समोसा और सेहत : दो परतों के बीच छिपी एक गरमागरम कहानी
समोसा भारतीय जीवन का ऐसा चरित्र है, जिसे देखते ही स्वास्थ्य की सारी चेतावनियां कुछ देर के लिए धुंधली पड़ जाती हैं। चाय सामने हो, बारिश हो रही हो, ऑफिस में शाम की सुस्ती हो या दोस्तों की महफिल—समोसा अचानक प्रकट होता है और कोई न कोई कह देता है, “एक प्लेट लगा दो।” त्रिकोण के आकार का यह छोटा-सा पकवान देखने में जितना मासूम लगता है, उसकी सेहत की कहानी उतनी ही पेचीदा है। बाहर से मैदे की कुरकुरी परत, भीतर आलू, मटर और मसालों का संसार और पूरी चीज का तेल में डूबकर सुनहरा होना—समोसा दरअसल स्वाद, ऊर्जा और तले हुए भोजन का एक छोटा-सा गठजोड़ है।
सबसे पहले समोसे के बारे में एक भ्रम दूर करना जरूरी है। समोसे में आलू होना अपने-आप में समस्या नहीं है और मैदा भी अपने-आप में कोई विष नहीं है। आलू एक स्टार्चयुक्त सब्जी है और WHO की स्वस्थ आहार संबंधी सलाह में आलू जैसे स्टार्चयुक्त कंदों को भोजन का हिस्सा माना गया है। समस्या उस समय बढ़ती है जब ऐसे खाद्य पदार्थ अत्यधिक वसा और नमक के साथ, विशेषकर डीप-फ्राइंग के जरिए, बार-बार और बड़ी मात्रा में खाए जाएं। WHO स्वस्थ आहार की बुनियाद संतुलन, विविधता, पर्याप्तता और संयम को मानता है तथा तले हुए खाद्य पदार्थों और अस्वास्थ्यकर वसा की मात्रा सीमित करने की सलाह देता है।
समोसे की सबसे बड़ी स्वास्थ्य-कहानी उसके मैदे से कम और तलने की प्रक्रिया से ज्यादा जुड़ी है। मैदा रिफाइंड अनाज है, इसलिए इसमें साबुत गेहूं की तुलना में प्राकृतिक फाइबर कम होता है। जब उसी मैदे की परत को तेल में डीप-फ्राई किया जाता है, तो भोजन की ऊर्जा-सघनता बढ़ जाती है। यानी एक छोटी-सी वस्तु देखने में भले छोटी हो, लेकिन उसमें मौजूद ऊर्जा अपेक्षाकृत अधिक हो सकती है। WHO भी कार्बोहाइड्रेट के प्रमुख स्रोत के रूप में साबुत अनाज, सब्जियों, फलों और दालों जैसे फाइबरयुक्त खाद्य पदार्थों को प्राथमिकता देने की सलाह देता है।
और समोसे का असली रहस्य है—तेल कितना और कैसा? घर में ताजा तेल में नियंत्रित तापमान पर बनाया गया समोसा और किसी ऐसी दुकान का समोसा जिसमें तेल बार-बार इस्तेमाल हो रहा हो, दोनों को स्वास्थ्य की दृष्टि से एक जैसा नहीं माना जा सकता। भारत के FSSAI ने स्पष्ट किया है कि तेल को बार-बार गर्म करने पर उसमें Total Polar Compounds यानी TPC बनते हैं और निर्धारित सीमा से ऊपर पहुंचने पर ऐसा तेल मानव उपभोग के लिए उपयुक्त नहीं रहता। FSSAI ने खाद्य कारोबारियों के लिए इस्तेमाल किए गए तेल के संग्रह और निपटान से संबंधित नियम भी बनाए हैं।
यहीं से समोसे की कहानी थोड़ी गंभीर हो जाती है। जब तेल बार-बार गर्म होता है, तो उसमें रासायनिक और भौतिक परिवर्तन होते हैं। इसलिए सड़क किनारे या दुकान पर समोसा खाते समय केवल यह देखना पर्याप्त नहीं कि उसकी परत कितनी कुरकुरी है; यह भी देखना महत्वपूर्ण है कि दुकान की स्वच्छता कैसी है और तेल की स्थिति कैसी दिखाई देती है। काला पड़ता, अत्यधिक झाग देता या धुएं की ओर जाता तेल कोई अच्छा संकेत नहीं है। हालांकि केवल आंख से तेल की रासायनिक गुणवत्ता का निश्चित निर्णय नहीं किया जा सकता—इसके लिए परीक्षण की जरूरत होती है।
समोसे के साथ एक और नाम जुड़ता है—ट्रांस फैट। यहां भी अतिशयोक्ति से बचना जरूरी है। हर समोसे में खतरनाक मात्रा में ट्रांस फैट होगा, यह कहना गलत है। लेकिन कुछ तले हुए और व्यावसायिक खाद्य पदार्थों में औद्योगिक ट्रांस फैट की मौजूदगी संभव है, खासकर जहां आंशिक रूप से हाइड्रोजनीकृत वसा का इस्तेमाल हो। WHO औद्योगिक ट्रांस फैट से बचने और कुल ट्रांस फैट को कुल ऊर्जा के 1 प्रतिशत से कम रखने की सलाह देता है, क्योंकि इसका संबंध हृदय रोग के बढ़े हुए जोखिम से है।
