जिएँ तो जिएँ कैसे — आखिर जीने का मतलब क्या है?
जीवन मनुष्य को मिला हुआ सबसे बड़ा अवसर है और शायद सबसे बड़ी पहेली भी। जन्म के समय कोई यह नहीं पूछता कि तुम जीना चाहते हो या नहीं, किस तरह जीना चाहते हो या तुम्हारे लिए जीवन का अर्थ क्या होगा। हम इस दुनिया में आते हैं और धीरे-धीरे हमें जीने का तरीका सिखाया जाता है—बोलना, चलना, पढ़ना, कमाना, आगे बढ़ना, सफल होना, परिवार बनाना, प्रतिष्ठा अर्जित करना। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में एक मूल प्रश्न कहीं पीछे छूट जाता है—आखिर जिएँ तो जिएँ कैसे? हम जीवन की तकनीक तो सीख लेते हैं, लेकिन जीवन का अर्थ सीखना भूल जाते हैं।
फिल्मी गीतों और संवादों की कुछ पंक्तियाँ कई बार दर्शन की मोटी-मोटी किताबों से अधिक गहराई से जीवन की उलझन को पकड़ लेती हैं। एक तरफ आवाज आती है—“जीना इसी का नाम है”। इसमें जीवन को स्वीकार करने की सहजता है। जैसे कहा जा रहा हो कि जीवन अपनी तमाम कठिनाइयों, अधूरेपन, संघर्षों और अप्रत्याशित मोड़ों के बावजूद इसी का नाम है; इसे जैसा मिला है, उसमें भी आनंद खोजो, संबंधों को जियो, छोटी-छोटी खुशियों को पहचानो और हर दिन को जीवन का हिस्सा समझो। दूसरी तरफ अमिताभ बच्चन का व्यंग्यपूर्ण सवाल है—“ये जीना भी कोई जीना है, लल्लू?” यहाँ जीवन की उस अवस्था पर प्रश्नचिह्न है जिसमें आदमी सांस तो ले रहा है, काम भी कर रहा है, पैसा भी कमा रहा है, लेकिन भीतर से जीवन अनुपस्थित है। और फिर तीसरी पंक्ति आती है—“जिएँ तो जिएँ कैसे?” यह शायद इन दोनों के बीच खड़ा सबसे मानवीय सवाल है। क्योंकि जीवन को स्वीकार कर लेना पर्याप्त नहीं, और जीवन से असंतुष्ट हो जाना भी समाधान नहीं। असली चुनौती है—इन दोनों के बीच अपने जीने का रास्ता तलाशना।
हम अक्सर जीवन को जीने के बजाय उसे व्यवस्थित करने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि जीना ही भूल जाते हैं। सुबह उठना, तैयार होना, काम पर जाना, पैसे कमाना, बिल चुकाना, बच्चों की फीस देना, घर चलाना, भविष्य के लिए बचत करना, पदोन्नति की चिंता करना, दूसरों से आगे निकलने की कोशिश करना और फिर थककर सो जाना—यह सब जीवन का हिस्सा है, लेकिन क्या यही पूरा जीवन है? अगर जीवन केवल जिम्मेदारियों की सूची है तो फिर एक मशीन और मनुष्य में मूल अंतर क्या बचता है? मशीन भी निर्देशों के अनुसार काम करती है, लेकिन मनुष्य के पास अनुभव करने की क्षमता है, प्रेम करने की क्षमता है, असहमति व्यक्त करने की क्षमता है, किसी कविता पर ठहर जाने की क्षमता है, बारिश में भीगने का मन है, किसी पुराने दोस्त को अचानक याद कर लेने की बेचैनी है। शायद जीवन का अर्थ इसी अतिरिक्त मानवीय हिस्से में छिपा है।
