इंसान सपने क्यों देखता है और सपने सच क्यों नहीं होते?
यह प्रश्न केवल नींद में आने वाले सपनों का नहीं, बल्कि मनुष्य की चेतना, उसकी इच्छाओं, उसकी सीमाओं और उसके भविष्य-बोध का प्रश्न है। सपना आखिर पैदा क्यों होता है? और यदि मनुष्य के भीतर सपने देखने की इतनी गहरी क्षमता है तो उनमें से अधिकांश सच क्यों नहीं होते? इसी विरोधाभास को केंद्र में रखकर विचार किया गया है।
मनुष्य शायद दुनिया का अकेला ऐसा प्राणी है जो केवल वर्तमान में नहीं जीता। वह अतीत को याद करता है, वर्तमान को महसूस करता है और भविष्य की कल्पना करता है। इसी भविष्य की कल्पना का सबसे सुंदर नाम है—सपना। रात को आंखें बंद करके जो सपना हम देखते हैं, वह भी मनुष्य की मानसिक दुनिया का हिस्सा है और दिन के उजाले में आंखें खुली रखकर जिस भविष्य की कल्पना करते हैं, वह भी सपना ही है। अंतर सिर्फ इतना है कि पहला सपना अक्सर हमारे नियंत्रण में नहीं होता, जबकि दूसरा हमारी इच्छा, कल्पना और संकल्प से बनता है।
सवाल यह है कि मनुष्य सपने देखता ही क्यों है?
शायद इसलिए कि वर्तमान मनुष्य को कभी पूरी तरह संतुष्ट नहीं करता। उसके पास जो है, उससे आगे कुछ और पाने की इच्छा हमेशा बनी रहती है। आदिम मनुष्य ने जब पहली बार किसी पक्षी को आकाश में उड़ते देखा होगा, तो शायद उसके भीतर भी उड़ने का सपना पैदा हुआ होगा। सदियों बाद मनुष्य ने विमान बनाया। कभी चांद केवल कविता और मिथक का हिस्सा था; फिर मनुष्य ने चांद पर कदम रख दिया। यानी सपना केवल नींद में आने वाली तस्वीर नहीं है; वह कई बार भविष्य की पहली रूपरेखा होता है।
मनुष्य की चेतना की सबसे बड़ी विशेषताओं में एक है—कल्पना करने की क्षमता। मस्तिष्क केवल यह नहीं पूछता कि “क्या है?”, वह यह भी पूछता है कि “क्या हो सकता है?” यही प्रश्न विज्ञान को जन्म देता है, साहित्य को जन्म देता है, कला को जन्म देता है और सभ्यता को आगे बढ़ाता है। अगर मनुष्य केवल वही स्वीकार करता जो पहले से मौजूद था, तो शायद न पहिया बनता, न बिजली आती, न इंटरनेट बनता और न कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी चीजें हमारे सामने होतीं।
इस अर्थ में सपना मनुष्य की असंतुष्टि नहीं, उसकी प्रगति का भी आधार है।
लेकिन सपनों की एक दूसरी दुनिया है—नींद के सपनों की। विज्ञान के अनुसार नींद के दौरान मस्तिष्क पूरी तरह बंद नहीं हो जाता। विशेषकर REM sleep यानी Rapid Eye Movement नींद के चरण में मस्तिष्क काफी सक्रिय रहता है और इसी अवस्था में जीवंत तथा भावनात्मक सपने अधिक सामान्य रूप से आते हैं। नींद के दौरान मस्तिष्क स्मृतियों, भावनाओं और अनुभवों को संसाधित करता है। इसलिए दिनभर की घटनाएं, पुरानी यादें, भय, इच्छाएं और चिंताएं कभी-कभी एक अजीब कहानी बनकर सपने में सामने आ जाती हैं।
इसीलिए सपने कई बार इतने असंबद्ध होते हैं कि उनमें तर्क दिखाई ही नहीं देता। हम ऐसे व्यक्ति को देखते हैं जो वर्षों पहले हमारे जीवन से चला गया, ऐसे स्थान पर पहुंच जाते हैं जहां कभी गए ही नहीं और ऐसी घटना घटती देखते हैं जिसका वास्तविक जीवन से कोई संबंध नहीं। सपना शायद हमारे मस्तिष्क की वह भाषा है जिसमें स्मृति, भावना और कल्पना एक-दूसरे से मिल जाती हैं।
लेकिन फिर प्रश्न और कठिन हो जाता है—यदि मनुष्य सपने देखता है तो वे सच क्यों नहीं होते?
