शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

निठल्ले के नोट्स - वेणु का नाद: मुरली, बंशी और बांसुरी का आध्यात्मिक दर्शन



कभी-कभी कोई वाद्य केवल वाद्य नहीं रहता। वह किसी सभ्यता की स्मृति बन जाता है, किसी प्रेमकथा की धड़कन बन जाता है और किसी देवता की पहचान तक बन जाता है। भारतीय संस्कृति में बाँस से बना एक छोटा-सा वाद्य ऐसा ही है—बाँसुरी। उसके साथ दो और शब्द चलते हैं—मुरली और बंशी। तीनों सुनने में अलग लगते हैं, लेकिन इनके बीच की दूरी उतनी नहीं है जितनी इनके नामों से लगता है। आम बोलचाल में ये शब्द प्रायः एक-दूसरे के पर्याय के रूप में प्रयुक्त होते हैं, हालांकि लोकपरंपराओं और वाद्य-विज्ञान में इनके आकार, स्वरूप और प्रयोग को लेकर कुछ भिन्नताएँ बताई जाती हैं।

और जब इन्हीं शब्दों के आगे ‘कृष्ण’ जुड़ जाता है, तो अर्थ अचानक बहुत बड़ा हो जाता है। बाँस का एक खोखला टुकड़ा संगीत का माध्यम बन जाता है, संगीत प्रेम का संदेश बन जाता है और प्रेम भक्ति का रास्ता।

बाँसुरी, बंशी और मुरली—तीन नाम, एक आत्मा

‘बाँसुरी’ शब्द को सामान्यतः बाँस से बने वाद्य के अर्थ में समझना सबसे सहज है। बाँस का खोखला तना, उसमें बनाए गए छिद्र और फूँक से पैदा होने वाली हवा की कंपन—इतनी-सी वैज्ञानिक संरचना से एक ऐसा संगीत जन्म लेता है, जिसे सुनकर मनुष्य हजारों वर्षों से भाव-विभोर होता आया है।

‘बंशी’ शब्द भी मूलतः इसी प्रकार के फूँक से बजाए जाने वाले वाद्य के लिए प्रयुक्त होता है। कृष्ण-काव्य और लोकभाषाओं में ‘बंशी’ शब्द विशेष रूप से लोकप्रिय हुआ। वहीं ‘मुरली’ का अर्थ भी बाँसुरी से जुड़ा है और संस्कृत तथा भारतीय साहित्यिक परंपरा में इसका व्यापक प्रयोग मिलता है।

अलग-अलग क्षेत्रों में इन नामों का इस्तेमाल अलग अर्थों में भी हुआ है। कहीं लंबी बाँसुरी को बंशी कहा गया, कहीं छोटी को मुरली; कहीं ‘मुरली’ सामान्य नाम है और ‘बंशी’ कृष्ण की बाँसुरी का काव्यात्मक नाम। इसलिए इन्हें तीन बिल्कुल अलग वाद्य मान लेना सही नहीं होगा। अधिक उचित यह कहना है कि ये एक ही बाँस-आधारित वाद्य-परंपरा के अलग नाम, रूप और सांस्कृतिक अर्थ हैं।

लेकिन कृष्ण की कथा में इन नामों का अर्थ केवल वाद्य से आगे निकल जाता है।

कृष्ण और उनकी मुरली का रिश्ता

कृष्ण की कल्पना बाँसुरी के बिना करना लगभग वैसा ही है जैसे वृंदावन की कल्पना बिना यमुना के करना। सिर पर मोरपंख, पीतांबर, अधरों पर मुस्कान और हाथ में बाँसुरी—कृष्ण की यह छवि भारतीय मानस में इतनी गहराई से बैठी है कि बाँसुरी स्वयं कृष्ण का प्रतीक बन गई है।

कृष्ण की बाँसुरी का संगीत सुनकर गोपियाँ अपने घर-आँगन, काम-काज और सामाजिक मर्यादाओं तक को भूलकर वृंदावन की ओर दौड़ पड़ती हैं—यह प्रसंग केवल प्रेमकथा नहीं है। भक्ति परंपरा ने इसमें एक गहरा आध्यात्मिक अर्थ खोजा। गोपियाँ यहाँ केवल स्त्रियाँ नहीं हैं; वे जीवात्मा का प्रतीक हैं और कृष्ण परमात्मा के।

