सोमवार, 8 अप्रैल 2013

टीवी देखिए, भाषा को देखिए !



                       
“भाषा बहता नीर”
“हर दस कोस पर बदल जाती है भाषा”
“भाषा संप्रेषण का माध्यम है”
“टेलीविजन की भाषा सीधी और सरल होनी चाहिए”
-पत्रकारिता और जनसंचार की पढ़ाई से लेकर इन क्षेत्रों में नौकरी करने तक तमाम पत्रकार इन जैसे कितने ही सिद्धांतों से रू-ब-रू होते हैं। पढ़ाई और प्रशिक्षण के दौरान भाषा के बारे में बनी समझ का इस्तेमाल नौकरी के दौरान होता है। लेकिन, ये भी कहना गलत नहीं होगा कि पढ़ाई, प्रशिक्षण और पत्रकारिता की नौकरी के सिलसिले में भाषा के बारे में हर व्यक्ति विशेष की अपनी समझ विकसित होती है जिसके आधार पर वह साल-दर-साल अपने काम को अंजाम देता है। ये जरूरी नहीं कि हर पत्रकार सोची-समझी रणनीति के तहत अपनी भाषा को अपग्रेड करे या नए शब्दों का इस्तेमाल शुरू करे या कुछ शब्दों को अपने इस्तेमाल से हटाए, वाक्य-विन्यास से जुड़े नए प्रयोग करे या यूं कहें कि भाषा से खेले या खिलवाड़ करे। काम की प्रक्रिया में ये सब संभव है जिस पर हम कामकाजी लोग कभी बैठकर विचार नहीं करते। लेकिन समय के साथ जो बदलाव भाषा में आते हैं, वो हंमारे काम, हमारे आउटपुट के जरिए पीढ़ी-दर-पीढ़ी नज़र आते हैं। ये बदलाव सूचना, शिक्षा और मनोरंजन के हर माध्यम में चाहे वो अखबार हो, या रेडियो या फिर टेलीविजन या वेब ही क्यों न हो- अपने-अपने तरीके से दिख रहे हैं।
      आज के दौर में टेलीविजन सूचना, शिक्षा और मनोरंजन का सबसे सशक्त माध्यम है, लिहाजा भाषा की बात करते हुए सबसे पहले और सबसे आसानी से ध्यान टीवी स्क्रीन पर ही जाता है। टेलीविजन पर भाषा का इस्तेमाल ऑडियो-विजुअल माध्यम होने से जुड़े उसके सिद्धांतों को परे छोड़ देता है- हम अक्सर ये भूल जाते हैं कि टीवी की भाषा ऑडियो-विजुअल है, ना कि टेक्स्ट, क्योंकि टेक्स्ट के बिना हमारा काम नहीं चलता। इसे सिर्फ मजबूरी कहें, या अपना पक्ष रखने और अपनी राय जाहिर करने के लिए ऑडियो-वीडियो की क्षमता पर शो प्रोड्यूसर का हावी होना मानें- टेक्स्ट के रूप में भाषा का इस्तेमाल टेलीविजन पर अहम हो गया है-अपनी बात समझाने के लिए हम टेक्स्ट का सहारा लेते हैं और हालत ये है कि स्क्रीन पर पिक्चर कम, टेक्स्ट ही ज्यादा दिखता है। जरूरत इस बात की है कि स्क्रीन पर टेक्स्ट का इस्तेमाल उतना ही हो, जितना बेहद जरूरी हो। ऐसा क्य़ों नहीं होता, इससे जुड़े कई सवाल हो सकते हैं- मसलन बड़ी आसानी से ये कहा जा सकता है कि हम भारतीय टीवीवालों को अभी तक टीवी की समझ नहीं आई। ये भी माना जा सकता है कि हमारे दर्शक इतने परिपक्व नहीं, जो विजुअल, इमेज और साउंड का सही अर्थ ही निकालें, यानी अनर्थ होने और उसके बाद की दूसरी प्रतिक्रियाओं के खतरे ज्यादा हैं। जो भी हो, अगर स्क्रीन पर भाषा का इस्तेमाल जरूरी है, तो उसके कुछ कायदे-कानून भी होने चाहिए- ऐसा भी माना जाता है। लेकिन, कहना न होगा कि जिस तरह, जितनी तेजी से भारत में खासकर हिंदी समाचार और सामयिक घटनाओं से जुड़े टेलीविजन चैनलों का विकास हुआ है, उतनी ही तेजी से भाषा संबंधी तमाम दीवारें टूटती गई हैं।
      देश में समाचार-प्रसारण के लिहाज से सबसे पहले वजूद में आई सरकारी टेलीविजन व्यवस्था ने रेडियो से भाषा उधार ली थी, लिहाजा उसका अपना अनुशासन था, जो काफी हद तक अब भी कायम है। निजी चैनल के तौर पर ज़ीटीवी ने 90 के दशक में “हिंग्लिश” माध्यम में समाचारों का प्रसारण शुरू किया तो उसके पीछे उसकी अपनी सोच थी- एक खास दर्शक वर्ग को पकड़ने की मानसिकता जुड़ी हुई थी। निजी समाचार चैनलों में नंबर 1 आजतक की बुनियाद ही ऐसी भाषा से जुड़ी रही है, जो आम लोगों की समझ के नजदीक हो। आजतक के बाद तमाम दूसरे निजी समाचार चैनलों ने तकरीबन इसी सिद्धांत को अपनाया है और यहीं से एक ऐसी उलझन शुरू हुई, जिसने मीडिया में हिंदी के इस्तेमाल पर सवाल उठा दिए हैं। यहां ये साफ करना जरूरी है कि हिंदी का वजूद खतरे में नहीं है, क्योंकि हिंदी से जो साहित्य-संपदा जुड़ी हुई है वो मीडिया से काफी ज्यादा है। लेकिन अगर मीडिय़ा ने हिंदी को अपनाया है, तो ये भी उसकी जिम्मेदारी है कि टेलीविजन पर इस्तेमाल होनेवाली भाषा के चाल-चरित्र और चेहरे को दर्शनीय-शोभनीय और समादृत रखे। ये मसला भाषा के संस्कार से जुड़ा है। अखबारों और रेडियो में तो हिंदी की अस्मिता बचाए रखने की कोशिश काफी हद तक संभव है क्योंकि भाषा के संस्कार का मामला इन दोनों माध्यमों से जुड़े लोगों की ट्रेनिंग और उनकी विरासत से जुड़ा है। लेकिन जब बात टेलीविजन की आती है, तो अक्सर बड़े चैनलों के पुरोधा इसे आम लोगों की समझ और समय के अनुसार भाषा में बदलाव जैसे थोथे तर्कों से जोड़कर किनारे कर देते हैं।
