शुक्रवार, 1 अप्रैल 2016

विवादों की बुनियाद पर टिके टीवी के समाचार चैनल



9 फरवरी 2016 को दिल्ली ही नहीं बल्कि देश-विदेश में मशहूर जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के कैंपस में देशविरोधी नारेबाजी की जो घटना हुई, उसकी चर्चा काफी दिनों तक टीवी के समाचार चैनलों पर छाई रही। आमतौर पर विश्वविद्यालयों के परिसरों में होनेवाले छात्रों के कार्यक्रमों में मीडिया की मौजूदगी नहीं ही रहती है, ना ही किसी मुद्दे पर बैठक या सेमिनार-संगोष्ठी जैसे कार्यक्रमों में टेलीविजन चैनलों की दिलचस्पी देखी जाती रही है क्योंकि एक तो ये कार्यक्रम ‘विजुअली’ बोरिंग किस्म के होते हैं, दूसरे, टीवी चैनलों में ये मान लिया जाता है कि भला ऐसे कार्यक्रमों में देशभर या टार्गेट ऑडिएंस के लिए न्यूज़ क्या निकलेगी? इस आम धारणा के बावजूद 9 फरवरी को जेएनयू कैंपस में हुए कार्यक्रम में चुनिंदा मीडिया की मौजूदगी देखी गई। ये भी कहा गया है कि मीडिया को इस कार्यक्रम की कवरेज के लिए बाकायदा छात्रों के एक संगठन की ओर से बुलाया गया था। और इसके बाद टीवी चैनलों पर जो तस्वीरें आईं और फिर जो कुछ हुआ वो न सिर्फ देश बल्कि पूरी दुनिया के दर्शकों ने टीवी चैनलों से लेकर सोशल मीडिया तक हर प्लेटफार्म पर देखा। इसके साथ ही अलग-अलग प्रतिक्रियाओं की बरसात शुरु हुई, बहस, रैलियां और प्रदर्शन शुरु हुए, कोर्ट कैंपस में मारपीट हुई..और जेएनयू में हुई एक घटना को लेकर अब तक जो कुछ हो रहा है वो रोज एक न एक नई खबर को जन्म दे रहा है। मीडिया को, खासकर टीवी के समाचार चैनलों को जिंदा रहने के लिए खबर चाहिए, वो भी हर रोज एक बार ही नहीं, बल्कि हर घंटे, हर पल। खबरें भला कहां से आती हैं, छप्पर फाड़कर तो आती नहीं, रोज-ब-रोज होनेवाली घटनाओं से ही निकलती हैं और संवाददाता या पत्रकारगण हमेशा घटित हो रही घटनाओं में से अपने काम लायक खबरें निकालते हैं, अपने लिए यानी अपने चैनल, अपने अखबार के लिए खबरों का निर्माण करते हैं। यहां खबरों का निर्माण कहना इसलिए जरूरी हो गया है क्योंकि अब खबरबाजी की प्रक्रिया में आज के पत्रकार हर घटना को अपने लिए उपयोगी खबर का मोड़ देने में लगे दिखते हैं। और इसका सबसे आसान तरीका है किसी भी घटना में विवाद खोजना, विवाद पैदा करना, और उस विवाद से नए-नए विवादों का सृजन जो खबरबाजी की प्रक्रिया को बरकरार रखे। जेएनयू की घटना भी एक ऐसी ही घटना मानी जा सकती है, क्योंकि इसे उन प्रायोजित घटनाओं की श्रेणी में रखा जा सकता है, जिनसे विवाद की पैदाइश की गुंजाइश हो और मीडिया उन्हें लपकने को तैयार बैठा हो। सवाल ये नहीं है कि जेएनयू में 9 फरवरी को जो कुछ हुआ वो गलत था या नहीं, सवाल तो ये है कि पहली बार, हां, शायद पहली बार ही मीडिया को, कुछेक टीवी चैनलों को कैंपस में हुए एक कार्यक्रम में खबर का एंगल क्यों मिला। जेएनयू में रोज ही तमाम बैठकें होती हैं, परिसंवाद होते हैं जिनमें देश के गणमान्य विद्वान, शिक्षाविद, राजनयिक, राजनेता जैसे तमाम लोग शामिल होते हैं, लेकिन ऐसे कितने कार्यक्रमों की कवरेज टीवी चैनलों की ओर से की जाती है? शायद उंगुलियों पर गिनने लायक कार्यक्रम मिलें, जिनमें टीवी चैनलों के कैमरे दिखें। लेकिन एक दिन एक कार्यक्रम की कवरेज हुई और उसके बाद पूरे देश में आग लग गई। ये कहना गलत होगा कि उक्त कार्यक्रम को नहीं कवर किया जाना चाहिए था। यहां तो इसके जरिए सिर्फ ये बताने की कोशिश हो रही है कि कैसे एक घटना की कवरेज एक विवाद की कवरेज में बदल जाती है और वो विवाद ऐसी खबर बन जाता है जो टीआरपी की जंग लड़ रहे चैनलों के लिए कोरामीन की खुराक से कम नहीं।
