1863 में रूसी लेखक निकोलाई चेर्निशेव्स्की ने जो उपन्यास “Что делать?” — “क्या करें?” लिखा, वह केवल एक साहित्यिक कथा नहीं था; वह अपने समय की सामाजिक बेचैनी, आर्थिक असमानता, स्त्री की पराधीनता, पुराने सामाजिक ढाँचे और बेहतर जीवन की तलाश से पैदा हुआ एक वैचारिक प्रश्न था। दिलचस्प बात यह है कि यह उपन्यास चेर्निशेव्स्की ने जेल में रहते हुए लिखा था और 1863 में Sovremennik पत्रिका में धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुआ। इसके प्रभाव को इतना व्यापक माना गया कि बाद की रूसी क्रांतिकारी बुद्धिजीवी पीढ़ियों पर इसका गहरा असर पड़ा।
चेर्निशेव्स्की के समय का रूस आज के रूस या दुनिया जैसा नहीं था। सामाजिक संरचना, आर्थिक व्यवस्था, राजनीतिक संस्थाएँ, स्त्री की स्थिति और सामान्य जीवन की परिस्थितियाँ बिल्कुल अलग थीं। फिर भी उनके सवाल की असली ताकत उसके ऐतिहासिक विवरण में नहीं, बल्कि उस बुनियादी मानवीय बेचैनी में है जो पूछती है—जब व्यवस्था में समस्याएँ हों, जीवन में असमानता हो, व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता चाहता हो और पुरानी मान्यताएँ उसके रास्ते में खड़ी हों, तब आखिर क्या किया जाए? यही वह बिंदु है जहाँ 1863 का प्रश्न 2026 के मनुष्य से संवाद करने लगता है।
उपन्यास की केंद्रीय पात्र वीरा पावलोव्ना केवल प्रेम और पारिवारिक संबंधों की कहानी की नायिका नहीं है। वह आर्थिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की तलाश करती है और सिलाई के सहकारी उद्यम के माध्यम से काम और सामूहिकता का एक वैकल्पिक मॉडल प्रस्तुत करती है; बाद में चिकित्सा की पढ़ाई के माध्यम से अपने बौद्धिक और आर्थिक आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ती है। कॉर्नेल विश्वविद्यालय की पृष्ठभूमि सामग्री भी उसके चरित्र में स्वतंत्रता, समानता, उपयोगी श्रम और स्त्री की सामाजिक भागीदारी के संबंध को रेखांकित करती है।
यहीं से उपन्यास का पहला बड़ा आधुनिक अर्थ निकलता है—मुश्किल परिस्थितियों में केवल शिकायत पर्याप्त नहीं है; अपनी परिस्थितियों को बदलने की क्षमता पैदा करना आवश्यक है। आज का मनुष्य बेरोजगारी, महंगाई, नौकरी की असुरक्षा, बढ़ती प्रतिस्पर्धा, शिक्षा की लागत, सामाजिक असमानता और भविष्य की अनिश्चितता से परेशान है। इन समस्याओं पर चिंता करना स्वाभाविक है, लेकिन चेर्निशेव्स्की के प्रश्न को आज के संदर्भ में पढ़ें तो उसका एक उत्तर यह निकलता है कि व्यक्ति को अपने जीवन में जहाँ तक संभव हो, निष्क्रियता से सक्रियता की ओर जाना होगा। "मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है?" से आगे बढ़कर "मैं अपनी स्थिति में अभी क्या बदल सकता हूँ?" पूछना होगा।
लेकिन यहाँ चेर्निशेव्स्की को आधुनिक समय में यांत्रिक रूप से लागू करना उचित नहीं होगा। उनके समाधान पर समाजवाद, सामूहिक श्रम, तर्कवादी नैतिकता और उस समय की रूसी सामाजिक परिस्थितियों की गहरी छाप थी। वे जिस प्रकार के सामाजिक पुनर्गठन की कल्पना कर रहे थे, उसे आज का लोकतांत्रिक, डिजिटल, वैश्विक और बाजार-आधारित समाज हूबहू स्वीकार नहीं कर सकता। उनके विचारों का ऐतिहासिक प्रभाव निर्विवाद रूप से महत्वपूर्ण था, लेकिन उनके प्रत्येक समाधान को आज के लिए अंतिम उत्तर मान लेना इतिहास को वर्तमान पर थोपना होगा। उनके विचारों को आज के लिए अधिक उपयोगी बनाने का तरीका शायद उनके सवाल को बचाए रखना है, हर उत्तर को नहीं।
आज "क्या करें?" का पहला सवाल व्यक्ति के सामने आर्थिक जीवन को लेकर खड़ा है। महंगाई और रोजगार की अनिश्चितता के दौर में केवल अधिक कमाने की इच्छा पर्याप्त नहीं है; वित्तीय अनुशासन, नए कौशल, बदलती तकनीक को समझना, बचत, वैकल्पिक आय और रोजगार की बदलती प्रकृति को समझना भी जरूरी है। जिस दौर में कृत्रिम बुद्धिमत्ता अनेक कामों की प्रकृति बदल रही है, वहाँ पुराने कौशल से हमेशा नई अर्थव्यवस्था में सुरक्षा नहीं मिल सकती। इसलिए आज का "क्या करें?" शायद यह कहता है—सीखना बंद मत कीजिए। डिग्री प्राप्त करना शिक्षा का अंत नहीं, बल्कि सीखते रहने की शुरुआत है।
दूसरा बड़ा प्रश्न काम और अर्थ का है। चेर्निशेव्स्की के यहाँ श्रम केवल पेट भरने का साधन नहीं है; वह स्वतंत्रता और सामाजिक उपयोगिता से भी जुड़ता है। आज काम करने वाले करोड़ों लोगों के लिए भी यही प्रश्न महत्वपूर्ण है—क्या काम केवल वेतन पाने का माध्यम है या उससे व्यक्ति को आत्मसम्मान, रचनात्मकता और सामाजिक उपयोगिता भी मिलनी चाहिए? आधुनिक अर्थव्यवस्था में हर व्यक्ति को अपने काम में आदर्श अर्थ मिल जाए, यह संभव नहीं; लेकिन काम को केवल प्रतिस्पर्धा और आय के पैमाने से देखना भी मनुष्य को भीतर से खाली कर सकता है। इसलिए "क्या करें?" का आधुनिक उत्तर हो सकता है—रोजगार कमाएँ, लेकिन अपने अस्तित्व को केवल रोजगार मत बनने दीजिए।
तीसरा प्रश्न स्त्री की स्वतंत्रता का है। चेर्निशेव्स्की ने अपने समय में स्त्री की पारिवारिक और सामाजिक पराधीनता के विरुद्ध स्वतंत्रता और आर्थिक आत्मनिर्भरता का प्रश्न उठाया था। आज स्त्रियाँ शिक्षा, रोजगार, राजनीति, विज्ञान, व्यवसाय और सार्वजनिक जीवन के अनेक क्षेत्रों में पहले की तुलना में कहीं अधिक उपस्थित हैं, लेकिन समान अवसर, वेतन, घरेलू जिम्मेदारियों के असमान वितरण, सुरक्षा और निर्णय लेने की स्वतंत्रता जैसे प्रश्न अभी भी अनेक समाजों में मौजूद हैं। इसलिए उपन्यास की स्त्री-मुक्ति की चिंता आज भी पढ़ी जा सकती है, लेकिन आधुनिक उत्तर अधिक व्यापक होगा—स्वतंत्रता केवल घर से बाहर निकलने की नहीं, बल्कि जीवन के फैसले स्वयं लेने की क्षमता है।
आज का सबसे बड़ा "क्या करें?" शायद अकेलेपन और सामाजिक विखंडन से संबंधित है। डिजिटल युग ने मनुष्य को हजारों लोगों से जोड़ दिया है, लेकिन वास्तविक संवाद कई बार कम कर दिया है। सोशल मीडिया पर संपर्क बहुत है, लेकिन भरोसेमंद संबंध कम हो सकते हैं। चेर्निशेव्स्की जिस सामूहिकता और सहयोग की कल्पना करते थे, उसे आज किसी एक राजनीतिक या आर्थिक सिद्धांत में खोजने की आवश्यकता नहीं। पड़ोस, परिवार, मित्रता, सहकारी संस्थाएँ, पेशेवर समुदाय, नागरिक संगठन और स्थानीय सामाजिक भागीदारी—ये सब आधुनिक सामूहिकता के रूप हो सकते हैं। शायद आज का उत्तर है—अकेले सफल होने की कोशिश मत कीजिए; दूसरों के साथ मिलकर उपयोगी बनने की कोशिश कीजिए।
यहाँ चेर्निशेव्स्की का एक और विचार उल्लेखनीय है—“रैशनल ईगोइज़्म”, जिसे मोटे तौर पर तर्कसंगत स्वार्थ या विवेकपूर्ण आत्महित कहा जा सकता है। उनके चिंतन में व्यक्ति अपने हित को समझते हुए ऐसा आचरण करे जिसमें दूसरों का हित भी उससे जुड़ा हो। आज इसे एक सरल भाषा में ऐसे समझा जा सकता है कि व्यक्ति को अपने हित की चिंता करनी चाहिए, लेकिन ऐसा हित जो समाज को नष्ट करके हासिल न किया जाए। व्यवसाय में लाभ जरूरी है, लेकिन धोखा देकर लाभ कमाना सामाजिक विश्वास को कमजोर करता है; व्यक्तिगत सफलता जरूरी है, लेकिन दूसरों की कीमत पर सफलता अंततः सामाजिक तनाव पैदा कर सकती है।
आज के "क्या करें?" का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सूचना के युग में विवेक भी है। चेर्निशेव्स्की के समय में सूचना के स्रोत सीमित थे; आज सूचना की कमी नहीं, बल्कि उसकी अधिकता समस्या है। समाचार, सोशल मीडिया, वीडियो, कृत्रिम बुद्धिमत्ता से निर्मित सामग्री और असंख्य राय हमारे सामने लगातार आती रहती हैं। ऐसे समय में हर बात पर प्रतिक्रिया देना बुद्धिमत्ता नहीं है। तथ्य और राय में अंतर करना, स्रोत की विश्वसनीयता देखना, बिना जाँचे सूचना आगे न बढ़ाना और अपनी मानसिक शांति की रक्षा करना भी आधुनिक नागरिकता का हिस्सा है। आज "क्या करें?" का उत्तर इसलिए शायद यह भी है—हर बात पर विश्वास मत कीजिए और हर बात पर प्रतिक्रिया भी मत दीजिए।
और फिर आता है वह प्रश्न जो चेर्निशेव्स्की के समय से कहीं अधिक जटिल रूप में आज हमारे सामने है—व्यक्ति और व्यवस्था के संबंध का प्रश्न। यदि बेरोजगारी व्यापक है, शिक्षा महँगी है, स्वास्थ्य सेवाएँ असमान हैं या आर्थिक अवसर कुछ वर्गों तक सीमित हैं, तो हर समस्या का उत्तर व्यक्ति को "और मेहनत करो" कहकर नहीं दिया जा सकता। कुछ समस्याएँ व्यक्तिगत होती हैं और कुछ संरचनात्मक। व्यक्तिगत अनुशासन आवश्यक है, लेकिन सामाजिक संस्थाओं, नीतियों और सार्वजनिक व्यवस्था की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। इसलिए आधुनिक "क्या करें?" में दो स्तर होने चाहिए—व्यक्ति क्या कर सकता है और समाज/संस्थाएँ क्या बदल सकती हैं।
चेर्निशेव्स्की के उपन्यास का ऐतिहासिक प्रभाव भी हमें सावधान करता है। यह पुस्तक रूसी क्रांतिकारी बुद्धिजीवियों के लिए प्रेरणादायक बनी और बाद की राजनीतिक विचारधाराओं पर उसका प्रभाव पड़ा। लेनिन ने 1902 में अपने प्रसिद्ध राजनीतिक पुस्तिका का शीर्षक भी “What Is to Be Done?” रखा और यह शीर्षक चेर्निशेव्स्की के उपन्यास से लिया गया था। इससे यह समझना जरूरी है कि किसी साहित्यिक कृति का प्रभाव उसके लेखक की मूल कल्पना से आगे जाकर इतिहास में नए अर्थ ग्रहण कर सकता है।
लेकिन आज, शायद इस शीर्षक को फिर से पढ़ने का सबसे उपयोगी तरीका किसी क्रांति का आह्वान करना नहीं, बल्कि जिम्मेदार कार्रवाई का दर्शन विकसित करना है। "क्या करें?" का अर्थ यह नहीं कि हर समस्या के लिए तुरंत कोई बड़ा और निर्णायक उत्तर हमारे पास होना चाहिए। कई बार उत्तर बहुत छोटा होता है—आज एक नया कौशल सीखना, एक गलत आदत छोड़ना, किसी जरूरतमंद की मदद करना, परिवार से बात करना, अपनी आर्थिक स्थिति का वास्तविक हिसाब बनाना, गलत सूचना को आगे न बढ़ाना, किसी अन्याय के विरुद्ध वैधानिक और शांतिपूर्ण तरीके से आवाज उठाना, या अपने भीतर के भय को पहचानना।
शायद 1863 के चेर्निशेव्स्की से 2026 के मनुष्य तक आते-आते "क्या करें?" का सबसे बड़ा परिवर्तन यही है कि आज हमें एक ही उत्तर नहीं, बल्कि प्रश्न पूछने की क्षमता चाहिए। हर युग अपनी समस्याएँ लेकर आता है और हर पीढ़ी को अपने उत्तर स्वयं गढ़ने पड़ते हैं। चेर्निशेव्स्की ने अपने समय में पूछा था कि पुराने समाज के भीतर नया जीवन कैसे संभव है। आज हमें पूछना है कि तकनीक, पूँजी, प्रतिस्पर्धा, पर्यावरणीय संकट, बेरोजगारी, सामाजिक तनाव, अकेलेपन और सूचना-अराजकता के बीच मनुष्य को मनुष्य बनाए कैसे रखा जाए।
इस अर्थ में “क्या करें?” आज भी एक पुराना प्रश्न नहीं, बल्कि एक जीवित प्रश्न है। उसका आधुनिक उत्तर किसी एक किताब, विचारधारा, नेता या व्यवस्था के पास नहीं है। उत्तर शायद कई छोटे-छोटे उत्तरों का योग है—सोचें, लेकिन केवल सोचते न रहें; प्रश्न करें, लेकिन केवल प्रश्न करते न रहें; सीखें, मिलकर काम करें, अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करें, दूसरों की स्वतंत्रता का सम्मान करें और जहाँ परिवर्तन संभव हो वहाँ पहला कदम स्वयं उठाएँ। चेर्निशेव्स्की के प्रश्न की आज की सबसे बड़ी प्रासंगिकता शायद यही है कि वह हमें परिस्थितियों का केवल वर्णन करने के बजाय उनसे संवाद करने और पूछने के लिए मजबूर करता है—**“ठीक है, समस्याएँ बहुत हैं; लेकिन अब हम क्या करने वाले हैं?”**

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