### अपना क्या है?
स्व, अपने और जीवन की जिम्मेदारियों के बीच उलझा मनुष्य
अक्सर हम अपने आसपास लोगों को यह कहते हुए सुनते हैं कि हमारे पास अपने लिए तो समय ही नहीं है। सुबह से शाम तक भागदौड़ है, दफ्तर की जिम्मेदारियां हैं, घर के काम हैं, बच्चों की पढ़ाई है, परिवार की जरूरतें हैं, सामाजिक दायित्व हैं और इन सबके बीच अपनी जिंदगी के लिए वक्त ही नहीं बचता। लेकिन कभी ठहरकर इस कथन पर विचार कीजिए। अगर हमारे पास अपने लिए समय नहीं है तो फिर हम जो कुछ कर रहे हैं, वह किसके लिए कर रहे हैं? दफ्तर में घंटों काम करते हैं, घर लौटकर फिर जिम्मेदारियों में जुट जाते हैं, बच्चों के भविष्य के लिए योजनाएं बनाते हैं, परिवार की सुख-सुविधाओं के लिए अपनी इच्छाओं को टालते रहते हैं, बीमार न पड़ें इसके लिए स्वास्थ्य का ध्यान रखते हैं और भविष्य सुरक्षित रहे इसके लिए पैसे बचाते हैं। आखिर यह सब किसके लिए है? क्या सचमुच हम अपने लिए कुछ नहीं कर रहे हैं या फिर हमने अपने होने और अपने लिए जीने की परिभाषा ही बहुत सीमित कर ली है?
दरअसल, 'अपना' शब्द जितना छोटा है, उसका अर्थ उतना ही व्यापक और जटिल है। अपना कौन है? अपना क्या है? और अपने लिए जीने का मतलब क्या है? इन तीनों सवालों के जवाब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि इनके जवाब हमेशा एक जैसे हों। सामान्यतः हम अपने लिए जीने का अर्थ अपनी इच्छाओं की पूर्ति, अपनी पसंद के काम, मनोरंजन, आराम, घूमने-फिरने और निजी उपलब्धियों से जोड़कर देखते हैं। इस दृष्टि से जब हमें इनमें से कुछ भी करने का अवसर नहीं मिलता तो लगता है कि हम अपने लिए जी ही नहीं रहे हैं। लेकिन क्या अपने लिए जीने का अर्थ केवल अपनी इच्छाओं की पूर्ति करना है? क्या परिवार के लिए कमाना, बच्चों को पढ़ाना, माता-पिता की देखभाल करना, जीवनसाथी की जरूरतों का ध्यान रखना और समाज के लिए कुछ करना अपने लिए जीने की श्रेणी में नहीं आता? आखिर जिन लोगों को हम अपना कहते हैं, उनके सुख-दुख से हमारा अस्तित्व भी तो जुड़ा हुआ है।
एक व्यक्ति सुबह उठकर दफ्तर जाता है। वहां वह अपनी योग्यता, समय और श्रम लगाता है। बदले में उसे वेतन मिलता है। पहली नजर में यह उसकी निजी आजीविका का मामला है। लेकिन उस वेतन का बड़ा हिस्सा घर के किराये, बच्चों की फीस, राशन, बिजली-पानी के बिल, माता-पिता की दवाइयों और परिवार की दूसरी जरूरतों पर खर्च होता है। वह केवल अपने पेट के लिए नहीं कमाता। वह अपने परिवार के वर्तमान और भविष्य के लिए कमाता है। इसी तरह घर में कोई महिला या पुरुष सुबह से रात तक घरेलू कामों में लगा रहता है। भोजन बनाना, घर की सफाई, बच्चों की देखभाल, बुजुर्गों की जरूरतें और तमाम छोटे-बड़े काम। इनमें से बहुत से कामों का कोई आर्थिक मूल्य निर्धारित नहीं होता, लेकिन इनके बिना परिवार का जीवन व्यवस्थित नहीं रह सकता। क्या इसे अपने लिए किया गया काम नहीं कहा जा सकता? यदि परिवार हमारा है, उसमें रहने वाले लोग हमारे अपने हैं और उनकी खुशियां हमारे जीवन का हिस्सा हैं, तो उनके लिए किया गया श्रम भी किसी न किसी अर्थ में अपने लिए ही किया गया श्रम है।