“ये जीना भी कोई जीना है, लल्लू” इसलिए केवल हास्यपूर्ण संवाद नहीं रह जाता। यह हमारे आधुनिक जीवन का आईना बन सकता है। वह जीवन जिसमें व्यक्ति के पास मोबाइल है लेकिन बातचीत नहीं, घर है लेकिन अपनापन नहीं, संपर्कों की लंबी सूची है लेकिन कोई ऐसा व्यक्ति नहीं जिससे वह अपने मन की बात कह सके, बैंक बैलेंस है लेकिन समय नहीं, छुट्टी है लेकिन चैन नहीं और मनोरंजन के हजार साधन हैं लेकिन मन बहलता नहीं। आदमी भविष्य को सुरक्षित करने की इतनी चिंता करता है कि वर्तमान असुरक्षित हो जाता है। वह रिटायरमेंट के लिए बचत करता रहता है, लेकिन यह भूल जाता है कि जीवन की कुछ चीजों की कोई ‘रिटायरमेंट डेट’ नहीं होती। बचपन दोबारा नहीं आता, बच्चों का बचपन दोबारा नहीं आता, युवावस्था वापस नहीं आती और किसी प्रिय व्यक्ति के साथ बिताया हुआ एक खास क्षण फिर उसी रूप में नहीं लौटता।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि जिम्मेदारियों को छोड़कर केवल आनंद के पीछे भागना ही जीवन है। “जीना इसी का नाम है” का वास्तविक अर्थ शायद यही है कि जीवन को उसकी संपूर्णता में स्वीकार किया जाए। जीवन में सुख है तो दुख भी है, उपलब्धि है तो असफलता भी, प्रेम है तो बिछड़ना भी, उम्मीद है तो निराशा भी। केवल सुख को जीवन मानना उतना ही अधूरा है जितना केवल दुख को जीवन मान लेना। जीवन किसी एक रंग का चित्र नहीं है। उसमें उजाला भी है और अंधेरा भी। कई बार रास्ता साफ दिखाई देता है और कई बार आदमी को धुंध में चलते हुए दिशा तलाशनी पड़ती है। इसलिए जीने की पहली शर्त शायद यह है कि हम जीवन से यह उम्मीद करना बंद करें कि वह हमेशा हमारी इच्छा के अनुसार चलेगा।
फिर सवाल आता है कि अगर जीवन हमेशा हमारी इच्छा के अनुसार नहीं चलता तो “जिएँ तो जिएँ कैसे?” इसका पहला उत्तर है—अपने जीवन को दूसरों की जिंदगी की नकल बनाकर नहीं। आधुनिक समाज ने तुलना को जीवन का स्थायी भाव बना दिया है। पड़ोसी के पास क्या है, मित्र कितना कमाता है, सहकर्मी किस पद पर पहुंच गया, किसके बच्चे विदेश चले गए, किसने कितना बड़ा घर खरीद लिया, किसकी गाड़ी कितनी महंगी है—इन सवालों ने हमारी खुशी का पैमाना बदल दिया है। सोशल मीडिया ने इस तुलना को और तीखा कर दिया है। वहां दूसरे लोगों का जीवन अक्सर चमकता हुआ दिखाई देता है और अपना जीवन साधारण। लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि हम दूसरे के जीवन का ‘प्रदर्शित हिस्सा’ अपने जीवन के ‘पूरा सच’ से तुलना कर रहे होते हैं। यह तुलना अंततः मनुष्य को अपने ही जीवन से असंतुष्ट कर देती है।
शायद जीने का अर्थ यह समझना भी है कि सफलता और सार्थकता एक ही चीज नहीं हैं। सफलता बाहर से दिखाई देती है; सार्थकता भीतर महसूस होती है। किसी व्यक्ति के पास बहुत पैसा हो सकता है लेकिन उसके पास समय न हो। कोई बहुत प्रसिद्ध हो सकता है लेकिन भीतर अकेला हो। कोई साधारण नौकरी कर सकता है लेकिन अपने परिवार, मित्रों और समाज के लिए अत्यंत उपयोगी हो सकता है। इसलिए जीवन का मूल्य केवल इस बात से तय नहीं होता कि हमने कितना पाया, बल्कि इससे भी तय होता है कि हमने जो पाया उसका किया क्या, किन लोगों के जीवन को छुआ और अपने भीतर कितनी मनुष्यता बचाए रखी।
