संतोष का असंतोष
कहते हैं—“संतोषं परमं सुखम्।” संतोष को सुख का सबसे बड़ा द्वार बताया गया है। लेकिन मनुष्य की फितरत देखिए—जिसके पास साइकिल है, वह मोटरसाइकिल चाहता है; मोटरसाइकिल मिल जाए तो कार; कार आ जाए तो बड़ी कार; बड़ी कार के बाद बंगला और बंगले के बाद ऐसा बंगला, जिसके सामने खड़ी कार छोटी दिखाई दे। इच्छाओं की यह यात्रा शायद ही कभी किसी स्टेशन पर रुकती है। आदमी मंजिल पर पहुँचते-पहुँचते अगली मंजिल का पता पूछ लेता है।
तब सवाल उठता है—यदि इच्छा मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है और इच्छाएँ अनंत हैं, तो संतोष आखिर आएगा कहाँ से?
शायद संतोष का अर्थ इच्छाओं की हत्या नहीं है। संतोष कोई ऐसा ब्रेक नहीं, जिसे लगा दिया और जीवन की गाड़ी वहीं खड़ी हो गई। वह तो शायद गाड़ी चलाते हुए यह जानना है कि हमें जाना कहाँ है और रास्ते में जो मिला, उसका आनंद लेना कैसे है।
इच्छा और संतोष को हम अक्सर एक-दूसरे का शत्रु मान लेते हैं। लगता है कि जहाँ इच्छा होगी, वहाँ संतोष नहीं होगा और जहाँ संतोष होगा, वहाँ इच्छा समाप्त हो जाएगी। लेकिन जीवन इतना सरल गणित नहीं है। इच्छा गति देती है, संतोष दिशा देता है। इच्छा कहती है—“और आगे बढ़ो”; संतोष कहता है—“यह भी कम नहीं है।” इच्छा भविष्य की ओर देखती है, संतोष वर्तमान को देखने की कला सिखाता है। मनुष्य को शायद दोनों की जरूरत है।
सच तो यह है कि इच्छा स्वयं बुरी नहीं है। यदि मनुष्य में इच्छा न होती तो न पहिया बनता, न जहाज समुद्र पार करता, न मनुष्य चाँद तक पहुँचता। कवि कविता लिखने की इच्छा करता है, वैज्ञानिक खोज की, विद्यार्थी ज्ञान की, किसान बेहतर फसल की और माता-पिता अपने बच्चों के बेहतर भविष्य की। सभ्यता का एक बड़ा हिस्सा मनुष्य की इसी बेचैनी का परिणाम है।
समस्या इच्छा में नहीं, इच्छा के मालिक के गुलाम बन जाने में है।
एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी इच्छा सामने खड़ी हो जाती है। फिर तीसरी, चौथी और पाँचवीं। मनुष्य वस्तुओं को नहीं, वस्तुएँ मनुष्य को चलाने लगती हैं। पहले हम मोबाइल खरीदते हैं, फिर मोबाइल हमें सूचनाएँ, संदेश और विज्ञापन देकर चलाने लगता है। पहले हम घर बनाते हैं, फिर घर की ईएमआई हमारी दिनचर्या तय करती है। पहले पैसा साधन था, धीरे-धीरे साध्य बन जाता है।
और यहीं संतोष की जरूरत शुरू होती है।
संतोष का अर्थ यह नहीं कि आदमी प्रयास करना छोड़ दे। संतोष आलस्य का दूसरा नाम नहीं है। जो व्यक्ति यह कहकर बैठ जाए कि “जो होना था हो गया, अब कुछ नहीं करना”, वह संतोषी नहीं, निष्क्रिय है। संतोष तो कर्म करते हुए भीतर की उस बेचैनी को नियंत्रित करने का नाम है जो कहती रहती है—“तुम्हारे पास पर्याप्त नहीं है।”
एक गरीब आदमी और एक करोड़पति दोनों असंतुष्ट हो सकते हैं। फर्क केवल इतना है कि दोनों की इच्छाओं का आकार अलग है। कभी-कभी जिसके पास बहुत कुछ होता है, उसके भीतर “और” की भूख भी उतनी ही बड़ी होती है। दूसरी ओर, कोई व्यक्ति सीमित साधनों में भी जीवन के छोटे-छोटे सुखों को पहचान लेता है। उसके लिए सुबह की धूप, चाय की प्याली, किसी अपने की मुस्कान, काम के बाद की थकान और रात की नींद भी जीवन की संपत्ति हो सकती है।
