रविवार, 13 सितंबर 2026

निठल्ले के नोट्स - एआई से किसका फायदा किसका नुकसान

मनुष्य को सामाजिक प्राणी कहा जाता है। अरस्तू ने मनुष्य को ‘पॉलिटिकल एनिमल’ कहा था, जिसका आशय केवल राजनीति करने वाले प्राणी से नहीं, बल्कि ऐसे जीव से था जो समुदाय में रहकर अपना जीवन पूरा करता है। जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य किसी न किसी सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा रहता है। परिवार उसका पहला समाज है, विद्यालय दूसरा, मित्रों और सहकर्मियों का संसार तीसरा और फिर पूरा समाज उसकी पहचान का विस्तार बन जाता है। मनुष्य अकेले जंगल में रहकर शायद जीवित रह सकता है, लेकिन मनुष्य के रूप में विकसित होना उसके लिए सामाजिक संबंधों के बिना कठिन है। भाषा समाज से मिलती है, व्यवहार समाज से सीखा जाता है, संस्कृति समाज से आती है और यहाँ तक कि हम अपने बारे में जो धारणा बनाते हैं, उसमें भी दूसरों की नजर का बड़ा हिस्सा होता है। लेकिन यही सामाजिकता, जो मनुष्य को मनुष्य बनाती है, कई बार उसके लिए मानसिक बोझ भी बन जाती है।

सामाजिक होने का सबसे पहला नुकसान यह है कि मनुष्य धीरे-धीरे अपनी जिंदगी का मूल्यांकन अपनी नजर से कम और दूसरों की नजर से अधिक करने लगता है। पड़ोसी ने क्या खरीदा, रिश्तेदार का बेटा कहाँ पहुँचा, दोस्त की तनख्वाह कितनी है, किसके घर में क्या बना, किसने कौन-सी गाड़ी खरीदी, किसकी बेटी की शादी कहाँ हुई और किसका बेटा विदेश चला गया—ये सवाल धीरे-धीरे हमारे अपने जीवन के सवालों पर कब्जा कर लेते हैं। पहले तुलना मोहल्ले तक सीमित थी, अब सोशल मीडिया ने पूरी दुनिया को पड़ोस बना दिया है। आदमी सुबह अपने घर की खिड़की खोलने से पहले मोबाइल की खिड़की खोलता है और देखते-देखते उसे लगता है कि दुनिया में हर कोई उससे अधिक सुखी, अधिक सफल, अधिक सुंदर, अधिक संपन्न और अधिक संतुष्ट है। सामाजिकता यहाँ संबंध नहीं रहती, प्रतियोगिता बन जाती है।

समाज का दूसरा दबाव है—स्वीकृति का दबाव। मनुष्य चाहता है कि लोग उसे अच्छा समझें, सम्मान दें, स्वीकार करें। यह इच्छा स्वाभाविक है, लेकिन जब दूसरों की स्वीकृति हमारी आत्म-मूल्य की कसौटी बन जाती है, तब समस्या शुरू होती है। हम कई बार वह नहीं करते जो हमें सही लगता है, बल्कि वह करते हैं जिसे समाज सही मानेगा। हमारी शिक्षा, नौकरी, विवाह, मकान, कपड़े, खान-पान, यात्राएँ और यहाँ तक कि हमारे विचार भी कई बार सामाजिक अपेक्षाओं के हिसाब से तय होने लगते हैं। आदमी अपनी जिंदगी जीता कम है, उसका सामाजिक संस्करण निभाता अधिक है। भीतर से वह कुछ और होना चाहता है और बाहर से कुछ और दिखाई देना चाहता है। इस अंतर से पैदा होने वाली थकान बहुत गहरी होती है।

सामाजिक होने का एक और नुकसान है—हर बात में राय देने और हर बात पर प्रतिक्रिया देने की आदत। पहले किसी व्यक्ति के जीवन में उसके अपने मोहल्ले के कुछ दर्जन लोग होते थे; आज उसके जीवन में सैकड़ों-हजारों डिजिटल परिचित हैं। किसी ने कुछ लिखा, किसी ने कुछ कहा, किसी ने कोई फोटो डाली, किसी ने कोई राजनीतिक या सामाजिक टिप्पणी की और हम तुरंत उसमें शामिल हो गए। दूसरों के जीवन की इतनी जानकारी हमारे पास है कि कई बार अपने जीवन के लिए समय ही नहीं बचता। मनुष्य की मानसिक ऊर्जा सीमित है, लेकिन उसकी सामाजिक जिज्ञासा असीमित। परिणाम यह होता है कि वह अपनी समस्याओं से अधिक दूसरों की समस्याओं पर विचार करने लगता है और अपनी जिंदगी की तुलना दूसरों की जिंदगी से करते-करते अपनी शांति खो देता है।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि समाधान असामाजिक हो जाना है। सामाजिकता से भागने की अपनी कीमत है। मनुष्य यदि पूरी तरह दूसरों से कट जाए तो धीरे-धीरे संवाद, आत्मीयता और भावनात्मक सहारे से वंचित हो सकता है। मनुष्य को केवल भोजन और आवास नहीं चाहिए; उसे किसी का साथ भी चाहिए। बीमारी में किसी का फोन, सफलता में किसी की बधाई, दुख में किसी का कंधा, संकट में किसी का हाथ और अकेलेपन में किसी की आवाज—इनकी कोई मशीन पूरी तरह भरपाई नहीं कर सकती। दुनिया में कितनी भी तकनीक आ जाए, मनुष्य के भीतर किसी दूसरे मनुष्य द्वारा समझे जाने की इच्छा समाप्त नहीं होगी।

असामाजिक होने का सबसे बड़ा नुकसान अकेलापन है। अकेले रहना और अकेलापन दो अलग चीजें हैं। कोई व्यक्ति अकेले रहकर भी संतुष्ट हो सकता है, क्योंकि उसके भीतर आत्मीय संबंधों की दुनिया हो सकती है; लेकिन कोई व्यक्ति भीड़ के बीच रहकर भी अकेला हो सकता है। समस्या तब पैदा होती है जब व्यक्ति किसी से जुड़ना ही नहीं चाहता, किसी से अपनी बात कहना नहीं चाहता और धीरे-धीरे उसके जीवन में संवाद के दरवाजे बंद होते जाते हैं। मनुष्य जितना बाहर की दुनिया से कटता है, उतना ही कभी-कभी अपने विचारों के भीतर फँसने लगता है। उसे अपनी धारणाओं को चुनौती देने वाला कोई नहीं मिलता और उसका संसार धीरे-धीरे छोटा होता जाता है।