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझने की है कि मनुष्य का 'स्व' केवल उसका शरीर या उसका व्यक्तिगत व्यक्तित्व नहीं है। उसका स्व उसके रिश्तों, अनुभवों, विचारों, स्मृतियों, आकांक्षाओं और जिम्मेदारियों से भी निर्मित होता है। हम अकेले पैदा जरूर होते हैं, लेकिन हमारा व्यक्तित्व अकेले विकसित नहीं होता। माता-पिता, परिवार, मित्र, शिक्षक, समाज, परिवेश और परिस्थितियां हमारे भीतर बहुत कुछ जोड़ती रहती हैं। हम जिस भाषा में सोचते हैं, जिस संस्कृति में जीते हैं, जिन मूल्यों को अपनाते हैं और जिन रिश्तों को महत्व देते हैं, उनमें हमारा अपना योगदान होने के साथ-साथ दूसरों की भी बड़ी भूमिका होती है। इसलिए यह कहना कि केवल वही काम अपना है जो हम अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए करते हैं, मनुष्य के सामाजिक अस्तित्व को बहुत संकुचित कर देना होगा।
भारतीय दर्शन में 'स्व' की अवधारणा केवल व्यक्तिगत अहंकार तक सीमित नहीं है। उपनिषदों में आत्मा और आत्मबोध की चर्चा मनुष्य को अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने की दिशा देती है। वहीं भारतीय चिंतन में 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की अवधारणा अपनेपन के दायरे को परिवार से आगे पूरी दुनिया तक विस्तृत करती है। भगवद्गीता में कर्मयोग का विचार भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। कर्म करना आवश्यक है, लेकिन कर्म को केवल व्यक्तिगत लाभ और फल की आकांक्षा तक सीमित नहीं रखना चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य अपनी इच्छाओं और आवश्यकताओं को पूरी तरह समाप्त कर दे। बल्कि इसका आशय यह है कि जीवन का अर्थ केवल अपने लिए संग्रह करना नहीं, बल्कि अपने कर्मों के माध्यम से व्यापक हित में योगदान करना भी है। इस दृष्टि से परिवार के लिए किया गया श्रम, समाज के लिए किया गया योगदान और दूसरों के प्रति निभाई गई जिम्मेदारियां भी मनुष्य के अपने जीवन का ही विस्तार हैं।
अब स्वास्थ्य का उदाहरण लीजिए। हम कहते हैं कि हमें बीमार नहीं पड़ना चाहिए। इसके पीछे स्वाभाविक रूप से अपनी पीड़ा, असुविधा और तकलीफ से बचने की इच्छा होती है। लेकिन क्या बात केवल इतनी ही है? जब हम बीमार पड़ते हैं तो हमारी परेशानी के साथ-साथ पूरा परिवार प्रभावित होता है। कोई हमारी देखभाल में लग जाता है, किसी की दिनचर्या बदल जाती है, किसी को दफ्तर से छुट्टी लेनी पड़ती है, बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है और घर का बजट भी बिगड़ सकता है। कई बार हमारी बीमारी से दूसरों को मानसिक और आर्थिक परेशानियां उठानी पड़ती हैं। इसीलिए हम अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखते हैं। नियमित व्यायाम करते हैं, खानपान सुधारते हैं, समय पर दवाइयां लेते हैं और अपनी जीवनशैली को अनुशासित रखने की कोशिश करते हैं। यानी अपने शरीर की देखभाल करने में भी दूसरों के प्रति हमारी जिम्मेदारी का भाव शामिल होता है। हम स्वस्थ रहना चाहते हैं ताकि अपने लोगों के लिए उपलब्ध रह सकें। इस तरह अपने लिए किया गया एक काम दूसरों के लिए भी किया गया काम बन जाता है।
यही बात हमारी आर्थिक गतिविधियों पर भी लागू होती है। हम पैसे कमाते हैं, बचत करते हैं, बीमा कराते हैं, घर खरीदते हैं और भविष्य के लिए निवेश करते हैं। इन सबके पीछे केवल व्यक्तिगत सुरक्षा की भावना नहीं होती। हम चाहते हैं कि हमारे बाद भी परिवार सुरक्षित रहे, बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले, किसी आपात स्थिति में उन्हें दूसरों के सामने हाथ न फैलाना पड़े और जीवन की बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष न करना पड़े। यहां तक कि सेवानिवृत्ति के बाद अपने खर्चों के लिए धन जुटाना भी कहीं न कहीं परिवार पर निर्भरता कम करने की इच्छा से जुड़ा होता है। हम अपने लिए आर्थिक रूप से सक्षम रहना चाहते हैं ताकि दूसरों पर बोझ न बनें। इस प्रकार आत्मनिर्भरता भी अपनेपन के प्रति एक जिम्मेदार दृष्टिकोण बन जाती है।
