शनिवार, 17 अक्टूबर 2026

निठल्ले के नोट्स - कर्मों का हिसाब होता है?

### कर्मों का हिसाब, ईश्वर का न्याय और जीवन का विरोधाभास: बुरे लोग सुखी और अच्छे लोग दुखी क्यों?

कहते हैं, ईश्वर सबका हिसाब रखता है। उसके यहाँ देर हो सकती है, अंधेर नहीं। जैसा करोगे, वैसा भरोगे। बुरे कर्मों का फल बुरा और अच्छे कर्मों का फल अच्छा मिलता है। ये बातें बचपन से सुनते आए हैं। माता-पिता बच्चों को गलत काम करने से रोकते हुए कहते हैं कि भगवान सब देख रहे हैं, चोरी मत करो, झूठ मत बोलो, किसी का बुरा मत करो, नहीं तो भगवान सजा देंगे। धर्मग्रंथों, धार्मिक प्रवचनों और नैतिक शिक्षाओं में भी कर्मफल का सिद्धांत अलग-अलग रूपों में मिलता है। लेकिन जैसे-जैसे मनुष्य जीवन को करीब से देखता है, उसके सामने एक विचित्र विरोधाभास खड़ा हो जाता है। कोई व्यक्ति दूसरों का हक मारकर, झूठ बोलकर, धोखा देकर, भ्रष्टाचार करके और लोगों को नुकसान पहुँचाकर भी ऐशोआराम की जिंदगी जीता दिखाई देता है। उसके पास धन है, प्रतिष्ठा है, सुविधाएँ हैं और सामाजिक प्रभाव भी। दूसरी ओर, कोई व्यक्ति ईमानदारी से काम करता है, दूसरों की सहायता करता है, अपने कर्तव्यों का पालन करता है, किसी का बुरा नहीं चाहता, फिर भी आर्थिक तंगी, बीमारी, पारिवारिक समस्याओं और अनेक प्रकार के दुखों से घिरा रहता है। यदि ईश्वर सबका हिसाब रखता है, यदि कर्मों का फल निश्चित है, तो फिर यह उलटा हिसाब क्यों दिखाई देता है? क्या कर्मफल का सिद्धांत गलत है, क्या ईश्वर का न्याय हमारी समझ से परे है, या हम जीवन को समझने के लिए एक ऐसे सरल नियम पर भरोसा कर बैठे हैं, जो वास्तविकता की जटिलताओं को पूरी तरह नहीं समझा सकता?

इस प्रश्न का उत्तर खोजने से पहले एक बुनियादी बात स्वीकार करनी होगी कि हम जिस संसार में रहते हैं, वहाँ अच्छे और बुरे कर्मों के परिणाम हमेशा तत्काल, समान और प्रत्यक्ष रूप से दिखाई नहीं देते। जीवन कोई ऐसी लेखा-बही नहीं है, जिसमें हर अच्छे कर्म के सामने निश्चित मात्रा में सुख और हर बुरे कर्म के सामने निश्चित मात्रा में दुख दर्ज हो जाए। यदि ऐसा होता, तो ईमानदार व्यक्ति कभी बीमार नहीं पड़ता, परिश्रमी व्यक्ति कभी असफल नहीं होता, निर्दोष व्यक्ति के साथ कभी अन्याय नहीं होता और अपराध करने वाला कभी सुखी नहीं रह सकता। वास्तविक दुनिया में ऐसा नहीं होता। प्राकृतिक आपदाएँ किसी व्यक्ति के चरित्र की जाँच करके नहीं आतीं, गंभीर बीमारियाँ केवल बुरे लोगों को नहीं होतीं, और आर्थिक संकट केवल बेईमान लोगों के हिस्से में नहीं आते। इसी तरह, धन और सफलता केवल ईमानदार लोगों को ही प्राप्त नहीं होते। जीवन में परिस्थितियाँ, संयोग, जन्म से मिली सुविधाएँ, सामाजिक व्यवस्था, स्वास्थ्य, अवसर, दूसरों के निर्णय और व्यक्ति के अपने चुनाव—सभी मिलकर परिणामों को प्रभावित करते हैं। इसलिए किसी व्यक्ति के सुखी या दुखी होने को केवल उसके अच्छे या बुरे कर्मों का सीधा परिणाम मान लेना वास्तविकता का अत्यधिक सरलीकरण है।