जीने का एक महत्वपूर्ण अर्थ है अपने लिए भी जीना। यह स्वार्थ नहीं है। मनुष्य यदि हर समय दूसरों की अपेक्षाओं को पूरा करने में लगा रहे तो एक दिन उसे यह पता चल सकता है कि उसने पूरी जिंदगी दूसरों के हिसाब से जी, लेकिन अपने हिसाब से एक दिन भी नहीं। समाज हमें लगातार भूमिकाएँ देता है—अच्छा बेटा बनो, अच्छा पति बनो, अच्छा पिता बनो, अच्छा कर्मचारी बनो, अच्छा नागरिक बनो। ये भूमिकाएँ जरूरी हैं, लेकिन इनके बीच ‘मैं कौन हूँ?’ यह सवाल भी जरूरी है। अपनी रुचियों के लिए समय निकालना, किताब पढ़ना, संगीत सुनना, यात्रा करना, लिखना, किसी पुराने शौक को फिर से अपनाना या कुछ देर बिल्कुल अकेले बैठना—ये जीवन की गैरजरूरी विलासिताएँ नहीं, बल्कि मनुष्य होने की जरूरतें भी हो सकती हैं।
इसी के साथ दूसरों के लिए जीना भी जीवन को अर्थ देता है। मनुष्य अकेले अपने सुख से लंबे समय तक संतुष्ट नहीं रह सकता। किसी की मदद करना, किसी को अवसर देना, किसी दुखी व्यक्ति की बात सुन लेना, अपने ज्ञान को किसी दूसरे तक पहुंचाना या अपने काम को ईमानदारी से करना—ये छोटे दिखाई देने वाले कर्म जीवन को भीतर से बड़ा बना देते हैं। जीवन की सार्थकता हमेशा किसी महान उपलब्धि में नहीं छिपी होती। कई बार किसी के जीवन में हमारे कारण आया छोटा-सा सकारात्मक बदलाव ही हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि होता है।
फिर एक और प्रश्न है—क्या जीने का अर्थ हमेशा खुश रहना है? शायद नहीं। खुशी जीवन का लक्ष्य हो सकती है, लेकिन जीवन का पर्याय नहीं। दुख से बचने की लगातार कोशिश कई बार दुख को और बड़ा बना देती है। जीवन में कुछ पीड़ाएँ ऐसी होती हैं जिन्हें समाप्त नहीं किया जा सकता, केवल समझा और स्वीकार किया जा सकता है। असफलता, बिछड़ना, उम्र का बढ़ना, प्रियजनों का जाना—इनसे कोई पूरी तरह बच नहीं सकता। इसलिए परिपक्व जीवन वह नहीं जिसमें दुख न हो, बल्कि वह है जिसमें दुख के बावजूद जीने की क्षमता बनी रहे।
और शायद यहीं “जिएँ तो जिएँ कैसे?” का सबसे गहरा उत्तर मिलता है—ऐसे जिएँ कि जीवन केवल समय बीतने का नाम न रह जाए। उम्र बढ़ना अपने आप होता है, लेकिन जीवन का गहरा होना अपने आप नहीं होता। इसके लिए सजगता चाहिए। जिस दिन हम सुबह उठकर यह महसूस करने लगते हैं कि एक और दिन मिल गया, उस दिन जीवन बदलना शुरू होता है। जिस दिन चाय का एक कप केवल चाय नहीं रहता, बल्कि कुछ मिनटों की शांति बन जाता है; किसी मित्र से बातचीत केवल औपचारिकता नहीं रहती, बल्कि आत्मीयता बन जाती है; काम केवल वेतन का साधन नहीं रहता, बल्कि अपनी क्षमता के इस्तेमाल का अवसर बन जाता है—उस दिन साधारण जीवन भी असाधारण अर्थ ग्रहण करने लगता है।
जीवन में महत्वाकांक्षा भी चाहिए और संतोष भी। केवल संतोष होगा तो गति रुक सकती है और केवल महत्वाकांक्षा होगी तो मन कभी रुकना नहीं सीखेगा। मनुष्य को आगे बढ़ने की इच्छा भी रखनी चाहिए और जहां पहुंचा है वहां खड़े होकर पीछे देखने की क्षमता भी। हर समय अगली मंजिल की ओर दौड़ते रहना ऐसा ही है जैसे कोई यात्री पूरे रास्ते केवल स्टेशन पहुंचने की चिंता करता रहे और रास्ते का दृश्य कभी देखे ही नहीं। मंजिल महत्वपूर्ण है, लेकिन रास्ता भी जीवन का हिस्सा है।
