शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

निठल्ले के नोट्स - जलेबी का जोड़ नहीं!

जलेबी : जितनी मीठी, उतनी ही उलझी हुई कहानी

जलेबी बनाना और जलेबी खाना—ये सचमुच दो अलग-अलग काम हैं। जलेबी खाना सीधा काम है: गरम जलेबी उठाइए, चाशनी टपकने दीजिए और मुंह में रख लीजिए। लेकिन जलेबी बनाना? वह अपने आप में एक कला है। घोल तैयार कीजिए, उसे कुछ देर रखिए, फिर किसी कपड़े, बोतल या विशेष नोजल से गरम तेल या घी में गोल-गोल घुमाते हुए डालिए। एक चक्र दूसरे चक्र में समाता जाता है और देखते-देखते कड़ाही में एक ऐसी आकृति बनती है जिसका न आरंभ समझ में आता है, न अंत। शायद इसी कारण हिंदी में किसी जटिल या उलझे हुए मामले को “जलेबी की तरह घुमा-फिराकर कहना” कहा जाता है। जलेबी केवल मिठाई नहीं; हमारी भाषा में भी उसका एक चरित्र है।

जलेबी की कहानी भी उसकी आकृति की तरह सीधी नहीं है। आज वह भारतीय मिठाइयों की पहचान जैसी लगती है, लेकिन उपलब्ध ऐतिहासिक प्रमाण बताते हैं कि इसकी पुरानी रिश्तेदारी पश्चिम एशिया की ज़लाबिया/ज़ुलबिया जैसी मिठाइयों से जुड़ती है। दसवीं शताब्दी के बगदाद के अरबी पाकशास्त्रीय ग्रंथ Kitab al-Tabikh में ऐसी तली हुई मिठाई की रेसिपी मिलती है और बाद के मध्यकालीन ग्रंथों में भी इसके रूप मिलते हैं। भारत में इसका उल्लेख कम-से-कम पंद्रहवीं शताब्दी तक पहुंच चुका था। लगभग 1450 ईस्वी के जैन ग्रंथ प्रियंकरनृपकथा में समृद्ध व्यापारी के भोजन के संदर्भ में जलेबी का उल्लेख मिलता है और बाद के भारतीय ग्रंथों में इसके बनाने की विधि भी मिलती है। इसलिए यह कहना अधिक सटीक है कि जलेबी की पुरानी जड़ें पश्चिम एशिया से जुड़ी हैं, लेकिन भारत ने उसे इतना अपना बना लिया कि आज उसके बिना भारतीय मिठाई की कल्पना अधूरी लगती है।

यही तो भोजन की खूबसूरती है। कोई चीज एक जगह पैदा होती है, दूसरी जगह पहुंचती है और तीसरी जगह जाकर अपनी नई पहचान बना लेती है। जलेबी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। पश्चिम एशिया की ज़लाबिया जब भारतीय उपमहाद्वीप के खान-पान में आई तो उसने स्थानीय स्वाद, उपलब्ध सामग्री और पाक-परंपराओं के साथ अपना रूप बदला। आज ईरान में इसके रिश्तेदार ज़ुलबिया के नाम से मिलते हैं, अरब दुनिया में ज़लाबिया जैसे नाम मिलते हैं और भारतीय उपमहाद्वीप में जलेबी, जिलेबी, जिलापी जैसे रूप दिखाई देते हैं। खाद्य इतिहास हमें यही बताता है कि व्यंजन पासपोर्ट लेकर यात्रा नहीं करते; वे यात्रियों, व्यापारियों, संस्कृतियों और स्वादों के साथ चलते हैं।

जलेबी बनाने की प्रक्रिया अपने आप में देखने लायक नाटक है। मैदे का घोल तैयार होता है, उसमें पानी और कभी-कभी दही, बेसन, सूजी या दूसरे घटक मिलाए जाते हैं; घोल को कुछ समय आराम दिया जाता है ताकि उसमें हल्का किण्वन हो सके। फिर उसे किसी नोजल या कपड़े से गरम घी या तेल में गोल-गोल धार के रूप में छोड़ा जाता है। कुछ ही क्षणों में वह तरल घोल एक कुरकुरी आकृति में बदल जाता है। उसके बाद उसे गरम चाशनी में डुबोया जाता है। Oxford Companion to Food भी जलेबी के इसी मूल ढांचे—मैदे आधारित घोल, गोलाकार धार, डीप-फ्राइंग और फिर चाशनी में भिगोने—का वर्णन करता है।

