‘मसनद’ शब्द की कहानी दिलचस्प इसलिए है कि इसका सफर तकिये से तख्त और तख्त से सत्ता तक का सफर है। नीचे निबंध में भाषिक व्युत्पत्ति और ऐतिहासिक अर्थ-विकास को अलग-अलग रखते हुए लिखा गया है, ताकि ‘मसनद’ को सीधे शुरू से ही ‘नवाबी सिंहासन’ मान लेने की भूल न हो।
तकिये से तख्त तक : मसनद की कहानी
कुछ शब्द ऐसे होते हैं जो अपने भीतर केवल अर्थ नहीं, पूरा इतिहास समेटे चलते हैं। ‘मसनद’ भी ऐसा ही शब्द है। आज ‘मसनद’ कहते ही आंखों के सामने किसी नवाब, बादशाह या रियासत के शासक की वह ऊंची-सी गद्दी उभर आती है, जिस पर बैठना केवल आराम से बैठना नहीं, बल्कि अधिकार और प्रतिष्ठा का प्रदर्शन भी था। लेकिन मसनद की मूल कहानी इतनी राजसी नहीं थी। उसका रिश्ता सबसे पहले सत्ता से नहीं, सहारे से था—ऐसे सहारे से, जिस पर पीठ टिकाई जा सके।
‘मसनद’ अरबी मूल का शब्द है और इसका संबंध अरबी धातु ‘स-न-द’ (س ن د) से है। इस धातु में किसी चीज के सहारे टिकने, सहारा देने या किसी वस्तु को किसी आधार पर टिकाने का भाव मिलता है। अरबी के आधिकारिक शब्दकोश में ‘मुस्नद’ के मूल अर्थों में वह वस्तु बताया गया है जिस पर सहारा लिया जाए। इसी मूल से ‘इस्तिनाद’ यानी सहारा लेना और ‘इस्नाद’ यानी किसी बात को किसी आधार या व्यक्ति से जोड़ना जैसे शब्द भी बने हैं। इसलिए ‘मसनद’ की सबसे पहली कल्पना को समझने के लिए राजदरबार की चमक-दमक से पहले पीठ के पीछे रखे जाने वाले सहारे को देखना होगा।
भारतीय भाषाओं में प्रचलित ‘मसनद’ का एक सामान्य अर्थ भी यही है—बड़ा तकिया, गाव-तकिया या तकिया लगाकर बैठने की जगह। पुराने समय की बैठने की संस्कृति आज की कुर्सी-सोफा संस्कृति से अलग थी। फर्श पर बैठना सामान्य था और लंबे, मोटे तथा सजावटी तकिये या गद्दे पीठ और शरीर को सहारा देते थे। ऐसे बड़े तकिये को ‘मसनद’ कहा जाने लगा। उर्दू-हिंदी शब्दकोशों में इसके अर्थों में बड़ा तकिया, गद्दी, आसन, तकिया लगाने की जगह और अमीरों की बैठने की गद्दी जैसे अर्थ मिलते हैं।
यहीं से शब्द का अर्थ धीरे-धीरे वस्तु से स्थान की ओर बढ़ा। जिस जगह पर कोई व्यक्ति मसनद लगाकर बैठता था, वह केवल बैठने की जगह नहीं रह गई; सामाजिक हैसियत के अनुसार वह सम्मान की जगह भी बनने लगी। साधारण आदमी जमीन पर बैठा हो और प्रतिष्ठित व्यक्ति ऊंचे गद्दे-मसनद पर—तो दोनों की बैठने की मुद्रा ही सामाजिक अंतर की घोषणा करने लगती थी। मसनद इस तरह धीरे-धीरे आराम का साधन भर न रहकर प्रतिष्ठा का प्रतीक बनने लगी।
यही वह मोड़ है जहां ‘मसनद’ का अर्थ ‘गद्दी’ से जुड़ता है। ‘गद्दी’ स्वयं भी बैठने के स्थान से पद और अधिकार का अर्थ ग्रहण कर चुकी थी। जिस प्रकार आज हम कहते हैं कि फलां व्यक्ति ‘कुर्सी पर बैठा है’, और ‘कुर्सी’ से हमारा आशय केवल लकड़ी या लोहे की बनी वस्तु से नहीं बल्कि पद से होता है, उसी तरह पुराने राजनीतिक-सामाजिक संसार में ‘मसनद’ भी बैठने की वस्तु से आगे बढ़कर अधिकार की सीट बन गई। शब्दकोशों में मसनद के अर्थों में गद्दी, तख्त, सिंहासन, आसन और seat of honour का मिलना इसी अर्थ-विस्तार का प्रमाण है।
