आदमी के जीवन में एक ऐसा समय भी आता है जब परिस्थितियाँ बाहर से कम और भीतर से ज्यादा भारी लगने लगती हैं। काम वही होते हैं, लोग वही होते हैं, समस्याएँ भी शायद उतनी ही होती हैं, लेकिन अचानक आदमी को लगता है कि वह कुछ कर नहीं सकता। उसे हर रास्ता बंद दिखाई देता है, हर निर्णय जोखिम भरा लगता है और हर असफलता उसके अपने सामर्थ्य पर सवाल खड़ा करने लगती है। वह मन ही मन कहने लगता है—“मैं क्या कर सकता हूँ?”, “मेरे हाथ में है ही क्या?”, “मेरी कौन सुनेगा?” यहीं से आदमी के भीतर ‘बेचारा’ होने की भावना जन्म लेती है। ध्यान देने वाली बात यह है कि बेबसी और बेचारगी एक ही चीज नहीं हैं। बेबसी किसी वास्तविक परिस्थिति का परिणाम हो सकती है, लेकिन बेचारगी धीरे-धीरे उस परिस्थिति के बारे में हमारे मन की स्थायी धारणा बन जाती है।
लाचार महसूस करने की शुरुआत अक्सर तब होती है जब आदमी को लगातार ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है जिन पर उसका नियंत्रण बहुत कम होता है। नौकरी की असुरक्षा, आर्थिक दबाव, बीमारी, पारिवारिक तनाव, रिश्तों में उपेक्षा, उम्र का बढ़ना, सामाजिक तुलना, बार-बार असफल होना या किसी प्रिय व्यक्ति पर निर्भर हो जाना—ये सब आदमी के आत्मविश्वास को धीरे-धीरे कमजोर कर सकते हैं। खासकर तब, जब वह लंबे समय तक कोशिश करता रहे और परिणाम उसकी इच्छा के अनुसार न आएँ। मनुष्य को केवल कठिनाई नहीं थकाती; कठिनाई के बावजूद परिणाम न बदलना उसे ज्यादा थकाता है। लगातार असफल प्रयासों के बाद दिमाग कभी-कभी यह निष्कर्ष निकाल लेता है कि “कोशिश करने से भी क्या होगा?” मनोविज्ञान में इस प्रवृत्ति को ‘सीखी हुई लाचारी’ यानी learned helplessness के रूप में समझा जाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि आदमी वास्तव में कुछ कर ही नहीं सकता; बल्कि यह कि उसे अपने प्रभाव की संभावना दिखाई देना बंद हो जाती है।
विडंबना यह है कि आदमी की सबसे बड़ी कैद कई बार बाहर नहीं, उसके अपने निष्कर्षों में बनती है। परिस्थितियाँ कहती हैं—“यह कठिन है”, लेकिन मन कह देता है—“यह मेरे लिए असंभव है।” परिस्थितियाँ कहती हैं—“इस रास्ते में बाधा है”, लेकिन मन कह देता है—“मेरे लिए कोई रास्ता ही नहीं है।” असफलता कहती है—“यह प्रयास काम नहीं आया”, लेकिन मन कह देता है—“मैं ही असफल हूँ।” इन तीनों वाक्यों के बीच बहुत बड़ा अंतर है। घटना को अपनी पहचान बना लेना आदमी को भीतर से कमजोर कर देता है। नौकरी चली जाना एक घटना है; “मैं किसी काम का नहीं हूँ” एक आत्म-निर्णय है। किसी रिश्ते का टूटना एक घटना है; “मुझे कोई कभी नहीं चाहेगा” एक निष्कर्ष है। आर्थिक कठिनाई एक परिस्थिति है; “मैं हमेशा गरीब ही रहूँगा” भविष्य के बारे में एक अनुमान है। जब अनुमान को सत्य मान लिया जाता है, तब लाचारी और गहरी हो जाती है।
