शनिवार, 26 सितंबर 2026

निठल्ले के नोट्स - किस्सा कुर्सी का

कुर्सी को देखकर पहली नजर में यही लगता है कि यह दुनिया की सबसे साधारण चीजों में से एक है—चार पाये, एक बैठने की जगह और पीठ टिकाने के लिए एक सहारा। लेकिन आदमी और कुर्सी का रिश्ता इतना साधारण नहीं है। कुर्सी केवल शरीर को बैठाने का साधन नहीं रही; उसने मनुष्य की सामाजिक हैसियत, सत्ता, सम्मान, ज्ञान और अधिकार को भी बैठने की जगह दी है। शायद इसीलिए हम कहते हैं—“कुर्सी मिल गई”, “कुर्सी चली गई”, “कुर्सी संभालना” और “कुर्सी बचाना”। इन मुहावरों में लकड़ी, लोहे या प्लास्टिक की कोई निर्जीव वस्तु नहीं, बल्कि पद और सत्ता का पूरा संसार छिपा हुआ है।

कुर्सी की कहानी बहुत पुरानी है। प्राचीन मिस्र में कुर्सियां कम-से-कम लगभग 3100 ईसा पूर्व से मौजूद थीं और वहां वे अक्सर साधारण घरेलू वस्तु न होकर प्रतिष्ठा और पद का प्रतीक थीं। लकड़ी, हाथीदांत, सोने की सजावट, मूल्यवान वस्त्र और नक्काशी से बनी कुर्सियां उच्च वर्ग के लोगों के लिए बनाई जाती थीं। मिस्र की कब्रों से मिली कुर्सियों ने इतिहासकारों को यह समझने में मदद की है कि हजारों वर्ष पहले बैठने का ढंग और फर्नीचर कैसा था। प्राचीन यूनान और रोम में भी कुर्सियों के अनेक रूप विकसित हुए। रोमन संसार की curule chair विशेष रूप से पद और अधिकार से जुड़ी हुई थी और बाद की यूरोपीय राजनीतिक-सामाजिक परंपराओं में भी ऊंची कुर्सी का अर्थ केवल आराम नहीं, प्रतिष्ठा रहा।

मगर एक दिलचस्प बात यह है कि प्राचीन दुनिया में हर आदमी के हिस्से में कुर्सी नहीं आती थी। लंबे समय तक रोजमर्रा के बैठने के लिए बेंच, संदूक, स्टूल या जमीन का इस्तेमाल अधिक सामान्य था। कुर्सी अक्सर किसी राजा, अधिकारी, धार्मिक प्रमुख या विद्वान के पद से जुड़ी विशेष वस्तु होती थी। यूरोप में भी कई सदियों तक कुर्सी आम घरेलू फर्नीचर की बजाय प्रतिष्ठा की वस्तु रही। पुराने स्रोतों के अनुसार 16वीं शताब्दी के आसपास यूरोप के कई हिस्सों में कुर्सी का रोजमर्रा के इस्तेमाल में व्यापक प्रसार हुआ। यानी जिस कुर्सी को आज हम हर घर, स्कूल, दफ्तर और चाय की दुकान में देखते हैं, वह कभी सामाजिक विशेषाधिकार की वस्तु थी।

अब जरा “कुर्सी” शब्द की कहानी पर आइए। अंग्रेजी का chair शब्द प्रारंभिक 13वीं शताब्दी के अंग्रेजी chaere से आया, जो पुराने फ्रांसीसी chaiere/chaire से होकर लैटिन cathedra और अंततः प्राचीन यूनानी kathedra तक पहुंचता है। यूनानी kathedra का मूल अर्थ बैठने की जगह या आसन था। दिलचस्प बात यह है कि इसी cathedra से अंग्रेजी का cathedral भी बना—अर्थात वह चर्च जहां बिशप की आधिकारिक आसंदी या cathedra होती है। इसलिए कुर्सी की भाषायी यात्रा सीधे चर्च, अध्यापन और अधिकार की दुनिया तक पहुंच जाती है।