संतोष शायद “मेरे पास क्या नहीं है” से ध्यान हटाकर “मेरे पास क्या है” देखने की दृष्टि है।
हमारी सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम वर्तमान को भविष्य के लिए गिरवी रख देते हैं। कहते हैं—अभी मेहनत कर लें, फिर आराम करेंगे। अभी पैसा कमा लें, फिर जीवन का आनंद लेंगे। अभी बच्चों का भविष्य बना दें, फिर अपने लिए समय निकालेंगे। लेकिन भविष्य जब आता है तो वह भी वर्तमान बन जाता है और हम फिर अगले भविष्य की तैयारी में लग जाते हैं।
इस तरह जीवन लगातार “फिर कभी” में बदलता रहता है।
संतोष हमें इसी “फिर कभी” से निकालकर “अभी” में लाता है।
लेकिन यहाँ भी एक सावधानी जरूरी है। संतोष का मतलब अपनी कमियों को महिमामंडित करना नहीं है। यदि कोई व्यक्ति शिक्षा प्राप्त कर सकता है और नहीं करता, स्वास्थ्य सुधार सकता है और नहीं करता, अपनी प्रतिभा का उपयोग कर सकता है और नहीं करता, तो केवल यह कह देना कि “मैं संतुष्ट हूँ”—संतोष नहीं, आत्मप्रवंचना है। जहाँ परिवर्तन संभव हो और आवश्यक भी, वहाँ संतोष कभी-कभी कायरता का सुंदर नाम बन सकता है।
इसलिए शायद हमें दो तरह के संतोष में फर्क करना चाहिए—एक वह जो हमें रोक देता है और दूसरा वह जो हमें भीतर से स्थिर रखता है।
पहला संतोष कहता है—“बस, अब कुछ नहीं चाहिए।”
दूसरा कहता है—“बहुत कुछ चाहिए, लेकिन जो अभी है, वह भी कम नहीं।”
पहला विकास को रोक सकता है; दूसरा विकास के बीच मनुष्य को बचाए रखता है।
भारतीय चिंतन में संतोष को केवल आर्थिक स्थिति से जोड़कर नहीं देखा गया। योगदर्शन में भी संतोष को एक महत्त्वपूर्ण नैतिक अनुशासन माना गया है। इसका आशय यही है कि मनुष्य अपने जीवन की परिस्थितियों के साथ ऐसी आंतरिक सामंजस्य की स्थिति विकसित करे, जिसमें बाहरी उपलब्धियाँ उसके सुख का एकमात्र स्रोत न बन जाएँ।
क्योंकि बाहरी संसार में “पर्याप्त” की कोई अंतिम संख्या नहीं होती।
एक लाख के बाद दो लाख, दो के बाद पाँच, पाँच के बाद दस। एक कमरे के बाद दो कमरे, दो के बाद चार, चार के बाद आठ। समस्या यह नहीं कि संख्या बढ़ती जाती है; समस्या यह है कि हम अपनी संतुष्टि की सीमा भी उसी अनुपात में आगे खिसकाते जाते हैं।
बाजार इस मनोविज्ञान को हमसे बेहतर समझता है। वह हमें बताता रहता है कि जो हमारे पास है, वह पुराना है; जो हमारे पास नहीं है, वही नया है। हमारे पास फोन है, मगर नया मॉडल नहीं। हमारे पास कपड़े हैं, मगर इस मौसम का फैशन नहीं। हमारे पास घर है, मगर उसका इंटीरियर आधुनिक नहीं। यानी बाजार की भाषा में संतोष एक खतरनाक शब्द है, क्योंकि संतुष्ट आदमी को लगातार कुछ बेच पाना कठिन है।
इसीलिए आधुनिक जीवन में संतोष एक तरह का आंतरिक प्रतिरोध भी है।
यह प्रतिरोध प्रगति के खिलाफ नहीं, बल्कि उस अंधी दौड़ के खिलाफ है जिसमें हमें पता ही नहीं रहता कि हम किससे आगे निकलना चाहते हैं।
