अच्छे दिन कब आएंगे?
मनुष्य की सबसे पुरानी आदतों में एक है—आज में रहते हुए कल की प्रतीक्षा करना। आज कुछ ठीक नहीं है तो मन कहता है, कल ठीक हो जाएगा; आज जेब हल्की है तो उम्मीद रहती है कि अगले महीने कुछ अधिक पैसे होंगे; आज नौकरी में मन नहीं लग रहा तो लगता है कि कभी कोई बेहतर अवसर आएगा; आज मन की कोई इच्छा अधूरी है तो भरोसा रहता है कि एक दिन वह पूरी जरूर होगी। इसी उम्मीद का एक लोकप्रिय नाम है—“अच्छे दिन”। लेकिन सवाल यह है कि आखिर अच्छे दिन आते कब हैं? क्या उनकी कोई तारीख होती है, कोई मुहूर्त होता है, कोई कैलेंडर होता है जिसमें लाल घेरे से लिखा हो कि फलां दिन से जिंदगी बदल जाएगी?
शायद नहीं। अच्छे दिन कोई डाकिया नहीं हैं जो दरवाजे पर दस्तक देकर कहें कि लीजिए, आपकी खुशियां आ गईं। वे अक्सर हमारी जिंदगी में चुपचाप आते हैं और हमें पता भी नहीं चलता। जिस दिन हम किसी चीज के लिए परेशान होते हैं, वही चीज कुछ समय बाद मिल जाए तो हमें लगता है कि अब अच्छे दिन आ गए। लेकिन थोड़े दिनों बाद वही उपलब्धि सामान्य लगने लगती है और मन किसी दूसरी चीज की कमी गिनने लगता है। नौकरी मिली तो पदोन्नति चाहिए, पदोन्नति मिली तो अधिक वेतन चाहिए, वेतन बढ़ा तो अपना घर चाहिए, घर मिला तो बेहतर घर चाहिए। मनुष्य की इच्छाओं का पेट शायद दुनिया की किसी भी अर्थव्यवस्था से बड़ा है—जितना भरिए, उतनी ही नई मांग पैदा हो जाती है।
फिर क्या इच्छाएं रखना ही छोड़ दें? बिल्कुल नहीं। इच्छा मनुष्य को आगे बढ़ाती है। जिस आदमी के भीतर कल को आज से थोड़ा बेहतर बनाने की इच्छा नहीं है, उसके जीवन में ठहराव बहुत जल्दी आ सकता है। समस्या इच्छा में नहीं, इच्छा को जीवन की एकमात्र शर्त बना देने में है। यदि हम यह तय कर लें कि “जब तक यह नहीं मिलेगा, मैं खुश नहीं हो सकता”, तो हम अपनी वर्तमान जिंदगी की सारी खुशियां भविष्य के किसी अनिश्चित खाते में जमा कर देते हैं। फिर जिंदगी चलती रहती है और हम जीने के बजाय इंतजार करते रहते हैं।
अजीब बात यह है कि हमें भविष्य की चिंता वर्तमान से अधिक रहती है। जिस अच्छे दिन के आने की प्रतीक्षा हम दस साल से कर रहे होते हैं, उसके रास्ते में आज का एक पूरा दिन बिना किसी शिकायत के निकल जाता है। सुबह की चाय, बच्चे की हंसी, किसी पुराने दोस्त का फोन, घर लौटते समय ठंडी हवा, मनपसंद गीत, किसी काम के ठीक से हो जाने की छोटी-सी संतुष्टि—ये सब इतने मामूली लगते हैं कि हम इन्हें खुशी की श्रेणी में रखते ही नहीं। हमें खुशी के लिए कोई बड़ी घटना चाहिए। जैसे जिंदगी तब तक जिंदगी नहीं है, जब तक उसमें कोई बड़ी उपलब्धि न जुड़ जाए।
