शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

निठल्ले के नोट्स - सर्जन और विसर्जन

सर्जन और विसर्जन : अर्थ, संबंध और द्वंद्व

सर्जन और विसर्जन—दो शब्द हैं, लेकिन जीवन के पूरे दर्शन को अपने भीतर समेटे हुए हैं। सर्जन का सामान्य अर्थ है किसी नई वस्तु, विचार, रूप या व्यवस्था को अस्तित्व में लाना और विसर्जन का अर्थ है उसे उसके मूल में लौटा देना, उससे विदा लेना या उसके अस्तित्व के एक रूप का अंत हो जाना। पहली नजर में दोनों एक-दूसरे के विरोधी दिखाई देते हैं। सर्जन जहां आरंभ है, विसर्जन अंत; सर्जन जहां पाने की खुशी है, विसर्जन वहां छोड़ने की पीड़ा। लेकिन प्रकृति के विधान में शायद आरंभ और अंत जैसी कोई स्वतंत्र चीज है ही नहीं। जिसे हम अंत कहते हैं, वह अक्सर किसी दूसरे आरंभ की भूमिका तैयार कर रहा होता है।

भारतीय चिंतन में सर्जन और विसर्जन का यह संबंध बहुत गहरा है। ब्रह्मा को सृष्टि का सर्जक और शिव को संहारक माना गया, लेकिन शिव का संहार केवल विनाश नहीं है। वह परिवर्तन की पूर्वपीठिका है। पुराना रूप समाप्त होता है ताकि नया रूप जन्म ले सके। यही कारण है कि भारतीय दर्शन में मृत्यु को भी जीवन का पूर्ण निषेध नहीं माना गया, बल्कि जीवन-चक्र की एक अवस्था के रूप में देखा गया। बीज मिट्टी में दबता है, अपने पुराने रूप में लगभग अदृश्य हो जाता है, तभी अंकुर के रूप में उसका नया सर्जन होता है। इस अर्थ में विसर्जन सर्जन का शत्रु नहीं, उसका सहचर है।

गणेश उत्सव और दुर्गापूजा जैसे पर्व इस दर्शन को बहुत सहज ढंग से हमारे सामने रखते हैं। हम मिट्टी से प्रतिमा बनाते हैं, उसमें अपनी आस्था, कल्पना और भावनाएं भरते हैं, कुछ दिनों तक उसे अपने घर और समाज के उत्सव का केंद्र बनाते हैं और फिर उसी प्रतिमा का विसर्जन कर देते हैं। देखने में यह बड़ा विचित्र लगता है कि जिसे बनाने में इतना श्रम किया, सजाया, पूजा और सम्मान दिया, उसे अंततः जल में प्रवाहित क्यों कर दिया? लेकिन शायद यही उस परंपरा का सबसे बड़ा संदेश है—रूप स्थायी नहीं है, भाव स्थायी हो सकते हैं। प्रतिमा जाती है, श्रद्धा नहीं; मिट्टी लौट जाती है, स्मृति नहीं। सर्जन हमें रूप देता है और विसर्जन हमें रूप से मोह के पार जाने की शिक्षा देता है।

मनुष्य का जीवन भी इसी क्रम से गुजरता है। बचपन का सर्जन होता है, फिर बचपन का विसर्जन होकर किशोरावस्था आती है। विद्यार्थी जीवन समाप्त होता है तो उसका विसर्जन ही व्यक्ति को नौकरी या व्यवसाय के नए संसार में प्रवेश देता है। विवाह के बाद एक तरह का अकेला जीवन विसर्जित होता है और पारिवारिक जीवन का सर्जन होता है। संतान का जन्म एक नए संसार का निर्माण करता है, लेकिन उसके बड़े होने के साथ माता-पिता की भूमिका भी धीरे-धीरे बदलती और पुराने रूप में विसर्जित होती रहती है। इसीलिए जीवन में शायद कुछ भी पूरी तरह समाप्त नहीं होता; वह अपना रूप बदलता है।