विवाद को खबर बनाने की बात सिर्फ जेएनयू की घटना की कवरेज तक ही सीमित नहीं है। आपको रोज ही टीवी पर किसी नेता, या किसी और सामाजिक या राष्ट्रीय महत्व की शख्सियत का कोई न कोई ऐसा बयान देखने को मिल जाएगा जिस पर ताबड़तोड़ प्रतिक्रियाएं आ रही होंगी और टीवी पर आधे-आधे घंटे का डिबेट चल रहा होगा। टीवी के लिए इंटरव्यू करनेवाले य़ा बाइट लेनेवाले पत्रकारों की हमेशा ये कोशिश रहती है कि सामनेवाला व्यक्ति कुछ न कुछ ऐसा बोल दे, जिससे खबर बन जाए और खबर आमतौर पर कुछ सकारात्मक बोलने पर नहीं बनती, बल्कि कुछ ऐसा बोलने बनती है जो किसी न किसी को चुभे। नेताओं की सभा और भाषणबाजी के दौरान भी बड़ी आसानी से ऐसी चंद लाइनें निकल जाती हैं जिन पर विवाद खड़ा होता है और टीवी पर दिन भर से लेकर प्राइम टाइम तक में प्रमुखता से चलने के लिए खबर बन जाती है। अब 29 मार्च 2016 को हुई एक घटना को ही देखिए। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के एक कार्यक्रम में केंद्र सरकार के कृषि राज्यमंत्री संजीव बाल्यान के एक किसान को दिये गये बयान पर ऐसा विवाद खड़ा हुआ कि मंत्री महोदय को बार-बार सफाई पेश करनी पड़ी। खबर है कि किसान ने मंत्री से अपने खेत में हुए नुकसान की बात बताई और आत्महत्या करने की धमकी दी तो मंत्री ने आपे से बाहर होकर उसे कह डाला कि –‘जा कर ले आत्महत्या’। मंत्री ने ये बयान किन हालात में दिया और क्या ये कहने के पीछे वाकई जिम्मेदार मंत्री की ये मंशा रही होगी कि नुकसान से परेशान किसान खुदकुशी कर लें तो कर लें, उन्हें कोई परवाह नहीं- ये सोचने की बात है। लेकिन टीवी चैनलों पर संजीव बाल्यान का वो बयान बार-बार हाईलाइट करके चलाया गया और विरोधियों ने इस पर मंत्री की आलोचना के लिए अपने तरकश के तमाम तीर निकाल लिए। जाहिर है, मंत्री की जुबान से जो बात निकल चुकी थी, उसने ऐसे विवाद को जन्म दे दिया, जो टीवी के लिए बड़ी खबर बन गया।
ऐसे तमाम उदाहरण आए दिन देखने को मिलते रहते हैं। वीएचपी नेता साध्वी प्राची, बीजेपी सांसद साक्षी महाराज, केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह, उत्तर प्रदेश सरकार के कद्दावर मंत्री आजम खान, जगदंबिका पाल, बेनी प्रसाद वर्मा जैसे तमाम नेता तो ऐसे बयानवीर हैं जो जब बोलते हैं तो जैसे आग निकलती है और कोई न कोई नया विवाद खड़ा हो जाता है और टीवी के समाचार चैनल उनके बयानों को आज की प्रमुख खबर या सबसे बड़ी खबर के तौर पर पेश करते नहीं थकते। हालांकि, राजनाथ सिंह और गुलाम नबी आजाद जैसे बड़े नेता भी कभी-कभी कुछ ऐसा बोल जाते हैं जो विवाद का मुद्दा बन जाता है। गौर कीजिये, जेएनयू मुद्दे पर हाफिज सईद वाला राजनाथ सिंह का बयान और ISIS  और RSS  की तुलना वाला गुलामनबी आजाद का बयान।