      टेलीविजन में हिंदी का काफी विस्तार हो चुका है, ऊर्दू और अंग्रेजी के काफी शब्द इसमें शामिल हो चुके हैं। लिहाजा, इसके के इस्तेमाल से जुड़े कई अहम सवाल सामने हैं- पहला और सबसे अहम तो ये कि क्या मीडिया, खासकर टेलीविजन के लिए हिंदी का कोई मानक रूप होना चाहिए? ये सवाल टीवी चैनलों में घोषित या अघोषित तौर पर स्टाइल-बुक लागू करने से जुड़ा है। कई टीवी चैनलों में स्टाइल बुक का इस्तेमाल शुरु हुआ था, जिसे पहले भले ही कड़ाई से अमल में लाया जाता रहा हो, लेकिन अब ये व्यवस्था बेमानी हो चुकी है। हालांकि कुछ चीजें जो अब भी चलती हैं, मोटे तौर पर इसी व्यवस्था की देन कही जा सकती हैं। ज़ीटीवी के हिंग्लिश रूप के लिए जाहिरा तौर पर स्टाइल बुक का कोई-न-कोई खाका जरूर रहा है, बाद के दौर में ज़ी न्यूज़ में डेस्क के लोगों को आजतक और एनडीटीवी जैसे चैनलों से मुक़ाबले के लिए अघोषित तौर पर वैसी ही भाषा इस्तेमाल करने के लिए तैयार किया गया। एनडीटीवी-इंडिया में स्टार ग्रुप से अलग होने से पहले उर्दूदां जबान के इस्तेमाल पर ज़ोर था, लेकिन अब वो परंपरा खत्म हो चुकी नज़र आ रही है। दूसरे चैनलों में भी हिंदी का कमोबेश खिचड़ी रूप ही इस्तेमाल हो रहा है, लिहाजा इसके मानकीकरण की बात बेमानी ही लगती है। मानकीकरण इसलिए भी मायने नहीं रखता क्योंकि आज किसी शब्द-विशेष को कई तरीकों से लिखने की जो परंपरा चल पड़ी है, उसकी ठोस काट किसी संपादक के पास मौजूद नहीं। अगर मौजूद हो भी तो उसे अमल में लाने के झंझट में कोई नहीं पड़ना चाहता। शब्दों को लिखने के तरीके अक्सर विवाद पैदा करते हैं और अपने को सही साबित करने की चुनौती आपसी वैमनस्य भी पैदा करती है, क्योंकि इस मैदान का छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा हर खिलाड़ी अपने आप को तुर्रम खां समझता है क्योंकि वो भी उसी पृष्ठभूमि से आने का दावा करता है जहां से दूसरे सहयोगी आए हों और ज्ञान किसी की बपौती तो है नहीं, ना ही तर्क और कुतर्क का मानवाधिकार किसी से छीना जा सकता है। लिहाजा हालात यही बनते हैं कि बॉस जैसे रिंगमास्टर किसी शब्द की जिस वर्तनी पर अपनी सहमति का ठप्पा लगा देते हैं, उसे ब्रह्मवचन मान कर लोग इस्तेमाल करने लगते हैं..दिलचस्प बात तो ये है कि थोड़े दिनों बाद लोग विवाद को भूल जाते हैं और पुरानी चाल पर अपने दिमाग के कहे मुताबिक फिर वही लिखने लगते हैं, जो उन्हें सही लगता है। इस प्रक्रिया में अर्थ का अनर्थ भी बड़ी आसानी से होता है, लेकिन टेलीविजन में काम करनेवाले लोगों के पास भाषा पर रिसर्च करने का वक्त कहां जो सही-गलत के पचड़े में पड़ें। यहां कुछ ऐसे शब्दों के जोड़े दिए जा रहे हैं, जिन्हें पढ़कर आप खुद फैसला कर सकते हैं कि क्या सही है और क्या गलत, या किस शब्द का इस्तेमाल कहां और किन अर्थों में होना चाहिए-
  • मलिका-मल्लिका
  • मोहब्बत-मुहब्बत
  • चित-चित्त
  • नार्को टेस्ट-नारको टेस्ट
  • दहलीज़- देहलीज़
  • तफतीश- तफ्तीश
  • शर्बत- शरबत
  • अमरीका-अमेरिका
  • जेम्स कैमरॉन- जेम्स कैमरून
  • डेविड कैमरुन-डेविड कैमरॉन
  • देसी-देशी
  • आर्कबिशप-आर्चबिशप
  • खरीदार-खरीददार
  • अंतरराष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय
  • उनतालीस-उनतालिस
  • तिरसठ-तिरेसठ
  • बाईस-बाइस
  • तेईस-तेइस
  • तिरुवनंतपुरम-त्रिवेंद्रम
  • वडोदरा-बड़ौदा
  • ताइपे-ताइपेई
  • रुवांडा-रवांडा
  • इसराइल-इज़रायल-इस्राइल
  • उल्फा-अल्फा
  • इम्तिहान-इम्तेहान
  • इंतिहा-इंतेहा
  • दास्तान-दास्तां
  • कार्रवाई-कार्यवाही
  • मिलिनियर-मिलिनेयर-मिलेनियर
-ये तो चंद उदाहरण है। इनमें कई जोड़े ऐसे हैं जिनमें दोनों शब्द सही हैं- पर अगर किसी चैनल में एक आदमी एक तरीके से और दूसरा दूसरे तरीके से लिखे तो एकरूपता नहीं होगी और बेचारा दर्शक उलझन में पड़ेगा, क्योंकि दर्शक इतनी महीन समझ रखे ही, इसकी उम्मीद नहीं कर सकते, उसे तो लगातार जो चलता दिखेगा, वही उसके लिए सही होगा। साथ ही, ऐसे शब्दों की कमी नहीं जिनके इस्तेमाल में सही-गलत के सवाल अक्सर उठते हैं। ऐसा ही वाक्य-विन्यास के मामले में भी है। टेलीविजन ग्राफिक्स में शब्दों के इस्तेमाल की सीमा होती है लिहाजा अगर सुचिंतित तरीके से समझदारी के साथ शब्दों का चयन और इस्तेमाल न किया जाए तो खबर अधूरी रह सकती है या आप अपने दर्शक तक वो सब नहीं पहुंचा सकते जिसकी वास्तव में जरूरत है। टेलीविजन के समाचार चैनलों की बाढ़ को देखते हुए मार्केट में टिके रहने और आगे निकलने की होड़ है। भाषा तो दर्शकों को माध्यम से जोड़ने का औजार है जो जितना ही पैना होगा, उतना ही गहरा वार करेगा। ऐसे में हिंदी के इस्तेमाल से जुड़े पहलू गंभीर हैं। जरूरत इस बात की है कि पत्रकारिता का प्रशिक्षण देनेवाले मीडिय़ा गुरु अपने चेलों में भाषा का संस्कार डालें और चैनलों के पुरोधा अपना चेहरा खूबसूरत रखने के लिए स्टाइल बुक की खत्म होती परंपरा को कड़ाई से पुनर्जीवित करें, भाषा के मामले में अपनी खास पहचान बनाएं। तभी चैनलों का भी भला होगा और भाषा का भी।
- कुमार कौस्तुभ
18.03.2010

शनिवार, 6 अप्रैल 2013

TV पर शब्दों की फिजूलखर्ची