उम्र बढ़ने के साथ यह भावना कभी-कभी और जटिल हो जाती है। युवा आदमी को लगता है कि उसके सामने बहुत समय है, इसलिए वह जोखिम उठा सकता है; मध्य आयु का आदमी पीछे मुड़कर अपने किए-अनकिए फैसलों का हिसाब करने लगता है। उसे परिवार की जिम्मेदारियाँ दिखाई देती हैं, बच्चों का भविष्य दिखाई देता है, नौकरी की अनिश्चितता दिखाई देती है, माता-पिता की चिंता दिखाई देती है और अपने शरीर तथा समय की सीमाएँ भी दिखाई देने लगती हैं। तब आदमी को लगता है कि अब गलत होने की गुंजाइश कम है। यही भावना कई बार उसे निर्णय लेने से रोकती है। वह सुरक्षा चाहता है, लेकिन पूर्ण सुरक्षा जीवन में उपलब्ध नहीं होती। परिणाम यह होता है कि आदमी न तो पुराने ढर्रे से संतुष्ट रहता है और न नया रास्ता चुनने का साहस कर पाता है।
बेचारगी का एक और कारण लगातार तुलना है। आज आदमी केवल अपने पड़ोसी या सहकर्मी से तुलना नहीं करता; वह सोशल मीडिया के माध्यम से सैकड़ों सफल, संपन्न और खुश दिखाई देने वाले लोगों से हर दिन तुलना करता है। किसी का बड़ा घर दिखाई देता है, किसी की विदेश यात्रा, किसी की पदोन्नति, किसी का व्यवसाय, किसी के बच्चों की उपलब्धियाँ और किसी का स्वस्थ शरीर। आदमी अपने जीवन की पूरी कहानी की तुलना दूसरे की दिखाई देने वाली कुछ तस्वीरों से करने लगता है। फिर उसे लगता है कि सब आगे निकल गए और वह पीछे रह गया। जबकि वास्तविकता यह है कि हर आदमी अपनी समस्याओं का एक हिस्सा छिपाकर चलता है। दूसरों की उपलब्धियों का दृश्य पक्ष और अपने जीवन की कठिनाइयों का अदृश्य पक्ष मिलाकर तुलना करेंगे तो परिणाम हमेशा अपने विरुद्ध ही आएगा।
इस स्थिति से निकलने का पहला रास्ता यह स्वीकार करना है कि “मैं अभी लाचार महसूस कर रहा हूँ” और “मैं वास्तव में पूरी तरह लाचार हूँ”—इन दोनों में अंतर है। भावनाएँ वास्तविक होती हैं, लेकिन हर भावना वास्तविकता का पूरा वर्णन नहीं करती। डर वास्तविक है, पर खतरा उतना बड़ा हो यह जरूरी नहीं। निराशा वास्तविक है, पर भविष्य निराशाजनक हो यह जरूरी नहीं। अकेलापन वास्तविक है, पर आदमी हमेशा अकेला रहेगा यह जरूरी नहीं। इसलिए जब मन कहे कि “मेरे पास कोई विकल्प नहीं है”, तब स्वयं से एक छोटा-सा सवाल पूछना चाहिए—“क्या सचमुच कोई विकल्प नहीं है, या मुझे अभी कोई विकल्प दिखाई नहीं दे रहा?” यह छोटा-सा अंतर सोचने की दिशा बदल सकता है।
इसके बाद आदमी को अपने जीवन को उन चीजों में बाँटना चाहिए जो उसके नियंत्रण में हैं और जो उसके नियंत्रण से बाहर हैं। मौसम, दूसरों की राय, किसी दूसरे व्यक्ति का व्यवहार, बीती हुई गलती या बाजार की स्थिति को वह पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सकता। लेकिन अपनी दिनचर्या, अपनी तैयारी, अपने खर्च, अपने स्वास्थ्य के प्रति सावधानी, अपनी भाषा, अपने व्यवहार, अपनी प्रतिक्रिया और अपने अगले कदम पर कुछ हद तक उसका अधिकार होता है। जब जीवन बहुत बड़ा और उलझा हुआ लगे, तब पूरी जिंदगी को ठीक करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। अगले चौबीस घंटे को व्यवस्थित करना चाहिए। एक जरूरी फोन करना, एक लंबित काम पूरा करना, थोड़ी देर चलना, किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करना, खर्च का हिसाब बनाना या किसी समस्या के तीन संभावित समाधान लिखना—ये छोटे कदम आदमी को फिर से यह अनुभव कराते हैं कि वह निष्क्रिय दर्शक नहीं, अपने जीवन का सहभागी है।
