मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

बेकार खबर, बकवास खबर!




टीवी चैनलों के न्यूज़रूम में काम करनेवाले तो ‘बेकार खबर, बकवास खबर’ की शब्दावली से परिचित होंगे ही, लेकिन पत्रकारिता के किसी आम छात्र के लिए ये तय कर पाना बड़ मुश्किल हो सकता है कि आखिर कोई खबर बेकार या बकवास कैसे हो सकती है? दरअसल, ‘बेकार खबर, बकवास खबर’ की परिकल्पना खबरिया माध्यम की जरूरत और मानसिकता पर निर्भर है। अगर कोई खबर आपके काम की नहीं है, तो उसे चलताऊ भाषा में आप बड़े आराम से ‘बेकार खबर, बकवास खबर’ कह सकते हैं। लेकिन, इससे खबर की मूल परिभाषा तो नहीं बदल सकती। खबर की मूल परिभाषा के तहत जो पांच तत्व ‘5 W और 1 H’ किसी जानकारी में होना चाहिए, वो है, तो वो खबर तो है ही, हां किसी व्यक्ति विशेष, चैनल विशेष, अखबार या किसी और माध्यम के लिए अगर कोई खबर काम की नहीं, तो उसे वो खबर के दायरे से अलग मान लेते हैं, ये प्रमुख बात है।
सवाल है कि परिभाषा के खांचे में आने के बावजूद कोई खबर खबर है क्या या कि खबर नहीं है, ये कैसे तय होगा? क्या ये सिर्फ किसी संपादकीय अधिकारी के विवेक का मामला है, या फिर इसके लिए कुछ मानक भी होने चाहिए। दोनों ही चीजें महत्वपूर्ण हैं। समाचार चैनल पर क्या चलेगा, ये तय करना तो संपादकीय अधिकारी का दायित्व है, तो अगर वो ये कहते हैं कि अमुक जानकारी खबर नहीं है या बेकार खबर है, या बकवास है, ये उनके विवेक के हिसाब से बिल्कुल सही माना जा सकता है। लेकिन अगर मानकों की बात करें, तो ये भी ख्याल रखना होगा कि टीवी पर प्रसारित होने के लिए किसी जानकारी या किसी खबर में कौन-कौन से तत्व होने चाहिए। सैद्धांतिक तौर पर तो टेलीविजन पर प्रसारित होनेवाली कोई खबर विजुअल यानी वीडियो और तस्वीरों का मौजूद होना सबसे जरूरी है। विजुअल के बिना खबर टीवी की खबर हो ही नहीं सकती, ऐसा माना जाता है। साथ ही साउंड यानी आवाज, एंबिएंस का भी होना जरूरी है जो घटना का चित्रण करे और उसके बारे में बताए। लेकिन मौजूदा दौर में टेक्स्ट के साथ ग्राफिक्स और एनिमेशन के सहयोग से टीवी पर खबरों को पेश करने का चलन बढ़ा है। ऐसे में किसी खबर को टीवी की खबर बनाने के लिए अगर विजुअल की कमी हो, तो ग्राफिक्स और एनिमेशन का इस्तेमाल प्रोड्यूसर की रचनात्मक प्रतिभा का परिचायक है। हालांकि, हमेशा ऐसा संभव नहीं होता। खबरों से जुड़ी परिस्थितियों और घटना का काल्पनिक चित्रण हमेशा नहीं किया जा सकता। ऐसे में बगैर विजुअल और साउंड के, खबर को थोड़े समय तो चलाया जा सकता है, उसे टीवी जैसे डायनेमिक माध्यम पर ज्यादा देर जिंदा नहीं रखा जा सकता।
खबर की पूर्णता से जुड़ा दूसरा मुद्दा है तथ्यात्मक पूर्णता का। अगर एक लाइन की किसी जानकारी में आवश्यक तथ्यों का अभाव है, तो उससे खबर नहीं बन सकती, बशर्ते किसी तरह से जरूरी तथ्य जुटा लिए जाएं। ऐसे में, एक लाइन की कोई जानकारी बड़े आराम से खबर के तौर पर खारिज की जा सकती है, क्योंकि उससे ये पता नहीं चलता कि वो लाइन कितनी बड़ी खबर को जन्म दे सकती है। लेकिन अगर, चैनल की आवश्यकता हो, और संभव हो, तो उस जानकारी के आसपास, इर्द-गिर्द की और जानकारियां और तथ्य जुटाकर उन्हें खबर बनाया जा सकता है। उदाहरण के लिए, अगर मुंबई में हुए आतंकवादी हमले या केदारनाथ में आई प्राकृतिक आपदा की खबरों की शुरुआती लाइन्स को नजरअंदाज कर दिया जाता तो कई चैनल बहुत बड़ी ब्रेकिंग न्यूज़ में पिछड़ जाते। इससे पत्रकारिता के छात्रों को सबक ये लेना चाहिए कि आपके पास आपके दिमाग में तमाम ऐसी जानकारियां होनी चाहिए, जो किसी भी नई जानकारी के लिए बैकग्राउंडर का काम कर सकती है और उसे बड़ी खबर बना सकती है। खासकर ऐसे वक्त में, जिस दिन खबरों का सूखा पड़ा हो, चैनल को नई खबरों की कमी हो, ऐसे में छोटी-छोटी दिखनेवाली जानकारियां, बड़ी खबरों में तब्दील की जा सकती हैं। इन दिनों सियासी बयानबाजियों से जुड़ी खबरें भी खूब चर्चा में हैं। अगर ऐसी खबरों के न्यूज़मेकर्स की बाइट उपलब्ध न हो, तो खबर देर तक नहीं चल सकती। टीवी के समाचार चैनलों में अक्सर ऐसा होता है, जब किसी नेता की रैली से एक-दो लाइन की जानकारी मिलती है। चाहें तो उसे नजरअंदाज कर दें, या फिर उसके आजू-बाजू, आगे-पीछे की जानकारियों को जोड़कर खबर को बड़ा बना दें। महाराष्ट्र के नेता राज ठाकरे एक ही जैसी बातें अमूमन हर बार बोलते हैं, लेकिन हर बार उनकी एक लाइन से कम से कम 30-40 सेकेंड की खबर बन जाती है।
एक और मुद्दा है घटना से जुड़े हर पक्ष को खबर में शामिल किया जाना। मसलन अगर हादसे, बलात्कार या ठगी के किसी मामले की खबर है और उसमें न पीड़ित की तस्वीर है, ना आरोपी की, तो उसे पूर्ण नहीं माना जाएगा। साथ ही, अपराध संबंधी खबरों में आरोपी और पीड़ित पक्षों के साथ-साथ पुलिस या जांच अधिकारी या प्रशासनिक पक्ष की प्रतिक्रिया नहीं हो, तो उन्हें एकतरफा मानकर बेशक खारिज किया जा सकता है, बशर्ते हादसे या अपराध से जुड़े पुख्ता विजुअल नहीं मौजूद हों। कई बार विदेशों से रॉयटर्स और एपीटीएन से अपराधिक खबरों की ऐसी फीड्स आती हैं जिनमें पर्याप्त विजुअल नहीं होते, ना ही घटना का चित्रण करने लायक पुख्ता सबूत होते हैं। तो ऐसी खबरों को प्रसारण लायक खबरों की श्रेणी में रखना मुश्किल होता है। ऐसा ही, किसी सांस्कृतिक समारोह की करवेज में भी हो सकता है, जिसमें आपके पास इच्छित कलाकार के विजुअल उपलब्ध न हों, तो उन्हें बेकार या बकवास करार देकर किनारा किया जा सकता है।
हालांकि एक बात ध्यान में रखनी चाहिए औ र अमूमन रखी भी जाती है कि कई बार कुछ जानकारियों में इतना दम होता है, जो बहुत जरूरी और काम की खबर बन सकती हैं, तो उन्हें विजुअल के अभाव में बेकार या बकवास नहीं करार दिया जा सकता । ऐसी स्थिति में ये प्रोड्यूसर की रचनात्मकता पर निर्भर करता है कि वो फाइल फुटेज, ग्राफिक्स और एनिमेशन का इस्तेमाल करके खबर को मुकम्मल तरीके से पेश करे, न कि उसे अपूर्ण मानकर खारिज कर दे। बड़े नेताओं, पदाधिकारियों के अहम बयानों, सरकारी सूचनाओं , प्रशासनिक जानकरियों वगैरह मामलों की जानकारियों में अक्सर ऐसा होता, जब दिखाने के लिए कुछ भी पुख्ता नहीं होता, लेकिन खबर की भरमार होती है। ऐसे में ये तो प्रोड्यूसर की काबिलियत पर ही निर्भर करता है कि वो कितनी सफाई और चुस्ती से खबर को खबर की तरह पेश करे।
अखबारों के लिए कोई खबर बेकार नहीं होती, क्योंकि वहां छपने के लिए पर्याप्त जगह होती है। यदि संपादकीय अधिकारी चाहें, तो किसी भी जानकारी को जगह देकर खबर बना सकते हैं। यही हाल इंटरनेट और सोशल मीडिया आधारित खबरिया वेबसाइट्स का भी है। रेडियो में भी टीवी से ज्यादा वक्त की कमी होती है, क्योंकि बुलेटिन तय होते हैं और समय सीमित होता है, लिहाजा, वहां भी इस बात का बड़ा ख्याल रखा जाता है कि कौन सी खबर बेकार है या बकवास है।
सबसे बड़ी बात ये है कि चैनल या समाचार देनेवाले किसी भी माध्यम को अपने दर्शक-पाठक और श्रोता वर्ग की पहचान होनी चाहिए और उसी के आधार पर ये तय होना चाहिए कि कोई खबर बेकार है या बकवास है या नहीं है। अगर दिल्ली-एनसीआर या मुंबई पर केंद्रित समाचार चैनल य़ा अखबार या रेडियो चैनल या इंटरनेट साइट हैं, तो उन्हें दिल्ली-एनसीआर या मुंबई से जुड़ी हर खबर किसी न किसी तरीके से लेनी चाहिए, क्योंकि लोगों की दिलचस्पी उनमें होगी ही होगी। इसी तरह राष्ट्रीय टीवी चैनलों, अखबारों, से ये अपेक्षा की जाती है कि वो कश्मीर से कन्याकुमारी और गुजरात, गोवा से गुवाहाटी तक की खबरों को कवर करें और प्रसारित करें,न कि सिर्फ दिल्ली या मुंबई तक केंद्रित रहें। हालांकि टीवी चैनलों की अपनी सीमाएं हैं, जिनकी वजह से उन्हें खबरों के चयन में बेकार और बकवास का बड़ा ख्याल रखना पड़ता है। परंतु, ये भी बात अहम है कि दर्शक देश के हर कोने का हाल जानना चाहते हैं और हर इलाके की उन खबरों को देखना-सुनना चाहते हैं जो किसी भी तरीके से दिलचस्प हो, चाहे वो किसी हादसे की दिल दहलाने वाली तस्वीर हो, या सांस्कृतिक कार्यक्रम की रंगारंग झलक। अगर किसी खबर में तथ्यात्म पूर्णता है और उसके वीडियो, तस्वीरें और साउंड जानदार हैं तो वो खबर बेकार या बकवास नहीं हो सकती। उसे प्रस्तुत करना फायदेमंद ही हो सकता है, नुकसानदेह नहीं।
-          कुमार कौस्तुभ

