रविवार, 25 अक्टूबर 2026

निठल्ले के नोट्स - मौत का एक दिन मुतइयन है..

### मौत के बहाने हज़ार, ज़िंदगी का भरोसा नहीं: मृत्यु के अजीबोगरीब कारणों पर एक चिंतन

मौत कैसे आती है, यह सवाल जितना पुराना है, उतना ही रहस्यमय भी। कोई बरसों बिस्तर पर पड़े रहने के बाद अंतिम साँस लेता है, तो कोई सुबह घर से हँसते हुए निकलता है और शाम तक उसकी मौत की खबर घर पहुँच जाती है। कोई गंभीर बीमारी से जूझते हुए भी वर्षों तक जीवित रहता है, तो कोई मामूली-सी दिखने वाली घटना का शिकार होकर दुनिया से विदा हो जाता है। कभी-कभी मृत्यु का कारण इतना विचित्र होता है कि पहली बार सुनने पर विश्वास करना कठिन हो जाता है। बिहार के मुजफ्फरपुर से आई वह खबर, जिसमें कथित तौर पर घर की तीसरी मंजिल से गुटखा थूकने के दौरान हाईटेंशन बिजली की लाइन की चपेट में आने से एक व्यक्ति की मौत हो गई, इसी विडंबना की ओर हमारा ध्यान खींचती है। घटना के सभी विवरणों की स्वतंत्र पुष्टि किए बिना इसे अंतिम रूप से स्थापित तथ्य मानना उचित नहीं होगा, लेकिन इससे उभरने वाला सवाल बिल्कुल वास्तविक है—आखिर मौत कब, कहाँ और किस बहाने आ जाए, इसका अनुमान लगाना इतना कठिन क्यों है?

मृत्यु के बारे में हमारी एक सहज धारणा है कि बड़ी मौत के पीछे कोई बड़ा कारण होगा। लंबी बीमारी, गंभीर दुर्घटना, युद्ध, प्राकृतिक आपदा या कोई असाध्य रोग। लेकिन वास्तविक जीवन इस धारणा को बार-बार चुनौती देता है। कभी एक छोटी-सी लापरवाही जीवन की पूरी कहानी समाप्त कर देती है, तो कभी मामूली-सी घटना ऐसे खतरनाक मोड़ पर पहुँच जाती है जिसकी कल्पना भी नहीं की गई थी। जिस काम को व्यक्ति रोजमर्रा की आदत समझकर करता है, वही कभी-कभी उसके जीवन का आखिरी काम बन जाता है। मुजफ्फरपुर की कथित घटना में भी विचित्रता इसी बात की है कि गुटखा थूकना अपने आप में किसी को जीवन के लिए खतरा नहीं लगता, लेकिन यदि कोई व्यक्ति ऊँचाई से थूकते समय बिजली की हाईटेंशन लाइन के निकट पहुँच जाए या उसके संपर्क में आ जाए, तो परिणाम जानलेवा हो सकता है। यहाँ असली खतरा गुटखा नहीं, बल्कि बिजली की उच्च वोल्टेज वाली लाइन के आसपास मौजूद जोखिम और उसके प्रति बरती गई असावधानी है।

मृत्यु का सबसे विचित्र पक्ष यही है कि वह हमेशा अपने आकार के अनुपात में चेतावनी नहीं देती। जिस खतरे को हम बड़ा मानते हैं, उससे बचने के लिए सतर्क रहते हैं; जिस खतरे को छोटा समझते हैं, उसकी अनदेखी कर देते हैं। सड़क पर तेज रफ्तार से वाहन चलाते समय हमें दुर्घटना का अंदेशा रहता है, लेकिन चलते-चलते मोबाइल देखने, सीढ़ियों पर जल्दबाजी करने, छत की मुंडेर के पास झुकने या बिजली के तारों के निकट जाने में हम उतने सतर्क नहीं रहते। जबकि दुर्घटनाओं की दुनिया में खतरे का आकार नहीं, परिस्थितियों का मेल निर्णायक हो सकता है। एक गलत कदम, शरीर का असंतुलन, किसी वस्तु का अप्रत्याशित रूप से गिरना या कुछ सेकंड की असावधानी ऐसी घटनाओं को जन्म दे सकती है जिनके परिणाम वापस नहीं लिए जा सकते।