समोसे की एक और दिलचस्प वैज्ञानिक कहानी एक्रिलामाइड की है। यह पदार्थ कुछ स्टार्चयुक्त खाद्य पदार्थों को ऊंचे तापमान पर पकाने, भूनने या तलने के दौरान बन सकता है। आलू और अनाज से बने खाद्य पदार्थों में इसकी मात्रा पकाने की विधि, तापमान, नमी और समय जैसी चीजों पर निर्भर करती है। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि “समोसा खाया और कैंसर हो गया”; विज्ञान ऐसी सीधी रेखा नहीं खींचता। लेकिन अत्यधिक तापमान और बहुत अधिक भूरा या जला हुआ स्टार्चयुक्त भोजन कम करना खाद्य-सुरक्षा की दृष्टि से उचित है।
अब यदि समोसे की तुलना वड़ा पाव से करें तो दोनों की कहानी कुछ समान और कुछ अलग है। वड़ा पाव में तला हुआ आलू-बेसन का वड़ा और पाव होता है; समोसे में मैदे की तली हुई परत के भीतर प्रायः आलू-मटर-मसाले का मिश्रण होता है। दोनों में समस्या का केंद्र केवल आलू नहीं, बल्कि डीप-फ्राइंग, तेल की मात्रा, नमक, परिष्कृत अनाज और खाने की आवृत्ति है। इसलिए यह कहना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा कि “समोसा खराब है लेकिन वड़ा पाव अच्छा है” या इसके उलट। स्वास्थ्य का सवाल पूरे भोजन-पैटर्न का है, किसी एक स्नैक की जाति तय करने का नहीं।
फिर भी समोसे की एक खास मुश्किल है—उसका आकार हमें धोखा देता है। प्लेट में दो छोटे समोसे देखकर दिमाग कहता है, “इतना ही तो है।” लेकिन तला हुआ मैदा और आलू का मिश्रण ऊर्जा-सघन हो सकता है। उसके साथ मीठी चाय आ जाए तो कहानी में चीनी भी प्रवेश कर जाती है। फिर दूसरा समोसा “सिर्फ स्वाद के लिए” और तीसरा “क्योंकि पहला बहुत अच्छा था।” यही वह क्षण है जब स्नैक भोजन का रूप लेने लगता है।
लेकिन समोसे को पूरी तरह अपराधी घोषित करना भी ठीक नहीं। भोजन केवल कैलोरी और पोषक तत्वों का गणित नहीं है; उसमें संस्कृति, स्मृति, सामाजिकता और आनंद भी शामिल हैं। किसी बरसाती शाम का गर्म समोसा, कॉलेज की कैंटीन की याद, ऑफिस की चाय और मित्रों के साथ साझा की गई प्लेट—इन सबका कोई पोषण-लेबल नहीं होता। स्वस्थ जीवन का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य स्वाद और आनंद से संन्यास ले ले। WHO की अवधारणा भी “संतुलित और विविध आहार” की है, किसी एक खाद्य पदार्थ के पूर्ण बहिष्कार की नहीं।
इसलिए असली प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि “समोसा खाएं या न खाएं?” बल्कि यह कि “समोसा हमारी जिंदगी में कितनी जगह घेरे?” कभी-कभार खाया गया एक समोसा और रोज शाम दो-तीन समोसे खाने की आदत एक ही बात नहीं है। यदि बाकी भोजन संतुलित है, फल-सब्जियां, दालें, साबुत अनाज और पर्याप्त प्रोटीन मिल रहे हैं तथा कुल ऊर्जा सेवन जरूरत के अनुरूप है, तो कभी-कभार का समोसा पूरे आहार को परिभाषित नहीं करता। दूसरी ओर, अगर तला हुआ स्नैक रोजमर्रा की आदत बन जाए, तो वजन, रक्त शर्करा, रक्त वसा और हृदय-स्वास्थ्य से जुड़े समग्र जोखिमों पर असर पड़ सकता है।
शायद इसलिए समोसे को देखने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि उसे भोजन नहीं, आनंद का अवसर समझिए—और आनंद को आदत बनने से बचाइए। घर पर बनाएं तो कम तेल में या बेक करके विकल्प बनाया जा सकता है; भरावन में मटर, दाल या दूसरी सब्जियां बढ़ाई जा सकती हैं; मैदे की जगह कुछ हद तक साबुत गेहूं का आटा इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे पारंपरिक समोसा पूरी तरह वही नहीं रहेगा, लेकिन उसका स्वास्थ्य-प्रोफाइल बदल सकता है।
अंततः समोसा हमें भोजन का एक बड़ा दर्शन समझाता है। स्वास्थ्य किसी एक दिन के खाने से नहीं बनता और किसी एक समोसे से बिगड़ता भी नहीं। शरीर हमारी पूरी जीवनशैली का हिसाब रखता है—हम क्या खाते हैं, कितना खाते हैं, कितनी बार खाते हैं, कितना चलते हैं और कितना निष्क्रिय रहते हैं। समोसा उस हिसाब-किताब की किताब में एक छोटा-सा अध्याय है। समस्या तब शुरू होती है जब हम उसे पूरी किताब बना देते हैं।
इसलिए अगली बार चाय के साथ गरमागरम समोसा सामने आए तो उसे देखकर अपराधबोध करने की भी जरूरत नहीं और यह सोचने की भी जरूरत नहीं कि “आलू है, मैदा है, तेल है—तो आज शरीर का अंत निश्चित है।” बस इतना याद रखिए—समोसा स्वाद का मित्र हो सकता है, स्वास्थ्य का आधार नहीं। और शायद यही उसकी और हमारी दोस्ती की सबसे सुरक्षित शर्त है।

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