विवादों से खबर बनाने की प्रक्रिया का सबसे अहम हिस्सा है राजनीतिक हस्तियों की बाइट्स। देश में विजुअल मीडिया की सबसे बड़ी समाचार एजेंसी एएनआई के संवाददाता और कैमरामैन रोज तड़के तकरीबन हर प्रमुख राजनीतिक दल के बड़े प्रवक्ता, या बोलने में माहिर नेता से गुजरे दिन या बीती रात या आज के दिन होनेवाली प्रमुख गतिविधियों पर बाइट लेने पहुंचते हैं और वो बाइट्स तमाम सब्सक्राइबर टीवी चैनलों को दी जाती है। अगर किसी नेता ने कोई ऐसी लच्छेदार बात कह दी या तीखा बयान दे दिया जिससे विवाद की बू आ रही हो, तो समझ लीजिए कि टीवी के समाचार चैनलों का दिन बन गया। क्योंकि फिर तो एक बयान की बाल की खाल निकालते हुए प्राइम टाइम तक की निपटाने की संभावना बन जाती है।
जहां विवाद, वहां खबर – टीवी के समाचार चैनलों के लिए ये फॉर्मूला कई वजहों से बेहद कारगर है। एक वजह तो ये है कि इसके जरिए समाचार चैनलों को समाज की वो सच्चाई दिखाने का मौका मिलता है, जिससे आम दर्शक नावाकिफ रहता है। मसलन मंत्रीजी अगर कैमरे के सामने कुछ ऐसा-वैसा बोल गए, तो दर्शक को तो पता चलेगा ही ना कि असल में सफेदपोश, लकदक कपड़ों में देश की दशा-दिशा का हिसाब रखनेवाले कर्णधारों के मन में क्या चल रहा है? अब 30 मार्च 2016 को मीडिया में वारयल यूपी के सीएम अखिलेश यादव की एक बाइट को ही देखिए जिसमें वो अपनी समस्या के लिए गुहार लगानेवाली एक महिला की बात सुने बगैर पुलिसकर्मियों से उसे सभा से हटाने औऱ उसकी मदद नहीं करने को कह रहे हैं और ये भी आरोप लगा रहे हैं कि ये उनकी सभा को डिस्टर्ब करने की विरोधियों की साजिश है। घटना की सच्चाई असल में जो भी हो, लेकिन सार्वजनिक मंच से क्या सीएम को इस तरह बयान देना शोभा देता है, क्या ये सवाल नहीं उठता कि भले ही महिला विरोधियों की साजिश के तहत सभा में आई हो, लेकिन, सीएम को उससे अलग तरीके से पेश आना चाहिए था औऱ विनम्रता से बात करके मामले को ठंडा करना चाहिए था। तो जो कुछ हुआ, उसमें सीएम अखिलेश यादव खुद विवाद में फंस गए और मीडिया ने उनके बयान और उस घटना की तस्वीरों को पेश करके सीएम को आईना दिखाने का ही काम किया। इस तरह, कई बार ऐसा हुआ है कि कैमरे के सामने गलतबयानी करने पर नेताओं को सफाई पेश करनी पड़ती है, शर्मिंदा होना पड़ता है, क्योंकि बयानों से विवाद में फंसने पर उनका असली चेहरा सामने आ जाता है। और खबर की खोज में लगा मीडिया, टीवी चैनलों के पत्रकार तो हमेशा इस ताक में रहते हैं कि कोई कुछ ऐसा बोल जाए, जिसको लेकर उसकी खिंचाई का मौका मिल जाए।  

ऐसा नहीं है कि विवाद सिर्फ किसी शख्सियत के बयान से ही निकले। विवाद तो किसी भी घटना से निकल सकता है, जैसा जेएनयू प्रकरण में देख ही चुके हैं। इसके अलावा, सरकारी योजनाओं के कार्यान्वयन, घोटाले, दफ्तरों में कार्यप्रणाली से लेकर घरों से सड़कों तक आम लोगों के झगड़े तक की खबर में विवाद का एंगल तलाशा जा सकता है। हर आदमी का जीवन कहीं न कहीं विवाद से जुड़ा है और वो विवाद तब खबर बन सकता है, जब किसी सुधी पत्रकार या संवाददाता की नज़र उस पर पड़ जाए। अगर किसी नामी हस्ती से जुड़ा विवाद हो, तो खबर ज्यादा वजनदार हो सकती है। उदाहरण के लिए, पूर्व केंद्रीय मंत्री नटवर सिंह की बहु नताशा सिंह की मार्च 2002 में हुई मौत का मामला भले ही ग्लैमर और क्राइम के एंगल से खबर हो, लेकिन चुंकि इसको लेकर नटवर सिंह और उनके बेटे जगत सिंह विवाद में रहे, इसलिए भी ये बड़ी खबर थी। या फिर 2015 में शीना बोरा हत्याकांड में मीडिया जगत की मशहूर हस्ती रहीं इंद्राणी मुखर्जी और पीटर मुखर्जी की गिरफ्तारी की खबर भी काफी हद तक इन हस्तियों के विवाद में फंसने के चलते टीवी के समाचार चैनलों के लिए ‘हॉटकेक’ बन गई।