मृत्यु के ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है, जिनमें जान जाने का कारण पहली नजर में मामूली या अप्रत्याशित लगता है। मसलन, पेड़ से नारियल या भारी डाल गिरने से किसी की जान चली जाना। चिकित्सा साहित्य में नारियल और पेड़ की शाखा गिरने से सिर में गंभीर चोट लगने के कारण हुई मौतों के मामले दर्ज हैं। पेड़ के नीचे बैठना, जो सामान्यतः आराम करने का एक सहज तरीका है, असामान्य परिस्थितियों में जानलेवा बन सकता है। इसी तरह सीढ़ी या ऊँचाई पर काम करते समय गिरना भी जान ले सकता है। दक्षिण ऑस्ट्रेलिया में 1999 से 2018 के बीच दर्ज ऐसे 12 मामलों के एक अध्ययन में आठ मौतें सीढ़ी से गिरने और चार बिजली के झटके से हुई थीं। इन घटनाओं की विडंबना यह है कि व्यक्ति कोई असाधारण काम नहीं कर रहा होता; वह बस अपने रोजमर्रा के जीवन का एक सामान्य काम कर रहा होता है।

कभी मौत बिजली के तार से आती है, कभी पानी में डूबने से, कभी भोजन गले में अटकने से और कभी किसी ऐसी वस्तु के गिरने से, जिसके बारे में हमने सोचा भी नहीं होता। बिजली के मामले में तो खतरा विशेष रूप से धोखा देने वाला है। तार टूटा हुआ हो, जमीन पर गिरा हो या ऊपर से गुजर रहा हो, तब भी वह दूर से सुरक्षित दिखाई दे सकता है। बारिश में लटकता नंगा तार, खेत में गिरा बिजली का तार या मकान की छत के ऊपर से गुजरती हाईटेंशन लाइन किसी भी क्षण गंभीर खतरा बन सकती है। मुजफ्फरपुर में ही अलग-अलग घटनाओं में बिजली के तारों की चपेट में आने से लोगों की जान जाने की खबरें सामने आती रही हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि बिजली से जुड़ी हर दुर्घटना को केवल व्यक्ति की लापरवाही कहा जाए। कई बार खुले तार, खराब रखरखाव, असुरक्षित निर्माण और बिजली विभाग की संभावित चूक भी जिम्मेदार हो सकती है। दुर्घटना की असली वजह का निर्धारण जाँच के बाद ही होना चाहिए।

मौत की अनिश्चितता का एक दूसरा पहलू प्राकृतिक शक्तियाँ हैं। आकाश में चमकती बिजली को हम दूर से देखते हैं और अक्सर मान लेते हैं कि वह कहीं और गिरेगी। लेकिन वज्रपात सीधे किसी व्यक्ति को प्रभावित कर सकता है, जबकि तूफान, बाढ़, चक्रवात और ओलावृष्टि जैसी घटनाएँ एक साथ अनेक लोगों की जान ले सकती हैं। विश्व मौसम विज्ञान संगठन से जुड़े एक अध्ययन में मौसम संबंधी आपदाओं के इतिहास में बिजली गिरने, चक्रवात, बवंडर और ओलावृष्टि से हुई बड़ी जनहानियों का विश्लेषण किया गया है। प्रकृति की इन घटनाओं और किसी व्यक्ति के साथ हुई आकस्मिक दुर्घटना में अंतर अवश्य है, लेकिन दोनों हमें यह समझाते हैं कि मनुष्य की भविष्यवाणी करने की क्षमता की सीमाएँ हैं। हम खतरे की संभावना का अनुमान लगा सकते हैं, उससे बचने की तैयारी कर सकते हैं, पर हर घटना का समय और परिणाम निश्चित रूप से नहीं बता सकते।