अत्यधिक असामाजिकता का एक दूसरा खतरा यह है कि व्यक्ति सामाजिक अनुभवों से मिलने वाली सीख से वंचित हो सकता है। दूसरे मनुष्य हमारे लिए केवल मनोरंजन या संबंध नहीं हैं; वे हमारे शिक्षक भी हैं। हम दूसरों की सफलताओं से सीखते हैं, उनकी गलतियों से सावधान होते हैं, उनके अनुभवों से अपने रास्ते पहचानते हैं। यदि हम हर संबंध को अनावश्यक समझकर दरवाजा बंद कर दें तो हम केवल दूसरों को नहीं खोते, अपनी सीखने की संभावनाएँ भी कम कर देते हैं। मनुष्य का व्यक्तित्व संवाद में परिपक्व होता है। असहमति भी उसके लिए उपयोगी है, क्योंकि हर समय अपने ही विचारों की प्रतिध्वनि सुनते रहने से विचार मजबूत नहीं, कई बार संकीर्ण हो जाते हैं।

फिर रास्ता क्या है? शायद उत्तर सामाजिक या असामाजिक होने के बीच कहीं नहीं, बल्कि सजग सामाजिक होने में है। हमें समाज से भागना नहीं है, लेकिन समाज को अपने भीतर पूरी तरह घुसने भी नहीं देना है। हमें रिश्ते रखने हैं, लेकिन हर रिश्ता अपनी पूरी मानसिक ऊर्जा मांगता रहे, यह जरूरी नहीं। हमें दूसरों की चिंता करनी है, लेकिन दूसरों की जिंदगी अपने सिर पर उठाकर नहीं घूमना है। हमें सहानुभूतिशील होना है, हस्तक्षेपकारी नहीं; संवेदनशील होना है, अति-जिज्ञासु नहीं; मिलनसार होना है, हर समय उपलब्ध नहीं।

यही वह जगह है जहाँ “अपने काम से काम रखना” एक सकारात्मक जीवन-दर्शन बन सकता है। अपने काम से काम रखने का अर्थ यह नहीं कि दुनिया में क्या हो रहा है, इससे कोई मतलब न रखा जाए। इसका अर्थ है कि हर घटना को अपनी मानसिक संपत्ति न बनाया जाए। किसी की परेशानी देखकर मदद करना सामाजिकता है; उसकी निजी जिंदगी में अनावश्यक ताक-झाँक करना दखल है। किसी की सफलता से प्रेरित होना स्वस्थ है; उसी सफलता से अपनी जिंदगी को छोटा समझना आत्म-पीड़ा है। किसी से असहमति होना सामान्य है; हर असहमति को युद्ध बना देना मानसिक अव्यवस्था है।

संतुलित सामाजिकता का एक सरल सिद्धांत हो सकता है—सरोकार रखिए, नियंत्रण नहीं; संबंध रखिए, निर्भरता नहीं; प्रेम रखिए, स्वामित्व नहीं; संवाद रखिए, अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं। जीवन में कुछ लोग ऐसे होने चाहिए जिनके सामने हम बिना किसी भूमिका के अपने वास्तविक रूप में रह सकें। ऐसे संबंध संख्या में कम हों तो भी पर्याप्त हैं। सौ परिचितों से अधिक मूल्य कभी-कभी उन दो-चार लोगों का होता है जिनसे बात करने के बाद मन हल्का हो जाता है।

यहाँ एक और फर्क समझना जरूरी है—व्यस्त रहना और मशगूल रहना एक बात नहीं है। सामाजिक दुनिया हमें लगातार व्यस्त रख सकती है, लेकिन व्यस्तता हमेशा अर्थपूर्ण नहीं होती। फोन पर संदेशों का जवाब देना, सोशल मीडिया देखना, दूसरों की गतिविधियों पर नजर रखना और हर बहस में शामिल होना भी एक प्रकार की व्यस्तता है; मगर यह मन को समृद्ध करने के बजाय उसे बिखेर सकती है। इसके विपरीत अपने काम, अध्ययन, लेखन, संगीत, कला, व्यायाम, परिवार या किसी सार्थक उद्देश्य में तल्लीन होना मनुष्य को भीतर से संगठित करता है। समाज से थोड़ा पीछे हटना तब असामाजिकता नहीं, आत्म-संरक्षण हो जाता है।

शायद आधुनिक मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या अकेलापन नहीं, बल्कि अति-सामाजिकता और वास्तविक आत्मीयता के बीच का अंतर है। हमारे संपर्क बढ़े हैं, लेकिन क्या हमारे संबंध भी उतने ही गहरे हुए हैं? हमारे मित्रों की सूची लंबी हुई है, लेकिन क्या संकट में फोन करने लायक लोगों की संख्या भी बढ़ी है? हमारे पास हजारों लोगों की खबर है, लेकिन क्या हमें अपने भीतर की खबर है? हम दुनिया से जुड़े हुए हैं, लेकिन क्या हम स्वयं से भी जुड़े हुए हैं? ये प्रश्न आज इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि तकनीक ने मनुष्य को पहले से कहीं अधिक सामाजिक दिखाई देने की सुविधा दे दी है, जबकि भीतर से वह पहले से अधिक अकेला भी हो सकता है।

इसलिए शायद आदर्श मनुष्य न तो पूरी तरह सामाजिक है, न पूरी तरह असामाजिक। वह सामाजिक भी है और आत्मनिर्भर भी। वह लोगों के बीच रह सकता है, लेकिन अकेले रहने से डरता नहीं। वह मित्र बनाता है, लेकिन अपनी खुशी का पूरा भार मित्रों पर नहीं डालता। वह परिवार से जुड़ा है, लेकिन हर व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता का सम्मान करता है। वह समाज की चिंता करता है, लेकिन हर सामाजिक विवाद को अपने जीवन का व्यक्तिगत युद्ध नहीं बना लेता। वह दुनिया को सुनता है, पर हर आवाज को अपने भीतर जगह नहीं देता।