बोलने में आपकी जेब से कुछ नहीं जाता, लिखने में भी आपकी जेब ढीली नहीं होती, शब्द संपदा बिखरी पड़ी है ठीक वैसे ही जैसे नदी में ढेर सारा पानी प्रवाहित हो रहा हो- दोउ हाथ उलीचिये यही सयानो काम- कुछ ऐसा ही परिदृश्य आजकल हिंदी टेलीविजन समाचार में शब्दों के इस्तेमाल को लेकर देखा जा रहा है। टेलीविजन पत्रकारिता की पढ़ाई करनेवालों को अक्सर ‘थोड़ा कहा, बहुत समझना’ के सिद्धांत पर चलने की व्यावहारिकता सिखाई जाती है यानी लिखिए कम, बोलिए कम और खबर ज्यादा से ज्यादा दीजिए। ऐसा इसलिए क्योंकि टेलीविजन अखबार नहीं है, जहां लंबे-लंबे कॉलम में ज्यादा से ज्यादा बात कहने की छूट हो। हालांकि बदलते आधुनिक हिंदी अखबारी परिदृश्य में इस छूट की सीमा काफी हद तक घट गई है। इसका बढ़िया उदाहरण नवभारत टाइम्स जैसे अखबार है जिनमें छोटे-छोटे न्यूज़ आइटम होते हैं और विज्ञापन से जुड़ी कारोबारी मजबूरियों के तहत सीमित स्थान में पूरी खबर देने का दायित्व होता है। हालांकि अखबारों में संपादकीय पृष्ठ भी होते हैं, जहां कुछ लंबी बातें करने की छूट होती है, जो टेलीविजन में नहीं मिलती। जाहिर है टेलीविजन की अपनी सीमा है। लेकिन समाचार की भाषा में शब्दों के इस्तेमाल के मायने में भारतीय समाचार टेलीविजन कई बार अखबार को पीछे छोड़ता दिखता है। टेलीविजन में खबर देने के कई तरीके होते हैं, ये हम सभी जानते हैं। फिर भी इस पर थोड़ी बात करनी जरूरी है। ब्रेकिंग न्यूज़, टिकर बैंड, टिकर स्क्रॉल, एंकर वीओ, स्टूडियो ग्राफिक, स्टूडियो वीओ, स्टूडियो सॉट, स्टोरी पैकेज, स्पेशल शो – आम तौर पर किसी खबर की शुरुआत से लेकर उसकी परिणति के यही चरण हैं। न्यूज़रूम में कोई भी खबर आती है तो उसके मेरिट के मुताबिक सबसे पहले उसे ब्रेकिंग न्यूज़ की पट्टी और फिर ब्रेकिंग स्टूडियो ग्राफिक और विजुअल के साथ पेश करने की कोशिश होती है। इस प्रक्रिया में खबर पेश करने के लिए शब्दों का चयन और उनका इस्तेमाल काफी महत्वपूर्ण है और यहीं आम तौर पर शब्दों की फिजूलखर्ची सबसे ज्यादा देखने को मिलती है। मसलन अगर किसी को अदालत से सज़ा हुई है तो इस खबर की पहली लाइन को एक पट्टी पर कई तरीकों से लिखा जा सकता है-
‘राजा को 5 साल क़ैद’,
‘राजा को मिली सज़ा’,
‘5 साल जेल काटेंगे राजा’,
‘राजा को हुई पांच साल की सज़ा’,
‘राजा को 5 साल के लिए जाना होगा जेल’,
‘राजा जाएंगे जेल’
‘राजा को कोर्ट ने 5 साल की सज़ा सुनाई’
‘राजा को कोर्ट से हुई 5 साल की सज़ा’
इत्यादि, इत्यादि। ठीक वैसे ही अगर क्रिकेट से जुड़ी किसी खबर की पट्टी लिखनी हो , तो उसके भी कई तरीके हो सकते हैं, मसलन-
‘भारत ने पहली पारी में बनाए 419 रन’
‘भारत : पहली पारी में 419’
‘भारतः पहली पारी-419/10’
‘भारत 419 पर ऑल आउट’
‘भारत के 419 रन’
चंद उदाहरणों से आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं कि सिर्फ एक पट्टी पर चलाने के लिहाज से दोनों खबरों में कौन-कौन सी लाइन बेहतर हो सकती हैं। लेकिन टेलीविजन समाचार के रोजमर्रा के कामकाज से जुड़े लोग किसी न किसी वजह से इसका ध्यान नहीं रख पाते और सही तरीके से खबर दर्शक तक नहीं पहुंच पाती। सीधे तौर पर ये बात पट्टी पर लिखे टेक्स्ट में झलकती है- कभी जगह कम पड़ जाती है, तो कभी जगह ज्यादा हो जाती है, जिससे पट्टी पर लिखा टेक्स्ट बड़ा या छोटा – दोनों तरह से बेढब दिखता है। दूसरी चीज, ये बात साफ नहीं हो पाती है कि आप खबर में बताना क्या चाहते हैं। क्या आप पूरी खबर देना चाहते हैं या दर्शक को अगली लाइन के लिए इंतजार करवाना चाहते हैं । आमतौर पर एक लाइन में पूरी खबर पेश करने की आदर्श स्थिति नहीं देखने को मिलती। दर्शक को खबर के लिए अगली लाइन का भी इंतजार करना ही पड़ता है और ये पट्टी बदलने की स्पीड पर निर्भर करता है कि दर्शक को कितनी जल्दी पूरी खबर मिले।  
अगर ब्रेकिंग न्यूज़ विंडो के साथ ग्राफिक के तौर या स्टूडिय़ो ग्राफिक के रूप में लिया जा रहा हो, तो और भी अजब स्थितियां स्क्रीन पर देखने को मिलती हैं। मसलन अगर आपको एक खबर को कई लाइनों में तोड़कर पेश करना हो, तो आपकी लेखन शैली की असल परीक्षा होनी ही है। यहां आपको एक साथ कई बातों का ध्यान रखना है। एक तो खबर के ज्यादा से ज्यादा हिस्से या उससे जुड़े ज्यादा से ज्यादा तथ्य ग्राफिक प्लेट्स पर दिए जा सकें। दूसरी चीज- क्या आपको टेंपलेट की सीमा का ज्ञान है- अगर आपको ये नहीं पता कि टेंपलेट पर कितने शब्द अधिकतम आ सकते हैं, तो बहुत संभव है कि आपकी खबर की पूरी लाइन ऑन एयर न हो और कुछ शब्द छूटे हुए दिखें। तीसरी बात- अगर टेंपलेट पर शब्दों की सीमा के साथ एलाइनमेंट की सुविधा नहीं दी गई तो आपके लिए खबर की लाइन लिखना और भी चुनौतीपूर्ण है। क्योंकि ऐसी स्थिति में एक लाइन बड़ी, दूसरी लाइन छोटी, तीसरी लाइन और भी छोटी या बड़ी दिख सकती और प्लेट पर ऐसा एलाइनमेंट पेश होगा जो देखने में न तो आकर्षक होगा, ना ही पूरी खबर उसमें समा सकेगी। ऐसे में आपके सामने शब्दों के चयन और उनके इस्तेमाल में सावधानी