गुरुवार, 17 सितंबर 2026

निठल्ले के नोट्स - सब बेचेंगे तो खरीदेगा कौन?

जब सब बेचेंगे तो खरीदेगा कौन?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले वर्षों में बार-बार इस विचार पर जोर दिया है कि भारत के युवाओं को केवल नौकरी खोजने वाला नहीं, बल्कि रोजगार देने वाला और job creator बनने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। 2016 में उन्होंने युवाओं के संदर्भ में कहा था कि वे “job seeker” नहीं, “job creator” बनना चाहते हैं और सरकार को ऐसा entrepreneurial ecosystem बनाना चाहिए जो इस आकांक्षा को पूरा कर सके। बाद में Startup India, Mudra और Stand-Up India जैसी पहलों को भी स्वरोजगार और उद्यमिता को बढ़ावा देने के संदर्भ में रखा गया। 2026 में भी प्रधानमंत्री ने self-employment और entrepreneurship की नई संस्कृति तथा देश में दो लाख से अधिक recognised startups का उल्लेख किया है। विचार अपने आप में आकर्षक है—नौकरी मांगने के बजाय स्वयं काम पैदा करना, अपने पैरों पर खड़ा होना और दूसरों को भी रोजगार देना। लेकिन इसी विचार के भीतर एक ऐसा आर्थिक सवाल छिपा है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता—अगर सब रोजगार देने वाले बन जाएंगे, सब अपना व्यवसाय करेंगे, सब कुछ बेचेंगे, तो खरीदेगा कौन?

पकौड़े बेचने का उदाहरण इसी बहस का प्रतीक बन गया था। इसका मूल विचार यह था कि स्वरोजगार का छोटा-से-छोटा रूप भी आर्थिक गतिविधि और आय का स्रोत हो सकता है। किसी व्यक्ति का पकौड़े बेचना भी काम है, बशर्ते वह उसके लिए आय पैदा करता हो और आर्थिक गतिविधि का हिस्सा बनता हो। लेकिन यहां एक दूसरा प्रश्न उठता है—यदि एक मोहल्ले में सौ लोग पकौड़े बेचने लगें, तो क्या सौों के लिए पर्याप्त ग्राहक होंगे? यदि हर बेरोजगार युवक चाय की दुकान खोल ले, हर दूसरा व्यक्ति कपड़े बेचने लगे, हर तीसरा मोबाइल रिपेयरिंग की दुकान खोल ले और हर चौथा ऑनलाइन सामान बेचने लगे, तो क्या केवल व्यवसाय शुरू कर देने से सभी व्यवसाय चल जाएंगे? नहीं। क्योंकि उद्यमिता का पहला नियम व्यवसाय शुरू करना नहीं, ग्राहक की जरूरत पहचानना है।

यहीं “स्वरोजगार” और “सफल उद्यमिता” के बीच का अंतर सामने आता है। स्वरोजगार का अर्थ है कि व्यक्ति स्वयं के लिए काम पैदा कर ले; उद्यमिता उससे आगे की चीज है—वह किसी ऐसी वस्तु या सेवा का निर्माण करे जिसकी वास्तविक मांग हो, उसके लिए ग्राहक भुगतान करने को तैयार हों और व्यवसाय लागत से अधिक मूल्य पैदा कर सके। हर व्यक्ति दुकान खोल सकता है, लेकिन हर दुकान सफल नहीं हो सकती। हर व्यक्ति YouTube चैनल शुरू कर सकता है, लेकिन हर चैनल को दर्शक नहीं मिलते। हर कोई कोचिंग सेंटर खोल सकता है, लेकिन हर सेंटर में विद्यार्थी नहीं आएंगे। हर व्यक्ति ऐप बना सकता है, लेकिन हर ऐप के उपयोगकर्ता नहीं होंगे। इसलिए उद्यमी बनने की संभावना असीमित हो सकती है, लेकिन बाजार की मांग असीमित नहीं होती।

अर्थव्यवस्था का वास्तविक चक्र यहां समझना जरूरी है। कोई एक व्यक्ति उत्पादन करता है, दूसरा उसकी वस्तु खरीदता है; दूसरा किसी तीसरे के लिए सेवा देता है और तीसरा उसके बदले भुगतान करता है। इस तरह पैसा एक हाथ से दूसरे हाथ में घूमता है। लेकिन यदि हर व्यक्ति केवल उत्पादन करने और बेचने पर ध्यान दे और खरीदने की क्षमता रखने वाले लोगों की संख्या या उनकी आय पर्याप्त न बढ़े, तो बाजार में supply बढ़ती जाएगी और demand उसके पीछे छूट सकती है। फिर प्रतियोगिता बढ़ेगी, कीमतें गिरेंगी, मुनाफा घटेगा और अनेक छोटे व्यवसाय बंद हो जाएंगे। इसलिए उद्यमिता की सफलता केवल उद्यमियों की संख्या से नहीं, ग्राहकों की संख्या और उनकी क्रय-शक्ति से भी तय होती है।

इसे एक छोटे से शहर की कल्पना करके समझा जा सकता है। मान लीजिए शहर में दस हजार परिवार हैं और अचानक पांच हजार लोग छोटे-छोटे व्यवसाय शुरू कर देते हैं। कोई चाय बेच रहा है, कोई नाश्ता, कोई कपड़े, कोई मोबाइल, कोई बीमा, कोई ऑनलाइन सेवा और कोई ट्यूशन। शुरुआत में यह उत्साहजनक दिखाई देगा—हर तरफ दुकानें, सेवाएं और नए व्यवसाय। लेकिन कुछ समय बाद पता चलेगा कि ग्राहकों की संख्या वही है। लोगों की आय में उसी अनुपात में वृद्धि नहीं हुई है। परिणाम क्या होगा? ग्राहक दस दुकानों के बजाय एक दुकान चुनेंगे, दस सेवाओं के बजाय दो सेवाएं लेंगे और कई व्यवसायों की बिक्री इतनी कम हो जाएगी कि वे लागत भी नहीं निकाल पाएंगे। यानी उद्यमियों की संख्या बढ़ गई, लेकिन बाजार नहीं बढ़ा।

इसलिए किसी भी अर्थव्यवस्था में रोजगार पैदा करने के लिए केवल “सब उद्यमी बनें” कहना पर्याप्त नहीं है। एक सफल उद्यमी बनने के लिए पूंजी चाहिए, कौशल चाहिए, बाजार की समझ चाहिए, तकनीक चाहिए, जोखिम उठाने की क्षमता चाहिए और सबसे महत्वपूर्ण—ग्राहक चाहिए। प्रधानमंत्री ने स्वयं एक अवसर पर यह कहा था कि self-employment केवल भाषणों से हासिल नहीं किया जा सकता; इसके लिए support, guidance और assistance की जरूरत होती है। यही बात इस बहस का महत्वपूर्ण दूसरा पक्ष है।

और यहां नौकरी की भूमिका भी समझनी होगी। सामान्यतः नौकरी करने वाला व्यक्ति केवल “job seeker” नहीं होता; वह consumer भी होता है। उसे वेतन मिलता है, वह घर का किराया देता है, खाना खरीदता है, कपड़े खरीदता है, बच्चों की फीस देता है, मोबाइल रिचार्ज करता है, यात्रा करता है, इलाज कराता है और कभी-कभी मकान, वाहन या अन्य बड़ी वस्तुएं खरीदता है। उसकी आय किसी दूसरे के व्यवसाय के लिए मांग पैदा करती है। इसलिए अर्थव्यवस्था में नौकरी और उद्यमिता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। वास्तव में वे एक-दूसरे को सहारा देते हैं। उद्यमी रोजगार देता है और कर्मचारी अपनी आय से बाजार में मांग पैदा करता है। एक रोजगार पैदा करता है, दूसरा उस रोजगार से पैदा हुई आय को बाजार में खर्च करके दूसरे व्यवसायों को जीवित रखता है।

यही वह बिंदु है जहां “सब नौकरी देने वाले बनें” की कल्पना को सावधानी से समझने की आवश्यकता है। हर व्यक्ति employer नहीं बन सकता और न ही हर व्यक्ति को employer बनना आवश्यक है। समाज को शिक्षक भी चाहिए, इंजीनियर भी, डॉक्टर भी, नर्स भी, वैज्ञानिक भी, पत्रकार भी, ड्राइवर भी, तकनीशियन भी, किसान भी और दुकानदार भी। हर व्यक्ति का आर्थिक योगदान अलग होता है। किसी को कंपनी बनाने में सफलता मिल सकती है, किसी को किसी कंपनी में अपनी विशेषज्ञता बेचने में। किसी का कौशल इतना मूल्यवान हो सकता है कि वह नौकरी करके भी अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ा योगदान दे। इसलिए job creator और job seeker को दो विरोधी श्रेणियों में बांटना शायद आर्थिक जीवन की वास्तविक जटिलता को बहुत सरल बना देना है।

उद्यमिता का एक और महत्वपूर्ण पक्ष है—हर उद्यमी को ग्राहक नहीं चाहिए, उसे पर्याप्त ग्राहक चाहिए। अगर दस लोग एक ही प्रकार की दुकान खोलते हैं और ग्राहकों की जरूरत वही रहती है, तो दसों का व्यवसाय चलना मुश्किल होगा। लेकिन यदि उनमें से कोई नई जरूरत पैदा करता है, बेहतर गुणवत्ता देता है, कम कीमत पर सुविधा देता है या ऐसी सेवा देता है जो पहले उपलब्ध ही नहीं थी, तो वह नया बाजार बना सकता है। असली उद्यमिता यहीं है। सफल उद्यमी केवल मौजूदा ग्राहकों को बांटता नहीं; वह कभी-कभी नई मांग पैदा करता है। मोबाइल फोन, ऑनलाइन भुगतान, food delivery, streaming, digital education और अनेक नई सेवाओं ने यही किया—उन्होंने केवल पुराने बाजार में हिस्सा नहीं लिया, बल्कि लोगों की आदतें और जरूरतें भी बदलीं।

लेकिन यहां भी एक सीमा है। मनुष्य की आय और समय सीमित हैं। हर नई सेवा के लिए वह अनंत पैसा नहीं खर्च कर सकता। उसकी जेब में ₹100 है तो वह एक ही ₹100 को दस अलग-अलग दुकानों पर खर्च नहीं कर सकता। इसलिए उद्यमिता को बढ़ाने के साथ-साथ आय और क्रय-शक्ति बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है। अगर लोगों की आय नहीं बढ़ती और केवल व्यवसायों की संख्या बढ़ती जाती है, तो प्रतियोगिता इतनी तीखी हो सकती है कि छोटे उद्यमी कम मार्जिन, कर्ज और अस्थिर आय के चक्र में फंस जाएं।

इसलिए असली सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “कितने लोग उद्यमी बने?” बल्कि यह होना चाहिए कि “कितने उद्यम टिकाऊ बने?” दुकान खोल लेना उद्यमिता की शुरुआत है, सफलता का प्रमाण नहीं। स्टार्टअप पंजीकृत हो जाना सफलता नहीं है; उसका टिकना, ग्राहक बनाना, मूल्य पैदा करना, लाभ कमाना और रोजगार पैदा करना सफलता के अधिक अर्थपूर्ण संकेत हैं। इसी तरह किसी व्यक्ति का स्वरोजगार में आ जाना अच्छी शुरुआत हो सकती है, लेकिन यदि उसकी आमदनी अनिश्चित है, कर्ज बढ़ रहा है और काम करने के बावजूद जीवन-स्तर में सुधार नहीं हो रहा, तो केवल उसे “उद्यमी” कह देने से आर्थिक समस्या समाप्त नहीं होती।

इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि भारत को उद्यमिता की आवश्यकता नहीं है। इसके उलट, छोटे व्यवसाय, MSME, startups, professionals, self-employed workers और स्थानीय उद्यम भारत की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रधानमंत्री ने भी छोटे उद्यमियों के रोजगार सृजन की भूमिका पर जोर दिया है और 2016 में कहा था कि छोटे-छोटे व्यवसाय करने वाले लोग भी दूसरों को रोजगार देते हैं। समस्या उद्यमिता में नहीं है; समस्या तब पैदा होती है जब उद्यमिता को रोजगार का एकमात्र समाधान मान लिया जाए।

क्योंकि रोजगार का स्वस्थ मॉडल शायद वह है जिसमें तीनों साथ चलें—नौकरी, स्वरोजगार और उद्यमिता। बड़ी कंपनियां और सरकारी संस्थाएं रोजगार दें; छोटे व्यवसाय स्वरोजगार और स्थानीय रोजगार पैदा करें; startups नई तकनीक और नए बाजार बनाएं; और शिक्षा व्यवस्था युवाओं को नौकरी पाने के साथ-साथ अपना काम खड़ा करने की क्षमता भी दे। तब “job seeker” और “job creator” के बीच दीवार नहीं रहेगी। एक व्यक्ति आज नौकरी कर सकता है, कल अपना व्यवसाय शुरू कर सकता है और भविष्य में दूसरों को नौकरी दे सकता है। आर्थिक जीवन स्थिर पहचान नहीं, बल्कि बदलती भूमिकाओं का संसार है।

अंततः “जब सब बेचेंगे तो खरीदेगा कौन?” का उत्तर बहुत सीधा है—खरीदने वाला वही होगा जिसकी आय है, जिसकी क्रय-शक्ति है और जिसे वास्तव में उस वस्तु या सेवा की जरूरत है। इसलिए किसी भी राष्ट्र की आर्थिक नीति का लक्ष्य केवल विक्रेताओं और उद्यमियों की संख्या बढ़ाना नहीं हो सकता। उसे ऐसे नागरिक भी चाहिए जिनके पास स्थिर और पर्याप्त आय हो, ताकि वे बाजार में मांग पैदा कर सकें। उसे ऐसे उद्यम चाहिए जो वास्तविक जरूरत पूरी करें। उसे ऐसे रोजगार चाहिए जो लोगों को उपभोग और बचत दोनों की क्षमता दें। और उसे ऐसा बाजार चाहिए जिसमें लाखों लोग केवल एक-दूसरे को बेचने की कोशिश न कर रहे हों, बल्कि वास्तव में एक-दूसरे के लिए मूल्य पैदा कर रहे हों।

शायद विकसित अर्थव्यवस्था की असली पहचान यही है कि वहां केवल “कौन बेच रहा है?” यह सवाल नहीं पूछा जाता, बल्कि यह भी देखा जाता है कि “कौन खरीद सकता है, क्या खरीदना चाहता है और क्यों खरीदना चाहता है?” उद्यमिता अर्थव्यवस्था का इंजन हो सकती है, लेकिन ग्राहक उसका ईंधन है। इंजन कितने भी बना लिए जाएं, ईंधन के बिना वे चलेंगे नहीं। इसलिए भारत को केवल उद्यमियों का देश नहीं, बल्कि उत्पादक, रोजगार-सृजक, कुशल कर्मचारी और सक्षम उपभोक्ताओं—सभी का संतुलित देश बनना होगा। तभी “सब बेचेंगे” की स्थिति “सब एक-दूसरे से खरीदेंगे” में बदल सकती है और उद्यमिता वास्तव में व्यापक समृद्धि का माध्यम बन सकती है।

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