प्राइवेट नौकरी सचमुच उस ढिबरी या बिजली के बल्ब जैसी है, जिसकी अपनी कोई रोशनी नहीं होती। जब तक बाहर से तेल मिलता रहे, बाती जलती रहती है; जब तक बिजली का प्रवाह बना रहे, बल्ब रोशनी देता रहता है। ऊर्जा का स्रोत बंद हुआ और उजाला भी उसी क्षण विदा। नौकरीपेशा आदमी की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है—कंपनी की जरूरत, पद की उपयोगिता और उसकी अपनी कार्यक्षमता के बीच जब तक तालमेल बना रहता है, नौकरी चलती रहती है। जिस दिन इनमें से किसी एक का संतुलन बिगड़ा, रोशनी मद्धम पड़ने लगती है और कभी-कभी अचानक अंधेरा भी छा जाता है।
प्राइवेट नौकरी की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि इसमें आदमी अपना समय ही नहीं, अपनी निश्चितता भी बेचता है। महीने की पहली तारीख को आने वाली तनख्वाह जितनी सुखद लगती है, उसके पीछे उतनी ही अनिश्चितता छिपी रहती है। सुबह समय पर दफ्तर पहुँचना, लक्ष्य पूरा करना, मीटिंग में उपस्थित रहना, रिपोर्ट देना, फोन उठाना, ईमेल का जवाब देना और बॉस की अपेक्षाओं को समझना—यह सब नौकरी का दिखाई देने वाला हिस्सा है। जो दिखाई नहीं देता, वह है नौकरी बचाए रखने की लगातार चलती हुई चिंता। आदमी काम केवल इसलिए नहीं करता कि काम पूरा हो जाए, बल्कि इसलिए भी करता है कि अगले महीने भी उसकी मेज, उसकी कुर्सी और उसके वेतन का अधिकार बना रहे।
प्राइवेट नौकरी में समय अक्सर घड़ी का नहीं, लक्ष्य का गुलाम होता है। कार्यालय से निकलने का समय भले ही शाम का हो, दिमाग की ड्यूटी कई बार रात तक चलती रहती है। मोबाइल में आया एक संदेश फिर से दफ्तर को घर में ले आता है। छुट्टी का दिन भी पूरी तरह छुट्टी नहीं रह जाता और परिवार के साथ बैठा व्यक्ति अचानक किसी जरूरी फोन का जवाब देने लगता है। शरीर घर में होता है, लेकिन मन उस फाइल, उस प्रोजेक्ट, उस डेडलाइन या अगले दिन की मीटिंग में अटका रहता है। धीरे-धीरे नौकरी केवल आठ-दस घंटे का काम नहीं रहती; वह जीवन के समय पर अपना अदृश्य अधिकार जमा लेती है।
इस व्यवस्था में उम्र भी एक विचित्र पैमाना बन जाती है। युवा कर्मचारी से ऊर्जा, गति और नई तकनीक सीखने की अपेक्षा होती है; अनुभवी कर्मचारी से परिणाम, नेतृत्व और लगातार उपयोगी बने रहने की। यानी हर उम्र में परीक्षा अलग है, लेकिन परीक्षा कभी समाप्त नहीं होती। उम्र बढ़ने के साथ आदमी अनुभव तो कमाता है, लेकिन कभी-कभी उसे यह डर भी सताने लगता है कि कहीं अनुभव की कीमत कंपनी की नजर में अधिक और उपयोगिता की अवधि कम न समझी जाने लगे। नई पीढ़ी कम वेतन में अधिक तेजी से काम कर सकती है—ऐसी धारणा यदि संगठन में जगह बना ले तो पुराने कर्मचारी के वर्षों के अनुभव के बावजूद उसके भीतर असुरक्षा जन्म ले सकती है।
