रविवार, 20 सितंबर 2026

निठल्ले के नोट्स - गंज डुंडवारा की कहानी

गंज डुंडवारा—नाम सुनते ही जैसे रेडियो के पुराने दिनों की कोई धुन कानों में उतर आती है। खासकर वे लोग जिन्होंने आकाशवाणी और विविध भारती के फरमाइशी फिल्मी गीत सुने हैं, उनके लिए यह नाम किसी नक्शे पर दर्ज एक छोटे शहर से कहीं अधिक है। आज गंज डुंडवारा उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले का एक कस्बा है। 2011 की जनगणना के अनुसार यहां की आबादी लगभग 45 हजार थी और यह रेलमार्ग से भी जुड़ा हुआ है। लेकिन रेडियो की दुनिया में इसकी पहचान किसी सरकारी सूची, किसी बड़े प्रसारण केंद्र या फिल्मी सितारे की वजह से नहीं, बल्कि फरमाइशी गीतों के श्रोताओं की वजह से बनी।

विविध भारती की सबसे बड़ी खूबी ही यही थी कि वह केवल गीत नहीं बजाता था, गीत को श्रोता के जीवन से जोड़ देता था। 1957 में शुरू हुई विविध भारती ने फिल्म संगीत, बातचीत, नाटक और मनोरंजन के अनेक रूपों को एक साथ लेकर देश के करोड़ों लोगों तक पहुंच बनाई। आज भी प्रसार भारती उसे आकाशवाणी का प्रमुख मनोरंजन नेटवर्क बताता है और ‘जयमाला’, ‘हवा महल’, ‘संगीत सरिता’, ‘भूले-बिसरे गीत’, ‘चित्रलोक’, ‘छायागीत’ जैसे कार्यक्रमों को उसकी विरासत का हिस्सा गिनाता है।

और फिर आता था वह जादुई क्षण—फरमाइश! श्रोता चिट्ठी लिखता था। चिट्ठी में अपना नाम, पता, कभी-कभी अपनी कहानी और अंत में किसी प्रिय गीत की फरमाइश। रेडियो पर उद्घोषक जब बोलता—“यह गीत फरमाया है गंज डुंडवारा से...” तो दूर-दराज बैठे श्रोता के कान अचानक चौकन्ने हो जाते। गंज डुंडवारा कोई महानगर नहीं था, लेकिन रेडियो की आवाज में उसका नाम किसी बड़े शहर से कम महत्वपूर्ण नहीं लगता था। उपलब्ध पुराने रेडियो अभिलेख-सदृश स्रोतों में भी गंजडुंडवारा के श्रोताओं की फिल्मी गीतों की फरमाइशें मिलती हैं। एक पुराने संकलन में तो “खोया मंडी गंजडुंडवारा” से कई श्रोताओं द्वारा फिल्म शागिर्द का गीत फरमाए जाने का उल्लेख मिलता है।

यहीं से गंज डुंडवारा का रेडियो-रोमांस शुरू होता है। सोचिए, उस समय न मोबाइल था, न व्हाट्सऐप, न फेसबुक, न इंस्टाग्राम। किसी को अपना पसंदीदा गीत सुनवाना है तो कागज उठाइए, स्याही लगाइए, चिट्ठी लिखिए, पोस्टकार्ड पर पता लिखिए और डाकखाने की ओर निकल जाइए। फिर इंतजार कीजिए—पता नहीं चिट्ठी पहुंचेगी भी या नहीं, पहुंचेगी तो पढ़ी जाएगी या नहीं, पढ़ी जाएगी तो फरमाइश स्वीकार होगी या नहीं और स्वीकार हुई तो किस दिन रेडियो पर अपना नाम सुनाई देगा! आज के ‘सेंड’ बटन की तुलना में वह इंतजार प्रेम-पत्र के इंतजार जैसा था।

फरमाइशी गीतों के कार्यक्रमों में इसीलिए केवल संगीत नहीं होता था, भूगोल भी होता था। “दिल्ली से फरमाइश”, “लखनऊ से फरमाइश”, “इलाहाबाद से फरमाइश”, “कानपुर से फरमाइश”—और इनके बीच अचानक कोई उद्घोषक कह देता, “गंज डुंडवारा से...”। रेडियो सुन रहे आदमी को लगता जैसे उसके अपने आसपास का कोई आदमी बोल उठा हो। कस्बे का नाम राष्ट्रीय तरंगों पर सुनाई देना अपने आप में एक छोटी-सी सामाजिक प्रतिष्ठा थी। रेडियो ने भारत के नक्शे पर केवल शहरों को नहीं जोड़ा, उसने श्रोताओं की भावनाओं को एक-दूसरे से जोड़ा।

