य हो जाती है। शायद इसी कारण दराज़ का संबंध मनुष्य की निजता से भी गहरा हुआ।

एक बच्चे की दराज़ में कंचे, कंचे से भी छोटे रहस्य और स्कूल की पर्चियां हो सकती हैं। किसी युवक की दराज़ में प्रेमपत्र हो सकता है। किसी वृद्ध की दराज़ में वर्षों पुराने खत और तस्वीरें। किसी कार्यालय की दराज़ में गोपनीय दस्तावेज। किसी मां की दराज़ में बच्चों की पहली चूड़ी या अस्पताल की पुरानी पर्ची।

दराज़ की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह वस्तुओं को केवल सुरक्षित नहीं रखती, उन्हें निजी बनाती है।

इसीलिए दुनिया के साहित्य में भी दराज़, संदूक, बंद डिब्बे और गुप्त खाने अक्सर रहस्य और स्मृति के प्रतीक बनते रहे हैं।

कार्यालय की दराज़ : कागजों की छोटी दुनिया

आधुनिक दफ्तर ने दराज़ को एक नया जीवन दिया।

लेखक की मेज की दराज़ में पांडुलिपियां, पत्रकार की दराज़ में नोट्स, क्लर्क की दराज़ में फाइलें, डॉक्टर की दराज़ में जरूरी सामान और शिक्षक की दराज़ में कॉपियां—हर पेशे ने दराज़ को अपनी जरूरत के अनुसार अपना लिया।

विशेष रूप से लेखन-मेज के साथ दराज़ का रिश्ता बेहद गहरा हुआ। डेस्क और कैबिनेट के विकास में दराज़ों की संख्या बढ़ती गई और लेखन सामग्री, दस्तावेजों तथा निजी वस्तुओं के लिए अलग-अलग स्थान बनने लगे। 17वीं सदी के उत्तरार्ध में bureau और दराज़दार फर्नीचर के कई रूप विकसित हुए।

इससे एक नया विचार पैदा हुआ—व्यवस्था।

दराज़ ने मनुष्य को सिखाया कि हर वस्तु का अपना घर हो सकता है।

कलम यहां, कागज वहां, चाबी इस खाने में, दस्तावेज उस खाने में।

दराज़ वास्तव में घर के भीतर बनाया गया एक छोटा-सा वर्गीकरण तंत्र है।

भारतीय घर की दराज़

भारत में दराज़ का एक अपना घरेलू चरित्र भी विकसित हुआ।

पुरानी लकड़ी की मेज की दराज़ खोलिए तो उसमें एक पूरा भारतीय घर मिल सकता है—पुराने सिक्के, बिजली का बिल, पेंचकस, माचिस, सुई-धागा, किसी शादी का निमंत्रण, पेन की आधी स्याही वाली रिफिल, पुरानी चाबी और वह रबर बैंड जिसे पिछले पांच साल से किसी काम में नहीं लिया गया।

दराज़ भारतीय परिवार की “काम आ जाएगा” संस्कृति की भी सबसे बड़ी संरक्षक है।

जो वस्तु आज काम की नहीं, उसे फेंकना क्यों?
कभी तो काम आएगी।

और इस 'कभी' की उम्मीद में दराज़ भरती जाती है।

धीरे-धीरे घर में दराज़ों की संख्या बढ़ती है और हर दराज़ अपने भीतर एक छोटा-सा इतिहास जमा करती जाती है।

दराज़ और स्मृति

शायद दुनिया की कोई भी दराज़ पूरी तरह खाली नहीं होती।

भले उसमें वस्तुएं न हों, लेकिन उसकी लकड़ी में हाथों के निशान होते हैं। उसकी रेलिंग में वर्षों की आवाजाही होती है। उसके हैंडल पर अनगिनत उंगलियों की चमक होती है।

पुरानी दराज़ खोलते समय कभी-कभी लकड़ी की एक विशेष गंध आती है। वह गंध केवल लकड़ी की नहीं होती—वह समय की गंध होती है।

एक पुरानी दराज़ में रखा पत्र उस व्यक्ति से ज्यादा पुराना हो सकता है जिसने उसे संभालकर रखा है। एक तस्वीर उस घर के उन लोगों को वापस ला सकती है जो अब वहां नहीं हैं। किसी बच्चे की पहली लिखावट, पिता की पुरानी डायरी या मां की लिखी कोई पर्ची—दराज़ इन सबको समय के अंधेरे में बचाकर रख सकती है।

इस अर्थ में दराज़ एक तरह का घरेलू अभिलेखागार है।

औद्योगिक युग ने दराज़ को बदल दिया

औद्योगिक क्रांति और बड़े पैमाने पर फर्नीचर निर्माण ने दराज़ को हस्तनिर्मित विलासिता से निकालकर सामान्य घरेलू वस्तु बना दिया।

