शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

निठल्ले के नोट्स - जूते-चप्पलों की दुनिया में आदमी की पहचान--------

जूते-चप्पलों की दुनिया में आदमी की पहचान
--------
किसी भीड़ में खड़े होकर अगर हम लोगों के चेहरों को देखना शुरू करें तो कुछ देर बाद चेहरे एक-दूसरे में घुलने लगते हैं। हजारों चेहरे, लगभग वही दो आंखें, एक नाक, एक मुंह, दो कान और चेहरे पर भावनाओं की वही पुरानी वर्णमाला। लेकिन जरा निगाह नीचे कीजिए। पांवों की तरफ। अचानक दुनिया बदल जाती है। कोई चमकदार जूता पहने है, कोई धूल से सना हुआ कैनवास, कोई रंग-बिरंगी चप्पल, कोई नुकीला जूता, कोई गोल-मटोल, कोई इतना भारी जूता कि लगता है पांव नहीं, पांव पर पूरा मकान रखा हो। और कोई ऐसा भी मिलेगा जिसकी चप्पल देखकर लगेगा कि वह चप्पल कम और जीवन-दर्शन ज्यादा है—बस चलती रहे, टूटे तो बांध लेना।

शायद मनुष्य के चेहरे जितनी विविधता उसके जूते-चप्पलों में भी है। फर्क सिर्फ इतना है कि चेहरा हमें प्रकृति ने दिया और जूते-चप्पल हमने खुद चुने हैं। इसलिए चेहरे से ज्यादा पांव के नीचे की चीज हमारे चुनाव की कहानी कहती है।

आप ट्रेन में बैठिए। सामने की सीट पर बैठे चार लोगों के पांव देख लीजिए। संभव है चारों के जूते अलग-अलग हों। एक के जूते पर किसी खेल-कूद कंपनी का निशान होगा, दूसरे के जूते पर धूल की ऐसी परत होगी जो उसके रोजमर्रा के रास्तों का भूगोल बता रही होगी। तीसरे की चप्पल बिल्कुल साधारण होगी और चौथा शायद ऐसा जूता पहने होगा जिसकी कीमत जानने के लिए आपको मोबाइल निकालकर खोज करना पड़े। यही दृश्य बस में, बाजार में, रेलवे स्टेशन पर, दफ्तर के बाहर और किसी विवाह समारोह में भी दिखाई देता है।

सवाल उठता है—आखिर जूते-चप्पलों में इतनी विविधता क्यों है?

क्या सचमुच जूता बनाने वाली कंपनियां हर डिजाइन की सीमित संख्या में जूते बनाती हैं ताकि सड़क पर हर दूसरे आदमी के पांव में वही जूता दिखाई न दे? शायद बाजार की रणनीति में इसका कुछ हिस्सा जरूर हो। फैशन की दुनिया में नया डिजाइन, नया रंग, नया आकार और नया संयोजन लगातार पैदा किया जाता है। मगर पूरी कहानी बाजार की नहीं है। असली कहानी शायद मनुष्य की उस पुरानी इच्छा की है—मैं भीड़ में रहूं, लेकिन भीड़ जैसा न दिखूं।

यही कारण है कि यूनिफॉर्म की दुनिया और सामान्य जीवन की दुनिया में इतना बड़ा अंतर है। स्कूल की वर्दी में बच्चों के जूते एक जैसे होते हैं। सेना में जूतों की एकरूपता अनुशासन का हिस्सा है। पुलिस, सुरक्षा बल या किसी औद्योगिक प्रतिष्ठान में भी जूते अक्सर एक निर्धारित रूप में दिखाई देते हैं। वहां व्यक्ति से पहले संस्था दिखाई देती है।

लेकिन जैसे ही आदमी यूनिफॉर्म उतारता है, उसके पांव आजाद हो जाते हैं।

वह अपनी पसंद का जूता पहनता है।

और यहीं से व्यक्तित्व का एक छोटा-सा लोकतंत्र शुरू होता है।

किसी को चमड़े का जूता पसंद है, किसी को कपड़े का। किसी को फीते अच्छे लगते हैं, किसी को बिना फीते का जूता। कोई ऊंची एड़ी चुनता है, कोई सपाट तलवा। कोई फैशन के लिए असुविधा सह लेता है और कोई सुविधा के लिए फैशन को दरवाजे पर छोड़ आता है। कोई जूते को कपड़ों का हिस्सा मानता है और कोई जूते को सिर्फ पांव बचाने की मशीन।

