अच्छे लोग अधिक हैं, फिर बुराई दिखाई इतनी क्यों देती है?
कभी-कभी मन में यह सवाल उठता है कि अगर दुनिया में अच्छे लोगों की संख्या बुरे लोगों से अधिक है, तो फिर समाज में बुराइयां इतनी दिखाई क्यों देती हैं? क्यों लगता है कि ईमानदारी, संवेदनशीलता, सहयोग और करुणा जैसे गुण पीछे छूट रहे हैं, जबकि छल, हिंसा, भ्रष्टाचार, स्वार्थ और बेईमानी हर तरफ अपना प्रभाव दिखा रहे हैं? क्या सचमुच बुरे लोग अधिक हैं, या हमारी नजर और समाज की व्यवस्था कुछ ऐसी है कि थोड़े-से बुरे काम भी बहुत बड़े दिखाई देने लगते हैं? शायद इस प्रश्न का उत्तर मनुष्य की प्रकृति से कम और उसके व्यवहार, सामाजिक व्यवस्था तथा हमारी देखने की आदत से अधिक जुड़ा हुआ है।
सबसे पहली बात यह समझने की है कि अच्छाई और बुराई समान शक्ति से दिखाई नहीं देतीं। एक व्यक्ति दस लोगों की मदद करता है, किसी भूखे को खाना खिलाता है, किसी अनजान की फीस भर देता है, रास्ते में घायल व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाता है या वर्षों तक ईमानदारी से अपना काम करता है—इनमें से अधिकांश घटनाएं खबर नहीं बनतीं। इसके विपरीत एक व्यक्ति दस लोगों को ठग ले, किसी की हत्या कर दे, कोई बड़ा घोटाला कर दे या सार्वजनिक स्थान पर हिंसा कर दे, तो वह घटना सैकड़ों-हजारों लोगों तक पहुंच जाती है। अर्थात अच्छाई अक्सर जीवन की सामान्य धारा में घुली रहती है, जबकि बुराई धारा को तोड़ती है और इसलिए अधिक दिखाई देती है।
हमारी मानसिक संरचना भी नकारात्मक घटनाओं को अधिक महत्व देती है। मनुष्य का मस्तिष्क खतरे को पहचानने के लिए विकसित हुआ है। जंगल में हजार शांत पेड़ों के बीच एक हिंसक जानवर को पहचानना जीवन-मरण का प्रश्न हो सकता था। आज जंगल की जगह शहर और सोशल मीडिया ने ले ली है, लेकिन खतरे पर ध्यान देने की वह प्रवृत्ति पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। इसलिए दुर्घटना, अपराध, विवाद, युद्ध, धोखा और हिंसा हमारी स्मृति पर सकारात्मक घटनाओं की अपेक्षा अधिक गहरा प्रभाव छोड़ते हैं। यही कारण है कि दिन भर में मिले दस अच्छे अनुभवों के बावजूद रात को हम अक्सर उस एक बुरी घटना के बारे में सोचते रहते हैं जिसने हमारा मन खराब कर दिया।
मीडिया और सोशल मीडिया इस अंतर को और बढ़ा देते हैं। शांति खबर नहीं होती, संघर्ष खबर बन जाता है। किसी शहर में लाखों लोग सुबह घर से निकलते हैं, अपना काम करते हैं, एक-दूसरे की मदद करते हैं और शाम को सुरक्षित घर लौटते हैं—यह सामान्य जीवन है, इसलिए समाचार नहीं बनता। लेकिन उसी शहर में कोई बड़ी आपराधिक घटना हो जाए तो वह सुर्खी बन जाती है। सोशल मीडिया पर भी यही तंत्र काम करता है। एक प्रेमपूर्ण, संवेदनशील और संतुलित संदेश शायद कुछ लोगों तक पहुंचे, लेकिन क्रोध, विवाद, अपमान और सनसनी पैदा करने वाली सामग्री बहुत तेजी से फैल सकती है। इस तरह हमें समाज का पूरा चेहरा नहीं, बल्कि उसका सबसे उत्तेजक हिस्सा बार-बार दिखाई देता है।
लेकिन केवल हमारी दृष्टि को दोष देना भी ठीक नहीं होगा। अच्छे लोगों की संख्या अधिक होने के बावजूद उनका प्रभाव हमेशा अधिक हो, यह जरूरी नहीं। अच्छाई कई बार व्यक्तिगत होती है, जबकि बुराई संगठित हो सकती है। एक ईमानदार व्यक्ति अकेला रिश्वत लेने से इनकार कर सकता है, लेकिन भ्रष्ट व्यवस्था में कई लोग मिलकर नियमों को अपने पक्ष में मोड़ सकते हैं। एक व्यक्ति हिंसा से बचना चाहता है, लेकिन संगठित हिंसा हजारों शांत लोगों का जीवन प्रभावित कर सकती है। एक परिवार अपने बच्चों को ईमानदारी सिखाता है, लेकिन यदि संस्थाओं में गलत आचरण को पुरस्कार मिलता दिखाई दे, तो व्यक्तिगत अच्छाई की शक्ति सीमित हो सकती है। इसलिए किसी समाज को केवल अच्छे व्यक्तियों की संख्या से नहीं, बल्कि उसकी संस्थाओं, कानूनों, सामाजिक मानदंडों और जवाबदेही की व्यवस्था से भी समझना चाहिए।