बाँसुरी की पुकार सुनना अर्थात भीतर से आती उस आवाज को सुनना, जो मनुष्य को उसके वास्तविक अस्तित्व की ओर बुलाती है।

इसलिए कृष्ण की बाँसुरी में कोई शब्द नहीं, फिर भी वह सबसे बड़ा संदेश देती है।

बाँसुरी का सबसे बड़ा रहस्य—वह खोखली है

शायद कृष्ण की बाँसुरी का सबसे सुंदर दर्शन उसके संगीत में नहीं, उसके खोखलेपन में छिपा है।

बाँसुरी के भीतर अपना कुछ नहीं होता। वह खोखली होती है। उसमें से जब तक कोई हवा न गुजरे, वह मौन पड़ी रहती है। कृष्ण के अधरों का स्पर्श मिलता है और वही निष्प्राण बाँस बोल उठता है।

भक्ति की भाषा में यही तो मनुष्य की साधना है—अपने भीतर का अहंकार खाली करना।

जब तक ‘मैं’ भरा हुआ है, तब तक परम सत्ता के लिए जगह कहाँ है? बाँसुरी कहती है—अपने भीतर से अहंकार, स्वार्थ और दंभ को निकाल दो; फिर जीवन में किसी बड़ी शक्ति की साँस उतर सकती है।

कृष्ण की बाँसुरी इसलिए केवल प्रेम का प्रतीक नहीं, समर्पण का प्रतीक भी है।

वह जैसे कहती है—

खुद को इतना खाली कर लो कि ईश्वर तुम्हारे भीतर से अपनी धुन बजा सके।

कृष्ण की बाँसुरी में कितने छेद थे?

लोकप्रिय चित्रों में कृष्ण की बाँसुरी प्रायः लंबी दिखाई देती है और उसमें कई छेद होते हैं। भारतीय बाँसुरी की संरचना में सामान्यतः छह या सात उँगली-छेदों की परंपरा मिलती है, जबकि अलग-अलग प्रकार की बाँसुरियों में संरचना और छिद्रों की संख्या भिन्न हो सकती है।

कृष्ण की ‘मुरली’, ‘वंशी’ और ‘वेणु’ के बारे में पुराणों और कृष्ण-साहित्य में भी अलग-अलग वर्णन मिलते हैं। वैष्णव परंपरा में कृष्ण की बाँसुरी के कई रूपों का उल्लेख मिलता है—वेणु, मुरली और वंशी। इनके आकार और ध्वनि के संबंध में बाद की परंपराओं में अनेक रोचक विवरण विकसित हुए।

यही कारण है कि कृष्ण की बाँसुरी का कोई एक ऐतिहासिक ‘नक्शा’ तय कर देना कठिन है। कृष्ण की बाँसुरी जितनी ऐतिहासिक वस्तु है, उससे कहीं अधिक वह सांस्कृतिक कल्पना और आध्यात्मिक प्रतीक है।

बाँसुरी की खोज किसने की?

यह प्रश्न जितना सरल है, उत्तर उतना ही कठिन।

बाँसुरी का आविष्कार किसी एक व्यक्ति ने किया—ऐसा कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। बल्कि बाँसुरी उन वाद्यों में है जिनकी जड़ें मानव सभ्यता के अत्यंत पुराने संगीत-अनुभव में दिखाई देती हैं।

मनुष्य ने बहुत पहले यह देखा होगा कि खोखले पौधों के तनों में हवा गुजरने पर विचित्र ध्वनि पैदा होती है। संभव है कि किसी खोखली हड्डी, सरकंडे या बाँस के टुकड़े में स्वाभाविक रूप से बने छेद से उत्पन्न ध्वनि ने उसे प्रयोग के लिए प्रेरित किया हो। धीरे-धीरे उसमें छेद बनाए गए होंगे, लंबाई बदली गई होगी और उँगलियों से स्वरों को नियंत्रित करने की कला विकसित हुई होगी।