यहां एक भाषाई सावधानी जरूरी है। अरबी में ‘मुस्नद’ और ‘मसनद’ एक ही रूप और एक ही अर्थ में हर जगह प्रयुक्त नहीं होते। ‘मुस्नद’ का एक प्रसिद्ध पारिभाषिक अर्थ व्याकरण में विधेय या predicate भी है, जबकि ‘मसनद’ के दूसरे प्रयोग में बैठने का सहारा, आसन या गद्दी का अर्थ विकसित हुआ। इसी तरह इस्लामी हदीस-परंपरा में ‘मुस्नद’ एक विशेष प्रकार के हदीस-संग्रह के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है। इसलिए हर ‘मसनद’ को केवल सिंहासन समझ लेना भाषिक दृष्टि से ठीक नहीं होगा।
लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप की दरबारी और साहित्यिक भाषा में मसनद का एक अलग ही व्यक्तित्व विकसित हुआ। फारसी प्रशासनिक और दरबारी संस्कृति के प्रभाव से ‘मसनद’ केवल बैठने की गद्दी न रहकर प्रतिष्ठित व्यक्ति की विशिष्ट आसंदी बनती गई। जिस व्यक्ति को ऊंची मसनद मिलती थी, वह केवल आराम से बैठने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि सामाजिक या राजनीतिक रूप से ऊंचे दर्जे का व्यक्ति माना जाता था। मसनद की ऊंचाई जैसे-जैसे बढ़ती गई, उसके साथ बैठने वाले की सामाजिक हैसियत भी बढ़ती गई—मानो तकिया धीरे-धीरे सत्ता का वास्तुशिल्प बन गया हो।
फिर आया वह चरण जब मसनद का संबंध सीधे शासक से जुड़ गया। राजाओं और नवाबों के दरबारों में शासक के लिए निर्धारित विशेष आसन, गद्दी या सिंहासन को भी मसनद कहा जाने लगा। यहां ‘मसनद’ अब वस्तु नहीं, राजसत्ता का प्रतीक थी। इस अर्थ में ‘मसनद पर बैठना’ केवल बैठने की क्रिया नहीं थी; इसका अर्थ सत्ता ग्रहण करना, अधिकार संभालना और शासन की वैध स्थिति प्राप्त करना हो गया। ‘मसनद-नशीं’ अर्थात मसनद पर बैठने वाला व्यक्ति और ‘मसनद-नशीनी’ अर्थात उस गद्दी पर बैठने या राजसिंहासन ग्रहण करने की अवस्था जैसे शब्द इसी अर्थ-विकास को स्पष्ट करते हैं।
और यहीं से मसनद का सफर नवाबी मसनद तक पहुंचता है। ‘नवाबी मसनद’ को समझना हो तो इसे किसी एक दिन किसी एक शासक द्वारा बनाई गई कुर्सी की कहानी समझना सही नहीं होगा। यह लंबे समय में विकसित हुई उस दरबारी परंपरा का हिस्सा थी जिसमें शासक की बैठने की जगह स्वयं उसके पद, अधिकार और प्रतिष्ठा की पहचान बन जाती थी। नवाब के सामने रखी मसनद और सामान्य दरबारी के बैठने की जगह एक नहीं हो सकती थी। मसनद की सजावट, ऊंचाई, स्थान और उस पर बैठने वाले व्यक्ति की हैसियत—सब मिलकर दरबार की सामाजिक सीढ़ी को दिखाई देने योग्य बना देते थे।
मसनद का यही अर्थ-विस्तार हमें भाषा के स्वभाव के बारे में भी बहुत कुछ बताता है। मनुष्य पहले किसी वस्तु का नाम रखता है, फिर वही वस्तु किसी सामाजिक व्यवहार का प्रतीक बन जाती है और अंततः उसका नाम उस सामाजिक शक्ति का पर्याय बन जाता है। ‘कुर्सी’ इसका आधुनिक उदाहरण है। कुर्सी पर बैठना शरीर की क्रिया है, लेकिन ‘कुर्सी संभालना’ सत्ता संभालने का मुहावरा है। ठीक वैसे ही ‘मसनद’ पर बैठना कभी शरीर को सहारा देने का साधारण उपाय रहा होगा, लेकिन बाद में ‘मसनद संभालना’ सत्ता और पद संभालने का संकेत बन गया।