समस्या तब पैदा होती है जब मनुष्य सर्जन को तो स्वीकार करना चाहता है, लेकिन विसर्जन को स्वीकार नहीं करना चाहता। हम नई चीज चाहते हैं, लेकिन पुरानी चीज छोड़ना नहीं चाहते। नई नौकरी चाहिए, लेकिन पुरानी पहचान छोड़ने में कठिनाई होती है। बच्चे बड़े हों, यह खुशी की बात है, लेकिन उनके अपने फैसलों को स्वीकार करना कठिन लगता है। उम्र बढ़ती है, लेकिन हम मन से अपनी पुरानी उम्र में ही टिके रहना चाहते हैं। हम सफलता का सर्जन चाहते हैं, लेकिन असफलताओं, पुरानी आदतों और बीती हुई अपेक्षाओं का विसर्जन करने के लिए तैयार नहीं होते। यही जीवन का एक बड़ा द्वंद्व है।

विचारों की दुनिया में भी यही बात लागू होती है। कोई समाज तभी आगे बढ़ता है जब वह नए विचारों का सर्जन करे और उन विचारों के लिए जगह बनाए जो पुराने पड़ चुके हैं। परंपरा का अर्थ यह नहीं कि हर पुरानी चीज को हमेशा बचाकर रखा जाए। परंपरा नदी की तरह है—उसका अस्तित्व प्रवाह में है, ठहराव में नहीं। जो परंपरा समय के साथ संवाद करती है, वह जीवित रहती है; जो केवल अपने पुराने रूप से चिपक जाती है, वह धीरे-धीरे संग्रहालय की वस्तु बन सकती है। इसलिए सामाजिक परिवर्तन में भी सर्जन और विसर्जन साथ-साथ चलते हैं।

कला और साहित्य शायद इस द्वंद्व को सबसे खूबसूरती से समझते हैं। एक लेखक जब नया वाक्य लिखता है तो वह सर्जन करता है, लेकिन लिखे हुए वाक्य को काट देना, संशोधित करना या पूरी रचना को बदल देना भी उसी रचनात्मक प्रक्रिया का हिस्सा है। कवि को कभी-कभी कविता लिखने से ज्यादा जरूरी यह समझना पड़ता है कि कविता में क्या नहीं रहना चाहिए। यानी सर्जन केवल जोड़ना नहीं है; वह चयन भी है। और चयन में कुछ चीजों का विसर्जन अनिवार्य है।

प्रकृति का पूरा संसार इसी नियम पर चलता है। पत्ते निकलते हैं और झड़ते हैं, फूल खिलते हैं और मुरझाते हैं, बादल बनते हैं और बरसकर समाप्त होते हुए प्रतीत होते हैं, नदियां समुद्र में मिल जाती हैं और समुद्र से उठी वाष्प फिर बादल बनती है। पानी का विसर्जन वास्तव में उसके किसी दूसरे रूप का सर्जन है। जंगल में एक पेड़ गिरता है तो उसका शरीर मिट्टी का हिस्सा बन जाता है और वही मिट्टी किसी दूसरे पौधे के जीवन का आधार बन सकती है। प्रकृति में मृत्यु भी संसाधन बन जाती है और अंत भी किसी नई शुरुआत की खाद।

मनुष्य का सबसे बड़ा मोह शायद अपने बनाए हुए संसार से होता है। हम घर बनाते हैं, पद बनाते हैं, प्रतिष्ठा बनाते हैं, संबंध बनाते हैं, संपत्ति बनाते हैं और धीरे-धीरे इन निर्मित चीजों को अपनी पहचान समझने लगते हैं। तब विसर्जन कठिन हो जाता है। वस्तु को छोड़ना आसान हो सकता है, लेकिन उस वस्तु से जुड़ी अपनी पहचान को छोड़ना कठिन होता है। इसलिए विसर्जन केवल किसी मूर्ति को नदी में प्रवाहित करना नहीं है; कभी-कभी यह अपने भीतर जमे अहंकार, अपेक्षा, क्रोध, भय और पुराने मोह को विदा करना भी है।