यहीं जलेबी का असली जादू है—वह पानी जैसे घोल से शुरू होकर कुरकुरे चक्र में बदलती है और फिर चाशनी को अपने भीतर सोख लेती है। यानी जलेबी का पूरा दर्शन तीन अवस्थाओं में है—तरलता, संरचना और मिठास। पहले वह आकारहीन है, फिर आकार ग्रहण करती है और अंततः चाशनी में डूबकर अपना चरित्र पाती है। जीवन भी शायद ऐसा ही है; परिस्थितियां हमें घोल की तरह कहीं भी बहा सकती हैं, लेकिन अनुभव और अनुशासन हमें कोई आकार देते हैं और अंत में हमारी पहचान इस बात से बनती है कि हमने भीतर क्या सोखा।

लेकिन जलेबी को केवल दर्शन में बदल देना भी उसके साथ अन्याय होगा। वह खाने की चीज है और खाने में उसका अपना विज्ञान है। मैदा, तेल या घी और चीनी की चाशनी—इन तीनों का मेल जलेबी को ऊर्जा-सघन मिठाई बनाता है। यानी वह कोई ऐसा खाद्य पदार्थ नहीं है जिसे पोषण की दृष्टि से रोजमर्रा के मुख्य भोजन का विकल्प माना जाए। खासकर जिन लोगों को अपने कुल चीनी और कैलोरी सेवन पर नियंत्रण रखना है, उनके लिए जलेबी का आकार छोटा होने के बावजूद उसमें मौजूद चीनी और तलने से आई ऊर्जा को ध्यान में रखना जरूरी है। यह कहना कि “एक जलेबी से स्वास्थ्य खराब हो जाएगा” उतना ही अतिरंजित है जितना यह कहना कि “जलेबी में कोई समस्या ही नहीं।” असली सवाल है—कितनी, कितनी बार और किस तरह के बाकी आहार के साथ?

जलेबी की एक विचित्र खूबी है कि वह मिठाई होते हुए भी केवल मिठाई नहीं रहती। उत्तर भारत के कई हिस्सों में दही-जलेबी का संयोजन मिलता है। उत्तर प्रदेश के वाराणसी, प्रयागराज, आगरा, मथुरा और लखनऊ जैसे शहरों में यह नाश्ते की सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा रहा है। हाल की पोषण चर्चाओं में भी दही-जलेबी को एक ओर चीनी और डीप-फ्राइड मिठाई तथा दूसरी ओर प्रोटीन और कैल्शियम वाले दही के संयोजन के रूप में देखा गया है। यह संयोजन पोषण की दृष्टि से जलेबी को “स्वास्थ्य भोजन” नहीं बना देता, लेकिन यह जरूर दिखाता है कि भारतीय समाज ने स्वाद और भोजन को कितनी रचनात्मकता से जोड़ा है।

जलेबी का भूगोल भी कम दिलचस्प नहीं है। कहीं वह पतली और कुरकुरी है, कहीं मोटी और रस से भरी हुई; कहीं उसे दूध या दही के साथ खाया जाता है, कहीं समोसे या कचौड़ी के साथ। कुछ जगहों पर वह त्योहार की मिठाई है, कहीं नाश्ता है और कहीं मेहमाननवाजी का हिस्सा। पश्चिम एशिया में इसके ऐतिहासिक रिश्तेदार धार्मिक और उत्सवी अवसरों से भी जुड़े रहे हैं; ईरान में ज़ुलबिया रमज़ान और इफ्तार की परंपरा से जुड़ी रही है। भारत में जलेबी ने त्योहारों, विवाहों, धार्मिक आयोजनों और मेलों में अपनी जगह बना ली। भोजन ने भूगोल पार किया और फिर हर भूगोल ने उसे अपने स्वाद के अनुसार थोड़ा-थोड़ा बदल लिया।