लेकिन इस पूरी चर्चा में एक दूसरा पक्ष भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। क्या दूसरों के लिए जीने का अर्थ अपने लिए जीना छोड़ देना है? क्या परिवार की जिम्मेदारियां निभाते-निभाते मनुष्य अपनी इच्छाओं, रुचियों, सपनों और मानसिक शांति को पूरी तरह भुला दे? क्या अपने लोगों के लिए सब कुछ करते रहना ही जीवन का अंतिम उद्देश्य है? यहां एक महीन अंतर समझने की जरूरत है। दूसरों के लिए जीना और अपने अस्तित्व को दूसरों के हवाले कर देना दो अलग-अलग बातें हैं। प्रेम, जिम्मेदारी और अपनापन तभी सार्थक हैं जब उनमें व्यक्ति की अपनी गरिमा और स्वतंत्रता भी सुरक्षित रहे।
कई बार परिवार और समाज के प्रति जिम्मेदारियां निभाते-निभाते व्यक्ति इस हद तक थक जाता है कि उसे अपने लिए कुछ करने पर अपराधबोध होने लगता है। वह अपने लिए कोई किताब खरीदना चाहता है तो सोचता है कि इस पैसे से घर की कोई जरूरत पूरी हो सकती थी। कहीं घूमने जाना चाहता है तो बच्चों की पढ़ाई या भविष्य की चिंता आड़े आ जाती है। मित्रों के साथ कुछ समय बिताना चाहता है तो लगता है कि घर में कोई काम छूट जाएगा। वह अपनी पसंद का कोई काम शुरू करना चाहता है, लेकिन यह सोचकर रुक जाता है कि इससे परिवार को कितना लाभ होगा। धीरे-धीरे वह अपनी इच्छाओं को अनावश्यक मानने लगता है। यह स्थिति अच्छी नहीं है। क्योंकि जो व्यक्ति लगातार दूसरों के लिए अपनी ऊर्जा खर्च करता है, उसे अपनी ऊर्जा की पुनःपूर्ति के लिए भी समय चाहिए। मनुष्य कोई मशीन नहीं है कि उसमें लगातार जिम्मेदारियां डालते रहें और उससे बिना थके काम लेते रहें।
इसलिए अपने लिए समय निकालने का अर्थ स्वार्थी होना नहीं है। कुछ देर अकेले बैठना, अपनी पसंद की पुस्तक पढ़ना, संगीत सुनना, टहलना, मित्रों से मिलना, लिखना, चित्रकारी करना या बिना किसी विशेष उद्देश्य के कुछ समय बिताना भी जीवन की आवश्यकताएं हैं। ये गतिविधियां हमें अपने भीतर लौटने का अवसर देती हैं। हम दिन भर जिन भूमिकाओं में जीते हैं, उनसे कुछ देर बाहर निकलकर अपने वास्तविक मन से संवाद कर पाते हैं। आखिर हम केवल किसी के पिता, पुत्र, पति, पत्नी, कर्मचारी, अधिकारी या अभिभावक नहीं हैं। इन सबके अतिरिक्त भी हमारा एक स्वतंत्र व्यक्तित्व है, जिसकी अपनी संवेदनाएं, जिज्ञासाएं और आकांक्षाएं हैं। उन आकांक्षाओं को जीवित रखना भी जीवन के प्रति हमारी जिम्मेदारी है।
एक और प्रश्न है। क्या हम जिन लोगों के लिए इतना कुछ करते हैं, वे हमेशा हमारे अपने बने रहते हैं? क्या रिश्तों में अपनापन हमेशा एकतरफा जिम्मेदारी से कायम रह सकता है? क्या किसी परिवार में एक व्यक्ति का लगातार त्याग और दूसरे लोगों की लगातार अपेक्षाएं स्वस्थ संबंधों का आधार बन सकती हैं? निश्चित रूप से नहीं। अपनेपन का अर्थ केवल देना नहीं, बल्कि एक-दूसरे को समझना, सम्मान देना और एक-दूसरे की जरूरतों के प्रति संवेदनशील रहना भी है। यदि कोई व्यक्ति परिवार के लिए अपनी पूरी जिंदगी खपा देता है, लेकिन परिवार उसकी थकान, इच्छाओं और भावनाओं को समझने की कोशिश नहीं करता, तो वहां अपनापन अधूरा है। परिवार केवल आर्थिक व्यवस्था या साझा छत का नाम नहीं है। वह परस्पर सम्मान, संवेदना, सहयोग और भावनात्मक सहभागिता से बनता है। अपने लोगों के लिए जीने का अर्थ यह भी है कि हम उन्हें अपने जीवन का हिस्सा बनाएं, लेकिन उन्हें अपने जीवन का पूरा स्वामी न बना दें।