मृत्यु इस पूरे विमर्श को और गंभीर बना देती है। यदि जीवन अनंत होता तो शायद जीने की कोई जल्दी नहीं होती। लेकिन जीवन सीमित है, इसलिए हर क्षण का महत्व है। मृत्यु का विचार जीवन को भयभीत करने के लिए नहीं, बल्कि उसे अधिक सचेत ढंग से जीने के लिए होना चाहिए। जब यह पता हो कि समय सीमित है, तब छोटी-छोटी बातों पर वर्षों की नाराजगी पालने का अर्थ कम समझ में आता है। तब किसी से प्रेम कहना, किसी से माफी मांगना, किसी पुराने संबंध को फिर से जोड़ना, अपनी पसंद का काम करना और अपने मन की बात कह देना अधिक जरूरी लगने लगता है।
अंततः शायद “जिएँ तो जिएँ कैसे?” का कोई एक सार्वभौमिक उत्तर नहीं है। हर मनुष्य को अपना उत्तर खुद खोजना पड़ता है। किसी के लिए जीवन परिवार है, किसी के लिए रचना, किसी के लिए ज्ञान, किसी के लिए सेवा, किसी के लिए स्वतंत्रता और किसी के लिए प्रेम। समस्या तब पैदा होती है जब हम अपना उत्तर खोजने के बजाय दूसरों का उत्तर उधार ले लेते हैं। जीवन की सबसे बड़ी स्वतंत्रता शायद यही है कि हम यह तय कर सकें कि हमारे लिए सार्थक जीवन कैसा होगा।
इसलिए “जीना इसी का नाम है” हमें जीवन को स्वीकार करना सिखाता है, “ये जीना भी कोई जीना है, लल्लू” हमें अपने जीवन की गुणवत्ता पर सवाल उठाना सिखाता है और “जिएँ तो जिएँ कैसे?” हमें अपना उत्तर खोजने के लिए मजबूर करता है। इन तीनों को साथ रख दें तो जीवन का एक सुंदर दर्शन सामने आता है—जीवन जैसा मिला है, उसे स्वीकार करो; जैसा चल रहा है, उस पर सवाल करो; और जैसा जीना चाहते हो, उसके लिए अपने हिस्से का रास्ता खुद बनाओ।
आखिरकार जिंदगी शायद कोई ऐसी पहेली नहीं है जिसका उत्तर किसी किताब के आखिरी पन्ने पर लिखा हो। यह तो रोज पूछा जाने वाला प्रश्न है और रोज दिया जाने वाला उत्तर भी। आज हम कैसे जीते हैं, किससे प्रेम करते हैं, किसे क्षमा करते हैं, किसके काम आते हैं, किस बात पर हंसते हैं, किस दुख को सहते हैं और किस सपने के लिए आगे बढ़ते हैं—इन सबका जोड़ ही हमारी जिंदगी है। इसलिए सवाल केवल इतना नहीं कि हम कितने साल जिए। असली सवाल यह है कि उन वर्षों में हमने कितना जीवन जिया।
और शायद जीवन का सबसे सुंदर उत्तर यही है—ऐसे जिएँ कि जब कभी पीछे मुड़कर देखें तो यह शिकायत न हो कि जिंदगी बहुत छोटी थी; बल्कि यह संतोष हो कि जो समय मिला, उसमें हमने केवल सांसें नहीं गिनीं, हमने जिंदगी को महसूस भी किया।
यह विषय दरअसल जीवन के दो बिल्कुल अलग दर्शन सामने रखता है। एक ओर फिल्म अनाड़ी का गीत “जीना इसी का नाम है” जीवन को उसकी छोटी-छोटी खुशियों, प्रेम, अपनत्व और दूसरों के काम आने में खोजता है; दूसरी ओर मिस्टर नटवरलाल का व्यंग्यात्मक वाक्य “ये जीना भी कोई जीना है, लल्लू” उस जीवन पर सवाल उठाता है जिसमें आदमी केवल सांस तो ले रहा है, लेकिन भीतर से जी नहीं रहा। इन दोनों के बीच शायद जीवन का सबसे बड़ा प्रश्न छिपा है—सिर्फ जीवित रहना और सचमुच जीना, क्या दोनों एक ही बात हैं?