पुरातात्त्विक प्रमाण बताते हैं कि बाँसुरी जैसे वायु-वाद्य मानव सभ्यता के अत्यंत प्राचीन संगीत उपकरणों में शामिल रहे हैं। यूरोप में पाई गई कुछ प्रागैतिहासिक अस्थि-बाँसुरियाँ लगभग 35,000–40,000 वर्ष पुरानी मानी जाती हैं। चीन में भी प्राचीन अस्थि-बाँसुरियों के प्रमाण मिले हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि आधुनिक भारतीय बाँसुरी उसी समय या उसी स्थान से निकली, बल्कि इतना अवश्य है कि हवा से संगीत पैदा करने का मानवीय प्रयोग अत्यंत प्राचीन है।

भारत में बाँस और सरकंडे की प्रचुरता ने इस तरह के वाद्यों के विकास के लिए स्वाभाविक वातावरण उपलब्ध कराया।

इस दृष्टि से बाँसुरी किसी एक आविष्कारक की देन नहीं, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के बीच हजारों वर्षों की साझेदारी का परिणाम है।

बाँस—जो पेड़ से अधिक एक प्रतीक है

बाँसुरी की कहानी बाँस के बिना पूरी नहीं हो सकती।

बाँस तेज़ी से बढ़ता है, भीतर से खोखला होता है और फिर भी अत्यंत मजबूत होता है। भारतीय लोकजीवन में बाँस का उपयोग घर बनाने से लेकर टोकरी, कृषि उपकरण और अनेक घरेलू वस्तुओं तक में होता रहा है। उसी बाँस का एक टुकड़ा जब कलाकार के हाथ में आता है तो वह जीवन की उपयोगिता से उठकर कला की ऊँचाई तक पहुँच जाता है।

यहाँ भी एक सुंदर प्रतीक छिपा है।

बाँस अपनी पहचान छोड़कर बाँसुरी बनता है।

उसमें छेद किए जाते हैं, उसका आकार बदला जाता है, उसे सुखाया जाता है, तराशा जाता है। वह जितना अपने मूल रूप से दूर होता जाता है, उतना ही संगीत के करीब पहुँचता है।

क्या मनुष्य के साथ भी ऐसा नहीं?

जीवन हमें काटता है, छीलता है, भीतर से खाली करता है, फिर किसी दिन हमारी अपनी आवाज पैदा होती है।

शायद इसीलिए बाँसुरी भारतीय दर्शन में इतनी सहजता से आध्यात्मिक प्रतीक बन गई।

मुरली की पुकार और गोपियों का आकर्षण

कृष्ण की मुरली का सबसे प्रसिद्ध प्रसंग वृंदावन की गोपियों से जुड़ा है। कहा जाता है कि कृष्ण जब बाँसुरी बजाते थे तो उसकी ध्वनि केवल कानों तक नहीं पहुँचती थी, सीधे हृदय में उतरती थी।

कृष्ण की मुरली सुनकर गोपियाँ सब कुछ छोड़कर उनकी ओर खिंची चली आती थीं।

इसे यदि केवल सांसारिक प्रेम के रूप में पढ़ें तो कथा अधूरी रह जाती है। भक्ति साहित्य ने इसे आत्मा और परमात्मा के मिलन की आकांक्षा के रूप में देखा।

आत्मा जब अपने मूल से दूर होती है तो संसार के हजारों शोर के बीच भी उसे एक ऐसी ध्वनि सुनाई देती रहती है, जो केवल उसी के लिए है।

कृष्ण की मुरली वही ध्वनि है।

वह किसी को आदेश नहीं देती।

वह किसी को धमकाती नहीं।

वह कोई भाषण नहीं देती।

वह बस बजती है।

और जो उसके लिए तैयार है, वह सुन लेता है।

बाँसुरी का संगीत—शब्दों के बिना संवाद

मनुष्य ने संवाद के लिए भाषा बनाई। लेकिन संगीत ने भाषा से पहले ही संवाद करना सीख लिया था।

बाँसुरी का सबसे बड़ा सौंदर्य यही है कि उसे सुनने के लिए किसी भाषा का ज्ञान आवश्यक नहीं। न संस्कृत चाहिए, न हिंदी, न ब्रज। उसकी ध्वनि सीधे संवेदना से बात करती है।

