### हैप्पी होने की औपचारिकता और खुशियों की वास्तविकता
एक ललित निबंध
हैप्पी दशहरा! हैप्पी दिवाली! हैप्पी न्यू ईयर! हैप्पी होली! हैप्पी जन्मदिन! हैप्पी एनिवर्सरी! साल के बारह महीनों में शायद ही कोई ऐसा महीना गुजरता हो जब हमारे पास एक-दूसरे को हैप्पी कहने का कोई अवसर न हो। कभी त्योहार के नाम पर, कभी नए साल के आगमन पर, कभी किसी की व्यक्तिगत उपलब्धि पर तो कभी किसी खास दिन के बहाने। मोबाइल फोन की स्क्रीन पर शुभकामनाओं का तांता लगा रहता है। व्हाट्सऐप समूहों में संदेशों की बाढ़ आ जाती है। रंग-बिरंगे चित्र, फूलों के गुलदस्ते, जलते हुए दीपक, पटाखे, मुस्कुराते चेहरे और उनके साथ चस्पा दो शब्द—हैप्पीनेस। लगता है जैसे पूरी दुनिया खुशियों के कारोबार में लगी हुई है। लेकिन इस तमाम हैप्पीनेस के शोरगुल के बीच एक छोटा-सा सवाल मन में जरूर उठता है कि क्या हम वास्तव में खुश हैं? क्या हमारे जीवन में उतनी ही खुशियां हैं, जितनी शुभकामना संदेशों में दिखाई देती हैं? और क्या किसी को हैप्पी कह देने भर से उसके जीवन में हैप्पीनेस का प्रवेश हो जाता है?
शुभकामनाएं देने और खुशियां बांटने की परंपरा निश्चित रूप से मानवीय संबंधों की खूबसूरत अभिव्यक्ति है। भारतीय संस्कृति में तो अभिवादन, मंगलकामना और शुभाशीष का विशेष महत्व रहा है। किसी के सुख, समृद्धि, स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करना हमारी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। 'सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः' का भाव केवल किसी एक व्यक्ति के लिए खुशी मांगने तक सीमित नहीं है, बल्कि संपूर्ण संसार के कल्याण की कामना करता है। समस्या शुभकामनाएं देने में नहीं है, समस्या तब पैदा होती है जब शुभकामनाएं केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाती हैं। जब हम किसी को हैप्पी दिवाली का संदेश भेजते हैं और अगले ही दिन उसके दुख, परेशानी या जरूरत से पूरी तरह अनजान बने रहते हैं, तब सवाल उठना स्वाभाविक है कि हमारी शुभकामना का वास्तविक अर्थ आखिर क्या था?
दरअसल, हमने खुशियों को भी एक तरह की सामाजिक रस्म में बदल दिया है। त्योहार आया तो शुभकामना भेजनी है, नया साल आया तो सबको बधाई देनी है, जन्मदिन आया तो केक और हैप्पी बर्थडे का संदेश भेजना है। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि शुभकामना संदेश भेजना भी हमारी दिनचर्या का एक अनिवार्य काम बन गया है। जिन लोगों से महीनों बात नहीं होती, उन्हें भी त्योहार पर संदेश भेज दिया जाता है। कुछ संदेश व्यक्तिगत होते हैं, लेकिन अधिकांश संदेश कॉपी-पेस्ट की संस्कृति के शिकार हैं। एक ही तस्वीर, एक ही पंक्ति और एक ही भावना सैकड़ों लोगों के पास पहुंच जाती है। संदेश भेजने वाला भी संतुष्ट और संदेश पाने वाला भी जवाब में 'थैंक्यू, सेम टू यू' लिखकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेता है। इस तरह खुशियां बांटने की प्रक्रिया कुछ सेकंड में पूरी हो जाती है। लेकिन क्या खुशियां इतनी सस्ती और इतनी आसान हैं कि दो शब्दों के आदान-प्रदान से उनका वितरण हो जाए?