बड़ी खबर



    
मीडिया, खासकर समाचारों की दुनिया की शब्दावली में ‘बड़ी खबर’ जाना-पहचाना टर्म है। खासतौर से वो लोग जो 24 घंटे समाचारों से खेलते हैं, उनके लिए ‘बड़ी खबर’ की अहमियत बहुत ज्यादा होती है। टीवी हो या रेडियो, या फिर इंटरनेट के समाचार चैनल या अखबार या समाचार पत्रिकाएं, समाचार संप्रेषण के हर माध्यम में ‘बड़ी खबर’ का मुद्दा उठता ही उठता है और हर खबरिया शख्सियत हर पल ये तय करने में जुटा रहता है कि आखिर उसके लिए किसी समय विशेष में बड़ी खबर क्या है? ऐसे में ये सवाल शाश्वत है कि आखिर क्या है ‘बड़ी खबर’? कोई एक खबर कब बड़ी हो सकती है, कैसे बड़ी हो सकती है, कितनी बड़ी हो सकती है, आखिर ‘बड़ी खबर’ की पहचान क्या है?‘बड़ी खबर’ को कैसे पेश किया जाना चाहिए? किसी पल के लिए ‘बड़ी खबर’ आखिर कब तक बड़ी रहती है या रह सकती है? ये तमाम सवाल ‘बड़ी खबर’ के इर्द-गिर्द घूमते रहते हैं और खबरों की दुनिया में काम करनेवाले तमाम लोग इन सवालों से दो-चार होते रहते हैं।
असल में देखें तो ‘बड़ी खबर’ कितनी देर बड़ी रहती है और कितनी देर बाद वो मर जा सकती है ये तय करना तो वास्तव में खबरिया लोगों का ही काम है, और ये भी कहा जा सकता है कि कोई भी खबर ‘बड़ी खबर’ हो सकती है, ये भी खबरों की दुनिया के लोग ही तय करते हैं, लेकिन आमतौर पर ये तो मान ही लिया जाता है कि अमुक खबर में ‘बड़ी खबर’ होने का पोटेंशिय़ल है, काबिलियत है और अमुक में नहीं है। ये काबिलियत वाली बात तय़ होती है मीडिया माध्यमों की मानसिकता से, उनके स्वरूप से, उनके टार्गेट ऑडिएंस से और, और भी कई ऐसे पहलुओं के जरिए जो खबरों में, उनके विस्तार में, उनके संसार में निहित होते हैं। समाचार माध्यमों में काम करनेवाले लोगों को रोज ही ‘बड़ी खबर’ के बड़े पहलुओं से रूबरू होने का मौका मिलता है। लेकिन, इस मुद्दे पर गहराई से विचार करना अकादमिक अध्ययन का भी विषय हो सकता है, इस पर शायद ही कभी चर्चा हुई हो। पत्रकारिता के पाठ्यक्रमों में खबरों, हेडलाइंस, स्क्रिप्टिंग और खबरों से जुड़े अन्य पहलुओं की चर्चा होती है, पर अमूमन इस बात पर विचार नहीं होता, इसका संधान नहीं होता कि ‘बड़ी खबर’ अपने-आप में खबरिया क्रियाकलापों का कितना जरूरी पहलू है। वास्तव में ये तो पत्रकारिता के व्यावहारिक पक्ष से जुड़ा पहलू है, जिसकी जानकारी छात्रों को पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद किसी समाचार संगठन, किसी टीवी चैनल या अखबार या किसी और माध्यम में काम करते हुए ही मिलती है और वरिष्ठ सहयोगियों के संसर्ग में इसकी समझ भी विकसित होती है कि कब कोई खबर वाकई ‘बड़ी खबर’ हो सकती है या नहीं। पत्रकारिता के छात्रों की जरूरत को देखते हुए यहां अलग-अलग माध्यमों में ‘बड़ी खबर’ के कांसेप्ट पर विस्तार से विचार करने की कोशिश की गई है।
टीवी के लिए बड़ी खबर क्या है?
5 अप्रैल 2014, समय दोपहर 1.25 बजे –डेढ़ बजे का बुलेटिन प्रोड्यूसर बुलेटिन को अंतिम रूप देने में लगा हुआ है। उस वक्त की खबरों में बीजेपी के नेता अमित शाह के विवादित बयान और उस पर प्रतिक्रियाओं की झड़ी लगी हुई है। उसी वक्त, गुजरात के गांधीनगर से बीजेपी के नेता लालकृष्ण आडवाणी के लोकसभा उम्मीदवार के तौर पर पर्चा भरने की लाइव तस्वीरें न्यूज़रूम के फीड मॉनिटर पर लाइव आ रही हैं। नरेंद्र मोदी भी लंबे समय बाद आडवाणी के साथ नज़र आ रहे हैं। पल भर में संपादकीय सलाह-मशविरा होता है और एजेंडा बदल जाता है। बुलेटिन की शुरुआत आडवाणी और मोदी की एक साथ तस्वीरों से होती है, जो लाइव मिल रही होती हैं और बुलेटिन का तकरीबन आधा से ज्यादा वक्त इन्हीं तस्वीरों को दिखाते हुए गुजरता है। ये एक उदाहरण है ‘बड़ी खबर’ का जिससे टीवी चैनल का बुलेटिन शुरु हुआ और उस पर केंद्रित हो गया। सवाल इसमें ये है कि ‘बड़ी खबर’ इसमें क्या थी? टीवी के नजरिये से देखें तो उस वक्त की बड़ी खबर मोदी और आडवाणी के मिलन की तस्वीरें थीं क्योंकि पहले पीएम पद की दावेदारी, फिर गांधीनगर सीट से उम्मीदवारी के विवाद के बाद, लंबे समय बाद बीजेपी के बुजुर्ग नेता लालकृष्ण आडवाणी और बीजेपी के नए क्षत्रप नरेंद्र मोदी एक साथ दिख रहे थे, एक-दूसरे की तारीफ के कसीदे पढ़ रहे थे। वाकई टीवी पर दिखाने के लिए ये उस खास वक्त की सबसे अच्छी तस्वीर थी। क्योंकि, एक तो दिन सियासी खबरों का था, साथ ही साथ, ये उसी वक्त की लाइव तस्वीरें थीं, जब बुलेटिन चलना था। अमित शाह के बयान पर विवाद से जुड़ी खबरें दर्शक सुबह से देख रहे थे और शायद कोई और ऐसी खबर थी ही नहीं जो इतनी बड़ी हो कि बुलेटिन की पहली खबर और सबसे महत्वपूर्ण खबर बन सके। ये एक उदाहरण भर है। ऐसा भी नहीं है कि जब भी किसी घटना की लाइव तस्वीरें आ रही हों, तो उनसे बुलेटिन की शुरुआत करना जरूरी हो। टीवी के बुलेटिन की सबसे महत्वपूर्ण खबर क्या हो, ये तात्कालिकता और सामयिकता के