कुरुक्षेत्र के उस मोड़ पर...
समय थम गया था। रथ के दो पहियों के बीच सिर्फ दो योद्धा नहीं खड़े थे, बल्कि एक तरफ़ था मनुष्य का संशय और दूसरी तरफ़ स्वयं सृष्टि का समाधान। अर्जुन के हाथ से गांडीव छूटकर गिर चुका था—अपनों को खोने का डर जब कर्तव्य पर हावी हो जाए, तो आत्मा ऐसी ही शिथिल हो जाती है। उसी निस्तब्धता में, सारथि बने केशव की मुस्कान फूटी और उपनिषदों का नवनीत बनकर ढलने लगा।
अठारह अध्यायों की यह यात्रा असल में कुरुक्षेत्र से शुरू होकर हमारे-आपके भीतर तक जाती है।
अठारह का यह विचित्र अंक ही क्यों?
सोचिए, अठारह दिन का युद्ध, अठारह अक्षौहिणी सेना और ग्रंथ के अठारह ही पर्व! यह केवल कोई संयोग या गणित नहीं है। सनातन चिंतन में यह अंक पूर्णांक और रूपांतरण का प्रतीक है। जब मनुष्य अपनी चेतना के अठारह सीढ़ियों को पार करता है, तभी वह संशय से निकलकर सिद्धि तक पहुँचता है। यह अठारह अध्याय मन की अठारह उलझनों को सुलझाने के अठारह सोपान हैं।
छह-छह के तीन पड़ाव: चेतना का विस्तार
गीता की यह अठारह अध्यायों की गंगा तीन धाराएँ बनाकर बहती है:
- प्रथम षटक (अध्याय १-६): कर्म की भूमि शुरुआत अर्जुन के 'विषाद' से होती है। विषाद यदि सही दिशा पाए, तो योग बन जाता है। यहाँ कृष्ण आत्मा की अजरता-अमरता का बोध कराते हुए कहते हैं—"शरीर वस्त्र की तरह है, उसे बदलना नियति है।" मन को साधने और बिना फल की चिंता किए कर्म करने की कला यहाँ सिखाई गई है।
- द्वितीय षटक (अध्याय ७-१२): भक्ति का विस्तार यहाँ केशव अपना घूँघट उठाते हैं। अर्जुन को अपनी 'विभूति' और 'विश्वरूप' के दर्शन कराते हैं। ब्रह्मांड की हर चमक, हर ऊर्जा में कृष्ण का ही विस्तार दिखाई देता है। जब साधक समझ जाता है कि सब कुछ ईश्वर ही है, तब तर्क समाप्त होता है और 'भक्ति' का जन्म होता है।
- तृतीय षटक (अध्याय १३-१८): ज्ञान का शिखर अंतिम पड़ाव विवेक का है। शरीर (क्षेत्र) और आत्मा (क्षेत्रज्ञ) का भेद, प्रकृति के तीन गुण (सत्, रज, तम) और दैवी-आसुरी संपदा का अंतर स्पष्ट होता है। और अंत में, अठारहवें अध्याय में कृष्ण सब समेटते हुए कहते हैं—"सब छोड़, बस मेरी शरण में आ जा।"
केशव की वह बात, जो आज भी गूँजती है
कृष्ण कोई नीरस उपदेशक नहीं थे, वे जीवन के सबसे रसिया और व्यावहारिक शिक्षक थे। उनका पहला और अंतिम संदेश एक ही है—भागो मत, जागो।
वे कहते हैं, कर्म से भागना संन्यास नहीं है, बल्कि कर्म के फल की आसक्ति को छोड़ देना ही सच्चा त्याग है। जब जीवन में सफलता और विफलता, सुख और दुख एक जैसे लगने लगें, समझो तुमने गीता को समझ लिया।
कुरुक्षेत्र का युद्ध तो सदियों पहले समाप्त हो गया, पर मन का कुरुक्षेत्र आज भी जारी है। जब-जब मन का गांडीव हाथ से छूटने लगे, तब-तब अठारह अध्यायों की यह बाँसुरी इंसान को फिर से युद्ध के मैदान में डट जाने का हौसला देती है।

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