शनिवार, 5 सितंबर 2026

निठल्ले के नोट्स

निठल्ला होने की कला

हमारे समाज में ‘निठल्ला’ होना लगभग अपराध की श्रेणी में आता है। सुबह देर तक बिस्तर पर पड़े रहिए तो कोई पूछेगा—“आज काम पर नहीं जाना?” बरामदे में कुर्सी डालकर चाय पीते हुए आसमान देखिए तो घर का कोई सदस्य चिंतित होकर कहेगा—“कुछ काम नहीं है क्या?” दफ्तर में पाँच मिनट खिड़की के बाहर देख लीजिए तो लगेगा कि कर्मचारी कामचोर हो गया। और अगर कोई युवा कह दे कि “आज मैं कुछ नहीं करूँगा”, तो उसके भविष्य की चिंता में परिवार, पड़ोसी और समाज तीनों एक साथ जुट जाते हैं।

मानो मनुष्य का जन्म ही इसलिए हुआ हो कि वह हर क्षण कुछ-न-कुछ करता रहे।

लेकिन क्या सचमुच हर समय कुछ करना जरूरी है?

क्या खाली बैठना हमेशा आलस्य है? क्या निष्क्रिय दिखाई देने वाला मन भीतर से भी निष्क्रिय होता है? और क्या दुनिया की कुछ बड़ी खोजें, रचनाएँ और विचार उस समय जन्मे, जब उनके रचयिता वास्तव में किसी निश्चित काम में व्यस्त नहीं थे?

शायद ‘निठल्ला’ शब्द को एक बार फिर से समझने की जरूरत है।

क्योंकि संभव है कि जिसे हम निठल्लापन कहते हैं, उसका एक हिस्सा दरअसल मन की प्रयोगशाला हो।


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निठल्ला आखिर होता कौन है?

हिन्दवी शब्दकोश के अनुसार ‘निठल्ला’ उस व्यक्ति को कहा जाता है जिसके पास कोई काम-धंधा न हो, जो खाली या बेरोजगार हो अथवा काम न करता हो; इसके साथ ‘आलसी’, ‘आरामतलब’, ‘निकम्मा’, ‘ठलुआ’ जैसे अर्थ भी जुड़े हैं। 

अर्थात शब्द के ऊपर समाज ने काफी नकारात्मक रंग चढ़ा दिया है।

लेकिन इसमें एक दिलचस्प फर्क है—काम न करना और कुछ न करना एक ही बात नहीं है।

किसी व्यक्ति का शरीर कुर्सी पर बैठा हो सकता है, मगर उसका दिमाग हजारों किलोमीटर की यात्रा कर रहा हो। वह खिड़की के बाहर पेड़ देख रहा हो सकता है और उसके भीतर कोई कहानी आकार ले रही हो। वह चाय की प्याली में चम्मच घुमा रहा हो सकता है और उसके मन में किसी कठिन समस्या का हल घूम रहा हो सकता है।

इसलिए ‘निठल्ला’ के दो रूप हैं।

एक वह, जो सचमुच अकर्मण्य है।

दूसरा वह, जो बाहर से निष्क्रिय और भीतर से अत्यंत सक्रिय है।

पहला निठल्लापन जीवन को जड़ बना सकता है; दूसरा कभी-कभी जीवन को नई दिशा दे सकता है।


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‘निठल्ला’ शब्द की व्युत्पत्ति भी थोड़ी निठल्ली है!

‘निठल्ला’ की व्युत्पत्ति को लेकर शब्दकोशीय स्रोतों में पूरी एकरूपता नहीं मिलती। हिन्दी शब्दसागर-आधारित प्रविष्टियों में इसे ‘नि + ठाला’ से बना माना गया है—अर्थात ऐसा व्यक्ति जो ‘ठाला’ यानी खाली हो। 

एक अन्य शब्द-स्रोत में ‘निठल्ला’ के लिए ‘नि = नहीं’ + ‘टहल’ जैसी व्युत्पत्तिगत संभावना भी दी गई है। 

यानी शब्द स्वयं भी जैसे अपनी उत्पत्ति के मामले में थोड़ा-सा निठल्ला है—एक जगह बैठकर तय नहीं करता कि आखिर वह आया कहाँ से!

