### देर आयद दुरुस्त आयद या बहुत देर हो गई हुजूर आते-आते!
जीवन में कुछ काम ऐसे होते हैं जिनके पूरा होने पर मन कहता है, चलो, देर से ही सही, काम तो हुआ; और कुछ काम ऐसे होते हैं जिनके पूरा होने तक प्रतीक्षा ही अपना अर्थ खो चुकी होती है। ऐसे में सवाल उठता है कि किसी काम के देर से पूरा होने पर हमें ‘देर आयद दुरुस्त आयद’ कहना चाहिए या ‘बहुत देर हो गई हुजूर आते-आते’? दोनों ही कथन अपने भीतर एक अनुभव, एक दृष्टिकोण और जीवन को देखने का अलग-अलग नजरिया समेटे हुए हैं। पहला कथन आशा का हाथ थामता है, जबकि दूसरा समय की निष्ठुरता का हिसाब मांगता है। एक उपलब्धि का स्वागत करता है, दूसरा उपलब्धि तक पहुंचने में हुई देरी पर सवाल उठाता है। कौन-सा कथन उचित है, यह केवल इस बात पर निर्भर नहीं करता कि काम पूरा हुआ या नहीं, बल्कि इस पर भी निर्भर करता है कि वह काम कब पूरा हुआ, किस कीमत पर पूरा हुआ और उसके पूरा होने से अब किसका, कितना भला होने वाला है।
‘देर आयद दुरुस्त आयद’ में एक उदार भाव है। यह मनुष्य को उसकी गलतियों, कमजोरियों और विलंब के बावजूद सुधार का अवसर देता है। मान लीजिए, किसी व्यक्ति को वर्षों बाद अपनी गलती का एहसास होता है और वह उस गलती को सुधारने की कोशिश करता है। किसी बिछड़े हुए संबंध में लंबे अंतराल के बाद संवाद की शुरुआत होती है, किसी विद्यार्थी को देर से ही सही, पढ़ाई का महत्व समझ में आता है या कोई व्यक्ति आधी उम्र बीत जाने के बाद अपने स्वास्थ्य के प्रति सचेत होता है। ऐसे अवसरों पर यह कहना उचित ही नहीं, आवश्यक भी है कि देर से सही, सही दिशा में कदम तो बढ़ा। आखिर मनुष्य का जीवन किसी मशीन की समय-सारिणी नहीं है, जिसमें हर काम निर्धारित समय पर ही पूरा हो। कई बार अनुभव पकने में समय लगता है, विवेक जागने में उम्र लग जाती है और अपनी भूल स्वीकार करने में अहंकार की कई परतें टूटती हैं। यदि सुधार की संभावना बची हुई है, तो केवल इस कारण उसका स्वागत न करना कि वह देर से आया है, अपने ही हाथों भविष्य का एक दरवाजा बंद कर देने जैसा है।
लेकिन हर परिस्थिति में ‘देर आयद दुरुस्त आयद’ कहना समझदारी नहीं है। कभी-कभी यह वाक्य जिम्मेदारी से बचने का सुविधाजनक बहाना भी बन जाता है। कोई अधिकारी वर्षों तक किसी समस्या को लटकाए रखे, कोई विभाग समय पर जरूरी सुविधा उपलब्ध न कराए, कोई सरकार वादे पूरे करने में लगातार देर करती रहे या किसी व्यक्ति की लापरवाही के कारण दूसरे व्यक्ति का जीवन संकट में पड़ जाए, तो क्या केवल काम पूरा हो जाने से सारी शिकायतें समाप्त हो जानी चाहिए? क्या देर से मिला न्याय उस व्यक्ति की पीड़ा मिटा सकता है जिसने न्याय की प्रतीक्षा में अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा गंवा दिया? क्या समय पर न मिली चिकित्सा, परीक्षा परिणाम में हुई देरी, नौकरी के लिए उम्र निकल जाने या किसी परियोजना के अधूरे रहने से हुए आर्थिक नुकसान की भरपाई केवल यह कहकर की जा सकती है कि आखिरकार काम हो तो गया? यहां ‘बहुत देर हो गई हुजूर आते-आते’ अधिक प्रासंगिक हो जाता है। इस कथन में व्यंग्य है, लेकिन व्यंग्य के पीछे एक गंभीर शिकायत छिपी है—आप आए तो सही, मगर तब आए जब आपकी उपस्थिति का वास्तविक लाभ मिलना कठिन हो गया।