इसलिए जूता सिर्फ जूता नहीं है।

वह हमारे स्वभाव का एक छोटा-सा बयान भी है।

पुराने समय में जूते शायद ज्यादा लंबे समय तक चलते थे। एक जोड़ी जूता खरीदा गया तो उसके साथ एक रिश्ता बन जाता था। उसकी सिलाई खुलती थी तो मोची के पास जाता था। तलवा घिसता था तो नया लग जाता था। जूते की मरम्मत होती थी, स्मृतियों की नहीं। आज की दुनिया में जूता थोड़ा घिसा नहीं कि मनुष्य का मन भी उसके साथ घिसने लगता है—अब नया ले लेते हैं।

बाजार ने हमारे पांवों को भी 'नया' होने की आदत डाल दी है।

अब जूता केवल चलने के लिए नहीं खरीदा जाता। वह सुबह की सैर के लिए अलग है, दौड़ने के लिए अलग, दफ्तर के लिए अलग, शादी के लिए अलग, पहाड़ पर जाने के लिए अलग, बरसात के लिए अलग और घर के भीतर पहनने के लिए भी अलग। एक समय आदमी के पास जूता होता था; अब जूतों के पास आदमी होता है—हर अवसर के लिए एक नया आदमी तैयार।

और फिर आते हैं वे चप्पलें, जिनका फैशन से कोई खास लेना-देना नहीं। वे जीवन की सबसे ईमानदार वस्तुओं में से हैं। वे पैर में आती हैं, घर से बाहर निकलती हैं, धूल खाती हैं, बरसात झेलती हैं, कभी बाथरूम जाती हैं, कभी बाजार, कभी पड़ोसी के घर और फिर चुपचाप दरवाजे के बाहर पड़ी रहती हैं। उन्हें कोई प्रशंसा नहीं चाहिए। वे बस साथ निभाती हैं।

कुछ चप्पलें ऐसी भी होती हैं जिन्हें देखकर लगता है कि उनका मालिक उन्हें तब तक नहीं छोड़ेगा जब तक चप्पल खुद अंतिम सांस न ले ले। बांटा की लोकप्रिय चप्पलों जैसी कुछ डिजाइनें इसका अपवाद जरूर हैं—ऐसी चप्पलें जिन्हें देखकर लगता है कि डिजाइन बदलने के बजाय पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन चप्पल वहीं की वहीं है।

जूते की दुनिया में एक और मजेदार बात है। हम अपने जूतों को देखते कम हैं, दूसरों के जूतों को देखते ज्यादा हैं। किसी शादी में आदमी शायद ही किसी के कुर्ते की सिलाई को ध्यान से देखे, लेकिन किसी का चमकता हुआ जूता जरूर आंख पकड़ लेता है। दफ्तर में किसी सहकर्मी की नई शर्ट पर टिप्पणी न हो, लेकिन नया जूता आते ही कोई पूछ देता है—"कहां से लिया?"

जूता चुपचाप बातचीत शुरू कर देता है।

कभी-कभी वह बातचीत रोक भी देता है।

किसी सरकारी कार्यालय में चमकदार महंगे जूते पहने आदमी को देखकर लोग उसके पद का अनुमान लगाने लगते हैं। किसी विश्वविद्यालय के परिसर में घिसे हुए जूते देखकर कोई उसके आर्थिक हालात का अनुमान लगा सकता है। किसी युवा के चमकदार खेल-जूतों को देखकर उसकी रुचि का अंदाजा लगाया जा सकता है। हालांकि ये अनुमान हमेशा सही हों, जरूरी नहीं। क्योंकि जूते भी अब अभिनय करना सीख चुके हैं।

एक महंगा दिखने वाला जूता जरूरी नहीं कि महंगा हो और साधारण दिखने वाला जूता जरूरी नहीं कि सस्ता हो।

यानी जूतों की दुनिया भी मनुष्य की तरह ही है—जो दिखाई देता है, जरूरी नहीं कि वही सच हो।

पांव के जूते सामाजिक दूरी भी बताते हैं और उसे मिटाते भी हैं। बड़े शहर के फुटपाथ पर बैठा मोची और किसी चमचमाते मॉल में जूता खरीदता ग्राहक एक ही वस्तु से जुड़े हुए हैं। एक जूता बनाता है, दूसरा पहनता है। एक के हाथ में सुई और हथौड़ी है, दूसरे के हाथ में कार्ड या मोबाइल। लेकिन दोनों के बीच एक अदृश्य धागा है—पांव।