अंततः मनुष्य को शायद उतना ही सामाजिक होना चाहिए जितना उसकी मनुष्यता के लिए आवश्यक है, और उतना ही एकांतप्रिय जितना उसकी आत्मा को अपने भीतर लौटने के लिए जरूरी है। समाज हमें बताता है कि दुनिया में हमारे अलावा भी लोग हैं; एकांत हमें याद दिलाता है कि इस दुनिया में हम स्वयं भी हैं। केवल समाज में रहेंगे तो भीड़ का हिस्सा बन सकते हैं और केवल अपने भीतर रहेंगे तो दुनिया से कट सकते हैं। जीवन की परिपक्वता शायद इसी में है कि हम भीड़ में रहते हुए भी अपना चेहरा बचाए रखें और अकेले रहते हुए भी दुनिया से अपना रिश्ता न तोड़ें।

मनुष्य सामाजिक प्राणी है—यह उसकी प्रकृति है। लेकिन सजग मनुष्य वह है जो यह भी जानता है कि किससे जुड़ना है, किससे दूरी रखनी है, किसकी मदद करनी है, किसकी बात सुननी है और किन बातों को हवा में उड़ जाने देना है। शायद स्वस्थ जीवन का सबसे सुंदर संतुलन यही है—दुनिया से रिश्ता बना रहे, लेकिन दुनिया हमारे भीतर का सुकून न छीन ले।


आपके प्रश्न का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा केवल यह नहीं है कि एआई कितनी बिजली और पानी खर्च करता है, बल्कि यह है कि उस खर्च का लाभ किसे मिलता है और पर्यावरणीय कीमत कौन चुकाता है। उपलब्ध ताजा आंकड़ों के आधार पर इस विषय को इस तरह देखना अधिक उचित होगा।


कभी मनुष्य ने मशीन इसलिए बनाई थी कि मशीन उसका श्रम कम कर दे। फिर कंप्यूटर आया तो उसने मनुष्य की गणना आसान कर दी। इंटरनेट आया तो सूचना तक पहुँच आसान हो गई। अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई आ गई है, जो केवल गणना या सूचना नहीं देती, बल्कि लिखती है, पढ़ती है, अनुवाद करती है, तस्वीर बनाती है, कोड लिखती है, शोध में सहायता करती है, वीडियो तैयार करती है और धीरे-धीरे मनुष्य के बौद्धिक श्रम के उन हिस्सों में भी प्रवेश कर रही है जिन्हें कभी केवल मनुष्य की विशिष्ट क्षमता माना जाता था। लेकिन इस सुविधा की एक ऐसी कीमत भी है जिसे हम अपने मोबाइल या कंप्यूटर की स्क्रीन पर नहीं देख पाते। हर एआई उत्तर के पीछे कहीं न कहीं सर्वर चल रहे हैं, सर्वर के पीछे डेटा सेंटर हैं, डेटा सेंटर के पीछे बिजली है और उन मशीनों को चलाते-ठंडा रखते रहने के पीछे पानी और अन्य प्राकृतिक संसाधन हैं। इसलिए सवाल अब यह नहीं है कि एआई कितनी सुविधा दे रही है; सवाल यह भी है कि उस सुविधा के लिए हम कितनी बिजली और कितना पानी खर्च कर रहे हैं और उस खर्च का लाभ किसे मिल रहा है।


सबसे पहले बिजली की बात। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी यानी IEA के अनुसार 2024 में दुनिया के डेटा सेंटरों ने लगभग 415 टेरावाट-घंटे बिजली का इस्तेमाल किया, जो वैश्विक बिजली खपत का करीब 1.5 प्रतिशत था। यह संख्या अभी पूरी दुनिया की बिजली खपत की तुलना में बहुत बड़ी दिखाई नहीं देती, लेकिन चिंता इसकी वर्तमान मात्रा से अधिक इसकी गति को लेकर है। IEA के अनुमान के मुताबिक 2030 तक वैश्विक डेटा सेंटर बिजली खपत 945 टेरावाट-घंटे के आसपास पहुँच सकती है—अर्थात 2024 की तुलना में दोगुने से भी अधिक। इनमें एआई का बढ़ता उपयोग एक प्रमुख चालक है। कुछ बड़े एआई-केंद्रित डेटा सेंटरों की बिजली मांग इतनी अधिक हो सकती है कि उनकी तुलना बिजली-गहन औद्योगिक संयंत्रों से की जा सकती है।


यहाँ एक महत्वपूर्ण सावधानी भी जरूरी है। इंटरनेट पर अक्सर एक एआई प्रश्न के लिए पानी की खपत का कोई एक चौंकाने वाला आंकड़ा बताया जाता है—मानो हर प्रश्न पूछने पर आधी बोतल पानी खर्च हो जाती हो। वास्तविकता इतनी सरल नहीं है। पानी की खपत इस बात पर निर्भर करती है कि मॉडल कितना बड़ा है, उत्तर कितना लंबा है, सर्वर कितना कुशल है, डेटा सेंटर कहाँ स्थित है, वहाँ ठंडा करने की कौन-सी तकनीक इस्तेमाल होती है और बिजली किस स्रोत से आती है। उदाहरण के लिए, गूगल ने 2025 में अपनी गणना के आधार पर बताया कि उसके Gemini Apps में एक सामान्य टेक्स्ट प्रॉम्प्ट के लिए मध्यिका ऊर्जा खपत लगभग 0.24 वाट-घंटा और पानी की खपत लगभग 0.26 मिलीलीटर थी। यह आंकड़ा किसी भी एआई के हर प्रश्न पर लागू नहीं किया जा सकता, लेकिन यह जरूर बताता है कि “एक प्रश्न = एक बोतल पानी” जैसी सरल गणनाएँ भ्रामक हो सकती हैं।