बरतने की कठिन समस्या खड़ी होती है। खासकर ब्रेकिंग न्यूज़ की स्थिति में जब आपके पास ज्यादा सोचने या टेक्स्ट को बार-बार बदलने के लिए ज्यादा वक्त नहीं होता तो अगर एलाइनमेंट या शब्द सीमा की वजह से एक मात्रा भी प्लेट पर न दिखे, तो लिखनेवाले पर मूर्खता का इल्जाम मढ़ा जाना स्वाभाविक है, भले ही वह ऐसी गलती के लिए पूर्ण रूप से दोषी न हो क्योंकि एक बात तो साफ है कि स्क्रीन पर मोटे-मोटे अक्षरों में दिखनेवाली गलती को कभी माफ नहीं किया जाता, भले ही गलती टेंपलेट की वजह से हो। ऐसे में अपने अनुभव और सूझ-बूझ के इस्तेमाल के साथ-साथ एक और बात गांठ बांध लेनी चाहिए कि अगर हम लिखने में शब्दों की फिजूलखर्ची से बचें तो समस्या काफी हद तक दूर हो सकती है। उदाहरण देने की जरूरत नहीं समझता क्योंकि ऐसे ढेरों उदाहरण आपको हिंदी न्यूज़ चैनलों पर अक्सर दिख जाएंगे, जिनमें छोटी-छोटी गलतियां बड़ा नुकसान कर बैठती हैं। यही बात स्टोरी पैकेज में इस्तेमाल होने वाले ग्राफिक्स प्लेट्स, और चैप्टर प्लेट्स वगैरह में भी दिख सकती है। हालांकि उनकी तैयारी और उनमें सुधार के लिए आपके और आपके ग्राफिक्स आर्टिस्ट के पास पर्याप्त समय होता है लिहाजा, उनके इस्तेमाल में आप बेढब गलतियों से बच सकते हैं।
बात स्टूडिय़ो वीओ या एंकर वीओ या एंकर सॉट या स्टूडियो पैकेज की करें, तो इनमें भी शब्दों की फिजूलखर्ची अक्सर झलकती है। आधुनिक हिंदी न्यूज़ चैनलों के न्य़ूज़रूम में ऐसा माना जाता है और ऐसी परिपाटी भी है कि  दर्शक खबरें देखना चाहते , न कि एंकर को। ऐसे में छोटे से छोटे एंकर लीड लिखना भी कम चुनौती का काम नहीं। माना जाता है कि अगर आपको पैकेज का एंकर लीड लिखना हो, तो खबर की जानकारी सिर्फ से 2 से 3 लाइन यानी अधिकतम 15 सेकेंड में देने की क्षमता होनी चाहिए। लेकिन आमतौर पर ऐसा नहीं दिखता और 18 से लेकर 25-30 सेकेंड तक एंकर को ज्ञान देते देखा जा सकता है। एंकर सॉट के इस्तेमाल में अपेक्षा ऐसी ही होती है कि बाइट में क्या कहा गया है- ये पूरी बात एंकर के जरिए न कहलवाई जाए, बल्कि उसकी ओर इशारा भर हो। स्टूडिय़ो वीओ या एंकर वीओ या स्टूडियो ग्राफिक्स या एंकर ग्राफिक्स के इस्तेमाल में भी शब्दों की फिजूलखर्ची से बचने की कोशिश होनी चाहिए –बातें तथ्यपरक और टु दि प्वाइंट हों, ताकि दर्शक ऊबे नहीं और कम समय में पूरी खबर से रू-ब-रू हो सके।
बात स्टोरी पैकेज की हो, तो उनमें भी शब्दों की फिजूलखर्ची से बचने की सलाह दी जाती है ताकि पैकेज बोझिल न हो। खबरों से जुड़े पैकेज में विश्लेषण की छूट नहीं दी जाती। अगर स्टोरी पैकेज तथ्यपरक है, तो उसमें ग्राफिक्स का इस्तेमाल होना ही चाहिए ताकि दर्शक को बिंदुवार जानकारी मिल सके। वहीं अगर पैकेज गीत-संगीत, फिल्म या किसी और सॉफ्ट स्टोरी से जुड़ा हो, तो उसमें भी विश्लेषण की छूट कतई नहीं दी जा सकती और ऐसी अपेक्षा की जाती है कि वॉयस ओवर के बजाय ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल नेचुरल एंबिएंस का हो। अगर किसी समाचार विशेष के विश्लेषण से जुड़ा पैकेज भी तैयार करना हो, तो टेलीविजन की भाषा में फिजूलखर्ची से बचते हुए उसे हवा-हवाई भाषाई शब्द जाल से बचते हुए बिंदुओं पर आधारित ही बनाया जाना चाहिए।
बात न्यूज़रूम से निकली है तो जरा फील्ड रिपोर्टर्स तक जाना जरूरी है। रिपोर्टिंग में खबर निकालने के साथ-साथ उसे सही तरीके से पेश करना भी बड़ी कला है। लेकिन लाइव की स्थिति में खबर पेश कर रहे बहुत से रिपोर्टर्स भाषा के लिहाज से पंगु होते हैं लिहाजा शब्दों का गैरजरूरी इस्तेमाल करते पाए जाते हैं। जमाना आम-फहम बातचीत की भाषा के इस्तेमाल का है, हिंदी-इंग्लिश का मिला-जुला उपयोग भी काफी बढ़ चला है, ऐसे में रिपोर्टर्स के लिए कम और जरूरी शब्दों में खबर देना कोई बड़ी बात नहीं, जरूरत है सिर्फ थोड़ी सजगता और थोड़ी तैयारी की।
सवाल ये है कि हिंदी न्यूज़ टेलिविजन में शब्दों की फिजूलखर्ची क्यों देखने को मिलती है। इसका एक बड़ा कारण है खबर लिखने की सही ट्रेनिंग की कमी। देश में जिस वक्त प्राइवेट न्यूज़ चैनलों की शुरुआत हो रही थी, उस वक्त स्टाइल बुक का पालन करने का भी रिवाज था,जिसका सार्थक असर टीवी समाचार लेखन पर पड़ता था। अब न तो समाचार लेखन के विशेषज्ञ टेलीविजन में रहे, ना ही ट्रेनर। जो नए लोग टीवी समाचार में आते भी हैं, उनमें तर्क की क्षमता ज्यादा होती है, सीखने की नहीं। दूसरी वजह य़े कि शुरुआती दौर में हिंदी टेलीविजन समाचारों के पुरोधा काफी हद तक भाषा के प्रति आग्रही थे, लेकिन नए दौर में ये बात काफी पीछे छूट गई है। अब तो वैसे अनुभवी लोग भी टीवी समाचार में कम ही हैं जिनकी बात गांठ बांधी जा सके। ऐसे में हिंदी न्यूज़ टेलीविजन में शब्दों का नाजायज इस्तेमाल ज्यादा होने लगा है, जो एक नए किस्म का माहौल तैयार कर रहा है।
-कुमार कौस्तुभ, 06-04-2013,  16.33 PM

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

TV स्क्रीन पर अखबार!


