मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026

निठल्ले के नोट्स - आज की या कल की?

### चिंता आज की करें या कल की? वर्तमान को जिएँ या भविष्य की फ़िक्र करें?

मनुष्य का जीवन बड़ा विचित्र है। वह अतीत से सीखता है, वर्तमान में जीता है और भविष्य के सपने देखता है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह अक्सर जीता वर्तमान में है, सोचता अतीत के बारे में है और चिंतित भविष्य को लेकर रहता है। जिस सुबह की धूप उसके आँगन में उतर रही होती है, उसका आनंद लेने के बजाय वह आने वाली शाम के अँधेरे की कल्पना करने लगता है। जिस भोजन की थाली उसके सामने सजी होती है, उसका स्वाद लेने के बजाय वह अगले दिन की रोटी का हिसाब लगाने लगता है। जिस परिवार के लोग उसके आसपास बैठे होते हैं, उनके साथ कुछ सुखद क्षण बिताने के बजाय वह उन आशंकाओं में डूबा रहता है कि कल क्या होगा, नौकरी रहेगी या नहीं, बच्चे सफल होंगे या नहीं, बीमारी आएगी या नहीं, बुढ़ापे में सहारा मिलेगा या नहीं। इस तरह भविष्य की चिंता में वर्तमान धीरे-धीरे हाथ से निकलता जाता है। जीवन बीतता रहता है, लेकिन जीवन को जीने का अवसर बार-बार टलता रहता है। सवाल यह है कि क्या मनुष्य को केवल आज की चिंता करनी चाहिए, या कल की फ़िक्र भी जरूरी है? क्या वर्तमान को भरपूर जीना समझदारी है, या भविष्य की तैयारी करना ही बुद्धिमानी है? शायद इस प्रश्न का सही उत्तर किसी एक पक्ष को चुनने में नहीं, बल्कि दोनों के बीच विवेकपूर्ण संतुलन बनाने में छिपा है।

वर्तमान में जीने की सलाह देने वालों की कमी नहीं है। जर्मन दार्शनिक आर्थर शोपेनहावर के विचारों में वर्तमान क्षण के महत्व और भविष्य की अनिश्चितता पर बार-बार जोर मिलता है। वहीं रोमन दार्शनिक सेनेका ने अपनी प्रसिद्ध रचना On the Shortness of Life में मनुष्य की उस प्रवृत्ति पर प्रश्न उठाया, जिसमें वह जीवन के बहुत से हिस्से को अनावश्यक व्यस्तताओं, पछतावों और भविष्य की आशंकाओं में गंवा देता है। सेनेका के विचार का सार यह है कि जीवन अपने आप में अनिवार्य रूप से छोटा नहीं होता; हम उसका बड़ा हिस्सा व्यर्थ कर देते हैं। यह बात आज के समय में और भी प्रासंगिक लगती है। आधुनिक मनुष्य के पास पहले से कहीं अधिक सुविधाएँ हैं, संचार के साधन हैं, चिकित्सा विज्ञान की उपलब्धियाँ हैं, मनोरंजन के असंख्य विकल्प हैं, फिर भी उसके पास अक्सर सुकून से बैठने का समय नहीं है। वह छुट्टी पर जाता है तो कार्यालय के संदेशों की चिंता साथ ले जाता है, परिवार के साथ होता है तो भविष्य की आर्थिक योजनाओं में उलझा रहता है और बिस्तर पर लेटता है तो अगले दिन की सूची उसके दिमाग में चलने लगती है। उसके पास जीवन के साधन बढ़े हैं, लेकिन जीवन का रस लेने की क्षमता कहीं-कहीं कम होती दिखाई देती है। शायद इसलिए कि उसने जीने को एक ऐसी परियोजना बना लिया है, जिसकी तैयारी कभी पूरी ही नहीं होती।