हमारे जीवन में एक दिलचस्प विरोधाभास भी है। हम कहते हैं कि हमारे पास अपने लिए समय नहीं है, लेकिन कई बार हम जिस समय को दूसरों के लिए खर्च कर रहे होते हैं, उसमें हमारा अपना अस्तित्व भी शामिल होता है। बच्चे की सफलता में हमें अपनी खुशी दिखाई देती है। माता-पिता की संतुष्टि में हमें अपनी उपलब्धि महसूस होती है। जीवनसाथी के चेहरे की मुस्कान हमें सुकून देती है। परिवार के लिए खरीदे गए घर में हमें अपना आशियाना नजर आता है। किसी मित्र की परेशानी दूर करके हमें जो आत्मसंतोष मिलता है, वह भी हमारी अपनी अनुभूति है। दूसरों को खुश देखकर खुश होना भी तो हमारी अपनी खुशी है। फिर इसे पूरी तरह दूसरों के लिए किया गया काम कैसे कहा जा सकता है? शायद मनुष्य का सुख और दुख इतने निजी नहीं हैं जितना हम समझते हैं। हमारी खुशियां अक्सर दूसरों से होकर गुजरती हैं और हमारी तकलीफें भी कई बार दूसरों के जीवन में उतर जाती हैं।
फिर भी इस विचार का एक खतरनाक विस्तार भी संभव है। यदि हम हर त्याग, हर समझौते और हर शोषण को यह कहकर उचित ठहराने लगें कि हम अपने लोगों के लिए कर रहे हैं, तो यह अपनेपन की अवधारणा का दुरुपयोग होगा। किसी व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता, सम्मान और मानसिक शांति भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं जितनी परिवार की जरूरतें। अपने लिए जीना कोई अपराध नहीं है। बल्कि जो व्यक्ति स्वयं से संतुष्ट, स्वस्थ और मानसिक रूप से प्रसन्न है, वह दूसरों के साथ भी बेहतर संबंध बना सकता है। दूसरों को खुश रखने की कोशिश में स्वयं को लगातार दुखी रखना अंततः न तो स्वयं के लिए अच्छा है और न ही दूसरों के लिए। प्रेम का अर्थ आत्मविलोपन नहीं है और जिम्मेदारी का अर्थ आत्मदमन नहीं है।
यहां 'अपना' और 'पराया' का अंतर भी विचारणीय है। जिन लोगों को हम अपना कहते हैं, क्या केवल वही अपने हैं? क्या किसी अनजान व्यक्ति की मदद करने पर मिलने वाला संतोष हमारा अपना नहीं है? सड़क पर घायल पड़े किसी व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाना, किसी जरूरतमंद बच्चे की पढ़ाई में मदद करना, किसी बुजुर्ग की परेशानी सुनना या किसी अपरिचित व्यक्ति के लिए थोड़ी-सी संवेदना दिखाना क्या हमारे जीवन का हिस्सा नहीं है? कई बार हम उन लोगों के लिए भी कुछ करते हैं जिनसे हमारा कोई पारिवारिक या आर्थिक संबंध नहीं होता। इसके पीछे मनुष्य होने की सहज संवेदना काम करती है। शायद अपनेपन का वास्तविक विस्तार वहीं से शुरू होता है, जहां हम अपने और पराये की सीमाओं से ऊपर उठकर दूसरे मनुष्य के दुख को अपना दुख समझने लगते हैं।