जीवित रहना जैविक प्रक्रिया है, जीना मानसिक और मानवीय अनुभव। सांस चल रही है, हृदय धड़क रहा है, पेट भर रहा है, नौकरी चल रही है, बैंक खाते में पैसा आ रहा है, बच्चे पढ़ रहे हैं, घर चल रहा है—इन सबका अर्थ यह नहीं कि जीवन भी चल रहा है। आदमी वर्षों तक एक ही दिन को दोहराते हुए भी जीवित रह सकता है। सुबह उठना, काम पर जाना, लौटना, खाना, मोबाइल देखना, सो जाना और फिर वही सब दोहराना—यह जीवन की दिनचर्या हो सकती है, लेकिन जीवन का अर्थ नहीं। शायद इसी जगह “ये जीना भी कोई जीना है” वाला सवाल पैदा होता है।
लेकिन इसके उलट यह मान लेना भी ठीक नहीं कि जीने का अर्थ हर समय रोमांच, मनोरंजन, यात्रा, सफलता और उपलब्धियों की तलाश है। आज की दुनिया ने जीवन को भी एक प्रोजेक्ट बना दिया है। कितना कमाया, कितनी यात्राएं कीं, कितनी बड़ी गाड़ी है, घर कितना बड़ा है, सोशल मीडिया पर कितने लोग जुड़े हैं, कितने देशों में घूम आए—मानो जीवन का मूल्य उसकी उपलब्धियों की सूची से तय होगा। परिणाम यह हुआ कि आदमी जीवन जीने से ज्यादा जीवन का प्रदर्शन करने लगा। वह पहाड़ पर भी जाता है तो तस्वीर के लिए, भोजन भी करता है तो पोस्ट के लिए और कभी-कभी मुस्कुराता भी इसलिए है कि तस्वीर अच्छी आए।
शायद “जीना इसी का नाम है” का वास्तविक अर्थ इससे कहीं अधिक गहरा है। जीना उन क्षणों को महसूस करना है जो जीवन को जीवन बनाते हैं। किसी सुबह की चाय का स्वाद, किसी पुराने मित्र का अचानक फोन, बच्चे की हंसी, किसी प्रिय व्यक्ति से हुई लंबी बातचीत, बारिश की आवाज, किताब के किसी वाक्य का भीतर उतर जाना, किसी अनजान व्यक्ति की मदद करके मिलने वाली संतुष्टि—ये घटनाएं अखबार की सुर्खियां नहीं बनतीं, लेकिन मनुष्य के निजी जीवन की सबसे बड़ी खबरें अक्सर यही होती हैं।
जीवन का अर्थ केवल पाना नहीं, अनुभव करना भी है। हम सफलता पाने के लिए इतने व्यस्त हो जाते हैं कि सफलता के बाद मिलने वाली खुशी को महसूस करने का समय ही नहीं बचता। आदमी घर खरीदता है, लेकिन घर में बैठने का समय नहीं है। पैसा कमाता है, लेकिन उसे खर्च करके अपने साथ रहने का अवसर नहीं है। परिवार के लिए काम करता है, लेकिन परिवार के साथ बातचीत करने का समय नहीं है। भविष्य सुरक्षित करने की चिंता में वर्तमान असुरक्षित हो जाता है। तब एक दिन पीछे मुड़कर देखने पर पता चलता है कि जिस जीवन के लिए इतनी मेहनत की, वह जीवन रास्ते में कहीं छूट गया।
फिर सवाल उठता है कि क्या संघर्ष जीवन के विरुद्ध है? बिल्कुल नहीं। संघर्ष भी जीवन का हिस्सा है। बीमारी, असफलता, आर्थिक कठिनाई, नौकरी का दबाव, रिश्तों में तनाव, जिम्मेदारियां—इनसे बचकर जीवन नहीं मिलता। बल्कि कई बार इन्हीं कठिनाइयों के बीच मनुष्य अपने जीवन की असली शक्ति पहचानता है। इसलिए “जीना” का अर्थ यह नहीं कि जीवन में दुख न हो। उसका अर्थ यह है कि दुख के बीच भी जीवन की संभावना समाप्त न हो। जो व्यक्ति कठिन समय में भी किसी सुबह की उम्मीद रख सकता है, वह विपरीत परिस्थितियों में भी जीवन से जुड़ा हुआ है।
जीने का एक अर्थ चुनने की स्वतंत्रता भी है। हर चीज हमारे नियंत्रण में नहीं होती, लेकिन हर परिस्थिति के प्रति हमारा रवैया पूरी तरह बाहरी दुनिया तय नहीं करती। नौकरी कैसी मिलेगी, लोग हमारे बारे में क्या सोचेंगे, बाजार क्या करेगा, उम्र कितनी होगी—इन सब पर हमारा नियंत्रण सीमित है। लेकिन हम किस चीज को महत्वपूर्ण मानेंगे, किस रिश्ते को समय देंगे, किस बात को छोड़ देंगे, किस बात के लिए खड़े होंगे और किन चीजों पर अपनी ऊर्जा खर्च करेंगे—इनमें हमारा चुनाव महत्वपूर्ण है। शायद वास्तविक जीवन वहीं शुरू होता है जहां आदमी दूसरों की अपेक्षाओं से थोड़ा हटकर स्वयं से पूछता है—मैं वास्तव में किस तरह जीना चाहता हूं?