मनुष्य ने पृथ्वी पर जितनी यात्राएं की हैं, उनका इतिहास शायद जूतों के तलवों में भी लिखा हुआ है। पांव ने जंगल पार किए, पहाड़ चढ़े, रेगिस्तान नापे, युद्ध लड़े, खेत जोते, शहर बसाए और चांद की जमीन तक पहुंच गया। जूता सभ्यता का बहुत छोटा आविष्कार दिखाई देता है, लेकिन उसने मनुष्य की यात्रा को बहुत लंबा कर दिया।

शायद इसीलिए किसी आदमी के जूते देखकर उसके रास्तों का थोड़ा अंदाजा लगाया जा सकता है।

लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह है कि इतने सारे जूतों के बावजूद हर आदमी आखिरकार उसी तरह चलता है—एक पैर आगे, दूसरा उसके पीछे। फिर दूसरा आगे, पहला पीछे। पूरी सभ्यता इसी क्रम पर चल रही है।

जूते बदलते रहे, रास्ते बदलते रहे, फैशन बदलता रहा, कंपनियां बदलती रहीं, डिजाइन बदलते रहे; मगर चलने की मूल लय वही रही।

और शायद यही जूतों की सबसे बड़ी दार्शनिक शिक्षा है।

हम सब अलग-अलग जूते पहनते हैं, अलग-अलग रास्तों से आते हैं, अलग-अलग मंजिलों की ओर जाते हैं। किसी के जूते चमक रहे हैं, किसी के घिस चुके हैं। किसी के तलवे मजबूत हैं, किसी के टूटने लगे हैं। किसी के पांव में कांटे चुभे हैं, किसी ने कालीन पर चलने के अलावा कुछ जाना ही नहीं। फिर भी सड़क सबके लिए एक है।

इसलिए अगली बार जब आप किसी ट्रेन में बैठे हों और सामने बैठे लोगों के जूते देखें, तो केवल जूतों को मत देखिएगा। उनके भीतर छिपी यात्राओं को पढ़ने की कोशिश कीजिएगा।

किसी जूते पर धूल होगी—वह किसी रास्ते की कहानी होगी।

किसी जूते पर चमक होगी—वह किसी पसंद की कहानी होगी।

किसी चप्पल पर टूटी हुई पट्टी होगी—वह किसी लंबे साथ की कहानी होगी।

और किसी बिल्कुल नए जूते में शायद एक अधूरी यात्रा छिपी होगी।

क्योंकि आदमी जहां भी जाता है, उसका एक हिस्सा उसके जूतों में भी चलता है।

चेहरा आदमी की पहचान बताता है, लेकिन उसके जूते उसकी यात्रा।

मशहूर लेखक प्रेमचंद के फटे जूते भी साहित्यिक विमर्श के केंद्र में आ चुके हैं!