यहीं से कुर्सी का सबसे दिलचस्प रूप सामने आता है—“कुर्सी” यानी केवल बैठने की जगह नहीं, बल्कि अधिकार की जगह। अंग्रेजी में chair का “पद या प्राधिकार” वाला अर्थ लगभग 13वीं शताब्दी से मिलता है और बाद में विश्वविद्यालयों में किसी प्रोफेसर की chair का अर्थ उसके अकादमिक पद से होने लगा। किसी बैठक की अध्यक्षता करने वाले व्यक्ति को chair कहना भी इसी विचार से निकला कि जो व्यक्ति “कुर्सी” पर बैठा है, वही बैठक का संचालन कर रहा है। आज भी विश्वविद्यालय में “Professor of History की Chair”, संसद में “Chair”, किसी समिति का “Chairperson” या बैठक की “Chair” इसी पुराने अर्थ की आधुनिक प्रतिध्वनि है।

भारतीय भाषाओं में प्रचलित “कुर्सी” शब्द की व्युत्पत्ति अंग्रेजी chair से नहीं मानी जानी चाहिए। हिंदी-उर्दू का “कुर्सी” अरबी kursī से आया है, जिसका संबंध अरबी में आसन/सीट और ऊंचे आसन के अर्थ से है। धार्मिक और दार्शनिक संदर्भों में भी कुर्सी का विशेष अर्थ मिलता है। यानी दुनिया की अलग-अलग भाषाओं में “बैठने” की वस्तु के लिए बने शब्दों ने धीरे-धीरे पद, अधिकार और प्रतिष्ठा के अर्थ भी ग्रहण किए—यह अपने आप में मानव समाज की मानसिकता का रोचक प्रमाण है।

कुर्सियां भी मनुष्य की तरह एक ही स्वभाव की नहीं होतीं। साधारण chair से लेकर armchair, rocking chair, recliner, folding chair, dining chair, office chair, high chair, wheelchair, lounge chair और gaming chair तक उनकी दुनिया बहुत विस्तृत है। किसी कुर्सी का उद्देश्य भोजन के समय सीधा बैठाना है, किसी का लंबे समय तक काम करने में शरीर को सहारा देना, किसी का आराम से पीछे झुकने देना और किसी का ऐसे व्यक्ति को गतिशीलता देना जो अपने पैरों से चल नहीं सकता। यानी कुर्सी की डिजाइन मनुष्य की जरूरत, शरीर, काम और जीवन-शैली के साथ बदलती गई है।

फिर आती है कुर्सी की सामग्री। कभी लकड़ी और हाथीदांत से शाही कुर्सियां बनती थीं, कभी कांस्य और पत्थर से, फिर धातु, बेंत, चमड़े और कपड़े का इस्तेमाल बढ़ा और आधुनिक युग में प्लास्टिक तथा मिश्रित पदार्थों ने कुर्सी को बेहद सस्ता और बड़े पैमाने पर उपलब्ध बना दिया। आधुनिक प्लास्टिक की ढली हुई कुर्सी ने तो कुर्सी को लगभग सार्वभौमिक वस्तु बना दिया है—स्कूल से शादी समारोह तक, चाय की दुकान से रेलवे प्लेटफॉर्म तक, अस्पताल से सरकारी दफ्तर तक।

लेकिन कुर्सी का सबसे बड़ा आविष्कार शायद उसका ढांचा नहीं, उसका अर्थ है। राजा की कुर्सी सिंहासन बन जाती है, शिक्षक की कुर्सी “अध्यापन की Chair”, न्यायाधीश की कुर्सी न्यायिक अधिकार का प्रतीक और बैठक की कुर्सी निर्णय लेने का केंद्र। भारत में भी “कुर्सी बचाना” और “कुर्सी संभालना” जैसे मुहावरे बताते हैं कि भाषा ने कुर्सी को सत्ता का पर्याय बना दिया है। असल में सत्ता खुद कहीं बैठती नहीं, लेकिन उसे बैठाने के लिए कुर्सी जरूर चाहिए!