इस संदर्भ में महात्मा गांधी का यह विचार याद आता है कि स्वयं को खोजने का सबसे अच्छा तरीका है कि स्वयं को दूसरों की सेवा में खो दिया जाए। इस विचार का अर्थ अपने अस्तित्व को मिटा देना नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को एक व्यापक उद्देश्य से जोड़ना है। इसी तरह अरस्तू ने मनुष्य को स्वभाव से सामाजिक प्राणी माना था। मनुष्य समाज से अलग रहकर न तो अपनी क्षमताओं का पूरा विकास कर सकता है और न ही अपने जीवन को संपूर्ण अर्थ दे सकता है। लेकिन आधुनिक समय में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आत्मसंतुष्टि की अवधारणा ने एक नया प्रश्न भी खड़ा किया है। क्या हमें केवल दूसरों की अपेक्षाओं के अनुसार जीना चाहिए या अपनी पसंद और प्राथमिकताओं के अनुसार भी जीवन को आकार देना चाहिए? इसका संतुलित उत्तर शायद यही है कि जीवन न तो केवल अपने लिए है और न ही केवल दूसरों के लिए। जीवन अपने और अपनों के बीच एक सतत संवाद है।
दरअसल, 'अपना क्या है' का उत्तर शायद किसी वस्तु, संपत्ति, उपलब्धि या रिश्ते में नहीं छिपा है। अपना वह भी है जिसे हम रचते हैं, वह भी है जिसे हम महसूस करते हैं और वह भी है जिसे हम दूसरों के साथ साझा करते हैं। हमारी कमाई अपनी है, लेकिन उसका उपयोग परिवार के लिए होता है। हमारा शरीर अपना है, लेकिन उसके स्वस्थ रहने से परिवार को भी सुकून मिलता है। हमारा समय अपना है, लेकिन उसका बड़ा हिस्सा दूसरों के साथ बीतता है। हमारी खुशियां अपनी हैं, लेकिन उनमें अपनों की मुस्कान शामिल रहती है। हमारे सपने अपने हैं, लेकिन उन्हें पूरा करने की प्रेरणा अक्सर किसी अपने से मिलती है। यहां तक कि हमारा अकेलापन भी कई बार उन्हीं लोगों की अनुपस्थिति से पैदा होता है जिन्हें हमने अपना माना है।
शायद सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हम अपने जीवन को केवल जिम्मेदारियों की सूची बनाकर न देखें। जीवन कोई ऐसा हिसाब-किताब नहीं है जिसमें यह दर्ज किया जाए कि हमने अपने लिए कितने घंटे खर्च किए और दूसरों के लिए कितने। असली सवाल यह है कि जो समय हमने जिया, उसमें हम कितने जीवंत रहे? जिनके लिए हमने मेहनत की, क्या उनके साथ सचमुच समय बिताया? जिनके भविष्य के लिए हमने धन कमाया, क्या उनके वर्तमान में भी शामिल रहे? जिनकी खुशियों के लिए हमने अपनी इच्छाएं टालीं, क्या हमने उन्हें अपनी खुशियों में सहभागी बनाया? और सबसे बढ़कर, क्या हमने स्वयं को इतना समय दिया कि अपने भीतर के मनुष्य से हमारा परिचय बना रहे?
अंततः 'अपना क्या है' का प्रश्न हमें एक गहरी जीवन-दृष्टि की ओर ले जाता है। शायद अपना वह नहीं है जो केवल हमारे अधिकार में है, बल्कि वह है जिसके साथ हमारा भावनात्मक, नैतिक और मानवीय संबंध है। अपने लिए कमाना, अपने लिए स्वस्थ रहना, अपने लिए सीखना और अपने लिए खुश रहना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है अपनों के लिए उपलब्ध रहना, उनके सुख-दुख में सहभागी होना और जरूरत पड़ने पर उनके लिए कुछ कर गुजरना। लेकिन इन दोनों के बीच संतुलन होना चाहिए। अपने हिस्से की जिंदगी को पूरी तरह दूसरों के नाम लिख देना भी उचित नहीं और दूसरों को जीवन से बाहर करके केवल अपने लिए जीना भी अधूरा है।
शायद जीवन का सबसे सुंदर सत्य यही है कि अपने लिए जीने और अपनों के लिए जीने के बीच कोई अभेद्य दीवार नहीं होती। अपने लोगों की खुशी में अपनी खुशी तलाशना भी अपने लिए जीना है और अपनी खुशी को दूसरों के साथ बांटना भी। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में स्वयं को खो देना जरूरी नहीं है। आखिर अपना भी तो कोई होना चाहिए—और वह अपना हम स्वयं हैं।

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