ग्रीक दार्शनिक एपिक्यूरस ने सुख को जीवन का महत्वपूर्ण तत्व माना, लेकिन उनका सुख केवल भोग-विलास का पर्याय नहीं था। उनके दर्शन में मानसिक शांति, अनावश्यक भय से मुक्ति और इच्छाओं पर संयम का विशेष महत्व था। इस दृष्टि से देखें तो वर्तमान में जीने का अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य कल की परवाह करना छोड़ दे, अपनी जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ ले या जितना संभव हो उतना खर्च करके आज का आनंद ले ले। वर्तमान का आनंद तभी टिकाऊ हो सकता है, जब उसके भीतर विवेक और संतुलन हो। यदि कोई व्यक्ति अपनी पूरी कमाई आज ही खर्च कर देता है, स्वास्थ्य की उपेक्षा करता है, संबंधों को नजरअंदाज करता है और यह कहकर अपने कर्तव्यों से बचता है कि कल किसने देखा है, तो वह वर्तमान को नहीं जी रहा, बल्कि भविष्य की कीमत पर क्षणिक सुख खरीद रहा है। इसके उलट, यदि कोई व्यक्ति भविष्य के लिए इतना बचाता है कि वर्तमान में अपने बच्चों के साथ समय नहीं बिता पाता, अपनी पसंद की छोटी-सी चीज खरीदने से भी डरता है और हर खुशी को सेवानिवृत्ति के बाद के लिए टालता रहता है, तो संभव है कि जब वह दिन आए, तब उसके पास साधन तो हों, लेकिन उन्हें साझा करने वाले लोग, स्वास्थ्य या मन की सहजता पहले जैसी न रहे। जीवन का गणित केवल बचत और खर्च का गणित नहीं है; उसमें अनुभव, संबंध, स्वास्थ्य और संतोष की भी अपनी कीमत है।

अमेरिकी दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक विलियम जेम्स ने ध्यान और अनुभव के महत्व पर विचार किया था। उनके दर्शन से यह समझने में मदद मिलती है कि हम जिस चीज पर अपना ध्यान टिकाते हैं, हमारा अनुभव बहुत हद तक उसी से आकार लेता है। यदि हमारा ध्यान लगातार उन संभावित संकटों पर लगा रहे, जो अभी आए ही नहीं हैं, तो आशंका हमारे वर्तमान अनुभव का रंग बदल देती है। सुबह का सामान्य दर्द किसी गंभीर बीमारी की आशंका बन सकता है, कार्यालय में अधिकारी की एक कठोर टिप्पणी नौकरी जाने का संकेत लग सकती है और बाजार में आई मामूली गिरावट पूरे भविष्य के आर्थिक संकट जैसी दिखाई देने लग सकती है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर आशंका निराधार है। कुछ आशंकाएँ वास्तविक जोखिमों की ओर संकेत करती हैं और उन्हें अनदेखा करना मूर्खता होगी। लेकिन संभावना और निश्चितता के बीच का अंतर समझना भी उतना ही जरूरी है। किसी अप्रिय घटना का हो सकना इस बात का प्रमाण नहीं है कि वह अवश्य ही घटेगी। चिंता का स्वभाव है कि वह संभावना को धीरे-धीरे निश्चितता का रूप देने लगती है और फिर मनुष्य उस घटना का दुख भी पहले ही भोगने लगता है, जो शायद कभी घटित ही न हो।