कुर्सी का एक और मानवीय पक्ष है। आदमी खड़ा होकर बराबरी की बात कर सकता है, लेकिन कौन कहां बैठेगा, यह समाज की संरचना के बारे में बहुत कुछ कह देता है। राजा ऊंचे आसन पर, गुरु ऊंची चौकी पर, अधिकारी अपनी कुर्सी पर और आगंतुक सामने की कुर्सी पर—बैठने की व्यवस्था कभी-कभी बिना एक शब्द बोले सामाजिक दूरी समझा देती है। इसीलिए इतिहास में कुर्सी केवल आराम की वस्तु नहीं, सामाजिक संकेतों की भाषा भी रही है।

और आज स्थिति यह है कि कुर्सी हमारे जीवन का इतना सामान्य हिस्सा बन चुकी है कि उसकी मौजूदगी का एहसास तब होता है जब वह नहीं होती। लगातार बैठने के स्वास्थ्य प्रभावों पर आधुनिक चिकित्सा और सार्वजनिक स्वास्थ्य में चर्चा होती है; दूसरी ओर कार्यालयों में एर्गोनॉमिक कुर्सियां शरीर की मुद्रा और काम के आराम को ध्यान में रखकर डिजाइन की जाती हैं। यानी कुर्सी अब केवल “कहां बैठें” का प्रश्न नहीं, “कैसे बैठें” का भी विज्ञान बन चुकी है।

आखिर में कुर्सी की पूरी कहानी को एक वाक्य में समेटना हो तो कहा जा सकता है—मनुष्य ने पहले बैठने के लिए कुर्सी बनाई, फिर कुर्सी ने मनुष्य के सामाजिक संसार को बैठने की जगहें बांटनी शुरू कर दीं। कभी वह राजा की शान थी, कभी शिक्षक का आसन, कभी अधिकारी का पद, कभी बुजुर्ग का सम्मान और आज कभी-कभी ऑफिस की सबसे महंगी वस्तु! चार पायों पर खड़ी यह चीज देखने में स्थिर है, मगर इसके अर्थ लगातार बदलते रहे हैं। शायद इसीलिए “किस्सा कुर्सी का” वास्तव में फर्नीचर का किस्सा नहीं, मनुष्य, समाज, सम्मान और सत्ता के रिश्ते का किस्सा है।

किस्सा कुर्सी का

कुर्सी बड़ी मामूली चीज लगती है। चार पाये, एक पटिया, पीठ के पीछे एक सहारा और आदमी बैठ गया। मगर दुनिया में कुछ चीजें देखने में जितनी मामूली होती हैं, उनका किस्सा उतना ही बड़ा होता है। कुर्सी भी ऐसी ही चीज है। आदमी ने इसे पहले थकान मिटाने के लिए बनाया होगा, लेकिन धीरे-धीरे कुर्सी ने आदमी की थकान से कहीं ज्यादा उसकी महत्वाकांक्षा को सहारा देना शुरू कर दिया। आज कुर्सी पर बैठना और कुर्सी पाना दो अलग-अलग बातें हैं। घर में कुर्सी पर बैठना आराम है, दफ्तर में कुर्सी पर बैठना पद है, विश्वविद्यालय में कुर्सी अकादमिक प्रतिष्ठा है और राजनीति में कुर्सी सत्ता का दूसरा नाम। इसीलिए कुर्सी का इतिहास दरअसल इंसान की बैठने की आदत से ज्यादा उसके उठने-बैठने के सामाजिक इतिहास का किस्सा है।

कुर्सी की कहानी इतनी पुरानी है कि उसकी शुरुआत के लिए किसी एक आविष्कारक का नाम लेना संभव नहीं। प्राचीन मिस्र में लगभग तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व से कुर्सी जैसे आसनों के प्रमाण मिलते हैं। मिस्र के राजाओं और उच्च वर्ग के लोगों के लिए बनी कुर्सियां साधारण बैठने की वस्तुएं नहीं थीं। उन पर नक्काशी, हाथीदांत, धातु और बहुमूल्य सजावट का इस्तेमाल होता था। यानी कुर्सी के इतिहास के बहुत आरंभिक दौर में ही यह संकेत मिल गया था कि जिस पर बैठा जाता है, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण कभी-कभी यह होता है कि कौन उस पर बैठा है। एक साधारण आदमी के लिए चटाई या स्टूल पर्याप्त था, मगर राजा को कुर्सी चाहिए थी—और वह भी ऐसी कि देखने वाला समझ जाए कि बैठने वाला साधारण आदमी नहीं है।