इसके निकट का शब्द है ‘निठाला’—जिसका अर्थ है ऐसा खाली समय जिसमें कोई काम-धंधा या रोजगार न हो, फुरसत का समय, या ऐसी अवस्था जिसमें आय का साधन न हो। 

और फिर आता है ‘ठल्ला’—जिसे हिन्दवी भी ‘निठल्ला’ का पर्याय बताती है। 

भाषा में शब्द बदलते-बदलते अर्थों की एक पूरी सामाजिक कहानी भी अपने भीतर लेकर चलते हैं। ‘खाली समय’ धीरे-धीरे ‘काम न करने’ और फिर ‘काम का न होने’ तक पहुँच गया। यानी हमारी अर्थव्यवस्था ने समय को भी नैतिकता से जोड़ दिया—जो समय पैसे या उत्पादन में न बदले, वह जैसे बेकार समय है।

यहीं से निठल्लेपन की असली कहानी शुरू होती है।


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हर खाली समय बेकार नहीं होता

हमने आधुनिक जीवन में समय को इतनी कसकर बाँध दिया है कि खाली समय हमें डराने लगा है।

सुबह अलार्म।
फिर नहाना।
फिर दफ्तर।
फिर बैठक।
फिर ई-मेल।
फिर फोन।
फिर संदेश।
फिर सोशल मीडिया।
फिर घर।
फिर स्क्रीन।
फिर सोना।

और अगले दिन वही चक्र।

इस व्यस्तता के बीच अगर कोई दस मिनट चुपचाप बैठ जाए तो हमें लगता है कि वह समय बर्बाद कर रहा है।

लेकिन मस्तिष्क के लिए हर समय ‘काम’ करना जरूरी नहीं। रचनात्मकता पर हुए शोधों में incubation, यानी किसी समस्या से कुछ समय के लिए ध्यान हटाना, एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया मानी गई है। कुछ अध्ययनों में पाया गया कि हल्के या कम demanding काम के दौरान मन को भटकने देने से पहले से सोची जा रही रचनात्मक समस्या पर बाद में प्रदर्शन बेहतर हो सकता है। 

अर्थात कभी-कभी समस्या का हल समस्या को घूरते रहने से नहीं, समस्या से थोड़ी देर दूर चले जाने से मिलता है।

यही तो निठल्लेपन का पहला बड़ा लाभ है।

दिमाग को साँस लेने की जगह मिलती है।


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निठल्लापन दरअसल विचारों का ‘खुला मैदान’ है

हमारी समस्या यह है कि हम दिमाग को भी दफ्तर बना चुके हैं।

हर विचार का कोई लक्ष्य होना चाहिए।
हर मिनट productive होना चाहिए।
हर बातचीत useful होनी चाहिए।
हर यात्रा purposeful होनी चाहिए।

लेकिन विचार हमेशा आदेश पर पैदा नहीं होते।

कभी कोई धुन नहाते समय आती है।
कभी कहानी बस में बैठकर सूझती है।
कभी किसी पुराने दोस्त की याद अचानक कोई कविता बन जाती है।
कभी बालकनी में कपड़े सुखाते हुए किसी जटिल समस्या का उत्तर मिल जाता है।

मन का अपना मौसम होता है।

और उस मौसम में सबसे अच्छी चीज कभी-कभी यही होती है कि हम छाता लेकर उसके नीचे खड़े न हों।


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न्यूटन और सेब : पेड़ के नीचे बैठा हुआ एक ‘निठल्ला’?

कल्पना कीजिए—एक आदमी बगीचे में बैठा है। कोई कंप्यूटर नहीं, कोई प्रस्तुति नहीं, कोई बैठक नहीं। बस पेड़, हवा, आकाश और विचार।

फिर एक सेब गिरता है।

और मन पूछता है—यह नीचे ही क्यों गिरा?

आगे की कहानी हम सब जानते हैं। न्यूटन और सेब की कथा गुरुत्वाकर्षण से जुड़ी प्रसिद्ध प्रेरक कहानी बन गई। इतिहासकार इस कहानी के लोकप्रिय संस्करण को लेकर सावधानी बरतते हैं, लेकिन William Stukeley के संस्मरण में न्यूटन द्वारा बगीचे में ‘contemplative mood’ में सेब गिरते देखने और गुरुत्वाकर्षण के विचार से उसका संबंध बताने का विवरण मिलता है। 

यहाँ असली चमत्कार सेब का गिरना नहीं था।

चमत्कार यह था कि एक आदमी ने उसे गिरते हुए देखा।

दुनिया में रोज करोड़ों सेब गिरते थे। मगर बाकी लोग शायद सेब उठाकर खा लेते थे।

न्यूटन ने पूछा—क्यों?

यही निठल्लेपन और जिज्ञासा का रिश्ता है।

जब बाकी दुनिया घटना देखती है, निठल्ला मन कभी-कभी उसमें प्रश्न देख लेता है।


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आर्किमिडीज का ‘यूरेका’ भी बाथरूम से निकला था!

दुनिया की सबसे प्रसिद्ध वैज्ञानिक कथाओं में एक आर्किमिडीज की है।

राजा के मुकुट में मिलावट की समस्या थी। आर्किमिडीज समाधान खोज रहे थे। फिर स्नान करते समय उन्होंने देखा कि शरीर पानी में उतरता है तो पानी विस्थापित होता है। इसी से जुड़ी प्रसिद्ध ‘Eureka!’ कथा बनी। 

कहानी का लोकप्रिय संस्करण चाहे जितना रोचक हो, इतिहासकार इसके हर विवरण को तथ्य मानने के बजाय सावधानी से देखते हैं। लेकिन इसका सांस्कृतिक महत्व अद्भुत है।

एक कठिन वैज्ञानिक समस्या पर सोचते-सोचते आदमी स्नान करने चला गया।

और समस्या उसके पीछे-पीछे बाथरूम तक चली गई।

अर्थात दिमाग ने काम बंद नहीं किया; उसने बस काम करने का तरीका बदल दिया।

यही तो incubation है—समस्या सामने नहीं है, फिर भी भीतर कहीं चल रही है।


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आइंस्टीन का दिमाग भी कभी-कभी ‘निठल्ला’ घूमता था

Albert Einstein की वैज्ञानिक शैली की एक खास विशेषता थी—thought experiments, यानी विचार-प्रयोग।

वह कल्पना करते थे—अगर मैं प्रकाश की किरण के साथ-साथ चलूँ तो क्या होगा? कोई व्यक्ति छत से गिर रहा हो तो उसे गुरुत्वाकर्षण कैसा महसूस होगा? ट्रेन, बिजली की चमक और गति के बारे में क्या होगा?

इनमें से कोई वास्तविक प्रयोगशाला में किया गया प्रयोग नहीं था। ये पहले दिमाग की प्रयोगशाला में खेले गए खेल थे। आइंस्टीन के ऐसे विचार-प्रयोग उनकी वैज्ञानिक सोच का महत्वपूर्ण हिस्सा थे। 

यहाँ ‘निठल्लापन’ शब्द का एक नया अर्थ सामने आता है।

कल्पना करना, बाहर से देखने पर निष्क्रिय हो सकता है; भीतर से वह बेहद सक्रिय क्रिया है।

आइंस्टीन के दिमाग में शायद कोई बॉस नहीं था जो हर पाँच मिनट में पूछता हो—“क्या output निकला?”

इसलिए दिमाग प्रश्नों के साथ खेल सकता था।


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जे.के. रोलिंग और वह समय जब जीवन व्यवस्थित नहीं था

J. K. Rowling की कहानी थोड़ी अलग है।

उनके पास कोई आरामदेह ‘creative sabbatical’ नहीं था। जीवन कठिन था। वे अकेली माँ थीं, आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रही थीं और एडिनबर्ग में बेटी के साथ रह रही थीं। उन्होंने कैफे में बैठकर, बेटी के सो जाने के दौरान, Harry Potter लिखना जारी रखा। उनकी आधिकारिक जीवनी भी बताती है कि ट्रेन यात्रा के दौरान Harry Potter का विचार अचानक आया था और बाद में उन्होंने कैफे में बैठकर लिखना जारी रखा। 

यह उदाहरण निठल्लेपन का नहीं, बल्कि एक दूसरी महत्वपूर्ण बात का है—

हर महान विचार योजनाबद्ध बैठक में पैदा नहीं होता।

कभी वह delayed train में आता है।

कभी कॉफी की मेज पर।

कभी उस समय जब जीवन की कोई स्पष्ट योजना नहीं होती।


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दुनिया की अनेक खोजों में ‘योजना’ से ज्यादा ‘संयोग’ का हाथ रहा है

मानव सभ्यता की कहानी में ऐसे अनेक प्रसंग हैं जहाँ खोज और आविष्कार बिल्कुल उस तरह नहीं हुए, जैसे किसी परियोजना का खाका बनाकर उन्हें किया गया था।