फिर भी मनुष्य कर्मफल के विचार से इतना जुड़ा क्यों है? इसका एक कारण यह है कि हम न्यायपूर्ण संसार में विश्वास करना चाहते हैं। हमें यह स्वीकार करना कठिन लगता है कि कोई व्यक्ति गलत काम करके लाभ उठा सकता है और किसी निर्दोष व्यक्ति को बिना किसी गलती के कष्ट सहना पड़ सकता है। यदि हम यह मान लें कि हर अन्याय का तत्काल हिसाब नहीं होता, तो हमारे मन में असुरक्षा और निराशा पैदा हो सकती है। इसके विपरीत, यह विश्वास कि ईश्वर सब देख रहा है और एक दिन सबको उसके कर्मों का फल मिलेगा, मन को सांत्वना देता है। यह विश्वास पीड़ित व्यक्ति को आशा देता है कि अन्याय अंतिम सत्य नहीं है और शक्तिशाली व्यक्ति अपनी शक्ति के बल पर हमेशा नहीं बच सकता। यह गलत काम करने वाले के भीतर भी एक नैतिक भय पैदा कर सकता है। इस अर्थ में कर्मफल का विचार केवल भविष्य में मिलने वाले पुरस्कार या दंड की धारणा नहीं, बल्कि नैतिक जीवन जीने की प्रेरणा भी है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब हम इस विश्वास को जीवन के हर परिणाम की व्याख्या करने वाला ऐसा सार्वभौमिक नियम मान लेते हैं, जिसके आधार पर हम हर सुखी व्यक्ति को पुण्यात्मा और हर दुखी व्यक्ति को किसी पुराने पाप का भागीदार घोषित करने लगते हैं।

गलत काम करने वाले लोग गलत काम क्यों करते हैं, जबकि वे जानते हैं कि उनके कर्मों का फल बुरा हो सकता है? इसका उत्तर मनुष्य की इच्छाओं, स्वार्थों और तत्काल लाभ की प्रवृत्ति में छिपा है। मनुष्य हमेशा दूरगामी परिणामों को ध्यान में रखकर निर्णय नहीं लेता। कई बार तत्काल मिलने वाला लाभ भविष्य के संभावित नुकसान पर भारी पड़ जाता है। कोई व्यापारी मिलावट करके अधिक मुनाफा कमाता है, कोई अधिकारी रिश्वत लेकर अपनी आर्थिक स्थिति सुधारता है, कोई व्यक्ति झूठ बोलकर किसी प्रतियोगिता या विवाद में लाभ हासिल करता है, तो कोई प्रभावशाली व्यक्ति दूसरों के अधिकारों का हनन करके अपना वर्चस्व बढ़ाता है। इन सभी स्थितियों में व्यक्ति को गलत काम से मिलने वाला लाभ दिखाई देता है, जबकि उसके संभावित परिणाम अनिश्चित, दूर या टाले जा सकने वाले लगते हैं। वह सोच सकता है कि उसे कोई पकड़ नहीं पाएगा, उसके पास व्यवस्था को प्रभावित करने की शक्ति है, दूसरे लोग भी तो यही कर रहे हैं, या परिस्थितियाँ उसे ऐसा करने के लिए मजबूर कर रही हैं। इस प्रकार वह गलत काम को अपने लिए तर्कसंगत ठहराने लगता है।

इसके अतिरिक्त, सभी लोग सही और गलत के प्रश्न को समान गंभीरता से नहीं लेते। कुछ लोग नैतिकता को अपने जीवन का आधार मानते हैं, जबकि कुछ के लिए नैतिक नियम केवल तब तक महत्त्वपूर्ण होते हैं, जब तक उनसे उनके हितों को नुकसान नहीं पहुँचता। किसी व्यक्ति को दूसरों की पीड़ा का वास्तविक अनुभव नहीं होता, तो किसी को अपने लाभ के सामने दूसरों का नुकसान नगण्य लगता है। कुछ लोग अपने अपराध को अपराध मानते ही नहीं; वे उसे चतुराई, व्यावसायिक कौशल, व्यावहारिक बुद्धिमत्ता या दुनिया में आगे बढ़ने का तरीका समझते हैं। भ्रष्टाचार करने वाला व्यक्ति स्वयं को भ्रष्ट नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार चलने वाला समझ सकता है। किसी को धोखा देने वाला व्यक्ति अपनी सफलता पर गर्व भी कर सकता है। जब व्यक्ति अपने गलत आचरण को गलत मानना ही छोड़ देता है, तब उसे अपराधबोध से रोकने वाली आंतरिक बाधा कमजोर हो जाती है। इसीलिए केवल यह समझाना कि भगवान सब देख रहे हैं, हर व्यक्ति को गलत काम करने से रोकने के लिए पर्याप्त नहीं होता।