सुनने में आपको भले ही अजूबा लगे, लेकिन रोज ब रोज आप देखें तो साफ हो जाएगा कि भारतीय न्यूज़ टेलीविजन की एक बड़ी सच्चाई यही है कि अब आपका टेलीविजन स्क्रीन अखबार की शक्ल ले चुका है। अखबार यानी खबरों का पुलिंदा, खबरों से भरे पन्ने, काले हरफों से भरपूर सफेद पन्ने। स्टील तस्वीरें। ढेर सारे विज्ञापन। सही है न आपको यही सब तो न्यूज़ चैनलों पर दिखता है। फर्क सिर्फ इतना है कि कागजी अखबार में खबरें उतनी तेजी से अपटेड नहीं होतीं, जितनी तेजी से टेलीविजन या इंटरनेट की खबरी वेबसाइट पर होती हैं। खबरी वेबसाइट शायद अखबारों के ज्यादा करीब हैं क्योंकि उनमें पेज बदलने की या एक पन्ने से दूसरे पन्ने पर जाने और पिछले पन्ने पर फिर से वापसी की सहूलियत होती है, जो टेलीविजन में नहीं होती। टेलीविजन न्यूज़ चैनल के स्क्रीन का हर पन्ना आम तौर पर नया होता है, कुछ न कुछ नयापन लिये होता है, पिछले पन्ने या गुजर चुकी खबरों पर वापसी तब तक वापसी नामुमकिन होती है, जब तक कि न्यूज़ चैनल की ओर से किसी खास प्रयोजनवश या फिर FPC  यानी फिक्स्ड् प्वाइंट चार्ट की मजबूरी के तहत उसे रिपीट न किया जाए। पुराना माल दोहराते वक्त भी अपडेट करने की पूरी गुंजाइश रहती है और ऐसा होता भी है यानी बात फिर वही कि टेलीविजन का हर बुलेटिन किसी न किसी रूप में नया होता है, ताजा होता, बासी नहीं होता, हां उबाऊ हो सकता है क्योंकि उसकी अपनी सीमाएं हैं और दर्शकवर्ग की अपनी उम्मीदें और आकांक्षाएं हैं, जिन पर हमेशा खरा उतरना न तो संभव है, ना ही इसके पीछे कोई मजबूरी होती है। अगर आपने टेलीविजन पर एक बार कोई बुलेटिन देखा तो आखिर एक या दो या चार घंटे बाद उसमें कितना नयापन हो सकता है- ये कई चीजों पर निर्भर करता है। पहली बात ये कि बुलेटिन रिपीट करने तक कितनी नई खबरें उसमें शामिल की गई हैं। दूसरी बात ये कि कितनी पुरानी खबरों में नए बिन्दु जुड़े हैं और तीसरी और सबसे अहम बात ये कि बुलेटिन का कलेवर और प्रस्तुति कितना बदला है। प्रस्तुति तो एंकर या प्रेजेंटर के बदलने के साथ बदल सकती है- देखना ये होगा कि अलग-अलग एंकर किसी एक खबर को कितने तरीकों से पेश करते हैं- हालांकि ये भी काफी हद तक प्रस्तुतकर्ता यानी प्रोड्यूसर और बुलेटिन तैयार करनेवालों पर निर्भर करता है कि क्या वो एंकर को स्टूडियो लीड कुछ बदलाव के साथ पढ़ने के लिए दे रहे हैं, क्या वो स्टोरी पैकेज में या हरेक आइटम में किसी न किसी स्तर पर कुछ वैल्यू एडिशन करके बुलेटिन में शामिल कर रहे हैं या फिर जैसे का तैसा उसे रिपीट कर दे रहे हैं। ऐसी स्थिति आमतौर पर रात के बुलेटिन या समाचार आधारित शो को सुबह के वक्त रिपीट करने में अक्सर देखी जाती है , लिहाजा वही दर्शक जिसने रात का बुलेटिन या कोई शो देखा हो, वो सुबह उसी प्रस्तुति को देखने के लिए चैनल पर रुक नहीं सकता- ये आदर्श स्थिति है, जिससे कोई इंकार नहीं कर सकता। हां, ये सच है कि आप अपने मनमुताबिक किसी भी बुलेटिन या शो को नहीं देख सकते, लेकिन आप अखबार के हर पन्ने को जब जी चाहे, अपनी इच्छानुसार पढ़ जरूर सकते हैं। ये तो टेलीविजन और अखबार का बुनियादी फर्क है जो हमेशा बरकरार रहेगा । लेकिन जब ये कहा जाता है कि टेलीविजन न्यूज़ चैनल अखबार की जगह ले रहा है, तो कई और बिंदुओं पर विचार करना जरूरी हो जाता है।
अखबार और टेलीविजन के बीच घटती दूरी का सबसे बड़ा उदाहरण है उन खबरों को न्यूज चैनलों पर परोसा जाना, जो सुबह के अखबार में छप चुकी होती हैं। सवाल उठता है कि क्या अखबार टेलीविजन न्य़ूज़ चैनलों पर हावी हो रहे हैं। विस्तार से गौर करें तो ये बात काफी हद तक ठीक लगती है। आमतौर पर भारत में टेलीविजन के न्यूज़ चैनलों की रोजाना दशा और दिशा अखबारी खबरें तय करती हैं। वजह – क्या टेलीविजन के पत्रकारों के पास वो खबरें सुबह तक नहीं होतीं, जो अखबारों के पास रात को ही आ जाती हैं, जिससे वो उन्हें छाप कर पाठकों तक पहुंचा देते हैं, क्या टेलीविजन पत्रकारों को खबरों की परख नहीं, समझ नहीं या उन पर पकड़ नहीं? – वजहें चाहे जो भी हों, लेकिन बड़ा सच ये है कि अखबारी खबरों, खासकर राजनीतिक खबरों के आधार पर ही आमतौर पर टेलीविजन का डेप्लान तैयार होता है और सुबह 6 बजे से मध्यरात्रि तक उन्हीं खबरों की बाल की खाल निकाली जाती है, जिन्हें अखबार पहले ही छाप चुके होते हैं। टेलीविजन न्यूज़ चैनलों की अपनी सीमाएं हैं। ऐसा माना जाता है कि विजुअल मीडियम होने की वजह से टेलीविजन के पत्रकारों को अपनी किसी भी खबर को चलाने के लिए तस्वीरों और ध्वनि का सहारा लेना पड़ता है ताकि खबर की सत्यता प्रमाणित हो सके। तस्वीरें किसी घटना की हो सकती हैं, या दस्तावेजों के रूप में हो सकती हैं, या फिर किसी खास व्यक्तिविशेष की आवाज के जरिए किसी खबर को पुष्ट किया जा सकता है। लेकिन जब कोई खबर अखबार में छप चुकी होती है तो उसे इस्तेमाल करने के लिए किसी विजुअल या ऑडियो रिसोर्स की बाध्यता नहीं होती क्योंकि खबर की पुष्टि हो चुकी होती है और आम तौर पर खंडन तभी होता है जब खबर आरोप-प्रत्यारोपों से जुड़ी हो। भले ही टेलीविजन की अपनी सीमा है, और कितनी भी दलीलें क्यों न दी जाएं लेकिन अखबारी खबरों का इस्तेमाल कहीं न कहीं इस कड़वी सच्चाई को जरूर दर्शाता है कि टेलीविजन पत्रकारिता अखबारी पत्रकारिता से कहीं न कहीं पिछड़ जरूर रही है। तमाम आधुनिक संसाधनों और सुविधाओं के होते हुए अखबारी खबरों का इस्तेमाल ये साफ कर देता है कि टीवी पत्रकार खबरों की दौड़ में पीछे रह जाते हैं। राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक खबरों के मामले में ऐसा अक्सर देखने को मिलता है। हां, दुर्घटना और हादसों से जुड़ी खबरों के मामले में टीवी जरुर आगे निकल जाता है और वो खबरें पहले टीवी पर फिर अखबारों में देखने को मिलती हैं – जिसकी वजह ये है कि अखबार की भी अपनी सीमा है और जिम्मेदारी है दिनभर की खबरों को समेटकर अगली सुबह पाठकों के सामने पेश करने की। जमाना बदल गया है और हमारे पास खबर हासिल करने के तमाम संसाधन हैं, ऐसे में अखबार की कोई बड़ी खबर बासी भले ही लगे, लेकिन अक्सर अखबार टेलीविजन को पछाड़ते दिखते हैं और आगे भी निकल जाते हैं क्योंकि वही टेलीविजन प्रोग्रामिंग का एजेंडा तय करते हैं।