अमेरिकी लेखक मार्क ट्वेन के नाम से एक लोकप्रिय कथन प्रचलित है—“I've had a lot of worries in my life, most of which never happened.” अर्थात, मैंने जीवन में बहुत-सी चिंताएँ कीं, जिनमें से अधिकांश कभी घटित ही नहीं हुईं। इस कथन के विभिन्न रूप प्रचलित हैं और इसका सटीक मूल स्रोत निश्चित रूप से स्थापित नहीं है, लेकिन इसमें छिपा अनुभव असाधारण रूप से मानवीय है। जरा अपने जीवन पर नजर डालिए। कितनी बार ऐसा हुआ कि परीक्षा से पहले लगा कि असफल हो जाएंगे, लेकिन परिणाम अपेक्षा से अच्छा आया? कितनी बार किसी बातचीत को लेकर रातभर बेचैनी रही, लेकिन अगले दिन बात सामान्य निकली? कितनी बार किसी समस्या को पहाड़ समझा, लेकिन समय बीतने के साथ वह छोटी दिखाई देने लगी? मनुष्य की स्मृति में उन संकटों की छाप तो रह जाती है, जिनसे वह वास्तव में गुजरा, लेकिन उन सैकड़ों आशंकाओं का हिसाब शायद ही रखता है, जो केवल उसके मन में जन्म लेकर समाप्त हो गईं। यदि वह कभी अपनी चिंताओं का लेखा-जोखा करे, तो उसे पता चल सकता है कि उसने अपने जीवन का कितना समय उन काल्पनिक संकटों से जूझने में बिताया, जिनके लिए वास्तविक जीवन में कभी संघर्ष करना ही नहीं पड़ा।

भविष्य की चिंता के पक्ष में भी उतने ही मजबूत तर्क हैं। अमेरिकी लेखक डेल कार्नेगी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक How to Stop Worrying and Start Living में एक उपयोगी विचार दिया—अपने जीवन को अलग-अलग दिनों के खंडों में बाँटकर जीना सीखिए। उनके कथन का आशय है कि बीते हुए कल और अनिश्चित आने वाले कल को आज के पूरे दिन पर हावी मत होने दीजिए; आज के काम को आज की सामर्थ्य के अनुसार पूरा कीजिए। यह विचार भविष्य की उपेक्षा नहीं करता, बल्कि चिंता को काम में बदलने की प्रेरणा देता है। आखिर किसान केवल आज की फसल देखकर संतुष्ट नहीं रह सकता। उसे अगली बुवाई के लिए बीज बचाने पड़ते हैं, मौसम का अनुमान लगाना पड़ता है और पानी की व्यवस्था करनी पड़ती है। विद्यार्थी केवल वर्तमान की मौज-मस्ती में डूबकर परीक्षा में सफलता की उम्मीद नहीं कर सकता। नौकरी करने वाले व्यक्ति को बचत, बीमा और सेवानिवृत्ति की योजना बनानी ही चाहिए। परिवार के मुखिया को अपने आश्रितों की जरूरतों के बारे में सोचना चाहिए। इसी तरह पर्यावरण की चिंता आज के जीवन से अलग कोई विषय नहीं है, क्योंकि आज के संसाधनों का विवेकहीन दोहन आने वाली पीढ़ियों के जीवन को कठिन बना सकता है। इस अर्थ में भविष्य की चिंता जिम्मेदारी का दूसरा नाम भी हो सकती है। समस्या भविष्य के बारे में सोचने में नहीं, बल्कि उसके बारे में सोचते-सोचते वर्तमान की शांति खो देने में है।

प्रसिद्ध दार्शनिक इमैनुएल कांट के नैतिक दर्शन में कर्तव्य और विवेक का विशेष महत्व है। उनके विचारों से प्रेरणा लेते हुए कहा जा सकता है कि मनुष्य को उन जिम्मेदारियों से विमुख नहीं होना चाहिए, जिन्हें वह समझता है और जिन्हें निभाना उसके लिए संभव है। लेकिन जिम्मेदारी निभाने और चिंता में डूबे रहने के बीच एक बुनियादी अंतर है। मान लीजिए, किसी व्यक्ति को अपनी नौकरी खोने का भय है। वह दिनभर इसी आशंका में डूबा रह सकता है कि यदि नौकरी चली गई तो क्या होगा, परिवार कैसे चलेगा और समाज में उसकी प्रतिष्ठा का क्या होगा। अथवा वह अपनी योग्यता बढ़ाने, कुछ बचत करने, दूसरे अवसर तलाशने और अपने काम को बेहतर बनाने की दिशा में कदम उठा सकता है। पहली स्थिति में भविष्य की आशंका वर्तमान की ऊर्जा को खा जाती है; दूसरी स्थिति में भविष्य की आशंका वर्तमान के कर्म की प्रेरणा बन जाती है। दोनों व्यक्तियों की चिंता का विषय एक ही है, लेकिन उनकी प्रतिक्रिया अलग है। इसीलिए शायद हमें अपने आप से यह नहीं पूछना चाहिए कि हमें चिंता करनी चाहिए या नहीं, बल्कि यह पूछना चाहिए कि हमारी चिंता हमें समाधान के निकट ले जा रही है या केवल भय के चक्र में घुमा रही है।

