### ईश्वर को क्या चाहिए—श्रद्धा या पवित्रता?
मनुष्य जब ईश्वर के सामने हाथ जोड़कर खड़ा होता है, तो उसके मन में अनेक इच्छाएँ होती हैं। कोई संतान की कामना लेकर आता है, कोई नौकरी और कारोबार में सफलता की प्रार्थना करता है, कोई बीमारी से मुक्ति चाहता है, तो कोई अपने परिवार की सुख-समृद्धि के लिए मंदिर की चौखट पर माथा टेकता है। कोई मन्नत माँगता है, कोई प्रसाद चढ़ाता है, कोई दान-पुण्य करता है और कोई घंटों पूजा-पाठ में बिताता है। लेकिन कभी-कभी एक बुनियादी सवाल मन में उठता है कि आखिर ईश्वर को चाहिए क्या? हमारी श्रद्धा, हमारी भक्ति, हमारे चढ़ावे या हमारे भीतर की पवित्रता? क्या ईश्वर को इस बात से प्रसन्नता होती है कि हम उनके सामने कितनी बार सिर झुकाते हैं, या इस बात से कि हम उनके सामने से उठकर संसार में दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं? सवाल जितना धार्मिक है, उतना ही नैतिक और मानवीय भी।
श्रद्धा और पवित्रता को अक्सर एक-दूसरे का पर्याय मान लिया जाता है, जबकि दोनों में एक महत्त्वपूर्ण अंतर है। श्रद्धा मन का विश्वास है, जबकि पवित्रता मनुष्य के विचारों, आचरण और कर्मों की निर्मलता है। श्रद्धा किसी अदृश्य शक्ति के प्रति समर्पण हो सकती है, किसी धार्मिक परंपरा में आस्था हो सकती है अथवा जीवन में किसी उच्चतर नैतिक सत्ता की उपस्थिति का अनुभव। इसके विपरीत, पवित्रता का अर्थ है कि हमारे भीतर छल-कपट, घृणा, लोभ, अन्याय और क्रूरता के लिए कितनी जगह बची है। कोई व्यक्ति ईश्वर में गहरी आस्था रख सकता है, लेकिन अपने कर्मचारी का शोषण भी कर सकता है। कोई नियमित रूप से मंदिर जा सकता है, लेकिन घर में अपने बुजुर्ग माता-पिता का अपमान कर सकता है। कोई व्रत रख सकता है, लेकिन किसी कमजोर व्यक्ति का हक मारने में उसे संकोच न हो। ऐसी स्थिति में उसकी श्रद्धा पर प्रश्न उठाना आवश्यक नहीं, लेकिन यह पूछना अवश्य उचित है कि उसकी श्रद्धा ने उसके चरित्र को कितना बदला है।
भारतीय धार्मिक परंपरा में इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए अनेक उदाहरण मिलते हैं। भगवद्गीता में भगवान कृष्ण कर्म, भाव और समर्पण को महत्त्व देते हैं। नौवें अध्याय के छब्बीसवें श्लोक में वे कहते हैं कि जो भक्त प्रेमपूर्वक पत्र, पुष्प, फल या जल अर्पित करता है, उसके उस भावपूर्ण अर्पण को वे स्वीकार करते हैं। इस श्लोक का महत्त्व इस बात में है कि ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए किसी महँगे चढ़ावे या भव्य आयोजन की अनिवार्यता नहीं बताई गई है। एक साधारण पत्ता, फूल, फल या जल भी पर्याप्त हो सकता है, बशर्ते उसके पीछे प्रेम और समर्पण का भाव हो। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि धार्मिक कर्मकांड का बाहरी वैभव, अंतर्मन के भाव से बड़ा नहीं है। हालाँकि इससे यह सिद्ध नहीं होता कि केवल श्रद्धा ही पर्याप्त है और आचरण का कोई महत्त्व नहीं; गीता का व्यापक संदेश मनुष्य को अपने कर्मों और स्वभाव को भी बेहतर बनाने की प्रेरणा देता है।
इसी संदर्भ में शबरी की कथा उल्लेखनीय है। रामकथा की प्रचलित परंपरा में शबरी को एक ऐसी भक्त के रूप में याद किया जाता है, जिसने भगवान राम के स्वागत में प्रेमपूर्वक बेर प्रस्तुत किए। लोकप्रचलित कथा में वह बेर चखकर मीठे बेर राम को देती है। अलग-अलग रामायणों और रामकथा की परंपराओं में इस प्रसंग का विवरण अलग मिलता है, लेकिन इसका लोकप्रिय नैतिक संदेश स्पष्ट है—भक्ति का मूल्य सामाजिक प्रतिष्ठा, धन-दौलत या बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि प्रेम और समर्पण से आँका जाना चाहिए। शबरी के पास न राजमहल था, न सोने-चाँदी के बर्तन और न कोई भव्य पूजा-व्यवस्था। उसके पास जो था, वह उसका स्नेह था। इस कथा को केवल श्रद्धा की विजय के रूप में देखना अधूरा होगा; इसमें सामाजिक ऊँच-नीच से परे जाकर मनुष्य के भाव को महत्त्व देने का संदेश भी निहित है। यदि ईश्वर की दृष्टि में प्रेम महत्त्वपूर्ण है, तो मनुष्य की दृष्टि में जाति, पद और संपत्ति के आधार पर किसी को छोटा क्यों माना जाए?