साथ-साथ खबरों की प्रकृति, उनके स्थान और परिवेश पर भी निर्भर करता है। साथ ही साथ इस पर भी निर्भर करता है कि प्रतिद्वंद्वी चैनल क्या चला रहे हैं, यानि किस खबर को प्रमुखता से दिखा रहे हैं। उस वक्त अगर चैनल के टार्गेट एरिया से जुड़े किसी इलाके में किसी बड़े हादसे की खबर, और तस्वीरें मिल रही होतीं, तो ये तय करना शायद और मुश्किल होता कि प्रमुखता किस खबर को दी जाए, सियासी खबर को, य़ा हादसे में हुए नुकसान से जुड़े मानवीय पहलू से जुड़ी खबर को। ऐसे तमाम मौके रोज ही आते हैं, जब बुलेटिन प्रोड्य़ूसर को बुलेटिन को अंतिम रूप देते हुए इस चुनौती से जूझना पड़ता है कि आखिर बुलेटिन की सबसे ‘बड़ी खबर’ क्या हो। ऐसे में वो वरिष्ठ सहयोगियों, संपादकीय प्रभारियों की सलाह लेता है और अपने विवेक का भी इस्तेमाल करता है और चैनल के स्वरूप, उसकी मानसिकता, उसके टार्गेट को ध्यान में रखते हुए ‘बड़ी खबर’ का चयन करता है। राष्ट्रीय चैनलों की बात छोड़ दें, तो दिल्ली-एनसीआर या यूपी या एमपी या राजस्थान के किसी क्षेत्रीय चैनल के लिए मोदी-आडवाणी की खबर ‘बड़ी खबर’ नहीं भी हो सकती थी, वैसे ही किसी बिज़नस चैनल के लिए भी मोदी-आडवाणी मिलन का खबरिया महत्व इतना नहीं हो सकता।
टेलीविजन के समाचार चैनलों में अक्सर ‘बड़ी खबर’ का अर्थ ब्रेकिंग न्यूज़ से भी लिया जाता है, यानी जिस वक्त किसी महत्वपूर्ण घटना से जुड़ी खबर आए, उसी वक्त उसे प्रसारित कर दिया जाए। लेकिन, जहां तक मेरा मानना है, ब्रेकिंग न्यूज़ ‘बड़ी खबर’ का एक रूप हो सकती है, ‘बड़ी खबर’ को पेश करने का एक जरिया हो सकती है। लेकिन जो विस्तार ‘बड़ी खबर’ की प्रस्तुति में होना चाहिए, वो ब्रेकिंग न्यूज़ में अक्सर नहीं होता क्योंकि खबर से जुड़ी जानकारी, तस्वीरों और अन्य अंगों के अभाव में किसी खबर को ब्रेकिंग न्यूज़ के ढ़ांचे में पेश करके टीवी चैनल के बुलेटिन में दूसरी खबरों को भी दिखाने की पूरी कोशिश रहती है। हां, अगर, कोई खबर लगातार डेवलप हो रही है, उससे जुड़ी जानकारियां बढ़ रही हैं, तस्वीरें औऱ बाइट्स मिल रही हैं, तो ब्रेकिंग न्यूज के ढांचे में भी 10-15 मिनट से लेकर आधे-एक घंटे तक का वक्त उसके लिए कम पड़ सकता है और वो खबर न सिर्फ एक बुलेटिन बल्कि पूरे दिन या 24 घंटे के लिए बड़ी खबर बनी रह सकती है बल्कि अगले दो-चार दिन उसका असर दिख सकता है। याद रहे, मुंबई में 2008 के आतंकवादी हमले की खबरें तकरीबन ढाई-तीन दिन से ज्यादा लगातार टीवी चैनलों पर छाई रही थीं, जब तक कि पूरा ऑपरेशन संपन्न नहीं हो गया। लेकिन, ऐसा भी देखा जाता है कि ब्रेक्रिंग न्यूज़ के तौर पर किसी बुलेटिन में सबसे पहले दिखाई जानेवाली कोई खबर अगले बुलेटिन्स से नदारद हो और उसकी जगह कोई और खबर ले ले। ऐसा इसलिए क्योंकि समय और परिस्थितियों के मुताबिक, बुलेटिन के लिए दूसरी कोई खबर ‘बड़ी खबर’ के तौर पर मुफीद हो सकती है। ये सब टीवी चैनलों के संपादकीय प्रभारियों और बुलेटिन प्रोड्यूसर्स को तय करना होता है कि किस वक्त, किस बुलेटिन में कौन सी खबर ‘बड़ी खबर’ के तौर पर पेश की जाए। इस प्रक्रिया में तमाम खबरों पर हमेशा नज़र रखना अतिआवश्यक है ताकि कहीं कोई ‘बड़ी खबर’ नज़रअंदाज न हो जाए।
रेडियो के लिए बड़ी खबर क्या है?
रेडियो पर ‘बड़ी खबर’ का कांसेप्ट टेलीविजन से कुछ अलग है। क्योंकि, एक तो ब्रेकिंग न्यूज़ वाली बात रेडियो में आमतौर पर नहीं सुनने में आती ( कभी नया प्रयोग दिख जाए तो बात और है), साथ ही, श्रव्य माध्यम होने के चलते तस्वीरों की कोई जगह नहीं । हां, बुलेटिन के वक्त या उससे ठीक पहले कोई बड़ी घटना की जानकारी आ जाए, तो उसे छोड़ना मुनासिब नहीं समझा जाता, भले ही वो खबर कुछ आगे-पीछे हो जाए। रेडियो में आमतौर पर समग्र बुलेटिन का कांसेप्ट है, जिसमें हर तरह की खबरें हों। ऐसे में किसी एक खबर के बड़े या छोटे होने का सवाल आमतौर पर नहीं उठता। रेडियो बुलेटिन के लिए अगर कोई खबर बड़ी हो, तो वो शुरुआती खबरों में और हेडलाइन में होगी, उस पर ज्यादा वक्त दिया जाए, ऐसा भी कम ही पाया जाता है। खबर को खींचनेवाली बात रेडियो में इसलिए नहीं, क्य़ोंकि तस्वीरों और एंबिएंस की मदद से किसी एक खबर पर ज्यादा देर टिकना यहां मुमकिन नहीं और एक ही लाइन को बार-बार दोहराने की बात हो नहीं सकती। हां, खबर से जुड़ी और भी खबरें हों, तो उन्हें साथ-साथ जरूर पेश किया जा सकता है। वर्ना रेडियो के लिए ‘बड़ी खबर’ का मतलब या तो शुरुआती खबर, या फिर जब आ जाए, तभी पेश कर दी जानेवाली खबर। टेलीविजन के मुकाबले, रेडियो की अपनी सीमाएं हैं। बुलेटिन में हर तरह की खबरें शामिल करने की परंपरा है। ऐसे में बड़ी खबर का मतलब यहां मुख्यतः हेडलाइंस से ही होता है।
इंटरनेट के लिए बड़ी खबर क्या है?