कभी किसी प्रयोग में अनपेक्षित परिणाम आया।

कभी किसी वैज्ञानिक ने असामान्य चीज देखी।

कभी कोई कलाकार अपने तय रास्ते से भटका।

कभी किसी लेखक ने लिखते-लिखते कहानी को दूसरी दिशा में जाते देखा।

इसीलिए विज्ञान और रचनात्मकता में serendipity—अप्रत्याशित लेकिन उपयोगी खोज— का महत्व है।

योजना आपको वहाँ ले जाती है जहाँ आप जाना चाहते हैं।

भटकना कभी-कभी वहाँ ले जाता है जहाँ आपको पता ही नहीं था कि जाना चाहिए।


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निठल्लापन और ‘ऊब’ का रिश्ता

आज के समय में हम ऊबना भूल गए हैं।

लाइन में खड़े हैं—मोबाइल निकाल लिया।

लिफ्ट का इंतजार—मोबाइल।

बस का इंतजार—मोबाइल।

चाय बन रही है—मोबाइल।

सोने से पहले—मोबाइल।

दिमाग को एक सेकंड खाली मिला नहीं कि हम उसमें सूचना भर देते हैं।

लेकिन कभी-कभी ऊब रचनात्मकता का दरवाजा खोलती है।

जब बाहर से कोई नया stimulus नहीं मिलता, मन भीतर घूमना शुरू करता है।

किसी पुराने अनुभव से किसी नए अनुभव की कड़ी जुड़ती है।
एक चेहरा किसी कहानी के पात्र में बदल जाता है।
एक शब्द किसी कविता की शुरुआत बन जाता है।
एक सवाल दूसरे सवाल को जन्म देता है।

हाल के शोध भी यह संकेत देते हैं कि incubation के दौरान mind-wandering और रचनात्मक प्रदर्शन के बीच संबंध हो सकता है, हालांकि यह संबंध हर परिस्थिति में समान नहीं होता और वैज्ञानिक प्रमाण पूरी तरह एकमत नहीं हैं। 

इसलिए निठल्लापन कोई जादुई formula नहीं है।

लेकिन सही मात्रा में खालीपन रचनात्मकता के लिए उपयोगी जगह जरूर बना सकता है।


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निठल्लेपन का पहला फायदा—मन को ‘रीसेट’ करना

लगातार काम करने से हम केवल थकते नहीं, बल्कि एक ही ढर्रे में फँस भी जाते हैं।

एक समस्या को लगातार देखते रहने पर हमारी सोच उसी रास्ते पर घूमती रहती है।

फिर हम कहते हैं—

“कुछ सूझ नहीं रहा।”

कई बार इसका समाधान और ज्यादा सोचने में नहीं, थोड़ा कम सोचने में होता है।

किताब बंद कर दीजिए।

कुर्सी से उठिए।

थोड़ा टहल आइए।

पेड़ देखिए।

चाय पीजिए।

बिना किसी लक्ष्य के बैठिए।

और संभव है कि लौटकर वही समस्या अचानक थोड़ी कम कठिन लगे।

यही मानसिक ‘रीसेट’ है।


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दूसरा फायदा—निठल्लापन जिज्ञासा को जन्म देता है

जब हम हर चीज का उपयोग तय कर देते हैं, तो दुनिया में आश्चर्य कम हो जाता है।

लेकिन निठल्ला आदमी चीजों को देखने लगता है।

वह पूछ सकता है—

पंखा घूमते समय हवा कैसी बनती है?

बारिश की बूंद गोल क्यों है?

चिड़िया तार पर बैठकर गिरती क्यों नहीं?

किसी पुराने मकान की खिड़की ऐसी क्यों है?

चाय की दुकान पर हर आदमी की अपनी चाय की शैली क्यों है?

और यहीं से विज्ञान, साहित्य, दर्शन और कला के प्रश्न पैदा होते हैं।

जिसे दुनिया मामूली मानकर आगे बढ़ जाती है, निठल्ला मन वहीं रुक जाता है।


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तीसरा फायदा—यह कल्पना को मुक्त करता है

काम की दुनिया में हमें सही उत्तर चाहिए।

कल्पना की दुनिया में हमें संभव उत्तर चाहिए।

निठल्लेपन में मन ‘क्या है’ से आगे बढ़कर ‘क्या हो सकता है’ पूछता है।

और हर आविष्कार की शुरुआत इसी प्रश्न से होती है।

पहिया बनाने से पहले किसी ने सोचा होगा—अगर यह चीज गोल घूमे तो?

उड़ने से पहले किसी ने सोचा होगा—अगर मनुष्य भी पक्षी की तरह हवा में जा सके तो?

