बुधवार, 23 सितंबर 2026

निठल्ले के नोट्स - दीक्षांत समारोह का ज्ञान

दीक्षांत समारोह: चोगे और परेड से बहुत पुरानी है इसकी कहानी

आज किसी विश्वविद्यालय का दीक्षांत समारोह याद कीजिए—मंच पर कुलपति, मुख्य अतिथि और अकादमिक अधिकारी विशेष परिधान में बैठे हैं, विद्यार्थी गाउन और हुड पहने कतारबद्ध होकर सभागार में प्रवेश कर रहे हैं, डिग्रियां प्रदान की जा रही हैं और पूरा आयोजन एक औपचारिक जुलूस या अकादमिक परेड जैसा दिखाई देता है। पहली नजर में यह सब कुछ इतना ‘अंग्रेजी’ लगता है कि स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि क्या दीक्षांत समारोह भी अंग्रेजों की देन है? उत्तर थोड़ा दिलचस्प है। दीक्षांत की मूल अवधारणा भारत में अंग्रेजों के आने से बहुत पहले मौजूद थी, लेकिन आज दिखाई देने वाला गाउन, हुड, कैप और औपचारिक अकादमिक procession मुख्यतः मध्यकालीन यूरोपीय विश्वविद्यालयों की परंपरा से आया है। अर्थात् भारतीय विश्वविद्यालयों ने दीक्षांत का विचार पश्चिम से नहीं लिया; आधुनिक भारतीय विश्वविद्यालयों ने उसके आयोजन के बाहरी रूप में यूरोपीय, विशेषतः ब्रिटिश, विश्वविद्यालयी परंपराओं को अपनाया।

आज के अकादमिक चोगे की जड़ें वास्तव में ब्रिटिश साम्राज्य से भी पुरानी हैं। यूरोप के मध्यकालीन विश्वविद्यालयों में विद्वानों और विद्यार्थियों का संबंध चर्च तथा धार्मिक संस्थाओं से बहुत गहरा था। उस समय सामान्य जीवन में भी वस्त्र व्यक्ति की सामाजिक और पेशागत स्थिति बताते थे। विश्वविद्यालयों में भी विद्वानों की पोशाक उनके पद और शैक्षणिक स्थिति की पहचान बन गई। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय स्वयं बताता है कि उसकी academic robes की परंपरा मध्यकालीन यूरोप के उन वस्त्रों से जुड़ी है जिनसे पहनने वाले का rank और profession पहचाना जाता था; आज की पोशाक में भी मध्यकालीन परंपरा की स्पष्ट निरंतरता दिखाई देती है।

यहां एक और रोचक बात है। जिसे हम आज ‘चोगा’ समझते हैं, वह शुरू से किसी विशेष समारोह के लिए बनाया गया fancy costume नहीं था। यूरोप के मध्यकालीन विश्वविद्यालयों में gown, hood और headgear व्यावहारिक तथा सामाजिक दोनों अर्थ रखते थे। ठंडे मौसम में लंबे वस्त्र उपयोगी थे और धार्मिक विद्वानों की पोशाक से भी उनका संबंध था। धीरे-धीरे अलग-अलग डिग्रियों और विश्वविद्यालयों के लिए इनके रंग, आकार और सजावट निर्धारित होने लगी। Oxford के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार, अकादमिक पोशाक के प्रमुख रूपों में 16वीं शताब्दी तक महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए, जबकि उनकी जड़ें उससे पहले के मध्यकालीन विश्वविद्यालयी जीवन में थीं।

परेड की कहानी भी इसी यूरोपीय विश्वविद्यालयी संस्कृति से जुड़ी है। विश्वविद्यालय केवल पढ़ाई की जगह नहीं थे बल्कि अपने-आप में स्वायत्त academic corporations थे। औपचारिक academic processions में अधिकारी, शिक्षक और degree प्राप्त करने वाले विद्यार्थी निर्धारित क्रम में चलते थे। Oxford के अभिलेख बताते हैं कि मध्यकालीन विश्वविद्यालयी वर्ष के महत्वपूर्ण समारोहों में academic exercises होते थे और degrees confer की जाती थीं; degree देने की प्रक्रिया स्वयं एक औपचारिक सार्वजनिक अनुष्ठान थी। आज जब हम कुलपति, डीन, प्रोफेसर और graduands को एक निश्चित क्रम में सभागार में प्रवेश करते देखते हैं, तो वह उसी लंबे यूरोपीय institutional tradition का आधुनिक रूप है।

