मनुष्य के अलावा अन्य प्राणी भी साहित्य के केंद्र में रहे हैं। महादेवी वर्मा ने की प्रणियों पर केंद्रित रेखाचित्रों की रचना की तो कृश्न चंदर एक गधे की आत्मकथा लिखकर अमर हो गए। गधा तो ख्वाजा नसीरूद्दीन की भी दास्तां का अहम हिस्सा रहा है। लेकिन इंसान के सबसे वफादार प्राणी कुत्ते भी साहित्य में अहम स्थान रखते हैं। इधर, फेसबुक पर सैर करते हुए कुत्तों से जुड़ी दो पुस्तकों पर नज़र पड़ी जिन्हें से एक है प्रख्यात पत्रकार पुष्प रंजन की "मेरा मुन्नू" और दूसरी है इरा टाक की "पिकोलो फाइल्स..". इन पुस्तकों में वास्तविक कंटेंट क्या है यह तो पढ़ने पर पता चलेगा, लेकिन केंद्र में कुत्ते तो हैं ही!
हिंदी साहित्य और बाल-साहित्य में कुत्तों को केंद्र में रखकर या उनकी वफादारी और संवेदना को उभारते हुए कई महत्वपूर्ण पुस्तकें और कहानियाँ रची गई हैं। मुंशी प्रेमचंद का बाल-उपन्यास 'कुत्ते की कहानी' आत्मकथात्मक शैली में 'कल्लू' नामक कुत्ते के दृष्टिकोण से लिखा गया है, जिसमें वह अपने जन्म, संघर्ष और वफादारी के अनुभवों को साझा करता है। वहीं, सआदत हसन मंटो की प्रसिद्ध कहानी 'टिटवाल का कुत्ता' भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित टिटवाल क्षेत्र में एक बेजुबान कुत्ते के माध्यम से सरहदों के पागलपन और युद्ध की निरर्थकता पर करारा व्यंग्य करती है। मोहन राकेश की कहानी 'परमात्मा का कुत्ता' में कुत्ता सरकारी नौकरशाही और भ्रष्टाचार के खिलाफ विरोध का एक प्रतीकात्मक माध्यम बनता है, जबकि यशपाल की 'कुत्ते की पूँछ' इंसानी मानसिकता और दिखावे के सामाजिक व्यवहार को उजागर करती है। इसके अलावा, बद्री नारायण की बाल-पुस्तक 'हाथी और कुत्ता' बच्चों के बीच सह-अस्तित्व का संदेश देती है, और वर्जीनिया वुल्फ के उपन्यास 'फ्लश' तथा जैक लंदन के 'द कॉल ऑफ द वाइल्ड' जैसी विश्वप्रसिद्ध कृतियों के हिंदी अनुवाद भी पाठकों के बीच खासे लोकप्रिय रहे हैं।

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