कहते हैं, परिस्थितियां प्रतिकूल हों तो मनुष्य के पास मन मसोसकर बैठ जाने के अलावा आखिर बचता ही क्या है? लेकिन शायद यही वह क्षण है जब मनुष्य की असली परीक्षा शुरू होती है। अनुकूल परिस्थितियों में आगे बढ़ना उपलब्धि हो सकता है, पर प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच अपने भीतर की रोशनी बचाए रखना कहीं बड़ी उपलब्धि है। जिंदगी हमेशा हमारे हिसाब से नहीं चलती। कभी मेहनत पूरी होती है, परिणाम नहीं मिलता; कभी सही समय पर लिया गया सही फैसला भी गलत साबित हो जाता है; कभी हम पूरी ईमानदारी से अपनी भूमिका निभाते हैं और बाजी किसी और के हाथ चली जाती है। ऐसे क्षणों में लगता है कि कर्म हार गया और किस्मत जीत गई। मगर क्या सचमुच किस्मत इतनी शक्तिशाली है कि कर्म को हमेशा परास्त कर दे?
किस्मत को समझने की पहली भूल यह है कि हम उसे कोई ऐसी अदृश्य शक्ति मान लेते हैं जो हमारी जिंदगी के सारे फैसले पहले से लिखकर बैठी है। यदि ऐसा होता तो मनुष्य की मेहनत, बुद्धि, साहस, योजना और अनुभव का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता। वास्तविक जीवन में परिस्थितियां हमारे नियंत्रण से बाहर हो सकती हैं, लेकिन उन परिस्थितियों के प्रति हमारी प्रतिक्रिया हमेशा पूरी तरह बाहर नहीं होती। बारिश रोकना हमारे हाथ में नहीं, लेकिन छाता लेकर निकलना या बारिश रुकने का इंतजार करना हमारे हाथ में है। बाजार बदलना हमारे हाथ में नहीं, लेकिन अपने कौशल को बदलते बाजार के अनुरूप ढालना हमारे हाथ में है। किसी व्यक्ति का व्यवहार हमारे नियंत्रण में नहीं, लेकिन उसके व्यवहार के कारण अपनी पूरी जिंदगी को अस्त-व्यस्त होने देना या उससे कोई सबक लेकर आगे बढ़ना काफी हद तक हमारे हाथ में है। शायद किस्मत और कर्म का वास्तविक संघर्ष यहीं नहीं, बल्कि यहीं से शुरू होता है।
कई बार कर्म करते-करते मनुष्य थक जाता है। वह पूछता है—आखिर कब तक? मैंने इतना किया, फिर भी मिला क्या? यही प्रश्न सबसे खतरनाक भी है और सबसे मानवीय भी। क्योंकि लगातार प्रयास के बाद भी परिणाम न मिलना मनुष्य के भीतर यह भ्रम पैदा कर देता है कि शायद प्रयास ही व्यर्थ है। लेकिन बीज बोने और पेड़ बनने के बीच का समय भी तो जीवन का हिस्सा है। खेत में बीज डालने के अगले दिन किसान मिट्टी खोदकर यह देखने नहीं लगता कि बीज ने काम करना शुरू किया या नहीं। वह पानी देता है, मौसम देखता है, खरपतवार हटाता है और इंतजार करता है। कर्म का सबसे कठिन हिस्सा अक्सर कर्म करना नहीं, बल्कि उसके परिणाम आने तक धैर्य बनाए रखना होता है।
सिकंदर की उपमा भी इसी संदर्भ में दिलचस्प है। इतिहास में सिकंदर को विजेता कहा गया, लेकिन किसी भी विजेता की कहानी केवल जीती हुई लड़ाइयों की कहानी नहीं होती। उसके पीछे संसाधन, रणनीति, सैनिक, समय, परिस्थितियां, सहयोगी, विरोधियों की कमजोरियां और असंख्य संयोग भी होते हैं। इसलिए जिंदगी को केवल "हर बाजी जीतने" की कला मान लेना भी खतरनाक है। मनुष्य हर बाजी नहीं जीत सकता। कुछ बाजियां हारनी पड़ती हैं, कुछ से हटना पड़ता है और कुछ में यह समझना पड़ता है कि खेल ही गलत था। असली सफलता शायद हर मुकाबला जीतने में नहीं, बल्कि हार के बाद यह पहचान लेने में है कि अगली बाजी किस तरह खेलनी है।
कर्म पर किस्मत भारी पड़ती हुई दिखाई दे तो सबसे पहले यह देखना चाहिए कि वास्तव में हमारे नियंत्रण में क्या है और क्या नहीं। परिणाम हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता, लेकिन तैयारी होती है। अवसर हमारे हाथ में नहीं होता, लेकिन अवसर मिलने पर तैयार रहना हमारे हाथ में है। दूसरे लोग हमें पहचानेंगे या नहीं, यह हमारे नियंत्रण में नहीं; लेकिन अपने काम की गुणवत्ता सुधारना हमारे नियंत्रण में है। किसी परीक्षा में प्रश्न क्या आएगा, यह हमारे हाथ में नहीं; लेकिन तैयारी कितनी होगी, यह काफी हद तक हमारे हाथ में है। इसी तरह जिंदगी में कुछ दरवाजे बंद हो जाएं तो उसी दरवाजे के सामने बैठकर रोते रहने के बजाय यह देखना अधिक उपयोगी है कि कमरे में कोई खिड़की है या नहीं। किस्मत के साथ संघर्ष करने का पहला तरीका शायद यही है कि अपनी ऊर्जा उन चीजों पर खर्च न करें जिन्हें हम बदल ही नहीं सकते।
