भेड़चाल—शब्द सुनते ही आंखों के सामने भेड़ों का एक झुंड आ जाता है। आगे वाली भेड़ जहां मुड़ती है, पीछे वाली बिना यह पूछे कि रास्ता कहां जाता है, किस दिशा में जाती है। उसे न नक्शा चाहिए, न गूगल मैप, न मंजिल का पता। बस सामने वाली चल रही है, इसलिए वह भी चल रही है। इंसान और भेड़ में फर्क यही होना चाहिए कि इंसान कभी-कभी रुककर पूछे—“आखिर मैं जा कहां रहा हूं?” लेकिन मुश्किल यह है कि आधुनिक मनुष्य ने भेड़चाल को इतना आधुनिक, आकर्षक और सुविधाजनक बना दिया है कि अब वह इसे चाल नहीं, जीवन-शैली समझने लगा है।
भेड़चाल का अर्थ केवल दूसरों की नकल करना नहीं है। यह उस मनोवृत्ति का नाम है जिसमें व्यक्ति अपने निर्णय की जिम्मेदारी किसी दूसरे के निर्णय पर डाल देता है। “सब कर रहे हैं”, “सब जा रहे हैं”, “सब खरीद रहे हैं”, “सब यही कह रहे हैं”—ये भेड़चाल के सबसे लोकप्रिय तर्क हैं। यहां ‘सब’ एक ऐसा अदृश्य देवता है जिसके सामने तर्क, विवेक और व्यक्तिगत पसंद अक्सर नतमस्तक हो जाते हैं।
भेड़चाल आखिर इतनी आकर्षक क्यों है? क्योंकि अकेले चलने में जोखिम है। भीड़ में चलने में सुरक्षा का भ्रम है। यदि हम कोई फैसला अकेले लेते हैं और वह गलत निकलता है तो उंगली हमारी ओर उठेगी। लेकिन अगर वही फैसला हजार लोगों ने लिया हो तो हमें सांत्वना मिल जाती है—“गलती हुई तो सबकी हुई।” मनुष्य स्वभाव से सामाजिक प्राणी है। उसे समूह का हिस्सा बने रहना अच्छा लगता है। समूह से अलग खड़ा होना केवल शारीरिक दूरी नहीं बनाता, कभी-कभी मनोवैज्ञानिक अकेलापन भी पैदा करता है। इसलिए भीड़ हमें सिर्फ रास्ता नहीं देती, आत्मविश्वास भी उधार देती है।
बाजार ने मनुष्य की इसी कमजोरी को बहुत पहले पहचान लिया था। किसी दुकान के बाहर भीड़ दिखाई दे तो भीतर जाने की इच्छा अचानक बढ़ जाती है। कोई रेस्तरां भरा हुआ हो तो लगता है कि खाना अच्छा ही होगा। सोशल मीडिया पर किसी चीज के लाखों अनुयायी हों तो हम मान लेते हैं कि उसमें कुछ खास जरूर होगा। कोई वीडियो वायरल हो गया तो हम उसे देखने से पहले ही उसके महत्वपूर्ण होने का प्रमाणपत्र दे देते हैं। लोकप्रियता धीरे-धीरे गुणवत्ता का पर्याय बना दी जाती है। फिर हम किसी चीज को इसलिए पसंद नहीं करते कि वह अच्छी है; वह अच्छी लगने लगती है क्योंकि बहुत सारे लोग उसे पसंद कर रहे हैं।
फैशन भेड़चाल का शायद सबसे सुंदर उदाहरण है। कल तक जो कपड़ा अजीब लग रहा था, आज वही फैशन बन जाए तो वही अजीबपन स्टाइल कहलाने लगता है। कल तक बालों की एक खास शैली देखकर हम कहते थे—“यह कैसी कटिंग है?” आज वही कटिंग देखकर कहते हैं—“क्या लुक है!” वस्तु वही, सिर वही, चेहरा वही; बदला सिर्फ इतना कि दूसरों ने उसे स्वीकार कर लिया। यानी हमारी पसंद कई बार हमारी अपनी नहीं होती, वह सामूहिक स्वीकृति से निर्मित होती है।
शिक्षा और करियर में भी भेड़चाल खूब दिखाई देती है। एक समय इंजीनियरिंग का दौर आया तो हर बच्चा इंजीनियर बनने लगा। फिर प्रबंधन आया तो एमबीए की कतार लग गई। उसके बाद सरकारी नौकरी, विदेश की पढ़ाई, आईटी, डेटा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता—हर युग अपनी एक सामूहिक महत्वाकांक्षा लेकर आता है। बच्चे की रुचि क्या है, उसकी क्षमता क्या है, वह किस तरह का जीवन चाहता है—ये प्रश्न अक्सर पीछे छूट जाते हैं। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न बन जाता है—“आजकल चल क्या रहा है?”