पहले दराज़ का निर्माण कारीगर की कला था; बाद में मशीनों ने उसे मानकीकृत करना शुरू किया। लकड़ी की कटाई, जोड़, धातु के हैंडल, रेल और माप—सब कुछ औद्योगिक उत्पादन का हिस्सा बनने लगा।

दराज़ अब राजमहलों से निकलकर सामान्य घरों, स्कूलों, कार्यालयों और दुकानों तक पहुंच गई।

यही वह क्षण था जब दराज़ विलासिता से आवश्यकता बन गई।

दराज़ की तकनीक : साधारण दिखने वाली जटिलता

हम दराज़ खींचते हैं और वह बाहर आ जाती है। काम इतना सरल लगता है कि हम उसके पीछे की तकनीक भूल जाते हैं।

लेकिन एक अच्छी दराज़ बनाना हमेशा आसान नहीं रहा। लकड़ी में नमी के कारण फैलाव और सिकुड़न, भार, घर्षण, जोड़ की मजबूती और सही संतुलन—इन सभी ने दराज़ बनाने वालों के सामने तकनीकी चुनौतियां रखीं।

पुरानी दराज़ों में लकड़ी के साधारण स्लाइडिंग तंत्र और अलग-अलग प्रकार के जोड़ मिलते हैं। बाद में बेहतर जोड़, धातु की रेल और फिर बॉल-बेयरिंग आधारित स्लाइडिंग सिस्टम विकसित हुए। आधुनिक फर्नीचर में तो ऐसी दराज़ें भी हैं जो हल्के धक्के से स्वयं बंद हो जाती हैं।

यानी जिस दराज़ को हम रोज खींचकर खोलते हैं, उसके पीछे सदियों की कारीगरी और इंजीनियरिंग छिपी है।

प्लास्टिक और प्लाईवुड से लेकर मॉड्यूलर फर्नीचर तक

20वीं सदी में फर्नीचर की दुनिया बदल गई। ठोस लकड़ी के साथ प्लाईवुड, पार्टिकल बोर्ड, एमडीएफ, प्लास्टिक और धातु का इस्तेमाल बढ़ा। फर्नीचर हल्का, सस्ता और बड़े पैमाने पर उत्पादित होने लगा।

दराज़ भी बदल गई।

अब वह भारी लकड़ी की पेटी नहीं रही। वह बेड के भीतर हो सकती है, सोफे के नीचे हो सकती है, रसोई के मॉड्यूल में हो सकती है, कार्यालय की घूमने वाली कैबिनेट में हो सकती है या दीवार में बने आधुनिक स्टोरेज सिस्टम का हिस्सा हो सकती है।

आज की छोटी शहरी रसोई में तो दराज़ों ने अलमारियों से एक तरह की जगह छीन ली है। बर्तनों से लेकर मसालों और चम्मचों तक—हर वस्तु के लिए विशेष आकार की दराज़ बनाई जा सकती है।

स्मार्ट दराज़ का युग

अब दराज़ केवल लकड़ी की नहीं रही।

आधुनिक फर्नीचर में soft-close प्रणाली है, जिसमें दराज़ जोर से बंद होने के बजाय धीरे-धीरे बंद होती है। Push-to-open तकनीक में हैंडल की आवश्यकता तक समाप्त हो सकती है। कुछ आधुनिक प्रणालियों में सेंसर और विद्युत नियंत्रण भी जोड़े जा रहे हैं।

रसोई में ऐसी दराज़ें हैं जो सामान को अलग-अलग स्तरों पर व्यवस्थित करती हैं। अस्पतालों और प्रयोगशालाओं में विशेष उद्देश्य की दराज़ें हैं। कार्यालयों में लॉक होने वाली दराज़ें हैं। संग्रहालयों और अभिलेखागारों में तापमान, नमी और सुरक्षा को ध्यान में रखकर विशेष स्टोरेज ड्रॉअर बनाए जाते हैं।

दराज़ अब केवल फर्नीचर का हिस्सा नहीं, एक डिजाइन-सिस्टम बन चुकी है।

और फिर आई डिजिटल दराज़

लेकिन कहानी यहां सबसे रोचक हो जाती है।

कभी मनुष्य अपने कागज दराज़ में रखता था। फिर फाइलों की अलमारी आई। फिर कंप्यूटर आया। और अब हमारी बहुत-सी 'दराज़ें' दिखाई ही नहीं देतीं।

मोबाइल फोन में Downloads, Documents, Archive, Saved, Drafts और Folders—क्या ये डिजिटल दराज़ें नहीं हैं?

