सामान्य जीवन में देखें तो यह सिद्धांत काफी हद तक सही दिखाई देता है। कोई व्यक्ति यदि ईमानदारी से काम करता है, लोगों का विश्वास अर्जित करता है, अपने संबंधों में संवेदनशील रहता है और कठिन परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करता, तो धीरे-धीरे उसके आसपास विश्वास और सम्मान का वातावरण बनता है। इसके विपरीत झूठ, धोखा, छल और स्वार्थ से हासिल की गई सफलता अक्सर अपने भीतर असुरक्षा लेकर आती है। जिसने दूसरों को धोखा देकर धन कमाया है, उसे शायद तत्काल आर्थिक लाभ मिल जाए, लेकिन उसके संबंधों में विश्वास कम हो सकता है। जिसने हर व्यक्ति को साधन की तरह इस्तेमाल किया है, उसके लिए संकट के समय सच्चे साथियों का मिलना कठिन हो सकता है। इस अर्थ में कर्म का फल किसी अदृश्य न्यायालय से मिलने वाली सजा या पुरस्कार ही नहीं, बल्कि हमारे अपने कर्मों से निर्मित जीवन-परिस्थितियां भी हैं।
लेकिन इस कहावत को यदि शाब्दिक और पूर्ण सत्य मान लिया जाए तो जीवन की अनेक वास्तविकताएं हमारे सामने प्रश्न खड़े करती हैं। दुनिया में अच्छे लोगों के साथ बुरी घटनाएं होती हैं और बुरे लोगों को कई बार सुख-सुविधा, सत्ता और प्रतिष्ठा मिलती दिखाई देती है। कोई ईमानदार व्यक्ति वर्षों मेहनत करने के बाद भी असफल हो सकता है, जबकि कोई छल-कपट करने वाला व्यक्ति बहुत आगे निकल सकता है। कोई निर्दोष व्यक्ति बीमारी, दुर्घटना या अन्याय का शिकार हो सकता है, जबकि उसके साथ अन्याय करने वाला व्यक्ति आराम से जीवन बिताता दिखाई दे सकता है। इसलिए यह कहना कि हर घटना निश्चित रूप से व्यक्ति के किसी पिछले कर्म की सजा या पुरस्कार है, न तो तार्किक रूप से सिद्ध किया जा सकता है और न ही मानवीय दृष्टि से उचित है।
यहीं “जो जैसा करेगा वैसा ही भरेगा” को एक नैतिक सूत्र की तरह समझना अधिक उचित है, किसी गणितीय सूत्र की तरह नहीं। जीवन कोई ऐसी मशीन नहीं है जिसमें एक तरफ अच्छा कर्म डालने पर दूसरी तरफ निश्चित मात्रा में सुख निकल आए और बुरा कर्म डालने पर उतनी ही मात्रा में दुख। परिणाम अनेक परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं—समय, समाज, संयोग, दूसरे लोगों के निर्णय, आर्थिक व्यवस्था, प्रकृति और परिस्थितियां। मनुष्य अपने कर्मों का मालिक हो सकता है, लेकिन वह परिणामों का पूर्ण स्वामी नहीं होता। यही कारण है कि गीता का कर्मयोग भी परिणाम पर अधिकार के बजाय कर्म पर अधिकार की बात करता है।
दरअसल कर्म का सबसे निश्चित फल बाहर नहीं, मनुष्य के भीतर पैदा होता है। कोई व्यक्ति बार-बार झूठ बोलता है तो वह केवल दूसरों को ही नहीं, स्वयं को भी झूठ बोलने का अभ्यस्त बना रहा होता है। चोरी या धोखे से लाभ पाने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे अपने भीतर यह विश्वास पैदा कर सकता है कि ईमानदार रास्ता मूर्खों के लिए है। इसके विपरीत ईमानदारी, अनुशासन, परिश्रम और करुणा भी धीरे-धीरे व्यक्ति के स्वभाव का हिस्सा बन जाते हैं। कर्म पहले आदत बनता है, आदत चरित्र बनाती है और चरित्र अंततः जीवन की दिशा निर्धारित करता है। इस अर्थ में “जैसी करनी वैसी भरनी” का सबसे गहरा अर्थ शायद यही है कि हम अपने कर्मों के माध्यम से अपने व्यक्तित्व और अपने भविष्य का निर्माण करते रहते हैं।
कर्म का फल सामाजिक स्तर पर भी मिलता है। विश्वास कोई दुकान से खरीदी जाने वाली वस्तु नहीं है; उसे वर्षों में कमाया जाता है और एक क्षण में खोया जा सकता है। एक पत्रकार, शिक्षक, चिकित्सक, व्यापारी या सार्वजनिक व्यक्ति यदि लगातार सत्यनिष्ठा से काम करता है तो उसकी विश्वसनीयता उसकी सबसे बड़ी पूंजी बन जाती है। इसके विपरीत बार-बार गलत सूचना देना, वादे तोड़ना या लोगों का विश्वास भंग करना अंततः उसकी सामाजिक साख को कमजोर करता है। हो सकता है कि उसे कुछ समय तक लाभ मिलता रहे, लेकिन विश्वास की कमी एक ऐसा कर्ज है जिसे किसी न किसी मोड़ पर चुकाना पड़ता है।
फिर भी इस विचार का एक खतरनाक रूप भी है। यदि हम हर पीड़ित व्यक्ति से कहने लगें कि “तुमने जरूर कुछ गलत किया होगा, इसलिए भुगत रहे हो”, तो हम अन्याय को समझने के बजाय पीड़ित को ही दोषी ठहराने लगेंगे। किसी गरीब की गरीबी, किसी बीमार की बीमारी या किसी दुर्घटना के शिकार व्यक्ति की पीड़ा को केवल उसके कर्मों का परिणाम बता देना संवेदना का नहीं, बल्कि संवेदनहीनता का परिचय हो सकता है। कर्म-सिद्धांत का उपयोग यदि दूसरों की पीड़ा को समझने के बजाय उनसे दूरी बनाने के लिए किया जाए, तो वह नैतिक दर्शन न रहकर सामाजिक अन्याय को स्वीकार करने का बहाना बन जाता है।
इसलिए इस कहावत का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है—किसी के साथ बुरा हुआ है तो हमारा काम यह पता लगाना नहीं कि उसने ऐसा क्या किया था कि उसके साथ बुरा हुआ; हमारा पहला दायित्व यह देखना है कि हम उसकी सहायता के लिए क्या कर सकते हैं। किसी के अच्छे कर्मों का फल देर से मिले तो भी उसे निराश नहीं होना चाहिए और किसी बुरे व्यक्ति की तत्काल सफलता देखकर अपने नैतिक रास्ते पर संदेह नहीं करना चाहिए। जीवन में न्याय हमेशा तत्काल और दिखाई देने वाले रूप में नहीं आता। कई बार कर्म का परिणाम धन या पद के रूप में नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, संबंधों, मानसिक शांति और समाज के विश्वास के रूप में सामने आता है।
“जो जैसा करेगा, वैसा ही भरेगा” इसलिए भविष्यवाणी से अधिक जिम्मेदारी का सिद्धांत है। यह हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि हम जो कर रहे हैं, उसका असर केवल आज पर नहीं, आने वाले कल पर भी पड़ेगा। हम दूसरों के साथ जैसा व्यवहार करते हैं, वैसी ही दुनिया बनाने में योगदान देते हैं। यदि हम छल को सामान्य बनाएंगे तो अविश्वास बढ़ेगा; यदि हम ईमानदारी को महत्व देंगे तो विश्वास का वातावरण बनेगा। यदि हम हिंसा को उचित ठहराएंगे तो हिंसा हमारे अपने जीवन तक भी पहुंच सकती है; यदि हम सहयोग को महत्व देंगे तो सहयोग की संभावना बढ़ेगी।
अंततः इस कहावत को अंधविश्वास की तरह नहीं, आत्मपरीक्षण के आईने की तरह देखना चाहिए। हर सुख हमारे पुण्य का प्रमाण नहीं और हर दुख हमारे पाप की सजा नहीं। जीवन इससे कहीं अधिक जटिल है। लेकिन यह जरूर सच है कि हमारे चुनाव हमें बनाते हैं, हमारी आदतें हमारा चरित्र बनाती हैं और हमारा चरित्र हमारे जीवन की दिशा पर गहरा प्रभाव डालता है। इसलिए “जो जैसा करेगा वैसा ही भरेगा” का सबसे विवेकपूर्ण अर्थ शायद यह है—कर्म का फल हमेशा उसी रूप में, उसी समय और उसी मात्रा में नहीं मिलता, लेकिन हम जो बोते हैं, उससे अपने भीतर और अपने आसपास की दुनिया में किसी न किसी रूप में भविष्य जरूर तैयार करते हैं। यही इस कहावत की वास्तविक शक्ति है।

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