प्राचीन यूनान और रोम में भी बैठने की वस्तुओं के अलग-अलग रूप विकसित हुए। रोमन समाज में curule chair विशेष रूप से पद और अधिकार से जुड़ी थी। यह कोई सामान्य घरेलू कुर्सी नहीं थी, बल्कि उच्च पदाधिकारियों से जुड़ा हुआ आसन था। यहां से कुर्सी के भीतर छिपा हुआ वह अर्थ और स्पष्ट होने लगता है जो बाद में पूरी दुनिया की भाषाओं और समाजों में फैल गया—कुर्सी जिस्म को कम और हैसियत को ज्यादा ऊंचा कर सकती है।

मध्यकालीन यूरोप में भी कुर्सी लंबे समय तक हर व्यक्ति के घर की सामान्य वस्तु नहीं थी। सिंहासन, धार्मिक अधिकारियों के आसन और उच्च पद वाले लोगों की कुर्सियां विशेष महत्व रखती थीं। आम लोग बेंच, स्टूल, संदूक या अन्य साधारण आसनों पर बैठते थे। धीरे-धीरे कुर्सी का इस्तेमाल सामान्य घरेलू जीवन में बढ़ा और आधुनिक युग आते-आते यह विशेषाधिकार की वस्तु से रोजमर्रा की जरूरत बन गई। जिस चीज पर कभी केवल राजा या अधिकारी बैठता था, वह अंततः स्कूल की कक्षा में हर विद्यार्थी के नीचे पहुंच गई। इतिहास की यही तो खूबसूरती है—राजा की चीज कभी न कभी जनता की चीज बन जाती है।

कुर्सी के इतिहास में भाषा भी कम दिलचस्प नहीं है। अंग्रेजी का chair पुराने फ्रांसीसी chaiere और उससे पहले लैटिन cathedra तथा यूनानी kathedra से विकसित हुआ। Kathedra का मूल संबंध बैठने की जगह या आसन से था। इसी लैटिन शब्द से cathedra बना और आगे चलकर cathedral शब्द निकला—वह चर्च जिसमें बिशप की आधिकारिक आसंदी होती है। यानी एक साधारण “बैठने की जगह” का शब्द धीरे-धीरे धार्मिक अधिकार और संस्थागत प्रतिष्ठा से जुड़ गया। विश्वविद्यालयों में आज भी किसी विशेष विषय के प्रोफेसर के पद को chair कहा जाता है। किसी समिति का संचालन करने वाला व्यक्ति chair होता है। यह महज संयोग नहीं कि अंग्रेजी भाषा में “कुर्सी” धीरे-धीरे “पद” का अर्थ ग्रहण कर गई।

हिंदी-उर्दू का “कुर्सी” शब्द दूसरी भाषायी यात्रा से आया है। यह अरबी kursī से संबंधित है, जिसका अर्थ आसन या बैठने की जगह है। अरबी और इस्लामी बौद्धिक परंपरा में कुर्सी का धार्मिक और दार्शनिक संदर्भ भी मिलता है। इसलिए यह मान लेना ठीक नहीं होगा कि हिंदी का कुर्सी शब्द सीधे अंग्रेजी chair से आया है। दोनों शब्दों की अपनी अलग भाषायी यात्राएं हैं, हालांकि दोनों में एक दिलचस्प समानता है—बैठने की वस्तु से आगे बढ़कर दोनों ने किसी न किसी रूप में अधिकार और प्रतिष्ठा का अर्थ ग्रहण किया।