समय की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह किसी के लिए रुकता नहीं। धन खो जाए तो फिर कमाया जा सकता है, मकान टूट जाए तो दोबारा बनाया जा सकता है, परीक्षा में असफल होने पर फिर प्रयास किया जा सकता है; लेकिन बीता हुआ समय वापस नहीं आता। यही कारण है कि किसी काम के पूरा होने का मूल्य केवल उसकी अंतिम उपलब्धि से नहीं, उसकी समयबद्धता से भी निर्धारित होता है। किसान के लिए वर्षा का पानी फसल बोने के समय उपयोगी है; फसल कट जाने के बाद वही वर्षा कितनी भी अच्छी क्यों न हो, उसका महत्व बदल जाता है। विद्यार्थी को परीक्षा के बाद मिलने वाली पुस्तक ज्ञान तो दे सकती है, लेकिन उस परीक्षा में सफल होने का अवसर नहीं लौटा सकती। किसी बीमार व्यक्ति को उपचार तब चाहिए जब उपचार से उसकी जान बचने की संभावना हो; उसके निधन के बाद अस्पताल की व्यवस्था दुरुस्त होने का समाचार भविष्य के रोगियों के लिए आशा जरूर पैदा करेगा, लेकिन उस परिवार के लिए वह एक कटु स्मृति ही रहेगा। इसलिए समय पर किया गया काम और देर से किया गया वही काम हमेशा समान मूल्य नहीं रखते।
फिर भी, देर से पूरा हुआ हर काम व्यर्थ नहीं हो जाता। इस अंतर को समझना जरूरी है। कुछ कामों की उपयोगिता तत्काल होती है, कुछ की दीर्घकालिक। किसी शहर में वर्षों की देरी के बाद पुल बनता है, तो उसके निर्माण में हुई लापरवाही और जनता की असुविधा पर सवाल उठना चाहिए, लेकिन पुल बन जाने से होने वाले लाभ को नकारना भी उचित नहीं होगा। किसी संस्थान में लंबे संघर्ष के बाद सुधार लागू होता है, तो उससे भविष्य में हजारों लोगों को लाभ मिल सकता है। किसी व्यक्ति को देर से मिली शिक्षा, देर से विकसित हुआ कौशल या देर से हासिल हुआ आत्मबोध उसके जीवन की शेष यात्रा को बेहतर बना सकता है। यहां हमें दो बातों को अलग-अलग देखना होगा—काम का पूरा होना अपने आप में कितनी अच्छी बात है और उसे समय पर पूरा न कर पाने की विफलता कितनी गंभीर है। पहली बात के लिए प्रशंसा हो सकती है, दूसरी के लिए जवाबदेही भी तय हो सकती है। काम पूरा होने पर खुशी मनाना और देरी के कारणों की जांच करना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।