लेकिन इससे एआई की जल-समस्या खत्म नहीं हो जाती। असली समस्या व्यक्तिगत प्रश्न में इस्तेमाल होने वाले कुछ मिलीलीटर पानी से कहीं बड़ी है। लाखों-करोड़ों प्रश्न, विशाल मॉडल की ट्रेनिंग, लगातार चलने वाले सर्वर, डेटा सेंटरों की कूलिंग और उन्हें बिजली उपलब्ध कराने वाली पूरी ऊर्जा-व्यवस्था मिलकर संसाधनों की बड़ी मांग पैदा करती है। पानी केवल सर्वर को ठंडा करने में ही नहीं लगता; बिजली बनाने की प्रक्रिया में भी अप्रत्यक्ष रूप से पानी का इस्तेमाल हो सकता है। यही कारण है कि किसी एआई प्रणाली की वास्तविक जल-छाप को केवल उसके सामने रखे कंप्यूटर की स्क्रीन देखकर समझना संभव नहीं है।


और यहाँ सबसे दिलचस्प प्रश्न आता है—बिजली और पानी खर्च कौन कर रहा है और फायदा किसे हो रहा है? उपयोगकर्ता तो केवल एक सवाल टाइप करता है और उसे कुछ सेकंड में उत्तर मिल जाता है। बिजली की बड़ी मशीनरी उसके घर में नहीं, बल्कि डेटा सेंटर में चल रही होती है। पानी उसके नल से नहीं बह रहा होता। पर्यावरणीय लागत उसके सामने दिखाई नहीं देती। लेकिन सुविधा सीधे उपयोगकर्ता तक पहुँच जाती है। यही आधुनिक डिजिटल अर्थव्यवस्था की एक विचित्र विशेषता है—खपत निजी दिखाई देती है, जबकि उसका आधारभूत संसाधन-खर्च कहीं और केंद्रित हो सकता है।


सबसे बड़ा आर्थिक लाभ निश्चित रूप से उन कंपनियों को मिल रहा है जो एआई मॉडल, क्लाउड कंप्यूटिंग, चिप, डेटा सेंटर और एआई सेवाओं का बुनियादी ढाँचा नियंत्रित करती हैं। इसके बाद उन व्यवसायों और पेशेवरों को लाभ मिलता है जो एआई की मदद से कम समय में अधिक काम कर पा रहे हैं। ऑक्सफोर्ड की भाषा में कहें तो यह केवल मशीन का इस्तेमाल नहीं, उत्पादकता का पुनर्गठन है। OECD के अध्ययनों में पाया गया है कि जनरेटिव एआई दोहराव वाले कामों को स्वचालित करके और कर्मचारियों की क्षमता बढ़ाकर उत्पादकता बढ़ा सकती है। कम अनुभवी कर्मचारियों को विशेष रूप से लाभ मिल सकता है क्योंकि एआई उन्हें तत्काल जानकारी, मार्गदर्शन और प्रतिक्रिया उपलब्ध कराती है।


इसका मतलब यह भी है कि एआई से होने वाला लाभ केवल बड़ी टेक कंपनियों तक सीमित नहीं है। एक छोटा व्यवसाय बेहतर ग्राहक सेवा दे सकता है, एक विद्यार्थी कठिन विषय समझ सकता है, एक पत्रकार शोध और प्रारंभिक ड्राफ्ट तैयार करने में समय बचा सकता है, एक शिक्षक पाठ्य-सामग्री बना सकता है, एक प्रोग्रामर कोडिंग का समय घटा सकता है और एक उद्यमी अकेले ही ऐसे काम कर सकता है जिनके लिए पहले पूरी टीम की आवश्यकता होती थी। IMF के 2026 के एक कार्यपत्र में वैश्विक एआई उपयोग के आधार पर अनुमान लगाया गया कि वर्तमान एआई उपयोग से बचाए गए श्रम-समय का आर्थिक मूल्य लगभग 2.7 ट्रिलियन डॉलर सालाना के बराबर हो सकता है। हालांकि यह वास्तविक नकद आय नहीं, बल्कि बचाए गए समय के श्रम-लागत के आधार पर निकाला गया संकेतक है।


लेकिन यहीं कहानी का दूसरा अध्याय शुरू होता है। यदि एआई से उत्पादकता बढ़ती है तो सवाल है—उस अतिरिक्त उत्पादकता का लाभ किसे मिलेगा? कंपनी को अधिक मुनाफा, कर्मचारी को अधिक वेतन, उपभोक्ता को सस्ती सेवा या केवल मालिकों और निवेशकों को अधिक पूंजीगत लाभ? इसका उत्तर अभी निश्चित नहीं है। IMF का विश्लेषण चेतावनी देता है कि एआई पूंजी पर मिलने वाले रिटर्न और उच्च आय वाले लोगों की उत्पादकता को अधिक बढ़ा सकती है, जिससे असमानता बढ़ने का खतरा है। भारत के संदर्भ में भी IMF ने अनुमान लगाया है कि लगभग 26 प्रतिशत भारतीय श्रमिक ऐसे व्यवसायों में हैं जिन पर एआई का उल्लेखनीय प्रभाव पड़ सकता है; इनमें करीब 14 प्रतिशत नौकरियाँ ऐसी हैं जहाँ एआई मानव श्रम का पूरक बन सकती है, जबकि लगभग 12 प्रतिशत अधिक विस्थापन-जोखिम वाली श्रेणी में आती हैं।


इसलिए यह कहना अधूरा होगा कि “एआई पानी बर्बाद कर रही है।” असली प्रश्न है—क्या उस पानी और बिजली के बदले समाज को पर्याप्त मूल्य मिल रहा है? यदि एआई किसी डॉक्टर को हजारों मेडिकल रिकॉर्ड तेजी से समझने में मदद करती है, किसी वैज्ञानिक को नई दवा खोजने में सहायता करती है, किसी किसान को मौसम और फसल के बारे में बेहतर निर्णय लेने देती है या किसी बिजली-प्रणाली को अधिक कुशल बनाती है, तो संसाधन का उपयोग एक उत्पादक निवेश बन सकता है। IEA भी इस बात पर जोर देता है कि एआई स्वयं ऊर्जा की बड़ी उपभोक्ता बनने के साथ-साथ ऊर्जा क्षेत्र को अधिक कुशल बनाने का माध्यम भी बन सकती है।