मनुष्य की एक विचित्र इच्छा है—भीड़ में रहना, लेकिन भीड़ जैसा न दिखना।
और जूता इस इच्छा का सबसे सहज प्रदर्शन है।
लेकिन जूते की कहानी फैशन से शुरू नहीं होती।
जूते की कहानी शायद उस दिन शुरू हुई होगी जब किसी आदिम मनुष्य के पांव में कोई नुकीला पत्थर चुभा होगा।
उसने शायद पहली बार नीचे देखा होगा।
फिर किसी पेड़ की छाल, घास, पत्ते या जानवर की खाल को पांव के नीचे रखने का विचार आया होगा। वह डिजाइनर नहीं था, न उसके पास जूते की दुकान थी, न आकार नापने का फीता। उसके सामने सिर्फ एक समस्या थी—पांव बचाना है।
यहीं से शायद जूते की सभ्यता शुरू हुई।
यह कहना मुश्किल है कि दुनिया का पहला जूता किसने और कहां बनाया। शुरुआती जूते-चप्पल लकड़ी, घास, पत्तियों, रेशों और चमड़े जैसी नष्ट हो जाने वाली चीजों से बने होंगे, इसलिए उनका बहुत कम पुरातात्त्विक प्रमाण बचा है। लेकिन जो प्रमाण मिले हैं, वे बताते हैं कि मनुष्य हजारों साल पहले से अपने पांवों को ढकने लगा था।
अमेरिका के ओरेगन की फोर्ट रॉक गुफा से मिले सेजब्रश की छाल से बने सैंडल लगभग दस हजार वर्ष पुराने हैं और इन्हें दुनिया के सबसे पुराने प्रत्यक्ष रूप से दिनांकित जूतों में माना जाता है।
यानी जब आज का आदमी जूते की दुकान में खड़ा होकर सोचता है—"ब्लैक लूं या ब्राउन?"—तो वह अनजाने में लगभग दस हजार साल पुरानी मानवीय परंपरा को आगे बढ़ा रहा होता है।
अंतर सिर्फ इतना है कि उस समय सवाल था—पांव बचेगा या नहीं?
आज सवाल है—पैर पर अच्छा लगेगा या नहीं?
यात्रा यहीं से बदल गई।
प्रकृति से बचने के लिए बनाया गया जूता धीरे-धीरे संस्कृति का हिस्सा बनने लगा। प्राचीन मिस्र में पत्तियों, पपीरस, घास, चमड़े और यहां तक कि लकड़ी से भी सैंडल बनाए जाते थे। मिस्र में जूते और सैंडल केवल उपयोग की वस्तु नहीं रहे; वे सामाजिक स्थिति और अवसर से भी जुड़ने लगे। ग्रैंड इजिप्शियन म्यूजियम के संग्रह में मध्य साम्राज्य काल के सैंडल लकड़ी और चमड़े के हैं।
दिलचस्प बात यह है कि प्राचीन मिस्र में हर समय जूते पहनकर घूमना जरूरी नहीं था। उपलब्ध संग्रहालयी साक्ष्यों से पता चलता है कि बहुत से लोग सामान्यतः नंगे पांव रहते थे और सैंडल विशेष अवसरों पर या पांव की सुरक्षा की जरूरत होने पर पहने जाते थे। यहां तक कि किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति की चप्पल उठाकर चलना सम्मान का पद माना जाता था—'सैंडल-बेयरर' जैसी उपाधि भी मिलती है।
यानी जिस वस्तु को आज हम अपने पैरों के नीचे रखते हैं, कभी वह किसी दूसरे व्यक्ति के लिए सम्मान का प्रतीक भी हो सकती थी।
फिर जूते ने एक और काम करना शुरू किया—उसने आदमी के वर्ग और हैसियत को बताना शुरू किया।
रोमन दुनिया में जूते का चमड़ा, रंग और डिजाइन भी सामाजिक संकेत देने लगे। मिस्र में मिले एक रोमन जूते के लाल रंग के अवशेष इस ओर संकेत करते हैं कि वह किसी उच्च हैसियत वाले व्यक्ति का हो सकता था, क्योंकि उस समय लाल रंग के लिए इस्तेमाल होने वाला महंगा रंग पदार्थ आम आदमी की पहुंच में नहीं था।
धीरे-धीरे जूता पांव की सुरक्षा से निकलकर प्रतिष्ठा का विस्तार बन गया।
फिर आदमी ने सोचा—जब जूता पहनना ही है तो सुंदर क्यों न हो?
बस, यहीं से डिजाइन पैदा हुआ।
फीते आए। पट्टियां आईं। ऊंची एड़ी आई। चमड़ा आया। रंग आए। नक्काशी आई। सजावट आई। और फिर जूते ने भी वही किया जो मनुष्य हर सुंदर चीज के साथ करता है—उसमें उपयोगिता से अधिक अर्थ भर दिए।
किसी के जूते उसकी गरीबी बताते हैं, किसी के जूते उसकी समृद्धि। किसी के जूते उसके पेशे का संकेत देते हैं और किसी के जूते उसकी फैशन समझ का।
सैनिक के जूते उसे कठिन जमीन पर चलने की ताकत देते हैं।
मजदूर के जूते उसके श्रम के साथी हैं।
खिलाड़ी के जूते उसकी गति का हिस्सा हैं।
दूल्हे के जूते उसकी शादी की पोशाक का हिस्सा हैं।
और बच्चे के स्कूल के जूते उसकी रोज की अनिवार्य यात्रा का हिस्सा।
अर्थात जूता केवल पांव के नीचे नहीं होता; वह आदमी की जीवन-स्थितियों के नीचे भी होता है।