भेड़चाल केवल आधुनिक समस्या भी नहीं है। मनुष्य के इतिहास में भीड़ के साथ चलने की प्रवृत्ति पुरानी है। कभी राजा की बात अंतिम सत्य थी, कभी समाज की परंपरा, कभी मोहल्ले की राय, कभी परिवार का फैसला। आज माध्यम बदल गए हैं। पहले दस लोग मिलकर किसी की राय बनाते थे, अब दस लाख लोग सोशल मीडिया पर वही काम कर सकते हैं। फर्क इतना है कि पहले भेड़चाल पैदल चलती थी, अब वह मोबाइल की स्क्रीन पर दौड़ती है।
और राजनीति से लेकर विचारों तक, भेड़चाल का असर दिखाई देता है। लोग कई बार किसी विचार को इसलिए स्वीकार कर लेते हैं कि उनके अपने समूह के लोग उसे स्वीकार करते हैं। फिर विचार तर्क से नहीं, पहचान से जुड़ जाता है। अपने लोग जो कह रहे हैं वह सही; दूसरे लोग जो कह रहे हैं वह गलत। धीरे-धीरे मनुष्य विचारों का मालिक नहीं रहता, विचार उसके मालिक हो जाते हैं। उसे अपने विचार बदलने में शर्म आने लगती है, क्योंकि उसे लगता है कि विचार बदलना समूह से बाहर निकलना है।
लेकिन यहां एक दिलचस्प विरोधाभास है। हर भीड़ गलत नहीं होती और हर अकेला व्यक्ति सही नहीं होता। यदि सड़क पर हजार लोग एक दिशा में भाग रहे हों तो यह मान लेना कि वे सभी मूर्ख हैं, उतना ही मूर्खतापूर्ण होगा जितना यह मान लेना कि वे सभी सही हैं। कभी भीड़ इसलिए दौड़ती है क्योंकि सामने खतरा है। कभी इसलिए क्योंकि सामने मुफ्त भोजन है। कभी इसलिए क्योंकि किसी ने अफवाह फैला दी है। इसलिए असली सवाल भीड़ में शामिल होने या उससे अलग होने का नहीं, बल्कि यह जानने का है कि भीड़ चल क्यों रही है।
समाज के विकास में भी सामूहिक व्यवहार की अपनी उपयोगिता है। भाषा, कानून, यातायात के नियम, सामाजिक परंपराएं, मुद्रा, संस्थाएं—इनमें बहुत कुछ इसलिए काम करता है क्योंकि बड़ी संख्या में लोग एक साझा व्यवस्था को स्वीकार करते हैं। यदि हर व्यक्ति हर क्षण अपनी अलग सड़क, अलग भाषा, अलग नियम और अलग व्यवस्था बनाने लगे तो समाज चलना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए हर सामूहिकता भेड़चाल नहीं है। सहमति और अंधानुकरण में वही अंतर है जो आंख खोलकर साथ चलने और आंख बंद करके पीछे चलने में है।
भेड़चाल का सबसे खतरनाक रूप तब सामने आता है जब वह प्रश्न पूछने की क्षमता छीन लेती है। “क्यों?” मनुष्य की सबसे छोटी और शायद सबसे ताकतवर खोजी मशीन है। बच्चे बार-बार पूछते हैं—क्यों? लेकिन उम्र बढ़ने के साथ हम अक्सर पूछना बंद कर देते हैं। समाज कहता है—ऐसा ही होता है। बाजार कहता है—सब खरीद रहे हैं। सोशल मीडिया कहता है—यह ट्रेंडिंग है। परिवार कहता है—सबके बच्चे ऐसा कर रहे हैं। और हम धीरे से पूछना भी छोड़ देते हैं कि “लेकिन मेरे लिए क्या सही है?”