लेकिन सबसे चौंकाने वाला प्रश्न यह है कि गलत काम करके भी कुछ लोग खुश कैसे रहते हैं? क्या उनके मन में अपराधबोध नहीं होता? क्या उन्हें अपने किए पर कभी पछतावा नहीं होता? इसका उत्तर यह है कि मनुष्य की खुशी और नैतिकता का संबंध सीधा और सरल नहीं है। खुशी के अनेक स्रोत होते हैं—धन, सुविधाएँ, सत्ता, मनोरंजन, परिवार, सामाजिक प्रतिष्ठा, शारीरिक सुख और अपनी इच्छाओं की पूर्ति। यदि किसी व्यक्ति को गलत काम से धन और शक्ति मिलती है, और वह अपने कर्मों के नैतिक पक्ष की चिंता नहीं करता, तो वह इन भौतिक लाभों का आनंद ले सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि वह नैतिक रूप से सही है या उसके जीवन में कोई आंतरिक संघर्ष नहीं है। इसका अर्थ केवल इतना है कि गलत कर्म का परिणाम हर बार तत्काल दिखाई देने वाला दुख नहीं होता।

कुछ लोग अपनी गलतियों को उचित ठहराकर मानसिक असुविधा से बचते हैं। वे अपने काम की तुलना दूसरों के काम से करते हैं और सोचते हैं कि वे उनसे बेहतर हैं। कोई कहता है, “मैंने अकेले थोड़े ही किया है, पूरा तंत्र ऐसा है।” कोई कहता है, “मैंने अपने परिवार के लिए किया।” कोई यह मान लेता है कि पीड़ित व्यक्ति स्वयं अपनी दुर्दशा के लिए जिम्मेदार था। इस तरह वे अपने भीतर एक ऐसी कहानी बनाते हैं, जिसमें वे स्वयं को दोषी नहीं मानते। जब व्यक्ति अपनी नैतिक जिम्मेदारी को स्वीकार ही नहीं करता, तब उसके भीतर अपराधबोध पैदा होने की संभावना कम हो सकती है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति संवेदनशील है, अपने व्यवहार की समीक्षा करता है और दूसरों के दुख को गंभीरता से महसूस करता है, वह कभी-कभी छोटी-सी गलती के लिए भी लंबे समय तक परेशान रह सकता है। इसलिए दुखी होना अपने आप में सदाचार का प्रमाण नहीं और प्रसन्न दिखाई देना अपने आप में दुष्टता का प्रमाण नहीं है।

यहाँ एक और अंतर समझना चाहिए—खुश दिखाई देना और वास्तव में संतुष्ट होना एक ही बात नहीं है। हम किसी व्यक्ति के घर, गाड़ी, कपड़े, यात्राएँ, सामाजिक प्रभाव और सार्वजनिक जीवन देखते हैं, लेकिन उसके मन की स्थिति नहीं जानते। संभव है कि वह वास्तव में प्रसन्न हो। यह भी संभव है कि वह भीतर से असुरक्षित हो, लगातार अपनी संपत्ति और प्रतिष्ठा खोने से डरता हो या अपने संबंधों में विश्वास की कमी से जूझता हो। लेकिन बिना प्रमाण के यह दावा करना भी उचित नहीं कि हर बेईमान व्यक्ति भीतर से दुखी ही होता है। कभी-कभी गलत काम करने वाला व्यक्ति सचमुच लंबे समय तक सुख-सुविधाओं का आनंद लेता है और उसे अपने कर्मों के कारण कोई स्पष्ट व्यक्तिगत कष्ट नहीं होता। इस असुविधाजनक सच्चाई को स्वीकार करना आवश्यक है। यदि हम हर बुरे व्यक्ति के दुखी होने की कल्पना केवल इसलिए करें कि हमें न्यायपूर्ण संसार में विश्वास बनाए रखना है, तो हम वास्तविकता को समझने के बजाय अपनी इच्छा के अनुरूप ढाल रहे होंगे।