कुछ मौतें तो ऐसी परिस्थितियों में होती हैं, जिनमें एक व्यक्ति को बचाने की कोशिश करते हुए दूसरे लोग भी जान गँवा देते हैं। दिसंबर 2025 में मुजफ्फरपुर जिले के मलकोनी गाँव में खेत में गिरे बिजली के तार की चपेट में पहले एक व्यक्ति आया और उसे बचाने के प्रयास में उसके बेटे तथा एक रिश्तेदार की भी मौत हो गई। यह केवल दुर्घटना नहीं, मानवीय संवेदना और खतरे की भयावहता का उदाहरण भी है। किसी अपने को संकट में देखकर व्यक्ति स्वाभाविक रूप से उसे बचाने दौड़ता है, लेकिन बिजली के खुले तार के मामले में यही सहज प्रतिक्रिया दूसरे जीवन को भी संकट में डाल सकती है। ऐसे समय में बिजली विभाग या प्रशिक्षित आपातकालीन सहायता को बुलाना और बिजली की आपूर्ति सुरक्षित रूप से बंद कराए बिना तार के पास न जाना अत्यंत जरूरी है। करंट से प्रभावित व्यक्ति को बचाने के लिए खुद बिजली के संपर्क में आ जाना किसी त्रासदी को कई गुना बढ़ा सकता है।

कभी-कभी मृत्यु के पीछे किसी बड़ी दुर्घटना से ज्यादा एक छोटी-सी चूक होती है। गाड़ी चलाते समय एक क्षण के लिए आँख सड़क से हट जाना, छत की मुंडेर पर झुककर कोई वस्तु उठाना, चलते वाहन से बाहर निकलना, गलत तरीके से बिजली का उपकरण ठीक करना या किसी अपरिचित जगह पर जोखिम का अनुमान लगाए बिना कदम बढ़ा देना—इनमें से प्रत्येक स्थिति का परिणाम सामान्य भी हो सकता है और असाधारण रूप से गंभीर भी। लेकिन यह कहना कि हर आकस्मिक मृत्यु का कारण लापरवाही ही है, मृत व्यक्ति के प्रति अन्याय होगा। हर दुर्घटना में कई कारक काम करते हैं। कभी मानवीय चूक होती है, कभी तकनीकी खराबी, कभी असुरक्षित व्यवस्था और कभी परिस्थितियों का ऐसा संयोग, जिसे पहले से पहचानना मुश्किल था। इसलिए दुर्घटना के बाद केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं कि व्यक्ति ने क्या गलती की; यह भी पूछना चाहिए कि व्यवस्था में कौन-सी खामी थी और भविष्य में ऐसी घटना को कैसे रोका जा सकता है।

यहाँ एक दिलचस्प मनोवैज्ञानिक प्रश्न भी उठता है। जब किसी व्यक्ति की मौत लंबी बीमारी से होती है, तो लोग उसके लिए मानसिक रूप से कुछ हद तक तैयार हो सकते हैं। लेकिन जब मौत किसी विचित्र, अप्रत्याशित या मामूली दिखने वाली घटना से होती है, तो सदमा अधिक गहरा हो सकता है। मनुष्य अपने जीवन को एक क्रम में देखना चाहता है। वह मानता है कि सुबह उठेगा, काम पर जाएगा, लौटकर भोजन करेगा, परिवार से बात करेगा और अगले दिन फिर यही सब करेगा। दिनचर्या हमें सुरक्षा का एहसास देती है। हम सोचते हैं कि जो काम कल किया था, उसे आज भी कर सकेंगे। लेकिन जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि नियमितता सुरक्षा की गारंटी नहीं है। हर दिन का सूरज निकलना इस बात का प्रमाण नहीं कि हर शाम हम सुरक्षित घर लौटेंगे। फिर भी इसी अनिश्चितता के बीच मनुष्य योजनाएँ बनाता है, सपने देखता है, घर बनाता है, बच्चों का भविष्य सँवारता है और आने वाले वर्षों के लिए तैयारी करता है। शायद जीवन की खूबसूरती भी इसी में है कि उसकी अनिश्चितता के बावजूद हम जीने की इच्छा नहीं छोड़ते।