इस प्रश्न का पहला उत्तर बहुत सरल है—क्योंकि सपना इच्छा है, भविष्यवाणी नहीं।
हम अक्सर अपनी इच्छा और वास्तविकता के बीच का अंतर भूल जाते हैं। किसी व्यक्ति का सपना होता है कि उसे मनचाही नौकरी मिले, कोई परीक्षा में सफल हो, प्रेम सफल हो, अपना घर हो, उसका बच्चा विदेश जाए, व्यवसाय बहुत बड़ा हो जाए या जीवन अचानक बदल जाए। लेकिन इच्छा अपने आप में परिणाम पैदा नहीं करती। वास्तविकता में असंख्य शक्तियां काम करती हैं—हमारी मेहनत, हमारी क्षमता, दूसरे लोगों के निर्णय, परिस्थितियां, अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य, समय, संयोग और कभी-कभी ऐसी घटनाएं जिन्हें हम नियंत्रित ही नहीं कर सकते।
इसलिए हर सपना सच नहीं हो सकता।
मान लीजिए हजार लोग एक ही प्रतियोगिता में प्रथम आने का सपना देखते हैं। सभी का सपना ईमानदार हो सकता है, सभी मेहनती हो सकते हैं, सभी को अपनी सफलता पर विश्वास हो सकता है। लेकिन प्रथम स्थान एक ही व्यक्ति को मिलेगा। यहां सपना झूठा नहीं था; बस वास्तविकता में संसाधन और अवसर सीमित थे।
दरअसल सपने का सच न होना हमेशा सपने की असफलता नहीं है। कई बार सपना वास्तविकता से बड़ा होता है और इसी कारण वह हमें आगे बढ़ाता है। एक बच्चा डॉक्टर बनने का सपना देखता है, लेकिन बड़ा होकर शिक्षक बन जाता है। क्या उसका सपना असफल हुआ? शायद नहीं। हो सकता है डॉक्टर बनने की उसकी इच्छा के पीछे समाज के लिए उपयोगी बनने की आकांक्षा रही हो और उसने किसी दूसरे रूप में वह काम कर दिया हो।
यही कारण है कि जीवन में सपनों का मूल्य उनके शत-प्रतिशत सच हो जाने में नहीं, बल्कि हमारे भीतर पैदा होने वाली दिशा में है।
मनुष्य की एक समस्या यह भी है कि वह सपनों को मंजिल समझ लेता है, जबकि सपना वास्तव में दिशा-सूचक होना चाहिए। “मुझे सफल होना है” सपना है, लेकिन “हर दिन दो घंटे इस काम को सीखूंगा” योजना है। “मुझे लेखक बनना है” सपना है, लेकिन रोज लिखना अभ्यास है। “मुझे स्वस्थ होना है” सपना है, लेकिन भोजन, व्यायाम और अनुशासन उस सपने को वास्तविकता की ओर ले जाने वाले कदम हैं।
सपना और संकल्प के बीच यही अंतर है।
सपना आंखों में पैदा होता है; संकल्प पैरों को रास्ते पर ले आता है।
और शायद यहीं से एक और महत्वपूर्ण प्रश्न पैदा होता है—क्या हर सपना सच होना चाहिए?
शायद नहीं।
अगर मनुष्य की हर इच्छा पूरी हो जाए तो क्या वह वास्तव में सुखी हो जाएगा? अनुभव इसके विपरीत संकेत देता है। एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी इच्छा जन्म लेती है। मनुष्य जिस घर को पाने का सपना देखता है, उसे पाने के बाद बड़े घर का सपना देखने लगता है। जिस पद को पाने के लिए वर्षों मेहनत करता है, उस पद पर पहुंचकर अगली ऊंचाई की तलाश शुरू कर देता है। जिस वस्तु को पाने के लिए बेचैन रहता है, उसे पा लेने के बाद उसकी चमक धीरे-धीरे सामान्य हो जाती है।
इसलिए सपनों का पूरा न होना कभी-कभी जीवन की सुरक्षा-व्यवस्था भी है। अधूरा सपना मनुष्य को गतिशील रखता है।
संतोष आवश्यक है, लेकिन पूर्ण संतोष शायद मनुष्य की गति रोक सकता है। असंतोष विनाशकारी भी हो सकता है और रचनात्मक भी। वही असंतोष जो किसी व्यक्ति को दूसरों से ईर्ष्या करने पर मजबूर करता है, किसी दूसरे व्यक्ति को अपने जीवन को बेहतर बनाने की प्रेरणा दे सकता है। फर्क इस बात से पड़ता है कि वह असंतोष इच्छा बनकर रह जाता है या प्रयास में बदलता है।
इसलिए हर सपना सच न होने का एक कारण यह भी है कि मनुष्य स्वयं बदलता रहता है। दस वर्ष पहले जो सपना हमें जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य लगता था, दस साल बाद शायद वह हमें महत्वहीन लगने लगे। तब प्रश्न यह नहीं रह जाता कि सपना क्यों पूरा नहीं हुआ; प्रश्न यह होता है कि जिस व्यक्ति ने वह सपना देखा था, वह अब वही व्यक्ति भी तो नहीं रहा।
कई बार जीवन हमारे सपनों को इसलिए भी तोड़ता है क्योंकि वह हमें किसी दूसरे रास्ते पर ले जाना चाहता है। यह बात सुनने में सांत्वना जैसी लग सकती है, लेकिन जीवन के अनुभव में इसके अनेक उदाहरण मिलते हैं। नौकरी नहीं मिली तो व्यवसाय शुरू हुआ। एक शहर में अवसर नहीं मिला तो दूसरे शहर में जीवन बदल गया। कोई संबंध समाप्त हुआ तो व्यक्ति ने अपने भीतर झांकना सीखा। कोई परीक्षा असफल हुई तो किसी दूसरे क्षेत्र में प्रतिभा सामने आई।
इसका अर्थ यह नहीं कि हर असफलता के पीछे कोई अदृश्य योजना होती है। जीवन इतना व्यवस्थित नहीं है। लेकिन मनुष्य में यह अद्भुत क्षमता जरूर है कि वह असफलता को भी अर्थ दे सकता है।
यही मनुष्य और उसके सपनों का सबसे सुंदर संबंध है।
कभी-कभी सपना पूरा होने से जीवन बदलता है और कभी सपना टूटने से।
और शायद इसीलिए सपनों के बारे में सबसे खतरनाक धारणा यह है कि “जिस चीज की मैंने सच्चे मन से कल्पना की है, वह जरूर मिलेगी।” ऐसा जरूरी नहीं है। संसार हमारी इच्छाओं के अनुसार संचालित नहीं होता। दुनिया में दूसरे लोगों के सपने भी हैं, उनकी इच्छाएं भी हैं, उनके संघर्ष भी हैं। हमारी इच्छा और किसी दूसरे की इच्छा टकरा सकती है। प्रकृति की अपनी सीमाएं हैं। संसाधन सीमित हैं। समय सीमित है। जीवन स्वयं सीमित है।
इसलिए सपना देखना मनुष्य का अधिकार है, लेकिन सपने का सच होना उसका अधिकार नहीं।
यह बात निराश करने वाली लग सकती है, लेकिन वास्तव में यह मनुष्य को अधिक परिपक्व बनाती है। सपना हमें संभावना दिखाता है और वास्तविकता हमें सीमा समझाती है। केवल सपना होगा तो हम कल्पना में रह जाएंगे; केवल वास्तविकता होगी तो जीवन नीरस और स्थिर हो जाएगा। मनुष्य की असली शक्ति इन दोनों के बीच पुल बनाने में है।
इसलिए शायद हमें सपनों को दो श्रेणियों में बांटकर देखना चाहिए—कुछ सपने पूरे करने के लिए होते हैं और कुछ सपने केवल हमें बेहतर मनुष्य बनाने के लिए।
हर सपना मंजिल तक पहुंचने के लिए नहीं होता। कुछ सपने हमें रास्ते पर चलना सिखाते हैं।
और नींद के सपनों की बात करें तो उनकी भी यही खूबसूरती है। हम रात में ऐसे संसार में जाते हैं जहां वास्तविकता के नियम थोड़ी देर के लिए बदल जाते हैं। वहां मृत व्यक्ति जीवित हो सकता है, असंभव स्थान वास्तविक लग सकता है और हम स्वयं ऐसी जगह पहुंच सकते हैं जहां जागते हुए कभी नहीं पहुंच सकते। सुबह आंख खुलती है और सपना गायब हो जाता है। लेकिन उसका भाव कभी-कभी पूरे दिन हमारे साथ रहता है।
शायद इसलिए मनुष्य सपने देखता है—क्योंकि वास्तविक दुनिया सीमित है, लेकिन मनुष्य की कल्पना सीमित नहीं।
और शायद सपने सच नहीं होते क्योंकि सपना और सच दो अलग-अलग चीजें हैं। सपना संभावना है; सच परिणाम है। सपना इच्छा है; सच परिस्थितियों और कर्मों का सम्मिलित परिणाम है। सपना आकाश दिखाता है; वास्तविकता बताती है कि वहां पहुंचने के लिए कितनी सीढ़ियां बनानी होंगी।
फिर भी मनुष्य सपना देखना बंद नहीं करता।
वह जानता है कि हर सपना पूरा नहीं होगा, फिर भी अगली सुबह एक नया सपना देखता है। यही शायद मनुष्य की सबसे बड़ी जिजीविषा है। वह असफलताओं के बाद भी भविष्य की कल्पना करता है। टूटे हुए सपनों के बाद भी नए सपने देखता है। उसे मालूम है कि जीवन उसकी हर इच्छा पूरी नहीं करेगा, फिर भी वह इच्छा करना नहीं छोड़ता।
शायद सपनों की सबसे बड़ी सार्थकता उनका सच हो जाना नहीं, बल्कि उनका हमें यह विश्वास दिलाना है कि कल आज से अलग हो सकता है।
और जब तक मनुष्य यह विश्वास करता रहेगा, तब तक सभ्यता चलती रहेगी, रचनाएं जन्म लेती रहेंगी, विज्ञान आगे बढ़ता रहेगा और मनुष्य अपनी सीमाओं को चुनौती देता रहेगा।
इसलिए अगली बार कोई सपना टूटे तो शायद यह कहना अधिक उचित होगा—“मेरा सपना झूठा नहीं था; बस मेरी जिंदगी ने उसके लिए कोई दूसरा अर्थ चुन लिया।”
क्योंकि कुछ सपने पूरे होकर हमारी कहानी बनते हैं, और कुछ अधूरे रहकर हमें कहानी लिखना सिखाते हैं।
यही सपनों का रहस्य है—वे सच होने के लिए ही नहीं देखे जाते; कई बार वे हमें सच की तलाश में चलाने के लिए देखे जाते हैं।

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