ऑफिस की राजनीति एक ऐसा कड़वा सच है जिससे पूर्णतः अछूता रहना लगभग नामुमकिन है। जहाँ भी अलग-अलग विचारधाराओं, महत्वाकांक्षाओं और सीमित संसाधनों वाले लोग एक साथ काम करते हैं, वहाँ पावर डायनेमिक्स या राजनीति का जन्म होना स्वाभाविक है। अगर आप सोचें कि केवल अपने काम से काम रखकर आप इस पूरे चक्रव्यूह से सुरक्षित दूर रह सकते हैं, तो यह एक गलतफहमी हो सकती है। निष्क्रिय रहने या राजनीति से पूरी तरह आँखें मूँद लेने से आप अक्सर दूसरों के राजनीतिक खेल का शिकार बन जाते हैं। इसलिए, ऑफिस की राजनीति से बचने का सबसे बेहतर तरीका यह नहीं है कि आप किसी कोने में छिप जाएँ, बल्कि यह है कि आप अपनी एक ऐसी मजबूत और पेशेवर छवि बनाएँ कि राजनीति का आप पर नकारात्मक प्रभाव न पड़े।
राजनीति के दुष्प्रभावों से खुद को बचाए रखने के लिए सबसे पहला कदम है कि आप कार्यस्थल पर तटस्थ और पेशेवर रुख बनाए रखें। किसी भी तरह की गपशप, दूसरों की चुगली या दलीय गुटबाज़ी से दूरी बनाना बेहद जरूरी है। अपने सहकर्मियों के साथ व्यक्तिगत संबंधों के बजाय एक स्वस्थ और सहयोगात्मक कार्य-संबंध विकसित करें। अपनी कम्यूनिकेशन को हमेशा पारदर्शी रखें और महत्वपूर्ण बातचीत को हमेशा लिखित ईमेल के रूप में रिकॉर्ड में रखें, ताकि भविष्य में कोई आपके काम का श्रेय न छीन सके या आप पर गलत आरोप न लगा सके। इसके साथ ही, अपने काम की गुणवत्ता को अपनी ढाल बनाएँ; जब आपका प्रदर्शन और परिणाम बेहतरीन होते हैं, तो दूसरों के लिए आपके खिलाफ साजिश रचना काफी कठिन हो जाता है।
हालाँकि, यदि आप ऐसी स्थिति में हैं जहाँ राजनीति से बचना बिल्कुल असंभव है, तो आपको शिकार बनने के बजाय एक स्मार्ट और रणनीतिक खिलाड़ी बनना होगा ताकि आप अपने पेशेवर हितों और करियर की सुरक्षा कर सकें। ऑफिस में अपने फायदे के लिए राजनीति करने का मतलब किसी का नुकसान करना या छल-कपट करना बिल्कुल नहीं है, बल्कि इसे "सकारात्मक कूटनीति" की तरह इस्तेमाल करना है। सबसे पहले, अपने संस्थान में निर्णय लेने वाले मुख्य लोगों और पावर सेंटर्स को पहचानें और उनके साथ अपने संबंधों को मजबूत करें। केवल अपने काम को पूरा कर देना ही काफी नहीं होता, बल्कि सही समय पर सही लोगों के सामने अपने काम और योगदान की दृश्यता (विजिबिलिटी) बनाना भी उतना ही आवश्यक है।
अपने करियर के फायदे के लिए राजनीति को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने हेतु आपको नेटवर्क और गठबंधन बनाने की कला आनी चाहिए। ऐसे सहकर्मियों और मेंटर्स का समर्थन हासिल करें जो मुश्किल समय में आपके पक्ष में खड़े हो सकें। हमेशा शांत रहें और अपनी भावनाएं कभी भी दूसरों के सामने जाहिर न होने दें, क्योंकि कार्यस्थल पर अत्यधिक भावुक होना आपकी कमजोरी बन सकता है। ऑफिस की अंदरूनी हवा किस तरफ बह रही है, इसे भांपना सीखें ताकि आप किसी भी संगठनात्मक बदलाव या खतरे का सामना करने के लिए समय रहते तैयार रहें। अंततः, ऑफिस की राजनीति में सफल होने का मूलमंत्र यह है कि आप न तो किसी के खेल का मोहरा बनें और न ही किसी के साथ अन्याय करें, बल्कि अपनी बुद्धि, नेटवर्किंग और सही रणनीति के दम पर अपने अधिकार और तरक्की की राह को सुरक्षित रखें।