यहां एक और महत्वपूर्ण बात सामने आती है—अच्छाई निष्क्रिय हो तो बुराई के लिए जगह बनती है। बहुत-से अच्छे लोग स्वयं गलत काम नहीं करते, लेकिन गलत काम के सामने चुप रह जाते हैं। वे सोचते हैं कि इससे उनका क्या लेना-देना, किसी और का मामला है, कौन परेशानी मोल ले। परिणाम यह होता है कि बुराई करने वाला व्यक्ति सक्रिय रहता है और अच्छाई चाहने वाला व्यक्ति निष्क्रिय। तब संख्या में कम होने के बावजूद बुराई का प्रभाव बड़ा दिखाई देने लगता है। लोकतांत्रिक समाज में नागरिक जिम्मेदारी का महत्व यहीं सामने आता है—गलत काम न करना अच्छाई की पहली सीढ़ी है, लेकिन गलत के विरुद्ध उचित और वैधानिक तरीके से आवाज उठाना उसकी अगली सीढ़ी है।
फिर भी यह मान लेना कि अच्छाई कमजोर है, मनुष्य के इतिहास को गलत पढ़ना होगा। सभ्यता का निर्माण मुख्यतः सहयोग से हुआ है। परिवार, मित्रता, पड़ोस, शिक्षा, चिकित्सा, विज्ञान, व्यापार, कला और लोकतांत्रिक संस्थाएं—इन सबके पीछे किसी न किसी रूप में विश्वास और सहयोग की आवश्यकता होती है। यदि मनुष्य मूलतः केवल स्वार्थी और हिंसक होता, तो इतने बड़े पैमाने पर अनजान लोगों के बीच सहयोग संभव ही नहीं होता। हम रोज ऐसे हजारों लोगों पर भरोसा करते हैं जिन्हें हम जानते तक नहीं—बस चालक से लेकर डॉक्टर तक, दुकानदार से लेकर बैंक कर्मचारी तक। समाज का सामान्य जीवन इसी अदृश्य भरोसे पर चलता है।
असल समस्या शायद यह नहीं है कि बुराई अच्छाई से अधिक है, बल्कि यह है कि बुराई की दृश्यता, प्रभाव और नुकसान की क्षमता कई बार अच्छाई से अधिक होती है। एक पुल बनाने में वर्षों लग सकते हैं और उसे गिराने में कुछ मिनट। किसी बच्चे का चरित्र बनाने में वर्षों लगते हैं, लेकिन एक गलत संगति उसे कुछ समय में प्रभावित कर सकती है। विश्वास बनाने में लंबा समय लगता है, टूटने में एक क्षण। इसी असमानता के कारण बुराई अपने वास्तविक अनुपात से बड़ी प्रतीत हो सकती है।
इसलिए अच्छे लोगों की संख्या गिनने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह देखना है कि वे अपनी अच्छाई के साथ क्या करते हैं। क्या वे केवल अच्छे बने रहते हैं या अपने आसपास की व्यवस्था को भी थोड़ा बेहतर बनाते हैं? क्या वे अन्याय देखकर चुप रहते हैं या उचित तरीके से उसका विरोध करते हैं? क्या वे अपने बच्चों को केवल सफल होना सिखाते हैं या सही होना भी? क्या वे ईमानदारी को केवल निजी गुण मानते हैं या सामाजिक जिम्मेदारी भी समझते हैं? क्योंकि समाज को बदलने के लिए केवल बुरे लोगों का कम होना पर्याप्त नहीं है; अच्छे लोगों का सक्रिय, सजग और जिम्मेदार होना भी जरूरी है।
शायद इसलिए दुनिया में अच्छाई का सबसे बड़ा प्रमाण कोई बड़ी घटना नहीं, बल्कि रोजमर्रा की सामान्य जिंदगी है। कोई मां अपने बच्चे के लिए जागती है, कोई पिता अपनी जरूरतें रोककर बच्चे की पढ़ाई कराता है, कोई शिक्षक बिना चर्चा के किसी विद्यार्थी की मदद करता है, कोई कर्मचारी अपना काम ईमानदारी से करता है, कोई राहगीर दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाता है, कोई दुकानदार गलती से मिले अतिरिक्त पैसे वापस कर देता है। ये घटनाएं इतिहास की सुर्खियां नहीं बनतीं, लेकिन इन्हीं छोटी-छोटी अच्छाइयों के सहारे समाज हर दिन चलता रहता है।
अंततः शायद सवाल यह नहीं होना चाहिए कि अच्छे लोग ज्यादा हैं या बुरे, बल्कि यह कि हमारे भीतर की अच्छाई कितनी जागरूक, सक्रिय और प्रभावशाली है। बुराई का शोर बड़ा हो सकता है, उसकी तस्वीरें ज्यादा तेजी से फैल सकती हैं और उसका असर कभी-कभी बहुत गहरा हो सकता है, लेकिन मनुष्य की सभ्यता का मूल आधार अब भी सहयोग, विश्वास, करुणा और परस्पर निर्भरता है। अच्छाई शायद इसलिए कम दिखाई देती है क्योंकि वह जीवन को तोड़ती नहीं, चलाती है। जिस दिन सुबह से शाम तक बिना किसी बड़ी घटना के हमारा जीवन सामान्य रूप से चलता है, उसी दिन हजारों-अनगिनत अच्छे काम चुपचाप अपना काम कर चुके होते हैं। बुराई अक्सर दरवाजा तोड़कर भीतर आती है; अच्छाई घर बनाकर रहती है—और घर की मौजूदगी इसलिए कम दिखाई देती है क्योंकि हम उसमें रोज रहते हैं।

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