भगवद्गीता का प्रसिद्ध श्लोक है—“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।” अर्थात तुम्हारा अधिकार कर्म पर है, फल पर नहीं। भगवद्गीता का यह संदेश वर्तमान और भविष्य के बीच संतुलन बनाने का एक महत्वपूर्ण सूत्र प्रस्तुत करता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि फल की योजना बनाना अनुचित है या परिणाम के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए। इसका आशय यह है कि परिणाम अनेक ऐसे कारणों से प्रभावित होता है, जो हमारे पूर्ण नियंत्रण में नहीं होते। हम परिश्रम कर सकते हैं, तैयारी कर सकते हैं, अपनी गलतियों को सुधार सकते हैं और परिस्थितियों के अनुरूप रणनीति बदल सकते हैं; लेकिन हम हर परिणाम की गारंटी नहीं दे सकते। किसान बीज बो सकता है, खेत की देखभाल कर सकता है, सिंचाई कर सकता है, लेकिन वह वर्षा को अपने आदेश पर नहीं बुला सकता। इसी प्रकार विद्यार्थी मेहनत कर सकता है, लेकिन परीक्षा का प्रश्नपत्र, मूल्यांकन और प्रतियोगिता की परिस्थितियाँ उसके पूर्ण नियंत्रण में नहीं होतीं। यदि वह परिणाम की चिंता में अपनी सारी ऊर्जा खर्च कर देगा, तो संभव है कि तैयारी भी प्रभावित हो जाए। गीता का कर्मयोग इसीलिए आज भी प्रासंगिक है कि वह मनुष्य को निष्क्रिय आशावाद नहीं, बल्कि सक्रिय कर्म और परिणाम के प्रति संतुलित दृष्टि सिखाता है।

वर्तमान में जीने और भविष्य के लिए तैयार रहने के इस द्वंद्व को समझने के लिए बौद्ध दर्शन की ओर भी देखा जा सकता है। बौद्ध परंपरा में सजगता, अर्थात वर्तमान क्षण में अपने विचारों, भावनाओं और अनुभवों के प्रति जागरूक रहने का विशेष महत्व है। इसका अर्थ यह नहीं है कि मन को जबरन विचारहीन बना दिया जाए या भविष्य की हर योजना छोड़ दी जाए। इसका अर्थ है कि जब हम वर्तमान में हों, तो यह पहचान सकें कि हमारा मन वास्तव में किस अनुभव से गुजर रहा है और किस काल्पनिक आशंका में उलझ रहा है। यदि भोजन करते समय मन केवल आर्थिक परेशानियों में उलझा है, तो भोजन का स्वाद भी खो जाता है। यदि परिवार के साथ बैठकर भी हम कार्यालय की समस्याओं को मन में दोहराते रहते हैं, तो हमारी शारीरिक उपस्थिति के बावजूद हमारी मानसिक अनुपस्थिति बनी रहती है। यदि छुट्टी के दिन भी अगले सप्ताह के काम की चिंता हमें घेरे रहती है, तो विश्राम का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। सजगता का अभ्यास हमें यह सिखा सकता है कि चिंता को पहचानें, उसे समझें और फिर तय करें कि उस पर अभी कोई कार्रवाई संभव है या नहीं। यदि संभव है तो कार्रवाई करें; यदि नहीं, तो अनिश्चितता को स्वीकार करना सीखें। हर समस्या का तत्काल समाधान संभव नहीं होता, लेकिन हर समस्या को हर समय मन में ढोते रहना भी आवश्यक नहीं है।