ऑफिस की राजनीति से बचना कैसे मुमकिन है और अगर नहीं बच सकते तो ऑफिस में राजनीति कैसे करनी चाहिए—यह सवाल दरअसल नौकरी करने की कला से कहीं अधिक, मनुष्य को समझने की कला से जुड़ा हुआ है। जिस दिन कई लोग एक जगह काम करने लगते हैं, उस दिन केवल काम नहीं होता, संबंध बनते हैं, अपेक्षाएँ पैदा होती हैं, प्रभाव के क्षेत्र बनते हैं और कहीं न कहीं हितों का टकराव भी शुरू हो जाता है। इसलिए ऑफिस में राजनीति कोई अलग से पैदा हुई बुराई नहीं है; वह मनुष्य के सामाजिक व्यवहार का ही एक रूप है। फर्क सिर्फ इतना है कि राजनीति स्वस्थ है या अस्वस्थ, पारदर्शी है या छिपी हुई, और उसका उद्देश्य संगठन के काम को बेहतर बनाना है या किसी व्यक्ति को आगे बढ़ाने के लिए दूसरे को पीछे धकेलना।
ऑफिस की राजनीति से पूरी तरह बचना शायद उतना ही मुश्किल है जितना किसी शहर में रहकर ट्रैफिक से पूरी तरह बच जाना। आप अपनी गाड़ी नियम से चला सकते हैं, अपनी लेन में रह सकते हैं, हॉर्न कम बजा सकते हैं, लेकिन सड़क पर बाकी गाड़ियाँ किस दिशा में जाएँगी, यह आपके हाथ में नहीं होता। ऑफिस में भी आप ईमानदारी से काम कर सकते हैं, समय पर पहुँच सकते हैं, बेहतर परिणाम दे सकते हैं और किसी के खिलाफ षड्यंत्र न कर सकते हैं, फिर भी यह सुनिश्चित नहीं कर सकते कि दूसरे लोग आपके बारे में क्या सोचेंगे, किसके साथ खड़े होंगे या आपके काम का श्रेय किस तरह प्रस्तुत करेंगे। इसलिए पहली समझ यही होनी चाहिए कि राजनीति से भागना और राजनीति को समझना—दो अलग बातें हैं।
समस्या राजनीति में होने से नहीं, राजनीति को गलत तरीके से करने से पैदा होती है। हर संगठन में कुछ लोग निर्णय लेने वालों के करीब होते हैं, कुछ लोग अपने काम और विशेषज्ञता के कारण प्रभावशाली होते हैं, कुछ लोग अपने नेटवर्क के कारण और कुछ लोग केवल इसलिए प्रभाव रखते हैं क्योंकि वे सही समय पर सही व्यक्ति के साथ दिखाई देते हैं। इसे समझना चापलूसी नहीं है। संगठन में औपचारिक पदों के अलावा अनौपचारिक शक्ति-संबंध भी होते हैं। कौन किसकी बात सुनता है, कौन किस पर भरोसा करता है, किसकी राय निर्णय को प्रभावित करती है और कौन-सा व्यक्ति संकट के समय उपयोगी साबित होता है—इन बातों को समझना ऑफिस की सामाजिक संरचना को समझना है।
इसलिए ऑफिस में राजनीति से बचने का पहला उपाय है—किसी गुट का अंधा हिस्सा मत बनिए। आज आपका बॉस किसी व्यक्ति के करीब है, कल कोई दूसरा व्यक्ति प्रभावशाली हो सकता है। आज जिस सहकर्मी के साथ बैठकर आप किसी तीसरे की आलोचना कर रहे हैं, संभव है कल वही सहकर्मी आपके बारे में किसी और के साथ वही बातचीत कर रहा हो। ऑफिस में कही गई बात का जीवनकाल अक्सर वक्ता की कल्पना से कहीं अधिक लंबा होता है। इसलिए अपनी बातचीत में ऐसी बातें कम रखिए जिन्हें कल आपके सामने दोहराया जाए तो आपको शर्मिंदा होना पड़े।