किस्मत पलटने का दूसरा नाम अक्सर अवसर पहचानना होता है। इतिहास और व्यक्तिगत जीवन दोनों में ऐसे अनेक अवसर आते हैं जिन्हें पहली नजर में अवसर समझना मुश्किल होता है। नौकरी चली जाना किसी के लिए संकट है, लेकिन वही घटना किसी दूसरे काम की शुरुआत भी बन सकती है। किसी योजना का असफल होना निराशाजनक है, लेकिन उससे यह पता चल सकता है कि योजना में गलती कहां थी। देर से मिलने वाली सफलता भी कभी-कभी अधिक टिकाऊ होती है, क्योंकि तब तक मनुष्य केवल परिणाम नहीं, प्रक्रिया भी सीख चुका होता है। इसलिए किस्मत पलटने का अर्थ हमेशा अचानक कोई चमत्कार होना नहीं है। कई बार किस्मत धीरे-धीरे तब पलटती है जब मनुष्य अपने निर्णय, कौशल, संपर्क, आदत और दिशा बदलना शुरू करता है।
और सबसे महत्वपूर्ण बात—किस्मत पलटने के लिए कभी-कभी अपनी अपेक्षाओं को भी पलटना पड़ता है। हम जिस रास्ते को सफलता का एकमात्र रास्ता मान बैठे हैं, जरूरी नहीं कि वही रास्ता हमें वहां पहुंचाए। जिंदगी में मंजिल से अधिक महत्वपूर्ण कभी-कभी दिशा होती है। अगर रास्ता बंद है तो गति बढ़ाने से कोई लाभ नहीं; दिशा बदलनी पड़ती है। यह स्वीकार करना पराजय नहीं कि कोई योजना काम नहीं कर रही। असली पराजय तब होती है जब हम केवल इसलिए उसी योजना से चिपके रहें क्योंकि हमने उसमें बहुत समय और ऊर्जा लगा दी है।
मनुष्य की सबसे बड़ी ताकत शायद उसकी परिस्थितियों को बदलने की क्षमता से भी पहले अपनी परिस्थितियों का अर्थ बदलने की क्षमता है। वही घटना किसी एक व्यक्ति को तोड़ सकती है और दूसरे को बना सकती है। असफलता किसी के लिए प्रमाण हो सकती है कि वह कुछ नहीं कर सकता, और किसी दूसरे के लिए प्रमाण कि उसे तरीका बदलना होगा। इसलिए प्रतिकूल परिस्थिति अपने आप में न तो जीत है, न हार; वह केवल परिस्थिति है। उसका परिणाम काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि हम उसके साथ क्या करते हैं।
फिर भी यह कहना ईमानदार होगा कि मेहनत करने वाला हर व्यक्ति सफल होगा और मेहनत से हर किस्मत बदली जा सकती है—यह जीवन का पूरा सच नहीं है। दुनिया में असमान अवसर हैं, संयोग हैं, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियां हैं, स्वास्थ्य और पारिवारिक जिम्मेदारियां हैं और ऐसी घटनाएं हैं जिन पर मनुष्य का कोई नियंत्रण नहीं। इसलिए असफल व्यक्ति को केवल यह कह देना कि "तुमने पर्याप्त मेहनत नहीं की", उतना ही गलत है जितना हर सफलता का श्रेय केवल किस्मत को दे देना। मनुष्य कर्म करता है, परिस्थितियां उसके साथ खेलती हैं और परिणाम दोनों के बीच कहीं बनता है।
इसलिए शायद किस्मत पलटने का सबसे व्यावहारिक मंत्र यह नहीं कि किसी चमत्कार का इंतजार किया जाए, बल्कि यह कि अपनी संभावना बढ़ाई जाए। एक रास्ता बंद हो तो दूसरा रास्ता तैयार हो, एक कौशल पुराना हो तो नया कौशल सीखा जाए, एक अवसर छूट जाए तो अगले अवसर के लिए तैयारी बढ़ाई जाए, एक हार मिले तो उससे मिली जानकारी को अगली कोशिश में इस्तेमाल किया जाए। किस्मत के दरवाजे पर दस्तक देते रहना जरूरी है, लेकिन दस्तक देने के साथ यह भी जरूरी है कि जब दरवाजा खुले तो हमारे हाथ में कुछ ऐसा हो जिसे दुनिया के भीतर ले जाया जा सके।
आखिरकार जिंदगी में हर बाजी जीतना संभव नहीं। कभी-कभी सबसे समझदार आदमी भी हारता है और कभी-कभी तैयार हुए बिना कोई व्यक्ति संयोग से जीत जाता है। लेकिन लंबी यात्रा में एक जीत या एक हार से अधिक मायने रखता है कि हम लगातार किस दिशा में जा रहे हैं। सिकंदर होना शायद सारी बाजियां जीत लेना नहीं, बल्कि हार, संयोग, विपरीत परिस्थितियों और अनिश्चितता के बीच भी अपनी अगली चाल सोच पाने की क्षमता है। किस्मत हमारे दरवाजे पर कब दस्तक देगी, यह शायद हमारे हाथ में नहीं; लेकिन दरवाजा खुला रखना, भीतर रोशनी जलाए रखना और दस्तक सुनते ही उठकर दरवाजा खोल देना—यह काफी हद तक हमारे हाथ में है। शायद यही कर्म का वह हिस्सा है, जहां से किस्मत को बदलने की कहानी शुरू होती है।

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