शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

निठल्ले के नोट्स - उम्र लंबी हो या जिंदगी

### आदमी को कितना जीना चाहिए: उम्र लंबी हो या जिंदगी?

आदमी को कितना जीना चाहिए, सत्तर साल, अस्सी साल, नब्बे साल या सौ साल? क्या सौ साल जी लेने वाला व्यक्ति अस्सी साल जीने वाले व्यक्ति से अधिक सफल माना जाएगा? क्या लंबी उम्र अपने आप में उपलब्धि है, या उपलब्धि इस बात में है कि आदमी अपनी उम्र का कितना हिस्सा सचमुच जी पाता है? ये प्रश्न देखने में जितने सरल लगते हैं, जीवन की गहराइयों में उतरने पर उतने ही जटिल हो जाते हैं। मनुष्य सदियों से अमर होने का सपना देखता आया है। उसने मृत्यु से बचने के लिए औषधियों, जड़ी-बूटियों, योग, तपस्या, चिकित्सा विज्ञान और तकनीक तक का सहारा लिया है। आज भी उम्र बढ़ाने के लिए नए अनुसंधान हो रहे हैं, लेकिन मूल प्रश्न अब भी वहीं खड़ा है कि आखिर जीवन की उचित अवधि कितनी होनी चाहिए और लंबी उम्र का वास्तविक लाभ क्या है? जीवन की अवधि का कोई एक आदर्श मानक नहीं हो सकता, क्योंकि मनुष्य की शारीरिक स्थिति, मानसिक संतुष्टि, सामाजिक परिस्थितियाँ और जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण अलग-अलग होते हैं। फिर भी इतना तो कहा ही जा सकता है कि उम्र बढ़ने की इच्छा स्वाभाविक है, लेकिन केवल उम्र के आंकड़े को जीवन की सफलता मान लेना उचित नहीं है।

प्रकृति ने मनुष्य को एक सीमित जीवन दिया है, लेकिन उस सीमा का कोई निश्चित कैलेंडर उसके हाथ में नहीं सौंपा। कोई शिशु जन्म के कुछ समय बाद ही दुनिया से विदा हो जाता है, कोई युवावस्था में दुर्घटना या बीमारी का शिकार बन जाता है, तो कोई नब्बे या सौ वर्ष की उम्र तक सक्रिय रहता है। इन अलग-अलग जीवन यात्राओं के बीच यह तय करना संभव नहीं है कि किस व्यक्ति ने उतना ही जीवन पाया, जितना उसे मिलना चाहिए था। जीवन की जैविक अवधि और जीवन की अनुभूत अवधि दो अलग-अलग बातें हैं। किसी के लिए पचास वर्ष भी अनुभवों, प्रेम, संघर्ष, उपलब्धियों और संतोष से भरे हो सकते हैं, जबकि कोई व्यक्ति अस्सी वर्ष जीकर भी लगातार अभाव, अकेलेपन और निरर्थकता का अनुभव कर सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि कम उम्र में मृत्यु को उचित या वांछनीय मान लिया जाए। समय से पहले मृत्यु अपने साथ अधूरे सपने, बिछोह और संभावनाओं का नुकसान लेकर आती है। इसका अर्थ केवल इतना है कि जीवन की गुणवत्ता का मूल्यांकन उसकी अवधि से अलग करके भी करना चाहिए।

विज्ञान की दृष्टि से देखें तो मनुष्य की जीवन प्रत्याशा पिछले एक-दो सौ वर्षों में उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है। स्वच्छता, टीकाकरण, पोषण, प्रसूति सेवाओं, एंटीबायोटिक दवाओं और आधुनिक चिकित्सा ने ऐसी अनेक बीमारियों से होने वाली मौतों को कम किया है, जो कभी सामान्य थीं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया में जन्म के समय औसत जीवन प्रत्याशा 2023 में लगभग 73.3 वर्ष थी, जबकि स्वस्थ जीवन प्रत्याशा लगभग 62.8 वर्ष थी। इन दोनों आंकड़ों के बीच का अंतर एक महत्त्वपूर्ण सच्चाई उजागर करता है। औसतन मनुष्य जितने वर्ष जीवित रहता है, वे सभी वर्ष जरूरी नहीं कि पूर्ण स्वास्थ्य में गुजरें। जीवन के अंतिम वर्षों में अनेक लोगों को हृदय रोग, मधुमेह, गठिया, दृष्टि या श्रवण संबंधी समस्याओं, स्मृति में गिरावट और दूसरी दीर्घकालिक बीमारियों का सामना करना पड़ता है। भारत में भी विश्व स्वास्थ्य संगठन के उपलब्ध अनुमानों के अनुसार 2023 में जन्म के समय स्वस्थ जीवन प्रत्याशा लगभग 60.6 वर्ष थी। इन आंकड़ों को किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत आयु-सीमा नहीं समझना चाहिए। जीवन प्रत्याशा एक आबादी का सांख्यिकीय औसत है, किसी खास व्यक्ति की मृत्यु की तारीख बताने वाला अनुमान नहीं।