दूसरा उपाय है—अपने काम को अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक सुरक्षा बनाइए। ऑफिस में आपकी प्रतिष्ठा जितनी अधिक आपके काम, विश्वसनीयता और परिणामों पर आधारित होगी, उतना ही किसी के लिए आपको कमजोर करना कठिन होगा। काम का रिकॉर्ड रखिए, महत्वपूर्ण निर्देशों को लिखित रूप में सुरक्षित रखिए, अपनी उपलब्धियों को तथ्यात्मक तरीके से प्रस्तुत कीजिए और ऐसी स्थिति पैदा मत होने दीजिए जिसमें आपके किए हुए काम का पूरा श्रेय कोई दूसरा व्यक्ति ले जाए। इसका अर्थ हर छोटी उपलब्धि का ढिंढोरा पीटना नहीं है; अर्थ यह है कि आपकी मेहनत का दस्तावेजी निशान मौजूद रहे।
लेकिन केवल अच्छा काम करना ही पर्याप्त नहीं होता। कई बार ऑफिस की राजनीति में सबसे बड़ी गलती मेहनती व्यक्ति यही करता है कि वह सोचता है—“मैं अच्छा काम करूँगा तो लोग अपने आप समझ जाएंगे।” जरूरी नहीं। संस्थाएँ केवल मेहनत नहीं देखतीं, वे दिखाई देने वाला योगदान भी देखती हैं। इसलिए अपने काम को दिखाना सीखिए, बेचिए नहीं। किसी प्रोजेक्ट में आपका योगदान क्या रहा, आपने कौन-सी समस्या हल की और उसका परिणाम क्या आया—इसे पेशेवर ढंग से बताना आत्मप्रचार नहीं, पेशेवर संचार है।
अगर राजनीति से पूरी तरह बचना संभव नहीं है, तो सवाल आता है कि राजनीति करनी कैसे चाहिए? इसका सबसे सुरक्षित उत्तर है—व्यक्तियों के खिलाफ नहीं, परिस्थितियों की समझ के साथ राजनीति कीजिए। किसी को गिराकर ऊपर उठने की कोशिश करने के बजाय अपनी उपयोगिता, विश्वसनीयता और संबंधों का ऐसा नेटवर्क बनाइए कि आपकी अनुपस्थिति महसूस हो। किसी व्यक्ति की कमजोरी खोजकर उसका इस्तेमाल करने से ज्यादा स्थायी शक्ति यह है कि लोग आपको समस्या पैदा करने वाले व्यक्ति के बजाय समस्या हल करने वाले व्यक्ति के रूप में देखें।
ऑफिस की राजनीति में एक और महत्वपूर्ण हथियार है—सही समय पर सही व्यक्ति से सही बात कहना। हर बात हर व्यक्ति को बताना राजनीतिक बुद्धिमत्ता नहीं है। गोपनीय सूचना को इधर-उधर ले जाना, एक व्यक्ति की बात दूसरे तक पहुँचाना, चुगली को नेटवर्किंग समझना और अफवाहों को अवसर मानना अंततः उलटा पड़ सकता है। आपकी विश्वसनीयता एक बार टूट गई तो फिर आपका नेटवर्क कितना भी बड़ा हो, लोग आपको महत्वपूर्ण सूचनाएँ देने से बचेंगे। राजनीति में सबसे मूल्यवान मुद्रा अक्सर सूचना नहीं, विश्वास होता है।
यह भी समझना जरूरी है कि ऑफिस में हर दोस्त आपका मित्र नहीं होता और हर असहमति रखने वाला आपका दुश्मन नहीं होता। पेशेवर संबंधों को व्यक्तिगत संबंधों से पूरी तरह मिला देना खतरनाक है। किसी सहकर्मी से आपकी अच्छी दोस्ती है, इसका अर्थ यह नहीं कि आप उसके हर निर्णय का समर्थन करें। उसी तरह किसी व्यक्ति से मतभेद है, इसका अर्थ यह नहीं कि उसके अच्छे काम को भी खराब बताना जरूरी है। परिपक्व पेशेवर व्यक्ति व्यक्ति और मुद्दे में फर्क करना जानता है।
ऑफिस की राजनीति में भावनात्मक नियंत्रण शायद सबसे बड़ा हथियार है। कोई आपके खिलाफ कुछ कह दे, कोई बैठक में आपका श्रेय ले जाए या कोई आपको जानबूझकर उकसाए—तुरंत प्रतिक्रिया देना अक्सर सामने वाले को वही अवसर देता है जिसकी उसे तलाश थी। हर लड़ाई लड़ना जरूरी नहीं होता। कुछ लड़ाइयाँ दस्तावेज से जीती जाती हैं, कुछ समय से और कुछ बिल्कुल न लड़कर। यह पहचानना कि कब बोलना है, कब चुप रहना है और कब ऊपर के स्तर पर तथ्यात्मक तरीके से मामला रखना है—यही राजनीतिक परिपक्वता है।