दूर बैठे आदमी से बात करने से पहले किसी ने सोचा होगा—आवाज इतनी दूर क्यों नहीं जा सकती?

और आज जब हम फोन पर हजारों किलोमीटर दूर बैठे आदमी का चेहरा देख रहे होते हैं, तब याद आता है कि कभी ये सब किसी की कल्पना में बेतुका विचार रहा होगा।


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चौथा फायदा—निठल्लापन आत्मसंवाद का समय देता है

व्यस्त आदमी सबके संपर्क में रहता है, मगर कई बार स्वयं से संपर्क टूट जाता है।

निठल्ला समय पूछता है—

मैं क्या चाहता हूँ?

मैं किस काम में खुश होता हूँ?

मुझे किस चीज से डर लगता है?

मैं वास्तव में क्या लिखना चाहता हूँ?

मैं किसे फोन करना चाहता हूँ?

मैंने आखिरी बार बिना किसी उद्देश्य के कब कुछ पढ़ा था?

ये प्रश्न productivity chart में नहीं आते।

लेकिन जीवन इन्हीं प्रश्नों से बनता है।


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पाँचवाँ फायदा—अचानक आने वाले विचारों के लिए दरवाजा खुला रहता है

विचार बहुत अनुशासित प्राणी नहीं होते।

वे कैलेंडर देखकर नहीं आते।

वे कहते नहीं—

“शाम 5:30 से 6:00 के बीच मैं आपके पास आऊँगा।”

वे अचानक आते हैं।

नहाते समय।

चलते समय।

सोने से ठीक पहले।

ट्रेन में।

चाय पीते हुए।

खिड़की के बाहर देखते हुए।

इसीलिए दुनिया के रचनात्मक लोगों की जीवनियों में ऐसे ‘अचानक सूझने’ वाले क्षण बार-बार मिलते हैं।

क्योंकि मन को जब थोड़ा खाली छोड़ा जाता है, तब वह अपनी पुरानी सामग्री को नए ढंग से जोड़ सकता है।


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मगर सावधान! निठल्लापन आलस्य का दूसरा नाम नहीं है

यहाँ सबसे जरूरी सावधानी है।

निठल्लापन और आलस्य को रोमांटिक बना देना भी एक भूल होगी।

अगर कोई व्यक्ति जरूरी काम छोड़कर दिन भर सोता रहे, जिम्मेदारियों से भागे, मेहनत से बचे और उसे ‘creative incubation’ का नाम दे दे, तो यह आत्म-छल है।

क्योंकि रचनात्मक निठल्लापन उस व्यक्ति के लिए उपयोगी है जिसके भीतर जिज्ञासा, अनुभव, अध्ययन और विचार का पदार्थ पहले से मौजूद हो।

खाली खेत में आप आराम से बैठ सकते हैं, लेकिन फसल अपने-आप नहीं उगेगी।

पहले बीज चाहिए।

इसी तरह—

काम के बाद का खालीपन रचनात्मक हो सकता है; काम से बचने का खालीपन जरूरी नहीं।

यही दोनों के बीच सबसे बड़ा अंतर है।


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असली निठल्लापन ‘कुछ नहीं’ नहीं, ‘कुछ भी’ है

शायद हमें निठल्लेपन की परिभाषा बदलनी चाहिए।

निठल्ला वह नहीं जो कुछ नहीं करता।

कभी-कभी निठल्ला वह है जो समाज द्वारा निर्धारित काम नहीं कर रहा होता, लेकिन अपने भीतर कुछ ऐसा कर रहा होता है जिसका परिणाम अभी दिखाई नहीं दे रहा।

कवि के सामने कागज खाली है।

चित्रकार कैनवास को देख रहा है।

वैज्ञानिक खिड़की से बाहर देख रहा है।

लेखक चाय ठंडी कर रहा है।

संगीतकार सुर खोज रहा है।

दार्शनिक छत देख रहा है।

बाहर से सब निठल्ले।

भीतर से सब काम में।


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समाज को भी निठल्लों की जरूरत है

अगर हर व्यक्ति केवल वही करता जो समाज उससे करवाना चाहता है, तो दुनिया में शायद बहुत कम नई चीजें पैदा होतीं।

समाज को कुछ ऐसे लोग चाहिए जो पूछें—

“ऐसा क्यों?”

“अगर ऐसा न हो तो?”

“क्या इसे किसी दूसरे तरीके से किया जा सकता है?”

“क्या कोई और रास्ता है?”

