क्या ही शिकायत करें किसी की, जब सब अपनी-अपनी जगह सही हैं
जीवन में शिकायतों की कोई कमी नहीं होती। किसी से शिकायत है कि उसने हमें समझा नहीं, किसी से कि उसने हमारा साथ नहीं दिया, किसी से कि उसने समय पर फोन नहीं किया, किसी से कि उसने हमारी अपेक्षाओं के मुताबिक व्यवहार नहीं किया। कभी लगता है कि पत्नी हमें नहीं समझती, कभी लगता है कि बच्चे हमारी कद्र नहीं करते, कभी मित्र बदल गए हैं और कभी लगता है कि दफ्तर में कोई हमारी मेहनत देख ही नहीं रहा। धीरे-धीरे आदमी शिकायतों की एक ऐसी गठरी लेकर चलने लगता है, जिसमें दूसरे लोगों की गलतियाँ भरी होती हैं और अपनी अपेक्षाएँ ऊपर से बँधी होती हैं। मगर उम्र और अनुभव जब थोड़ा धैर्य सिखाते हैं, तब एक अजीब-सी बात समझ में आती है—शायद शिकायत करने के लिए कोई पूरी तरह गलत है ही नहीं। संभव है, सब अपनी-अपनी जगह सही हों।
दरअसल, हर आदमी अपनी कहानी का नायक होता है। उसे अपने निर्णय अपने अनुभवों, अपनी परिस्थितियों, अपने डर, अपनी जरूरतों और अपनी सीमाओं के भीतर से सही दिखाई देते हैं। जिस बात को हम स्वार्थ समझते हैं, वह दूसरे के लिए आत्मरक्षा हो सकती है। जिसे हम बेरुखी कहते हैं, वह शायद उसकी अपनी थकान हो। जिसे हम उपेक्षा समझते हैं, वह संभव है उसकी अपनी परेशानियों का परिणाम हो। और जिसे हम जिद कहते हैं, उसके पीछे शायद वर्षों से जमा कोई चोट बैठी हो। समस्या यह है कि हम दूसरों के व्यवहार को उसके परिणाम से देखते हैं, लेकिन अपने व्यवहार को अपनी परिस्थितियों से समझाते हैं। अपनी गलती के लिए हमारे पास हमेशा एक कहानी होती है और दूसरे की गलती के लिए केवल एक फैसला।
शिकायतों का सबसे बड़ा आधार शायद हमारी अपेक्षाएँ हैं। हम चाहते हैं कि दूसरा हमें उसी तरह समझे जैसे हम स्वयं को समझते हैं। पति चाहता है कि पत्नी उसकी चुप्पी पढ़ ले, पत्नी चाहती है कि पति बिना बताए उसकी थकान समझ जाए। माता-पिता चाहते हैं कि बच्चे उनकी इच्छाओं को अपना कर्तव्य समझें और बच्चे चाहते हैं कि माता-पिता उनकी इच्छाओं को उनकी स्वतंत्रता समझें। मित्रता में हम चाहते हैं कि दोस्त बिना बुलाए आ जाए, प्रेम में चाहते हैं कि सामने वाला बिना कहे सब समझ जाए और रिश्तों में चाहते हैं कि दूसरा वही करे जो हम उसकी जगह होते तो करते। लेकिन मनुष्य कोई खुली किताब नहीं है। हर व्यक्ति अपने भीतर एक ऐसा संसार लेकर चलता है जिसकी पूरी भाषा दूसरे को कभी नहीं आती।
कभी-कभी दो लोग एक ही घटना को देखकर बिल्कुल अलग निष्कर्ष निकालते हैं और दोनों को अपना निष्कर्ष सही लगता है। एक कहता है—“मैंने तुम्हारे लिए इतना किया।” दूसरा कहता है—“लेकिन मुझे तुम्हारे किए की जरूरत ही नहीं थी।” एक कहता है—“मैंने तुम्हें स्वतंत्रता दी।” दूसरा कहता है—“तुमने मुझे अकेला छोड़ दिया।” एक कहता है—“मैं तुम्हारी चिंता करता हूँ।” दूसरा कहता है—“तुम मुझे नियंत्रित करते हो।” यहाँ कौन सही है? शायद दोनों। और शायद दोनों थोड़े-थोड़े गलत भी। जीवन का सबसे कठिन गणित यही है कि रिश्तों में हर सवाल का उत्तर केवल सही और गलत में नहीं निकलता।
उम्र बढ़ने के साथ आदमी यह भी समझने लगता है कि हर व्यक्ति अपनी लड़ाई लड़ रहा है। कोई पैसे की चिंता में परेशान है, कोई नौकरी बचाने में, कोई बच्चों के भविष्य में, कोई अपने माता-पिता की बीमारी में, कोई अकेलेपन में और कोई ऐसी चिंता में जिसका उसे किसी से जिक्र तक नहीं करना। बाहर से देखने पर कोई व्यक्ति हमें कठोर, लापरवाह या स्वार्थी दिखाई दे सकता है, लेकिन उसके भीतर क्या चल रहा है, इसका अनुमान लगाना आसान नहीं। हम किसी के व्यवहार का केवल एक दृश्य देखते हैं और उसी से पूरे चरित्र का फैसला सुना देते हैं। शायद यही हमारी सबसे बड़ी जल्दबाजी है।
इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि हर गलत काम को सही मान लिया जाए, अन्याय को सह लिया जाए या अपनी सीमाओं को समाप्त कर दिया जाए। जीवन में स्पष्ट रूप से गलत व्यवहार होते हैं, शोषण होता है, धोखा होता है और कभी-कभी दूरी बनाना ही बुद्धिमानी होती है। लेकिन हर असहमति को अपराध और हर अलग राय को विश्वासघात मान लेना भी उचित नहीं। “सब अपनी जगह सही हैं” का अर्थ यह नहीं कि सबके कर्म समान रूप से सही हैं; इसका अर्थ यह है कि हर व्यक्ति के व्यवहार के पीछे कोई न कोई संदर्भ, अनुभव और मनोवैज्ञानिक कारण हो सकता है। समझना और सहमत होना दो अलग बातें हैं।
कितना विचित्र है कि हम दूसरों से न्याय की उम्मीद करते हैं, लेकिन उन्हें समझने के लिए समय नहीं देते। हम चाहते हैं कि लोग हमारी मजबूरियाँ समझें, मगर उनकी मजबूरियाँ सुनने से पहले ही फैसला कर देते हैं। हमें अपनी परिस्थितियाँ दिखाई देती हैं, दूसरे की केवल गलती दिखाई देती है। शायद रिश्तों में थोड़ी शांति उसी दिन आएगी जिस दिन हम यह पूछना शुरू करेंगे—“उसने ऐसा क्यों किया?”—और केवल यह पूछना बंद करेंगे—“उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?”
जीवन के उत्तरार्ध में शिकायतें धीरे-धीरे छोटी होने लगती हैं। आदमी देखता है कि जिन बातों पर कभी घंटों बहस होती थी, वे अब याद भी नहीं रहतीं। जिन लोगों से कभी नाराजगी थी, उनके प्रति भी मन में एक नरमी आने लगती है। समझ में आता है कि सब अपनी-अपनी सीमाओं में जी रहे थे। किसी ने हमें उतना प्रेम दिया जितना वह दे सकता था, किसी ने उतना साथ दिया जितना उसके लिए संभव था और किसी ने उतना ही समझा जितना उसकी समझ वहाँ तक पहुँच सकी। हम भी तो हर रिश्ते में आदर्श नहीं थे। शायद हम भी किसी की कहानी में वही व्यक्ति हैं जिसकी शिकायत आज कोई दूसरा कर रहा है।
तब लगता है, शिकायतें दरअसल रिश्तों की नहीं, हमारी अपेक्षाओं की होती हैं। हम चाहते हैं कि दुनिया हमारे हिसाब से चले, लोग हमारे मन के मुताबिक व्यवहार करें और परिस्थितियाँ हमारी इच्छा के अनुसार बदलें। लेकिन दुनिया का अपना स्वभाव है और लोगों की अपनी मजबूरियाँ। जीवन कोई ऐसा विद्यालय नहीं जहाँ सभी विद्यार्थी एक ही उत्तर लिखें और शिक्षक केवल एक उत्तर को सही घोषित करे। यहाँ हर व्यक्ति अपने अनुभव की कॉपी लेकर बैठा है और अपनी समझ के अनुसार उत्तर लिख रहा है।
इसलिए कभी-कभी चुप रह जाना शिकायत करने से अधिक बुद्धिमानी होती है। माफ कर देना सामने वाले को निर्दोष घोषित करना नहीं, अपने मन को बोझ से मुक्त करना है। दूरी बना लेना नफरत नहीं, आत्मसम्मान भी हो सकता है। और किसी को समझने की कोशिश करना उसके हर कर्म का समर्थन करना नहीं, बल्कि मनुष्य होने की जटिलता को स्वीकार करना है।
आखिर में जीवन शायद हमें इसी सरल-सी बात तक लाकर छोड़ देता है—क्या ही शिकायत करें किसी की, जब सब अपनी-अपनी जगह सही हैं। कोई अपने अनुभव से सही है, कोई अपनी जरूरत से, कोई अपनी मजबूरी से और कोई अपनी समझ से। हम भी अपनी जगह सही हैं और सामने वाला भी। फर्क सिर्फ इतना है कि हमारी जगह हमें दिखाई देती है और दूसरे की जगह समझने के लिए थोड़ा धैर्य चाहिए। शायद परिपक्वता यही है कि आदमी हर बहस जीतने की बजाय कुछ रिश्ते बचा ले, हर शिकायत दर्ज कराने की बजाय कुछ बातें जाने दे और हर व्यक्ति को कटघरे में खड़ा करने से पहले एक क्षण के लिए यह सोच ले—अगर मैं उसकी जगह होता, तो क्या मैं सचमुच कुछ और करता?
शायद उस एक सवाल के बाद शिकायतों की आधी दुनिया अपने आप शांत हो जाए।

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