अब प्रश्न उठता है कि यदि श्रद्धा इतनी महत्त्वपूर्ण है, तो पवित्रता की आवश्यकता क्यों? इसका उत्तर प्रह्लाद की कथा में भी खोजा जा सकता है। पुराणों की परंपरा में प्रह्लाद की भक्ति का सामना उसके पिता हिरण्यकशिपु के अहंकार और अत्याचार से होता है। यहाँ भक्ति केवल पूजा की क्रिया नहीं, बल्कि अन्याय के सामने अपने विश्वास पर टिके रहने का साहस बन जाती है। इस कथा को ऐतिहासिक घटना के प्रमाण की तरह नहीं, धार्मिक आख्यान के नैतिक संदेश की तरह समझना चाहिए। इसका आशय यह है कि सच्ची आस्था मनुष्य को अहंकारी या अत्याचारी बनाने के बजाय सत्य, साहस और सदाचार की ओर ले जानी चाहिए। यदि किसी व्यक्ति की धार्मिकता उसे दूसरों पर अत्याचार करने का अधिकार देती प्रतीत होती है, तो उसकी आस्था के सामाजिक परिणामों पर गंभीरता से विचार करना होगा।
भारतीय संत परंपरा में भी बाहरी शुद्धता की अपेक्षा आंतरिक निर्मलता पर जोर मिलता है। कबीर की वाणी में धार्मिक आडंबर, पाखंड और केवल बाहरी क्रियाओं के सहारे धर्म का प्रदर्शन करने की आलोचना बार-बार दिखाई देती है। इसका आशय यह नहीं कि पूजा, स्नान, व्रत या तीर्थयात्रा निरर्थक हैं। अनेक लोगों के लिए ये कर्म आत्मानुशासन, सांत्वना और सामुदायिक जुड़ाव के साधन हैं। समस्या तब पैदा होती है, जब साधन ही साध्य बन जाता है। मनुष्य स्नान करके शरीर को स्वच्छ कर लेता है, लेकिन अपने मन में ईर्ष्या और द्वेष पालता रहता है। वह मंदिर में प्रवेश से पहले जूते उतार देता है, लेकिन बाहर निकलकर किसी गरीब के प्रति अपमानजनक व्यवहार करता है। वह मूर्ति के सामने फूल चढ़ाता है, लेकिन जीवित मनुष्य की पीड़ा देखकर मुँह फेर लेता है। तब प्रश्न उठता है कि स्वच्छता और पवित्रता में अंतर कहाँ खो गया?