यहाँ एक बुनियादी प्रश्न उठता है कि क्या मनुष्य को केवल अधिक वर्ष जीने का प्रयास करना चाहिए या उन वर्षों को स्वस्थ बनाए रखने का भी? मान लीजिए कि चिकित्सा विज्ञान किसी व्यक्ति का जीवन दस वर्ष बढ़ा देता है, लेकिन उन दस वर्षों का अधिकांश हिस्सा बिस्तर पर, असहनीय पीड़ा में या दूसरों पर पूरी तरह निर्भर रहकर गुजरता है। क्या इसे पूरी तरह असफल उपलब्धि कहा जा सकता है? नहीं, क्योंकि बीमारी या दिव्यांगता के साथ जीने वाले व्यक्ति का जीवन भी मूल्यवान है और उसकी गरिमा किसी स्वस्थ व्यक्ति से कम नहीं होती। लेकिन यह जरूर पूछा जाना चाहिए कि क्या स्वास्थ्य सेवाओं का लक्ष्य केवल मृत्यु को कुछ समय टालना है, या व्यक्ति को अधिक समय तक स्वतंत्र, सक्रिय, निर्णय लेने में सक्षम और सामाजिक जीवन से जुड़ा बनाए रखना भी है। आधुनिक चिकित्सा और स्वस्थ वृद्धावस्था की अवधारणा इसी दूसरे लक्ष्य पर भी जोर देती है। दीर्घायु का अर्थ बीमारी से पूरी तरह मुक्त जीवन नहीं, बल्कि जहाँ तक संभव हो, शारीरिक और मानसिक क्षमताओं को बनाए रखना तथा बीमारी होने पर भी सम्मानजनक जीवन जीने की परिस्थितियाँ उपलब्ध कराना है।

सवाल यह भी है कि क्या सौ वर्ष तक जीना मनुष्य की स्वाभाविक सीमा है? इतिहास में सौ वर्ष से अधिक जीने वाले अनेक लोगों के प्रमाण मिलते हैं। फ्रांस की जीन काल्मां का जन्म 1875 में हुआ था और 1997 में 122 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हुई। उन्हें आधुनिक अभिलेखों में सबसे अधिक आयु तक जीवित रहने वाले प्रमाणित व्यक्तियों में गिना जाता है। लेकिन किसी एक व्यक्ति का असाधारण जीवन यह साबित नहीं करता कि प्रत्येक मनुष्य सौ या उससे अधिक वर्ष तक जीवित रह सकता है। मनुष्य की अधिकतम संभावित आयु और आबादी की औसत जीवन प्रत्याशा अलग-अलग अवधारणाएँ हैं। किसी समाज में औसत जीवन प्रत्याशा बढ़ने का अर्थ यह नहीं कि उस समाज के सभी लोग अत्यंत वृद्धावस्था तक पहुँचेंगे। इसी तरह, किसी व्यक्ति के माता-पिता या दादा-दादी का लंबा जीवन उसकी अपनी आयु की गारंटी नहीं है। आनुवंशिकता का योगदान होता है, लेकिन जीवनशैली, पर्यावरण, आर्थिक स्थिति, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच और संयोग भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए लंबी उम्र का कोई जादुई नुस्खा या निश्चित सूत्र उपलब्ध नहीं है।