तकनीकी तौर पर सबसे उन्नत होने के कारण इंटरनेट चुंकि टेलीविजन, रेडियो और अखबार- तीनों ही समाचार माध्यमों की सुविधा और संसाधन इस्तेमाल कर सकता है, ऐसे में, इंटरनेट की न्यूज़ साइट्स और सोशल मीडिया के लिए ‘बड़ी खबर’  का मतलब मिला-जुला है। इंटरनेट पर बुलेटिन का वक्त निश्चित नहीं होता, ऐसे में जब जी चाहे, कोई खबर पेश की जा सकती, टेक्स्ट, वीडियो, साउंड अपलोड किए जा सकते हैं। ऐसे में ये सबसे तेज़ गति से खबरों को पेश करने का सबसे आसान माध्यम है। लेकिन, टेलीविजन के मुकाबले इंटरनेट की साइट्स पर किसी वक्त की ‘बड़ी खबर’ की प्रस्तुति थोड़ी धीमी दिखती रही है। इसकी वजह ये हो सकती है कि इंटरनेट के न्यूज़ साइट अभी तक टीवी और अखबार की छाया से उबर नहीं सके हैं। एक तो कम से कम भारत में ज्यादातर न्यूज़ साइट्स किसी न किसी टीवी चैनल या अखबार का हिस्सा हैं, ऐसे में पहले कोई भी खबर टीवी चैनल या अखबार के हिसाब से आती है, फिर वेबसाइट पर आती है। विदेशों में, जहां भी खबरों की स्वतंत्र वेबसाइट्स काम कर रही हैं, वो अपने हिसाब से खबरें पेश करती हैं। मसलन, दुनिया के किसी महत्वपूर्ण हिस्से में भूकंप, या सूनामी या ऐसे किसी औऱ हादसे की खबरें हों, या फिर अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव जैसे बड़े इवेंट्स की खबरें हों, उन्हें न्यूज़ साइट्स पर तेजी से फॉलो किया जाता है। याद रहे, पॉप गायक माइकल जैक्सन की मौत से जुड़ी खबरें टीवी चैनलों के मुकाबले www.tmz.com जैसी वेबसाइट्स ने ज्यादा तेजी से पेश कीं। ऐसा ही, सुमात्रा के सूनामी और भूकंप के हादसों के बाद भी देखा गया। इन दिनों सोशल मीडिया की माइक्रोब्लॉगिंग साइट्स, ट्विटर और फेसबुक पर खबरों की पेशकश ज्यादा बढ़ गई है। बल्कि, ये कहना गलत नहीं होगा कि ट्विटर और फेसबुक भी टीवी चैनलों, रेडियो और अखबार के समान ही खबरों के माध्यम बन चुके हैं। किसी तय समय में जो भी बड़ी खबरें सोशल मीडिया पर बड़ी हो सकती हैं, या दूसरे शब्दों में जिन मुद्दों पर सबसे ज्यादा चर्चा हो रही हो, उनकी जानकारी ‘ट्रेंडिंग’ के जरिए मिलती है। यानी सोशल मीडिया पर ‘बड़ी खबर’ का मतलब है ‘ट्रेंडिंग’ में जो मुद्दे शामिल हों, आगे चल रहे हों। तो अगर आप ‘ट्रेंडिंग’ पर नज़र रख रहे हैं, तो बड़ी खबरों की जानकारी से महरूम नहीं रह सकते। लेकिन, किसी टीवी चैनल के लिए जो खबर ‘बड़ी खबर’  हो, जरूरी नहीं, वो ‘ट्रेंडिंग’ में भी दिखे। क्योंकि सोशल मीडिया का संसार कुछ तो अलग है ही, टीवी, रेडियो या अखबार की ‘बड़ी खबर’ वहां से गायब भी रह सकती है और जो खबर सोशल मीडिया पर ‘ट्रेंडिंग’ में हो, वो जरूरी नहीं कि टीवी, रेडियो या अखबार में मिल ही जाए। हर माध्यम के लिए ‘बड़ी खबर’ का कांसेप्ट अलग हो सकता है, ये हमेशा ख्याल रखना होगा।
अखबारों के लिए बड़ी खबर क्या है?
बात अखबारों की ‘बड़ी खबर’ की। अखबारों के संस्करण तो 24 घंटे में एक बार छपते हैं, तो उनके लिए बड़ी खबर जाहिर है अलग ही होगी। अखबारों में पहले पन्ने पर सुर्खियों में शामिल खबर ‘बड़ी खबर’ मानी जाती है। अखबारों में चुंकि पिछले दिनभर की खबरें होती हैं, तो उन्हीं में से सबसे महत्वपूर्ण खबरों को सुर्खियों में जगह मिलेगी और वही बड़ी खबरें होंगी, चाहे वो सियासत की खबरें हों, खेल की, या अपराध की या किसी और मुद्दे से जुड़ी खबर। हर अखबार का अपना रोज का एजेंडा होता है, जिसका असर उसकी ‘बड़ी खबर’ पर देखा जा सकता है। मौसम चुनाव का है, तो सियासी बयानबाजी की कोई खबर पहले पन्ने की पहली खबर यानी सबसे बड़ी खबर हो सकती है। किसी बड़ी घटना से जुड़ी खबर भी बड़ी खबर हो सकती है। इतना जरूर ध्यान रखना पड़ता है कि चुंकि अखबार छापकर बेचे जाते हैं और एक बार छप जाने के बाद पन्नों में बदलाव नहीं हो सकता , तो खबर में ऐसा कुछ न जाए, जो या तो पुराना पड़ चुका हो, बासी लगे, या फिर उसकी जानकारी में आमूल-चूल कोई बदलाव हो। ऐसे में अखबार के लिए ‘बड़ी खबर’ चुनना ज्यादा बड़ी चुनौती है टीवी या इंटरनेट के बनिस्पत।  
समाचार पत्रिकाओं के लिए क्या है बड़ी खबर?
रही बात समाचार पत्रिकाओं में ‘बड़ी खबर’ की, तो एक बात साफ है कि समाचार पत्रिकाओं को साप्ताहिक या पाक्षिक तौर पर खबरों का लेखा-जोखा देना होता है। ऐसे में उनके लिए ‘बड़ी खबर’ किसी ऐसे खास मुद्दे से जुड़ी हो सकती है, जिसका दूरगामी महत्व हो, जिसमें पाठकों की दिलचस्पी लंबे समय तक बनी रहे। आम तौर पर समाचार पत्रिकाओं में ‘कवर स्टोरी’ या ‘आवरण कथा’ पेश की जाती है, जिन्हें ‘बड़ी खबर’ की श्रेणी में रखा जा सकता है। जैसा कि शीर्षक से ही साफ है, ‘आवरण कथा’ का जिक्र पत्रिका के पहले पन्ने यानी कवर पर रहता है ऐसे में वो ही पत्रिका की प्रमुख खबर हुई। समाचार पत्रिकाओं में बड़ी खबर क्या हो, ये तय करना संपादकों का काम है और दूरदर्शी अनुभवी संपादकगण इसका पूरा ख्याल रखते हैं कि बड़ी खबर वही हो, जो पत्रिका को बेचे। ऐसे में सबसे रोचक, दिलचस्प या सनसनीखेज खबर आमतौर पर ‘कवर स्टोरी’ या ‘आवरण कथा’ बनती है।