यहाँ एक व्यावहारिक उदाहरण पर विचार कीजिए। एक व्यापारी प्रतिदिन मंदिर जाता है, नियमित पूजा करता है और त्योहारों पर बड़ी मात्रा में दान भी देता है। दूसरी ओर, वह अपने कर्मचारियों का वेतन समय पर नहीं देता, ग्राहकों को धोखा देता है और करों से बचने के लिए गलत रास्ते अपनाता है। दूसरा व्यक्ति बहुत धार्मिक नहीं है, शायद वह नियमित पूजा भी नहीं करता, लेकिन अपने काम में ईमानदार है, जरूरतमंदों की सहायता करता है और किसी का अधिकार नहीं मारता। क्या हम निश्चित रूप से कह सकते हैं कि ईश्वर की दृष्टि में पहले व्यक्ति की स्थिति दूसरे से बेहतर होगी? इसका कोई ऐसा सार्वभौमिक, प्रमाणित उत्तर उपलब्ध नहीं है जिसे सभी धार्मिक परंपराएँ समान रूप से स्वीकार करें। लेकिन नैतिक दृष्टि से इतना अवश्य कहा जा सकता है कि दान से अन्याय का हिसाब अपने-आप समाप्त नहीं हो जाता और पूजा किसी के शोषण को उचित नहीं बना देती। यदि दान सच्चा है, तो उसे मनुष्य की जिम्मेदारी से भागने का माध्यम नहीं, बल्कि जिम्मेदारी निभाने की प्रेरणा बनना चाहिए।
इसी तरह, अस्पताल में रोगियों की सेवा करने वाला कोई नर्स, चिकित्सक या सफाईकर्मी शायद हर दिन मंदिर न जाता हो, लेकिन अपने काम के माध्यम से वह पीड़ा कम करता है, जीवन बचाने में योगदान देता है और मानवीय गरिमा की रक्षा करता है। कोई व्यक्ति सड़क पर घायल पड़े अजनबी को अस्पताल पहुँचाता है, कोई भूखे को भोजन देता है, कोई किसी अनजान विद्यार्थी की पढ़ाई का खर्च उठाता है, तो कोई अपने सामने हो रहे अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाता है। क्या इन कर्मों का नैतिक महत्त्व केवल इसलिए कम हो जाएगा कि इनके पीछे किसी धार्मिक अनुष्ठान का उद्देश्य नहीं था? धर्म के अनेक मानवीय अर्थों में सेवा, करुणा और परोपकार का केंद्रीय स्थान है। इसलिए पवित्रता को केवल धार्मिक व्यक्ति की विशेषता मानना भी उचित नहीं। नैतिक आचरण का मूल्य उस व्यक्ति के धार्मिक परिचय से स्वतंत्र रूप से भी समझा जा सकता है।
फिर भी श्रद्धा को पूरी तरह खारिज कर देना सही नहीं होगा। मनुष्य केवल तर्क से नहीं चलता; वह भावनाओं, आशाओं, भय, स्मृतियों और संबंधों से भी संचालित होता है। किसी संकट के समय प्रार्थना उसे मानसिक सहारा दे सकती है। पूजा उसे अपने भीतर झाँकने का अवसर दे सकती है। धार्मिक अनुशासन उसे संयम सिखा सकता है और सामुदायिक उपासना उसे अकेलेपन से बाहर ला सकती है। बहुत से लोग अपनी आस्था के कारण ही जरूरतमंदों की सहायता करते हैं, नशे या हिंसा से दूर रहते हैं और कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखते हैं। अतः श्रद्धा अपने-आप में समस्या नहीं है। प्रश्न यह है कि श्रद्धा किस दिशा में ले जा रही है। यदि वह विनम्रता, करुणा, सत्य और सेवा को बढ़ाती है, तो वह पवित्रता की सहयोगी बनती है। यदि वह अहंकार, कट्टरता, दूसरों के प्रति घृणा और अपने कर्मों को सही ठहराने का साधन बन जाती है, तो उसके स्वरूप पर पुनर्विचार आवश्यक है।
पवित्रता का अर्थ यह भी नहीं कि मनुष्य के मन में कभी कोई बुरा विचार आए ही नहीं, उससे कभी गलती हो ही नहीं या वह जीवन की हर परिस्थिति में आदर्श बना रहे। मनुष्य होने का अर्थ ही है कि हमसे भूलें होंगी, कभी क्रोध आएगा, कभी स्वार्थ हावी होगा और कभी हम अपने ही सिद्धांतों से विचलित हो जाएँगे। असली प्रश्न यह नहीं कि हम कितनी बार गिरते हैं, बल्कि यह है कि गिरने के बाद अपनी गलती स्वीकार करते हैं या नहीं। क्या हम क्षमा माँग सकते हैं? क्या हम किसी का नुकसान किया हो तो उसकी भरपाई करने का प्रयास करते हैं? क्या हम अपनी सुविधा के विरुद्ध जाकर भी सही काम कर सकते हैं? पवित्रता कोई ऐसा प्रमाणपत्र नहीं, जिसे एक बार प्राप्त कर लेने के बाद जीवन भर जेब में रखा जा सके। वह आत्मपरीक्षण और सुधार की सतत प्रक्रिया है।