पचास की उम्र के बाद यह प्रश्न शायद और महत्वपूर्ण हो जाता है कि अब जीवन में क्या सर्जन करना है और क्या विसर्जित करना है। जीवन के पहले हिस्से में मनुष्य बहुत कुछ जोड़ने में लगा रहता है—शिक्षा, नौकरी, घर, पैसा, परिवार, पहचान और उपलब्धियां। लेकिन जीवन के उत्तरार्ध में केवल जोड़ते चले जाना पर्याप्त नहीं होता। कुछ चीजों को छोड़ना भी सीखना पड़ता है—हर किसी को खुश करने की कोशिश, हर अवसर को पकड़ लेने की बेचैनी, अतीत की असफलताओं का बोझ, दूसरों से निरंतर तुलना और उन इच्छाओं का पीछा जो अब जीवन के लिए जरूरी नहीं रह गईं। उम्र का एक अर्थ यह भी है कि हम सर्जन की कला से धीरे-धीरे विसर्जन की कला की ओर बढ़ें।

लेकिन विसर्जन का अर्थ पलायन भी नहीं है। किसी जिम्मेदारी से भाग जाना विसर्जन नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से बचना हो सकता है। सच्चा विसर्जन तब है जब हम किसी चीज को इसलिए छोड़ें क्योंकि उसका समय पूरा हो चुका है, न कि इसलिए कि उसे निभाना कठिन हो गया है। किसान फसल काटता है तो वह खेती छोड़ नहीं देता; विद्यार्थी परीक्षा समाप्त होने पर सीखना बंद नहीं करता; नदी समुद्र में मिलकर अपनी यात्रा खत्म नहीं करती, बल्कि जलचक्र का हिस्सा बन जाती है। इसलिए स्वस्थ विसर्जन हमेशा किसी न किसी रूप में अगले सर्जन की संभावना अपने भीतर रखता है।

शायद इसी कारण भारतीय जीवन-दर्शन में त्याग और प्राप्ति को एक-दूसरे का विरोधी नहीं माना गया। जो व्यक्ति हर चीज को पकड़कर रखना चाहता है, उसके हाथ अंततः थक जाते हैं। जो समय आने पर छोड़ना जानता है, उसके हाथ नई चीजों के लिए खाली रहते हैं। मुट्ठी बंद करके हम किसी वस्तु को अपने पास रख सकते हैं, लेकिन नई वस्तु ग्रहण करने के लिए हाथ खोलना ही पड़ता है। जीवन भी कुछ ऐसा ही है—सर्जन के लिए ऊर्जा चाहिए और विसर्जन के लिए साहस।

अंततः सर्जन और विसर्जन जीवन के दो छोर नहीं, बल्कि एक ही वृत्त की दो अवस्थाएं हैं। सर्जन हमें संसार में अपनी उपस्थिति दर्ज कराना सिखाता है और विसर्जन हमें यह समझाता है कि हमारी बनाई हुई कोई भी चीज हमेशा हमारे पास रहने के लिए नहीं बनी। हम आते हैं, कुछ बनाते हैं, कुछ बदलते हैं, कुछ छोड़ते हैं और अंततः स्वयं भी इस संसार से विदा होते हैं। लेकिन हमारे विचार, कर्म, रचनाएं, संस्कार और दूसरों के जीवन पर पड़े प्रभाव किसी न किसी रूप में आगे बढ़ते रहते हैं। इसलिए शायद जीवन का असली रहस्य यह नहीं कि हमने कितना सर्जन किया और कितना बचाकर रखा, बल्कि यह है कि हमने कब क्या बनाया, कब क्या छोड़ दिया और अपने सर्जन को विसर्जन के लिए कितनी सहजता से तैयार किया। क्योंकि जो विसर्जन को समझ लेता है, वही सर्जन के मूल्य को भी गहराई से समझ पाता है।

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