अमेरिकी मनोवैज्ञानिक अब्राहम मैस्लो ने मानवीय आवश्यकताओं और आत्मविकास पर विचार करते हुए यह समझने में सहायता की कि मनुष्य का जीवन केवल सुरक्षा और अस्तित्व तक सीमित नहीं है। उसे प्रेम, संबंध, सम्मान, रचनात्मकता और अपनी क्षमताओं को विकसित करने की भी जरूरत होती है। यदि भविष्य की सुरक्षा ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य बन जाए, तो मनुष्य उन अनुभवों को पीछे छोड़ सकता है, जो जीवन को अर्थ देते हैं। एक व्यक्ति अधिक धन कमाने के लिए लगातार काम करता है ताकि परिवार को बेहतर जीवन दे सके, लेकिन इसी क्रम में परिवार के साथ समय बिताना भूल जाता है। वह बच्चों के भविष्य के लिए धन जमा करता है, पर उनके बचपन की स्मृतियों में शामिल नहीं हो पाता। वह अपने स्वास्थ्य और आराम को यह कहकर टालता है कि कुछ वर्ष और मेहनत कर लूँ, फिर आराम से जीऊँगा। लेकिन जीवन की विडंबना यह है कि भविष्य कभी अंतिम रूप से तैयार नहीं होता। एक लक्ष्य पूरा होता है तो दूसरा सामने आ जाता है, एक आर्थिक चिंता समाप्त होती है तो दूसरी जन्म ले लेती है। यदि खुशी को हर बार अगले पड़ाव के लिए स्थगित किया जाता रहेगा, तो संभव है कि मंजिल तक पहुँचने के बाद भी मनुष्य को लगे कि अभी कुछ और हासिल करना बाकी है।

यहाँ एक और प्रश्न उठता है—क्या चिंता करना हमारे स्वभाव का हिस्सा है, या इसे कम करना सीखा जा सकता है? मनोविज्ञान की दृष्टि से चिंता पूरी तरह निरर्थक नहीं है। सीमित मात्रा में चिंता हमें खतरे पहचानने, तैयारी करने और समय पर निर्णय लेने में मदद कर सकती है। लेकिन जब चिंता बार-बार लौटे, नियंत्रण से बाहर महसूस हो, नींद और एकाग्रता को प्रभावित करे तथा सामान्य जीवन में बाधा बनने लगे, तब वह उपयोगी चेतावनी से आगे बढ़कर समस्या बन सकती है। इसीलिए हर चिंता को समाप्त करना जरूरी नहीं, बल्कि उसकी प्रकृति समझना जरूरी है। हम अपने आप से पूछ सकते हैं कि जिस बात को लेकर मैं परेशान हूँ, क्या उसके समाधान के लिए अभी कोई ठोस कदम उठा सकता हूँ? यदि हाँ, तो वह कदम क्या है? यदि नहीं, तो क्या बार-बार उसी बारे में सोचने से परिस्थिति बदल जाएगी? क्या मेरे पास उपलब्ध तथ्यों के आधार पर कोई वास्तविक खतरा है, या मैं केवल सबसे बुरे परिणाम की कल्पना कर रहा हूँ? ऐसे प्रश्न चिंता को धुँधली आशंका से निकालकर स्पष्ट समस्या में बदलने में मदद कर सकते हैं। और यदि चिंता लंबे समय तक बनी रहे, दैनिक जीवन को प्रभावित करे या असहनीय लगे, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सहायता लेना भी समझदारी है।