ई-मेल का Archive एक डिजिटल दराज़ है। कंप्यूटर का Folder एक डिजिटल दराज़ है। फोन की Gallery का कोई निजी Album एक डिजिटल दराज़ है। क्लाउड स्टोरेज में सुरक्षित पुरानी फाइलें भी किसी न किसी अर्थ में डिजिटल संदूक और दराज़ ही हैं।

फर्क केवल इतना है कि पुरानी दराज़ लकड़ी की थी, आज की दराज़ कोड और स्क्रीन की बनी हुई है।

पहले चाबी से दराज़ खुलती थी। अब पासवर्ड से खुलती है।

पहले दराज़ में प्रेमपत्र छिपता था, अब मोबाइल के किसी Locked Folder में।

पहले पिता की मेज की दराज़ निजी थी, अब किसी व्यक्ति का Password Manager।

मनुष्य बदला है, उसकी जरूरत नहीं।

दराज़ का सबसे बड़ा परिवर्तन

दराज़ के इतिहास को यदि एक वाक्य में कहना हो तो कहा जा सकता है—

दराज़ ने आकार बदला है, लेकिन उसका उद्देश्य नहीं।

पहले उसने मनुष्य को सामान व्यवस्थित करने में मदद की। फिर उसने निजी वस्तुओं को सुरक्षित रखने का काम किया। बाद में उसने दस्तावेजों और स्मृतियों को संभाला। आधुनिक युग में उसने जगह बचाने की कला सीखी और डिजिटल युग में उसने अपना भौतिक शरीर तक छोड़ दिया।

आज हमारे पास शायद पहले से अधिक दराज़ें हैं—बस उनमें से बहुत-सी दिखाई नहीं देतीं।

दराज़ : मनुष्य के भीतर का एक रूपक

दराज़ को यदि थोड़ा दार्शनिक होकर देखें तो वह मनुष्य के मन जैसी लगती है।

हमारे भीतर भी कितनी दराज़ें हैं।

एक में बचपन रखा है।
एक में प्रेम।
एक में असफलताएं।
एक में पुराने दोस्त।
एक में वे बातें जिन्हें हम किसी से नहीं कहते।
एक में वे सपने जिन्हें हमने कभी पूरा नहीं किया।
और एक ऐसी दराज़ भी होती है जिसे हम वर्षों से खोलना नहीं चाहते।

बाहर से मनुष्य एक ही दिखाई देता है, लेकिन भीतर अनेक खाने होते हैं।

शायद इसीलिए दराज़ हमें इतनी परिचित लगती है। वह हमारे घर में रखी हुई वस्तु कम और हमारे भीतर की संरचना का बाहरी रूप अधिक है।

अंत में

संदूक से शुरू हुई कहानी दराज़ तक पहुंची। दराज़ ने घर को व्यवस्थित किया, कार्यालय को अनुशासित किया, वस्तुओं को निजी बनाया और स्मृतियों को बचाने की जगह दी। उसने राजमहलों से मध्यवर्गीय घरों तक का सफर किया और फिर डिजिटल दुनिया में प्रवेश कर लिया।

आज हम किसी पुराने फर्नीचर की दराज़ खोलते हैं तो उसमें केवल वस्तुएं नहीं मिलतीं—एक समय मिलता है।

लकड़ी की वह छोटी-सी जगह हमें बताती है कि मनुष्य हमेशा से कुछ चीजों को अपने पास रखना चाहता रहा है—जरूरी चीजें, उपयोगी चीजें, मूल्यवान चीजें और सबसे बढ़कर, वे चीजें जिनसे उसका कोई भावनात्मक रिश्ता है।

इसीलिए दराज़ का इतिहास वास्तव में लकड़ी, लोहे और फर्नीचर का इतिहास नहीं है। यह मनुष्य की स्मृति, निजता, व्यवस्था और संचय की प्रवृत्ति का इतिहास है।

और शायद इसीलिए हर घर में कोई न कोई दराज़ ऐसी जरूर होती है जिसे खोलते ही सामान कम और **बीता हुआ जीवन ज्यादा दिखाई देता है।**


लकड़ी का वह एक छोटा-सा आयताकार डिब्बा, जो खिसककर बाहर आता है और फिर ख़ामोशी से अंदर समा जाता है—इसे हम 'दराज' कहते हैं। सरसरी नज़र से देखें, तो यह महज़ फ़र्नीचर का एक हिस्सा भर है। लेकिन अगर थोड़ी गहराई में उतरकर सोचें, तो दराज मनुष्य के जीवन, उसके इतिहास और उसकी गोपनीयता की सबसे सुरक्षित पनाहगाह है।

दराज का इतिहास: सादगी से नफ़ासत तक

मानव सभ्यता जब खानाबदोश जीवन से निकलकर स्थायित्व की ओर बढ़ी, तो उसे चीज़ों को संभालने की ज़रूरत महसूस हुई। प्राचीन काल में बड़े-बड़े बक्से या तिजोरियाँ हुआ करती थीं। लेकिन जैसे-जैसे इंसान की ज़िंदगी में काग़ज़ात, गहने, खत और छोटी-मोटी चीज़ों का दखल बढ़ा, बड़े बक्सों की जगह सूक्ष्म और सुलभ व्यवस्था ने ले ली।