एक दिलचस्प बात यह भी है कि ऑफिस की राजनीति में बहुत ज्यादा निष्पक्ष दिखने की कोशिश भी कभी-कभी आपको अलग-थलग कर सकती है। मनुष्य सामाजिक प्राणी है। लोगों से सामान्य संबंध रखना, उनकी समस्याओं को सुनना, अवसर मिलने पर सहयोग करना, किसी के अच्छे काम की प्रशंसा करना और कठिन समय में सहकर्मी के साथ खड़ा होना जरूरी है। संबंध बनाना चापलूसी नहीं है। फर्क नीयत और तरीके का है। चापलूसी में आप व्यक्ति को खुश करने के लिए अपनी राय बेचते हैं; अच्छे पेशेवर संबंधों में आप सम्मान देते हैं लेकिन अपनी रीढ़ बचाकर रखते हैं।
सबसे खतरनाक ऑफिस राजनीति वह होती है जिसमें व्यक्ति दूसरों को नुकसान पहुँचाने को अपनी सफलता का पर्याय समझ लेता है। किसी की सूचना छिपाना, जानबूझकर गलत जानकारी देना, झूठी शिकायत करना, श्रेय हथिया लेना, अफवाह फैलाना या किसी की नौकरी अथवा प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने की कोशिश करना अल्पकालिक लाभ दे सकता है, लेकिन इससे संगठन में विश्वास का वातावरण खराब होता है और अंततः व्यक्ति स्वयं भी उसी संस्कृति का शिकार हो सकता है। जो व्यवस्था दूसरों के खिलाफ इस्तेमाल की जाती है, वह कभी-कभी अपने निर्माता के खिलाफ भी इस्तेमाल होने लगती है।
इसलिए ऑफिस की राजनीति का बेहतर सिद्धांत शायद यह है—“लोगों को हराइए मत, अपनी स्थिति मजबूत कीजिए।” अपने बॉस से पेशेवर संबंध रखिए, लेकिन केवल बॉस पर निर्भर मत रहिए। सहकर्मियों से सहयोग रखिए, लेकिन अपनी पहचान केवल किसी गुट से मत बनाइए। वरिष्ठों के सामने अपनी उपलब्धियाँ रखिए, लेकिन दूसरों के योगदान को मिटाकर नहीं। जूनियरों की मदद कीजिए, क्योंकि भविष्य में वही लोग आपके पेशेवर नेटवर्क का हिस्सा होंगे। और सबसे महत्वपूर्ण—ऐसा कोई काम मत कीजिए जिसे छिपाने के लिए आपको आगे दस झूठ बोलने पड़ें।
अंततः ऑफिस की राजनीति से बचने का सबसे व्यावहारिक तरीका राजनीति को खत्म करना नहीं, बल्कि उसके बीच अपनी मर्यादा और उपयोगिता बचाए रखना है। ऑफिस में पूरी तरह निष्क्रिय रहना भी बुद्धिमानी नहीं और हर समय षड्यंत्र में लगे रहना भी। एक ओर भोलेपन से यह मान लेना कि “मैं तो सिर्फ काम करता हूँ, राजनीति से मेरा कोई लेना-देना नहीं”, खतरनाक हो सकता है; दूसरी ओर यह मान लेना कि “आगे बढ़ने के लिए दूसरों को गिराना जरूरी है”, उससे भी ज्यादा खतरनाक है। सही रास्ता इनके बीच है—लोगों को समझिए, शक्ति-संबंधों को पहचानिए, अपने हितों की रक्षा कीजिए, संबंध बनाइए, अपने काम का रिकॉर्ड रखिए, सही समय पर अपनी बात रखिए और जहाँ संभव हो वहाँ सहयोग कीजिए।
आखिरकार ऑफिस में सबसे टिकाऊ राजनीति वह है जिसमें आप किसी के खिलाफ खड़े हुए बिना अपनी जगह बना लेते हैं। आपका काम आपकी पहचान बने, आपकी विश्वसनीयता आपकी ढाल बने, आपके संबंध आपका नेटवर्क बनें और आपका संयम आपकी ताकत। तब ऑफिस की राजनीति आपके लिए युद्ध का मैदान नहीं रह जाती; वह बस उस संगठन की सामाजिक वास्तविकता बन जाती है, जिसे समझकर आपको अपने रास्ते पर आगे बढ़ना है।

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