यहां एक और दिलचस्प विरोधाभास दिखाई देता है। हम दूसरों को खुश रहने की शुभकामनाएं देते हैं, लेकिन खुद अपनी खुशियों को लेकर कितने आश्वस्त हैं? हम हैप्पी न्यू ईयर कहते हुए नए साल में बेहतर जिंदगी की उम्मीद करते हैं, लेकिन पुराने साल की चिंताओं, कुंठाओं, असफलताओं और शिकायतों को भी अपने साथ नए साल में ले आते हैं। दिवाली पर घरों में दीपक जलाते हैं, लेकिन मन के अंधेरे को दूर करने के लिए कोई प्रयास नहीं करते। होली पर रंगों से सराबोर हो जाते हैं, लेकिन संबंधों में जमी बेरुखी और मनमुटाव के रंग फीके ही रहते हैं। दशहरा पर रावण का पुतला जलाते हैं, लेकिन अपने भीतर के अहंकार, ईर्ष्या, क्रोध और प्रतिशोध को बचाकर रखते हैं। ऐसे में त्योहारों की शुभकामनाएं और जीवन की वास्तविकता कई बार एक-दूसरे से बिल्कुल विपरीत दिशाओं में खड़ी दिखाई देती हैं।
खुशी आखिर है क्या? क्या खुशी का अर्थ केवल हंसना, मुस्कुराना, घूमना-फिरना, खरीदारी करना, स्वादिष्ट भोजन करना और उत्सव मनाना है? क्या किसी महंगे रेस्तरां में भोजन करना, विदेश यात्रा पर जाना, महंगे कपड़े पहनना या सोशल मीडिया पर अपनी खुशहाल तस्वीरें साझा करना ही हैप्पीनेस का प्रमाण है? निश्चित रूप से ये चीजें क्षणिक आनंद दे सकती हैं, लेकिन आनंद और खुशी में अंतर है। आनंद किसी खास घटना, वस्तु या परिस्थिति से उत्पन्न हो सकता है, जबकि खुशी का संबंध मन की एक गहरी अवस्था से भी है। कई बार साधारण-सी चाय की प्याली, किसी पुराने मित्र से बातचीत, परिवार के साथ बिताए गए कुछ पल, किसी जरूरतमंद की सहायता या लंबे समय बाद मिली किसी आत्मीय व्यक्ति की मुस्कान हमें वह संतोष दे सकती है, जो बड़े-बड़े आयोजनों में भी नहीं मिलता।
मनोविज्ञान में भी खुशी को केवल क्षणिक प्रसन्नता के रूप में नहीं देखा जाता। इसमें जीवन से संतुष्टि, सकारात्मक भावनाएं, संबंधों की गुणवत्ता और जीवन में अर्थबोध जैसे पहलू शामिल होते हैं। यही वजह है कि बहुत सुविधासंपन्न व्यक्ति भी भीतर से उदास हो सकता है और सीमित संसाधनों में जीवन जीने वाला व्यक्ति भी संतुष्ट एवं प्रसन्न रह सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि अभावों का महिमामंडन किया जाए या आर्थिक कठिनाइयों को नजरअंदाज कर दिया जाए। गरीबी, बीमारी, बेरोजगारी, असुरक्षा और सामाजिक अन्याय किसी की खुशी को वास्तविक रूप से प्रभावित करते हैं। इसलिए किसी दुखी व्यक्ति से केवल यह कह देना कि खुश रहो, उसकी समस्या का समाधान नहीं है। कई बार उसे उपदेश से ज्यादा सहारे, सांत्वना से ज्यादा सहयोग और शुभकामना से ज्यादा संवेदनशीलता की आवश्यकता होती है।
हमारी खुशियों का एक बड़ा संकट अपेक्षाओं से भी जुड़ा है। हम चाहते हैं कि नया साल हमारे लिए सब कुछ बदल दे। नौकरी मिल जाए, कारोबार चल निकले, वेतन बढ़ जाए, मकान बन जाए, बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो जाए, बीमारी दूर हो जाए, रिश्तों में मिठास आ जाए और जीवन की तमाम परेशानियां समाप्त हो जाएं। हमारी अपेक्षाएं अनुचित नहीं हैं, लेकिन जब हम अपनी खुशी को पूरी तरह भविष्य की किसी उपलब्धि से बांध देते हैं, तब वर्तमान लगातार अधूरा महसूस होने लगता है। आज की खुशी कल की किसी उपलब्धि के इंतजार में टलती रहती है। एक इच्छा पूरी होती है तो दूसरी सामने आ जाती है। एक लक्ष्य हासिल होता है तो नया लक्ष्य खड़ा हो जाता है। इस तरह जीवन का बड़ा हिस्सा उस खुशी की प्रतीक्षा में बीत जाता है, जिसे हम भविष्य में कहीं सुरक्षित मानकर बैठे होते हैं।