भले ही आजकल इस बात पर जोर दिया जा रहा हो कि टीवी और दूसरे समाचार माध्यमों में सकारात्मक खबरों को प्रमुखता दी जानी चाहिए, लेकिन ये कड़वी सच्चाई है कि मनोवैज्ञानिक तौर पर ऑडिएंस का रुझान उन्हीं खबरों पर ज्यादा रहता है जहां कुछ सवाल उठ रहे हों, कुछ सस्पेंस हो और ऐसा अक्सर विवादों में ही देखने को मिलता है। 24 में से 18 घंटे खबरें दिखाने की होड़ में लगे टीवी के समाचार चैनलों के सामने बुलेटिनों की ताजगी बरकरार रखने के लिए विवादों से खबर निकालने के अलावा शायद कोई और चारा नहीं और टाइम स्लॉट भरने के लिए गर्मागर्म बहसबाजी के जो कार्यक्रम रोज पेश किये जाते हैं, उनकी बुनियाद भी तो विवादों पर ही टिकी है। विवाद न हों, तो भला बात कैसे होगी, मुद्दा तो विवाद से ही खड़ा होगा और तभी टीवी के बने-बनाए मंच पर वाद-विवाद-संवाद की औपचारिकता भी पूरी की जा सकेगी।
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-          कुमार कौस्तुभ
SRB-101-C, शिप्रा रिवेरा,
ज्ञान खंड-3, इंदिरा पुरम,
गाजियाबाद- 201014
Mobile- 9953630062, 9910220773

मंगलवार, 22 सितंबर 2015

संदर्भ बिहार चुनावः हम क्यों जाएं बिहार?



24 साल पहले, 15 अगस्त 1991 को मैं नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर वैशाली एक्सप्रेस से उतरा ..पहली बार दिल्ली आया था..मन में नई उम्मीदें थीं.. रोजी-रोटी के लिए जिंदगी बनाने का इरादा था..दिल्ली में राह दिखाने के लिए कुछ सीनियर थे, जो मुझसे कई साल पहले से दिल्ली आकर यहां अपना ठिकाना बना चुके थे और आगे की राह तलाश रहे थे...क्योंकि उनके लिए भी तब बिहार में कुछ करने का कोई रास्ता नहीं बचा था...और मेरे जैसे लड़कों के लिए भी.. मेरे आसपास, मुझसे कुछ पहले और मुझसे कुछ बाद मेरे कई साथी, और कई अनजान लड़के भी तब दिल्ली में अपना भविष्य देख रहे थे..कुछ इंजीनियरिंग और मेडिकल की तैयारी कर रहे थे, तो कुछ दिल्ली विश्वविद्यालय और दूसरे संस्थानों में पढ़ाई करके जिंदगी बनाना चाहते थे..1990-91 का दौर उससे दस-बीस साल पहले के वक्त से अलग था, जब हमारे यहां के कई छात्र, जिनके पास सुविधा थी, पूंजी थी, शौक से करियर की नई ऊंचाइयों को छूने के लिए दिल्ली आते थे, ये बात दीगर है कि कितने लोग कहां तक पहुंचे..लेकिन मैं आपको 90 के दशक के जिस दौर में ले आया हूं उस वक्त बिहार से दिल्ली आना तमाम छात्रों की मजबूरी बन गया था..ऐसे भी छात्र थे जिसके घरवालों के पास पैसे की कमी नहीं थी और ऐसे भी थे, जिनके परिजन बड़ी मेहनत से गाढ़ी कमाई जोड़कर अपने बच्चों को दिल्ली भेज रहे थे कि वो जिंदगी में कुछ बन सकें, अच्छी पढ़ाई कर सकें, अच्छी नौकरी हासिल कर सकें...ऐसा नहीं था कि उस वक्त बिहार में रहते हुए भी लड़के अच्छा नहीं कर रहे थे, औऱ उन लोगों ने बेहतरीन करियर नहीं बनाया, लेकिन तब सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य के मद्देनजर बहुसंख्यक मानसिकता यही बन चुकी थी कि बिहार में कुछ हासिल नहीं होनेवाला.. और इसी के चलते हमने भी वैशाली एक्सप्रेस से दिल्ली का सफर किया...और 15 अगस्त 1991 को जिंदगी में नई आजादी हासिल की...पारिवारिक बंधनों से आजादी, खुद की बदौलत कुछ कर गुजरने की आजादी...बिहार के अंधकारमय भविष्य से आजादी..