इसीलिए स्कूल और सेना की वर्दी में जूतों की एकरूपता दिखाई देती है। वहां व्यक्ति से पहले संस्था दिखाई देती है। सेना का जूता सैनिक की व्यक्तिगत पसंद नहीं, सैन्य अनुशासन का हिस्सा है। स्कूल का जूता बच्चे की फैशन स्वतंत्रता नहीं, विद्यालय की सामूहिक पहचान का हिस्सा है।
लेकिन जैसे ही आदमी यूनिफॉर्म उतारता है, उसके पांव आजाद हो जाते हैं।
वह अपनी पसंद का जूता पहनता है।
और यहीं से व्यक्तित्व का एक छोटा-सा लोकतंत्र शुरू होता है।
किसी को चमड़े का जूता पसंद है, किसी को कपड़े का। किसी को फीते अच्छे लगते हैं, किसी को बिना फीते का जूता। कोई फैशन के लिए असुविधा सह लेता है और कोई सुविधा के लिए फैशन को दरवाजे पर छोड़ आता है।
किसी को जूते का रंग कपड़ों से मिलाना है।
किसी को जूते का ब्रांड दिखाना है।
किसी को बस इतना चाहिए कि चलते समय पांव न दुखे।
और किसी के लिए जूता इतना महत्वपूर्ण है कि वह पूरा पहनावा जूते से तय करता है।
इक्कीसवीं सदी में जूता लगभग एक अलग उद्योग नहीं, बल्कि व्यक्तित्व का बाजार बन चुका है।
सुबह दौड़ने के लिए अलग जूता।
दफ्तर के लिए अलग।
शादी के लिए अलग।
पार्टी के लिए अलग।
बारिश के लिए अलग।
पहाड़ पर चढ़ने के लिए अलग।
जिम के लिए अलग।
और घर से बाहर कूड़ा फेंकने के लिए भी एक पुरानी चप्पल अलग।
एक समय आदमी के पास जूता होता था।
अब जूतों के पास आदमी होता है—हर अवसर के लिए एक नया आदमी तैयार।
यही वजह है कि आज सड़क पर हमें जूतों की इतनी विविधता दिखाई देती है। दुनिया का बाजार केवल हमारी जरूरत नहीं बेचता; वह हमारी अलग दिखने की इच्छा भी बेचता है।
फिर भी इस पूरी आधुनिक चमकदार दुनिया के बीच कुछ जूते ऐसे हैं जिनकी कोई फैशन महत्वाकांक्षा नहीं होती।
चप्पल।
चप्पल शायद मनुष्य की सबसे लोकतांत्रिक पोशाक है।
वह अमीर के घर भी मिलती है और गरीब के घर भी। घर में भी, बाजार में भी। सुबह भी, शाम भी। कभी मंदिर तक, कभी सब्जी मंडी तक, कभी पड़ोसी के घर तक।
और कुछ चप्पलें तो इतनी लोकप्रिय हो जाती हैं कि डिजाइन बदलने की जरूरत ही महसूस नहीं होती। बंटा की कुछ पुरानी लोकप्रिय चप्पलों की तरह—पीढ़ियां बदल जाती हैं, लेकिन चप्पल का रूप किसी पुराने रिश्तेदार की तरह वहीं खड़ा रहता है।
जूते की दुनिया में यह भी एक विचित्र विरोधाभास है।
हम जूते खरीदते हैं ताकि वे हमारे साथ चलें, लेकिन अंततः वे हमारी पहचान बन जाते हैं।
किसी शादी में आदमी शायद किसी के कुर्ते की सिलाई पर ध्यान न दे, लेकिन जूते जरूर देख लेता है।
दफ्तर में किसी सहकर्मी की नई शर्ट पर कोई टिप्पणी न करे, लेकिन नया जूता तुरंत सवाल पैदा करता है—
"कहां से लिया?"
जूता चुपचाप बातचीत शुरू कर देता है।
लेकिन जूता सिर्फ पहचान और प्रतिष्ठा का प्रतीक नहीं रहा। उसने इतिहास में सत्ता और अपमान की भाषा भी सीखी है।
जिस वस्तु को हमने पांव के नीचे रखा, वही कभी-कभी किसी की इज्जत उतारने का औजार बन गई।
भारतीय भाषाओं में 'जूते से मारना', 'जूते की नोक पर रखना', 'जूती समझना' जैसे मुहावरे हैं। यानी भाषा ने भी जूते को केवल पहनने की वस्तु नहीं माना; उसे अपमान, तिरस्कार और अधीनता के प्रतीक में बदल दिया।
मध्य-पूर्व की कई संस्कृतियों में जूते के तलवे को दिखाना या जूता फेंकना विशेष रूप से गंभीर अपमान माना जाता है, क्योंकि जूता उस चीज को छूता है जिसे जमीन और शरीर के सबसे निचले हिस्से से जोड़ा जाता है। इसी सांस्कृतिक अर्थ ने आधुनिक राजनीति में जूते को विरोध के प्रतीक में बदल दिया।
2008 में दुनिया ने इसका सबसे चर्चित आधुनिक उदाहरण देखा, जब एक इराकी पत्रकार ने बगदाद में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश की प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपने दोनों जूते उनकी ओर फेंके। बुश ने झुककर जूते से बचाव किया, लेकिन घटना की तस्वीर दुनिया भर में फैल गई। वह जूता अचानक एक वस्तु से बढ़कर राजनीतिक असहमति की भाषा बन गया।
इस घटना की दिलचस्पी इस बात में थी कि जूते ने चोट से ज्यादा अपमान का संदेश दिया। दार्शनिक जेरोम न्यू के विश्लेषण के अनुसार, ऐसे प्रतीकात्मक हमलों का उद्देश्य अक्सर शारीरिक क्षति से अधिक सम्मान और गरिमा पर प्रहार करना होता है।
भारत में भी जूता राजनीतिक विरोध का प्रतीक बना है। 