सोशल मीडिया ने इस स्थिति को और जटिल बना दिया है। वहां लगभग हर व्यक्ति खुश दिखाई देता है। कोई परिवार के साथ छुट्टियां मना रहा है, कोई शानदार भोजन कर रहा है, कोई महंगे उपहार प्राप्त कर रहा है, कोई उपलब्धियों का जश्न मना रहा है। दूसरों की इन चुनी हुई खुशहाल तस्वीरों को देखकर हम अनजाने में अपने जीवन की तुलना उनसे करने लगते हैं। हमें लगता है कि बाकी सभी लोग हमसे ज्यादा खुश हैं, उनके जीवन में परेशानियां कम हैं और हमारी जिंदगी में ही कुछ कमी है। जबकि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाला जीवन किसी व्यक्ति के संपूर्ण जीवन का दस्तावेज नहीं होता। वहां मुस्कुराहटें दिखाई देती हैं, लेकिन उनके पीछे की बेचैनियां नहीं। उत्सव दिखाई देते हैं, लेकिन अकेलापन नहीं। उपलब्धियां दिखाई देती हैं, लेकिन संघर्ष नहीं। इस प्रकार खुशियों का प्रदर्शन कई बार खुश रहने की वास्तविक अनुभूति पर भारी पड़ जाता है।
एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि क्या हम दूसरों की खुशी से वास्तव में खुश होते हैं? किसी को सफलता मिलने पर क्या हम दिल से प्रसन्न होते हैं? किसी परिचित की आर्थिक उन्नति, पदोन्नति, लोकप्रियता या पारिवारिक समृद्धि देखकर क्या हमारे मन में सहज प्रसन्नता आती है या अनजाने में तुलना और प्रतिस्पर्धा की भावना जन्म लेने लगती है? हम मुंह से बधाई देते हैं, लेकिन मन में हिसाब लगाने लगते हैं कि उसके पास क्या है और हमारे पास क्या नहीं। ऐसे में हैप्पीनेस का संदेश एक सामाजिक शिष्टाचार तो रह जाता है, लेकिन उसके पीछे छिपी सद्भावना कमजोर पड़ जाती है। दूसरों के सुख में सुखी होना भी एक तरह की मानसिक उदारता है, जिसके लिए अपने भीतर ईर्ष्या और असुरक्षा की जगह कम करनी पड़ती है।
यह भी विचारणीय है कि क्या हर व्यक्ति को हर समय खुश रहने की आवश्यकता है? क्या उदास होना, निराश होना, रोना, किसी बात से दुखी होना या कुछ समय अकेले रहना असामान्य है? आजकल खुश रहने का दबाव भी एक नई समस्या बनता जा रहा है। सकारात्मक सोच के नाम पर लोगों से अपेक्षा की जाती है कि वे हर परिस्थिति में मुस्कुराते रहें। जैसे दुखी होना कोई अपराध हो। जबकि मनुष्य का जीवन केवल खुशी और उत्साह से नहीं बना है। इसमें दुख, असफलता, भय, अनिश्चितता, बिछोह और निराशा के भी अपने स्थान हैं। जीवन की परिपक्वता शायद इस बात में है कि हम हर परिस्थिति में खुश रहने का अभिनय करने के बजाय अपनी भावनाओं को स्वीकार करना सीखें। कभी-कभी दुख को महसूस करना भी जरूरी होता है, क्योंकि वही हमें दूसरों के दुख को समझने की संवेदना देता है।
त्योहारों की सार्थकता भी इसी बिंदु पर समझने की आवश्यकता है। दशहरा केवल रावण दहन का आयोजन नहीं, बल्कि अपने भीतर की बुराइयों से संघर्ष करने की प्रेरणा है। दिवाली केवल घरों को रोशन करने का पर्व नहीं, बल्कि जीवन में अंधकार को दूर करने का प्रतीक है। होली केवल रंग खेलने का अवसर नहीं, बल्कि संबंधों में जमी दूरियों को मिटाने का बहाना है। नया साल केवल कैलेंडर बदलने का नाम नहीं, बल्कि अपने व्यवहार, विचार और जीवन की प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करने का अवसर भी हो सकता है। यदि इन अवसरों पर हम केवल मिठाइयां बांटें, संदेश भेजें और तस्वीरें साझा करें, लेकिन अपने व्यवहार में कोई सकारात्मक परिवर्तन न लाएं, तो उत्सव की मूल भावना कहीं पीछे छूट जाती है।