अब दूसरी ओर देखिए। अच्छे कर्म करने वाले लोग दुखी क्यों रहते हैं? क्या ईमानदारी, परोपकार और सदाचार जीवन को कठिन बना देते हैं? कुछ परिस्थितियों में ऐसा हो सकता है। जो व्यक्ति गलत समझौता करने से इनकार करता है, उसे पदोन्नति या आर्थिक लाभ का अवसर खोना पड़ सकता है। जो कर्मचारी भ्रष्टाचार का विरोध करता है, उसे दबाव, अलगाव या प्रताड़ना का सामना करना पड़ सकता है। जो व्यक्ति अपने परिवार की जरूरतों के लिए स्वयं त्याग करता है, वह अपनी इच्छाओं को पीछे छोड़ देता है। जो दूसरों की पीड़ा के प्रति संवेदनशील होता है, वह ऐसी समस्याओं से भी दुखी हो सकता है, जिन्हें दूसरे लोग अनदेखा कर देते हैं। इस अर्थ में नैतिकता हमेशा सुविधाजनक नहीं होती। सही काम करना कभी-कभी तत्काल नुकसान उठाने की माँग करता है, जबकि गलत काम तत्काल लाभ दे सकता है। यदि हम यह अपेक्षा करें कि सदाचार अपनाते ही जीवन सरल हो जाएगा, तो हमें निराशा हो सकती है। सदाचार कोई बीमा पॉलिसी नहीं है, जो बीमारी, आर्थिक संकट, दुर्घटना या पारिवारिक दुख से सुरक्षा की गारंटी दे।

लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं कि अच्छे कर्म करने वाले लोगों को दुख सहने के लिए ही पैदा किया गया है। कभी-कभी हम त्याग और सदाचार के बीच अंतर करना भूल जाते हैं। किसी की सहायता करना अच्छी बात है, लेकिन अपनी क्षमता से बाहर जाकर हर व्यक्ति की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले लेना आवश्यक नहीं। ईमानदार होना अच्छी बात है, लेकिन अपने अधिकारों की रक्षा न करना ईमानदारी नहीं। क्षमाशील होना अच्छी बात है, लेकिन लगातार शोषण सहते रहना अनिवार्य रूप से सदाचार नहीं। दूसरों के लिए जीना अच्छी बात है, लेकिन अपने स्वास्थ्य, आर्थिक सुरक्षा और मानसिक शांति की पूरी उपेक्षा करना बुद्धिमानी नहीं। नैतिक जीवन का अर्थ अपने हितों का पूर्ण त्याग करना नहीं, बल्कि अपने हितों और दूसरों के अधिकारों के बीच न्यायपूर्ण संतुलन स्थापित करना है। जो व्यक्ति दूसरों का भला करते हुए स्वयं को लगातार नष्ट करता जाता है, उसे अपनी सीमाओं और जिम्मेदारियों पर विचार करना चाहिए। सदाचार का संबंध विवेक से भी है, केवल सहनशीलता से नहीं।

हम अक्सर यह भी मान लेते हैं कि अच्छे लोगों के साथ अच्छा और बुरे लोगों के साथ बुरा होना चाहिए, लेकिन इस मान्यता में एक छिपी हुई अपेक्षा है—कि दुनिया हमारी नैतिक समझ के अनुसार चले। वास्तविकता यह है कि प्रकृति और समाज हमारे व्यक्तिगत नैतिक निर्णयों के आधार पर परिणाम नहीं बाँटते। आग अच्छे और बुरे दोनों को जला सकती है। संक्रामक बीमारी ईमानदार और बेईमान दोनों को हो सकती है। आर्थिक मंदी मेहनती और आलसी दोनों को प्रभावित कर सकती है, हालाँकि उसका प्रभाव उनकी परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग होगा। इसी तरह, किसी व्यक्ति की सफलता केवल उसके चरित्र का परिणाम नहीं होती। जन्म से मिली संपत्ति, परिवार का सहयोग, शिक्षा, सामाजिक संपर्क, सही समय पर मिला अवसर और संयोग भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि किसी व्यक्ति को जीवन में बहुत कठिनाइयाँ मिली हैं, तो यह मान लेना कि उसने अवश्य कोई बुरा कर्म किया होगा, पीड़ित के साथ एक और अन्याय है। और यदि कोई व्यक्ति संपन्न है, तो यह निष्कर्ष निकालना कि वह पिछले या वर्तमान जन्म के पुण्य का फल भोग रहा है, भी बिना पर्याप्त आधार के किया गया दावा है।