जीने का अर्थ दूसरों से आगे निकलना भी नहीं है। दौड़ में हमेशा कोई आगे होगा और कोई पीछे। अगर जीवन को लगातार तुलना में बदल दिया जाए तो संतोष कभी नहीं मिलेगा। किसी के पास हमसे ज्यादा पैसा होगा, किसी के पास ज्यादा प्रसिद्धि, किसी के पास बेहतर घर, किसी के पास बेहतर शरीर, किसी के पास अधिक अवसर। तुलना की यह मशीन मनुष्य को लगातार यह विश्वास दिलाती रहती है कि उसका जीवन अधूरा है। जबकि जीवन का मूल्य अक्सर इस बात में होता है कि जो हमारे पास है, उसके साथ हम क्या अनुभव पैदा करते हैं।
इसका अर्थ यह भी नहीं कि संतोष के नाम पर महत्वाकांक्षा छोड़ दी जाए। महत्वाकांक्षा और संतोष एक-दूसरे के शत्रु नहीं हैं। आदमी आगे बढ़ने की इच्छा रखते हुए भी वर्तमान को जी सकता है। वह अधिक कमाने की कोशिश करते हुए भी अपने पास मौजूद समय का सम्मान कर सकता है। वह बड़ा घर चाहता हो, फिर भी छोटे कमरे में मिली पारिवारिक हंसी को कम मूल्यवान न समझे। असली संतुलन शायद यही है—भविष्य के लिए प्रयास करना और वर्तमान को भविष्य के नाम पर पूरी तरह कुर्बान न कर देना।
और शायद जीवन का सबसे सुंदर अर्थ किसी के लिए उपयोगी होना है। मनुष्य जब केवल अपने लिए जीता है तो उसकी इच्छाएं लगातार बढ़ती जाती हैं; लेकिन जब उसका जीवन किसी दूसरे के जीवन में थोड़ी-सी रोशनी जोड़ने लगता है, तो उसके अस्तित्व को एक अलग अर्थ मिलता है। किसी को ज्ञान देना, किसी परेशान व्यक्ति की बात सुन लेना, किसी बच्चे को आत्मविश्वास देना, किसी बुजुर्ग के साथ कुछ समय बिताना, अपने काम को ईमानदारी से करना—ये छोटे काम हैं, लेकिन इन्हीं से मनुष्य अपने होने को सार्थक करता है।
अंततः शायद “जीना इसी का नाम है” और “ये जीना भी कोई जीना है” विरोधी विचार नहीं, बल्कि एक ही प्रश्न के दो छोर हैं। पहला हमें बताता है कि जीवन में मौजूद छोटी खुशियों को पहचानो; दूसरा चेताता है कि केवल मशीन की तरह दिन काटते मत रहो। जीना न तो केवल सांस लेना है, न केवल सुख भोगना; जीना अपने समय, संबंधों, अनुभवों, संघर्षों और चेतना को अर्थ देना है।
जीवन कितना लंबा है, इसका निर्णय हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता; लेकिन उसमें कितना जीवन होगा, उसमें हमारी भूमिका जरूर है। कोई व्यक्ति अस्सी वर्ष जीकर भी अपने जीवन से अपरिचित रह सकता है और कोई व्यक्ति पचास वर्ष में इतने अनुभव, प्रेम, ज्ञान और संवेदना अर्जित कर सकता है कि उसका जीवन दूसरों के लिए भी अर्थपूर्ण हो जाए। इसलिए शायद जीवन का असली पैमाना वर्षों की संख्या नहीं, जीए गए क्षणों की गहराई है।
और इसीलिए जीवन के अंत में शायद यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण नहीं होगा कि हमने कितना कमाया, कितना पाया या कितने लोगों को पीछे छोड़ा। शायद अधिक महत्वपूर्ण सवाल होगा—क्या हमने सचमुच जिया? क्या हमने प्रेम किया? क्या हम किसी के काम आए? क्या हमने अपने भीतर के मनुष्य को बचाए रखा? क्या हमने कुछ ऐसे क्षण जिए जिन्हें याद करते हुए मन कह सके—हाँ, यह जीवन था।
तभी “जीना इसी का नाम है” कोई फिल्मी पंक्ति भर नहीं रह जाती। वह जीवन का एक प्रस्ताव बन जाती है—जीवन को केवल काटिए मत, उसे महसूस कीजिए; केवल अपने लिए मत रखिए, उसे बांटिए; केवल भविष्य के लिए मत बचाइए, उसे आज भी थोड़ा-थोड़ा जी लीजिए। वरना सचमुच मन के भीतर से आवाज आएगी—“ये जीना भी कोई जीना है, लल्लू!”

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