खुशी का संबंध हमारे सामाजिक व्यवहार से भी है। किसी बुजुर्ग को समय देना, किसी बच्चे की बात ध्यान से सुनना, किसी परेशान व्यक्ति की मदद करना, किसी पुराने विवाद को समाप्त करना, किसी से क्षमा मांग लेना या किसी की गलती को उदारता से क्षमा कर देना—ये ऐसे छोटे-छोटे काम हैं जिनमें खुशी के बड़े अर्थ छिपे हैं। किसी को हैप्पी न्यू ईयर कहने से कहीं ज्यादा सार्थक यह हो सकता है कि हम नए साल में उसके जीवन की किसी वास्तविक परेशानी को कम करने का प्रयास करें। किसी को हैप्पी दिवाली कहने के साथ यह भी सुनिश्चित करें कि हमारे आसपास कोई ऐसा व्यक्ति तो नहीं जिसके घर में इस बार दीपक जलाने के लिए तेल तक उपलब्ध नहीं है। किसी को हैप्पी होली कहने के साथ यह भी सोचें कि हमारे व्यवहार से किसी का मन बेरंग तो नहीं हो रहा है।
वास्तव में खुशियां कोई ऐसी वस्तु नहीं हैं जिन्हें हम किसी दुकान से खरीदकर अपने जीवन में रख सकें या किसी संदेश के माध्यम से किसी दूसरे के जीवन में पहुंचा सकें। हम खुशियों के लिए अनुकूल परिस्थितियां बना सकते हैं, किसी के दुख को कम कर सकते हैं, किसी के चेहरे पर मुस्कान ला सकते हैं और अपने भीतर संतोष एवं सकारात्मकता विकसित कर सकते हैं। लेकिन खुशी की अनुभूति अंततः व्यक्ति के अपने अनुभव, संबंधों, मानसिक स्थिति और जीवन की परिस्थितियों से जुड़ी होती है। इसीलिए शुभकामना का मूल्य उसके शब्दों में कम और उसके पीछे छिपी भावना तथा व्यवहार में अधिक होता है।
तो क्या हमें एक-दूसरे को हैप्पी कहना बंद कर देना चाहिए? बिल्कुल नहीं। शुभकामनाएं देना बंद करने की नहीं, उन्हें अधिक अर्थपूर्ण बनाने की जरूरत है। जब हम किसी को हैप्पी दशहरा कहें तो उसके जीवन से बुराइयों और परेशानियों के दूर होने की सच्ची कामना भी करें। जब हैप्पी दिवाली कहें तो उसके घर के साथ उसके मन में भी उजाला होने की कामना करें। जब हैप्पी न्यू ईयर कहें तो केवल नए साल की नहीं, उसके जीवन में बेहतर स्वास्थ्य, संतोष, सुरक्षा और आत्मीय संबंधों की कामना करें। और जब हैप्पी होली कहें तो यह भी सुनिश्चित करने का प्रयास करें कि हमारे कारण किसी के जीवन के रंग फीके न पड़ें।
अंततः सवाल यह नहीं है कि हम साल में कितनी बार एक-दूसरे को हैप्पी कहते हैं, बल्कि यह है कि हम सालभर में कितनी बार किसी को वास्तव में खुश होने की वजह देते हैं। कितनी बार किसी के चेहरे पर मुस्कान लाते हैं, कितनी बार किसी का बोझ हल्का करते हैं और कितनी बार अपनी छोटी-छोटी खुशियों में दूसरों को शामिल करते हैं। शुभकामना संदेश कुछ क्षणों के लिए मोबाइल की स्क्रीन को रोशन कर सकते हैं, लेकिन किसी के जीवन को रोशन करने के लिए संवेदना, सद्भावना और सहयोग की जरूरत होती है।
शायद खुशियों की सबसे सुंदर परिभाषा यही है कि खुशी केवल अपने खुश होने का नाम नहीं, बल्कि किसी दूसरे की उदासी कम कर पाने की क्षमता का नाम भी है। इसलिए अगली बार जब हम किसी को 'हैप्पी' कहें तो एक पल ठहरकर यह भी सोचें कि क्या हम उसके जीवन में खुशी का कोई वास्तविक कारण बन सकते हैं? क्योंकि हैप्पी कह देना आसान है, किसी को सचमुच हैप्पी कर देना बड़ी बात है। और शायद इसी एक छोटे-से अंतर में शुभकामनाओं की औपचारिकता और खुशियों की सार्थकता के बीच का पूरा दर्शन छिपा हुआ है।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें