रविवार, 27 सितंबर 2026

निठल्ले के नोट्स - तकिया कमाल का

तकिया शब्द की कहानी केवल सोने के लिए सिर के नीचे रखी जाने वाली मुलायम चीज़ की कहानी नहीं है। यह उन शब्दों में है जिन्होंने अपने भौतिक अर्थ से निकलकर भाषा में एक सुंदर रूपक भी बना लिया। मज़ेदार बात यह है कि जिस चीज़ पर सिर टिकाकर आदमी आराम करता है, उसी से बना ‘तकिया-कलाम’ वह शब्द या वाक्यांश है जिस पर बोलने वाला अपनी बातचीत को बार-बार टिकाता है। शब्दकोशों में ‘तकिया’ का मूल फ़ारसी बताया गया है और इसके अर्थों में तकिया, सहारा, टेक, आश्रय और विश्राम-स्थान जैसे अर्थ मिलते हैं। रेख़्ता भी फ़ारसी تکیہ (takya) के अर्थ में pillow, bolster, cushion के साथ-साथ किसी ऐसी चीज़ को दर्ज करता है जिस पर कोई झुके या भरोसा करे।

तकिया से कैसे बना तकिया-कलाम!

तकिया—नाम लेते ही मन में सबसे पहले एक मुलायम-सी चीज़ उभरती है, जिस पर सिर रखते ही दिनभर की थकान मानो धीरे-धीरे अपना सामान समेटने लगती है। बिस्तर हो, चारपाई हो, दीवान हो या आरामकुर्सी—तकिया वहाँ मौजूद हो तो आराम की संभावना कुछ बढ़ जाती है। लेकिन तकिए की असली दिलचस्पी केवल उसकी रूई, कपास, फोम या किसी दूसरे भराव में नहीं, उसके नाम और अर्थ की यात्रा में है। हिंदी में प्रचलित ‘तकिया’ फ़ारसी मूल का शब्द माना जाता है। फ़ारसी تکیہ (takya) से आया यह शब्द उर्दू और हिंदी में इतना घुल-मिल गया कि आज यह किसी विदेशी आगंतुक की तरह नहीं, घर के पुराने सदस्य की तरह लगता है।

शब्द की दुनिया में तकिया केवल सिर रखने की वस्तु नहीं रहा। उसका एक मूल भाव है—सहारा। सिर को सहारा देने वाला तकिया, शरीर को टिकाने वाला तकिया, थके आदमी को आराम देने वाला तकिया और फिर रूपक में किसी चीज़ पर निर्भर रहने का भाव—इन सबमें ‘टेक’ और ‘सहारे’ का एक साझा सूत्र दिखाई देता है। पुराने शब्दकोशों में ‘तकिया’ के अर्थ में pillow, bolster और cushion के अलावा reliance, support, prop यानी भरोसा, सहारा और आधार जैसे अर्थ भी मिलते हैं। यही अर्थ-विस्तार आगे चलकर भाषा में अनेक मुहावरों और यौगिक प्रयोगों का रास्ता खोलता है।

यहाँ एक भाषाई सावधानी भी जरूरी है। ‘तकिया’ और ‘तक़िय्या’ एक ही शब्द नहीं हैं। उर्दू-फ़ारसी परंपरा में एक ओर تکیہ—takya है, जिसका अर्थ तकिया, सहारा या आश्रय है; दूसरी ओर अरबी मूल का تقیہ—taqiyya है, जिसका संबंध परहेज़, सावधानी या भयवश अपने धार्मिक विश्वास को छिपाने जैसे अर्थों से है। दोनों की वर्तनी और अर्थ-परंपरा अलग हैं। इसी तरह ‘ताक़िया’ भी अलग शब्द है, जिसका अर्थ एक प्रकार की टोपी है। इसलिए ‘तकिया’ को ‘तक़िय्या’ से जोड़ देना भाषाई रूप से ठीक नहीं होगा।

तकिए के भी अपने कई रूप हैं। सबसे परिचित है सिरहाने का तकिया, जिसे सोते समय सिर के नीचे रखा जाता है। इसे अलग-अलग आकारों और भराव के अनुसार बनाया जाता है। कुछ तकिए लंबे और बेलनाकार होते हैं, जिन्हें हिंदी-उर्दू में गोल तकिया या बोल्स्टर कहा जाता है। कुछ छोटे, चौकोर या आयताकार तकिए केवल सिर के लिए नहीं बल्कि पीठ, कमर, गर्दन या हाथ को सहारा देने के लिए इस्तेमाल होते हैं। सजावटी तकिए—जिन्हें आजकल कुशन भी कहा जाता है—बिस्तर, सोफे और दीवान की शोभा बढ़ाते हैं। इस प्रकार तकिया धीरे-धीरे केवल नींद की वस्तु न रहकर आराम, बैठने और सजावट—तीनों का साथी बन गया है।

तकिए का एक पुराना सामाजिक-सांस्कृतिक अर्थ भी है। शब्दकोशों में ‘तकिया’ का अर्थ विश्राम या आश्रय का स्थान भी मिलता है। पुराने भारत की मिश्रित फ़ारसी-उर्दू सांस्कृतिक परंपरा में ‘तकिया’ शब्द ऐसे स्थान के अर्थ में भी प्रयुक्त हुआ जहाँ फ़कीर या दरवेश ठहरते थे। रेख़्ता के शब्दकोश में भी ‘takya’ के साथ फ़कीर के निवास या ठहरने के स्थान का अर्थ दर्ज है। इस अर्थ में तकिया केवल सिर टिकाने की जगह नहीं, बल्कि जीवन की भाग-दौड़ से हटकर कुछ देर ठहरने का स्थान भी हो गया।

लेकिन तकिए की भाषाई यात्रा का सबसे दिलचस्प पड़ाव है—‘तकिया-कलाम’। यहाँ तकिया अचानक बिस्तर से उठकर ज़बान पर आ बैठता है। ‘कलाम’ अरबी मूल का शब्द है, जिसका अर्थ बात, कथन, वचन, बातचीत या उक्ति है। ‘तकिया-ए-कलाम’ का शाब्दिक भाव हुआ—बात का सहारा। अर्थात ऐसा शब्द, पद या वाक्यांश जिस पर बोलते-बोलते आदमी बार-बार टिक जाता है। रेख़्ता इसे बातचीत में आदतन बार-बार जोड़े जाने वाले शब्द या वाक्यांश के अर्थ में दर्ज करता है, जबकि हिन्दवी भी इसे बातचीत में बार-बार निकलने वाला अभ्यस्त शब्द या पद बताता है।

सोचिए, कोई व्यक्ति हर तीसरे वाक्य के बाद कहता है—‘जो है कि...’, कोई ‘क्या नाम है...’ कहकर अपनी बात आगे बढ़ाता है, कोई ‘मतलब...’ को इतना दोहराता है कि वह अर्थ बताने के बजाय विराम-चिह्न जैसा काम करने लगता है और कोई हर बात के अंत में ‘समझे?’ जोड़ देता है। ये शब्द अपने आप में गलत नहीं हैं; वे तब तकिया-कलाम बनते हैं जब बोलने वाले की ज़बान उन्हें आदतन बार-बार इस्तेमाल करने लगे। हिन्दवी और रेख़्ता दोनों में इसी तरह के प्रयोगों को तकिया-कलाम कहा गया है।

इसलिए तकिया-कलाम को केवल ‘गलत भाषा’ समझना भी उचित नहीं। बातचीत में कई बार ऐसे शब्द सोचने के लिए क्षण भर का समय देते हैं। बोलने वाला अगले वाक्य को मन में व्यवस्थित करता है और उसकी ज़बान तब तक ‘मतलब...’, ‘देखिए...’, ‘क्या है कि...’ जैसे शब्दों पर टिक जाती है। यानी जिस तरह शरीर को सहारा देने के लिए तकिया होता है, उसी तरह बोलते समय विचारों के बीच एक छोटा-सा भाषाई सहारा मिल जाता है। फर्क इतना है कि सिर के नीचे रखा तकिया हमें सोने में मदद करता है और तकिया-कलाम कभी-कभी सामने वाले को सोचने पर मजबूर कर देता है कि वक्ता आखिर असली बात कब शुरू करेगा!

तकिया-कलाम की दुनिया भी बड़ी रोचक है। किसी का तकिया-कलाम ‘देखिए’ हो सकता है, किसी का ‘दरअसल’, किसी का ‘मतलब’, किसी का ‘यानी’, किसी का ‘क्या है कि’, तो किसी का ‘समझ रहे हैं न?’। कुछ लोग बातचीत में अंग्रेज़ी के ‘यू नो’, ‘एक्चुअली’, ‘बेसिकली’ या ‘राइट’ जैसे शब्दों का इतना इस्तेमाल करते हैं कि वे उनके भाषाई तकिए बन जाते हैं। हालांकि हर बार दोहराया गया शब्द तकिया-कलाम नहीं होता; संदर्भ के लिए उसका स्वाभाविक या व्याकरणिक प्रयोग अलग बात है। तकिया-कलाम में मुख्य बात है—आदतन और बार-बार लौटना।

इससे एक दिलचस्प भाषाई सत्य सामने आता है कि मनुष्य केवल अपने विचारों से नहीं बोलता, अपनी आदतों से भी बोलता है। उसकी शब्दावली उसके व्यक्तित्व की एक छोटी-सी छाया बन जाती है। हम अक्सर दूसरों के तकिया-कलाम को उनसे पहले पहचान लेते हैं। मित्र कुछ कहे नहीं कि हमें पता रहता है कि अगला शब्द क्या आने वाला है। कभी यह आदत प्यारी लगती है, कभी हास्यास्पद, कभी खीज पैदा करती है और कभी व्यक्ति की पहचान ही बन जाती है। साहित्य और व्यंग्य में भी किसी पात्र की ऐसी भाषाई आदत उसके चरित्र-चित्रण का प्रभावी साधन बन सकती है।

‘सुख़न-तकिया’ भी इसी भाषाई परिवार का एक सुंदर प्रयोग है। ‘सुख़न’ का संबंध बात या कथन से है और ‘सुख़न-तकिया’ उस शब्द या वाक्यांश को कहा गया है जो किसी की ज़बान पर चढ़ जाए और बातचीत में बार-बार निकलता रहे। हिन्दवी इसे सीधे ‘तकिया-ए-कलाम’ के अर्थ में दर्ज करता है।

तकिए का एक और अर्थ-विस्तार हमें भाषा की रचनात्मक शक्ति समझाता है। जब कोई कहता है—‘फलाँ व्यक्ति इसी विचार पर तकिया किए बैठा है’—तो यहाँ सिर रखने वाला तकिया नहीं, बल्कि किसी विचार, व्यक्ति या आधार पर निर्भरता का भाव सक्रिय हो जाता है। पुराने फ़ारसी-उर्दू प्रयोगों में ‘तकिया करना’ का अर्थ किसी पर निर्भर या भरोसा करना तथा ‘तकिया लगाना’ का अर्थ किसी पर टिकना या सहारा लेना भी मिलता है।

इस तरह एक साधारण-सी घरेलू वस्तु ने भाषा में पूरा परिवार बना लिया—तकिया, तकिया लगाना, तकिया करना, तकिया-नशीन, तकिया-दार, सुख़न-तकिया और सबसे लोकप्रिय तकिया-कलाम। शब्द ने पहले शरीर को सहारा दिया, फिर मन को आश्रय दिया और अंततः ज़बान को भी एक टेक दे दी।

और शायद यही तकिए की सबसे बड़ी खूबी है। आदमी बिस्तर पर लेटता है तो तकिया सिर के नीचे होता है; किसी थके हुए को सहारा चाहिए तो तकिया पीठ के पीछे होता है; किसी पुराने सांस्कृतिक संदर्भ में वह आश्रय-स्थान बन जाता है; और बातचीत में वही तकिया शब्दों के बीच आ जाता है। सिर जहाँ टिकता है, वहाँ तकिया; और बात जहाँ बार-बार टिकती है, वहाँ तकिया-कलाम। भाषा ने वस्तु से रूपक बनाया और रूपक से मुहावरा। यही तो किसी जीवित भाषा की असली खूबसूरती है—वह घर की चीज़ों को भी उठाकर अपने शब्दकोश में बसा लेती है।

इसलिए अगली बार जब कोई बातचीत में बार-बार ‘मतलब...’, ‘देखिए...’, ‘जो है कि...’ या ‘समझे?’ कहे, तो उसे तुरंत टोकने के बजाय एक क्षण के लिए उसके भाषाई तकिए को पहचानिए। हो सकता है वह व्यक्ति विचारों की लंबी यात्रा कर रहा हो और उसकी ज़बान ने रास्ते में एक छोटा-सा तकिया रख लिया हो। बस ध्यान इतना रहे कि तकिया सहारा बने तो अच्छा है, लेकिन अगर बात पूरी तरह उसी पर सिर रखकर सो जाए तो बातचीत खर्राटे लेने लगती है!

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