लाचारी का इलाज हमेशा बड़ा निर्णय नहीं होता; कई बार छोटे-छोटे निर्णयों की वापसी होती है। आदमी जब लगातार दूसरों से पूछकर, दूसरों की स्वीकृति लेकर या परिस्थितियों के अनुसार प्रतिक्रिया करते-करते थक जाता है, तब उसे अपने जीवन में कुछ छोटे निर्णय स्वयं लेने चाहिए। कौन-सा काम पहले करना है, किस बात को टालना नहीं है, किस खर्च को रोकना है, किस व्यक्ति से दूरी रखनी है, किससे सहायता माँगनी है और किस बात को स्वीकार कर आगे बढ़ जाना है—इन छोटे निर्णयों से आत्म-नियंत्रण की भावना लौटती है। आत्मविश्वास अक्सर पहले से मौजूद कोई जादुई गुण नहीं होता; वह अपने ही किए हुए छोटे-छोटे सफल कार्यों से बनता है।
यह भी समझना जरूरी है कि सहायता माँगना कमजोरी नहीं है। आदमी के भीतर ‘मैं सब कुछ खुद करूँगा’ वाली धारणा भी कई बार उसे बेबस बना देती है। जीवन में कुछ समस्याएँ अकेले हल नहीं होतीं। आर्थिक समस्या में वित्तीय सलाह की जरूरत हो सकती है, स्वास्थ्य समस्या में चिकित्सक की, मानसिक दबाव में मनोवैज्ञानिक या काउंसलर की और पारिवारिक संकट में किसी विश्वसनीय व्यक्ति की। मदद लेना और अपनी जिम्मेदारी किसी दूसरे के हवाले कर देना अलग-अलग बातें हैं। सहायता वह हाथ है जो आदमी को खड़ा होने में मदद करता है; उसके स्थान पर जीवन जीने का काम वह हाथ नहीं कर सकता।
कभी-कभी आदमी को अपनी अपेक्षाओं का भी पुनर्मूल्यांकन करना पड़ता है। जीवन में बहुत-सी पीड़ा इसलिए पैदा होती है क्योंकि हम चाहते हैं कि हर चीज हमारी योजना के अनुसार हो। लेकिन जीवन योजना से कम और अनिश्चितता से ज्यादा चलता है। हर मेहनत का तत्काल पुरस्कार नहीं मिलता, हर अच्छा आदमी सफल नहीं होता और हर गलत आदमी तुरंत दंडित नहीं होता। यह जीवन की असुविधाजनक सच्चाई है। पर इसका अर्थ यह नहीं कि प्रयास व्यर्थ है। प्रयास का मूल्य केवल परिणाम में नहीं, आदमी की अपनी क्षमता और चरित्र को बचाए रखने में भी है। कई बार जीत परिस्थिति बदलने में नहीं, परिस्थिति के भीतर टूटे बिना खड़े रहने में होती है।
अपने आप को ‘बेचारा’ मानने से बचने के लिए अपनी भाषा बदलना भी जरूरी है। “मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है?” की जगह “अब मैं क्या कर सकता हूँ?” पूछना, “सब खत्म हो गया” की जगह “इस समय सबसे बड़ी समस्या क्या है?” पूछना और “मैं कुछ नहीं कर सकता” की जगह “मैं कौन-सी एक चीज बदल सकता हूँ?” पूछना मानसिक दिशा बदल देता है। यह कोई सकारात्मक सोच का खोखला नारा नहीं है। यह समस्या को नकारना नहीं, समस्या के भीतर उपलब्ध नियंत्रण के छोटे से हिस्से को खोज लेना है।