‘बड़ी खबर’ कितनी बड़ी?
मीडिया की शब्दावली में ‘बड़ी खबर’ इस्तेमाल कब  और कैसे शुरु हुआ, ये तो कहना मुश्किल है। लेकिन, इतना जरूर कहा जा सकता है कि ये टीवी समाचार की भाषा के सरलीकरण की ही देन है। आम बोल चाल में हेडलाइन कही जानेवाली खबरों को बड़ी खबरें कहा जाने लगा, फिर कई टीवी चैनलों ने हेडलाइंस का ही नाम बदलकर बड़ी खबर रख दिया। ज़ी न्यूज़ ने तो ‘बड़ी खबर’ के नाम से समाचार कार्यक्रम ही शुरु किया था जिसे काफी समय तक मशहूर एंकर पुण्य प्रसून वाजपेयी पेश करते थे। दरअसल, ‘बड़ी खबर’ किसी भी प्रमुख खबर को अहमियत के साथ पेश करने का एक तरीका, एक ढांचा बन गया, जिसका इस्तेमाल अलग-अलग समाचार चैनल, अखबार और दूसरे माध्यम अपने-अपने तरीके से करते आ रहे हैं। लेकिन, ‘बड़ी खबर’ का कांसेप्ट एक तरह से देखें तो सिर्फ प्रमुख खबर तक ही केंद्रित है और कोई खबर किसी समय, किसी परिस्थिति, किसी बुलेटिन, किसी चैनल के लिए कब महत्वपूर्ण हो सकती है, कब बड़ी हो सकती है, ये तो पूर्ण रूप से संपादकीय सरोकारों पर निर्भर है, पत्रकारिता की भाषा और व्याकरण पर नहीं।
-          कुमार कौस्तुभ

शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

आज का एजेंडा



 
24 घंटे चलनेवाले टेलीविजन पर चलने वाले समाचार चैनलों पर लगातार नई-नई खबरें दिखाने की उम्मीद की जाती है। लेकिन 24 घंटे का वक्त नई-नई खबरों से भर पाना कतई आसान नहीं। हर पल नई खबरें पैदा भले ही हों, लेकिन टेलीविजन चैनलों के लिए उन्हें हासिल और फिर पेश कर पाना मुमकिन नहीं। वजह ये कि हर खबर की अपनी सीमा होती है, अपना वजन होता है, अपनी कीमत होती है, अपने दर्शक होते हैं। ये सब तय करना और परखना तो समाचार चैनलों के संपादकीय विभागों का ही काम है, जो अपनी जरूरत और खासकर अपने दर्शक वर्ग की जरूरत के मुताबिक खबरें चुनते और पेश करते हैं। ऐसे में टेलीविजन के समाचार चैनलों को हर रोज प्रसारण के लिए एजेंडा तय करने की जरूरत पड़ती है ताकि 24 घंटे प्रसारित होनेवाले बुलेटिनों और समाचार आधारित कार्यक्रमों का तानाबाना बुना जा सके। हां, ये भी तय है कि एजेंडे का एक खाका भर ही तैयार किया जा सकता है और समय और परिस्थितियों के मुताबिक उसमें त्वरित बदलाव भी हो सकते हैं। लेकिन बुनियादी सवाल ये है कि किसी भी समाचार चैनल में हर दिन का एजेंडा तय कैसे किया जा सकता है, जबकि खबरों का सतत प्रवाह हो और खबरों की बहुतायत हो।

 

हरेक समाचार चैनल का खास दर्शक वर्ग होता है या यूं कहें कि हरेक समाचार चैनल अपने-आप को खास दर्शक वर्ग पर केंद्रित करके समाचारों का प्रसारण करता है। रोजाना का एजेंडा तय करते हुए ये बात काफी अहमियत रखती है कि 24 घंटे के प्रसारण के दौरान किस टाइम स्लॉट में कौन से इलाके के ज्यादातर लोग किस चैनल को देखते हैं। अगर किसी चैनल को मुंबई में सुबह और देर रात के वक्त ज्यादा देखा जाता है तो उसका जोर सुबह और देर रात के स्लॉट में मुंबई की खबरों पर ज्यादा हो सकता है। यही फॉर्मूला दिल्ली और दूसरे मेट्रो के साथ भी अपनाया जाता है। इसके अलावा, राजनीतिक खबरों को एजेंडे में तभी अहमियत मिलती है, जबकि उनकी सामयिकता और प्रासंगिकता हो। मसलन चुनावी वक्त में अगर किसी बड़े और लोकप्रिय नेता की रैली किसी दिन तय हो, तो समाचार चैनलों का पूरा ध्यान नेता के भाषण पर होता है और उसे लाइव प्रसारित करने की योजना भी बनती है। यही बात बड़े मुकदमों के मामलों पर अदालतों में आनेवाले फैसलों को लेकर भी ध्यान में रखी जाती है। आमतौर पर ऐसा देखा गया है कि धनंजय चटर्जी की फांसी, जेसिका लाल हत्याकांड, प्रियदर्शिनी मट्टू कांड, आरुषि हत्याकांड जैसे तमाम मामलों पर फैसलों के दिन सुबह से रात तक समाचार चैनलों पर कोई और खबर नहीं दिखी। खबर और खबर की पृष्ठभूमि पर ही चैनलों का 24 घंटे का बड़ा हिस्सा खप गया। कुछ ऐसा ही ट्रेंड क्रिकेट से जुड़ी खबरों के मामले में देखा गया है। मसलन, भारत के वनडे मुकाबलों के दिन या सचिन तेंदुलकर के मैचों और उनसे जुड़ी किसी और बड़ी घटना के दिन सुबह से लगातार बुलेटिनों में क्रिकेट ही छाया रहा। इस तरह, दिल्ली-मुंबई, शख्सियत, सियासत, कोर्ट और स्पोर्ट्स की खबरें दिन भर का एजेंडा तय कर सकती हैं और उनमें बदलाव तभी हो सकता है जब अचानक कहीं से किसी बड़े हादसे की खबर आए, वो भी विजुअल और बाइट्स के साथ। किसी हादसे की खबर कितनी बड़ी हो सकती है और एजेंडे में कितनी जगह ले सकती ये तो हादसे की प्रकृति, वक्त, स्थान, परिस्थितियों से तय होता है, लेकिन चुंकि हादसों से मानवीय पक्ष जुड़ा है इसलिए उनकी खबरें देखे जाने की अधिक संभावना होती है लिहाजा उन्हें प्रायोरिटी मिलना लाजिमी है।