यही प्रश्न प्रगति का ईंधन हैं।

और इन प्रश्नों के लिए थोड़ी-सी मानसिक आवारगी चाहिए।

बहुत अधिक अनुशासित मन कभी-कभी बहुत अच्छा कर्मचारी बन सकता है; थोड़ा भटकता हुआ मन कभी-कभी नया रास्ता खोज सकता है।


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और शायद इसलिए ‘निठल्ले’ का एक नया सम्मान होना चाहिए

हमारे यहाँ ‘निठल्ला’ शब्द अक्सर ताने की तरह बोला जाता है।

“बड़ा निठल्ला है!”

लेकिन कल्पना कीजिए, अगर हम इसे गाली की जगह एक अस्थायी मानसिक अवस्था मानें।

आज कुछ नहीं करना है।

आज बस बैठना है।

आज कोई लक्ष्य नहीं।

आज कोई सूची नहीं।

आज कोई उपलब्धि नहीं।

आज बस चाय होगी।

खिड़की होगी।

आकाश होगा।

थोड़ी-सी ऊब होगी।

कुछ भटके हुए विचार होंगे।

और शायद उन्हीं में से कोई एक विचार कल की कविता बन जाए।

कोई दूसरा लेख।

कोई तीसरा आविष्कार।

कोई चौथा निर्णय।

कोई पाँचवाँ जीवन-परिवर्तन।


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अंततः निठल्लापन समय की बर्बादी नहीं, समय की खुली खिड़की हो सकता है

हमने जीवन को इतना लक्ष्य-केंद्रित बना दिया है कि भूल गए हैं—मनुष्य मशीन नहीं है।

मशीन को निर्देश चाहिए।

मनुष्य को कभी-कभी विराम चाहिए।

मशीन को काम चाहिए।

मनुष्य को कभी-कभी खालीपन चाहिए।

मशीन लगातार चलती है।

मनुष्य रुकता है, सोचता है, भटकता है, सपने देखता है और फिर एक दिन अचानक कह उठता है—

“अरे! यह तो ऐसे भी किया जा सकता है!”

शायद न्यूटन के बगीचे में गिरता हुआ सेब इसी तरह किसी प्रश्न का दरवाजा बना था। शायद आर्किमिडीज के स्नान का प्रसंग इसी बात का प्रतीक है कि समाधान कभी-कभी समस्या से दूर जाकर मिलता है। आइंस्टीन के thought experiments बताते हैं कि प्रयोगशाला से पहले कल्पना की प्रयोगशाला होती है। और रचनात्मकता पर आधुनिक शोध भी संकेत देता है कि कुछ परिस्थितियों में काम से विराम, मन का भटकना और incubation नए संबंध बनाने में सहायक हो सकते हैं। 

इसलिए अगली बार कोई आपको निठल्ला कहे तो तुरंत नाराज़ मत होइए।

पहले यह देखिए कि आप कर क्या रहे हैं।

अगर आप केवल जिम्मेदारियों से भाग रहे हैं, तो वह निठल्लापन नहीं—आलस्य है।

लेकिन अगर आप कुछ देर दुनिया के शोर से बाहर बैठकर अपने भीतर की आवाज सुन रहे हैं, किसी अनजाने विचार को आकार लेने दे रहे हैं, किसी प्रश्न को पकने दे रहे हैं, किसी कहानी को अपने आप बनने दे रहे हैं—

तो संभव है कि आप निठल्ले नहीं, सृजन की प्रतीक्षा में हों।

क्योंकि हर बीज को अंकुर बनने के लिए लगातार हिलाया-डुलाया नहीं जाता।

उसे कुछ समय मिट्टी के अँधेरे में चुपचाप पड़े रहना पड़ता है।

और शायद मनुष्य का कुछ सबसे सुंदर काम भी ऐसे ही होता है—

पहले वह कुछ नहीं करता दिखाई देता है,
फिर अचानक कुछ ऐसा कर देता है
जो दुनिया को लगता है—
यह तो एक दिन में हो गया!

जबकि वह एक दिन नहीं था।

वह उन तमाम निठल्ले दिनों, खाली दोपहरों, भटकते विचारों और बेकार समझे गए पलों में धीरे-धीरे बन रहा था।

और इसीलिए, जीवन में मेहनत जितनी जरूरी है, थोड़ा-सा निठल्लापन भी जरूरी है।

क्योंकि कभी-कभी काम करने से उपलब्धि मिलती है और काम से हटने से विचार।

और सभ्यता आगे दोनों से बढ़ती है।

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