वक्त गुजरता गया..साल-दर-साल गुजरते गए..15 साल बाद बिहार को भी एक आजादी मिली..लालू राज से आजादी मिली..कहना न होगा कि बिहार में लालू प्रसाद का सत्ताशीन होना एक बड़े बदलाव का परिचायक था जिसका फायदा जाहिरा तौर पर बिहार के दलित-वंचित तबकों को मिला जो लालू के उदय से पहले तक कथित तौर पर सवर्ण सरकारों के मारे थे। सामाजिक न्याय की दुहाई देकर सत्ता में आए लालू ने उनका जो भी भला किया हो, लेकिन एक बड़ी आबादी का भविष्य जरूर अंधकारमय दिखने लगा था...15 साल बाद नीतीश कुमार के सत्ता में आने पर लोगों को भरोसा हुआ कि बिहार में हालात बदलेंगे..और हालात काफी हद तक बदले भी..सड़कें बनीं, बिजली की हालत सुधरी..,बड़ी संख्या में युवकों-महिलाओं को कांट्रेक्ट पर नौकरियां भी मिलीं.. लेकिन हमारे जैसे उन बिहारवासियों का क्या हुआ, जो प्रवासी हो चुके थे? बिहार में नीतीश सरकार के पहले दौर में कानून-व्यवस्था में सुधार के साथ-साथ ये उम्मीद भी जागी थी कि बिहार लौटकर कुछ करने की बात सोची जा सकती है। लेकिन, जो उम्मीदें बिहार में ‘सुशासन’ के पहले दौर में परवान चढ़ रही थीं, वो धीरे-धीरे खत्म होने लगीं, क्योंकि 10 साल के शासन में नीतीश वैसा बदलाव नहीं ला सके, जिसकी उम्मीद थी। ये तो एक पहलू है। अब दूसरे पहलू की बात, जो मुझ जैसे प्रवासियों से जुड़ी है। 24-25-30 साल पहले बिहार से बाहर आने के बाद हमें अपने राज्य में वापसी का कोई रास्ता नहीं मिला। जाहिर है, रोजी-रोटी और गुजर-बसर के लिए किसी ने दिल्ली को अड्डा बनाया, तो कोई बैंगलोर, कोई पुणे गया, किसी ने मुंबई से लेकर दमन और वडोदरा, अहमदाबाद तक का रुख किया और जहां पर नौकरी करने गए, वहां के होकर रह गए, वहीं घर बनाया (घर बसाया भले ही बिहार में था), और बाल-बच्चों समेत पुश्तैनी घर से कम से कम 1000 किलोमीटर दूर तो जरूर रहने लगे। नौकरी के दबाव में त्योहारों पर भी पुश्तैनी घर जाना दुश्वार हो गया औऱ जब भी घर की सरजमीं पर कदम रखा, तो लोगों से यही सुनने को मिला- बबुआ, कितने दिन के लिए आए हैं? यानी सब ये जानते हैं, समझते हैं कि जो गया, वो परदेसी हो गया, अब आएगा तो अतिथि की तरह और जाएगा भी वैसे ही। पुश्तैनी घर पर रह गए बुजुर्ग माता-पिता..य़े किसी एक घर का नहीं, पूरे मोहल्ले का हाल है..यहां तक कि शहर-दर-शहर में ज्यादातर घरों में बच गए बुजुर्ग और युवा पीढ़िय़ां नए रास्तों की तलाश में शहर से निकल गईं सिर्फ कभी-कभार आने के लिए। अब जरा सोचिए, जो व्यक्ति साल में 5-10 दिनों के लिए अपने पुश्तैनी घर पहुंच पाता हो, उसके लिए उस घर का क्या अर्थ है, उसके जो नन्हे बच्चे शुरु से पिता के पुश्तैनी घर से दूर रहे, उनके लिए वो घर किसी पर्यटन स्थल से ज्यादा महत्व कैसे रखेगा? जहां उन्होंने जिंदगी शुरु की, और जहां उन्हें जीवन की राह मिलेगी, उसी को तो वो अपना घर समझेंगे, ऐसे में उन हजारों बिहारियों के लिए बिहारी कहलाने का मतलब ही क्या, जो अपनी कथित जमीन से कभी न लौटने के लिए दूर हो गए। कोई दिल्लीवाला हो गया, कोई मुंबई वाला, कोई कहीं औऱ का, भले ही वहां के लोग उसे बिहारी ही क्यों न कहें।