जीवन की एक बड़ी विडंबना यह भी है कि हम भविष्य के लिए जो कुछ जुटाते हैं, उसका उपयोग करने के लिए भविष्य में पर्याप्त समय और स्वास्थ्य मिलने की कोई गारंटी नहीं है। इसका मतलब यह नहीं कि बचत करना, बीमा लेना, बच्चों की शिक्षा की योजना बनाना या वृद्धावस्था की तैयारी करना व्यर्थ है। बल्कि इन सबका महत्व इसलिए है कि वे भविष्य की अनिश्चितता से निपटने की हमारी क्षमता बढ़ाते हैं। लेकिन तैयारी और भय में अंतर है। तैयारी हमें अधिक स्वतंत्र बनाती है; भय हमें अपने ही विचारों का बंदी बना देता है। तैयारी कहती है कि अपनी आय का कुछ हिस्सा बचाओ, नियमित स्वास्थ्य-जाँच कराओ, कौशल बढ़ाओ और संबंधों को मजबूत रखो। भय कहता है कि जब तक हर जोखिम समाप्त नहीं हो जाता, तब तक चैन से मत बैठो। जबकि वास्तविकता यह है कि जोखिम कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होते। सबसे सुरक्षित जीवन भी अनिश्चितताओं से मुक्त नहीं है। मनुष्य का विवेक इस बात में नहीं है कि वह हर अनिश्चितता को मिटा दे, बल्कि इसमें है कि वह जिन जोखिमों को कम कर सकता है, उन्हें कम करे और जिन्हें नियंत्रित नहीं कर सकता, उनके साथ जीना सीखे।

शायद इसी संदर्भ में प्राचीन रोमन दार्शनिक सेनेका का एक और विचार याद आता है। On the Shortness of Life में उन्होंने भविष्य की प्रतीक्षा में वर्तमान को खो देने की प्रवृत्ति की आलोचना की है। उनका तर्क है कि भविष्य की आशा में आज को लगातार टालते रहना जीवन की बड़ी बर्बादी है। यह विचार हमें अपने जीवन की प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करता है। क्या हम अपने प्रियजनों से वह बात कहने के लिए किसी खास दिन की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जो आज भी कही जा सकती है? क्या हम किसी पुराने मित्र से मिलने, कोई अच्छी किताब पढ़ने, अपनी रुचि का काम करने या प्रकृति के बीच कुछ समय बिताने को लगातार टालते जा रहे हैं? क्या हम हर रविवार यह सोचकर बिताते हैं कि अगले सप्ताह से जीवन व्यवस्थित करेंगे, और हर सप्ताहांत वही अव्यवस्था हमारे सामने खड़ी मिलती है? भविष्य के लिए योजना बनाना आवश्यक है, लेकिन भविष्य के नाम पर वर्तमान को स्थगित कर देना बुद्धिमानी नहीं है। जीवन कोई ऐसा समारोह नहीं है, जिसकी असली शुरुआत सारी तैयारियाँ पूरी हो जाने के बाद होगी। जीवन तो तैयारियों के बीच भी चल रहा है।

इसका एक व्यावहारिक समाधान यह हो सकता है कि हम भविष्य की चिंता को समय और सीमा दें, लेकिन उसे अपने पूरे दिन का स्वामी न बनने दें। आर्थिक भविष्य के लिए बैठकर बजट बनाना उपयोगी है; दिनभर मन में पैसों की चिंता दोहराना नहीं। स्वास्थ्य के लिए नियमित व्यायाम और संतुलित भोजन आवश्यक है; हर शारीरिक अनुभूति को किसी बड़ी बीमारी का संकेत मान लेना नहीं। बच्चों के भविष्य के लिए शिक्षा और संस्कारों की व्यवस्था करना जरूरी है; उनके जीवन के हर निर्णय को अपने भय के अनुसार नियंत्रित करना नहीं। नौकरी और करियर के लिए नई संभावनाएँ तलाशना उपयोगी है; हर सहकर्मी की सफलता को अपनी असफलता का प्रमाण मान लेना नहीं। इसी प्रकार अतीत की गलतियों से सीखना आवश्यक है, लेकिन बार-बार उन्हीं को याद करके स्वयं को दंडित करते रहना नहीं। इस दृष्टि से वर्तमान में जीना कोई दार्शनिक विलासिता नहीं, बल्कि जीवन के प्रबंधन की एक व्यावहारिक कला है। इसमें मनुष्य अपनी जिम्मेदारियों से भागता नहीं, बल्कि उन्हें अधिक स्पष्टता, ऊर्जा और शांति के साथ निभाता है।