पुनर्जागरण काल में यूरोप के कारीगरों ने मेज़ों और अलमारियों के पेट में लकड़ी के छोटे बक्से बिठाने शुरू किए। यही दराज का शुरुआती रूप था। 17वीं और 18वीं सदी तक आते-आते 'ब्यूरो' और 'ड्रेसर' के रूप में दराजें हर संभ्रांत घर का ज़रूरी हिस्सा बन गईं। भारत में भी राजघरानों के भारी-भरकम शीशम और सागौन के संदूकों से लेकर मुंशी जी की लकड़ी की डेस्क तक—दराज ने धीरे-धीरे अपना एक खास स्थान बना लिया।

परंपरा और भावना: स्मृतियों का गुपचुप घर

दराज सिर्फ़ सामान रखने की जगह नहीं, बल्कि हमारी परंपराओं और भावनाओं का एक मूक गवाह है। हमारे घरों में हर दराज का अपना एक अनकहा 'व्यक्तित्व' होता है:

 * घर के बड़े-बुजुर्गों की दराज: इसमें हमेशा एक अजीब-सी पुरानी महक होती है—दवाइयों की पर्चियाँ, पीली पड़ चुकीं पुरानी रसीदें, पीतल की चाबियाँ, और शायद किसी पुराने चश्मे का केस।

 * बच्चों की दराज: कंचे, टूटे हुए खिलौने, कोई रंगीन पत्थर, और पेंसिल के छिलके—यह दराज बचपन के किसी अनसुलझे ख़ज़ाने जैसी होती है।

 * गुप्त दराज (Secret Drawer): पुराने ज़माने में कारीगर फर्निचर में ऐसी गुप्त दराजें बनाते थे, जिनका पता सिर्फ़ मालिक को होता था। इनमें प्रेम-पत्र, वसीयत या ख़ानदानी ज़ेवर रखे जाते थे।

दराज के साथ एक परंपरा यह भी जुड़ी रही है कि यह इंसान की व्यक्तिगत आज़ादी की पहली सीमा रेखा है। "मेरी दराज मत खोलना"—यह वाक्य किसी भी घर में निजता (privacy) का पहला पाठ होता है।

समय के साथ आए परिवर्तन: लकड़ी से डिजिटल स्क्रीन तक

समय बदला, तो दराज का रूप और चरित्र भी बदल गया।

 * सामग्री और बनावट: पहले की दराजें भारी लकड़ी, पीतल के कुंदों और बारीक नक्काशी से बनती थीं। उन्हें खोलने पर लकड़ी के रगड़ खाने की एक सोंधी-सी आवाज़ आती थी। आज की दराजें प्लाईवुड, प्लास्टिक या स्टील की हैं। इनमें मखमली हाइड्रोलिक चैनल लगे हैं, जो बिना किसी आवाज़ के झटके से बंद हो जाती हैं। नक्काशी की जगह अब मिनिमलिस्टिक design ने ले ली है।

 * समीकरणों में बदलाव: आधुनिक दौर में जहाँ घर छोटे और फ़्लैट कल्चर वाले हो गए हैं, दराजें अब बहुउपयोगी (multi-functional) हो गई हैं। बेड के नीचे, सोफ़े के अंदर, यहाँ तक कि सीढ़ियों के पायदानों में भी दराजें छिपी हैं।

 * भौतिक से आभासी (Virtual Drawer): सबसे बड़ा परिवर्तन 21वीं सदी में आया है। अब हमारी सबसे महत्वपूर्ण चीज़ें लकड़ी की दराज में नहीं, बल्कि लैंपटॉप या स्मार्टफोन की 'डिजिटल दराज' (Folders, Cloud Storage, Vaults) में रखी जाती हैं। पासवर्ड और बायोमेट्रिक लॉक ने पुरानी चाबियों की जगह ले ली है।

हालाँकि आज के डिजिटल युग में दस्तावेज़ और तस्वीरें स्क्रीन के पीछे सिमट गई हैं, लेकिन लकड़ी की उस पारंपरिक दराज की जगह कोई नहीं ले सकता। आज भी जब हम किसी पुरानी दराज को खींचकर बाहर निकालते हैं, तो उसमें से धूल के साथ-साथ बीता हुआ ज़माना छनकर बाहर आता है। दराज महज़ लकड़ी का एक डिब्बा नहीं, बल्कि इंसान के अतीत, उसकी गोपनीयताओं और उसकी स्मृतियों को अपने सीने में समेटे रखने वाला एक वफ़ादार साथी है।