सच्चाई तो यही है कि जो जहां रहता है, वो वहीं का हो जाता है, वो चाहकर भी वहां नहीं लौट सकता, जहां उसकी जड़ें थीं, यानी आज के दौर में कर्मभूमि का ही महत्व है, जन्मभूमि का नहीं। अब सरकारी नौकरियों का दौर काफी हद तक जा चुका है, पेंशन भी नहीं मिलती। लिहाजा, 60-65 साल में रिटायरमेंट का कोई मतलब ही नहीं, जब तक शरीर साथ दे, तब तक काम कर सकते हैं ..और काम भी वहीं मिलेगा, जहां आपने अपनी जगह बनाई है।
नीतीश सरकार ने शुरुआत में ये उम्मीदें जगाई थीं कि हजारों-लाखों बिहारी अपनी जन्मभूमि से जुड़ सकेंगे, लेकिन 10 साल बाद भी जमीनी हकीकत यही है कि ज्यादातर प्रवासियों का ( कुछ अपवाद हो सकते हैं) जुड़ाव अपने पुश्तैनी घर से बस तब तक है जब तक माता-पिता और चंद गहरे रिश्तेदार उस जगह पर हैं, जो आपका पुश्तैनी घर है...क्योंकि अब न आप लौट सकते, ना ही आपके बाल-बच्चे वहां लौटेंगे..कानूनन भी अगर आप लंबे समय से कहीं औऱ रह रहे हैं और वहां के वोटर हो गए, तो आपके पुश्तैनी संसदीय या विधानसभा क्षेत्र की वोटिंग लिस्ट में आपका नाम नहीं होना चाहिए..तो जाहिर है, जहां ज्यादा समय गुजार रहे हैं, जहां आपके लिए काम है, वहीं का होकर रहना पड़ेगा... 20-30 साल बाद अगर कुछ सोचकर, किसी उम्मीद से घर लौटेंगे भी तो स्थानीय लोग यही पूछेंगे – अब क्य़ा करने आए हो, यही कहेंगे- क्या बाहर कुछ काम नहीं था? कुछ लोगों को ये भी लगेगा कि आप उनके काम में बाधा बन कर खड़े हो सकते हैं, या उनसे मुकाबला कर सकते हैं यानी ऐसा मुमकिन नहीं कि आप वापसी करें तो आपका स्वागत ही हो, हो सकता है नई-नई सामाजिक मुश्किलें आपका इंतजार कर रही हों, जो आपकी जमीन देखता होगा, वो अलग परेशान हो जाएगा, अगर आप कुछ नया काम करेंगे, तो लोग संशय की नजर से देखेंगे.. हमारे कई दोस्त अब भी ये सोचते हैं कि नौकरी का वक्त पूरा करने यानी कथित रिटायरमेंट के बाद पुश्तैनी इलाके में जाकर ही कुछ करेंगे। पर बड़ा सवाल ये है कि करेंगे तो क्या करेंगे? बहरहाल ये अलग चर्चा का विषय है औऱ इस पर सबकी अपनी-अपनी राय हो सकती है। हकीकत तो यही है कि आपको लौटना भी होगा तो अकेले, परिवार सहित लौटना मुमकिन नहीं, क्योंकि बाल-बच्चे अपना करियर देखेंगे, उनके पास आपके साथ रहने के लिए क्या, इतना भी वक्त नहीं होगा कि वो आपको आकर कभी-कभार देख जाएं, आपसे मिल जाएं, क्योंकि वो कहीं औऱ अपने भविष्य़ की उड़ान भरेंगे। ऐसे में 25-30 साल पहले बिहार छोड़ चुके मुझ जैसे उन हजारों-लाखों बिहारियों के सामने यही सवाल है कि आखिर अब क्यों जाएं बिहार? क्या गांव या शहर की जमीन के उस टुकड़े के नाम पर जो दस्तावेजों में आपके नाम लिखा है? वही ज़मीन जिसकी देखभाल के लिए अगर आप मौके पर न रहे, तो दूसरे लोग कब्जा कर सकते हैं? आपके चंद दिन न रहने पर आपके पुश्तैनी इलाके में आपकी जिस अचल संपत्ति की सुरक्षा तक संभव नहीं, असामाजिक लोग आपकी पहचान मिटाने को आतुर रहते हैं, उसको आप कब तक ढो सकते हैं?  दीगर बात है कि देश ही नहीं दुनियाभर में बिहार से ‘बेघर’ हो चुके हमारे तमाम भाई-बंधु अपने हुनर औऱ अपनी मेहनत से न सिर्फ अपने जीने का बंदोबस्त कर रहे हैं बल्कि अहम मुकाम भी बना चुके हैं, खुद को ‘बिहारी’ कहते हुए गर्व भी होता है, तो हमारे तमाम भाइयों को इसी पहचान के चलते जिल्लत भी झेलनी पड़ती है। भले ही वो बिहार का नाम दुनियाभर में कर रहे हों, लेकिन बिहार ने प्रवासियों को क्या दिया? उन्हें क्यों जाना चाहिए बिहार?