भारतीय दर्शन में कर्म और कर्मफल की अवधारणा के अनेक रूप हैं। भगवद्गीता में कर्म करने, कर्तव्य निभाने और फल के प्रति आसक्ति से मुक्त रहने की शिक्षा मिलती है। गीता का प्रसिद्ध संदेश कर्म पर अधिकार और फल पर अनन्य अधिकार न होने की बात करता है। इसका एक अर्थ यह समझा जा सकता है कि मनुष्य को अपने कर्मों की गुणवत्ता और अपने कर्तव्य पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि परिणाम अनेक कारणों से प्रभावित होते हैं और हमेशा उसके नियंत्रण में नहीं रहते। भारतीय धार्मिक और दार्शनिक परंपराओं में जन्म-जन्मांतर, संचित कर्म, प्रारब्ध और पुनर्जन्म के माध्यम से दिखाई देने वाली असमानताओं को समझाने के प्रयास भी हुए हैं। इन मान्यताओं के अनुसार, वर्तमान जीवन की परिस्थितियाँ केवल वर्तमान कर्मों से निर्धारित नहीं होतीं। लेकिन पुनर्जन्म और पूर्वजन्म के कर्मों के बारे में ये धार्मिक-दार्शनिक धारणाएँ हैं; इन्हें इस तरह प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता कि किसी विशेष व्यक्ति के दुख का कारण निश्चित रूप से उसका पूर्वजन्म का कोई पाप है। ऐसी व्याख्या से सावधान रहना चाहिए, क्योंकि इससे किसी पीड़ित व्यक्ति के प्रति सहानुभूति घट सकती है और सामाजिक अन्याय को भी भाग्य का परिणाम मानकर स्वीकार किया जा सकता है।

कर्मफल के विचार की एक व्यावहारिक और अधिक प्रत्यक्ष व्याख्या भी है। हमारे कर्म अक्सर हमारे जीवन और समाज पर प्रभाव डालते हैं, लेकिन उन प्रभावों की प्रकृति और समय अलग-अलग हो सकते हैं। झूठ बोलने से किसी व्यक्ति को तत्काल लाभ मिल सकता है, लेकिन बार-बार झूठ बोलने से उसके संबंधों में विश्वास टूट सकता है। भ्रष्टाचार से धन मिल सकता है, लेकिन कानूनी कार्रवाई, आर्थिक नुकसान या प्रतिष्ठा गिरने का जोखिम भी बढ़ सकता है। हिंसा से कोई व्यक्ति दूसरों को दबा सकता है, लेकिन इससे भय, प्रतिरोध और अस्थिरता पैदा हो सकती है। दूसरी ओर, ईमानदारी, मेहनत, विश्वसनीयता और सहयोग लंबे समय में अच्छे संबंधों, सामाजिक विश्वास और स्थिरता का आधार बन सकते हैं। फिर भी ये परिणाम निश्चित नहीं हैं। कोई झूठा व्यक्ति पकड़े बिना रह सकता है और कोई ईमानदार व्यक्ति अपने सद्गुणों के बावजूद धोखा खा सकता है। कर्मों के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक परिणामों को समझना उपयोगी है, लेकिन उन्हें किसी अचूक ब्रह्मांडीय गणित का प्रमाण मान लेना उचित नहीं।