मसनद से जुड़े शब्दों की दुनिया इस अर्थ-यात्रा को और रोचक बनाती है। मसनद-नशीं वह जो मसनद पर बैठा हो, और इसका अर्थ आगे चलकर सिंहासन पर बैठा शासक भी हुआ। मसनद-नशीनी का अर्थ सिंहासनारोहण या किसी प्रतिष्ठित आसन पर आसीन होना हुआ। ‘मसनद-आरा’ जैसे प्रयोग में मसनद को सजाने-संवारने का भाव आता है। शब्दों का यह परिवार बताता है कि मसनद अब केवल एक गद्दा नहीं रही थी; उसके चारों ओर सत्ता, दरबार, प्रतिष्ठा और पद की पूरी शब्दावली तैयार हो चुकी थी।
मसनद की कहानी में एक सुंदर विडंबना भी है। उसकी जड़ में है सहारा और उसकी अंतिम सामाजिक छवि है सत्ता। जिस चीज का मूल अर्थ था जिस पर टिककर बैठा जाए, वही आगे चलकर ऐसी जगह बन गई जिस पर बैठने के लिए लोग सत्ता की लड़ाइयां लड़ने लगे। यानी मसनद ने पहले शरीर को सहारा दिया, फिर सामाजिक प्रतिष्ठा को और अंततः राजकीय अधिकार को।
नवाबी दौर में मसनद इसलिए महत्वपूर्ण थी कि वह दरबार में सत्ता को दृश्य रूप देती थी। राजा या नवाब का शासन कितना भी अमूर्त क्यों न हो, उसका एक ठोस प्रतीक चाहिए था—ताज, तलवार, राजचिह्न और मसनद। इनमें मसनद का अपना महत्व था, क्योंकि वह शासक को बाकी लोगों से अलग करके दिखाती थी। जहां बाकी लोग दरबार में उपस्थित होते थे, वहां शासक मसनद पर आसीन होता था। इसीलिए ‘मसनद पर बैठना’ धीरे-धीरे ‘राज करना’ और ‘मसनद छिन जाना’ सत्ता छिन जाने का रूपक बन गया।
मगर इतिहास की विडंबना यही है कि कोई भी मसनद हमेशा किसी एक व्यक्ति की नहीं रहती। शासक बदलता है, मसनद वही रहती है। आज की भाषा में हम कहते हैं—पद स्थायी नहीं, व्यक्ति अस्थायी है। पुरानी दरबारी भाषा शायद इसे और सुंदर ढंग से कहती थी—मसनद रहती है, मसनद-नशीं बदलते रहते हैं। एक नवाब जाता है, दूसरा आता है; एक बादशाह उतरता है, दूसरा चढ़ता है; लेकिन वह गद्दी, वह आसन, वह मसनद अपनी जगह बनी रहती है।
इसलिए ‘मसनद’ का पूरा सफर वास्तव में भारतीय उपमहाद्वीप की सामाजिक और राजनीतिक भाषा का भी सफर है। अरबी की ‘स-न-द’ धातु में निहित सहारे के भाव से निकली मसनद, फारसी-दरबारी संसार और भारतीय भाषाई प्रयोगों में बड़ा तकिया बनी, फिर प्रतिष्ठित आसन और गद्दी बनी, और अंततः शासकीय अधिकार तथा सिंहासन का प्रतीक बन गई। शब्द ने अपना शरीर नहीं बदला, लेकिन उसका अर्थ लगातार बड़ा होता गया।
और शायद इसीलिए ‘मसनद’ शब्द में आज भी एक साथ दो तस्वीरें दिखाई देती हैं—एक में फर्श पर रखा बड़ा-सा गाव-तकिया है, जिस पर कोई थका हुआ आदमी पीठ टिकाकर आराम कर रहा है; दूसरी में वही मसनद है, जिस पर बैठा नवाब अपने दरबार की ओर देख रहा है। पहली तस्वीर में मसनद सहारा है, दूसरी में सत्ता। पहली में वह शरीर को संभालती है, दूसरी में वह शासन की प्रतिष्ठा को। शब्द की यही यात्रा उसे साधारण तकिये से असाधारण प्रतीक बना देती है—और तब समझ में आता है कि मसनद आखिर केवल बैठने की जगह नहीं थी; वह उस युग में यह बताने वाली जगह थी कि कौन बैठ सकता है, कहां बैठ सकता है और उसके बैठने का अर्थ क्या है।

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