ये सवाल ज़ेहन में इसलिए उठा है क्योंकि हमारे कई मित्र आजकल अपील कर रहे हैं बिहार में ‘जंगलराज’ आने से रोकने के लिए बिहार लौटिए, वोट दीजिये। पर मुझे तो लगता है कि बिहार का भविष्य अब उन्हीं के हाथों में सुरक्षित है, जो लोग बिहार में रह रहे हैं और रहेंगे। क्योंकि उन्हें ही अपना भला-बुरा बेहतर तरीके से समझना चाहिए। लिहाजा, बिहार में रहनेवाले वहां के वोटरों से यही उम्मीद है कि आनेवाले चुनाव में वो अपने भविष्य, अपनी आगे की पीढ़ियों के भविष्य को देखते हुए नई सरकार चुनने के लिए वोट देंगे, ताकि आप सलामत रहें, आपकी जमीन, आपकी पहचान सलामत रहे, बिहार में ही ऐसे अवसर पैदा हों ताकि आपकी आनेवाली पीढ़ियों को बाहर जाकर प्रवासी न बनना पड़े। क्योंकि एक बार प्रवासी बन गए, तो वापसी मुश्किल है। बिहारवासियों, अपने भविष्य के लिए आप जिसे भी बेहतर समझते हैं, उसे वोट दीजिये, भला होगा तो आपका, बुरा होगा तो आपका।

गुरुवार, 18 सितंबर 2014

गांधीजी के नाम पर ऑरवेल को बख्श दीजिय़े




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एक तरफ 2017 में महात्मा गांधी के चंपारण आंदोलन की शतवार्षिकी की तैयारियां चल रही हैं तो दूसरी तरफ बिहार के मोतिहारी में मोतिहारी से जुड़ी एक और शख्सियत जॉर्ज ऑरवेल की स्मृतियां मिटाने की तैयारी हो रही है। वो भी सिर्फ इस नाम पर कि ऑरवेल अंग्रेज थे, उस ब्रिटिश हुकूमत के एक अफसर की पैदाइश थे, जिसने हिंदुस्तान को बरसों गुलाम बनाए रखा। मोतिहारी में इन दिनों बढ़ चढ़कर ऑरवेल की स्मृति में पार्क और मेमोरियल बनाए जाने का विरोध हो रहा है। इसका मकसद आखिर क्या है? आप गांधीजी को मानते हैं। चंपारण में उनके आने और यहां अपने आंदोलन की शुरुआत करने को लेकर फख्र महसूस करते हैं। आप ये भी चाहते हैं कि गांधीजी के नाम पर सरकारें (केंद्र और राज्य) चंपारण और मोतिहारी के विकास में कुछ योगदान करें। लेकिन आप ये भूल जाते हैं कि चंपारण के मोतिहारी की जमीन पर ही पैदा हुआ था ऑरवेल जैसा नामचीन लेखक जिससे दुनिया में मोतिहारी की पहचान जुड़ी है। ऑरवेल की स्मृति मिटा देने का कोई तार्किक मतलब नहीं है। न तो ऑरवेल को इस बात की सज़ा दी सकती है कि वो उस अंग्रेज की औलाद थे, जिसने चंपारण पर शासन किय़ा, ना ही ऐसी किसी बात के लिए जो उन्होंने कभी हिंदुस्तान के या गांधीजी के ही खिलाफ कही हो।
जिस वक्त गांधीजी मोतिहारी पधारे थे, उस वक्त ऑरवेल की उम्र महज 14-15 साल रही होगी। गांधीजी की मौत के सिर्फ 2 साल बाद 1950 में ऑरवेल ने भी प्राण त्याग दिये। लेकिन गांधीजी की मृत्यु के बाद उन्होंने बड़ी बेबाकी से जो कुछ उनके ऊपर लिखा वो महत्वपूर्ण है। ऑरवेल का लेख ‘रिफ्लेक्शंस ऑन गांधी’ 1949 में पार्टिजन रिव्यू नाम की पत्रिका में छपा था। शायद गांधीजी ने खुद भी वो लेख पढ़ा होता, तो ऑरवेल के बेबाक अंदाज के कायल हो गए होते। ऐसा नहीं कि ऑरवेल ने गांधीजी की विचारधारा और उनकी गतिविधियों पर सवाल नहीं उठाए हैं, लेकिन तमाम अंग्रेज और विदेशी लेखकों से अलग हटकर निष्पक्ष तरीके