कृष्ण का संदेश भी शायद इसी कारण बाँसुरी के माध्यम से अधिक प्रभावशाली लगता है।

गीता में कृष्ण ने अर्जुन को शब्द दिए; वृंदावन में उन्होंने बाँसुरी दी।

कुरुक्षेत्र में कृष्ण वाणी हैं।

वृंदावन में कृष्ण संगीत हैं।

कुरुक्षेत्र में वे कर्तव्य समझाते हैं।

वृंदावन में वे प्रेम जगाते हैं।

एक जगह कृष्ण कहते हैं कि कर्म करो; दूसरी जगह उनकी बाँसुरी जैसे कहती है—अपने भीतर सुनो।

दोनों मिलकर कृष्ण के व्यक्तित्व की पूर्णता बनाते हैं।

मुरली में न कोई भेद, न कोई सीमा

बाँसुरी की ध्वनि हवा के सहारे निकलती है। वह यह नहीं पूछती कि सुनने वाला राजा है या चरवाहा, मनुष्य है या पशु, धनी है या निर्धन।

वृंदावन की कृष्ण-कथा में तो यहाँ तक कहा जाता है कि उनकी मुरली सुनकर केवल गोपियाँ ही नहीं, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे और यमुना तक जैसे ठहर जाती थी।

यह साहित्यिक अतिशयोक्ति हो सकती है, लेकिन उसके भीतर एक गहरी सांस्कृतिक आकांक्षा है—ऐसा संगीत जो समूचे जीवन को जोड़ दे।

कृष्ण की बाँसुरी का यह संदेश आज भी प्रासंगिक है।

जिस संगीत में मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने की शक्ति हो, वही सच्चा संगीत है।

बाँसुरी और भारतीय संगीत परंपरा

भारतीय शास्त्रीय संगीत में बाँसुरी का विकास एक स्वतंत्र और अत्यंत समृद्ध परंपरा के रूप में हुआ। उत्तर भारत में बाँसुरी को हिंदुस्तानी संगीत की महत्वपूर्ण वाद्य परंपरा में स्थान मिला और दक्षिण भारत में भी बाँस से बने वायु-वाद्यों की अपनी परंपराएँ विकसित हुईं।

आधुनिक हिंदुस्तानी बाँसुरी को जिस ऊँचाई पर पहुँचाने का श्रेय मिलता है, उनमें पन्नालाल घोष का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने अपेक्षाकृत बड़ी बाँसुरी को शास्त्रीय संगीत के गंभीर मंच के लिए विकसित किया और उसकी संभावनाओं का विस्तार किया। बाद में हरिप्रसाद चौरसिया जैसे महान कलाकारों ने बाँसुरी को विश्वव्यापी पहचान दिलाई।

इस तरह जिस वाद्य को कभी चरवाहे की सहज धुन का साथी समझा जाता था, वह बड़े संगीत सभागारों और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुँच गया।

लेकिन उसकी आत्मा वही रही—बाँस, हवा और उँगलियों का संवाद।

एक दिलचस्प विरोधाभास

बाँसुरी में स्वयं कोई आवाज नहीं होती।

आवाज पैदा करने के लिए उसे किसी और की साँस चाहिए।

यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी है और सबसे बड़ी ताकत भी।

मनुष्य भी कुछ ऐसा ही है। अकेले में हम केवल एक संभावना हैं। किसी संबंध, किसी प्रेम, किसी विचार, किसी गुरु या किसी बड़ी चेतना की साँस हमें वह बना सकती है, जो हम अपने भीतर बनने की क्षमता रखते हैं।

कृष्ण की बाँसुरी शायद इसी कारण इतनी बड़ी प्रतीक बन गई।

वह कहती है—

तुम्हारे भीतर संगीत पहले से है; बस तुम्हें अपनी बाँसुरी को सही साँस के लिए उपलब्ध कराना है।

बंशी की धुन और प्रेम का दर्शन

कृष्ण की बंशी में प्रेम है, लेकिन यह प्रेम अधिकार नहीं मांगता।

कृष्ण बाँसुरी बजाते हैं और गोपियाँ आती हैं। वे किसी को बाँधकर नहीं लाते। बाँसुरी बुलाती है, खींचती नहीं।