लेकिन अब कहानी का सबसे महत्वपूर्ण भारतीय अध्याय शुरू होता है। भारत में शिक्षा पूरी होने पर विद्यार्थी को विदाई देने और उसके आगे के जीवन के लिए तैयार करने की परंपरा वैदिक काल से मिलती है। इसे समावर्तन या समावर्तन संस्कार कहा जाता था। ‘समावर्तन’ का सामान्य अर्थ है—वापस लौटना। विद्यार्थी ब्रह्मचर्य और गुरुकुल-जीवन की शिक्षा पूरी करके गुरु के आश्रम से गृहस्थ या सामाजिक जीवन में लौटता था। इसलिए इसे आधुनिक अर्थ में degree distribution ceremony कहना पूरी तरह सही नहीं होगा, लेकिन कार्यात्मक दृष्टि से इसमें आधुनिक convocation से एक महत्वपूर्ण समानता अवश्य दिखाई देती है: औपचारिक शिक्षा के एक चरण का समापन और विद्यार्थी को सामाजिक जीवन में प्रवेश की अनुमति। उपलब्ध संस्कृत परंपराओं के विवरण में समावर्तन को विद्यार्थीजवन की समाप्ति से जोड़ा गया है।

समावर्तन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा कोई चमकदार पोशाक या मंच नहीं था, बल्कि गुरु का विदाई-संदेश था। तैत्तिरीय उपनिषद् में गुरु द्वारा विद्यार्थियों को दिया गया प्रसिद्ध उपदेश इसी संदर्भ में आता है—“सत्यं वद, धर्मं चर” अर्थात सत्य बोलो और धर्म का आचरण करो। इसके साथ गुरु विद्यार्थी को स्वाध्याय, कर्तव्य, माता-पिता और गुरु के प्रति सम्मान तथा समाज के प्रति उत्तरदायित्व की याद दिलाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो आधुनिक convocation में कुलपति का भाषण जिस भूमिका को निभाता है, प्राचीन भारतीय समावर्तन में उसका केंद्र गुरु का नैतिक और सामाजिक उपदेश था।

समावर्तन में एक प्रतीकात्मक परिवर्तन भी होता था। विद्यार्थी ब्रह्मचर्य के दौरान धारण किए जाने वाले कुछ विशिष्ट चिह्नों को छोड़कर स्नान करता और नए वस्त्र धारण करता था। इसीलिए उसे ‘स्नातक’ कहा जाता था—अर्थात जिसने स्नान करके विद्यार्थी जीवन की एक अवस्था पूर्ण की। उपलब्ध विवरणों में स्नान, पुराने विद्यार्थी-चिह्नों का त्याग, नए वस्त्र धारण करना और गुरु-दक्षिणा देना जैसे तत्व मिलते हैं। यहां ‘स्नातक’ शब्द का इतिहास विशेष रूप से रोचक है, क्योंकि आज हम Bachelor या Graduate को जिस अर्थ में ‘स्नातक’ कहते हैं, उसकी जड़ इसी प्राचीन भारतीय परंपरा में है।

इसलिए अगर किसी प्राचीन गुरुकुल में आज के विश्वविद्यालय जैसा मंच, डिग्री-स्क्रॉल, mortarboard और काला gown खोजेंगे तो निराशा होगी। प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य मूलतः प्रमाणपत्र प्राप्त करना नहीं, बल्कि विद्यार्थी का संस्कार और सामाजिक जीवन के लिए उसका निर्माण था। शिक्षा समाप्त होने पर गुरु विद्यार्थी को केवल यह नहीं बताता था कि ‘तुम पास हो गए’, बल्कि यह भी बताता था कि अब तुम्हें मनुष्य के रूप में कैसा जीवन जीना है। इस दृष्टि से आधुनिक convocation की सबसे मूल्यवान परंपरा—शिक्षा पूरी होने के बाद जिम्मेदारी का बोध—भारत में किसी औपनिवेशिक प्रशासन से आयातित नहीं थी।

यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि ‘प्राचीन भारतीय विश्वविद्यालय’ और ‘गुरुकुल’ एक ही चीज नहीं थे। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला जैसे बड़े शिक्षण केंद्रों की संरचना और कार्यप्रणाली अलग-अलग ऐतिहासिक परिस्थितियों में विकसित हुई थी। नालंदा जैसे बौद्ध महाविहार में हजारों विद्यार्थी और आचार्य रहते थे और शिक्षा अनेक विषयों में दी जाती थी। इसलिए हर प्राचीन शिक्षण संस्था में वैदिक गुरुकुल के समावर्तन संस्कार को हूबहू लागू मान लेना इतिहास को अत्यधिक सरल बना देना होगा। प्राचीन भारत में शिक्षा की अनेक परंपराएं थीं और उनके समापन संस्कार भी एक जैसे नहीं रहे होंगे। हमारे पास समावर्तन के बारे में अपेक्षाकृत स्पष्ट साहित्यिक प्रमाण हैं, लेकिन किसी आधुनिक विश्वविद्यालय जैसी एक समान ‘राष्ट्रीय convocation ceremony’ का प्रमाण नहीं मिलता।