शायद जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि हम अक्सर दूसरों की जिंदगी देखकर अपनी जिंदगी को कमतर समझने लगते हैं। पड़ोसी ने नई कार खरीदी तो हमारी पुरानी कार अचानक छोटी हो गई। किसी परिचित ने विदेश यात्रा की तो अपना शहर नीरस लगने लगा। किसी ने नया मकान बनाया तो अपना घर अधूरा लगने लगा। सोशल मीडिया ने तो इस तुलना को चौबीस घंटे का उद्योग बना दिया है। वहाँ हर किसी की जिंदगी इतनी चमकदार दिखाई देती है कि अपनी जिंदगी पर धूल जमी हुई लगने लगती है।
लेकिन हम भूल जाते हैं कि हम दूसरों की जिंदगी की झलक की तुलना अपनी जिंदगी की पूरी कहानी से कर रहे होते हैं।
संतोष इस तुलना से मुक्ति देता है।
वह कहता है—तुम्हारी जिंदगी तुम्हारी है। तुम्हारे सुख की परिभाषा किसी दूसरे के ड्राइंग रूम, बैंक बैलेंस या छुट्टियों की तस्वीर से तय नहीं होगी।
फिर भी मनुष्य पूरी तरह इच्छामुक्त नहीं हो सकता। और शायद उसे होना भी नहीं चाहिए। इच्छा मनुष्य को मनुष्य बनाती है। कोई बेहतर दुनिया की इच्छा करता है, कोई बेहतर कविता की, कोई बेहतर समाज की। किसी की इच्छा व्यक्तिगत होती है, किसी की सामूहिक। इसलिए इच्छाओं को मिटाना समाधान नहीं; इच्छाओं का विवेकपूर्ण चुनाव करना समाधान है।
हर इच्छा के सामने यह प्रश्न रखा जा सकता है—क्या मुझे सचमुच इसकी जरूरत है, या मुझे केवल इसलिए चाहिए कि किसी और के पास है?
क्या यह मेरी जिंदगी को बेहतर बनाएगी या केवल मेरी बेचैनी को कुछ समय के लिए शांत करेगी?
और सबसे बड़ा प्रश्न—यदि यह मुझे मिल भी गया तो उसके बाद क्या?
शायद इस “उसके बाद क्या?” के उत्तर में संतोष का बीज छिपा है।
मनुष्य की इच्छाएँ अनंत हैं, इसलिए हर इच्छा पूरी करके संतोष प्राप्त करना असंभव है। लेकिन मनुष्य इच्छाओं के बीच चुनाव करके, उपलब्धियों के बीच ठहरकर और वर्तमान को स्वीकार करके संतोष पा सकता है।
संतोष कोई अंतिम मुकाम नहीं, जीने की एक मुद्रा है।
जैसे यात्रा में कोई यात्री रास्ते के सुंदर दृश्य देखने के लिए खिड़की से बाहर देखता है। मंजिल तक पहुँचना जरूरी है, लेकिन केवल मंजिल को देखते रहने वाला रास्ते को खो देता है। जीवन भी ऐसी ही यात्रा है। इच्छाएँ हमारी मंजिलें बनाती रहें, पर संतोष हमें रास्ते के पेड़, बादल, धूप, बारिश और साथ चल रहे लोगों को देखने की फुर्सत देता रहे।
अंततः संतोष शायद इच्छाओं का अंत नहीं, उन पर अपना अधिकार वापस पा लेना है।
यह कहना नहीं कि “मुझे कुछ नहीं चाहिए”, बल्कि यह कह पाना है—“मुझे बहुत कुछ चाहिए, लेकिन मेरी खुशी केवल उन्हीं चीजों पर निर्भर नहीं है।”
और शायद यही वह क्षण है जब मनुष्य इच्छा का दास न रहकर उसका स्वामी बनता है।
तब “संतोषं परमं सुखम्” कोई पुराना उपदेश नहीं रह जाता। वह जीवन का एक गहरा व्यावहारिक सूत्र बन जाता है—चलते रहो, चाहते रहो, बेहतर बनने की कोशिश करते रहो; लेकिन जो मिला है, उसे इतना छोटा मत समझो कि जो नहीं मिला, उसकी छाया में पूरा जीवन अंधेरा हो जाए।
क्योंकि इच्छाएँ सचमुच अनंत हैं।
पर जीवन—अनंत नहीं।
इसलिए शायद संतोष का सबसे बड़ा अर्थ यही है कि अनंत इच्छाओं के बीच सीमित जीवन को जीना न भूलें।

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