प्राइवेट नौकरी का एक और दुख यह है कि यहां मेहनत और सुरक्षा हमेशा समानुपाती नहीं होतीं। कोई व्यक्ति वर्षों तक ईमानदारी से काम कर सकता है, अनेक संकटों में संस्था का साथ दे सकता है, अतिरिक्त जिम्मेदारियां उठा सकता है, फिर भी कंपनी के आर्थिक निर्णय, पुनर्गठन, तकनीकी बदलाव या पद समाप्त होने के कारण उसकी नौकरी पर प्रश्नचिह्न लग सकता है। कर्मचारी के लिए नौकरी उसका जीवन हो सकती है, लेकिन कंपनी के लिए वह व्यवसाय की एक आवश्यकता है। दोनों के रिश्ते में भावनाएं हो सकती हैं, पर अंतिम निर्णय अक्सर आर्थिक गणित करता है।
यहीं से ‘कर्मचारी’ और ‘संसाधन’ के बीच का फर्क समझ में आता है। मनुष्य अपने परिवार, बच्चों की फीस, घर के खर्च, कर्ज, माता-पिता की जरूरतों और भविष्य की योजनाओं के साथ नौकरी करता है; संस्था उसे पद, भूमिका, लागत और प्रदर्शन के मानकों से देखती है। कर्मचारी के लिए वेतन बंद होना घर की रसोई पर असर डाल सकता है, जबकि कंपनी के लिए किसी पद को समाप्त करना कभी-कभी केवल एक प्रशासनिक निर्णय होता है। यही असमानता निजी नौकरी की चिंता को जन्म देती है।
फिर भी निजी नौकरी को केवल अभिशाप कह देना भी ठीक नहीं होगा। इसी व्यवस्था ने करोड़ों लोगों को रोजगार, आय, अनुभव, कौशल, सामाजिक गतिशीलता और बेहतर जीवन के अवसर दिए हैं। निजी क्षेत्र में प्रतिभा को आगे बढ़ने के रास्ते मिलते हैं, नई तकनीकों से परिचय होता है और कई बार सीमित योग्यता से शुरुआत करने वाला व्यक्ति अपनी मेहनत और दक्षता से बहुत आगे निकल जाता है। समस्या नौकरी करने में नहीं, उस नौकरी को जीवन की एकमात्र सुरक्षा मान लेने में है।
इसलिए शायद प्राइवेट नौकरी में काम करने वाले व्यक्ति को ढिबरी की तरह केवल बाहर से मिलने वाली ऊर्जा पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। उसे अपनी ऊर्जा का कुछ हिस्सा अपने भीतर भी जमा करना चाहिए—नए कौशल में, बचत में, स्वास्थ्य में, संबंधों में और किसी वैकल्पिक संभावना में। नौकरी रहे तो जीवन बेहतर चले और नौकरी चली जाए तो जीवन रुक न जाए—आर्थिक स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ शायद यही है। तनख्वाह जरूरी है, लेकिन तनख्वाह से बड़ी चीज वह क्षमता है जिससे आदमी दोबारा कमाने की स्थिति में रह सके।
आखिरकार प्राइवेट नौकरी की दुनिया में सबसे बड़ा संकट बेरोजगारी का नहीं, ‘कभी भी नौकरी चली जाने’ की आशंका का है। यह आशंका आदमी को लगातार जलाती रहती है, ठीक वैसे ही जैसे ढिबरी की लौ तेल खत्म होने से पहले भी यह जानती रहती है कि उसका अस्तित्व तेल पर निर्भर है। बिजली का बल्ब अपनी रोशनी पर गर्व कर सकता है, लेकिन उसे यह भी मालूम है कि स्विच उसके हाथ में नहीं है। शायद निजी नौकरी की सबसे बड़ी सच्चाई यही है—हम काम करते हैं, कमाते हैं, आगे बढ़ते हैं, सपने देखते हैं; लेकिन जिस संस्थान से हमारी रोशनी आती है, उसके स्विच पर हमारा अधिकार हमेशा नहीं होता। इसलिए समझदार नौकरीपेशा व्यक्ति का लक्ष्य केवल अच्छी नौकरी पाना नहीं होना चाहिए, बल्कि ऐसी स्थिति बनाना भी होना चाहिए कि एक दिन स्विच बंद हो जाए तो भी उसके जीवन में पूरा अंधेरा न उतरे।

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