यही प्रेम और स्वामित्व का अंतर है।

सच्चा प्रेम सामने वाले को स्वतंत्र रखते हुए भी अपने पास आने की इच्छा पैदा करता है।

शायद इसीलिए कृष्ण की बाँसुरी भारतीय प्रेम-दर्शन में इतनी महत्वपूर्ण है। वह प्रेम को आदेश नहीं, आमंत्रण बनाती है।

कृष्ण का संगीत कहता है—

आओ, यदि मन कहता है।

न आओ, तो भी स्वतंत्र हो।

प्रेम में अधिकार से अधिक आकर्षण है, आग्रह से अधिक समर्पण है और शब्दों से अधिक मौन है।

मुरली का एक और संदेश—अहंकार छोड़ो

बाँसुरी के पास अपनी कोई धुन नहीं होती।

धुन वादक की साँस और उँगलियों से आती है।

यदि बाँसुरी कहने लगे—‘मैं स्वयं बजती हूँ’, तो संगीत समाप्त हो जाएगा।

मनुष्य का अहंकार भी कुछ ऐसा ही है। हम अक्सर अपनी उपलब्धियों को ‘मैं’ से जोड़ते हैं—मैंने किया, मैंने पाया, मैंने बनाया।

कृष्ण की मुरली इससे बिल्कुल उलटा दर्शन देती है।

वह जैसे कहती है—

अपने भीतर से ‘मैं’ थोड़ा कम करो; शायद तब तुम्हारे भीतर से कोई बड़ी धुन निकल सके।

यही कारण है कि कृष्ण की बाँसुरी को भक्ति में आत्मसमर्पण का प्रतीक माना गया।

और अंत में—कृष्ण की बाँसुरी क्यों अमर है?

राजाओं के पास महल थे।

योद्धाओं के पास शस्त्र थे।

ऋषियों के पास शास्त्र थे।

कृष्ण के पास बाँसुरी थी।

उन्होंने संसार को जीतने के लिए बाँसुरी नहीं बजाई। उन्होंने किसी पर शासन करने के लिए भी उसे नहीं बजाया। उनकी बाँसुरी ने किसी साम्राज्य की सीमा नहीं बढ़ाई।

उसने केवल हृदयों की सीमाएँ मिटाईं।

यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है।

मुरली, बंशी और बाँसुरी के नाम भले अलग हों, लेकिन कृष्ण के संदर्भ में तीनों एक ही अनुभव की ओर ले जाते हैं—प्रेम की पुकार, आत्मा का आकर्षण और अहंकार से मुक्ति।

एक साधारण बाँस का टुकड़ा जब कृष्ण के अधरों से लगता है तो वह साधारण नहीं रहता। उसमें से निकलने वाली हवा स्वर बनती है, स्वर संगीत बनता है, संगीत प्रेम बनता है और प्रेम अंततः भक्ति में बदल जाता है।

शायद कृष्ण की बाँसुरी का सबसे बड़ा संदेश यही है—

जीवन को इतना मत भर लो कि उसमें किसी और की साँस के लिए जगह ही न बचे।

थोड़ा खाली रहो।

थोड़ा झुको।

थोड़ा समर्पित हो जाओ।

क्योंकि हो सकता है, तुम्हारे भीतर भी कोई बाँसुरी पड़ी हो—
जिसे अभी तक किसी कृष्ण की साँस का इंतज़ार हो।