तो क्या इसका अर्थ यह है कि ईश्वर का न्याय नहीं है, या कर्मफल का सिद्धांत केवल मनुष्य को नैतिक बनाए रखने के लिए गढ़ी गई कल्पना है? इस प्रश्न का कोई ऐसा सर्वमान्य उत्तर नहीं है, जिसे प्रमाणित रूप से अंतिम कहा जा सके। आस्तिक व्यक्ति विश्वास कर सकता है कि ईश्वरीय न्याय मनुष्य की सीमित दृष्टि से परे है और जीवन में दिखाई देने वाली असमानताएँ पूरी व्यवस्था का अंतिम निर्णय नहीं हैं। दार्शनिक व्यक्ति पूछ सकता है कि यदि ईश्वर सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ और न्यायकारी हैं, तो निर्दोष लोगों के दुख और अन्याय की समस्या को कैसे समझा जाए। नास्तिक व्यक्ति यह मान सकता है कि संसार में कोई सुनिश्चित अलौकिक न्याय-व्यवस्था नहीं है, इसलिए मनुष्यों को स्वयं न्यायपूर्ण संस्थाएँ और नैतिक सामाजिक व्यवस्था बनानी चाहिए। इन दृष्टिकोणों में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन एक साझा निष्कर्ष निकाला जा सकता है—हमें केवल इस आशा पर निर्भर नहीं रहना चाहिए कि हर अन्याय का हिसाब अपने आप हो जाएगा। यदि कोई भ्रष्ट व्यक्ति व्यवस्था को नुकसान पहुँचा रहा है, तो उसके विरुद्ध प्रमाण जुटाना, शिकायत करना, कानून का सहारा लेना और संस्थागत सुधार की माँग करना आवश्यक है। किसी पीड़ित से यह कह देना कि चिंता मत करो, भगवान सब देख रहे हैं, उसकी समस्या का वास्तविक समाधान नहीं है।

यहीं धर्म और नैतिकता की सबसे बड़ी परीक्षा होती है। यदि हम कर्मफल में विश्वास करते हैं, तो क्या यह विश्वास हमें दूसरों के प्रति अधिक दयालु बनाता है या उनके दुख के लिए उन्हें ही दोषी ठहराने का साधन बन जाता है? यदि कोई गरीब है, बीमार है या किसी अन्याय का शिकार है, तो क्या हम उसकी सहायता करेंगे या कहेंगे कि यह उसके कर्मों का फल है? यदि कोई शक्तिशाली व्यक्ति बेईमानी करके सफल हो रहा है, तो क्या हम उसके व्यवहार का विरोध करेंगे या यह सोचकर चुप रहेंगे कि ईश्वर कभी न कभी उसका हिसाब कर देगा? कर्मफल में विश्वास का नैतिक मूल्य इस बात से भी तय होता है कि वह हमें जिम्मेदारी की ओर ले जाता है या निष्क्रियता की ओर। यदि यह विश्वास हमें अपने कर्मों के प्रति सजग बनाता है, दूसरों का नुकसान करने से रोकता है और न्याय के लिए प्रेरित करता है, तो वह उपयोगी है। लेकिन यदि वह हमें अन्याय सहने, पीड़ित को दोष देने या गलत काम करने वाले के सामने असहाय बने रहने के लिए प्रेरित करता है, तो उसकी व्याख्या पर पुनर्विचार आवश्यक है।

एक और विडंबना यह है कि लोग अक्सर अच्छे कर्म इसलिए करना चाहते हैं कि उन्हें अच्छा फल मिले। वे दान करते हैं, पूजा करते हैं, व्रत रखते हैं, जरूरतमंदों की सहायता करते हैं और बदले में सुख, स्वास्थ्य, धन या सफलता की अपेक्षा रखते हैं। इसमें मनुष्य की स्वाभाविक इच्छाएँ दिखाई देती हैं। लेकिन यदि हर अच्छा काम किसी पुरस्कार की उम्मीद में किया जाए, तो क्या वह वास्तव में निःस्वार्थ कर्म रह जाता है? यदि किसी भूखे व्यक्ति को भोजन इसलिए दिया जाए कि भगवान प्रसन्न होकर धन देंगे, तो भोजन देना उपयोगी अवश्य है, लेकिन उसके पीछे की प्रेरणा में लेन-देन का भाव भी मौजूद है। इसके विपरीत, यदि हम किसी की सहायता इसलिए करते हैं कि उसका दुख कम होना चाहिए, तो उस कर्म का मूल्य उस व्यक्ति की राहत में भी है, चाहे हमें बदले में कोई पुरस्कार मिले या नहीं। इसका अर्थ यह नहीं कि अच्छे कर्म करने वाले को सुख की इच्छा नहीं रखनी चाहिए। मनुष्य को सुखी जीवन की आकांक्षा रखने का पूरा अधिकार है। प्रश्न केवल इतना है कि क्या हम सदाचार को किसी अदृश्य पुरस्कार की खरीद समझते हैं या उसे एक बेहतर मनुष्य और बेहतर समाज बनाने का तरीका मानते हैं।