कुर्सी की किस्मों की गिनती करने बैठें तो शायद आदमी थक जाए और कुर्सी न थके। खाने की कुर्सी अलग, आरामकुर्सी अलग, झूलने वाली rocking chair अलग, पीछे झुकने वाली recliner अलग, दफ्तर की घूमने वाली कुर्सी अलग, स्कूल की कुर्सी अलग, बार की ऊंची bar stool अलग, व्हीलचेयर अलग और बच्चों के लिए high chair अलग। आज तो गेम खेलने के लिए भी विशेष gaming chair है। यानी जिस मनुष्य ने कभी पेड़ के तने पर बैठकर काम चला लिया था, उसने अब बैठने के लिए इतना बड़ा उद्योग खड़ा कर दिया है कि कुर्सी भी सोचती होगी—आखिर आदमी को बैठना है या बैठने की पूरी व्यवस्था बनानी है?

कुर्सी की डिजाइन भी मनुष्य के जीवन की कहानी कहती है। भोजन की मेज वाली कुर्सी आपको सीधा बैठाती है, कार्यालय की कुर्सी लंबे समय तक काम करने की सुविधा देने के लिए बनाई जाती है, आरामकुर्सी शरीर को ढीला छोड़ने का निमंत्रण देती है और झूलने वाली कुर्सी शायद शरीर से ज्यादा मन को आराम देती है। व्हीलचेयर तो कुर्सी के अर्थ को ही बदल देती है। वहां कुर्सी केवल बैठने का साधन नहीं रहती, बल्कि व्यक्ति की गतिशीलता का माध्यम बन जाती है। इस तरह कुर्सी की उपयोगिता उसके आकार से नहीं, मनुष्य की जरूरत से तय होती है।

लेकिन कुर्सी की असली ताकत उसके चार पायों में नहीं, उसके प्रतीकात्मक अर्थ में है। “कुर्सी संभालना”, “कुर्सी बचाना”, “कुर्सी छोड़ना”, “कुर्सी पर बैठना”, “कुर्सी छिन जाना”—इन वाक्यांशों में कहीं भी फर्नीचर की चिंता नहीं होती। चिंता होती है पद की, अधिकार की, प्रतिष्ठा की। राजनीति में तो कुर्सी इतनी शक्तिशाली चीज बन चुकी है कि आदमी पांच साल तक जिस कुर्सी पर बैठता है, उसके बारे में पांच साल बाद भी चर्चा होती रहती है। कुर्सी स्थिर रहती है, लोग बदलते रहते हैं; लेकिन हर कोई चाहता है कि बदलने वालों में उसका नाम न आए।

कुर्सी का एक मनोविज्ञान भी है। जब किसी कमरे में दस लोग हों और ग्यारह कुर्सियां हों तो कोई परेशानी नहीं। लेकिन दस लोग और नौ कुर्सियां हों तो अचानक लोकतंत्र, शिष्टाचार, उम्र, पद, रिश्तेदारी और मित्रता सबकी परीक्षा शुरू हो जाती है। कौन खड़ा रहेगा और कौन बैठेगा—यह छोटा-सा सवाल है, लेकिन इसके उत्तर में समाज की पूरी संरचना दिखाई दे सकती है। बड़े को कुर्सी, मेहमान को कुर्सी, अधिकारी को कुर्सी, बुजुर्ग को कुर्सी और कभी-कभी उस व्यक्ति को भी कुर्सी जो इतना प्रभावशाली है कि उसके खड़े रहने से बाकी लोगों को असुविधा होने लगे!

हमारे यहां तो कुर्सी और सम्मान का रिश्ता भी पुराना है। किसी को कुर्सी देना सम्मान है, किसी को नीचे बैठाना सामाजिक संकेत। मंच पर कौन कुर्सी पर बैठेगा और कौन पीछे खड़ा रहेगा, किसके लिए बड़ी कुर्सी होगी और किसके लिए छोटी—इन सबमें सामाजिक पदानुक्रम चुपचाप अपना परिचय देता है। समारोहों में कुर्सियों की कतारें कई बार भाषण से पहले ही बता देती हैं कि कौन मुख्य अतिथि है और कौन केवल आमंत्रित अतिथि। कभी-कभी तो मंच पर रखी कुर्सियों की संख्या देखकर ही पत्रकारों को खबर की गंभीरता का अनुमान हो जाता है।