अखबार और टेलीविजन में दूर होते फर्क का दूसरा अहम नमूना है टीवी स्क्रीन पर बढ़ता टेक्स्ट का चलन। टेलीविजन पत्रकारिता के छात्रों को सबसे पहले आमतौर पर यही पढ़ाया जाता है कि टेलीविजन ऑडियो-विजुअल माध्यम है और टेलीविजन पर समाचारों की प्रस्तुति का मकसद है तस्वीरों और आवाज के माध्यम से खबरों की प्रस्तुति, खासकर ये सिद्धांत सामने आता रहा है कि टेलीविजन में शब्दों का कम से कम इस्तेमाल हो और विजुअल और ऑडियो के जरिए ही खबरी घटनाक्रम को बयां करने की प्रैक्टिस हो। सैद्धांतिक तौर पर ये स्थिति बेहद महत्वपूर्ण है, दुनियाभर के टेलीविजन न्यूज़ चैनलों में इसका पालन होता है और कोशिश ये होती है कि दर्शकों को खबरी घटनाक्रम से ज्यादा से ज्यादा जोड़ा जाए। विजुअल ताकतवर हों, आवाज दमदार हो, तो खबर का हर पहलू खुद-ब-खुद खुलकर सामने आ सकता है- ये सिद्धांत भी काफी अहम है। लेकिन हर खबर के लिए विजुअल और ऑडिय़ो तत्व मौजूद हों, ये संभव नहीं। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए ग्राफिक्स और एनिमेशन के इस्तेमाल की परंपरा शुरु हुई, ताकि जिन बातों को कहने के लिए तस्वीरें न हों, उन्हें ग्राफिक्स और एनिमेशन के जरिए बयां किया जाए। ग्राफिक्स और एनिमेशन ने अपनी इस भूमिका को हद से ज्यादा निभाय़ा है। बल्कि कहना न होगा कि समाचार प्रस्तुति में उन्होंने नए आयाम भी जोड़े हैं। खबरों से लेकर बुलेटिन और खास कार्यक्रमों तक को नया और आकर्षक कलेवर देने में ग्राफिक्स और एनिमेशन से जुड़े तत्वों की बेहतरीन भूमिका है। साथ ही, जहां तक खबरों का सवाल है तो हर पल बदलते फ्रेम के साथ बदलते दर्शकों को घटनाक्रम से जोड़े रखने, उससे इंट्रोड्यूस कराने में टेक्स्ट यानी शब्दों की भूमिका भी कम नहीं । और यही वो स्थिति है जो टेलीविजन को अखबार के और करीब ले जाती है। अगर आप टेलीविजन के न्य़ूज बुलेटिन की किसी स्टोरी को देखें तो उसमें कई ऐसे तत्व नजर आते हैं जहां टेक्स्ट की प्रमुखता है – टॉप बैंड, लोअर बैंड, नेम सुपर/एस्टन, चैप्टर प्लेट, प्वाइंटर प्लेट्स, टू विंडो, थ्री विंडो, फोर विंडो वगैरा तमाम चीजें आजकल किसी भी आम या खास न्यूज स्टोरी पैकेज के अभिन्न अंग दिखते हैं। इनके अलावा, जैकेट, नाउ शोइंग बग, कमिंग अप बैंड, चैनल लोगो, टाइम बैंड, टिकर, न्यूज स्क्रॉल आदि-आदि तो हमेशा स्क्रीन पर दिखनेवाली चीजें हैं। यानी कुल मिलाकर स्क्रीन का 50 से साठ फीसदी हिस्सा टेक्स्ट आधारित इन्हीं ग्राफिक्स एलिमेंट्स के नाम हो जाता है । ये चीजें स्क्रीन पर आती जाती रहती हैं लिहाजा विजुअल्स की निरंतरता को प्रभावित करती हैं। दर्शक बार-बार डिस्टर्ब होता है और स्टोरी से नहीं जुड़ पाता ऐसा कई लोगों का मानना है । वैसे कई टेलीविजन विशेषज्ञ ये भी मानते हैं कि स्क्रीन पर जल्दी-जल्दी बदलाव दिखता है तो नयापन दिखता है और दर्शक ऊबता नहीं। मान्यताएं अलग-अलग हो सकती हैं। लेकिन इस सच्चाई से कतई इंकार नहीं किय़ा जा सकता है कि स्क्रीन पर विजुअल से ज्यादा टेक्स्ट का दिखना किसी टेबलॉयड को पढ़ने से कम नहीं जिसमें बड़ी तस्वीरें और छोटे-बड़े टेक्स्ट से पेज भरा होता है।
भारत में न्यूज़ टेलीविजन अब भी संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। एक तरफ टीआरपी की होड़ में गलाकाट प्रतियोगिता और उससे जुड़ी नकल की भेड़चाल है, तो दूसरी ओर अपने-अपने स्क्रीन को अलग दिखाने की कोशिश । ऐसे में टेलीविजन और अखबार की बढ़ती करीबी या बढ़ता तालमेल खबरों के हिसाब से भले ही जरूरी हो, लेकिन मजबूत टेलीविजन पत्रकारिता के लिहाज से कतई प्रासंगिक नहीं है।
-          कुमार कौस्तुभ, 05.04.2013, 17.49 PM

सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

'समाचार वाचक' की 'अकाल मृत्यु'


"तो ये थीं खबरें अभी तक, आप देखते रहिए आज तक"- बुलेटिन की ये टैग लाइन अब भी टीवी के उन दर्शकों को सुरेंद्र प्रताप सिंह की याद दिला देती है, जो भारत में टेलीविजन समाचार के उत्थान के गवाह रहे हैं। सुरेंद्र प्रताप सिंह का चेहरा और उनका अंदाज-ए-बयां तो एक मिसाल भर है, भारत में टेलीविजन पर समाचार देखने में दिलचस्पी रखनेवालों लोगों को दूरदर्शन समाचार के वो तमाम चेहरे भी जेहन में हमेशा ताजा रहेंगे, जो अब कहीं नहीं दिखते, मसलन जेवी रमन, शम्मी नारंग, सलमा सुल्तान, सरला माहेश्वरी, अविनाश कौर सरीन, सुनीत टंडन...ये ऐसे तमाम चेहरों की फेहरिस्त है, जिनके नाम सामने आते ही, भारत के टीवी समाचार दर्शकों की कई पीढ़ियां रोमांचित हो उठती हैं...अगर इनमें से किसी की तस्वीर अब भी सामने आ जाए, तो लोग इन्हें नहीं भूलेंगे..भारत में टेलीविजन की समाचार प्रस्तुति का पर्याय बन चुके इन चेहरों की फेहरिस्त को कुछ और आगे बढ़ाएं तो कुछ ऐसे चेहरे भी सामने आते हैं, जो आज भी भारतीय टेलीविजन के अलग-अलग चैनलों पर दिख जाते हैं और सहसा आम दर्शक उन्हें पहचान लेते हैं...जैसे डॉ. प्रणय रॉय, विनोद दुआ, राजदीप सरदेसाई, संजय पुगलिया, आशुतोष, पुण्य प्रसून वाजपेयी, निधि कुलपति, रवीश कुमार, अभिज्ञान प्रकाश, दीपक चौरसिया...ये टेलीविजन समाचार चैनलों के वो चेहरे हैं, जिन्होंने न सिर्फ समाचार प्रस्तुति से बल्कि पत्रकारिता की अपनी धार से टेलीविजन समाचार की दुनिया में अपनी पहचान बनाई। लेकिन दूरदर्शन से लेकर निजी चैनलों तक टेलीविजन समाचार करीब डेढ़-दो दशकों के सफर का जो दौर हमने देखा है, उससे साफ जाहिर है कि इंडस्ट्री में नई तकनीक के इस्तेमाल, नवीनता और कुछ नया करने-दिखाने की चाहत की जद्दोजहद के बीच उस स्क्रीन पर उभरने वाले उस चेहरे की अकाल-मृत्यु हो गई, जिसे शुरुआती दौर में समाचार-वाचक कहा जाता था।