 

इस तरह, साफ समझा जा सकता है कि समाचार चैनलों के एजेंडे का फॉर्मूला नंबर- एक है वो खबर जो ज्यादा से ज्यादा बिके। कितनी भी बड़ी किसी शख्सियत से जुड़ी खबर तभी एजेंडे में होगी, जब उसमें 'बिकने' यानी देखे जाने की क्षमता होगी। मसलन, नरेंद्र मोदी या राहुल गांधी या लालू प्रसाद यादव के बयान इसलिए खबर बनते हैं क्योंकि उन्हें देश ही नहीं दुनियाभर में लोग देखना-सुनना चाहते हैं। लालू यादव के चुटीले बयान दिल्ली के साथ-साथ यूपी-बिहार में भी टीआरपी दे सकते हैं, लिहाजा उन्हें एजेंडे में रखा जाता है।

 

इसी फॉर्मूले के तहत खेल और फिल्मी दुनिया से जुड़ी खबरों को भी समाचार चैनलों पर इतनी अहमियत मिलती है कि उनकी आलोचना होने लगती है। क्रिकेट के प्रति दर्शकों की दीवानगी और अपने दौर में सचिन तेंदुलकर के प्रति दर्शकों के लगाव को समाचार चैनल जमकर भुनाते रहे हैं। अगर भारत कभी अच्छी पारी खेलता है, तो भी खूब खबर चलती है और बुलेटिन के बुलेटिन खेल पर कुर्बान हो जाते हैं और अगर भारत का प्रदर्शन खराब रहा तो भी खबर बनती है और खिलाड़़ियों की आलोचना में दिन निकल जाता है। यही बात सचिन तेंदुलकर को लेकर भी रही। जब तक अच्छा प्रदर्शन रहा, वो समाचार चैनलों के आंखों के तारे रहे और प्रदर्शन खराब रहा, तो भी वो आलोचना के बहाने बुलेटिनों में छाते रहे। यही हाल, फिल्मी सितारों का है। अमिताभ बच्चन से लेकर शाहरुख खान, सलमान खान, कैटरीना-दीपिका जैसे सितारे कभी तो अपने बयानों तो कभी अपने बर्ताव और अफेयर्स को लेकर न सिर्फ सुर्खियां बनते रहे, बल्कि टेलीविजन के समाचार चैनलों के आधे-एक घंटे के विशेष कार्यक्रमों के लिए मसाला भी बन गए। य़ानी जो बिकता है वो दिखता है और दूसरे तरीके से कहें तो जो दिखता है ( फिल्मों में, क्रिकेट में, विवादों में) वो खूब बिकता है का फॉर्मूला समाचार चैनलों पर चलता है।

 

एजेंडे का फॉ़र्मूला नंबर 2 है- स्थानिकता यानी बड़े शहरों- दिल्ली-मुंबई और चुनिंदा मेट्रो में समाचार चैनल को देखे जाने के आंकड़ों के हिसाब से भी उन जगहों की खबरों को जगह मिलती है। चुंकि, ज्यादातर राष्ट्रीय समाचार चैनल दिल्ली-मुंबई में ज्यादा देखे जाते हैं और देश के विभिन्न प्रदेशों के लोग दिल्ली-मुंबई में ज्यादा रहते हैं- तो एक तरफ दिल्ली-मुंबई के दर्शक और दूसरी तरफ दिल्ली-मुंबई से जुड़े दर्शकों की नज़र दिल्ली और मुंबई की खबरों पर रहती है। लिहाजा बुलेटिनों में इन जगहों की खबरों को न सिर्फ प्राथमिकता मिलती है, बल्कि उन पर आधे-आधे घंटे के कार्यक्रम भी बनाए जाते हैं।

 

खबरों के एजेंडे का फॉर्मूला नंबर 3 हैं अपराध और हादसे। एक तो हादसों और अपराध से जुड़े मानवीय पहलू और दूसरे उनसे होनेवाले नुकसान की जानकारी में लोगों की दिलचस्पी- ये दोनों पक्ष दर्शकों को हादसों और अपराध की खबरों से जोड़ते हैं। ऐसे में, अपराधों और हादसों की प्रकृति और विशालता को देखते हुए उनसे जुड़ी खबरों को बुलेटिनों में अहमियत मिलती है।

 