आखिरकार, हमें यह स्वीकार करने का साहस रखना होगा कि संसार हमेशा न्यायपूर्ण दिखाई नहीं देता और हर अन्याय का समाधान हमारी आँखों के सामने नहीं आता। कुछ बुरे लोग लंबे समय तक सफल रहते हैं। कुछ अच्छे लोग जीवन भर संघर्ष करते हैं। कुछ अपराधियों को दंड मिलता है, कुछ बच निकलते हैं। कुछ ईमानदार लोगों को उनके काम का सम्मान मिलता है, कुछ को उपेक्षा सहनी पड़ती है। इन वास्तविकताओं से बचने के लिए हमें न तो यह दावा करना चाहिए कि हर बुरा व्यक्ति भीतर से दुखी ही होता है, न यह कि हर दुखी व्यक्ति किसी अदृश्य पाप का दंड भोग रहा है। ऐसा कहना हमारे विश्वास को बचा सकता है, लेकिन इससे सत्य की खोज पूरी नहीं होती। जीवन में न्याय की आकांक्षा रखना उचित है, पर यह मान लेना कि न्याय हमेशा अपने आप हो जाएगा, व्यावहारिक विवेक नहीं है।

अच्छा कर्म इसलिए नहीं करना चाहिए कि उसके बदले में सुख मिलने की गारंटी है; अच्छा कर्म इसलिए करना चाहिए कि वह सही है, किसी का जीवन बेहतर बना सकता है और हमें अपने विवेक के सामने ईमानदार रहने में सहायता देता है। इसी तरह, बुरे कर्म से केवल इसलिए नहीं बचना चाहिए कि कभी ईश्वर दंड देगा, बल्कि इसलिए भी बचना चाहिए कि उससे किसी का अधिकार छिन सकता है, किसी का जीवन कठिन हो सकता है और समाज में विश्वास कमजोर पड़ सकता है। कर्मफल में विश्वास रखने वाला व्यक्ति इसे ईश्वरीय जवाबदेही के रूप में समझ सकता है; विश्वास न रखने वाला व्यक्ति इसे नैतिक जिम्मेदारी के रूप में देख सकता है। दोनों ही स्थितियों में जीवन की दिशा केवल इस आधार पर तय नहीं होनी चाहिए कि कौन सुखी दिखाई दे रहा है और कौन दुखी।

शायद इस पूरे प्रश्न का सबसे महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष यही है कि सुख किसी व्यक्ति के अच्छे होने का प्रमाण नहीं और दुख उसके बुरे होने का प्रमाण नहीं। धनवान होना पुण्य का प्रमाण नहीं, गरीब होना पाप का प्रमाण नहीं। बीमारी किसी नैतिक विफलता का सबूत नहीं और सफलता किसी व्यक्ति की श्रेष्ठता की अंतिम मुहर नहीं। मनुष्य का मूल्यांकन उसके आचरण, उसके इरादों, दूसरों के प्रति उसके व्यवहार और अपनी गलतियों की जिम्मेदारी स्वीकार करने की उसकी क्षमता से होना चाहिए, केवल उसकी संपत्ति या परिस्थितियों से नहीं। यदि ईश्वर सचमुच सबका हिसाब रखता है, तो उस अंतिम हिसाब की प्रकृति और समय का निर्णय हमारी सीमित समझ से परे हो सकता है। लेकिन हमारे सामने जो अन्याय है, उसे पहचानना और जहाँ संभव हो, उसे दूर करना हमारी जिम्मेदारी है। क्योंकि ईश्वर के न्याय की प्रतीक्षा करते हुए मनुष्य का न्याय से मुँह मोड़ लेना स्वयं एक नैतिक विडंबना होगी। और यदि कोई अंतिम हिसाब है भी, तो शायद हमें उसकी चिंता में इतना नहीं उलझना चाहिए कि अपने वर्तमान कर्मों का हिसाब रखना ही भूल जाएँ।

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