मृत्यु के विचित्र कारणों पर चर्चा करते हुए अंधविश्वास की ओर चले जाना भी आसान है। कोई कह सकता है कि जिसकी जितनी उम्र लिखी है, वह उतना ही जिएगा; किसी की मृत्यु का समय पहले से तय है; या जब मौत आती है तो कोई बहाना खोज लेती है। ये बातें आस्था, दर्शन और सांस्कृतिक परंपराओं का हिस्सा हो सकती हैं, लेकिन इन्हें वैज्ञानिक रूप से सिद्ध तथ्य नहीं माना जा सकता। चिकित्सा विज्ञान मृत्यु के जैविक कारणों की पड़ताल करता है, जबकि दुर्घटना की जाँच यह पता लगाने का प्रयास करती है कि घटना कैसे हुई और उसे रोका जा सकता था या नहीं। इन दोनों दृष्टियों का उद्देश्य मृत्यु को कोई रहस्यमय नियति घोषित करना नहीं, बल्कि उसके कारणों को समझना और जहाँ संभव हो, जीवन बचाना है।

इसलिए यह कहना कि मौत के बहाने हजार हैं, एक प्रभावशाली मुहावरा तो है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि मृत्यु से बचने के लिए कुछ किया ही नहीं जा सकता। हम सड़क सुरक्षा के नियमों का पालन कर सकते हैं, बिजली के तारों से दूरी रख सकते हैं, मकानों की छत और बालकनी को सुरक्षित बनवा सकते हैं, खराब विद्युत व्यवस्था की शिकायत कर सकते हैं, जोखिम भरे काम प्रशिक्षित लोगों से करा सकते हैं और आपातकालीन स्थितियों में घबराहट के बजाय सही कदम उठा सकते हैं। गुटखा थूकने जैसी आदत के संदर्भ में भी दो स्तरों पर विचार करना जरूरी है। पहला, गुटखा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है और उसका सेवन छोड़ना चाहिए। दूसरा, किसी भी ऊँचाई से थूकने या वस्तु फेंकने से पहले नीचे और आसपास की परिस्थितियों का ध्यान रखना चाहिए। आदत छोटी हो सकती है, लेकिन उसके साथ जुड़ी परिस्थिति का जोखिम छोटा हो, यह जरूरी नहीं।

मुजफ्फरपुर की कथित घटना हमें अंततः एक गहरे प्रश्न के सामने खड़ा करती है—क्या मनुष्य सचमुच अपनी मृत्यु के प्रति असहाय है? पूरी तरह नहीं। वह मृत्यु के हर कारण को नियंत्रित नहीं कर सकता, लेकिन अनेक खतरों को कम कर सकता है। वह यह तय नहीं कर सकता कि उसके जीवन में कोई दुर्घटना कभी नहीं होगी, लेकिन वह अपने घर, कार्यस्थल, सड़क और आसपास के वातावरण को अधिक सुरक्षित बनाने में योगदान दे सकता है। मौत की अनिश्चितता को स्वीकार करना और सुरक्षा के प्रति लापरवाह हो जाना दो बिल्कुल अलग बातें हैं।

जीवन का कोई भरोसा नहीं—यह बात सुनने में जितनी दार्शनिक लगती है, उतनी ही व्यावहारिक भी है। लेकिन इसका अर्थ जीवन को संयोग के हवाले कर देना नहीं होना चाहिए। बल्कि इस अनिश्चितता के कारण ही हर जीवन अधिक मूल्यवान हो जाता है। जो व्यक्ति आज हमारे साथ बैठकर चाय पी रहा है, जरूरी नहीं कि कल भी उसी जगह मिले; जो व्यक्ति सुबह किसी साधारण काम के लिए घर से निकला है, उसके लिए भी हमारी शुभकामना यही होती है कि वह सकुशल लौटे। इसलिए मृत्यु के अजीबोगरीब कारणों पर आश्चर्य व्यक्त करने के साथ हमें जीवन की साधारण सावधानियों को भी गंभीरता से लेना चाहिए। आखिर मृत्यु का कारण कभी असाधारण हो सकता है, लेकिन जीवन बचाने की समझ अक्सर बहुत साधारण होती है—खतरे को पहचानना, जोखिम से दूरी रखना, दूसरों की सुरक्षा का ध्यान रखना और छोटी-सी असावधानी को मामूली समझकर नजरअंदाज न करना। मौत कब आएगी, यह हमारे हाथ में नहीं; लेकिन जीवन को कितना सुरक्षित, सजग और सार्थक बनाया जाए, इसमें हमारा हाथ जरूर है।

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