दरअसल, इन दोनों कथनों के बीच एक तीसरा प्रश्न भी छिपा है—देर किसकी वजह से हुई और उसकी कीमत किसने चुकाई? यदि किसी व्यक्ति ने कठिन परिस्थितियों के बावजूद संघर्ष करते हुए देर से सफलता प्राप्त की है, तो उसके लिए ‘देर आयद दुरुस्त आयद’ कहना उसके संघर्ष का सम्मान है। लेकिन यदि किसी जिम्मेदार व्यक्ति ने अपने कर्तव्य की उपेक्षा की और फिर बहुत देर से काम पूरा करके प्रशंसा पाने की अपेक्षा की, तो ‘बहुत देर हो गई हुजूर आते-आते’ कहना अनुचित नहीं। पहला व्यक्ति समय से हारकर भी परिस्थितियों से लड़ रहा था; दूसरा व्यक्ति शायद समय रहते अपना कर्तव्य निभा सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। दोनों को एक ही तराजू पर तौलना न्याय नहीं होगा। परिस्थितिजन्य विलंब और लापरवाही से पैदा हुई देरी में फर्क करना ही विवेक है।
व्यक्तिगत जीवन में भी इन कथनों का अर्थ परिस्थिति के अनुसार बदल जाता है। मान लीजिए, कोई व्यक्ति वर्षों बाद अपने माता-पिता से अपने व्यवहार के लिए क्षमा मांगता है। यदि माता-पिता जीवित हैं, संबंध सुधारने की गुंजाइश है और क्षमा मांगने वाला सचमुच अपने व्यवहार में बदलाव लाने को तैयार है, तो देर से आया पश्चात्ताप भी मूल्यवान है। लेकिन यदि वह व्यक्ति केवल किसी औपचारिक अवसर पर क्षमा मांगकर अपने दायित्व से मुक्त होना चाहता है, तो उसके शब्दों से अधिक उसके आचरण को महत्व दिया जाना चाहिए। इसी तरह, कोई व्यक्ति पचास वर्ष की उम्र में अपने स्वास्थ्य, परिवार या करियर के प्रति जिम्मेदार बनता है, तो उसे यह कहकर हतोत्साहित करना कि अब बहुत देर हो चुकी है, उचित नहीं। जीवन में कुछ अवसर अवश्य समाप्त हो जाते हैं, लेकिन सारे अवसर एक साथ समाप्त नहीं होते। जो बीत गया, उसका शोक अपनी जगह है; जो बचा है, उसकी संभावना अपनी जगह।
सामाजिक और राजनीतिक जीवन में इन कथनों की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। सार्वजनिक संस्थाओं का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि उन्होंने कोई काम पूरा कर दिया, बल्कि इस आधार पर भी होना चाहिए कि उन्होंने उसे कब पूरा किया, कितने संसाधन खर्च किए, कितने लोगों को राहत मिली और कितने लोगों को अनावश्यक परेशानी उठानी पड़ी। समय पर किया गया काम प्रशासनिक दक्षता का प्रमाण है, जबकि वर्षों की देरी के बाद हुआ काम कभी-कभी केवल लंबित जिम्मेदारी का निपटारा होता है। यदि कोई व्यवस्था अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए हर बार ‘देर आयद दुरुस्त आयद’ का सहारा लेने लगे, तो यह कहावत सुधार की प्रेरणा के बजाय लापरवाही का कवच बन सकती है। दूसरी ओर, यदि जनता हर देर से हुए सुधार को केवल व्यंग्य की दृष्टि से देखे और उसके वास्तविक लाभ को स्वीकार ही न करे, तो सकारात्मक परिवर्तन के प्रति उत्साह भी कमजोर पड़ सकता है। इसलिए स्वस्थ समाज को उपलब्धि का स्वागत करना चाहिए, लेकिन देरी के सवाल को भुलाना नहीं चाहिए।