अब प्रश्न आता है कि भारत के विश्वविद्यालयों में यूरोपीय academic dress कैसे पहुंचा। इसका उत्तर आधुनिक विश्वविद्यालय व्यवस्था में है। 19वीं शताब्दी में भारत में आधुनिक शैली के विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई—कलकत्ता, बंबई और मद्रास विश्वविद्यालय 1857 में स्थापित हुए। ये विश्वविद्यालय ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान विकसित उस आधुनिक higher-education system का हिस्सा थे जिसकी संस्थागत संरचना यूरोपीय विश्वविद्यालयों से प्रभावित थी। इसलिए degrees, Senate, Convocation, Chancellor, Vice-Chancellor जैसे संस्थागत ढांचे के साथ औपचारिक academic dress और ceremonial procession की परंपरा भी भारतीय विश्वविद्यालयी संस्कृति में प्रवेश करती गई। लेकिन इसे यह कहना कि ‘अंग्रेजों ने भारत में convocation की परंपरा शुरू की’ ऐतिहासिक रूप से अधूरा कथन होगा; अधिक सटीक बात यह है कि अंग्रेजी शासन ने आधुनिक विश्वविद्यालयी संस्थान और उनके यूरोपीय ceremonial forms भारत में स्थापित किए, जबकि शिक्षा पूर्ण होने पर गुरु से विदाई और सामाजिक जीवन में प्रवेश की भारतीय परंपरा उनसे कहीं पुरानी थी।

दिलचस्प बात यह है कि आज के ‘convocation’ में भारतीय और यूरोपीय परंपराएं एक तरह से मिल गई हैं। गाउन यूरोप का है, लेकिन ‘स्नातक’ भारत का अपना पुराना शब्द है; academic procession यूरोपीय विश्वविद्यालयी संस्कृति से आया, लेकिन गुरु से विदाई और जीवन के लिए उपदेश की अवधारणा भारतीय शिक्षा-परंपरा में बहुत पुरानी है। आज कुछ भारतीय विश्वविद्यालय पारंपरिक gowns को छोड़कर भारतीय पोशाक, अंगवस्त्रम, पगड़ी या संस्थान की स्थानीय पहचान वाले परिधानों का इस्तेमाल भी करते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि वे convocation छोड़ रहे हैं; वे केवल उसके बाहरी प्रतीकों को स्थानीय सांस्कृतिक संदर्भ में ढाल रहे हैं।

और शायद यही इस पूरी कहानी का सबसे सुंदर निष्कर्ष है। दीक्षांत समारोह का असली अर्थ चोगा पहनना नहीं है। चोगा एक प्रतीक है; परंपरा का बाहरी आवरण है। यूरोप ने इसे अपनी विश्वविद्यालयी संस्कृति के अनुसार विकसित किया, ब्रिटिश शासन के माध्यम से यह आधुनिक भारतीय विश्वविद्यालयों में आया और भारत ने इसे अपने ढंग से स्वीकार किया। लेकिन शिक्षा पूरी होने पर गुरु का यह कहना कि अब तुम्हारा ज्ञान केवल तुम्हारा निजी लाभ नहीं, बल्कि तुम्हारे आचरण और समाज के प्रति तुम्हारी जिम्मेदारी है—यह विचार भारतीय बौद्धिक परंपरा में बहुत पहले मौजूद था। तैत्तिरीय उपनिषद् का “सत्यं वद, धर्मं चर” शायद किसी भी आधुनिक convocation address से अधिक संक्षिप्त और गहरा ‘farewell message’ है।

इस दृष्टि से देखें तो विश्वविद्यालय का दीक्षांत समारोह दो सभ्यताओं की मिली-जुली स्मृति है। यूरोप ने हमें उसका ceremonial form दिया—gown, hood, cap और procession; भारत के पास पहले से उसका philosophical core था—शिक्षा की पूर्णता, गुरु की विदाई, ज्ञान के साथ जिम्मेदारी और समाज में लौटने का संस्कार। आज जब कोई विद्यार्थी चोगा पहनकर मंच की ओर बढ़ता है, तो वह केवल डिग्री लेने नहीं जा रहा होता; वह उस बहुत पुरानी मानवीय परंपरा को आगे बढ़ा रहा होता है जिसमें शिक्षा का अंत वास्तव में शिक्षा का अंत नहीं, बल्कि उसके वास्तविक उपयोग की शुरुआत माना जाता है।

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