लेकिन जिंदगी बड़ी घटनाओं से कम और छोटी-छोटी निरंतरताओं से ज्यादा बनती है। अच्छे दिन शायद वही हैं जिनमें समस्याएं खत्म नहीं हुईं, लेकिन उनसे निपटने की हमारी ताकत बढ़ गई। परिस्थितियां पूरी तरह हमारे अनुकूल नहीं हुईं, लेकिन हमने उनसे समझौता करना सीख लिया। कुछ इच्छाएं पूरी हुईं, कुछ अधूरी रह गईं और कुछ इच्छाओं के बारे में हमें बाद में समझ आया कि उनका पूरा न होना ही शायद अच्छा था। समय के साथ मनुष्य को यह भी पता चलता है कि हर इच्छा पूरी हो जाना सुख की गारंटी नहीं है। कई बार जिस चीज के लिए हम वर्षों बेचैन रहते हैं, उसके मिल जाने के बाद पता चलता है कि असली जरूरत कुछ और थी।
इसलिए “जैसा चल रहा है, वैसा चलने दो” भी पूरी तरह सही दर्शन नहीं है और “सब कुछ अभी बदल देना है” भी हमेशा समझदारी नहीं। जीवन को नदी की तरह होना चाहिए—बहते रहना, लेकिन दिशा का बोध बनाए रखना। जहां रास्ता बदलना जरूरी हो, वहां मोड़ लेना चाहिए; जहां थोड़ा धैर्य चाहिए, वहां ठहरना चाहिए; जहां मेहनत की जरूरत हो, वहां मेहनत करनी चाहिए और जहां कुछ हमारे हाथ में नहीं है, वहां चिंता का बोझ थोड़ा नीचे रख देना चाहिए। हर चीज को नियंत्रित करने की कोशिश भी मनुष्य को थका देती है।
मन में इच्छाएं हैं तो उन्हें लिखिए, उनके लिए योजना बनाइए, समय दीजिए और जितना संभव हो उतना प्रयास कीजिए। लेकिन अपनी खुशी को केवल उस अंतिम परिणाम से मत बांधिए। मंजिल जरूरी है, मगर रास्ते को सजा-संवारकर चलना भी जरूरी है। क्योंकि हो सकता है मंजिल आने में देर हो और रास्ता ही आपकी जिंदगी का सबसे बड़ा हिस्सा बन जाए।
और शायद अच्छे दिनों का सबसे ईमानदार उत्तर यही है कि अच्छे दिन आने वाले दिनों में ही नहीं होते। वे कभी-कभी आज में भी छिपे होते हैं, बस हम उनसे भविष्य की तारीख पूछते रहते हैं। जिस दिन मनुष्य यह समझ लेता है कि “मुझे आगे भी बढ़ना है और आज को भी जीना है”, उस दिन प्रतीक्षा थोड़ी हल्की हो जाती है। इच्छाएं रहती हैं, सपने भी रहते हैं, संघर्ष भी रहता है, लेकिन बेचैनी अकेली साथी नहीं रहती।
आखिर जिंदगी कोई रेलवे स्टेशन नहीं कि हम प्लेटफॉर्म पर खड़े होकर घोषणा सुनते रहें—“अच्छे दिनों वाली गाड़ी कुछ ही देर में आने वाली है।” हो सकता है जिस गाड़ी का हम इंतजार कर रहे हैं, उसमें हमारी सीट पहले से न हो। और यह भी संभव है कि जिस ट्रेन में हम अभी बैठे हैं, उसमें खिड़की के बाहर का दृश्य हमारी कल्पना से कहीं सुंदर हो। इसलिए सफर जारी रखना चाहिए, टिकट संभालकर रखना चाहिए, जरूरत पड़े तो गाड़ी बदलनी चाहिए और बीच-बीच में खिड़की से बाहर भी देख लेना चाहिए।
अच्छे दिन कब आएंगे? शायद जब सब कुछ मनमाफिक हो जाएगा—लेकिन शायद उससे पहले भी। और मन की सारी इच्छाएं कब पूरी होंगी? शायद कभी नहीं। क्योंकि एक इच्छा पूरी होते ही मन दूसरी इच्छा पैदा कर देगा। इसलिए जीवन का रहस्य इच्छाओं को खत्म करने में नहीं, इच्छाओं के साथ शांतिपूर्वक जीना सीखने में है। कल बेहतर हो, इसके लिए आज प्रयास करते रहिए; लेकिन कल के इंतजार में आज को खराब मत कीजिए। आखिर जो दिन हमारे हाथ में है, वह आज है—और संभव है कि कुछ साल बाद हम इसी आज को याद करके कहें, “वह भी क्या अच्छे दिन थे!”

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