एक दिलचस्प बात यह भी है कि देर से काम पूरा होने का अर्थ हर बार देर से शुरुआत करना नहीं होता। कई बार तैयारी में समय लगता है, परिस्थितियां अनुकूल नहीं होतीं, संसाधन उपलब्ध नहीं होते या काम की प्रकृति ही ऐसी होती है कि जल्दबाजी नुकसानदेह हो सकती है। किसी पुस्तक को लिखने, वैज्ञानिक खोज करने, न्यायिक निर्णय देने या किसी जटिल समस्या का स्थायी समाधान खोजने में लगा अतिरिक्त समय परिणाम की गुणवत्ता को बेहतर बना सकता है। यहां समय की अवधि से अधिक महत्वपूर्ण है उस अवधि का उपयोग। लेकिन जब देरी अनिश्चितकालीन हो जाए, निर्णय टलते रहें और कोई यह बताने को तैयार न हो कि काम कब पूरा होगा, तब धैर्य धीरे-धीरे निराशा में बदलने लगता है। प्रतीक्षा की भी एक सीमा होती है। धैर्य का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन उसे दूसरों की सुविधा के लिए अनंतकाल तक खींचा नहीं जा सकता।
इसलिए किसी काम के पूरा होने पर उचित प्रतिक्रिया तय करने का एक व्यावहारिक तरीका है। पहले देखें कि काम पूरा होने से अब भी वास्तविक लाभ हो रहा है या नहीं। फिर समझें कि देरी अपरिहार्य परिस्थितियों के कारण हुई या टाली जा सकती थी। तीसरा प्रश्न यह हो कि विलंब से किसी को कितना नुकसान हुआ और क्या उसकी भरपाई संभव है। अंत में यह भी देखें कि काम पूरा करने वाले व्यक्ति या संस्था ने अपनी देरी की जिम्मेदारी स्वीकार की है या केवल उपलब्धि का श्रेय लेना चाहा है। यदि देर के बावजूद काम उपयोगी है, प्रयास ईमानदार रहा है और सुधार की संभावना मौजूद है, तो ‘देर आयद दुरुस्त आयद’ कहना उदारता और विवेक का परिचय है। लेकिन यदि देरी ने अवसर छीन लिए, नुकसान पहुंचाया या जिम्मेदारी से बचने का रास्ता बनाया, तो ‘बहुत देर हो गई हुजूर आते-आते’ कहना समय के महत्व और जवाबदेही की याद दिलाता है।
अंततः, इन दोनों कहावतों में से किसी एक को सार्वभौमिक सत्य मान लेना उचित नहीं। पहली हमें सिखाती है कि देर हो जाने के बाद भी सही काम का महत्व समाप्त नहीं होता; दूसरी चेतावनी देती है कि हर सही काम सही समय पर ही अपना पूरा अर्थ प्राप्त करता है। जीवन में उदारता इतनी होनी चाहिए कि हम देर से हुए सुधार को स्वीकार कर सकें, और विवेक इतना कि सुधार के नाम पर हुई देरी को सामान्य न मान लें। किसी काम का पूरा होना राहत की बात है, लेकिन उसका समय पर पूरा होना दक्षता की निशानी है। देर से मिला अवसर भी कभी-कभी जीवन बदल सकता है, लेकिन खोया हुआ अवसर हमेशा लौट आए, इसकी कोई गारंटी नहीं।
इसलिए जब कोई काम देर से पूरा हो, तो न तो हर बार ताली बजानी चाहिए और न हर बार तंज कसना चाहिए। जहां सुधार की संभावना हो, वहां स्वागत कीजिए; जहां नुकसान हुआ हो, वहां जवाब मांगिए; और जहां देरी ने किसी का जीवन ही बदल दिया हो, वहां संवेदना को प्राथमिकता दीजिए। क्योंकि अंततः प्रश्न केवल यह नहीं है कि हुजूर आए या नहीं, प्रश्न यह भी है कि जब वे आए, तब तक क्या बचा था। ‘देर आयद दुरुस्त आयद’ आशा का वाक्य है, जबकि ‘बहुत देर हो गई हुजूर आते-आते’ समय की कीमत का स्मरण। समझदारी इन दोनों में से किसी एक को चुनने में नहीं, बल्कि यह पहचानने में है कि किस परिस्थिति में किस बात को याद रखना अधिक जरूरी है।

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