से उन्होंने गांधीजी के व्यक्तित्व और कृतित्व की जो व्याख्या की है उसे खारिज भी नहीं किया जा सकता। गांधीजी पर ऑरवेल का लेख और उस पर लिखे गए तमाम और भी लेख इंटरनेट पर बड़ी आसानी से उपलब्ध हैं, कोई भी उन्हें तलाशकर पढ़ सकता है। सवाल सिर्फ यही है कि मोतिहारी में ऑरवेल के मेमोरियल का विरोध क्यों हो रहा है और इससे क्या हासिल होनेवाला है। ऑरवेल ने जो कुछ गांधीजी पर लिखा है, उससे साफ है कि वो गांधीजी के विरोधी नहीं थे। वक्त और हालात ने उन्हें उसी मोतिहारी की धरती पर पैदा किया जो गांधीजी की कर्मभूमि के नाम से मशहूर है। गांधी और ऑरवेल अपने-अपने क्षेत्र के सम्माननीय़ व्यक्तित्व हैं और दोनों की एक-दूसरे से न तो तुलना हो सकती है, ना ही एक के नाम पर दूसरे को खारिज किया जा सकता है। अगर मोतिहारी के लोगों को गांधीजी के अपनी जमीन से जुड़ाव का गर्व है, तो उन्हें इस बात का भी फख्र होना चाहिए कि ऑरवेल जैसे लेखक यहां की जमीन पर पैदा हुए।
एक और बात सामयिक है, वो ये कि अगर हम ऐसा चाहते हैं कि गांधीजी के चंपारण आंदोलन की शतवार्षिकी पर मोतिहारी को कुछ फायदा हो, गांधीजी के नाम पर मोतिहारी और चंपारण के विकास को कुछ और गति मिले, तो हमें ऑरवेल से क्यों द्रोह है? अगर सरकार ऑरवेल के नाम पर मोतिहारी में कुछ करना चाहती है तो उसका स्वागत होना चाहिए। साथ ही, मोतिहारी के लोगों को विदेशों की उन एजेंसियों और संस्थाओं को भी आमंत्रित करना चाहिए, जो ऑरवेल की स्मृति , उनकी विरासत को सहेजने में कुछ योगदान कर सकती हों। मोतिहारी में प्रस्तावित महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय में ऑरवेल के नाम पर अध्ययन पीठ की स्थापना होनी चाहिए, ताकि ब्रिटेन और अमेरिका के विद्य़ार्थी उस महान लेखक की जन्मभूमि पर आकर शोध और अनुसंधान कर सकें। अगर इस तरह की गतिविधियां शुरु होती हैं तो निश्चित रूप से इसका फायदा मोतिहारी और चंपारण क्षेत्र को ही मिलेगा, कोई नुकसान नहीं होगा। गांधीजी की दुनिया में महत्ता निर्विवाद है और ऑरवेल भी लेखक के तौर पर दुनिया में कम मशहूर नहीं। ऐसे में अगर गांधीजी के साथ-साथ ऑरवेल की विरासत को सहेजने की भी पहल होती है, तो इसमें कोई बुराई नहीं दिखती। हां, चाहे गांधीजी का मेमोरियल हो, या ऑरवेल का, उसके लिए जमीन अधिग्रहण जैसे विवाद नहीं पैदा होने चाहिए और ये तय करना सरकार और प्रशासन का काम है कि कैसे किसी भी विवाद से बचकर विकास को गति दी जा सकती है। गांधीजी तोड़ने में नहीं जोड़ने में विश्वास करते थे और अगर उस धरती पर , जहां का नाम गांधीजी से जुड़ा है, वहां ऑरवेल जैसी शख्सियत की याद मिटाने की कोशिश हो, तो उससे शर्मनाक कुछ भी नहीं होगा। इसलिए गांधीजी के ही नाम पर सही, ऐसी तमाम कोशिशों को किनारे कर दिया जाना चाहिए, जो ऑरवेल के विरोध में शुरु हुई हैं और गांधीजी और ऑरवेल को जोड़कर एक नई पहल होनी चाहिए जिसकी गूंज सात समुंदर पार तक सुनाई दे, न कि ऐसी कोई कार्रवाई हो, जो गांधी की कर्मभूमि कहलानेवाली धरती का नाम दुनिया में कलंकित करे।