दफ्तर में कुर्सी का महत्व और बढ़ जाता है। एक ही मेज, एक ही कमरा और लगभग एक ही काम—लेकिन कुर्सी बदलते ही व्यवहार बदल सकता है। छोटी कुर्सी पर बैठने वाला फाइल लेकर बड़े साहब की कुर्सी तक जाता है और बड़ी कुर्सी पर बैठने वाला उसी फाइल पर हस्ताक्षर करके वापस भेज देता है। फर्क फाइल में नहीं, कुर्सी में है। इसीलिए सरकारी दफ्तरों की भाषा में “कुर्सी” कई बार व्यक्ति का नाम भी हो जाती है। “साहब कुर्सी पर नहीं हैं”—इस वाक्य का अर्थ यह नहीं कि साहब कहीं कुर्सी खरीदने गए हैं; इसका अर्थ है कि सत्ता का छोटा-सा केंद्र फिलहाल खाली है।

शिक्षा की दुनिया में कुर्सी का अर्थ थोड़ा सभ्य हो जाता है। यहां कुर्सी सत्ता से ज्यादा ज्ञान की प्रतिष्ठा का प्रतीक बनती है। विश्वविद्यालय में किसी विषय की academic chair किसी विद्वान के पद और विशेषज्ञता को दर्शाती है। लेकिन विद्यार्थी के लिए शिक्षक की कुर्सी फिर भी एक रहस्यमय वस्तु होती है। जब तक शिक्षक कुर्सी पर बैठा है, कक्षा चल रही है; शिक्षक कुर्सी से उठ गया तो विद्यार्थियों की निगाह घड़ी पर चली जाती है। ज्ञान का पूरा संसार कभी-कभी एक कुर्सी और दीवार पर लगी घड़ी के बीच झूलता रहता है।

और घर? घर में कुर्सी की राजनीति सबसे लोकतांत्रिक होकर भी सबसे कठिन होती है। बैठक की सबसे आरामदायक कुर्सी पर अक्सर उसका अनौपचारिक आरक्षण होता है जो रोज उसमें बैठता है। कोई दूसरा वहां बैठ जाए तो घर में संविधान नहीं बदलता, लेकिन चेहरे के भाव जरूर बदल जाते हैं। टीवी के सामने वाली कुर्सी, बालकनी की कुर्सी, अखबार पढ़ने वाली कुर्सी और गर्मियों में पंखे के ठीक नीचे वाली कुर्सी—हर घर में कुछ कुर्सियों की अपनी प्रतिष्ठा होती है। वहां कोई नामपट्ट नहीं लगा होता, मगर सबको पता होता है कि किसकी कुर्सी कौन-सी है।

फिर आधुनिक युग ने कुर्सी को विज्ञान से जोड़ दिया। अब केवल यह पर्याप्त नहीं कि कुर्सी सुंदर दिखे; वह शरीर के अनुकूल भी होनी चाहिए। लंबे समय तक गलत मुद्रा में बैठने से होने वाली असुविधाओं ने ergonomic chair को जन्म दिया। कुर्सी की ऊंचाई, पीठ का सहारा, सीट की गहराई, हाथ रखने की जगह और स्क्रीन की स्थिति तक पर विचार होने लगा। मनुष्य ने अंततः स्वीकार कर लिया कि वह कुर्सी पर बहुत समय बिताता है और अब कुर्सी भी उसके शरीर के बारे में कुछ सोचे।

कुर्सी का कारोबार भी इसी के साथ बड़ा हुआ। लकड़ी के कारीगर से लेकर आधुनिक फर्नीचर उद्योग तक, कुर्सी अब एक वैश्विक व्यापार है। साधारण प्लास्टिक की कुर्सी से लेकर डिजाइनर फर्नीचर तक, इसकी कीमत कुछ सौ रुपये से लेकर हजारों-लाखों रुपये तक पहुंच सकती है। कहीं कुर्सी उपयोग की वस्तु है, कहीं डिजाइन का नमूना और कहीं कला का हिस्सा। आधुनिक डिजाइन इतिहास में कुछ कुर्सियां स्वयं प्रतिष्ठित डिजाइन वस्तुएं बन चुकी हैं। यानी कभी कुर्सी पर राजा बैठता था, अब कभी-कभी कुर्सी खुद इतनी प्रसिद्ध हो जाती है कि उसके बारे में किताब लिखी जाती है।