गंज डुंडवारा की दिलचस्पी का एक पहलू यह भी है कि यह कोई महानगर या प्रसिद्ध सांस्कृतिक राजधानी नहीं था। यह कासगंज जिले का एक सामान्य कस्बा है, जिसकी अपनी स्थानीय अर्थव्यवस्था, बाजार, रेलवे और सामाजिक जीवन है। सरकारी और अन्य अभिलेखों में यह उत्तर प्रदेश के एटा-कासगंज क्षेत्र से जुड़े कस्बों में दिखाई देता है। लेकिन रेडियो ने इसकी एक दूसरी पहचान बना दी—“वह जगह जहां से फरमाइश आती है।”

और शायद यही रेडियो की असली ताकत थी। टेलीविजन ने हमें चेहरे दिखाए, इंटरनेट ने हमें दुनिया दिखाई, लेकिन रेडियो ने हमें कल्पना करने की आजादी दी। जब उद्घोषक कहता था—“गंज डुंडवारा से अब्दुल सत्तर अंसारी, एम. कलीम ज़ख्मी, वी.पी. गौतम और मुनव्वर लल्ला की फरमाइश पर...” तो श्रोता इन लोगों को देख नहीं सकता था, लेकिन कल्पना कर सकता था—शायद कोई दुकान पर बैठा होगा, कोई खेत से लौटा होगा, कोई चाय की दुकान पर रेडियो लगाए होगा और कोई अपने कमरे में अकेला उस गीत का इंतजार कर रहा होगा। एक गीत और एक छोटे-से कस्बे के बीच रेडियो ने कितनी बड़ी भावनात्मक दूरी मिटा दी थी!

गंज डुंडवारा की कहानी असल में गंज डुंडवारा की कहानी कम और उस भारत की कहानी ज्यादा है, जो रेडियो सुनता था। वह भारत जिसमें रेडियो घर का सदस्य था। सुबह समाचार, दोपहर में गीत, शाम को फरमाइश और रात में धीमी आवाज में बजता कोई पुराना नगमा—रेडियो घर की दीवारों से टकराकर परिवार का हिस्सा बन जाता था। विविध भारती ने फिल्मी गीतों को केवल मनोरंजन नहीं रहने दिया; उसने उन्हें स्मृति, प्रेम, दोस्ती, इंतजार और पहचान का माध्यम बना दिया। संसद के एक पुराने दस्तावेज में भी आकाशवाणी द्वारा फिल्मी संगीत और विविध भारती जैसे कार्यक्रमों को जनता की पसंद से जोड़े जाने का उल्लेख मिलता है।

इसलिए आज जब कोई पुराने रेडियो दिनों को याद करते हुए कहता है—“गंज डुंडवारा से फरमाइश आई है...” तो यह केवल एक पते का उच्चारण नहीं है। इसमें एक पूरा युग छिपा है—डाकिए का इंतजार, पोस्टकार्ड की स्याही, ट्रांजिस्टर की खरखराहट, उद्घोषक की आवाज, गीत की पहली पंक्ति और उस क्षण की खुशी जब हजारों-लाखों श्रोताओं के बीच किसी छोटे कस्बे के किसी साधारण आदमी का नाम अचानक राष्ट्रीय तरंगों पर सुनाई देता था।

गंज डुंडवारा इसलिए रेडियो के इतिहास में कोई बड़ा प्रसारण केंद्र होकर याद नहीं आता; वह श्रोता होकर याद आता है। और शायद यही उसकी सबसे खूबसूरत पहचान है। बड़े शहर रेडियो को कार्यक्रम देते थे, लेकिन छोटे शहर और कस्बे रेडियो को दिल देते थे। गंज डुंडवारा उन्हीं धड़कते हुए दिलों में से एक था—जहां से कभी कोई चिट्ठी चली होगी, किसी ने अपना पसंदीदा गीत लिखकर भेजा होगा और कई दिनों बाद किसी शाम रेडियो से आवाज आई होगी—“अब सुनिए, गंज डुंडवारा से फरमाइश पर...” फिर गीत बजा होगा और उस छोटे-से कस्बे को लगा होगा कि पूरी दुनिया ने कुछ क्षण के लिए उसका नाम सुन लिया है।

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