सृष्टि के आरंभ में जब पवन ने खोखले बाँस के तनों को छुआ होगा, तब प्रकृति ने स्वयं अपना पहला संगीत सुना होगा। सुषिर् वाद्य यानी फूँककर बजाए जाने वाले वाद्य यंत्रों का इतिहास उतना ही प्राचीन है जितनी स्वयं मानव चेतना। वैदिक साहित्य में जिस 'वेणु' या 'नाड़ी' का उल्लेख मिलता है, वही लोकजीवन में ढलकर बांसुरी, मुरली और बंशी बनी। यह केवल खोखले बाँस का टुकड़ा नहीं, बल्कि प्रकृति और ब्रह्म के मिलन का पहला संगीतमय साक्ष्य है। समय के साथ यह वाद्य न केवल भारतीय संगीत का मुख्य आधार बना, बल्कि लोक परंपराओं से लेकर आध्यात्मिक दर्शन का भी एक अटूट हिस्सा बन गया।
आम जनमानस प्रायः मुरली, बंशी और बांसुरी को एक ही मान लेता है, किंतु इनकी बनावट, ध्वनि और शास्त्रीय प्रयोग में सूक्ष्म भेद हैं। बांसुरी इस श्रेणी का सामान्य और सार्वभौमिक नाम है, जो 'बाँस' और 'सुर' के योग से बना है। यह आकार में बड़ी तथा गँभीर ध्वनि उत्पन्न करने वाली होती है, जिसे प्रायः आड़ी (ट्रांसवर्स) रखकर बजाया जाता है और इसमें छह या सात छिद्र होते हैं। वहीं मुरली आकार में बांसुरी से थोड़ी छोटी और तीक्ष्ण स्वर वाली होती है। इसके मुख की ओर एक सीधा छिद्र होता है जिससे फूँक मारना अपेक्षाकृत सहज होता है, इसलिए लोक संगीत और चरवाहों की संगति में इसका प्रयोग अधिक हुआ। इसके विपरीत, बंशी अत्यंत सूक्ष्म, पतली और मधुर तान वाली होती है। शास्त्रों में वेणु के उसी कोमल रूप को बंशी कहा गया है, जिसकी ध्वनि सीधे हृदय के तारों को झंकृत करती है।
पौराणिक अनुश्रुति है कि द्वापर युग में जब भगवान शिव अपने आराध्य बाल-कृष्ण के दर्शन हेतु गोकुल पहुँचे, तो उन्होंने महर्षि दधीचि की अस्थियों से निर्मित एक अद्भुत वेणु श्रीकृष्ण को भेंट की थी। श्रीकृष्ण का इन तीनों वाद्य यंत्रों से संबंध उनके जीवन के अलग-अलग सोपानों को दर्शाता है। बांसुरी उनके बाल-रूप और प्रकृति-प्रेम की सहचरी है, मुरली गोचारण और सखाओं को एकत्र करने का साधन है, और बंशी श्रीमद्भागवत के रासपंचाध्यायी की वह अमर तान है जो जीवात्मा को परमात्मा की ओर आकर्षित करती है। ब्रज की परंपराओं में यह माना जाता है कि जब कान्हा की बंशी बजती थी, तो पूरी सृष्टि स्थिर हो जाती थी और नदियाँ अपनी धारा रोककर सुनती थीं।
इन काष्ठ-वाद्यों के माध्यम से श्रीकृष्ण का संदेश अत्यंत गूढ़ और व्यावहारिक है। बाँस का खोखलापन मनुष्य को शून्यता अर्थात अहंकार त्याग का संदेश देता है; जब तक मन से द्वेष और अहम् खाली नहीं होगा, ईश्वरीय संगीत का प्रवाह संभव नहीं है। बाँस का स्वयं में मौन रहकर वादक की फूँक के आगे समर्पित हो जाना ही ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना है। इसके साथ ही, एक बाँस को काटने, सुखाने और अग्नि से तपाकर छिद्र किए जाने की प्रक्रिया यह सिखाती है कि जीवन में निखार और मधुरता संघर्षों और सहिष्णुता के बाद ही आती है।
एक सुंदर पौराणिक प्रसंग में राधा जी ने बंशी से ईर्ष्या व्यक्त करते हुए पूछा था कि उसने ऐसा कौन सा पुण्य किया है जो वह दिन-रात मोहन के अधरों से लगी रहती है। इस पर बंशी ने उत्तर दिया कि उसने अपना संपूर्ण अस्तित्व मिटा दिया है और अपने भीतर की सभी गाँठों को जला दिया है; अब उसके पास अपना कुछ नहीं बचा, इसलिए जो फूँक मोहन भरते हैं, वही स्वर बनकर बहता है। इस प्रकार बांसुरी केवल एक वाद्य नहीं, बल्कि भारतीय अध्यात्म का वह जीवित रूपक है जो सिखाता है कि जीवन के सीधे-सपाट पोरों में यदि समर्पण के छिद्र कर दिए जाएँ, तो हर साँस एक मधुर राग बन सकती है।

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