आमतौर पर खबर की परिभाषाओं में उनकी तात्कालिकता और सामयिकता अहम है यानी जो कुछ नया है उसमें खबर का पुट हो सकता है। लेकिन, टेलीविजन के समाचार चैनलों के एजेंडे में वो सब कुछ शामिल होता है जिसमें सामयिकता की उम्मीद हो यानी जिससे कुछ नया निकले, कोई नई खबर निकले, भले ही वो अवश्यमभावी हो जैसे कि कोर्ट के फैसलों में ये तय माना जा सकता है कि फैसला पक्ष में होगा या विपक्ष में। खबर तब बनती है जब फैसला उम्मीद के मुताबिक न हो और तब भी जब उम्मीद के हिसाब से ही हो, बशर्ते उससे कुछ ऐसी शख्सियतें जुड़ी हों, जो टेलीविजन पर बिकते हों। इसी तरह, किसी नेता के चुनावी भाषण में आम तौर पर तय माना जाता है कि वो वही बोलेगा जो पिछले कई भाषणों में बोल चुका हो, लेकिन जो भी वो बोले उसे खबर माना जाता है चुंकि नेता लोकप्रिय होते हैं, उनके चेहरे बिकते हैं, लोग ये जानना चाहते हैं कि वो आखिर क्या बोल रहे हैं।

 

ऐसे में, टेलीविजन के समाचार चैनलों में रोजाना दिन का एजेंडा तय करते हुए समाचार चैनलों के संपादकीय विभागों को ये ध्यान रखना पड़ता है कि आज कौन-कौन से प्रमुख कार्यक्रम हैं, क्या-क्या घटित होनेवाला है। इसी के आधार पर ये भी तय होता है कि कौन से कार्यक्रम या घटना पर आधारित खबर चैनल पर कितनी देर तक किस रूप में चलने के काबिल है। अगर किसी दिन किसी अदालत में किसी मामले पर बड़ा फैसला आनेवाला होता है, तो उसके अनुरूप पहले से तैयारी की जाती है जिसके तहत घटना की पृष्ठभूमि बताने से लेकर कोर्ट से संवाददाताओं के लाइव प्रसारण और प्रतिक्रियाएं हासिल करने से लेकर फैसले के विशद विश्लेषण तक चंद मिनटों से लेकर कई घंटों तक की पैकेजिंग और प्रोग्रामिंग की योजनाएं बनती हैं और उन्हें अमली जामा पहनाया जाता है। इसी तरह नेताओं के बयानों और उनकी चुनावी रैलियों से निकलनेवाली खबरों के साथ होता है। पहले से पता होता है कि आज अमुक नेता की अमुक जगह कितनी बड़ी रैली होनेवाली है, तो उसकी तैयारी से लेकर भाषण के लाइव प्रसारण और फिर बयानों पर प्रतिक्रिया समेत तमाम तत्वों को समेटते हुए चैनल पर मिनटों से लेकर घंटों तक के प्रसारण की योजना बनती है।

 

ऐसी घटनाएं जो अचानक होती हैं, जिनके बारे में पता नहीं होता, मसलन हादसे और अपराध, उनकी विशालता और प्रकृति एजेंडे में बदलाव करवा सकती है। और ये समाचार चैनलों पर निर्भर करता है कि वो अचानक होनेवाली घटनाओं को कितनी गंभीरता से लेते हैं और किस तरीके से उन पर प्रतिक्रिया देते हैं। ये सब तब संभव होता है जबकि समाचार चैनलों के संपादकीय विभाग और संवाददाता खबरों के प्रति गंभीर हों, तत्पर हों। किसी बड़े ट्रेन हादसे की कितनी बड़ी कवरेज हो, इसके पीछे कई तत्व काम करते हैं। बहुत बड़ा हादसा होने पर भी टेलीविजन पर कई बार मुकम्मल तरीके से खबरें चलने में काफी वक्त लग जाता है क्योंकि न तो समय से विजुअल हासिल हो पाते हैं, ना ही चश्मदीदों और दूसरे संबंधित लोगों की प्रतिक्रियाएं मिल पाती हैं। अगर, सारी चीजें समय से हासिल हों और कोई और बड़ी खबर चैनल के पास न हो, तो एक हादसा चैनल के कई घंटे के बुलेटिनों में प्रमुखता से छाया रह सकता है।

 

कौन सा दिन किस खबर के नाम रहेगा, ये पहले से तय कर पाना आम तौर पर मुमकिन नहीं होता। लेकिन, बहुधा, ऐसा भी देखा जाता है कि सुर्खियों में जो खबर सुबह से चलती रहती है, वो दिन से रात तक बुलेटिनों में भी प्रमुखता से शुमार रहती है। उदाहरण के लिए आम बजट या रेल बजट के दिन या फिर सुप्रीम कोर्ट के बड़े फैसलों के दिन ऐसा पाया जाता है कि सुबह 6 बजे से लेकर रात 12 बजे और आगे तक की सुर्खियों में एक ही थीम की खबर पहली है और बुलेटिनों में भी वही ज्यादा से ज्यादा जगह ले रही है। दर्शकों को ये बोरिंग भी लग सकता है कि आखिर एक ही मामले की खबर लगातार क्यों चलती है? इसका जवाब तो ये है कि कोई भी व्यक्ति लगातार 6 या 8 घंटे या 12 घंटे तक एक समाचार चैनल नहीं देखता और कुछ वक्त के अंतराल पर जब वो समाचार चैनल देखता है तो उसे नई खबर या खबर के अपडेट की जरूरत होती है, तो जिसने पहले नहीं देखा उसके लिए तो खबर नई ही होती है और जो लगातार देख रहे हैं, उन्हें जरूर कुछ बोरिंग लग सकता है, पर अपडेट भी तो मिल सकते हैं। दूसरा एक पहलू और है कि अगर कोई खबर 'बड़ी खबर' कहलाने के काबिल है, तो आखिर चैनल पर चलेगी भी तो वही खबर, उसके आगे दूसरी किस खबर को अहमियत दी जा सकती है? खबरों के प्रसारण की समझदारी और इस पर फैसला जटिल है और संपादकीय जिम्मेदारी वाले व्यक्ति विशेष के हिसाब से बदलता रहता है। जाहिर है, इसी हिसाब से बुलेटिन का, खबरों का और चैनल का एजेंडा भी बदलता है। जो लोग एजेंडा तय करते हैं, उनमें खबरों के प्रति संजीदगी और समझदारी बहुत जरूरी है। साथ ही ये भी जरूरी है कि वो चैनल के प्रसारण के आंकड़ों, टीआरपी वगैरह से भली भांति परिचित हों और सबसे बढ़कर ये जरूरी है कि उनमें समय और परिस्थितियों और चैनल के फायदे-नुकसान के हिसाब से खबर पकड़ने और छोड़ने का विवेक हो।

 

- कुमार कौस्तुभ