यानी जूते ने मानव सभ्यता की एक लंबी यात्रा तय की है—
पहले वह पांव बचाने की चीज था।
फिर वह चलने का साथी बना।
फिर पहनावे का हिस्सा बना।
फिर प्रतिष्ठा का प्रतीक बना।
फिर फैशन बना।
फिर उद्योग बना।
और कहीं-कहीं वह विरोध और अपमान का हथियार भी बन गया।
जूते की यात्रा यहीं खत्म नहीं होती।
कभी-कभी वह स्मृति भी बन जाता है।
युद्ध में मारे गए सैनिक के खाली जूते।
किसी मृत व्यक्ति के दरवाजे पर रखे उसके पुराने जूते।
किसी बच्चे के छोटे पड़ चुके जूते।
किसी पिता के जूते, जिन्हें बेटा संभालकर रखता है।
इन सबमें जूता वस्तु नहीं रह जाता—वह अनुपस्थिति का संकेत बन जाता है।
किसी का जूता खाली पड़ा हो तो पांव की अनुपस्थिति दिखाई देती है।
शायद इसीलिए जूते मनुष्य से कुछ ज्यादा ईमानदार होते हैं। वे हमारे साथ चलते हैं, हमारी धूल खाते हैं, हमारी थकान जानते हैं और हमारे रास्तों का हिसाब रखते हैं।
जूते पर लगी मिट्टी बताती है कि आदमी कहां-कहां गया है।
तलवे की घिसावट बताती है कि वह कैसे चलता है।
जूते की मरम्मत बताती है कि उसने चीजों को कितनी जल्दी छोड़ना सीखा या कितनी देर तक निभाया।
और जूते का नया होना बताता है कि शायद कोई नई यात्रा शुरू हुई है।
इसलिए अगली बार जब आप ट्रेन में बैठे हों और सामने बैठे लोगों के जूतों को देखें, तो सिर्फ यह मत देखिएगा कि किसका जूता सुंदर है और किसका पुराना।
उन जूतों की कहानियां पढ़ने की कोशिश कीजिएगा।
किसी जूते पर धूल होगी—वह किसी रास्ते की कहानी होगी।
किसी जूते पर चमक होगी—वह किसी पसंद की कहानी होगी।
किसी चप्पल पर टूटी हुई पट्टी होगी—वह किसी लंबे साथ की कहानी होगी।
किसी सैनिक के भारी जूते में किसी सीमा की कहानी होगी।
किसी बच्चे के छोटे जूते में बढ़ते हुए बचपन की।
और किसी बुजुर्ग के पुराने जूते में शायद आधी सदी की यात्रा।
अंततः आदमी के जीवन को भी तो जूते की तरह ही समझा जा सकता है।
हम सब अलग-अलग डिजाइन के हैं।
हमारे रास्ते अलग हैं।
हमारी चाल अलग है।
किसी का रास्ता चिकना है, किसी का पथरीला।
किसी के तलवे जल्दी घिस जाते हैं, किसी के लंबे समय तक चलते हैं।
किसी को रास्ते में कांटे मिलते हैं, किसी को कालीन।
फिर भी मंजिल की ओर बढ़ने का मूल तरीका वही है—
एक पैर आगे, दूसरा उसके पीछे।
सभ्यता ने जूते बदल दिए।
रास्ते बदल दिए।
फैशन बदल दिया।
जूते बनाने की मशीनें बदल दीं।
अब तो कृत्रिम बुद्धिमत्ता से डिजाइन तैयार होने लगे हैं और कारखानों में हजारों जोड़ी जूते एक साथ बनने लगे हैं।
लेकिन मनुष्य की चाल नहीं बदली।
वह अब भी चलता है।
और शायद जूते की पूरी कहानी का सबसे सुंदर सत्य यही है—
जूता चाहे कितना भी नया हो, अंततः उसे किसी पुराने काम में ही लगाया जाता है—किसी आदमी को उसकी मंजिल तक पहुंचाने में।
चेहरा आदमी की पहचान बता सकता है।
कपड़े उसका सामाजिक परिचय दे सकते हैं।
लेकिन उसके जूते उसकी यात्रा बताते हैं।
और हर पांव के नीचे एक अलग कहानी है।