एक और महत्त्वपूर्ण प्रश्न है—क्या ईश्वर को हमारी पवित्रता चाहिए, या पवित्रता मनुष्य को स्वयं चाहिए? इसका उत्तर आस्था और दर्शन के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। ईश्वर के अस्तित्व, स्वरूप और इच्छाओं के बारे में विभिन्न धर्मों में अलग मान्यताएँ हैं; इन मान्यताओं को प्रयोगशाला में जाँचकर एक अंतिम निष्कर्ष तक पहुँचना संभव नहीं हुआ है। इसलिए यह दावा करना कि ईश्वर निश्चित रूप से किसी विशेष प्रकार की पूजा चाहता है या किसी खास अनुष्ठान से प्रसन्न होता है, आस्था का कथन होगा, प्रमाणित सार्वभौमिक तथ्य नहीं। लेकिन मनुष्य के जीवन में ईमानदारी, करुणा, न्याय और संवेदनशीलता के महत्त्व को समझने के लिए हमें ईश्वर की इच्छा के बारे में अंतिम निर्णय की आवश्यकता भी नहीं है। ये गुण परिवार, समाज और सार्वजनिक जीवन को बेहतर बनाते हैं। वे विश्वास करने वाले और विश्वास न करने वाले, दोनों के जीवन को अर्थपूर्ण बना सकते हैं।
शायद इसी कारण धर्म के प्रश्न को केवल इस रूप में नहीं देखना चाहिए कि ईश्वर को क्या चढ़ाया जाए, बल्कि इस रूप में भी देखना चाहिए कि हम संसार को क्या लौटाते हैं। मंदिर में चढ़ाया गया फूल कुछ समय बाद मुरझा जाता है, प्रसाद समाप्त हो जाता है और पूजा की थाली अपनी जगह रख दी जाती है। लेकिन किसी जरूरतमंद को दिया गया सम्मान, किसी दुखी को मिला सहारा, किसी कर्मचारी को समय पर मिला न्यायपूर्ण वेतन और किसी कमजोर व्यक्ति की रक्षा के लिए उठाया गया कदम अपने प्रभाव में कहीं अधिक स्थायी हो सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि फूल चढ़ाना व्यर्थ है; अर्थ यह है कि फूल चढ़ाने वाला हाथ किसी मनुष्य को अपमानित करने के लिए न उठे। प्रार्थना करने वाला मन किसी दूसरे की पीड़ा के प्रति असंवेदनशील न हो। ईश्वर के नाम पर सिर झुकाने वाला व्यक्ति अपने अहंकार के सामने भी थोड़ा झुकना सीखे।
अंततः, ईश्वर को श्रद्धा चाहिए या पवित्रता—इसका उत्तर प्रत्येक धार्मिक परंपरा अपने ढंग से दे सकती है। लेकिन मनुष्य के लिए दोनों के बीच एक सुंदर संबंध संभव है। श्रद्धा वह बीज है, जिससे पवित्रता का वृक्ष उग सकता है; पवित्रता वह फल है, जिससे श्रद्धा की सार्थकता पहचानी जा सकती है। बीज के बिना वृक्ष का जन्म कठिन है, लेकिन केवल बीज को हथेली पर रखकर उसकी छाया नहीं पाई जा सकती। उसी तरह केवल आस्था का दावा करके उसके नैतिक परिणामों से बचा नहीं जा सकता। और यदि किसी व्यक्ति में धार्मिक श्रद्धा नहीं है, तब भी उसके भीतर सत्य, करुणा और न्याय के गुण विकसित हो सकते हैं। इसलिए किसी की भक्ति का मूल्यांकन केवल उसके माथे के तिलक, हाथ की माला, पूजा की अवधि या चढ़ावे की कीमत से नहीं होना चाहिए। अधिक उपयोगी प्रश्न यह है कि उसकी उपस्थिति से दूसरों के जीवन में क्या बदलता है।
यदि ईश्वर सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान हैं, जैसा कि अनेक धार्मिक मान्यताएँ कहती हैं, तो उन्हें मनुष्य की ओर से अपनी महानता का प्रमाण देने की आवश्यकता क्यों होगी? और यदि वे करुणामय हैं, तो क्या उनकी आराधना का सबसे सुंदर रूप करुणा से रहित हो सकता है? शायद इन प्रश्नों का सबसे ईमानदार उत्तर किसी मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर या गुरुद्वारे के भीतर ही नहीं, बल्कि उस क्षण में भी मिलता है जब हम किसी असहाय मनुष्य के सामने खड़े होते हैं और तय करते हैं कि उसकी सहायता करनी है या आगे बढ़ जाना है। श्रद्धा हमें ईश्वर की ओर देखने की प्रेरणा दे सकती है; पवित्रता हमें मनुष्य की ओर देखने की दृष्टि देती है। और यदि हमारी श्रद्धा हमें मनुष्य से विमुख कर दे, तो हमें अपनी श्रद्धा की नहीं, उसके अर्थ की जाँच करनी चाहिए। आखिर ईश्वर की खोज में निकले मनुष्य के लिए इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि वह भगवान के चरणों में फूल तो रख दे, लेकिन उसी भगवान की सृष्टि के किसी दुखी प्राणी के आँसू पोंछने के लिए उसके पास समय न हो?

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