फिर भी कुछ स्थितियाँ ऐसी होती हैं जहाँ केवल इच्छाशक्ति पर्याप्त नहीं होती। यदि लंबे समय तक निराशा, असहायता, अत्यधिक चिंता, नींद की गंभीर गड़बड़ी, किसी काम में रुचि समाप्त होना, सामाजिक दूरी, लगातार अपराधबोध या जीवन को समाप्त करने जैसे विचार आने लगें, तो इसे केवल “कमजोर मन” कहकर टालना उचित नहीं है। ऐसी स्थिति में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सहायता लेना समझदारी है। जिस तरह शरीर की गंभीर बीमारी में डॉक्टर के पास जाना कमजोरी नहीं है, उसी तरह मन की गंभीर परेशानी में विशेषज्ञ की सहायता लेना भी कमजोरी नहीं है।
अंततः आदमी को यह समझना होगा कि जीवन में कुछ दौर ऐसे आएँगे जब वह सचमुच दूसरों पर निर्भर होगा। बच्चा निर्भर होता है, बीमार आदमी निर्भर होता है, वृद्ध आदमी कभी-कभी निर्भर होता है और कठिन समय में स्वस्थ तथा सक्षम व्यक्ति भी सहायता का मोहताज हो सकता है। निर्भर होना अपमान नहीं है। असली खतरा तब शुरू होता है जब आदमी अपनी अस्थायी निर्भरता को अपनी स्थायी पहचान बना लेता है। “मुझे अभी सहारे की जरूरत है” और “मैं बिना सहारे के कुछ नहीं हूँ”—इन दोनों वाक्यों के बीच आत्मसम्मान की पूरी दुनिया खड़ी है।
शायद जिंदगी का सबसे कठिन पाठ यही है कि आदमी हर परिस्थिति को अपने अनुकूल नहीं बना सकता, लेकिन हर परिस्थिति में अपनी प्रतिक्रिया को कुछ हद तक चुन सकता है। वह हर दरवाजा नहीं खोल सकता, लेकिन यह तय कर सकता है कि बंद दरवाजे के सामने कितनी देर बैठना है। वह हर व्यक्ति को नहीं बदल सकता, लेकिन यह तय कर सकता है कि किसके व्यवहार को अपने आत्मसम्मान का पैमाना नहीं बनने देना है। वह बीता हुआ समय वापस नहीं ला सकता, लेकिन आज का एक घंटा अपने हाथ में ले सकता है। और कई बार जिंदगी को फिर से पकड़ने के लिए इतना ही काफी होता है।
इसलिए जब आदमी को लगे कि वह बेचारा है, तो उसे तुरंत अपने बारे में कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाना चाहिए। संभव है कि वह थका हुआ हो, डरा हुआ हो, लगातार असफलताओं से घायल हो या ऐसी परिस्थिति में फँसा हो जहाँ उसके विकल्प वास्तव में सीमित हों। लेकिन सीमित विकल्प और शून्य विकल्प एक बात नहीं हैं। उसे अपनी समस्या को छोटे हिस्सों में बाँटना चाहिए, जो उसके नियंत्रण में है उसे पहचानना चाहिए, जहाँ जरूरत हो वहाँ सहायता लेनी चाहिए और फिर एक छोटा-सा अगला कदम उठाना चाहिए। जिंदगी हमेशा बड़े फैसलों से नहीं बदलती; कभी-कभी वह केवल इतना करने से बदलने लगती है कि आदमी एक दिन सुबह उठकर स्वयं से कहता है—“मैं बेचारा नहीं हूँ। मैं मुश्किल में हूँ। और मुश्किल में होना तथा हार जाना एक ही बात नहीं है।” यही वाक्य भीतर बुझती हुई रोशनी को फिर से जलाने की शुरुआत हो सकता है।

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