और अब आती है जलेबी की वह विशेषता जिसके कारण वह केवल मिठाई नहीं, मुहावरा भी बन गई। किसी बात को बहुत घुमाकर कहना हो तो कहा जाता है—“जलेबी मत बनाइए।” यानी जलेबी की गोलाई भारतीय मानसिकता में भाषाई प्रतीक बन गई है। सीधी बात को घुमाकर कहना, मुद्दे के इर्द-गिर्द घूमते रहना, बात को इतना उलझा देना कि सुनने वाला भूल जाए कि शुरुआत कहां से हुई थी—यह सब “जलेबी बनाना” है। राजनीति से लेकर दफ्तर तक, प्रेम से लेकर पारिवारिक बातचीत तक, जलेबी हमारे संवाद की एक शैली बन चुकी है। मजेदार बात यह है कि जलेबी खाने वाला उसे खोलकर नहीं खाता, लेकिन जलेबी बनाने वाला उसे लगातार घुमाकर बनाता है। शायद यही कारण है कि हमारी भाषा ने जलेबी को उलझी हुई बात का प्रतीक बना दिया।

फिर भी जलेबी में एक गहरी सांस्कृतिक उदारता है। यह उन मिठाइयों में है जिसने अपनी विदेशी रिश्तेदारी को छिपाकर भारतीय होने का दावा नहीं किया; उसने भारत में आकर भारतीयता को अपना लिया। यही भारतीय भोजन-संस्कृति की बड़ी विशेषता है—वह बाहर से आई चीज को केवल स्वीकार नहीं करती, उसे बदल देती है। मसाले बदलते हैं, आकार बदलता है, खाने का समय बदलता है, साथ में परोसी जाने वाली चीज बदलती है और कुछ पीढ़ियों बाद लोग पूछने लगते हैं—“यह बाहर की चीज थी?” जलेबी के मामले में भी इतिहास और पहचान के बीच यही रोचक रिश्ता दिखाई देता है।

और शायद जलेबी हमें एक और महत्वपूर्ण बात सिखाती है—हर चीज जो मीठी है, वह जीवन के लिए अच्छी नहीं होती; लेकिन हर चीज जो स्वास्थ्य की दृष्टि से सीमित मात्रा में खानी चाहिए, वह जीवन से निकाल देने योग्य भी नहीं होती। जलेबी आनंद है, पोषण का विकल्प नहीं। त्योहार है, रोज का नाश्ता नहीं। स्मृति है, भोजन की अनिवार्यता नहीं। कभी-कभार गरम जलेबी की खुशबू से बचना भी जरूरी नहीं, लेकिन उसे रोज की आदत बना लेना भी विवेकपूर्ण नहीं।

आखिर में जलेबी की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि उसे बनाने वाला उसे जितना घुमाता है, खाने वाला उतनी ही जल्दी खत्म कर देता है। बनाने में धैर्य, खाने में अधैर्य; बनाने में कला, खाने में लालच; बनाने में चाशनी का इंतजार, खाने में “गरम है क्या?” की बेचैनी। और शायद यही जलेबी का जीवन-दर्शन है—दुनिया चाहे जितनी गोल-गोल घूमती रहे, अंततः मनुष्य की सबसे बड़ी चिंता यही रहती है कि गरम जलेबी कब मिलेगी।

इसलिए अगली बार कोई आपसे कहे कि “बात को जलेबी मत बनाइए”, तो मुस्कुराइए। जलेबी केवल बात को घुमाने का नाम नहीं है। वह सदियों की यात्राओं, संस्कृतियों के मेल, व्यापारिक रास्तों, धार्मिक और सामाजिक परंपराओं, कारीगर की उंगलियों और भारतीय स्वाद की रचनात्मकता से बनी एक खाद्य-कहानी है। **जलेबी की मिठास उसकी चाशनी में जितनी है, उससे कहीं अधिक उसकी कहानी में है—और उसकी कहानी की तरह ही उसका आकार भी हमें याद दिलाता है कि इतिहास कभी सीधी रेखा में नहीं चलता। वह भी अक्सर जलेबी की तरह घूमता हुआ हमारे सामने आता है।**

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