दरअसल, टेलीविजन स्क्रीन पर समाचार पेश करनेवाले शख्स को समाचार वाचक या न्यूज़ रीडर कहना हमें भारत में रेडियो से मिला, जिसकी साफ वजह ये है कि भारतीय रेडियो सेवा आकाशवाणी में शुरुआत से ही समाचार सुनानेवालों को समाचार वाचक कहने की परिपाटी शुरु हो गई थी और बुलेटिन को ऑन एयर करने की परिकल्पना में शामिल मुख्य शख्सियत को निर्माता या प्रोड्यूसर कहा जाता था। ये शब्दावली भी शायद बीबीसी जैसे संस्थान  से उधार ली गई होगी, जिसके आधार पर हमारे यहां रेडियो और टेलिविजन सेवा की शुरुआत हुई।
वक्त बदला..नवीनता आई..प्रस्तुति में बदलाव शुरु हुए और समाचार वाचक की पदवी भी आकाशवाणी से लेकर टेलीविजन तक में बदलकर न्यूज़ एंकर हो गया..समाचार चैनलों में न्यूज़ एंकर बनना अब बड़े फख्र की बात समझी जाती है..पत्रकारिता की पढ़ाई करनेवाला हर छात्र रिपोर्टर बनना चाहता है, तो हर छात्रा न्यूज़ एंकर बनने का ख्वाब देखती है...समाचार चैनलों में न्यूज़ एंकर की कुर्सी तक पहुंचने के लिए तमाम पापड़ बेलने को लोग तैयार रहते हैं...इसके पीछे छुपी रहती है छोटे पर्दे पर चेहरा दिखने की चाहत...लेकिन अगर गहराई से सोचा जाए और वर्तमान परिस्थितियों का अध्ययन करें तो साफ पता चलता है अब पिचासी प्रतिशत न्यूज़ एंकर्स की कोई पहचान नहीं है...आम दर्शक उनका नाम तक नहीं जानते, उन्हें याद नहीं रख पाते...क्या यही परिणती है इस 'हॉट फेवरेट' कुर्सी को पाने की ..वाकई ये दशा काफी चिंताजनक है..आवाज चाहे कितनी ही बेहतरीन क्यों न हो, प्रेजेंटेशन कितना ही नाटकीय और कितना ही कथित तौर पर बेहतरीन क्यों न हो, लेकिन दर्शकों के दिलोदिमाग पर ये सब क्यों नहीं कोई छाप छोड़ पाते, ये शायद कभी किसी स्वनामधन्य एंकर ने नहीं सोचा होगा। वजह ये है कि संस्थान के दूसरे कारिंदों की तरह वो भी नौकरी बजाते हैं और लगातार घंटों बुलेटिन पढ़ने के बोझ से इतने दबे होते हैं कि उन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं होती कि बॉस के अतिरिक्त किसी और को उनका प्रेजेंटेशन कितना अच्छा लग रहा है या नहीं। ये एक परिस्थिति है, जिससे , मेरा मानना है कि तमाम निजी समाचार चैनलों के दूसरे-तीसरे दर्जे के न्यूज़ एंकर दो-चार होते हैं। न तो वो होम वर्क कर पाते हैं, ना ही अपने-आप को अपडेट रखने की कोशिश करते हैं..चेहरे की बदौलत कमाई करने वाली तमाम महिला एंकर्स को खबरों की ए-बी-सी-डी पता नहीं होती और अगर वो कोई गलती करें, तो इसके लिए डेस्क के कारिंदे दोषी होते हैं कि वो वक्त रहते उन्हें अपडेट क्यों नहीं कर सके..सवाल टीम की जिम्मेदारी पर आकर टिक जाता है, जिसके लिए कब कौन कितना दोषी होता है, ये समय और परिस्थितियों पर छोड़ दिया जाए तो अच्छा।
बात न्यूज़ एंकर की हो रही है, तो जरा और तफसील से सोचें कि आखिर क्या है न्यूज़ एंकर का काम..कहां से आई है ये शब्दावली...इतिहास और सामान्य़ ज्ञान की गहराई में जाएं तो विकिपीडिय़ा के सौजन्य से पता चलता है कि ये शब्द अमेरिका से आयातित है। वीकिपीडिय़ा में दी गई जानकारी के मुताबिक, न्यूज़ एंकर और मिलते-जुलते शब्दों न्यूज़कास्टर, न्यूज़ प्रजेंटर का इस्तेमाल पहले पहल अमेरिका में शुरु हुआ। समाचार पेश करनेवालों के लिए एंकर शब्द का इस्तेमाल 1952 के आसपास एक गेम शो में पैनल के प्रमुख सदस्य को उद्धृत करने के लिए किये गए शब्द से उधार लेकर किया गया।  वैसे, वीकिपीडिया एंकर शब्द को खेलों की ट्रैक एंड फील्ड प्रतियोगिताओं में सबसे तेज़ धावक की पोजिशन से भी जोड़ता है और बाद में इस शब्द का इस्तेमाल समाचार से जुड़े शो में संवाददाताओं के पैनल के एक स्थाई सदस्य के रूप में  बताता है, जिसे आगे चलकर खास कार्यक्रमों की कवरेज करनेवाले शो के होस्ट और न्यूज़ प्रेजेंटर के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा।
साफ जाहिर है कि न्यूज़ एंकर का काम कितना चुनौतीपूर्ण है और उन पर दर्शकों को खबर को शुरु से अंत तक समझाने की कितनी बड़ी जिम्मेदारी होती है। आज के दौर में भारतीय समाचार चैनलों में ज्यादातर न्यूज़ एंकर किस तरह अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करते हैं, ये किसी से छिपा नहीं है। जैसे जहाज को समंदर में खड़ा होने के लिए 'एंकर' की जरूरत होती है, ठीक उसी तरह खबरों को एक सीमा तक ले जाकर छोड़ देने से ज्यादा कुछ और जिम्मेदारी हमारे न्यूज़ एंकर्स में नहीं देखी जाती। इसके बाद खबर किस ओर जाएगी, ये तय करना समाचार चैनलों के डेस्क के कारिंदों का हो जाता है और आखिरी तौर पर जिम्मेदार भी वही होते हैं जो बुलेटिन के प्रोड्यूसर होते हैं, आउटपुट की जिम्मेदारी संभालते हैं। लेकिन सवाल फिर भी यही है कि समाचार वाचक से न्यूज़ एंकर तक के सफर में क्या-क्या बदला।