मसलन, माइक्रोसॉफ्ट ने अपने एक प्रयोग में एआई-आधारित नियंत्रण प्रणाली के माध्यम से एक भवन में 30 प्रतिशत से अधिक ऊर्जा बचत हासिल करने और एक फीनिक्स डेटा सेंटर में पानी की खपत में 21 प्रतिशत कमी दर्ज करने की बात कही है। कंपनी नए डेटा सेंटर डिजाइनों में ऐसी कूलिंग तकनीकों पर भी काम कर रही है जिनमें कूलिंग के लिए पानी की जरूरत बहुत कम या शून्य हो सकती है। इसका अर्थ है कि एआई की कहानी केवल “एआई पानी पीती है” तक सीमित नहीं है; एआई का इस्तेमाल पानी और ऊर्जा बचाने के लिए भी किया जा सकता है।


फिर भी इसमें एक बड़ा विरोधाभास है। जिस तकनीक से हम ऊर्जा बचाने की उम्मीद कर रहे हैं, वही तकनीक ऊर्जा की मांग भी तेजी से बढ़ा रही है। IEA के अनुसार 2024 में डेटा सेंटरों को बिजली देने के लिए दुनिया भर में लगभग 460 टेरावाट-घंटे बिजली की जरूरत थी और बेस-केस अनुमान में यह 2030 तक 1,000 टेरावाट-घंटे से ऊपर जा सकती है। अगले कुछ वर्षों में अतिरिक्त मांग का लगभग आधा हिस्सा नवीकरणीय स्रोतों से पूरा होने की उम्मीद है, लेकिन प्राकृतिक गैस और कोयला भी इस वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए एआई का पर्यावरणीय प्रभाव इस बात पर भी निर्भर करेगा कि उसके पीछे की बिजली किस स्रोत से आती है।


पानी की समस्या भी केवल “कितना पानी” की समस्या नहीं है, बल्कि “कहाँ का पानी” की समस्या है। किसी ऐसे क्षेत्र में डेटा सेंटर बनाना जहाँ पर्याप्त पानी उपलब्ध है और पुनर्चक्रण की व्यवस्था है, और किसी जल-संकटग्रस्त क्षेत्र में विशाल डेटा सेंटर खड़ा करना—इन दोनों का पर्यावरणीय अर्थ एक जैसा नहीं हो सकता। माइक्रोसॉफ्ट स्वयं स्वीकार करता है कि डेटा सेंटर की जल-प्रभावशीलता को स्थानीय जलवायु और क्षेत्र के अनुसार देखना पड़ता है। कंपनी के अनुसार उसके वैश्विक डेटा सेंटरों का FY2025 Water Usage Effectiveness लगभग 0.27 लीटर प्रति किलोवाट-घंटा था, लेकिन क्षेत्रीय आंकड़ों में पर्याप्त अंतर दिखाई देता है।


इस पूरे विमर्श में आम उपभोक्ता को अपराधी बना देना भी उचित नहीं होगा। यदि कोई व्यक्ति एआई से एक पत्र लिखवा लेता है, किसी कठिन विषय को समझ लेता है या अपना काम जल्दी पूरा कर लेता है, तो उसे यह कहकर दोषी ठहराना कि उसने पृथ्वी का पानी खत्म कर दिया, अतिशयोक्ति होगी। असली पर्यावरणीय चुनौती व्यक्तिगत प्रॉम्प्ट से अधिक एआई के बड़े पैमाने पर बुनियादी ढाँचे की है। लाखों सर्वरों की स्थापना, नए डेटा सेंटर, चिप निर्माण, बिजली उत्पादन, कूलिंग सिस्टम और लगातार बढ़ती कंप्यूटिंग क्षमता—यही वह स्थान है जहाँ नीति और जवाबदेही की जरूरत सबसे ज्यादा है।


और शायद सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें एआई को “हर काम का हथौड़ा” बनाने से बचना होगा। यदि किसी प्रश्न का उत्तर पाँच पंक्तियों में स्वयं सोचा जा सकता है, तो उसके लिए अत्यधिक कम्प्यूटेशनल संसाधन वाला सिस्टम चलाना आवश्यक नहीं। यदि एक साधारण कैलकुलेटर पर्याप्त है तो अत्यंत शक्तिशाली एआई मॉडल का उपयोग तकनीकी रूप से संभव होने के बावजूद संसाधन की दृष्टि से समझदारी नहीं हो सकता। IEA की 2026 की समीक्षा बताती है कि प्रति एआई कार्य ऊर्जा दक्षता बहुत तेजी से सुधरी है—हाल के वर्षों में प्रति कार्य ऊर्जा उपयोग में हर साल कम-से-कम एक क्रम यानी लगभग दस गुना तक कमी देखी गई है—लेकिन साथ ही अधिक ऊर्जा-गहन एआई उपयोग भी तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। यानी मशीन अधिक किफायती हो रही है, मगर हम उसका इस्तेमाल पहले से कहीं ज्यादा कर रहे हैं।


यही आधुनिक तकनीक का पुराना विरोधाभास है। कार अधिक ईंधन-कुशल होती है तो हम अधिक कार चलाने लगते हैं। मोबाइल अधिक ऊर्जा-कुशल होता है तो हम अधिक समय मोबाइल पर बिताने लगते हैं। एआई प्रति प्रश्न कम बिजली खर्च करने लगे तो हम एक दिन में सैकड़ों प्रश्न पूछने लगते हैं। इसे अर्थशास्त्र में दक्षता के साथ बढ़ती मांग की समस्या के रूप में देखा जा सकता है। इसलिए केवल एआई को अधिक कुशल बनाना पर्याप्त नहीं होगा; उसके इस्तेमाल को भी अधिक विवेकपूर्ण बनाना होगा।