धूमिल के मोचीराम के लिए -

न कोई छोटा है
न कोई बड़ा है

 हर आदमी एक जोड़ी जूता है

जूते के सुर और जूता-प्रेमी

हिंदी सिनेमा ने जूते को केवल पहनावे की चीज नहीं रहने दिया, उसे गीतों में चरित्र, पहचान, यात्रा और मस्ती का प्रतीक बना दिया। राज कपूर की फिल्म श्री 420 का “मेरा जूता है जापानी, ये पतलून इंग्लिशतानी, सिर पे लाल टोपी रूसी, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी” जूते को वैश्विक आधुनिकता और भारतीय आत्मा के अद्भुत मेल का रूपक बना देता है। वहीं इब्न बतूता वाला गीत—“इब्न बतूता, बगल में जूता, पहने तो पूरा है फिट”—जूते को घूमक्कड़ी, बचपन और खिलंदड़ेपन की लय में बदल देता है। इनके बीच हिंदी फिल्मों में जूता कभी प्रेम का बहाना बना, कभी गरीबी और हैसियत का संकेत, कभी हास्य का उपकरण और कभी व्यक्ति की पहचान का हिस्सा। “जूते दे दो पैसे ले लो” जैसे लोक-रंग वाले गीत हों या शादी-ब्याह में दूल्हे के जूते चुराने की रस्म से जुड़े गीत-संवाद—जूता भारतीय लोकप्रिय संस्कृति में पैरों से निकलकर गीत, कथा और मुहावरे तक जा पहुँचा है। इस अर्थ में हिंदी फिल्मी गीतों ने जूते को जमीन पर चलने वाली वस्तु से उठाकर हमारी सामूहिक कल्पना में एक सांस्कृतिक पात्र बना दिया।

दुनिया की अनेक मशहूर हस्तियों की जिंदगी में भी जूते महज जरूरत नहीं, जुनून और व्यक्तित्व का हिस्सा रहे हैं। अमेरिकी बास्केटबॉल खिलाड़ी Michael Jordan के नाम से जुड़ा Air Jordan तो जूते और लोकप्रिय संस्कृति के रिश्ते का शायद सबसे बड़ा उदाहरण है—खेल का जूता देखते-देखते पहचान, फैशन और संग्रह की वस्तु बन गया। Imelda Marcos के जूतों का विशाल संग्रह उनकी सार्वजनिक छवि का ऐसा हिस्सा बना कि उनका नाम ही जूता-संग्रह के पर्याय की तरह इस्तेमाल होने लगा। भारत में भी फिल्मी सितारों और राजघरानों से लेकर उद्योगपतियों तक, महंगे, हाथ से बने और विशेष डिजाइन वाले जूतों का आकर्षण प्रतिष्ठा और व्यक्तित्व-प्रदर्शन से जुड़ा रहा है। आखिर जूता भी अजीब चीज है—वह आदमी के सिर पर नहीं होता, फिर भी कई बार उसकी हैसियत, स्वाद, स्वभाव और यात्रा—चारों का पता दे देता है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें