नियति में विश्वास की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वह मनुष्य को उन चीजों को स्वीकार करने की क्षमता देता है जिन्हें वह बदल नहीं सकता। जीवन में बहुत कुछ हमारे हाथ में नहीं होता। हम जन्मस्थान, जन्म का समय, परिवार, मौसम, बीमारी, दूसरे व्यक्ति के निर्णय या अचानक घट जाने वाली घटनाओं को नियंत्रित नहीं कर सकते। हर चीज को अपने नियंत्रण में रखने की कोशिश मनुष्य को बेचैन कर सकती है। ऐसे में “जो होना था, वह हो गया” का भाव मन को अतीत के साथ संघर्ष करने से बचाता है। जो घटना घट चुकी है, उसके साथ लगातार लड़ते रहने के बजाय उसे स्वीकार करके आगे बढ़ने की शक्ति मिलती है।
लेकिन स्वीकार और समर्पण में अंतर है। स्वीकार का अर्थ है—जो हो चुका है, उसे अब बदला नहीं जा सकता; इसलिए उससे सीखकर आगे बढ़ो। समर्पण का अर्थ हो सकता है—कुछ भी मेरे हाथ में नहीं, इसलिए प्रयास करने की जरूरत ही क्या है। पहला जीवन-दर्शन है, दूसरा भाग्यवाद बन सकता है। यदि “जो होना है, होकर रहेगा” का अर्थ यह निकाल लिया जाए कि मनुष्य के प्रयास का कोई महत्व नहीं, तो फिर शिक्षा क्यों लें, बीमारी में इलाज क्यों कराएँ, परीक्षा की तैयारी क्यों करें, खेती में मेहनत क्यों करें या किसी अन्याय के खिलाफ आवाज क्यों उठाएँ?
यहीं “होइहैं सोइ जो राम रचि राखा” को समझने की जरूरत है। इस पंक्ति को यदि केवल भाग्यवादी अर्थ में पढ़ा जाए तो मनुष्य का पुरुषार्थ गौण हो जाता है। लेकिन तुलसी की व्यापक जीवन-दृष्टि में कर्म, धर्म, भक्ति और मर्यादा सभी महत्वपूर्ण हैं। इसलिए इसे शायद इस रूप में समझना अधिक उचित होगा कि मनुष्य को अपना कर्तव्य और पुरुषार्थ पूरी निष्ठा से करते हुए अंतिम परिणाम के प्रति अहंकार या अत्यधिक आसक्ति नहीं रखनी चाहिए। परिणाम हमेशा हमारी इच्छा के अनुसार नहीं आएगा—यह स्वीकार करना कमजोरी नहीं, बल्कि मानसिक परिपक्वता है।
जीवन में एक विचित्र विरोधाभास है। हम परिणाम चाहते हैं, लेकिन परिणाम पर हमारा पूरा अधिकार नहीं होता। किसान खेत में बीज बो सकता है, जमीन तैयार कर सकता है, सिंचाई कर सकता है, खाद डाल सकता है; लेकिन बारिश को आदेश नहीं दे सकता। विद्यार्थी पढ़ सकता है, अभ्यास कर सकता है, परीक्षा दे सकता है; लेकिन प्रश्नपत्र कैसा आएगा और दूसरे विद्यार्थी कितना अच्छा प्रदर्शन करेंगे, यह उसके नियंत्रण में नहीं। व्यवसायी योजना बना सकता है, मेहनत कर सकता है, जोखिम का आकलन कर सकता है; लेकिन बाजार की हर परिस्थिति उसके हाथ में नहीं। इसलिए पुरुषार्थ और नियति का संबंध शायद यही है कि पुरुषार्थ हमारे हाथ में है, परिणाम पूरी तरह हमारे हाथ में नहीं।
इस विचार का एक दूसरा पहलू भी है। कई बार मनुष्य अपनी असफलता को भाग्य के खाते में डालकर अपने दायित्व से बचना चाहता है। परीक्षा में तैयारी नहीं की और असफल हो गए तो कहा—“भाग्य में यही लिखा था।” व्यवसाय में गलत निर्णय लिया और नुकसान हो गया तो कहा—“होना ही था।” रिश्ते में अपनी गलतियों को नहीं देखा और संबंध टूट गया तो कहा—“रिश्ता ही ऐसा था।” ऐसी स्थिति में नियति एक दार्शनिक सत्य नहीं, बल्कि आत्ममुक्ति का सुविधाजनक बहाना बन जाती है। भाग्य को दोष देना आसान है, अपने निर्णयों की समीक्षा करना कठिन।
इसके विपरीत कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो हर परिणाम को केवल अपने पुरुषार्थ का परिणाम मानते हैं। सफलता मिली तो कहते हैं—“मैंने कर दिखाया”, असफलता मिली तो स्वयं को पूरी तरह दोषी ठहराते हैं। यह दृष्टिकोण भी अधूरा है। मनुष्य को अपने प्रयास का श्रेय लेना चाहिए, लेकिन यह भी स्वीकार करना चाहिए कि सफलता में परिस्थितियों, समय, अवसर, दूसरे लोगों के सहयोग और संयोग की भूमिका भी होती है। शायद इसी संतुलन का नाम विनम्रता है।
नियति में विश्वास का सबसे सुंदर रूप तब दिखाई देता है जब वह भय को कम करता है, कर्म को नहीं। यदि कोई व्यक्ति यह सोचता है कि “मैं अपना सर्वोत्तम प्रयास करूंगा; परिणाम जो होगा, उसे स्वीकार करूंगा”, तो यह सोच उसे मानसिक रूप से मजबूत बना सकती है। लेकिन यदि वह कहता है, “कुछ भी करने की जरूरत नहीं, जो होना है होकर रहेगा”, तो वही विचार उसे निष्क्रिय बना देता है। दोनों वाक्यों में केवल थोड़ा-सा अंतर है, लेकिन जीवन पर उनका प्रभाव बिल्कुल उलट है।
भारतीय दर्शन में कर्म की अवधारणा इसी कारण महत्वपूर्ण है। कर्म का अर्थ केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य और आचरण से भी है। यदि सब कुछ पहले से तय होता और मनुष्य के प्रयास का कोई अर्थ नहीं होता, तो कर्म का पूरा दर्शन ही अर्थहीन हो जाता। गीता का संदेश भी निष्क्रिय बैठने का नहीं, कर्म करने का है। इसलिए नियति को कर्म का विकल्प मानना भारतीय चिंतन की व्यापक परंपरा के साथ न्याय नहीं करता।
फिर भी यह मान लेना भी उचित नहीं कि मनुष्य अपने जीवन का पूर्ण निर्माता है। आधुनिक सफलता-कथाएँ कभी-कभी यह भ्रम पैदा करती हैं कि जिसने चाहा, उसने पा लिया। वास्तविक जीवन इतना सरल नहीं। दो व्यक्ति समान मेहनत कर सकते हैं, लेकिन उनके परिणाम अलग हो सकते हैं। किसी को अवसर मिल जाता है, किसी को नहीं। किसी को सही समय पर सही व्यक्ति का सहयोग मिल जाता है, किसी को नहीं। किसी की प्रतिभा परिस्थितियों से उभर आती है, किसी की परिस्थितियों में दब जाती है। इसलिए सफलता में पुरुषार्थ है तो संयोग भी है; असफलता में कभी कमी है तो कभी परिस्थितियों की कठोरता भी।
शायद जीवन का सबसे संतुलित सूत्र यही है कि भविष्य को नियति के भरोसे मत छोड़िए, लेकिन भविष्य को पूरी तरह अपने नियंत्रण में होने का भ्रम भी मत पालिए। जितना आपके हाथ में है, उतना पूरी शक्ति से कीजिए। जो आपके हाथ में नहीं है, उसके लिए स्वयं को नष्ट मत कीजिए। जो गलती हुई है, उसे भाग्य का नाम देकर छोड़िए मत; उससे सीखिए। जो प्रयास करने योग्य है, उसे “राम की इच्छा” कहकर टालिए मत। और जब तमाम प्रयासों के बाद भी परिणाम आपके पक्ष में न आए, तब स्वयं को यह कहने की अनुमति दीजिए कि शायद अब इसे स्वीकार करके आगे बढ़ना ही बेहतर है।
अंततः “जो होना है, वह होकर रहेगा” भविष्य की भविष्यवाणी से अधिक वर्तमान के प्रति एक दृष्टिकोण हो सकता है। हमें वास्तव में नहीं मालूम कि क्या होना है। इसलिए भविष्य को पहले से लिखी हुई पटकथा मान लेना मनुष्य की संभावनाओं को छोटा कर देता है। हो सकता है कुछ चीजें हमारी इच्छा के विरुद्ध हों, लेकिन यह भी संभव है कि हमारे प्रयास ही उन संभावनाओं को बदल दें जिन्हें हम आज नियति समझ रहे हैं।
इसलिए “होइहैं सोइ जो राम रचि राखा” का सबसे स्वस्थ अर्थ शायद यह नहीं कि “कुछ मत करो, सब राम पर छोड़ दो”, बल्कि यह है कि “अपना धर्म और पुरुषार्थ पूरी ईमानदारी से करो और परिणाम के अहंकार या भय में स्वयं को मत खोओ।” नियति यदि है भी तो वह मनुष्य के हाथ-पाँव बाँध देने वाली बेड़ी नहीं होनी चाहिए। वह केवल उस सीमा का बोध करा सकती है जहाँ हमारा नियंत्रण समाप्त होता है। उस सीमा तक पहुँचने से पहले प्रयास करना मनुष्य का धर्म है; सीमा के बाद शांति से स्वीकार करना उसकी बुद्धिमत्ता।
आखिरकार जीवन शायद न पूरी तरह भाग्य है, न पूरी तरह पुरुषार्थ। जीवन उन दोनों के बीच चलने वाली एक अनिश्चित यात्रा है—जहाँ रास्ता चुनने का अधिकार हमारे पास है, लेकिन रास्ते में मिलने वाली हर परिस्थिति पर हमारा अधिकार नहीं। इसलिए न तो भाग्य के भरोसे बैठना उचित है और न अपने पुरुषार्थ पर इतना अहंकार करना कि संयोग और परिस्थितियों की भूमिका ही भूल जाएँ। बेहतर यही है कि कर्म में मनुष्य रहें, परिणाम में विनम्र रहें और अनिश्चितता के सामने विश्वास बनाए रखें। शायद यही “राम रचित” होने की भावना का सबसे जीवंत और व्यावहारिक अर्थ है।

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