आखिरकार प्रश्न एआई के खिलाफ होने या उसके पक्ष में होने का नहीं है। एआई को रोक देना न व्यावहारिक है, न शायद वांछनीय। लेकिन यह मान लेना भी ठीक नहीं कि तकनीकी प्रगति की हर कीमत स्वतः उचित है। जिस समाज में पीने के पानी की कमी हो, वहाँ डेटा सेंटर की कूलिंग के लिए इस्तेमाल होने वाले पानी का हिसाब होना चाहिए। जिस क्षेत्र में बिजली की आपूर्ति सीमित हो, वहाँ विशाल डेटा सेंटरों की ऊर्जा मांग का सामाजिक और आर्थिक मूल्यांकन होना चाहिए। जिस देश के श्रमिक एआई से प्रभावित होने वाले हैं, वहाँ केवल एआई कंपनियों को लाभ देने के बजाय शिक्षा, कौशल और पुनःप्रशिक्षण में भी निवेश होना चाहिए।


इसलिए असली सवाल शायद यह नहीं कि “एआई कितना पानी पीती है?” असली सवाल यह है कि “एआई जितना पानी और बिजली खर्च करती है, उसके बदले मनुष्य और समाज को कितना मूल्य मिल रहा है?” यदि एआई किसी मनुष्य के दस घंटे का काम एक घंटे में कर देती है और उस बचे समय का उपयोग वह रचनात्मक, मानवीय और उत्पादक काम में करता है, तो यह संसाधन का सार्थक उपयोग है। लेकिन यदि एआई केवल इसलिए इस्तेमाल हो रही है कि मनुष्य सोचने की अपनी क्षमता का इस्तेमाल ही न करे—हर छोटा वाक्य, हर साधारण गणना, हर मामूली निर्णय और हर छोटी जिज्ञासा भी मशीन को सौंप दी जाए—तो हम केवल बिजली और पानी नहीं खर्च कर रहे होंगे, हम अपनी मानसिक ऊर्जा और मौलिक क्षमता भी किराये पर दे रहे होंगे।


एआई की असली परीक्षा यह नहीं कि वह कितने सवालों का जवाब दे सकती है। असली परीक्षा यह है कि वह कितने संसाधनों के बदले मनुष्य के जीवन को वास्तव में बेहतर बनाती है। डेटा सेंटरों की चिमनियों और कूलिंग सिस्टमों से लेकर हमारे मोबाइल की स्क्रीन तक एक अदृश्य संसाधन-श्रृंखला जुड़ी हुई है। इसलिए एआई का भविष्य केवल तेज, सस्ता और शक्तिशाली एआई नहीं होना चाहिए; वह ऊर्जा-कुशल, जल-कुशल, पर्यावरण-जिम्मेदार और सामाजिक रूप से न्यायपूर्ण एआई भी होना चाहिए।


क्योंकि अंततः बिजली किसी कंपनी की निजी संपत्ति नहीं और पानी किसी सर्वर का अधिकार नहीं। ये प्रकृति की साझी पूँजी हैं। एआई को मनुष्य का काम आसान करने का अधिकार जरूर है, लेकिन पृथ्वी के संसाधनों पर उसका अधिकार असीमित नहीं हो सकता। सवाल यह है कि हम एआई को अपना मालिक बनाते हैं या अपना औजार—और उससे भी बड़ा सवाल यह है कि औजार को चलाने की कीमत कौन चुकाता है और उससे पैदा हुई समृद्धि का हिस्सा किसे मिलता है।आधार: ऊपर के प्रमुख ऊर्जा आंकड़े IEA, जल/डेटा-सेंटर आंकड़े Microsoft और Google के प्रकाशित तकनीकी/सस्टेनेबिलिटी डेटा, तथा उत्पादकता और रोजगार संबंधी निष्कर्ष OECD और IMF के शोध पर आधारित हैं। खास तौर पर “एक सवाल = इतनी बोतल पानी” जैसे वायरल दावों को मैंने जानबूझकर सार्वभौमिक तथ्य की तरह नहीं लिया है, क्योंकि वास्तविक खपत मॉडल, डेटा सेंटर, कूलिंग और बिजली-स्रोत के अनुसार बहुत बदलती है। 

आधार: ऊपर के प्रमुख ऊर्जा आंकड़े IEA, जल/डेटा-सेंटर आंकड़े Microsoft और Google के प्रकाशित तकनीकी/सस्टेनेबिलिटी डेटा, तथा उत्पादकता और रोजगार संबंधी निष्कर्ष OECD और IMF के शोध पर आधारित हैं। खास तौर पर “एक सवाल = इतनी बोतल पानी” जैसे वायरल दावों को मैंने जानबूझकर सार्वभौमिक तथ्य की तरह नहीं लिया है, क्योंकि वास्तविक खपत मॉडल, डेटा सेंटर, कूलिंग और बिजली-स्रोत के अनुसार बहुत बदलती है।

अगर सीधे-सीधे पूछा जाए कि एआई की बढ़ती भूख का सबसे ज्यादा असर किन देशों पर पड़ने वाला है, तो सबसे पहले अमेरिका और चीन का नाम आएगा। इसके बाद यूरोप, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ देश तेजी से इस दौड़ में दिखाई देते हैं। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार 2024 में दुनिया के डेटा सेंटरों की कुल बिजली खपत करीब 415 टेरावॉट-घंटे थी, जिसमें अकेले अमेरिका की हिस्सेदारी लगभग 45 प्रतिशत, चीन की 25 प्रतिशत और यूरोप की 15 प्रतिशत थी। 2030 तक वैश्विक डेटा सेंटर बिजली खपत लगभग 945 टेरावॉट-घंटे तक पहुंच सकती है। दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका और चीन मिलकर 2030 तक डेटा सेंटरों की वैश्विक बिजली खपत में होने वाली वृद्धि का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा अपने खाते में ले सकते हैं। यानी एआई की डिजिटल दुनिया जितनी आभासी दिखाई देती है, उसका बिजली का बिल उतना ही भौतिक है।


अमेरिका इस मामले में सबसे बड़ी प्रयोगशाला भी है और सबसे बड़ी चुनौती भी। 2024 में दुनिया की डेटा सेंटर बिजली खपत का करीब 45 प्रतिशत अमेरिका में हुआ और 2030 तक अमेरिका में डेटा सेंटरों की बिजली खपत आज की तुलना में लगभग 130 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान है। IEA के अनुसार 2030 तक अमेरिका में बिजली की मांग में होने वाली वृद्धि का लगभग आधा हिस्सा डेटा सेंटरों से आ सकता है। इसलिए अमेरिका में समस्या केवल यह नहीं है कि एआई कितना पानी पी रहा है; समस्या यह भी है कि उसके लिए बिजली कहां से आएगी, ग्रिड पर कितना दबाव पड़ेगा और स्थानीय समुदायों को उस बिजली तथा पानी की कीमत कितनी चुकानी पड़ेगी। अमेरिका का एक बड़ा जवाब नवीकरणीय ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा, प्राकृतिक गैस और भविष्य में छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों के मिश्रण में दिखाई देता है। IEA के अनुसार 2035 तक अमेरिका के डेटा सेंटरों की बिजली आपूर्ति में कम-कार्बन स्रोतों की हिस्सेदारी आधे से अधिक हो सकती है। यानी अमेरिका एआई को रोकने के बजाय उसकी ऊर्जा-भूख को दूसरी ऊर्जा व्यवस्था के सहारे पूरा करने की कोशिश कर रहा है।


चीन की स्थिति कुछ अलग है। वहां डेटा सेंटरों की बिजली आपूर्ति में कोयले की भूमिका अभी बहुत बड़ी है—IEA के अनुसार आज चीन में डेटा सेंटरों को मिलने वाली बिजली का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा कोयले से आता है। इसलिए चीन के सामने एआई विस्तार का सबसे बड़ा पर्यावरणीय प्रश्न कार्बन उत्सर्जन और ऊर्जा-स्रोत का है। लेकिन चीन ने डेटा सेंटरों को नवीकरणीय ऊर्जा वाले पश्चिमी क्षेत्रों की ओर ले जाने और नवीकरणीय ऊर्जा तथा परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं। IEA का अनुमान है कि 2035 तक चीन में नवीकरणीय ऊर्जा और परमाणु ऊर्जा मिलकर डेटा सेंटरों की बिजली आपूर्ति का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा दे सकते हैं। यानी चीन की रणनीति है—एआई को धीमा मत करो, उसके लिए ऊर्जा व्यवस्था को बदलो।


यूरोप का रास्ता अपेक्षाकृत अधिक पर्यावरण-केंद्रित दिखाई देता है। वहां 2030 तक डेटा सेंटरों के लिए अतिरिक्त बिजली की जरूरत का बड़ा हिस्सा नवीकरणीय और परमाणु ऊर्जा से पूरा होने की उम्मीद है; IEA के अनुसार इन दोनों स्रोतों की संयुक्त हिस्सेदारी अतिरिक्त मांग में लगभग 85 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। यूरोप की चुनौती यह है कि वह एआई की दौड़ में पीछे भी नहीं रहना चाहता और अपनी जलवायु प्रतिबद्धताओं से समझौता भी नहीं करना चाहता। इसलिए वहां डेटा सेंटर केवल कंप्यूटिंग क्षमता के केंद्र नहीं, बल्कि ऊर्जा दक्षता, कार्बन उत्सर्जन और संसाधन उपयोग के नियमन के केंद्र भी बन रहे हैं।


भारत के सामने शायद सबसे जटिल तस्वीर है। भारत को एआई से बहुत बड़ा आर्थिक और सामाजिक लाभ मिल सकता है—शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, प्रशासन, भाषा-प्रौद्योगिकी और उद्योगों में उत्पादकता बढ़ सकती है—लेकिन भारत को बिजली की बढ़ती मांग, पानी की उपलब्धता और पहले से दबाव झेल रहे शहरी बुनियादी ढांचे के बीच संतुलन बनाना होगा। भारत में डेटा सेंटर क्षमता 2020 के लगभग 375 मेगावाट से बढ़कर 2025 में लगभग 1,500 मेगावाट हो चुकी है। सरकार के अनुसार डेटा सेंटर उद्योग उन्नत कूलिंग तकनीकों को अपना रहा है ताकि पानी की खपत कम की जा सके।


भारत ने इस चुनौती के लिए कुछ संस्थागत इंतजाम भी शुरू किए हैं। पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार बड़े भवन या टाउनशिप परियोजनाओं के रूप में आने वाले कुछ डेटा सेंटरों के पर्यावरणीय आकलन में जल-संकट वाले क्षेत्रों में मीठे पानी की उपलब्धता, जल-संतुलन, ग्रे-वॉटर और उसके पुनर्चक्रण जैसे पहलुओं पर विचार किया जाता है। वहीं ऊर्जा दक्षता और जल संरक्षण के लिए भवन संबंधी ऊर्जा दक्षता संहिताएं लागू हैं और डेटा सेंटरों में डायरेक्ट-टू-चिप लिक्विड कूलिंग, इमर्शन कूलिंग तथा क्लोज्ड-लूप कूलिंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ रहा है।


भारत के लिए असली चुनौती यह है कि देश को एआई का केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि उत्पादक और अवसंरचना-निर्माता भी बनना है। इसलिए डेटा सेंटर बनाना जरूरी है, लेकिन उन्हें ऐसे स्थानों पर बनाना ज्यादा जरूरी है जहां बिजली, पानी और पर्यावरण पर असामान्य दबाव न पड़े। यदि किसी जल-संकटग्रस्त शहर में विशाल डेटा सेंटर बना दिया जाए और उसके लिए स्थानीय लोगों के पीने के पानी पर दबाव पड़े, तो वह डिजिटल विकास नहीं बल्कि संसाधनों का स्थानांतरण होगा। दूसरी ओर यदि वही डेटा सेंटर नवीकरणीय ऊर्जा, पुनर्चक्रित जल और बंद-चक्र कूलिंग के साथ विकसित हो, तो वह आर्थिक विकास और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के बीच बेहतर संतुलन बना सकता है।


दक्षिण-पूर्व एशिया भी इस बदलाव का बड़ा केंद्र बनने वाला है। सिंगापुर और दक्षिणी मलेशिया जैसे क्षेत्र डेटा सेंटरों के महत्वपूर्ण हब बन रहे हैं और IEA के अनुसार 2030 तक दक्षिण-पूर्व एशिया में डेटा सेंटरों की बिजली मांग दोगुने से अधिक हो सकती है। यहां समस्या यह है कि जमीन, पानी और बिजली तीनों संसाधन सीमित हैं। इसलिए इस क्षेत्र में डेटा सेंटरों का भविष्य केवल इस बात पर निर्भर नहीं करेगा कि कितने सर्वर लगाए जा सकते हैं, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करेगा कि प्रति यूनिट कंप्यूटिंग कितनी बिजली और कितना पानी खर्च होता है।


दक्षिण अफ्रीका इसका एक और महत्वपूर्ण उदाहरण है। अफ्रीका में डेटा सेंटर क्षमता अभी विकसित देशों की तुलना में बहुत कम है, लेकिन दक्षिण अफ्रीका महाद्वीप का सबसे बड़ा डेटा सेंटर बाजार बन चुका है। समस्या यह है कि वहां पहले से बिजली और पानी दोनों पर दबाव है। हाल में केप टाउन के पास प्रस्तावित एक बड़े डेटा सेंटर को लेकर पानी और बिजली के संसाधनों पर दबाव की चिंता सामने आई है। यह उदाहरण बताता है कि एआई की अर्थव्यवस्था में विकासशील देशों के लिए सबसे बड़ा सवाल केवल “हमारे यहां डेटा सेंटर आएंगे या नहीं?” नहीं होगा, बल्कि “वे हमारे सीमित संसाधनों का कितना उपयोग करेंगे और उसके बदले स्थानीय अर्थव्यवस्था को कितना लाभ मिलेगा?” होगा।


जापान और दक्षिण कोरिया भी इस परिवर्तन से प्रभावित होंगे, हालांकि उनके पास अपेक्षाकृत विकसित बिजली और तकनीकी प्रणालियां हैं। IEA के अनुसार जापान की डेटा सेंटर बिजली मांग 2030 तक लगभग 80 प्रतिशत बढ़ सकती है। इन देशों में नवीकरणीय ऊर्जा और परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ाकर डेटा सेंटरों की अतिरिक्त बिजली जरूरत पूरी करने की कोशिश की जा रही है। इसलिए विकसित देशों के पास एक महत्वपूर्ण लाभ है—उनके पास बेहतर ग्रिड, पूंजी, ऊर्जा तकनीक और अधिक कुशल डेटा सेंटर बनाने की क्षमता है। गरीब देशों की समस्या यह है कि वे एआई के लाभ तो चाहते हैं, लेकिन उस बुनियादी ढांचे को खड़ा करने की कीमत उठाना उनके लिए कहीं कठिन है।


यहीं एआई की सबसे बड़ी वैश्विक असमानता सामने आती है। जिस देश के पास सस्ती और विश्वसनीय बिजली, ठंडा वातावरण, पर्याप्त जल संसाधन, नवीकरणीय ऊर्जा और पूंजी है, वह डेटा सेंटर आकर्षित कर सकता है और एआई से आर्थिक लाभ कमा सकता है। जिसके पास बिजली की कमी है, पानी का संकट है या कमजोर ग्रिड है, उसके लिए वही एआई अवसंरचना अतिरिक्त बोझ बन सकती है। IEA भी इस बात पर जोर देता है कि डेटा सेंटरों का वैश्विक बिजली में हिस्सा अभी अपेक्षाकृत छोटा है, लेकिन उनका स्थानीय प्रभाव बहुत अधिक हो सकता है क्योंकि वे कुछ विशेष क्षेत्रों में अत्यधिक बिजली की मांग को केंद्रित कर देते हैं।


इसलिए देशों के सामने विकल्प एआई को स्वीकार करने या न करने का नहीं है। असली विकल्प यह है कि वे “कितना एआई” नहीं, बल्कि “किस तरह का एआई” विकसित करते हैं। ऊर्जा-कुशल चिप, कम बिजली में काम करने वाले मॉडल, छोटे और विशेषीकृत एआई मॉडल, नवीकरणीय ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा, पानी का पुनर्चक्रण, क्लोज्ड-लूप कूलिंग, गर्मी का पुन: उपयोग और डेटा सेंटरों की ऐसी लोकेशन जहां स्थानीय जल-संकट न हो—ये वे रास्ते हैं जिनसे एआई की आर्थिक ताकत को पर्यावरणीय जिम्मेदारी के साथ जोड़ा जा सकता है।


और शायद सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि एआई की कीमत कौन चुकाएगा और लाभ किसे मिलेगा। अमेरिका और चीन के पास विशाल पूंजी और तकनीकी क्षमता है, इसलिए वे एआई से पैदा होने वाली आर्थिक समृद्धि का बड़ा हिस्सा हासिल कर सकते हैं। यूरोप पर्यावरणीय मानकों को मजबूत करके अपनी दिशा तय कर रहा है। भारत जैसे देशों के सामने चुनौती और अवसर दोनों हैं—वे एआई की मदद से विकास की छलांग लगा सकते हैं, लेकिन उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि उस छलांग के लिए बिजली और पानी की कीमत आम नागरिक न चुकाए। अंततः एआई का भविष्य केवल एल्गोरिद्म और चिप से तय नहीं होगा; वह पानी की बूंद, बिजली की यूनिट और उस बिजली के बिल में भी लिखा होगा।


इसलिए आने वाले समय में किसी देश की एआई-ताकत का पैमाना केवल यह नहीं होगा कि उसके पास कितने बड़े मॉडल हैं या कितने जीपीयू हैं। असली सवाल होगा—एक एआई उत्तर तैयार करने में कितनी ऊर्जा लगी, कितना पानी लगा, कितना कार्बन निकला और उससे पैदा हुई आर्थिक कीमत में समाज की हिस्सेदारी कितनी रही। जिस देश ने इन चार सवालों का संतुलित उत्तर खोज लिया, वही एआई की अगली दौड़ में वास्तव में सफल माना जाएगा।


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