शायद इसलिए भेड़चाल सुविधाजनक है। इसमें निर्णय लेने की मेहनत कम है। अपना रास्ता चुनने के लिए विवेक चाहिए, जानकारी चाहिए, जोखिम उठाने का साहस चाहिए और कभी-कभी अकेले खड़े होने की क्षमता भी। भीड़ में शामिल होने के लिए सिर्फ पैर चाहिए—और वे भी अपने नहीं, सामने वाले के पीछे चलने के लिए।
लेकिन जिंदगी की सबसे दिलचस्प यात्राएं अक्सर उन्हीं लोगों ने की हैं जिन्होंने एक दिन भीड़ से थोड़ा किनारा कर लिया। उन्होंने पूछा—क्या कोई दूसरा रास्ता हो सकता है? यही प्रश्न वैज्ञानिक खोज का आरंभ है, कला का आरंभ है, साहित्य का आरंभ है और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का भी। हर नया विचार किसी पुराने रास्ते से थोड़ा हटकर ही पैदा होता है।
इसका मतलब यह नहीं कि हमें हर बात में भीड़ के खिलाफ चलना चाहिए। केवल इसलिए कि बाकी लोग दाएं जा रहे हैं, बाएं चले जाना भी कोई बुद्धिमत्ता नहीं। भीड़ के विरुद्ध जाना भी अगर भीड़ की प्रतिक्रिया में हो, तो वह भेड़चाल का उल्टा संस्करण ही है। असली स्वतंत्रता तो यह है कि हम न भीड़ से प्रभावित होकर चलें, न भीड़ से प्रभावित होकर उसके खिलाफ जाएं; हम देखें, सोचें और फिर तय करें कि हमें जाना किधर है।
आखिर भेड़चाल में बुराई भेड़ों में कम और मनुष्य के उस आलस्य में अधिक है, जो अपने फैसलों की जिम्मेदारी उठाना नहीं चाहता। भीड़ हमें रास्ता दे सकती है, लेकिन मंजिल नहीं चुन सकती। भीड़ हमें लोकप्रिय बना सकती है, लेकिन जरूरी नहीं कि सही भी बनाए। भीड़ में चलना आसान है, मगर जीवन की असली पहचान शायद उस क्षण से शुरू होती है जब हम चलते-चलते एक बार पीछे मुड़कर देखते हैं और पूछते हैं—“सब जा रहे हैं, ठीक है; लेकिन मैं क्यों जा रहा हूं?”
यही एक सवाल भेड़चाल को विचार में और अनुकरण को निर्णय में बदल सकता है। और शायद मनुष्य होने की शुरुआत भी यहीं से होती है।
अगर बिल्कुल ताजा और आंखों के सामने दिखने वाला उदाहरण लेना हो, तो इस समय सबसे अच्छा उदाहरण है—AI से अपनी पुरानी 1980s वाली तस्वीर बनवाने का वायरल ट्रेंड।
पिछले कुछ दिनों में लोग अपनी वर्तमान तस्वीरों को AI की मदद से 1980 के दशक के लुक में बदलकर सोशल मीडिया पर डाल रहे हैं। बात यहां तक पहुंची कि Piyush Goyal, Kiren Rijiju और दूसरे सार्वजनिक चेहरे भी इस ट्रेंड में शामिल हो गए।
यह भेड़चाल का बड़ा खूबसूरत डिजिटल संस्करण है—पहले किसी ने अपनी फोटो को 80s का बना दिया, दूसरे ने देखा तो उसने भी बना ली, तीसरे ने देखा तो उसे लगा कि वह पीछे क्यों रहे, और देखते-देखते “मेरी भी 1980 वाली फोटो बना दो” एक सामूहिक इच्छा बन गई। यहां किसी को कोई नुकसान नहीं हो रहा, इसलिए यह भेड़चाल का अपेक्षाकृत harmless रूप है; लेकिन मनोविज्ञान वही है—दूसरे कर रहे हैं, इसलिए मुझे भी करना है।
और इसका एक और मजेदार पहलू है: जिस तकनीक ने कभी लोगों को अलग और मौलिक बनाने का दावा किया था, वही तकनीक कुछ ही दिनों में सबको एक ही ट्रेंड में शामिल कर देती है। AI तस्वीरें अलग-अलग लोगों की हैं, मगर उनका विचार एक ही है—“देखो, मैं 80 के दशक में कैसा दिखता।”
भेड़चाल का थोड़ा तीखा और व्यंग्यात्मक उदाहरण चाहिए, तो इससे भी बेहतर ताजा उदाहरण बॉलीवुड में मिल रहा है। Kareena Kapoor Khan ने अभी इसी सप्ताह हिंदी फिल्म उद्योग की “herd mentality” पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर Animal सफल हुई तो सब वैसी हिंसक फिल्में बनाने लगेंगे।
भेड़चाल का सबसे ताजा उदाहरण शायद यह है कि आजकल कोई एक चीज चल जाए तो बाकी लोग यह नहीं पूछते कि वह क्यों चली; वे पूछते हैं—हम भी वही कब बना रहे हैं? फिल्म चल गई तो उसी तरह की फिल्म, कोई रील वायरल हो गई तो वैसी ही रील, AI का एक फोटो-ट्रेंड चल पड़ा तो हर मोबाइल में वही पुराना जमाना। यानी पहले ट्रेंड बनता था, फिर लोग उसे अपनाते थे; अब लोग ट्रेंड देखते ही उसके पीछे दौड़ पड़ते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले भेड़ें चरवाहे के पीछे चलती थीं, आज मनुष्य ‘ट्रेंडिंग’ के पीछे चलता है।”

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