मगर कुर्सी का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि वह स्वयं कभी चलती नहीं और उसके लिए आदमी सारी जिंदगी दौड़ता रहता है। कुर्सी के चार पाये जमीन पर टिके होते हैं, लेकिन उस पर बैठने वाले की महत्वाकांक्षा के पंख लगे होते हैं। आदमी पद पाने के लिए दौड़ता है, पद बचाने के लिए दौड़ता है और पद जाने के बाद उसी कुर्सी की याद में कभी-कभी संस्मरण लिखता है। कुर्सी चुपचाप वहीं रहती है। उसे न खुशी होती है, न दुख। आज कोई बैठा, कल कोई दूसरा बैठेगा। कुर्सी की सबसे बड़ी दार्शनिकता शायद यही है कि वह व्यक्ति से ज्यादा स्थायी होती है, लेकिन व्यक्ति उसे अपना समझने की भूल करता रहता है।

इसलिए कुर्सी को केवल फर्नीचर समझना उसके साथ अन्याय है। वह मानव सभ्यता की एक छोटी-सी लेकिन बेहद अर्थपूर्ण खोज है। उसने थके हुए शरीर को सहारा दिया, बुजुर्ग को आराम दिया, विद्यार्थी को पढ़ने की जगह दी, मरीज को गतिशीलता दी, कलाकार को सृजन का आसन दिया और सत्ता को प्रतीक दिया। लेकिन उसी कुर्सी ने यह भी सिखाया कि ऊंचाई हमेशा महानता नहीं होती और कुर्सी की ऊंचाई से बैठे हुए आदमी का कद तय नहीं होता।

आखिर में कुर्सी से बड़ा व्यंग्य शायद यही है कि आदमी जीवन भर कुछ न कुछ पाने के लिए खड़ा रहता है, और जब बहुत कुछ पा लेता है तो अंततः बैठ जाता है। राजा सिंहासन पर बैठता है, अधिकारी अपने कार्यालय में बैठता है, शिक्षक अपनी कक्षा में बैठता है, लेखक अपनी मेज पर बैठता है और आम आदमी दिन भर की मेहनत के बाद अपनी घर की कुर्सी पर बैठकर चैन की सांस लेता है। फर्क सिर्फ इतना है कि किसी के लिए कुर्सी सत्ता है, किसी के लिए सम्मान, किसी के लिए रोजी-रोटी और किसी के लिए आराम।

इसलिए अगली बार जब किसी कुर्सी को देखें तो केवल यह मत सोचिए कि इस पर बैठा जा सकता है। जरा यह भी सोचिए कि इस साधारण-सी वस्तु ने मनुष्य की सभ्यता को कितनी कहानियां दी हैं। कभी यह राजा का सिंहासन बनी, कभी गुरु की आसंदी, कभी अधिकारी का पद, कभी वैज्ञानिक की प्रयोगशाला का हिस्सा और कभी थके हुए आदमी की शाम का सबसे भरोसेमंद साथी। कुर्सी खुद कहीं नहीं जाती, लेकिन उसके चार पायों पर इतिहास, समाज, सत्ता, प्रतिष्ठा और मनुष्य की महत्वाकांक्षा सदियों से चक्कर काट रहे हैं। सच पूछिए तो किस्सा कुर्सी का नहीं, कुर्सी के बहाने आदमी का किस्सा है—वह आदमी जो पहले बैठने के लिए कुर्सी बनाता है और फिर पूरी जिंदगी यह तय करने में लगा देता है कि आखिर किस कुर्सी पर बैठना है।यह संस्करण तथ्यात्मक इतिहास को बनाए रखते हुए व्यंग्य और दर्शन को अधिक प्रमुख करता है। 

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