अंततः, चिंता आज की करें या कल की—इसका उत्तर शायद यह है कि चिंता से अधिक ध्यान आज के कर्म पर दें और कल की तैयारी आज ही करें। कल के बारे में सोचना बुद्धिमानी है, लेकिन कल के भय में आज को खो देना नासमझी है। वर्तमान का आनंद लेना जरूरी है, लेकिन उसके नाम पर भविष्य के प्रति लापरवाह हो जाना भी उचित नहीं। अतीत से सबक लें, भविष्य की योजना बनाएँ और वर्तमान में अपना सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश करें। जो बदल सकता है, उसे बदलने का प्रयास करें; जो अभी बदल नहीं सकता, उसे लेकर अपने मन को अनावश्यक यातना न दें; और जो अनिश्चित है, उसे निश्चित मानकर आज ही उसका शोक मनाना बंद करें।

जीवन की सबसे बड़ी विडंबना शायद यह नहीं कि हमें समय कम मिलता है, बल्कि यह है कि समय रहते हमें समय का महत्व समझ में नहीं आता। हम बचपन में बड़े होने की जल्दी में रहते हैं, युवावस्था में सफल होने की, अधेड़ उम्र में सुरक्षित होने की और बुढ़ापे में बीते दिनों को फिर से जीने की इच्छा करते हैं। इस दौड़ में आज बार-बार हमारे हाथ से निकल जाता है। इसलिए जब अगली बार मन भविष्य की किसी आशंका से घिर जाए, तो अपने आप से एक छोटा-सा प्रश्न पूछिए—क्या मैं इस चिंता से कल को बेहतर बना रहा हूँ, या केवल आज को खराब कर रहा हूँ? यदि चिंता किसी ठोस कदम की ओर ले जाती है, तो वह उपयोगी है। यदि वह केवल बेचैनी बढ़ाती है, तो उससे थोड़ा पीछे हटना ही बेहतर है।

आखिर कल जब आज बनेगा, तब वह भी वर्तमान ही होगा। तब भी कुछ इच्छाएँ अधूरी होंगी, कुछ प्रश्न अनुत्तरित होंगे और कुछ आशंकाएँ सामने खड़ी होंगी। यदि हम आज की सारी खुशियाँ कल के लिए बचाकर रखेंगे, तो कल भी शायद यही करेंगे। इसलिए कल के लिए बीज बचाइए, लेकिन आज के फूलों की खुशबू लेना मत भूलिए। भविष्य के लिए घर बनाइए, लेकिन उसमें वर्तमान के रिश्तों को रहने की जगह भी दीजिए। धन कमाइए, स्वास्थ्य सँभालिए, जिम्मेदारियाँ निभाइए, सपने देखिए और योजनाएँ बनाइए, लेकिन बीच-बीच में रुककर यह भी महसूस कीजिए कि जीवन अभी, इसी क्षण, आपके सामने उपस्थित है। न बीता हुआ कल लौट सकता है, न आने वाला कल पूरी तरह हमारे नियंत्रण में है। हमारे हाथ में सबसे अधिक जो है, वह आज है—और शायद जीवन को समझने की शुरुआत इसी स्वीकार से होती है।

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