पुराने गुजरे जमाने में जब समाचारों की पैकेजिंग की परिपाटी नहीं रही होगी, तब के समाचार वाचकों पर समाचार के आइटम की हर लिखी हुई पंक्ति पढ़कर सुनाने की जिम्मेदारी थी..काम काफी हद तक मशीनी था, वहां सिर्फ आपकी आवाज और थोड़ी नाटकीयता से काम चल जाता था। 90 के दशक के अंत और 21वीं सदी की शुरुआत में लाइव टेलीविजन समाचार ने समाचार प्रस्तुति में बड़ा बदलाव ला दिया और इसके साथ ही समाचार वाचकों की भूमिका बदली और वो समाचार पढ़ने से आगे बढ़कर समाचार की नैया को समुद्र में पार लगाने की दिलचस्प भूमिका में आ गए...ये कम से कम भारत में टेलीविजन समाचार के उस दौर की दास्तान है, जब देश में निजी समाचार चैनलों का उदय हो रहा था, प्रतियोगित बढ़ रही थी, टीवी मीडिया संस्थानों के मालिकों और संपादकों पर नया कर दिखाने और मैदान में अपने-आप को बड़ा मजबूत साबित करने की कड़ी चुनौती थी। दूरदर्शन के एकाधिकार से समाचार को बाहर निकालने के संक्रमण के उस दौर ने समाचार वाचकों के न्यूज़ एंकर्स के रूप में बदलाव को कागज से टेलीप्रॉंम्पटर और फिर टॉकबैक से स्क्रिप्ट तक शिफ्ट होते देखा। जो समाचार वाचक खुद को नई तकनीक और जरूरतों के काबिल बनाकर मैदान में बने रहे, और जो खुद को नहीं बदल सके, उन्हें मैदान से हटना पड़ा और नए चेहरों ने उनकी जगह ले ली। दर्शक एक ही जैसे चेहरे देखकर उब न जाए, चैनलों की इस मानसिकता ने भी तमाम पुराने चेहरों को जगह खाली करने के लिए मजबूर कर दिया और जो समाचार वाचक कभी टेलीविजन की शान हुआ करते थे, वो गुमनामी के अंधेरे में खो गए।
भारतीय टेलीविजन के संक्रमण काल का जो दौर अभी चल रहा है, उसमें न्यूज़ चैनलों की बाढ़ सी आ गई है। राष्ट्रीय चैनलों के बाद क्षेत्रीय चैनलों की बहुतायत ने दर्शकों के सामने इतना कुछ परोस दिया है, जो देख पाना औऱ रजिस्टर कर पाना आम दर्शक के लिए दुरुह है। लोगों के पास रिमोट कंट्रोल के बटन हैं और नापसंदगी जाहिर करते हुए चैनल बदलने का पूरा हक है यानी किसी एक या दो चैनल को देखने की मजबूरी नहीं है। दर्शक खुद ये तय कर सकता है कि वो क्या देखना चाहता है। बात समाचार चैनलों की हो रही है, तो खास समय में भी पचासों चैनल बदल-बदलकर देखने का विकल्प खुला हुआ है। चैनल पचासों हैं, तो बुलेटिन भी सैकड़ों-हजारों होंगे क्योंकि अब ,समाचारों के लिए अलग टेलिविजन चैनल हैं और उन पर 24 में से 12 घंटे तो समाचार बुलेटिन आते ही हैं। जाहिर सी बात है कि बुलेटिन की भरमार है तो एंकर भी सैकड़ों होंगे। ऐसे में कोई दर्शक अब शिद्दत से किसी खास चेहरे से समाचार जानने-सुनने को बाध्य नहीं। एंकरों की इस भीड़ को देखते हुए सवाल फिर भी वही है कि किसी भी चैनल का कोई चेहरा आंम दर्शकों के लिए खास क्यों नहीं बन सका। रवीश कुमार और दीपक चौरसिया जैसे कुछ चेहरे अपवाद हो सकते हैं, लेकिन उनके अपवाद होने की वहज है, वो ये है कि उन्होंने अपनी पहचान अपनी खास रिपोर्टिंग से बनाई है, न कि समाचार बुलेटिन पढ़कर। ऐसे में अगर किसी आम न्यूज़ एंकर को दर्शक याद नहीं रख सके, तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है। क्या न्यूज़ एंकर खुद जिम्मेदार हैं कि वो अपनी अलग पहचान न बना सके, या फिर टेलीविजन स्क्रीन का वो एंकर फ्रेम जिम्मेदार है, जिसके जरिए उन्हें स्क्रीन पर पेश किया जाता है, ..एंकर फ्रेम से मतलब स्क्रीन पर एंकर की प्लेसमेंट से है- किसी चैनल पर एंकर कमर तक नजर आता है तो कही आपाद मस्तक। कहीं, पासपोर्ट साइज़ तस्वीर जैसा फ्रेम , तो कहीं इतना लांग शॉट कि एंकर का चेहरा समझ में ही न आए। कहीं बक्से में तो कहीं लेफ्ट या राइट साइड में इतना किनारे कि स्क्रीन पर मौजूद स्पेस में उसका होना य़ा न होना बराबर हो...दो या तीन मेहमान साथ हों और फुल फ्रेम शॉट भी उसी तरीके से हो, तब तो एंकर तो क्या, मेहमानों को भी पहचानना मुश्किल।  खबर अहम है, एंकर नहीं- ये मानसिकता भी समाचार चैनलों पर आजकल काफी मजबूत देखी जा रही है। लिहाजा फास्ट पेस में बुलेटिन की शुरुआत करती एंकर जितनी तेजी में अपने नाम के साथ स्वागत करके आगे बढ़ जाती है, वो शाय़द ही किसी के जेहन में जम पाता हो। बुलेटिन की शुरुआत में पट्टी पर एंकर का नाम दिए जाने की परंपरा भी आमतौर पर खत्म हो चली है। बड़ी खबर हो, तो एंकर का चेहरा दिखाना अहम नहीं माना जाता, उसके बजाए समाचार से जुड़े तथ्यों के टेक्स्ट वाली ब्रेकिंग न्यूज़ की पट्टी या दूसरी ग्राफिक पट्टियां या फिर विजुअल दिखाना जरूरी होता है। जंमाना तेज़ गति से खबरें दिखाने का है, लिहाजा हरेक समाचार चैनल पर 24 घंटे में कई ऐसे बुलेटिन होते हैं, जिनमें ग्राफिक और विजुअल के साथ 50 से 100 खबरें दिखाने की मजबूरी बेचारे एंकर को पर्दे के पीछे बिठा देती है।  ऐसे में 365 दिन 24X7 चलनेवाले न्यूज़ चैनलों में एंकर की पहचान बने तो कैसे। समाचार वाचक से न्यूज़ एंकर के बदलाव के लगभग 2 दशकों ने उन चेहरों की जैसे हत्य़ा कर दी, जो आम दर्शकों के पसंदीदा हुआ करते थे, जिनके आने का रोज इंतजार रहता था, तब जो हमारे सामने परोसा जाता था, उसकी क्वालिटी का आज कोई सानी नहीं..लेकिन बाजारवादी व्यवस्था के बदले माहौल ने छीन लिए हमारे हरदिल अजीज चेहरे और हो गई समाचार वाचक की अकाल मृत्यु जिसे समाचारों के सभी दीवाने याद करते हैं, लेकिन शोक कोई नहीं मनाता।

सोमवार, 31 दिसंबर 2012

मैं डरता हूं

डरता हूं
आनेवाली अगली खबर से
इसलिए डरता हूं
कि खबर बुरी न हो
कितना असर होगा मुझ पर
कितने दुखी होंगे मेरे आत्मीय जन
खबर का क्या अंजाम होगा
किसी का घर उजड़ेगा?
होग क्रांति?
बदलेगा समाज?
क्या एक खबर से
निकलेंगी और खबरें?
या 
खबरों के बाज़ार में 
भी़ड़ में अकेले 
इंसान की तरह
गुम हो जाएगी
वो भी खबर?
हो जाएगी एक और खबर की मौत?
शायद इसलिए भी मैं
डरता हूं बेइन्तेहा
हर आनेवाली खबर से
- कुमार कौस्तुभ
29 दिसंबर 2012, शाम 6 बजकर 17 मिनट पर