सोमवार, 7 सितंबर 2026

निठल्ले के नोट्स - कितना फैलाएं पांव

कहावत है—“जितनी लंबी चादर हो, उतना ही पांव पसारो।” हमारे बुजुर्गों ने यह बात शायद इसलिए कही थी कि आदमी नींद में भी आर्थिक सर्वेक्षण करता रहे। चादर छोटी हो तो पांव सिकोड़ लो, बड़ी हो तो आराम से फैलाओ। मगर जिंदगी की मुश्किल यह है कि यहां चादर पहले से नापकर नहीं मिलती। कभी चादर छोटी पड़ जाती है, कभी पांव बड़े हो जाते हैं और कभी आदमी चारपाई ही बदलने निकल पड़ता है।

सवाल यही है कि पांव आखिर कितना फैलाया जाए? और जोखिम कितना लिया जाए?

जीवन में एक वर्ग वह है जो पांव फैलाने से पहले चारपाई की लंबाई, चौड़ाई, लकड़ी की गुणवत्ता, रस्सियों की मजबूती और यहां तक कि चारपाई बनाने वाले बढ़ई का चरित्र भी जांच लेता है। वह तब तक पांव नहीं फैलाता, जब तक उसे पूरा विश्वास न हो जाए कि चारपाई टूटेगी नहीं। ऐसे लोग सुरक्षित रहते हैं, लेकिन कभी-कभी उनकी जिंदगी इतनी सुरक्षित होती है कि उसमें रोमांच का प्रवेश ही नहीं हो पाता।

दूसरी तरफ वे लोग हैं जो चारपाई देखकर कहते हैं—“पहले पांव फैलाते हैं, चारपाई बाद में देखी जाएगी।” यही लोग जोखिम लेते हैं। कभी गिरते हैं, कभी संभलते हैं, कभी चारपाई टूटती है और कभी उसी टूटे हुए तख्ते से नई चारपाई बनाने का हुनर सीख जाते हैं।

असल में तरक्की की कहानी अक्सर इसी दूसरे वर्ग ने लिखी है।

जिस आदमी ने पहली बार समुद्र को देखकर सोचा होगा कि “उधर भी कुछ होगा”, उसने जोखिम लिया। जिसने आसमान की तरफ देखकर कहा होगा कि “आदमी उड़ क्यों नहीं सकता?”, उसने जोखिम लिया। जिसने नौकरी छोड़कर अपना काम शुरू किया, जिसने नया शहर चुना, जिसने प्रेम में पहल की, जिसने किताब लिखी, जिसने मंच पर पहली बार बोलने की हिम्मत की—इन सबने किसी न किसी दिन अपनी सुरक्षित चादर से बाहर पांव निकाला।

जोखिम जिंदगी का नमक है। बहुत कम हो तो जिंदगी फीकी लगती है और बहुत ज्यादा हो तो रक्तचाप बढ़ सकता है!

लेकिन जोखिम और दुस्साहस में फर्क है। जोखिम वह है जिसमें गिरने की संभावना स्वीकार करते हुए आदमी उठने की तैयारी भी रखता है। दुस्साहस वह है जिसमें आदमी गिरने के बाद भी कहता है—“मैं तो देख ही रहा था कि नीचे क्या है।”

इसलिए सवाल यह नहीं कि जोखिम लिया जाए या नहीं। सवाल यह है कि किस जोखिम की कीमत कितनी है और उसके बदले मिलने वाली संभावना कितनी बड़ी है।

एक नौकरी छोड़ना जोखिम हो सकता है, लेकिन बिना सोचे पूरी जमा पूंजी दांव पर लगा देना शायद जोखिम नहीं, जुआ है। नया व्यवसाय शुरू करना साहस है, लेकिन बाजार को समझे बिना सब कुछ लगा देना मूर्खता हो सकती है। किसी से प्रेम का इजहार करना जोखिम है; यह मान लेना कि सामने वाला भी उसी क्षण प्रेम में पड़ जाएगा—अति-आत्मविश्वास।

यानी पांव फैलाने के साथ आंखें भी खुली रहनी चाहिए।

जीवन में सबसे बड़ा जोखिम कई बार जोखिम न लेना होता है। एक ही जगह खड़े रहने में भी खतरा है। दुनिया आगे बढ़ती रहती है और हम अपनी सुरक्षित जगह को सुरक्षा समझते रहते हैं। पानी में उतरने से डरने वाला आदमी किनारे पर सुरक्षित जरूर रहता है, लेकिन तैरना कभी नहीं सीखता।

मगर दूसरी तरफ लगातार जोखिम लेते रहने की भी अपनी कीमत है। जिंदगी कोई शेयर बाजार नहीं कि हर सुबह नई बोली लगाई जाए। हर जोखिम जरूरी नहीं कि हमें बड़ा बनाए। कुछ जोखिम सिर्फ इतना सिखाते हैं कि अगली बार ऐसा जोखिम मत लेना!

इसलिए शायद समझदार आदमी की पहचान यह नहीं कि वह कितना बड़ा जोखिम लेता है, बल्कि यह है कि वह जोखिम लेने से पहले क्या-क्या सोचता है।

पांव फैलाने की भी एक कला है। पहले एक पांव बाहर जाता है, जमीन की मजबूती परखी जाती है, फिर दूसरा। पूरी देह तभी आगे बढ़ती है जब जमीन भरोसा देती है। जीवन भी शायद इसी तरह चलता है। छोटी छलांगें हमें बड़ी छलांगों के लिए तैयार करती हैं।

कभी-कभी पांव चादर से बाहर निकालना भी जरूरी है, क्योंकि दुनिया की नई चादर वहीं से शुरू होती है।

और हां, चादर छोटी हो तो हर बार पांव काटने की जरूरत नहीं। कभी-कभी चारपाई बड़ी करने की कोशिश भी की जा सकती है।

यही मनुष्य की असली खूबी है। वह उपलब्ध परिस्थितियों में सिर्फ समायोजन नहीं करता, परिस्थितियों को बदलने की कोशिश भी करता है। जिसके पास छोटी चादर थी, उसने बड़ी चादर बुन ली। जिसकी चारपाई छोटी थी, उसने दूसरी चारपाई बना ली। और जिसके सामने रास्ता नहीं था, उसने रास्ता बना लिया।

जीवन शायद इसी का नाम है—अपनी सीमा को पहचानना, लेकिन उसे अंतिम सीमा न मानना।

पांव उतने ही फैलाइए कि नींद चैन से आए; मगर इतने भी नहीं सिकोड़िए कि सपने ही छोटे हो जाएं।

क्योंकि जिंदगी में कुछ पांव चादर के भीतर आराम के लिए होते हैं और कुछ पांव चादर से बाहर निकलकर नई जमीन तलाशने के लिए।

बस फर्क इतना है कि पांव फैलाने से पहले यह देख लेना चाहिए कि जमीन है भी या नहीं!

वरना कहावत बदलनी पड़ेगी—

“जितनी चारपाई हो, उतने ही पांव पसारो;
और अगर चारपाई छोटी लगे, तो हिम्मत हो तो नई चारपाई डालो।”

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