उम्र बढ़ाने की इच्छा के पीछे केवल मृत्यु का भय नहीं, बल्कि जीवन से मोह भी है। आदमी अपने बच्चों को बड़ा होते देखना चाहता है, उनके विवाह में शामिल होना चाहता है, नाती-पोतों के साथ समय बिताना चाहता है, अपनी अधूरी किताब लिखना चाहता है, अपने अनुभवों को अगली पीढ़ी तक पहुँचाना चाहता है। वह अपने जीवन में आए परिवर्तनों का साक्षी बने रहना चाहता है। जिस व्यक्ति ने अभावों में जीवन शुरू किया हो, वह अपनी मेहनत से परिवार को संपन्न होते देखना चाहता है। जिसने बच्चों की शिक्षा के लिए अपनी इच्छाओं का त्याग किया हो, वह उनकी सफलता के दिन जीना चाहता है। जिसने समाज में कुछ योगदान दिया हो, वह उस योगदान के परिणाम देखना चाहता है। इस अर्थ में लंबी उम्र की इच्छा केवल अपने शरीर को बचाए रखने की इच्छा नहीं, बल्कि अपनी संभावनाओं को पूरा करने की आकांक्षा भी है। मनुष्य जीना चाहता है क्योंकि उसे लगता है कि अभी बहुत कुछ करना बाकी है। लेकिन यही इच्छा कभी-कभी अंतहीन दौड़ भी बन जाती है। आदमी वर्तमान को भविष्य के लिए स्थगित करता रहता है और जब भविष्य आता है, तब तक वर्तमान का आनंद लेने की उसकी क्षमता कम होने लगती है।

जीवन की विडंबना देखिए कि युवावस्था में आदमी समय से परेशान रहता है और वृद्धावस्था में समय के बीत जाने से। युवावस्था में उसे लगता है कि दिन छोटे हैं, काम बहुत हैं और जीवन में आगे निकलने के लिए पर्याप्त समय नहीं है। वह धन कमाने, पद पाने, मकान बनाने, बच्चों को स्थापित करने और सामाजिक प्रतिष्ठा अर्जित करने में लगा रहता है। उम्र के मध्य भाग में पहुँचकर उसे पता चलता है कि जिन लक्ष्यों के लिए उसने जीवन का बड़ा हिस्सा खर्च किया, उनमें से अनेक पूरे हो चुके हैं, कुछ अब महत्त्वहीन लगने लगे हैं और कुछ की कीमत अपेक्षा से अधिक चुकानी पड़ी है। तब वह सोचने लगता है कि क्या जीवन का उद्देश्य केवल उपलब्धियाँ अर्जित करना था? क्या जिस परिवार के लिए उसने दिन-रात काम किया, उसके साथ पर्याप्त समय भी बिताया? क्या वह अपने शरीर की देखभाल करता रहा या उसे केवल काम करने की मशीन समझता रहा? क्या उसने अपनी पसंद की किताबें पढ़ीं, मित्रों के साथ बैठा, प्रकृति को देखा, संगीत सुना या बिना किसी उत्पादक उद्देश्य के भी कभी प्रसन्न रहना सीखा? उम्र का एक बड़ा संकट यह है कि जब आदमी को समय की कीमत समझ में आती है, तब उसे पहली बार यह भी महसूस होता है कि समय वापस नहीं खरीदा जा सकता।

इसीलिए यह प्रश्न कि आदमी को कितना जीना चाहिए, दरअसल इस प्रश्न से जुड़ा है कि उसे किस तरह जीना चाहिए। मान लीजिए किसी व्यक्ति को यह निश्चित रूप से बता दिया जाए कि वह नब्बे वर्ष तक जीवित रहेगा। क्या वह निश्चिंत होकर अपने स्वास्थ्य की उपेक्षा कर सकता है? क्या वह अपने संबंधों को सुधारने, अपने अधूरे काम पूरे करने या अपने भीतर की बेचैनी को समझने के लिए अस्सी वर्ष की उम्र तक प्रतीक्षा करेगा? दूसरी ओर, यदि किसी को यह बताया जाए कि उसके पास केवल दस वर्ष हैं, तो संभव है कि वह जीवन को नए दृष्टिकोण से देखने लगे। लेकिन वास्तविकता यह है कि किसी व्यक्ति को अपनी मृत्यु की निश्चित तारीख मालूम नहीं होती। इसलिए बुद्धिमानी यह नहीं कि हम अपनी मृत्यु का अनुमान लगाकर जीवन की योजना बनाएँ, बल्कि यह कि अनिश्चितता को स्वीकार करते हुए आज के जीवन को अर्थपूर्ण बनाने का प्रयास करें। इसका अर्थ हर दिन को आखिरी दिन मानकर जल्दबाजी में जीना भी नहीं है। जीवन में भविष्य के लिए योजना बनाना, बचत करना, बच्चों की शिक्षा और परिवार की सुरक्षा के लिए काम करना उतना ही जरूरी है, जितना वर्तमान के सुख और संबंधों को महत्त्व देना। विवेक इसी संतुलन में है।

एक और प्रश्न है कि क्या लंबी उम्र हमेशा सुखद होती है? इसका उत्तर वृद्ध लोगों के अनुभवों में खोजा जा सकता है। उम्र बढ़ने के साथ व्यक्ति के अनुभव और समझ बढ़ सकते हैं, लेकिन उसके मित्र और जीवनसाथी बिछुड़ सकते हैं, बच्चे काम के कारण दूर रह सकते हैं, सामाजिक भूमिका बदल सकती है और शरीर पहले जैसी सक्रियता का साथ छोड़ सकता है। कभी-कभी वह आर्थिक रूप से सुरक्षित होते हुए भी भावनात्मक रूप से अकेला पड़ जाता है। उसे लगता है कि दुनिया तेजी से बदल रही है और उसके अनुभवों का मूल्य घटता जा रहा है। दूसरी ओर, ऐसे अनेक वृद्ध लोग भी हैं जो पढ़ते हैं, लिखते हैं, सामाजिक काम करते हैं, नई चीजें सीखते हैं और परिवार तथा समुदाय के लिए उपयोगी बने रहते हैं। अतः वृद्धावस्था अपने आप में न तो अभिशाप है, न वरदान। उसके अनुभव इस बात पर निर्भर करते हैं कि व्यक्ति के स्वास्थ्य और आर्थिक सुरक्षा के साथ उसके संबंधों, सामाजिक सम्मान, मानसिक सक्रियता और जीवन के प्रति दृष्टिकोण की स्थिति कैसी है। समाज का दायित्व भी केवल वृद्ध लोगों की उम्र बढ़ाने तक सीमित नहीं होना चाहिए। उसे ऐसा वातावरण बनाना चाहिए जिसमें वृद्ध व्यक्ति स्वयं को अनावश्यक, बोझ या उपेक्षित महसूस न करे।

यहाँ एक व्यावहारिक पक्ष भी है। आज चिकित्सा विज्ञान के विस्तार के साथ जीवन को लंबे समय तक बनाए रखने की क्षमता बढ़ी है, लेकिन इसके साथ उपचार की लागत, परिवार की जिम्मेदारी और जीवन के अंतिम चरण में चिकित्सा संबंधी निर्णयों की जटिलता भी बढ़ी है। किसी गंभीर बीमारी में उपचार कितना कराया जाए, किस स्तर तक जीवनरक्षक उपाय अपनाए जाएँ और मरीज की अपनी इच्छा का कितना सम्मान हो, ये प्रश्न परिवारों के सामने कठिन परिस्थितियाँ पैदा करते हैं। इनका उत्तर केवल यह कहकर नहीं दिया जा सकता कि जीवन हर कीमत पर बचाया जाना चाहिए, और न यह कहकर कि अधिक उम्र हो जाने पर उपचार का कोई अर्थ नहीं रह जाता। हर व्यक्ति का जीवन अपने आप में मूल्यवान है। उपचार का निर्णय बीमारी की प्रकृति, ठीक होने की संभावना, उपचार से मिलने वाले लाभ, संभावित कष्ट, मरीज की इच्छा और चिकित्सकीय सलाह को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। केवल उम्र के आधार पर किसी व्यक्ति के जीवन को कम महत्त्व देना अनुचित है। साथ ही, गंभीर बीमारी में उपचार के उद्देश्य पर ईमानदारी से बातचीत करना, मरीज की गरिमा बनाए रखना और अनावश्यक पीड़ा को कम करने वाली उपशामक देखभाल उपलब्ध कराना भी महत्त्वपूर्ण है।

अगर आदमी लंबी उम्र चाहता है, तो उसे अपने जीवन के उन पक्षों पर ध्यान देना चाहिए जिन पर उसका कुछ नियंत्रण है। संतुलित भोजन, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद, तंबाकू से दूरी, शराब से परहेज या उसका जोखिमपूर्ण सेवन न करना, रक्तचाप, रक्त शर्करा और कोलेस्ट्रॉल की निगरानी तथा जरूरत के अनुसार चिकित्सकीय जाँच स्वस्थ जीवन की संभावनाएँ बढ़ा सकते हैं। इसके साथ मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक संबंध और तनाव से निपटने की क्षमता भी महत्त्वपूर्ण हैं। नियमित व्यायाम करने वाला व्यक्ति भी बीमार पड़ सकता है और अनुशासित जीवन जीने वाला व्यक्ति भी कम उम्र में मृत्यु का शिकार हो सकता है। इसलिए स्वस्थ जीवनशैली को अमरता की गारंटी नहीं, बल्कि बेहतर स्वास्थ्य और जोखिम कम करने का साधन समझना चाहिए। शरीर की देखभाल का उद्देश्य केवल अधिक जन्मदिन मनाना नहीं, बल्कि रोजमर्रा के काम करने, अपने प्रियजनों के साथ समय बिताने और अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने की क्षमता को यथासंभव लंबे समय तक सुरक्षित रखना होना चाहिए।

लेकिन जीवन केवल शरीर का नाम नहीं है। अगर कोई व्यक्ति वर्षों तक जीवित तो रहता है, मगर उसके पास बातचीत करने के लिए कोई नहीं, साझा करने के लिए कोई अनुभव नहीं और सुबह उठने का कोई उद्देश्य नहीं, तो उसके जीवन में एक गहरा खालीपन पैदा हो सकता है। दूसरी ओर, सीमित संसाधनों वाला व्यक्ति भी मित्रता, पारिवारिक निकटता, रचनात्मकता और सामाजिक सहभागिता के कारण अपने जीवन को समृद्ध अनुभव कर सकता है। इसका मतलब यह नहीं कि गरीबी या बीमारी को रोमानी ढंग से प्रस्तुत किया जाए। आर्थिक सुरक्षा और स्वास्थ्य की सुविधा जीवन की गुणवत्ता के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। लेकिन धन और सुविधाओं के साथ-साथ मनुष्य को अपने जीवन में संबंधों, अर्थ और सहभागिता के लिए भी जगह बनानी पड़ती है। केवल इसलिए कि आदमी अधिक धन अर्जित कर सके, उसे अधिक समय तक जीवित रहने की इच्छा नहीं करनी चाहिए; और केवल इसलिए कि उसने अपने लक्ष्य हासिल नहीं किए, उसे अपने जीवन को असफल भी नहीं मानना चाहिए। जीवन की सार्थकता उपलब्धियों के साथ-साथ उन अनुभवों में भी है जिन्हें किसी पद, पुरस्कार या बैंक खाते में दर्ज नहीं किया जा सकता।

हमारे समाज में उम्र को लेकर कई धारणाएँ प्रचलित हैं। किसी व्यक्ति के साठ वर्ष पूरे होते ही उसे वृद्ध मान लिया जाता है, जबकि कोई दूसरा व्यक्ति अस्सी वर्ष की उम्र में भी सक्रिय रहता है। साठ वर्ष की आयु अनेक सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्थाओं में वृद्धावस्था से जुड़ी मानी जाती है, लेकिन जैविक वृद्धावस्था का अनुभव सभी व्यक्तियों में एक जैसा नहीं होता। व्यक्ति की कार्यक्षमता, स्वास्थ्य और परिस्थितियों में काफी अंतर हो सकता है। इसी तरह, चालीस या पचास वर्ष की आयु को जीवन का ढलान मान लेना भी उचित नहीं। यह वह समय हो सकता है जब आदमी अपने अनुभवों के आधार पर पहले से बेहतर निर्णय ले सके, अपनी रुचियों को फिर से पहचान सके और जीवन के उन हिस्सों पर ध्यान दे सके जिन्हें उसने जिम्मेदारियों के कारण पीछे छोड़ दिया था। उम्र का बढ़ना केवल क्षमताओं का घटना नहीं है; वह अनुभव, दृष्टि और प्राथमिकताओं के बदलने का अवसर भी हो सकता है। बेशक, इसके लिए स्वास्थ्य, आर्थिक सुरक्षा और सामाजिक सहयोग आवश्यक हैं।

दार्शनिक दृष्टि से देखें तो मृत्यु जीवन का विरोध मात्र नहीं, उसकी सीमा भी है। यदि जीवन अनंत होता, तो संभव है कि किसी काम को पूरा करने की तात्कालिकता कम हो जाती, संबंधों को सँभालने की जरूरत टलती रहती और हर निर्णय को अनिश्चित भविष्य पर छोड़ा जा सकता। सीमित समय का बोध हमें प्राथमिकताएँ तय करना सिखाता है। इसका अर्थ मृत्यु का महिमामंडन करना नहीं, बल्कि जीवन की नश्वरता को समझना है। हमें नहीं पता कि मृत्यु के बाद क्या है। विभिन्न धर्म और दार्शनिक परंपराएँ आत्मा, पुनर्जन्म, स्वर्ग, मुक्ति या दूसरी अवधारणाओं के माध्यम से इस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास करती हैं, लेकिन इन मान्यताओं को वैज्ञानिक रूप से सिद्ध सार्वभौमिक तथ्य नहीं माना जा सकता। इसलिए जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण चाहे धार्मिक हो या धर्मनिरपेक्ष, एक साझा प्रश्न फिर भी बना रहता है कि जो समय हमें मिला है, उसमें हम अपने और दूसरों के लिए क्या कर सकते हैं। किसी व्यक्ति के जाने के बाद उसकी आयु का आंकड़ा पीछे रह जाता है, लेकिन उसके व्यवहार, प्रेम, काम, विचार और दूसरों के जीवन पर पड़े प्रभाव की स्मृति लंबे समय तक बनी रह सकती है।

तो आखिर आदमी को कितना जीना चाहिए? इसका कोई ऐसा उत्तर नहीं दिया जा सकता जो हर व्यक्ति पर लागू हो। चिकित्सा विज्ञान का उद्देश्य असमय मृत्यु को रोकना, बीमारी का उपचार करना और स्वस्थ जीवन के वर्षों को बढ़ाना होना चाहिए। व्यक्ति का उद्देश्य अपनी परिस्थितियों के भीतर स्वास्थ्य, स्वतंत्रता, संबंधों और संतोष को यथासंभव बनाए रखना हो सकता है। समाज का उद्देश्य यह होना चाहिए कि हर व्यक्ति को सम्मानजनक जीवन जीने के अवसर मिलें, चाहे वह युवा हो या वृद्ध, स्वस्थ हो या बीमार, आर्थिक रूप से संपन्न हो या कमजोर। सौ वर्ष जीना अपने आप में न तो सफलता का प्रमाण है, न अस्सी वर्ष में मृत्यु जीवन की असफलता का संकेत। लंबी उम्र एक अवसर है, लेकिन उस अवसर का अर्थ व्यक्ति के अनुभवों और जीवन की परिस्थितियों से तय होता है। हमें केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि हमारी उम्र कितनी लंबी होगी, बल्कि यह भी कि हम कितने समय तक अपने निर्णय स्वयं ले सकेंगे, अपने प्रियजनों से जुड़ सकेंगे, सीख सकेंगे, कुछ रच सकेंगे और अपने अस्तित्व को सार्थक महसूस कर सकेंगे।

अंततः, आदमी को उतना लंबा जीवन पाने की कामना करनी चाहिए जितना संभव हो, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी यह है कि उसके जीवन में जीने की वजह बनी रहे। उम्र का बढ़ना हमारे नियंत्रण में पूरी तरह नहीं है, मगर अपने समय का उपयोग, अपने व्यवहार में सुधार, अपने संबंधों की देखभाल और अपने शरीर के प्रति जिम्मेदारी काफी हद तक हमारे हाथ में हैं। जीवन की सफलता शायद इस बात में नहीं कि हमने कितने वर्ष पूरे किए, बल्कि इसमें है कि जो वर्ष मिले, उनमें हमने कितना प्रेम किया, कितना सीखा, कितनी जिम्मेदारियाँ निभाईं और कितनी बार अपने तथा दूसरों के जीवन को थोड़ा बेहतर बनाया। लंबी जिंदगी की इच्छा कीजिए, स्वस्थ और सक्रिय जीवन के लिए प्रयास कीजिए, लेकिन जीवन को किसी भविष्य की तारीख तक स्थगित मत कीजिए। क्योंकि मनुष्य की उम्र का अंतिम हिसाब वर्षों में लगाया जा सकता है, पर उसके जीवन की गहराई का हिसाब केवल वर्षों से नहीं लगाया जा सकता।

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